लौकी के पकौड़े रेसिपी: आलू-प्याज नहीं शाम की चाय के साथ मिनटों में बनाएं लौकी के पकौड़े, सेहत और स्वाद दोनों का है असली रूप

सामग्री: 1 कद्दू की हुई लौकी, 1 कप बेसन, 2 हरी मिर्च नीली कटी हुई, 1 छोटा प्याज़ रंगीन कटा हुआ, 1/2 मीठी लाल मिर्च पाउडर, 1/2 मीठी हल्दी, 1/2 छोटी हल्दी, हल्का हरा धनिया, स्वाद साबूत नमक, तेल छवि: फ्रीपिक पकौड़े बनाने की आसान विधि: सबसे पहले लोकी को धोकर छीलें और फिर उसे कद्दू कर लें। कद्दू की हुई लौकी को बिजली साकस ने उसका अतिरिक्त पानी निकाल दिया। छवि: एआई लेकिन पानी बिल्कुल भी पसंद नहीं है क्योंकि उसी से बैटर तैयार किया जा सकता है। अब एक बड़ी कटोरी में लोकी, बेसन, हरी मिर्च प्याज, हल्दी, लाल मिर्च, अजवायन, हरा धनिया और नमक शामिल है। छवि: एआई सभी निःशक्तों को अच्छी तरह से ठीक करें। जरूरत लगे तो थोड़ा पानी के अनुकूल एनालॉग बैटर तैयार कर लें। अब कढ़ाही में तेल गर्म करें। तेल गर्म होने के बाद हाथ या पेट की मदद से छोटी-छोटी पकौड़े डालें। छवि: एआई उदाहरण के तौर पर मध्यम आंच पर सोनार और क्रिस्पी होने तक तलें। जब पकौड़े अच्छे तरह से पक जाएं तो उन्हें प्लेट में निकाल लीजिए. लौकी के गरमागरम पकौड़ों को हरी चटनी, टोमैटो सॉस या दही के साथ परोसें। छवि: एआई चाय के साथ इनका स्वाद और भी शानदार लगता है। लॉकी पेट को प्रभाव और ठंडी कहानी है। वनस्पति से भरपूर होने के कारण पाचन अच्छा रहता है। कम तेल में भी स्वादिष्ट बन जाते हैं। छवि: एआई बच्चों को प्रमाणित करने के तरीके से सामान्य ज्ञान का तरीका है। इसलिए इसे आप शाम के समय छोड़ सकते हैं। छवि: फ्रीपिक अगर आप रोज-रोज के आलू और प्याज के पकौड़े से कुछ अलग स्वाद लेना चाहते हैं, तो इस बार लौकी के पकौड़े जरूर बनाएं. ये स्वाद और स्वास्थ्य दोनों का शानदार संयोजन है। छवि: एआई
कौन होते हैं कंपाउंडर, जो छोटे शहरों में धड़ल्ले से लगाते हैं इंजेक्शन, क्या होती है क्वालिफिकेशन

Last Updated:May 13, 2026, 16:31 IST Compounder Role in Hospitals: छोटे शहरों और कस्बों में क्लीनिक पर एक डॉक्टर के साथ कई कंपाउंडर काम करते हैं. कंपाउंडर का मुख्य काम डॉक्टर की मदद करना होता है, लेकिन अक्सर वे डॉक्टर की गैरमौजूदगी में मरीजों का इलाज करते हैं. NDMC के पूर्व चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. अनिल बंसल के मुताबिक कंपाउंडर कोई ऑफिशियल पोस्ट नहीं है और कानूनी रूप से ये मरीजों का इलाज नहीं कर सकते हैं. मरीजों को कभी भी कंपाउंडर से इलाज नहीं कराना चाहिए. कंपाउंडर आमतौर पर डॉक्टर के हेल्पर होते हैं और वे इलाज करने के लिए क्वालिफाइड नहीं होते हैं. Are Compounders Allowed to Treat Patients: हमारे देश में डॉक्टर्स की कमी है और इसकी वजह से तमाम झोलाझाप मरीजों का धड़ल्ले से इलाज कर रहे हैं. झोलाछाप से ट्रीटमेंट कराना न सिर्फ गैरकानूनी है, बल्कि मरीजों के लिए जानलेवा भी हो सकता है. हर साल सैकड़ों लोग झोलाझाप के चक्कर में अपनी जान गंवा देते हैं. जब भी आप छोटे शहरों या कस्बों में किसी डॉक्टर के क्लीनिक पर जाएंगे, तो वहां कई कंपाउंडर होते हैं. ये कंपाउंडर इंजेक्शन लगाने से लेकर ड्रिप चढ़ाते हुए देखे जाते हैं. कई बार डॉक्टर की गैर मौजूदगी में कंपाउंडर मरीजों का इलाज भी करते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो डॉक्टर की गैर मौजूदगी में कंपाउंडर द्वारा मरीज देखना गैर कानूनी और खतरनाक है. हमेशा क्वालिफाइड डॉक्टर से इलाज कराना चाहिए. नई दिल्ली के NDMC के पूर्व चीफ मेडिकल ऑफिसर और सीनियर फिजीशियन डॉ. अनिल बंसल ने News18 को बताया कि प्राइवेट डॉक्टर्स अक्सर अपने क्लीनिक पर कुछ हेल्पर रख लेते हैं, जिन्हें कंपाउंडर कहा जाता है. कंपाउंडर जैसी कोई ऑफिशियल पोस्ट नहीं होती है और न ही इसके लिए कोई खास डिप्लोमा या डिग्री होती है. तमाम प्राइवेट डॉक्टर 8वीं और 10वीं पास लोगों को कंपाउंडर बना देते हैं. क्लीनिक में कंपाउंडर रखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन उनका काम सिर्फ डॉक्टर की मदद करना है. वे न इंजेक्शन लगाने के लिए क्वालिफाइड होते हैं और न ही दवा प्रिस्क्राइब करने का अधिकार होता है. इसके अलावा डॉक्टर की गैर मौजूदगी में मरीजों का इलाज करना तो अपराध है. अक्सर कंपाउंडर और झोलाछाप द्वारा गलत इलाज के मामले सामने आते हैं. लोगों को जागरूक होना चाहिए और ऐसे लोगों के पास इलाज के लिए नहीं जाना चाहिए. डॉक्टर बंसल ने बताया कि आज के समय में मेडिकल सिस्टम काफी बदल चुका है. अब प्रशिक्षित नर्स, फार्मासिस्ट और पैरामेडिकल स्टाफ अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालते हैं. केवल डॉक्टर की देखरेख में प्रशिक्षित व्यक्ति ही इंजेक्शन लगाने या मेडिकल प्रक्रियाओं में सहायता कर सकता है. बिना उचित मेडिकल योग्यता और लाइसेंस के इलाज करना कानूनी रूप से गलत माना जाता है. छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं की दूरी और लोगों की जागरुकता कम होने की वजह से कई लोग पहले किसी डॉक्टर के यहां कंपाउंडर का काम करते हैं और फिर झोलाछाप बनकर इलाज करने लगते हैं. कानूनी रूप से इलाज और दवा लिखने का अधिकार केवल योग्य डॉक्टर्स को होता है. फार्मासिस्ट दवाएं देने का काम कर सकते हैं, लेकिन वे इलाज तय नहीं कर सकते. इसी तरह नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ की भी तय सीमाएं होती हैं. डॉक्टर के अनुसार गलत तरीके से इंजेक्शन लगाना बेहद खतरनाक हो सकता है. इससे नसों को नुकसान, एलर्जी, संक्रमण और गंभीर साइड इफेक्ट्स का खतरा बढ़ सकता है. अगर इंजेक्शन या सुई ठीक से स्टरलाइज न हो, तो हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी और दूसरी संक्रमण संबंधी बीमारियों का जोखिम भी बढ़ सकता है. बिना जांच और सही सलाह के दवाएं लेना शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है. खासकर एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल भविष्य में दवाओं के असर को कम कर सकता है. डॉक्टर सलाह देते हैं कि किसी भी गंभीर बीमारी, लगातार बुखार, सांस लेने में परेशानी या तेज दर्द जैसी स्थिति में योग्य डॉक्टर से ही जांच करवानी चाहिए. केवल इंजेक्शन लग जाने से बीमारी ठीक हो जाएगी, यह सोच सही नहीं मानी जाती. सही इलाज के लिए बीमारी की वजह समझना जरूरी होता है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्स में सबमिट करें
सरकार ने 14 खरीफ फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया:तुअर दाम की MSP ₹450 बढ़ाकर ₹8450 की, धान में ₹72 का इजाफा किया

केंद्र सरकार ने 14 खरीफ फसलों की मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) बढ़ा दी है। केंद्रीय कैबिनेट ने आज यानी 13 मई को यह फैसला लिया। कैबिनेट मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि धान की नई MSP 2441 रुपए तय की गई है, जो पिछली MSP से 72 रुपए ज्यादा है। वहीं तुअर दाम की MSP 450 रुपए बढ़ाई है। मूंगफली का समर्थन मूल्य 254 रुपए बढ़कर 7517 रुपए किया क्या है MSP या मिनिमम सपोर्ट प्राइस न्यूनतम समर्थन मूल्य वो गारंटीड मूल्य है जो किसानों को उनकी फसल पर मिलता है। भले ही बाजार में उस फसल की कीमतें कम हो। इसके पीछे तर्क यह है कि बाजार में फसलों की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर किसानों पर न पड़े। उन्हें न्यूनतम कीमत मिलती रहे। सरकार हर फसल सीजन से पहले CACP यानी कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइजेज की सिफारिश पर MSP तय करती है। यदि किसी फसल की बम्पर पैदावार हुई है तो उसकी बाजार में कीमतें कम होती हैं, तब MSP उनके लिए फिक्स प्राइस का काम करती है। यह एक तरह से कीमतें गिरने पर किसानों को बचाने वाली बीमा पॉलिसी की तरह काम करती है। कैबिनेट के 3 अन्य फैसले 1. कोयले से गैस बनाने के प्रोजेक्ट्स को मंजूरी: सरकार ने सरफेस कोल और लिग्नाइट गैसीफिकेशन (कोयले से गैस बनाने) के प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने के लिए 37,500 करोड़ रुपए की योजना को मंजूरी दे दी है। यह योजना भारत के कोयला और लिग्नाइट गैसीफिकेशन प्रोग्राम को रफ्तार देने के लिए शुरू की गई है। सरकार ने साल 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले को गैस में बदलने का लक्ष्य रखा है। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और विदेशों से आने वाली चीजों पर हमारी निर्भरता कम होगी। 2. नागपुर एयरपोर्ट की जमीन की लीज बढ़ाई: नागपुर एयरपोर्ट के लिए सरकार ने एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) की उस जमीन की लीज अवधि बढ़ाने को मंजूरी दे दी है, जो मिहान इंडिया लिमिटेड (MIL) को दी गई थी। अब यह लीज 6 अगस्त 2039 के बाद भी जारी रहेगी। 3. अहमदाबाद-धोलेरा के बीच चलेगी देश की पहली स्वदेशी सेमी हाई-स्पीड ट्रेन: सरकार ने रेल मंत्रालय के अहमदाबाद (सरखेज)-धोलेरा सेमी हाई-स्पीड डबल लाइन प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। इस पूरे प्रोजेक्ट पर करीब 20,667 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। यह भारतीय रेलवे का पहला ऐसा सेमी हाई-स्पीड प्रोजेक्ट होगा, जिसे पूरी तरह से भारत में बनी (स्वदेशी) तकनीक से तैयार किया जाएगा।
जलेबी के साथ समोसा या पोहा क्या है ज्यादा सही कॉम्बिनेशन? जानिये दोनों में अंतर

जलेबी के साथ नमकीन खाने का कॉम्बिनेशन भारतीय स्ट्रीट फूड की एक खास पहचान है. खासकर उत्तर और पश्चिम भारत में यह काफी लोकप्रिय है. अब सवाल यह है कि जलेबी के साथ समोसा बेहतर है या पोहा, और इसका स्वाद व सेहत पर क्या असर पड़ता है. साथ ही यह परंपरा कहां से जुड़ी है, यह भी जानना जरूरी है. कहां का है यह फूड कॉम्बिनेशन?जलेबी‑समोसा और जलेबी‑पोहा का कॉम्बिनेशन मुख्य रूप से उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, दिल्ली) और मध्य प्रदेश (इंदौर, उज्जैन) में काफी मशहूर है. जलेबी + समोसा: यूपी, बिहार और दिल्ली के स्ट्रीट फूड में आम.जलेबी + पोहा: खासतौर पर इंदौर (मध्य प्रदेश) की पहचान. इंदौर में तो सुबह का सबसे लोकप्रिय नाश्ता ही “पोहा‑जलेबी” माना जाता है. स्वाद के हिसाब से अंतरजलेबी + समोसा समोसा मसालेदार, कुरकुरा और थोड़ा भारी होता है.जलेबी की मिठास के साथ मिलकर तीखा‑मीठा कॉम्बिनेशन बनाता है.यह ज्यादा रिच और भरपूर स्वाद देता है. जलेबी + पोहा पोहा हल्का, नरम और हल्का नमकीन होता है.जलेबी के साथ इसका स्वाद संतुलित और सौम्य लगता है.सुबह के नाश्ते के लिए ज्यादा उपयुक्त. सेहत पर असरजलेबी + समोसा दोनों डीप फ्राइड होते हैं.ज्यादा कैलोरी और ऑयल.ज्यादा खाने पर वजन बढ़ सकता है.पाचन धीमा हो सकता है.इसलिए इसे कभी‑कभार ही खाना बेहतर है. जलेबी + पोहा पोहा कम तेल में बनता है.इसमें मूंगफली, करी पत्ता, हल्की सब्जियां होती हैं.पचने में आसान और हल्का.जलेबी के साथ खाने पर भी यह अपेक्षाकृत हेल्दी विकल्प है. कौन सा कॉम्बिनेशन बेहतर है? स्वाद के लिए: जलेबी + समोसा ज्यादा मजेदार और चटपटा.सेहत और रोज के लिए: जलेबी + पोहा बेहतर विकल्प. निष्कर्षजलेबी के साथ समोसा और पोहा दोनों ही भारतीय स्ट्रीट फूड की खास पहचान हैं, लेकिन उनका उपयोग मौके पर निर्भर करता है. अगर आप कुछ भारी और मसालेदार खाना चाहते हैं, तो समोसा‑जलेबी सही है.अगर हल्का और संतुलित नाश्ता चाहिए, तो पोहा‑जलेबी ज्यादा अच्छा है. इस तरह आप अपने स्वाद और सेहत दोनों को ही ध्यान में रखकर अपनी सेहत के अनुसार सही चुनाव कर सकते हैं.
Akshay kumar| Samosa| समोसा सच में एसिडिटी करता है? अक्षय कुमार ने 15 साल से नहीं खाया, डायटीशियन ने बताई हकीकत

Last Updated:May 13, 2026, 15:58 IST एक बार अक्षय कुमार ने बताया था कि उन्होंने 5 साल से समोसा नहीं खाया, उन्होंने बताया कि समोसा एसिडिटी करता है, ऐसे में आरएमएल की डायटीशियन शालिनी वर्मा से जानते हैं कि क्या यह सच है? समोसा किन बीमारियों का खतरा पैदा करता है? समोसा मसालों, तेल और मैदा से बना होने के चलते पचने में भारी होता है और यह एसिडिटी करता है. Samosa: समोसा का नाम आए और मुंह में पानी न आए, ऐसा तो नहीं हो सकता है. हालांकि कुछ लोग अपने मन पर कंट्रोल कर जाते हैं और समोसे से दूरी बना लेते हैं. कुछ लोग मोटापा बढ़ने की टेंशन में तो कुछ लोग डाइटिंग और अन्य वजहों से समोसा नहीं खाते हैं. ऐसा ही खुलासा कुछ दिन पहले बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने किया था, जब उन्होंने बताया था कि उन्होंने पिछले 15 साल से समोसा नहीं खाया है. टीवी शो ‘Wheel of Fortune’ में समोसे को लेकर दिलचस्प खुलासा करते हुए उन्होंने कहा, ‘मैंने 15 साल से एक भी समोसा नहीं खाया है.’ अक्षय ने आगे बताया, ‘ये डाइटिंग या वजन बढ़ने की वजह से नहीं है. समोसा खाने से मुझे तेज एसिडिटी हो जाती है, जो मुझे बहुत परेशान करती है. इसलिए मैंने 15 साल पहले ही इसे छोड़ दिया.’ ज्यादातर लोगों को पता है कि अक्षय कुमार अपनी फिटनेस और अनुशासन के लिए मशहूर हैं. वे सुबह जल्दी उठते हैं, भारी वर्कआउट करते हैं और सख्त डाइट फॉलो करते हैं. लेकिन इस बार उन्होंने साफ कहा कि समोसे से दूर रहना उनका स्वास्थ्य संबंधी फैसला है, न कि सिर्फ बॉडी बनाने की कोशिश. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में समोसा एसिडिटी करता है? समोसे में ऐसा क्या होता है जो नुकसान करता है? आइए जानते हैं.. दिल्ली के डॉक्टर राम मनोहर लोहिया अस्पताल की डायटीशियन शालिनी वर्मा कहती हैं कि समोसा एसिडिटी कर सकता है इसके पीछे कई वजहें हैं. समोसा डीप फ्राइड होता है और यह मैदा से बनता है. इसमें आलू के साथ बहुत सारे मसाले भी मिले होते हैं लिहाजा इसे पचाने के लिए पेट में अतिरिक्त एसिड बनता है जो रिफ्लक्स होकर सीने में जलन और एसिडिटी पैदा करता है. अक्सर देखा है कि समोसा खाने से कई लोगों को भयंकर गले में जलन, खट्टी डकारें और भूख न लगने की समस्या पैदा करते हैं. इसके अलावा समोसे में एक और चीज खराब होती है और वह है जिस तेल में समोसा तला जाता है, वह बार-बार गर्म होता है, जलता है और फिर रीयूज होता रहता है. अक्सर दुकानों में एक खाद्य तेल को कई बार इस्तेमाल करते हैं. यह तेल भी हेल्थ के लिए नुकसानदेह होता है. बार-बार इस्तेमाल किया गया तेल लोगों में कैंसर, हार्ट अटैक, हाई ब्लड प्रेशर और मोटापे जैसी समस्याएं बढ़ा सकता है. ज्यादा मात्रा में ऐसा तेल इस्तेमाल करने से शरीर में सूजन, कोलेस्ट्रॉल और फूड पॉइजनिंग का खतरा बढ़ता है. इसके अलावा तलने में इस्तेमाल तेल को दोबारा गर्म करने से उसमें विषैले ट्रांस फैट, एल्डिहाइड और फ्री रेडिकल्स बनते जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर देते हैं. About the Author प्रिया गौतमSenior Correspondent Priya Gautam is an accomplished journalist currently working with Hindi.News18.com with over 14 years of extensive field reporting experience. Previously worked with Hindustan times group (Hindustan Hindi) and …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्स में सबमिट करें
कच्ची आम की दाल रेसिपी: घर में कच्ची आम की दाल, पेट की गर्मी के लिए है बेस्ट; नोट करें यूनिक रेसिपी

कच्ची आम की दाल बनाने की सामग्री के लिए: 1 कप तुअर दाल, 1 छोटा कच्चा आम, 2 हरी मिर्च 1 छोटा टमाटर, 1/2 हल्दी, स्वादानुसार नमक, 1 छोटा चम्मच घी, 2 बड़ा चम्मच छवि: एआई धन्यवाद के लिए: 1/2 मेयोनेज़ जीरा, 1/2 मेयोनेज़ जीरा, 1 चुटकी हींग, 7-8 करी पत्ते, 2 सूखी लाल मिर्च, थोड़ा हरा धनिया छवि: सोशल मीडिया दाल बनाने की आसान विधि: सबसे पहले दाल को अच्छी तरह धोकर 15-20 मिनट के लिए सबसे पहले। अब कुकर में दाल और हल्दी, नमक और पानी का मिश्रण मिलाकर 3-4 सीट आने तक पका लें। छवि: फ्रीपिक अब कच्चे आम को छीलकर छोटे-छोटे अनाजों में काट लें। अगर आपको ज्यादा खट्टा स्वाद पसंद है तो आम थोड़ी ज्यादा दाल ले सकते हैं. एक पैन में थोड़ी सी घी या तेल गरम कर लीजिये. छवि: फ्रीपिक इसमें राई, जीरा, हींग, करी पत्ता और सूखा लाल मिर्च तड़का कारखाना शामिल है। फिर इसमें हरी मिर्च और टमाटर के टुकड़े टुकड़े भून लें। अब कटे हुए कच्चे आम और 2-3 मिनट तक के लिए आदर्श आम छोटा नर हो जाए। छवि: एआई इसके बाद दाल में पकी हुई। ज़रूरत के हिसाब से पानी और डालें 5 मिनट तक का पैसा। अंत में लिटिल गुड ताकि रेस्टुरेंटपन का स्वाद कम हो जाए। ऊपर से हरा धनिया मॉड्यूल हॉटागर्म सर्व करें। छवि: एआई आप कच्ची आम की दाल के साथ गरमा गरम चावल, जीरा चावल या रोटी खा सकते हैं. गर्मी के दिनों में ये दाल भी लगती है और पेट भी ठंडा हो जाता है। छवि: एआई शरीर को ठंडक शब्दावली में मदद करता है। पाचन तंत्र बेहतर रहता है। विटामिन-सी से भरपूर है। गर्मी में भूख बढ़ाने में मदद मिलती है। स्वाद और स्वास्थ्य दोनों का शानदार संयोजन है। छवि: फ्रीपिक (टैग्सटूट्रांसलेट)कच्चे आम की दाल रेसिपी(टी)कच्चे आम की दाल रेसिपी(टी)तूर दाल रेसिपी(टी)ग्रीष्मकालीन रेसिपी(टी)भारतीय भोजन(टी)कच्चा आम की दाल रेसिपी(टी)कच्चा आम की दाल बनाने की विधि
करोड़ों की संपत्ति, पावर पैक परिवार, फिटनेस फ्रीक और लग्जरी लाइफस्टाइल, सब होने के बाद भी अवसाद में क्यों गए प्रतीक यादव

Last Updated:May 13, 2026, 15:56 IST Prateek Yadav Depressed despite being healthy and wealthy : पैसे की कोई कमी नहीं, परिवार इतना पावरफुल कि एक इशारे पर बड़ा से बड़ा काम भी छोटा पड़ जाए, फिटनेस का ऐसा चस्का कि देश भर में अपना जिम का चेन खोल ले. फिर भी प्रतीक यादव इन सबसे बेजार हो गए थे. कहा जा रहा है कि वे गहरे अवसाद में चले गए थे. इतना सब कुछ होने के बावजूद आखिर कोई कैसे अवसाद में चला जाता है. क्या डिप्रेशन का अमीरी-गरीबी से संबंध है. Prateek Yadav Death : साल 2005 के आसपास की बात है. तब प्रतीक यादव महज 16-17 साल के थे. लेकिन उनके वजूद पर सबसे बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया था. वे देश के दिग्गज नेता मुलायम सिंह यादव के पुत्र तो थे लेकिन सार्वजनिक रूप से इसकी मान्यता नहीं थी. दुनिया को तब पता चला जब अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. इस याचिका में कहा गया कि मुलायम सिंह यादव की दो पत्नियां हैं और दोनों के नाम से कई संपत्तियां हैं लेकिन मुलायम सिंह यादव सिर्फ एक पत्नी की का व्यौरा अपने हलफनामे में बताते हैं. इस सनसनीखेज रहस्योदघाटन के बाद मुलायम सिंह यादव ने पहली बार यह स्वीकार किया कि साधना गुप्ता उनकी पत्नी और प्रतीक यादव उनका बेटा है. यह भूमिका देना इसलिए जरूरी था ताकि आपको पता चले कि प्रतीक यादव किस तरह की जटिलताओं, अस्तित्व के संकटों और गुमनामी की कोख से बाहर आए थे. इन सबके बावजूद प्रतीक यादव की रसूख और उनकी विलासिता में कोई कमी नहीं थी. वे राज्य के सीएम और दिग्गज नेता के बेटे थे. डिप्रेशन का अमीरी-गरीबी से नाता नहींरिपोर्टों के मुताबिक उनके पास रियल स्टेट का बड़ा कारोबार था और जिम का चेन था. साथ ही वे सोशल मीडिया इंफ्लुएंशर से भी कमाई कर लेते थे. ऐसे में पैसे की कमी की तो कोई बात ही नहीं थी. दूसरी ओर वे बेहद फिटनेस फ्रीक थी, लग्जरी लाइफस्टाइल और भारी शानो-शौकत उनकी पहचान थी. इन सबके बावजूद वे कहीं न कहीं गोल्डन केज में बंद थे. इनती भीड़ में तन्हा. शायद यही वह कारण रहा होगा जब वे अवसाद में गए होंगे. अक्सर समाज में यह भ्रम रहता है कि डिप्रेशन केवल गरीबी, असफलता या अभाव से उपजता है. लेकिन मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखे तो खाली पेट और खाली मन के डिप्रेशन में बड़ा अंतर होता है. जब किसी व्यक्ति के पास सत्ता, पैसा और फिटनेस जैसी सभी बाहरी चीजें मौजूद हों, तब भी वह अवसाद का शिकार हो सकता है. दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर और क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट डॉ अरुणा ब्रूटा कहती हैं अवसाद का अमीरी-गरीबी से कोई संबंध नहीं है. यह एक बीमारी है और बीमारी किसी को भी हो सकती है. प्रतीक यादव को किस कारण अवसाद हुई यह तो उनके डॉक्टर ही बताएंगे लेकिन कई स्थितियों में लोग अवसाद में चले जाते हैं चाहे उसके पास कितना भी पैसा या पावर ही क्यों न हो. डिप्रेशन का भावनात्मक कारण हेदोनिक एडेप्टेशन –मनोविज्ञान में एक शब्द है हेदोनिक ट्रेडमिल. इसका अर्थ है कि इंसान कितनी भी बड़ी उपलब्धि या सुख प्राप्त कर ले. एक समय के बाद यह सब नीरस लगने लगता है. जब किसी व्यक्ति के पास दुनिया की हर सुख-सुविधा पहले से मौजूद हो, तो उसके मस्तिष्क को डोपामाइन का किक मिलना बंद हो जाता है. इसलए जीवन में कुछ नया पाने की उत्तेजना खत्म होने लगती है और गहरा खालीपन आने लगता है. इसे बौद्धिक ऊब कहते हैं. अस्तित्वगत संकट- जब जीवन में सब सुख-सुविधा उपलब्ध हो तब इंसान आत्म-बोध या जीवन के अर्थ को तलाशने लगता है. जो व्यक्ति ताकतवर परिवार से होता है उसके उपर अपनी विरासत को बचाने या बड़ा करने का भारी दबाव होता है. यदि उसे अपने काम में कोई वास्तविक उद्देश्य या अर्थ नजर नहीं आता, तो वह सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है वाली भावना में फंस जाता है. फिटनेस और इमेज का दबाव- जिम और फिटनेस का जुनून कभी-कभी व्यक्ति को ज्यादा चिंता में डाल देता है. जो व्यक्ति पावरफुल परिवार से होता है उसमें हमेशा परफेक्ट दिखने की दबाव रहता है. परफेक्शन का बोझ ज्यादा होने से मानसिक थकान होती है. ऐसे लोग कई बार जिम और सप्लीमेंट का सहारा लेते हैं जिससे हार्मोनल असंतुलन पैदा होने लगता है. इससे न्यूरोट्रांसमीटर में उतार-चढ़ाव होने लगता है और व्यक्ति गहरे अवसाद में चला जाता है. वास्तविक संबंधों का अभाव –कहा जाता है कि टॉप पर पहुंचकर व्यक्ति अकेला हो जाता है. जब व्यक्ति बहुत बड़ा हो जाता है तो उसके आगे-पीछे चाटुकारों की एक फौज लग जाती है लेकिन वह व्यक्ति अपनी कमजोरी या अपनी मनोभावों को उन सबसे व्यक्त नहीं कर पाता है क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनकी स्थिति कमजोर होगी. यह भावनात्मक अलगाव डिप्रेशन का सबसे बड़ा कारण बनता है. बायोकेमिकल डिजीज के कई कारण डॉ. अरुणा ब्रुटा के मुताबिक अवसाद कई तरह के होते हैं. प्रतीक यादव को चाहे जो भी अवसाद रहा हो लेकिन यह बहुत खतरनाक होता है. एक बायपोलर डिप्रेसिव डिसोर्डर होता है. इसमें मरीज में आत्महत्या की प्रवृति होती है. वास्तव में सुसाइडोलॉजी बहुत बड़ा साइंस है. इसे लेकर कई रिसर्च हो चुकी है लेकिन अब तक पूरी तरह से यह स्पष्ट नहीं हो पाई है. इसलिए अभी और रिसर्च की जरूरत होती है. एक साइकोसोमेटिक होता है. इसमें ब्रेन का न्यूरोट्रांसमिटर असंतुलित हो जाता है. न्यूरोट्रांसमीटर में खुशी और भावनाओं को नियंत्रित करने वाले डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे हार्मोन होते हैं. इनकी मात्रा कम-ज्यादा हो जाती है. इसलिए यह एक मानसिक बीमारी है जिसका इलाज कराना जरूरी है. अगर किसी व्यक्ति में न्यूरोट्रांसमीटर का असंतुलन हो जाए तो इसका सडेन रिएक्शन होता है. इसलिए इसे बायोकेमिकल डिजीज कहा जाता है. कुछ मामलों में यह जेनेटिक भी होता है. About the Author Lakshmi Narayan 18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके
पुलिस–प्रशासन ने घर पर जेसीबी चलाई, परिवार दबा:छतरपुर में मलबे में लहूलुहान मिले; केन-बेतवा परियोजना के लिए अतिक्रमण हटाने गए थे

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के दौधन गांव में केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत अतिक्रमण हटाने पहुंची टीम ने आदिवासी परिवार के मकान पर बुलडोजर चला दिया। आरोप है कि परिवार घर के अंदर मौजूद था, इसके बावजूद जेसीबी चलाई गई। मलबे में दबने से पति-पत्नी और दो बच्चे घायल हो गए। ग्रामीणों के मुताबिक, कार्रवाई के लिए जेसीबी मशीनें और भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। इसी दौरान आदिवासी ग्रामीण आजाद के मकान पर भी कार्रवाई शुरू कर दी गई। “साहब बचा लीजिए…”, मलबे में दबा मिला परिवार प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मकान गिरते ही चीख-पुकार मच गई। परिवार के सदस्य मलबे में दब गए। मौके पर मौजूद लोगों ने उन्हें बाहर निकाला। बताया जा रहा है कि पति-पत्नी खून से लथपथ हालत में मिले, जबकि एक बच्चा बेहोश हो गया था। घटना के वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें घायल परिवार मदद की गुहार लगाता दिखाई दे रहा है। वीडियो में परिवार कह रहा था कि वे आदिवासी हैं और उन्हें बचाया जाए, लेकिन कार्रवाई नहीं रोकी गई। बुलजोडर कार्रवाई से जुड़ी 3 तस्वीरें देखिए… कार्रवाई के दौरान भड़के ग्रामीण, पथराव और तोड़फोड़ परिवार के घायल होने की खबर फैलते ही गांव में तनाव बढ़ गया। बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर पहुंच गए और प्रशासनिक कार्रवाई का विरोध शुरू कर दिया। देखते ही देखते ग्रामीणों ने पथराव कर दिया। पथराव में एडिशनल एसपी की गाड़ी, तहसीलदार का वाहन और एक जेसीबी मशीन समेत करीब आधा दर्जन वाहनों में तोड़फोड़ हुई। कई गाड़ियों के शीशे टूट गए। प्रशासनिक अमले को भी मौके से पीछे हटना पड़ा। गांव में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात घटना के बाद पूरे इलाके को पुलिस छावनी में बदल दिया गया। गांव में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है, ताकि स्थिति नियंत्रण में रखी जा सके। प्रशासन उपद्रव और पथराव में शामिल लोगों की पहचान करने में जुटा है। ग्रामीणों का आरोप है कि कार्रवाई जल्दबाजी और दबाव में की गई। उनका कहना है कि प्रशासन ने यह सुनिश्चित नहीं किया कि मकान पूरी तरह खाली है या नहीं। केन-बेतवा परियोजना के लिए हटाया जा रहा था अतिक्रमण प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, गांव में केन-बेतवा लिंक परियोजना से जुड़े क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा रही थी। टीम राजस्व और पुलिस अमले के साथ मौके पर पहुंची थी। पहले से नोटिस और समझाइश की प्रक्रिया की गई थी। अधिकारियों का कहना है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। वहीं ग्रामीण कार्रवाई को अमानवीय बताते हुए दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। कई सवालों के घेरे में प्रशासनिक कार्रवाई घटना के बाद प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मकान तोड़ने से पहले यह जांच की गई थी कि घर के अंदर कोई मौजूद तो नहीं है। क्या सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था। और अगर परिवार अंदर था, तो कार्रवाई क्यों नहीं रोकी गई?
नर्स बनने के लिए ओलिंपिक विजेता का संन्यास:कहा- मुझे ‘असली दुनिया’ का आकर्षण खींच रहा; कॉमनवेल्थ 2026 की टीम में शामिल थीं केटी आर्चीबाल्ड

ब्रिटेन की सबसे सफल और दिग्गज साइकिलिस्ट में से एक, तीन बार की ओलिंपिक मेडलिस्ट केटी आर्चीबाल्ड ने अचानक संन्यास ले लिया है। हैरानी की बात यह है कि उन्हें इसी साल होने वाले 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए स्कॉटलैंड की टीम में चुना गया था। लेकिन 32 वर्षीय केटी ने ट्रैक को हमेशा के लिए अलविदा कहकर अपना नया करियर चुन लिया है। अब वह एक नर्स के रूप में मरीजों की सेवा करती नजर आएंगी। केटी ने बताया कि काफी समय से ‘असली दुनिया’ का आकर्षण उन्हें अपनी ओर खींच रहा था। वह उस दुनिया को छोड़ने से डर रही थीं जिसे वह जानती हैं और उसमें माहिर हैं। लेकिन उनका मानना है कि अब उनके अंदर कोई डर नहीं बचा है। केटी ने कहा कि मैं उस स्टार्ट लाइन तक पहुंचने के लिए बेताब थी लेकिन अब मेरा दिमाग और शरीर साथ नहीं दे रहा है। समय आ गया है कि नई पीढ़ी अपना जलवा बिखेरे। अपने नए सफर के बारे में बात करते हुए केटी ने बताया कि वह फिलहाल एक नर्स बनने की ट्रेनिंग ले रही हैं और उन्हें इस नए पेशे से प्यार हो गया है। उनका कहना है कि जब लोगों को मदद की सख्त जरूरत हो और वे आप पर भरोसा कर सकें, तो उनके लिए वह भरोसेमंद इंसान बनना बहुत ही खास एहसास देता है। इस भावुक मौके पर केटी ने अपने शानदार सफर के लिए कोच, टीम के साथियों और परिवार का आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से अपनी मां और अपने दिवंगत पार्टनर रैब वार्डेल को याद किया। गौरतलब है कि रैब का 2022 में 37 साल की उम्र में कार्डियक अरेस्ट से अचानक निधन हो गया था। केटी ने कहा कि रैब ने ही उन्हें सिखाया था कि जीवन में रिलैक्स रहने और मजे करने से ज्यादा जरूरी कुछ नहीं है और वह हर दिन इन दोनों चीजों में बेहतर हो रही हैं। 13 साल लंबा रहा करियर, 7 वर्ल्ड टाइटल जीते – केटी ने 19 साल की उम्र में ब्रिटेन की एंड्योरेंस स्क्वाड में जगह बनाई थी। अपने शानदार करियर में उन्होंने कुल 51 प्रमुख मेडल जीते। उनके नाम ओलिंपिक में दो स्वर्ण और एक रजत पदक, सात वर्ल्ड टाइटल, रिकॉर्ड 21 यूरोपियन टाइटल और एक कॉमनवेल्थ गेम्स का स्वर्ण पदक दर्ज है। – वह महिला ‘टीम परस्यूट’ में विश्व रिकॉर्ड धारक टीम का हिस्सा भी हैं। उनके पदकों की संख्या और भी अधिक हो सकती थी, यदि उन्हें 2022 के बर्मिंघम गेम्स और बाद में ओलिंपिक से ठीक पहले चोट व अन्य कारणों से अपना नाम वापस नहीं लेना पड़ता।
केरल विधानसभा चुनाव:केरल के मुख्यमंत्री के चयन में देरी के मुद्दे पर जनता का सामना करना मुश्किल हुआ- एआईयू महासचिव

केरल के नए मुख्यमंत्री के चयन में हो रही देरी को लेकर यूनाइटेड डेमोक्रेटिक मोर्चा (यू एफसी) गठबंधन की सहयोगी पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (एआईयू ग्रेड) की गंभीरता अब खत्म हो रही है और इसके कई नेताओं का कहना है कि वे इस मुद्दे पर जनता की राय का सामना करना गलत हैं। तिरुर विधानसभा क्षेत्र से एआईयू के नेता कुरुक्कोली मोइदीन ने रविवार को यहां कहा कि वह जहां भी जाते हैं। खासकर महिलाओं सहित सभी लोग सरकारी कर्मचारियों को मुख्यमंत्री के चयन में देरी क्यों हो रही है। उन्होंने कहा कि लेकिन इस देरी से भी बड़ी समस्या यह मुद्दा कांग्रेस में खुलकर सामने आया है। विधायक ने कहा, “यह एक बड़ी बर्बादी बन गई है। यहां तक कांग्रेस कार्यकर्ता भी निराश हैं। महिलाएं भी घूम रही हैं कि मुख्यमंत्री का चयन कब होगा। मुझे पूरा विश्वास है कि कांग्रेस के पास सबसे मजबूत नेतृत्व है, इसलिए इन सभी कार्यकर्ताओं का समाधान हो जाएगा।” कोंडोट्टी सीट से विधायक टी. वी. इब्राहिम ने एक दिन पहले कहा था कि मुख्यमंत्री को कौन होना चाहिए, इस पर कांग्रेस ने निर्णय लेने में देरी कर दी है, जिससे यूएफओ की जीत का समर्थन किया जा सके और इसके कारण उनके कार्यकर्ता और नेता जनता का आमना-सामना करने में असमर्थ हो गए हैं। इब्राहिम ने यह भी कहा कि तकनीकी रूप से यह कांग्रेस का आंतरिक मामला हो सकता है, लेकिन ”अश्विवकार्य” में देरी को देखते हुए जल्द ही निर्णय लिया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री पद के लिए तीन मुख्य उम्मीदवार वरिष्ठ नेता राकेश चेन्निथला, वी. डी. ष्रिषन और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (संस्था) के. सी. वेणुगोपाल हैं.









