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करोड़ों की संपत्ति, पावर पैक परिवार, फिटनेस फ्रीक और लग्जरी लाइफस्टाइल, सब होने के बाद भी अवसाद में क्यों गए प्रतीक यादव

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Prateek Yadav Depressed despite being healthy and wealthy : पैसे की कोई कमी नहीं, परिवार इतना पावरफुल कि एक इशारे पर बड़ा से बड़ा काम भी छोटा पड़ जाए, फिटनेस का ऐसा चस्का कि देश भर में अपना जिम का चेन खोल ले. फिर भी प्रतीक यादव इन सबसे बेजार हो गए थे. कहा जा रहा है कि वे गहरे अवसाद में चले गए थे. इतना सब कुछ होने के बावजूद आखिर कोई कैसे अवसाद में चला जाता है.

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क्या डिप्रेशन का अमीरी-गरीबी से संबंध है.

Prateek Yadav Death : साल 2005 के आसपास की बात है. तब प्रतीक यादव महज 16-17 साल के थे. लेकिन उनके वजूद पर सबसे बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया था. वे देश के दिग्गज नेता मुलायम सिंह यादव के पुत्र तो थे लेकिन सार्वजनिक रूप से इसकी मान्यता नहीं थी. दुनिया को तब पता चला जब अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. इस याचिका में कहा गया कि मुलायम सिंह यादव की दो पत्नियां हैं और दोनों के नाम से कई संपत्तियां हैं लेकिन मुलायम सिंह यादव सिर्फ एक पत्नी की का व्यौरा अपने हलफनामे में बताते हैं. इस सनसनीखेज रहस्योदघाटन के बाद मुलायम सिंह यादव ने पहली बार यह स्वीकार किया कि साधना गुप्ता उनकी पत्नी और प्रतीक यादव उनका बेटा है. यह भूमिका देना इसलिए जरूरी था ताकि आपको पता चले कि प्रतीक यादव किस तरह की जटिलताओं, अस्तित्व के संकटों और गुमनामी की कोख से बाहर आए थे. इन सबके बावजूद प्रतीक यादव की रसूख और उनकी विलासिता में कोई कमी नहीं थी. वे राज्य के सीएम और दिग्गज नेता के बेटे थे.

डिप्रेशन का अमीरी-गरीबी से नाता नहीं
रिपोर्टों के मुताबिक उनके पास रियल स्टेट का बड़ा कारोबार था और जिम का चेन था. साथ ही वे सोशल मीडिया इंफ्लुएंशर से भी कमाई कर लेते थे. ऐसे में पैसे की कमी की तो कोई बात ही नहीं थी. दूसरी ओर वे बेहद फिटनेस फ्रीक थी, लग्जरी लाइफस्टाइल और भारी शानो-शौकत उनकी पहचान थी. इन सबके बावजूद वे कहीं न कहीं गोल्डन केज में बंद थे. इनती भीड़ में तन्हा. शायद यही वह कारण रहा होगा जब वे अवसाद में गए होंगे. अक्सर समाज में यह भ्रम रहता है कि डिप्रेशन केवल गरीबी, असफलता या अभाव से उपजता है. लेकिन मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखे तो खाली पेट और खाली मन के डिप्रेशन में बड़ा अंतर होता है. जब किसी व्यक्ति के पास सत्ता, पैसा और फिटनेस जैसी सभी बाहरी चीजें मौजूद हों, तब भी वह अवसाद का शिकार हो सकता है. दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर और क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट डॉ अरुणा ब्रूटा कहती हैं अवसाद का अमीरी-गरीबी से कोई संबंध नहीं है. यह एक बीमारी है और बीमारी किसी को भी हो सकती है. प्रतीक यादव को किस कारण अवसाद हुई यह तो उनके डॉक्टर ही बताएंगे लेकिन कई स्थितियों में लोग अवसाद में चले जाते हैं चाहे उसके पास कितना भी पैसा या पावर ही क्यों न हो.

डिप्रेशन का भावनात्मक कारण

हेदोनिक एडेप्टेशन –मनोविज्ञान में एक शब्द है हेदोनिक ट्रेडमिल. इसका अर्थ है कि इंसान कितनी भी बड़ी उपलब्धि या सुख प्राप्त कर ले. एक समय के बाद यह सब नीरस लगने लगता है. जब किसी व्यक्ति के पास दुनिया की हर सुख-सुविधा पहले से मौजूद हो, तो उसके मस्तिष्क को डोपामाइन का किक मिलना बंद हो जाता है. इसलए जीवन में कुछ नया पाने की उत्तेजना खत्म होने लगती है और गहरा खालीपन आने लगता है. इसे बौद्धिक ऊब कहते हैं.

अस्तित्वगत संकट- जब जीवन में सब सुख-सुविधा उपलब्ध हो तब इंसान आत्म-बोध या जीवन के अर्थ को तलाशने लगता है. जो व्यक्ति ताकतवर परिवार से होता है उसके उपर अपनी विरासत को बचाने या बड़ा करने का भारी दबाव होता है. यदि उसे अपने काम में कोई वास्तविक उद्देश्य या अर्थ नजर नहीं आता, तो वह सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है वाली भावना में फंस जाता है.

फिटनेस और इमेज का दबाव- जिम और फिटनेस का जुनून कभी-कभी व्यक्ति को ज्यादा चिंता में डाल देता है. जो व्यक्ति पावरफुल परिवार से होता है उसमें हमेशा परफेक्ट दिखने की दबाव रहता है. परफेक्शन का बोझ ज्यादा होने से मानसिक थकान होती है. ऐसे लोग कई बार जिम और सप्लीमेंट का सहारा लेते हैं जिससे हार्मोनल असंतुलन पैदा होने लगता है. इससे न्यूरोट्रांसमीटर में उतार-चढ़ाव होने लगता है और व्यक्ति गहरे अवसाद में चला जाता है.

वास्तविक संबंधों का अभाव –कहा जाता है कि टॉप पर पहुंचकर व्यक्ति अकेला हो जाता है. जब व्यक्ति बहुत बड़ा हो जाता है तो उसके आगे-पीछे चाटुकारों की एक फौज लग जाती है लेकिन वह व्यक्ति अपनी कमजोरी या अपनी मनोभावों को उन सबसे व्यक्त नहीं कर पाता है क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनकी स्थिति कमजोर होगी. यह भावनात्मक अलगाव डिप्रेशन का सबसे बड़ा कारण बनता है.

बायोकेमिकल डिजीज के कई कारण

डॉ. अरुणा ब्रुटा के मुताबिक अवसाद कई तरह के होते हैं. प्रतीक यादव को चाहे जो भी अवसाद रहा हो लेकिन यह बहुत खतरनाक होता है. एक बायपोलर डिप्रेसिव डिसोर्डर होता है. इसमें मरीज में आत्महत्या की प्रवृति होती है. वास्तव में सुसाइडोलॉजी बहुत बड़ा साइंस है. इसे लेकर कई रिसर्च हो चुकी है लेकिन अब तक पूरी तरह से यह स्पष्ट नहीं हो पाई है. इसलिए अभी और रिसर्च की जरूरत होती है. एक साइकोसोमेटिक होता है. इसमें ब्रेन का न्यूरोट्रांसमिटर असंतुलित हो जाता है. न्यूरोट्रांसमीटर में खुशी और भावनाओं को नियंत्रित करने वाले डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे हार्मोन होते हैं. इनकी मात्रा कम-ज्यादा हो जाती है. इसलिए यह एक मानसिक बीमारी है जिसका इलाज कराना जरूरी है. अगर किसी व्यक्ति में न्यूरोट्रांसमीटर का असंतुलन हो जाए तो इसका सडेन रिएक्शन होता है. इसलिए इसे बायोकेमिकल डिजीज कहा जाता है. कुछ मामलों में यह जेनेटिक भी होता है.

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Lakshmi Narayan

18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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Prateek Yadav Depressed despite being healthy and wealthy : पैसे की कोई कमी नहीं, परिवार इतना पावरफुल कि एक इशारे पर बड़ा से बड़ा काम भी छोटा पड़ जाए, फिटनेस का ऐसा चस्का कि देश भर में अपना जिम का चेन खोल ले. फिर भी प्रतीक यादव इन सबसे बेजार हो गए थे. कहा जा रहा है कि वे गहरे अवसाद में चले गए थे. इतना सब कुछ होने के बावजूद आखिर कोई कैसे अवसाद में चला जाता है.

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क्या डिप्रेशन का अमीरी-गरीबी से संबंध है.

Prateek Yadav Death : साल 2005 के आसपास की बात है. तब प्रतीक यादव महज 16-17 साल के थे. लेकिन उनके वजूद पर सबसे बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया था. वे देश के दिग्गज नेता मुलायम सिंह यादव के पुत्र तो थे लेकिन सार्वजनिक रूप से इसकी मान्यता नहीं थी. दुनिया को तब पता चला जब अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. इस याचिका में कहा गया कि मुलायम सिंह यादव की दो पत्नियां हैं और दोनों के नाम से कई संपत्तियां हैं लेकिन मुलायम सिंह यादव सिर्फ एक पत्नी की का व्यौरा अपने हलफनामे में बताते हैं. इस सनसनीखेज रहस्योदघाटन के बाद मुलायम सिंह यादव ने पहली बार यह स्वीकार किया कि साधना गुप्ता उनकी पत्नी और प्रतीक यादव उनका बेटा है. यह भूमिका देना इसलिए जरूरी था ताकि आपको पता चले कि प्रतीक यादव किस तरह की जटिलताओं, अस्तित्व के संकटों और गुमनामी की कोख से बाहर आए थे. इन सबके बावजूद प्रतीक यादव की रसूख और उनकी विलासिता में कोई कमी नहीं थी. वे राज्य के सीएम और दिग्गज नेता के बेटे थे.

डिप्रेशन का अमीरी-गरीबी से नाता नहीं
रिपोर्टों के मुताबिक उनके पास रियल स्टेट का बड़ा कारोबार था और जिम का चेन था. साथ ही वे सोशल मीडिया इंफ्लुएंशर से भी कमाई कर लेते थे. ऐसे में पैसे की कमी की तो कोई बात ही नहीं थी. दूसरी ओर वे बेहद फिटनेस फ्रीक थी, लग्जरी लाइफस्टाइल और भारी शानो-शौकत उनकी पहचान थी. इन सबके बावजूद वे कहीं न कहीं गोल्डन केज में बंद थे. इनती भीड़ में तन्हा. शायद यही वह कारण रहा होगा जब वे अवसाद में गए होंगे. अक्सर समाज में यह भ्रम रहता है कि डिप्रेशन केवल गरीबी, असफलता या अभाव से उपजता है. लेकिन मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखे तो खाली पेट और खाली मन के डिप्रेशन में बड़ा अंतर होता है. जब किसी व्यक्ति के पास सत्ता, पैसा और फिटनेस जैसी सभी बाहरी चीजें मौजूद हों, तब भी वह अवसाद का शिकार हो सकता है. दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर और क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट डॉ अरुणा ब्रूटा कहती हैं अवसाद का अमीरी-गरीबी से कोई संबंध नहीं है. यह एक बीमारी है और बीमारी किसी को भी हो सकती है. प्रतीक यादव को किस कारण अवसाद हुई यह तो उनके डॉक्टर ही बताएंगे लेकिन कई स्थितियों में लोग अवसाद में चले जाते हैं चाहे उसके पास कितना भी पैसा या पावर ही क्यों न हो.

डिप्रेशन का भावनात्मक कारण

हेदोनिक एडेप्टेशन –मनोविज्ञान में एक शब्द है हेदोनिक ट्रेडमिल. इसका अर्थ है कि इंसान कितनी भी बड़ी उपलब्धि या सुख प्राप्त कर ले. एक समय के बाद यह सब नीरस लगने लगता है. जब किसी व्यक्ति के पास दुनिया की हर सुख-सुविधा पहले से मौजूद हो, तो उसके मस्तिष्क को डोपामाइन का किक मिलना बंद हो जाता है. इसलए जीवन में कुछ नया पाने की उत्तेजना खत्म होने लगती है और गहरा खालीपन आने लगता है. इसे बौद्धिक ऊब कहते हैं.

अस्तित्वगत संकट- जब जीवन में सब सुख-सुविधा उपलब्ध हो तब इंसान आत्म-बोध या जीवन के अर्थ को तलाशने लगता है. जो व्यक्ति ताकतवर परिवार से होता है उसके उपर अपनी विरासत को बचाने या बड़ा करने का भारी दबाव होता है. यदि उसे अपने काम में कोई वास्तविक उद्देश्य या अर्थ नजर नहीं आता, तो वह सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है वाली भावना में फंस जाता है.

फिटनेस और इमेज का दबाव- जिम और फिटनेस का जुनून कभी-कभी व्यक्ति को ज्यादा चिंता में डाल देता है. जो व्यक्ति पावरफुल परिवार से होता है उसमें हमेशा परफेक्ट दिखने की दबाव रहता है. परफेक्शन का बोझ ज्यादा होने से मानसिक थकान होती है. ऐसे लोग कई बार जिम और सप्लीमेंट का सहारा लेते हैं जिससे हार्मोनल असंतुलन पैदा होने लगता है. इससे न्यूरोट्रांसमीटर में उतार-चढ़ाव होने लगता है और व्यक्ति गहरे अवसाद में चला जाता है.

वास्तविक संबंधों का अभाव –कहा जाता है कि टॉप पर पहुंचकर व्यक्ति अकेला हो जाता है. जब व्यक्ति बहुत बड़ा हो जाता है तो उसके आगे-पीछे चाटुकारों की एक फौज लग जाती है लेकिन वह व्यक्ति अपनी कमजोरी या अपनी मनोभावों को उन सबसे व्यक्त नहीं कर पाता है क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनकी स्थिति कमजोर होगी. यह भावनात्मक अलगाव डिप्रेशन का सबसे बड़ा कारण बनता है.

बायोकेमिकल डिजीज के कई कारण

डॉ. अरुणा ब्रुटा के मुताबिक अवसाद कई तरह के होते हैं. प्रतीक यादव को चाहे जो भी अवसाद रहा हो लेकिन यह बहुत खतरनाक होता है. एक बायपोलर डिप्रेसिव डिसोर्डर होता है. इसमें मरीज में आत्महत्या की प्रवृति होती है. वास्तव में सुसाइडोलॉजी बहुत बड़ा साइंस है. इसे लेकर कई रिसर्च हो चुकी है लेकिन अब तक पूरी तरह से यह स्पष्ट नहीं हो पाई है. इसलिए अभी और रिसर्च की जरूरत होती है. एक साइकोसोमेटिक होता है. इसमें ब्रेन का न्यूरोट्रांसमिटर असंतुलित हो जाता है. न्यूरोट्रांसमीटर में खुशी और भावनाओं को नियंत्रित करने वाले डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे हार्मोन होते हैं. इनकी मात्रा कम-ज्यादा हो जाती है. इसलिए यह एक मानसिक बीमारी है जिसका इलाज कराना जरूरी है. अगर किसी व्यक्ति में न्यूरोट्रांसमीटर का असंतुलन हो जाए तो इसका सडेन रिएक्शन होता है. इसलिए इसे बायोकेमिकल डिजीज कहा जाता है. कुछ मामलों में यह जेनेटिक भी होता है.

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18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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