चुनावी रेवड़ियों से राज्यों का कर्ज बढ़ रहा:लाड़ली बहना के कारण MP का कर्ज रेड लाइन में, महाराष्ट्र में राशन किट योजना बंद

चुनाव में फ्री राशन, महिलाओं को नकदी जैसी ‘मुफ्त की रेवड़ियों’ वाली योजनाएं राज्यों के लिए बड़ा बोझ बन रही हैं। हालत यह है कि इनको पूरा करने के लिए राज्य न पर्याप्त संसाधन जुटा पा रहे हैं और न संतुलित बजट बना पा रहे हैं। कुछ राज्यों में तो इन घोषणाओं का बोझ कुल राजस्व प्राप्तियों के 30 से 40% तक पहुंच गया है। हिमाचल जैसे छोटे राज्य में नकदी संकट की विकट स्थिति है। राज्य में सीएम, मंत्री, विधायकों समेत अफसरों के वेतन-पेंशन टालने पड़े। तेलंगाना को चुनावी घोषणाओं के लिए हर साल 1 लाख करोड़ चाहिए, पर बजट की कमी से कई योजनाएं अटकी हैं। मप्र में लाड़ली बहना योजना के चलते GSDP के मुकाबले कर्ज 27% से बढ़कर 32% पहुंच गया। महाराष्ट्र में लाडकी बहिन योजना के दबाव के कारण त्योहारों में मिलने वाली राशन किट योजना बंद कर दी गई है। एक्सपर्ट कमेंट… कैश ट्रांसफर जैसे चुनावी वादे जारी रहे तो भले देश की इकोनॉमी बेहतर रहे, पर राज्य डिफॉल्ट कर सकते हैं। हिमाचल के जैसे ही दूसरे राज्य भी खर्च में कटौती कर रहे हैं। डॉ. अमरजीत सिंह सेठी, इंडियन एसोसिएशन फॉर रिसर्च इन नेशनल इनकम एंड वेल्थ के एडिटर संकट क्यों: घोषणाएं ज्यादा, कमाई कम
एक गलती से बढ़ेगा पित्त-कफ! बैसाख में अपनाएं ये देसी डाइट प्लान, एक्सपर्ट से समझें सब

कोरबा : 3 अप्रैल से बैसाख महीने की शुरुआत हो चुकी है जो की 1 मई तक चलेगा.बैसाख माह वसंत के अंत एवं ग्रीष्म की शुरुआत का संक्रमणकाल है.इस अवधि में मौसम धीरे‑धीरे गरम व शुष्क होता है, जिससे कफ‑पित्त दोनो दोष असंतुलित हो सकते हैं और संक्रामक रोगों की सम्भावना बढ़ती है.आयुर्वेदिक विशेषज्ञ डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा, जो छत्तीसगढ़ के प्रख्यात नाड़ी वैद्य हैं, उन्होंने इस ऋतु में विशेष आहार‑विधान की महत्ता को बताया. वनस्पति तेल से परहेज, बेल‑सत्तू को प्राथमिकताडॉ. शर्मा के अनुसार, बैसाख माह मे भारी, तेलीय व मसालेदार भोजन से बचना चाहिए.वनस्पति तेल शरीर में कफ को बढ़ाता है और पित्त दोष को असंतुलित कर देता है.इस समय तेल‑रहित, हल्का एवं ताजा भोजन ही स्वास्थ्य के लिये लाभदायक है. वहीं, बेल साबूदाना और सत्तू को इस माह के प्रमुख पोषक माना गया है.बेल में आसानी से पचने वाले कार्बोहाइड्रेट होते हैं, जो गर्मी में शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं.सत्तू में प्रोटीन, फाइबर और आयरन की भरपूर मात्रा होती है, जिससे पाचन‑तंत्र मजबूत रहता है और शारीरिक शक्ति बनी रहती है. क्या खाएंजौ, दलिया, चावल, मक्क, मोंठ, मूंग, चना, तुअर दाल,बेल, संतरा, तरबूज, खरबुज, आम, मौसंबी, सेव, लौकी, ककड़ी, कद्दू, हरा धनिया, तरोई, करेला, जिमीकंद, सहजन की फली, पुदीना, चौलाई,जीरा, सूखा धनिया, मीठा नीम, हल्दी, इलायची, पतली दालचीनी.इन पदार्थों में जल संतुलन, एंटी‑ऑक्सीडेंट और पाचन‑सहायक गुण होते हैं, जो गर्मी के तापमान से शरीर को ठंडा रखने में मदद करते हैं.गर्म मौसम में पर्याप्त मात्रा में शुद्ध पानी एवं नारियल पानी सेवन करें, जिससे डिहाइड्रेशन से बचाव होगा.खाने में हल्का व ताज़ा रखना, देर रात का भोजन न करना और बासी भोजन से पूरी तरह परहेज करना चाहिए. क्या न खाएंवनस्पति तेल, बाजरा, पुराना गेहूँ, उड़द दाल, मसूर, साथ ही मेथी, बैंगन, मूली, फूल‑गोभी, पत्ता‑गोभी, अरबी, पपीते तथा अधिक तीखा‑तेज़ मसालेदार व्यंजन.इनसे कफ‑पित्त की वृद्धि, अपच, उल्टी और डिहाइड्रेशन की शंका बढ़ती है. डॉ. शर्मा ने बताया की बैसाख में आयुर्वेदिक नियमों का पालन कर हम न केवल संक्रमण‑रोगों से बच सकते हैं, बल्कि शरीर को संतुलित रख कर गर्मी के सत्र में ऊर्जा भी बनाए रख सकते हैं.बेल, सत्तू और मौसमी फल‑सब्जियों को अपने थाली में शामिल कर स्वस्थ बेसाख का आनंद उठाएं.
बड़वानी में नबालिग लड़किया कराया जा रहा सीवरेज का काम:उम्र 11 से 12 साल के बीच, खोदी गई सड़क की कर रही थीं मरम्मत

बड़वानी में सीवरेज के काम में बाल मजदूरी का मामला सामने आया है। जिला मुख्यालय के योग माया मंदिर रोड पर एक सीवरेज कंपनी द्वारा नाबालिग बच्चों से काम करवाया जा रहा था। यह घटना शनिवार रात को सामने आई, जहां बच्चों से चैंबर बनाने और खोदी गई सड़क को फिर से बनाने का भारी काम लिया जा रहा था। मौके पर नाबालिग बच्चियां सड़क निर्माण और मरम्मत के कार्य में लगी हुई थीं। बताया गया कि ठेकेदार कम मजदूरी देने के लालच में इन नाबालिगों से काम करवा रहे हैं। इस संबंध में तस्वीरें और वीडियो भी सामने आए हैं। जब मीडिया ने काम कर रहे बच्चों से उनकी उम्र जाननी चाही, तो मौके पर मौजूद ठेकेदार ने उन्हें वहां से भगा दिया। एक बच्ची के पिता से पूछने पर उसने अपनी बेटी की उम्र 11-12 साल बताई, लेकिन ठेकेदार ने उसे भी चुप करा दिया। ठेकेदार ने दावा किया कि बच्ची अपनी मर्जी से काम करने आती है। पांच से सात बच्चियां कर रही थीं काम नगर पालिका नेता प्रतिपक्ष राकेश सिंह जाधव ने बताया कि उन्हें देर रात सीवरेज के काम में पांच से सात नाबालिग बच्चों से बाल श्रम करवाने की जानकारी मिली थी। शनिवार रात को उन्होंने मौके पर जाकर जायजा लिया, जहां नाबालिग बच्चों से गैंती-पावड़े उठाकर काम करवाया जा रहा था। जाधव के पहुंचने पर ठेकेदार ने बच्चों को वहां से भगा दिया। जाधव ने यह भी आरोप लगाया कि पूरे शहर में सीवरेज का घटिया काम किया जा रहा है। इस मामले में श्रम विभाग और जिला प्रशासन की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि खुलेआम हो रही बाल मजदूरी पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
चेहरे के बाल हटाना: चेहरे से अनचाहे बाल हटाने के लिए काम आएगा ये 3 देसी नुस्खा, 10 मिनट में चेहरे से बाल हटाएं

आलू और मसूर दाल: अनचाहे बाल हटाने के लिए आप चेहरे पर आलू और मसूर की दाल का पैक लगा सकते हैं। आलू में बालों को हटाने का गुण होता है। वहीं मसूर की दाल बालों को आदर्श बनाने में मदद करती है। छवि: फ्रीपिक एक कटोरी रातभर खरीदी हुई मसूर दाल को पीसकर कद्दूकस किया हुआ आलू, एक चुटकी हल्दी और नींबू का रस स्टॉल शामिल है। फ़ांसी के बाद राँचेकर हटा दिए गए। छवि: फ्रीपिक हल्दी और बेसन पैक: चेहरे के अनचाहे बालों को हटाने के लिए बेसन और हल्दी का प्रयोग करें। एक बेसन में आधा माइल्ड हल्दी और थोड़ा सा गुलाब जल स्टॉक और तैयार पेस्ट को पीस पर। छवि: फ्रीपिक अनइंस्टॉल के बाद प्यारे हाथों से राँघते हुए मिले। यह प्रक्रिया आप एक सप्ताह में दो से तीन बार कर सकते हैं। छवि: फ्रीपिक कच्चा पपीते: कच्चे पपीते एंजाइम होते हैं जो बालों की जड़ों को बनाते हैं। इसमें हल्दी कॉस्मेटिक डॉक्टर और फिजियोथेरेपी हाथ से मसाज करें। छवि: फ्रीपिक इसे आप एक सप्ताह में 1-2 बार अप्लाई करें। इसी कारण कच्चे पपीते से भी आप अनचाहे बालों को हटा सकते हैं। छवि: फ्रीपिक स्किन पर ग्लोम स्केन रूटीन के लिए आप स्किन केयर रूटीन को फॉलो करें। इसके लिए आप बाहरी उत्पाद नहीं, बल्कि घर की रसोई में मौजूद एनआइए की सहायता ले सकते हैं। छवि: फ्रीपिक अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए तरीके, तरीके और दावे अलग-अलग विद्वानों पर आधारित हैं। रिपब्लिक भारत लेख में दी गई जानकारी के सही होने का दावा नहीं किया गया है। किसी भी उपचार और सुझाव को पहले डॉक्टर या डॉक्टर की सलाह से अवश्य लें।
गेहूं काट रहे किसानों के पास पहुंचा कूनो का चीता:पहाड़गढ़ में ईश्वरा महादेव मंदिर के पास भालू मिलने से लौटे श्रद्धालु

मुरैना जिले की अटेर ग्राम पंचायत के मदनपुरा गांव में शनिवार दोपहर 4 बजे गेहूं काट रहे किसानों के पास कूनो नेशनल पार्क का एक चीता पहुंच गया, जिसे एक बुजुर्ग किसान ने शोर मचाकर भगा दिया। वहीं, पहाड़गढ़ क्षेत्र स्थित प्राचीन ईश्वरा महादेव मंदिर के पास एक वयस्क भालू दिखाई देने से दर्शन करने गए श्रद्धालु बिना दर्शन किए ही लौट आए। इन दोनों घटनाओं से ग्रामीणों में दहशत है और जानवरों के वीडियो भी सामने आए हैं। वर्तमान में वन विभाग की टीम पहाड़गढ़ में भालू की तलाश कर रही है, जबकि चीते की निगरानी कूनो की मॉनिटरिंग टीम द्वारा की जा रही है। गेहूं भर रहे किसानों के पास पहुंचा चीता, बुजुर्ग ने शोर मचाकर भगाया शनिवार दोपहर 4 बजे अटेर ग्राम पंचायत के मदनपुरा गांव में अचानक कूनो का एक चीता भ्रमण करता हुआ पहुंच गया। खेतों में गेहूं की फसल काटने के बाद उसे अपने घर ले जाने के लिए बोरियों में भर रहे किसान चीते को देखकर डर गए। किसानों के शोर मचाने पर चीता पास में ही चारा खा रही पालतू भैंसों का शिकार करने की नीयत से उनकी तरफ बढ़ा। इसी दौरान एक बुजुर्ग किसान शोर मचाते हुए चीते के पीछे-पीछे दौड़ पड़ा। बुजुर्ग के परिवार की महिलाएं और पुरुष उसे वापस आने की समझाइश देते रहे, लेकिन वह नहीं माना। नतीजा यह हुआ कि चीता वहां से भाग गया। इस घटना का वीडियो भी सामने आया है। ईश्वरा महादेव मंदिर के पास दिखा भालू, बिना दर्शन लौटे श्रद्धालु दूसरी घटना में पहाड़गढ़ क्षेत्र के प्रसिद्ध प्राचीन ईश्वरा महादेव मंदिर पर एक वयस्क भालू दिखने से लोगों में दहशत फैल गई। कुछ श्रद्धालु मंदिर में दर्शन करने गए थे, लेकिन मंदिर के पास ही भालू दिखाई देने पर वे भय के कारण बिना दर्शन किए ही वापस लौट आए। श्रद्धालुओं द्वारा भालू का वीडियो भी बना लिया गया है। इसके बाद ग्रामीणों ने वन विभाग को सूचना दी। वन विभाग अधीक्षक बोले- भालू को खोज रही टीम वन विभाग अधीक्षक श्याम सिंह चौहान के अनुसार, “वन विभाग को पहाड़गढ़ में भालू होने की सूचना मिली जिसके लिए वन विभाग की टीम को निर्देशित किया गया है वह भालू को खोज रही है । जहां तक चीता का सवाल है उसके लिए कूनो की टीम चीता को मॉनिटरिंग करती है निकल वन विभाग का सपोर्ट भी लेती है।चिता भ्रमण के दौरान आया होगा वह वापस चला जाएगा मॉनिटरिंग टीम उसे मॉनिटर कर रही है।”
श्मशान की राशि से सरपंचों लगवाई स्ट्रीट लाइट:19 पंचायतों के कामों की होगी जांच, इंजीनियर उतरेंगे मैदान में

उमरिया जिले की 19 ग्राम पंचायतों में कुल 543 एलईडी स्ट्रीट लाइटों के नियम विरुद्ध लगाए जाने की शिकायतों के बाद अब उनके कार्यों की जांच शुरू कर दी गई है। जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अभय सिंह ने मानपुर जनपद पंचायत की 6 ग्राम पंचायतों और करकेली जनपद पंचायत की 13 ग्राम पंचायतों में भौतिक सत्यापन के लिए उपयंत्रियों को जिम्मेदारी सौंपी है। निर्देश में कहा गया है कि 5वें वित्त आयोग की राशि खर्च करने से पहले ग्राम पंचायत विकास योजना तैयार कर उसे पंचायत दर्पण पोर्टल पर दर्ज करना आवश्यक है। प्राथमिकता अनुसार श्मशान घाट विकास कार्यों पर राशि खर्च की जानी थी, लेकिन कई पंचायतों में इसके विपरीत स्ट्रीट लाइट का कार्य कराया गया। काम का तरीका देखा जाएगा जांच के दौरान उपयंत्री यह देखेंगे कि नए खंभे लगाए गए हैं या नहीं, वायरिंग जमीन के अंदर की गई है या नहीं, तकनीकी स्वीकृति और प्राक्कलन के अनुसार कार्य हुआ है या नहीं, तथा लाइटें चालू हालत में हैं या नहीं। उपयोगिता के आधार पर विस्तृत प्रतिवेदन जिला पंचायत को सौंपा जाएगा। कहां कितनी लगाई गईं करकेली जनपद पंचायत की 13 पंचायतों में 355 स्ट्रीट लाइट लगाई गई हैं। इनमें पठारीकला में 15, बिरुहलिया 22, कॉलोनी 34, महरोई 60, महिमार 30, बिलासपुर 31, अतरिया 22, अखड़ार 22, पथरहटा 45, बरहटा 21, करकेली 10, पिनौरा 18 और नरवार-25 में 25 लाइट शामिल हैं। वहीं मानपुर जनपद पंचायत की 6 पंचायतों में 188 स्ट्रीट लाइट लगाई गई हैं। इनमें दमोय 26, जनकपुरी 26, चितरांव 26, मझोखर 30, सकरिया 14 और गोरइया में 26 लाइट लगाई गई हैं।
पेट की गर्मी और कब्ज दूर करने के लिए दही-चावल है बेहतर या दाल-चावल? एक्सपर्ट से जानें सही जवाब!

Last Updated:April 05, 2026, 09:02 IST Dahi Chawal vs Dal Chawal : दही-चावल और दाल-चावल, दोनों ही हल्के, स्वादिष्ट और आसानी से पचने वाले भोजन हैं. इसीलिए जब आप बीमार हों या आपका पेट खराब हो, तो इन्हें खाने की सलाह दी जाती है. हालांकि, जब बात पेट की सेहत की आती है, तो ये दोनों ही शरीर को अलग-अलग तरीकों से फ़ायदा पहुंचाते हैं. अगर आपके मन में कभी यह सवाल आया है कि आपके पेट के लिए इन दोनों में से कौन ज़्यादा बेहतर है, तो यहां वह जानकारी दी गई है. दही-चावल और दाल-चावल ऐसे दो मुख्य खाने हैं जो पूरे देश में रोज़मर्रा की डाइट का हिस्सा हैं. दोनों ही हल्के, स्वादिष्ट और आसानी से पचने वाले हैं, इसलिए बीमार होने पर या पेट खराब होने पर इन्हें खाने की सलाह दी जाती है. लेकिन जब बात आती है पेट की सेहत की, तो ये दोनों शरीर को अलग-अलग तरीके से फायदा पहुंचाते हैं. अगर आपने कभी सोचा है कि इनमें से कौन सा आपके पेट के लिए बेहतर है, तो ये तुलना आपको समझने में मदद करेगी कि हर खाने का क्या फायदा है. ऐसा कहती हैं एक्सपर्ट प्रियंका रोहतगी. दही-चावल आंत में अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाता है. दही में जीवित कल्चर होने की वजह से इसमें बहुत सारे प्रोबायोटिक्स होते हैं. ये फायदेमंद बैक्टीरिया आंत के माइक्रोबायोम का संतुलन बनाए रखते हैं, जो पाचन, इम्यूनिटी और पोषक तत्वों के लिए जरूरी है. इसे रोज खाने से पेट साफ रहता है और गैस कम होती है. दही-चावल पाचन तंत्र को आराम देता है. दही में दूध के मुकाबले कम लैक्टोज होता है, इसलिए इसे कई लोगों के लिए पचाना आसान होता है. इसमें मौजूद प्रोबायोटिक्स आंत में लैक्टोज को बेहतर तरीके से तोड़ने में मदद करते हैं. दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स पाचन तंत्र की हल्की सूजन कम करने में भी मदद करते हैं. दही-चावल आमतौर पर थोड़ा पतला और हल्का नमक डालकर खाया जाता है, जिससे शरीर में पानी की मात्रा बनी रहती है. Add News18 as Preferred Source on Google दाल में बहुत फाइबर होता है, जो आंत के अच्छे बैक्टीरिया के लिए खाना बन जाता है. ये प्रीबायोटिक्स आंत के बैक्टीरिया को बढ़ने में मदद करते हैं और शॉर्ट-चेन फैटी एसिड बनाते हैं, जो आंत की सेहत के लिए फायदेमंद है. इसी वजह से दाल-चावल लंबे समय तक आंत की सेहत के लिए बहुत अच्छा है. दाल में फाइबर और चावल में जटिल कार्बोहाइड्रेट का मेल मल की मात्रा और घनत्व को बेहतर बनाता है. इसे नियमित खाने से मल त्याग कंट्रोल में रहता है और कब्ज कम होती है. दाल-चावल अक्सर आंतों की सेहत के लिए फायदेमंद होता है. दाल से मिलने वाला प्रोटीन पाचन तंत्र की मांसपेशियों और बाकी मांसपेशियों की मरम्मत में मदद करता है. अलग-अलग दालों में फाइबर, अमीनो एसिड और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की मात्रा अलग होती है. ये विविधता कम चीजों वाले खाने की तुलना में आंतों के माइक्रोबायोम को ज्यादा मजबूत बनाती है, जिससे कुल मिलाकर पाचन शक्ति बेहतर होती है. दही-चावल और दाल-चावल दोनों ही पेट के लिए अच्छे हैं, लेकिन इनका असर अलग होता है. जब पेट को शांत करना हो या बीमारी के बाद ठीक करना हो, जैसे एसिडिटी या डायरिया, तब दही-चावल बहुत फायदेमंद होता है. इसमें मौजूद प्रोबायोटिक्स तुरंत पेट को आराम देते हैं. वहीं, दाल-चावल में फाइबर और प्रोटीन होता है, जो लंबे समय तक पेट को मजबूत बनाता है और पाचन को बेहतर करता है. अगर आपकी आंत संवेदनशील या परेशान महसूस करती है, तो दही-चावल एक अच्छा विकल्प हो सकता है. अगर आप लंबे समय तक अच्छी पाचन चाहते हैं, तो दाल-चावल थोड़ा बेहतर है. सबसे अच्छा है कि आप अपनी डाइट में दोनों को समय-समय पर शामिल करें, इससे आपकी आंत स्वस्थ, संतुलित और मजबूत रहेगी. First Published : April 05, 2026, 09:02 IST
लंबी कतारों से मिलेगा छुटकारा, सीकर के इस अस्पताल में लगा एक्सरे, दो मिनट में होगी आंखों की जांच

Last Updated:April 05, 2026, 09:01 IST Sikar SK Hospital New Facility: सीकर के एसके अस्पताल में मरीजों को बेहतर सुविधा देने के लिए नई व्यवस्था शुरू की जा रही है. ट्रोमा सेंटर में एक्स-रे जांच की सुविधा शुरू होने से इमरजेंसी मरीजों को तुरंत राहत मिलेगी और रेडियोलॉजी विभाग पर दबाव कम होगा. साथ ही नेत्र विभाग में नई ऑटो रिफ्रेक्टोमीटर मशीन लगाई जाएगी, जिससे दो मिनट में आंखों की जांच संभव होगी. इन सुविधाओं से मरीजों का समय बचेगा और उन्हें प्राइवेट अस्पतालों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. ख़बरें फटाफट एसके अस्पताल में एक्स-रे और आंखों की जांच सुविधा शुरू सीकर: शेखावाटी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल श्री कल्याण (एसके) हॉस्पिटल में अब मरीजों को और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलने जा रही है. अस्पताल प्रशासन ने मरीजों की बढ़ती संख्या और लंबी कतारों को देखते हुए नई व्यवस्थाएं लागू करने का फैसला लिया है. इसी कड़ी में ट्रोमा सेंटर में एक्स-रे जांच की सुविधा शुरू की जा रही है, जिससे खासतौर पर इमरजेंसी मरीजों को तुरंत राहत मिल सकेगी. अब मरीजों को अलग-अलग विभागों में भटकने की जरूरत नहीं पड़ेगी और एक ही छत के नीचे उन्हें आवश्यक जांच और उपचार की सुविधा उपलब्ध होगी. अस्पताल अधीक्षक डॉ. प्रियंका अमन ने बताया कि फिलहाल एक्स-रे जांच की सुविधा केवल एक ही स्थान पर उपलब्ध है, जिससे रेडियोलॉजी विभाग में मरीजों की लंबी कतारें लग जाती है. इस समस्या को ध्यान में रखते हुए ट्रोमा यूनिट में एक्स-रे जांच शुरू की जा रही है. इससे न केवल रेडियोलॉजी कक्ष का दबाव कम होगा, बल्कि दुर्घटना या अन्य आपात स्थिति में आने वाले मरीजों को तुरंत जांच की सुविधा मिल सकेगी. इससे इलाज की प्रक्रिया भी तेजी से पूरी हो पाएगी और मरीजों को समय पर उपचार मिलना आसान होगा. दो मिनट में आंखों की हो सकेगी जांच अस्पताल के नेत्र रोग विभाग में भी बड़ी राहत देने की तैयारी की गई है. वर्तमान में चश्मे का नंबर जांचने की सुविधा केवल एक ही जगह होने के कारण मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है. इसे देखते हुए आई डिपार्टमेंट में एक अतिरिक्त ऑटो रिफ्रेक्टोमीटर मशीन लगाने का निर्णय लिया गया है. यह मशीन महज दो मिनट में आंखों की जांच कर सटीक नंबर बता देती है. इससे मरीजों का समय और पैसे दिनों बचेंगे. दो मशीन लगने से उन्हें लाइनों में भी नहीं लगाना पड़ेगा. डॉ. प्रियंका अमन ने बताया कि अस्पताल प्रशासन लगातार मरीजों को अधिक से अधिक सुविधाएं देने के लिए कई नाचार भी किए जा रहे हैं. नई मशीन और ट्रोमा सेंटर में एक्स-रे सुविधा शुरू होने से मरीजों को काफी सहूलियत मिलेगी. खासकर उन मरीजों के लिए यह व्यवस्था बेहद लाभकारी होगी, जिन्हें तुरंत जांच की आवश्यकता होती है. प्राइवेट हॉस्पिटल में जाने की नहीं पड़ेंगी जरूरत सीकर के एसके अस्पताल में एक्स-रे जांच अधिक आसान होने के बाद अब मरीजों को प्राइवेट हॉस्पिटलों में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. इससे पहले मरीज को सराय और आंखों की जांच के लिए प्राइवेट हॉस्पिटलों पर निर्भर रहना पड़ता था. इसमें सबसे अधिक परेशानी गरीब और मिडिल क्लास लोगों को आ रही थी. ऐसे में इस समस्या का समाधान निकलते हुए अस्पताल प्रशासन ने दोनों मशीनों की संख्या में बढ़ोतरी की है. About the Author deep ranjan दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से News18 हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें Location : Sikar,Rajasthan First Published : April 05, 2026, 09:01 IST
बाघ के शिकारी अपने बयान से पलटे:बोले- यूरिया से नहीं, बिजली करंट से मारा, खेत में अफीम बचाने बिछाए थे तार

छिंदवाड़ा जिले के तामिया क्षेत्र स्थित छातीआम गांव में सतपुड़ा टाइगर रिजर्व (एसटीआर) के रेडियो कॉलर वाले बाघ के शिकार मामले में नया खुलासा हुआ है। अफीम की खेती के मामले में जांच के दौरान गिरफ्तार 5 आरोपियों ने अपने बयान बदलते हुए बताया है कि बाघ की मौत मरे हुए बैल के मांस पर डाले गए यूरिया को खाने से नहीं, बल्कि खेत के चारों तरफ अफीम की खेती बचाने के लिए बिछाए गए तारों के करंट से हुई थी। फिलहाल, वन विभाग को बाघ की मौत का स्पष्ट कारण जानने के लिए लैब रिपोर्ट का इंतजार है और मामले की जांच जारी है। 3 मार्च को मिली थी आखिरी लोकेशन, 23 दिन बाद पहुंची टीम सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के रेडियो कॉलर लगे बाघ की आखिरी लोकेशन 3 मार्च को तामिया के सांगाखेड़ा रेंज के छातीआम गांव में मिली थी। बाघ की कोई हलचल न होने पर 23 दिन बाद एसटीआर के देनवा बफर की टीम गांव पहुंची। वहां बाघ तो नहीं मिला, लेकिन शिकार किया हुआ एक मरा बैल मिला, जिससे टीम को शिकार का संदेह हुआ। टीम ने डॉग स्क्वॉड और रेस्क्यू टीम बुलाकर खोजबीन की तो खेत में अफीम की फसल लगी मिली। इसके बाद वन विभाग और एसटीआर ने 27 मार्च को छातीआम निवासी उदेसिंग, उसके बेटे मनक सिंह सहित 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया था। पहले यूरिया डालकर मारने की बात मानी, अब पलटे प्रारंभिक जांच में आरोपियों ने बताया था कि उन्होंने मृत बैल के शरीर पर यूरिया डाल दिया था, जिसे खाने से बाघ की मौत हुई। वन अधिकारियों ने भी इसे मान लिया था और पोस्टमार्टम के बाद प्रेस नोट में यही बात दोहराई थी। 28 मार्च को एसटीआर फील्ड डायरेक्टर ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) को यही रिपोर्ट भेजी थी। लेकिन अब तामिया एसडीओ सीमा ठाकुर द्वारा दर्ज किए गए धारा 50 के बयानों में आरोपियों ने बताया कि बाघ की मौत यूरिया से नहीं, बल्कि अफीम की खेती के चारों तरफ तार से फैलाए गए करंट की चपेट में आने से हुई है। 23 दिन की देरी पर उठे सवाल, मॉनिटरिंग लॉग ऑडिट की मांग बाघ के शिकार मामले में वन विभाग की टीम की मॉनिटरिंग पर सवाल उठ रहे हैं। वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने कहा कि बाघिन के रेडियो कॉलर से तीन मार्च से कोई हलचल नहीं हो रही थी। सवाल यह है कि 23 दिनों तक मॉनिटरिंग टीम ने इस पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। उन्होंने मांग की है कि एनटीसीए द्वारा पिछले 30 दिनों के मॉनिटरिंग लॉग का ऑडिट किया जाए। अफसर बोले- लैब रिपोर्ट से स्पष्ट होगा मौत का कारण एसटीआर फील्ड डायरेक्टर राखी नंदा ने बताया, “बाघ के शिकारियों ने पहले मरे हुए बैल के मांस पर यूरिया डालने की बात कहीं थी। जिसे खाने से बाघ की मौत हुई। बाघ की मौत कैसे हुई, यह लैब से रिपोर्ट आने के बाद ही क्लियर होगी। डॉक्टर ने पोस्टमार्टम के दौरान सैंपल लिए गए। यूरिया खाने, इलेक्ट्रिक करंट या अन्य कारणों से मौत हुई। वो लैब रिपोर्ट स्पष्ट होगा।” वहीं, पश्चिम छिंदवाड़ा वन मंडल के डीएफओ साहिल गर्ग ने कहा, “आरोपितों के बयान लिए गए हैं। आरोपितों ने यह स्वीकार किया है कि करंट लगने से बाघ की मौत हुई। अभी इस मामले की जांच जारी है।”
पुरुषों को 30 की उम्र से ही हार्ट डिजीज का खतरा ! युवा बिल्कुल नजरअंदाज न करें ये 5 सबसे बड़े कारण

Last Updated:April 05, 2026, 08:15 IST Heart Disease Risk in Men: एक नई रिसर्च में पता चला है कि पुरुषों में दिल की बीमारी का खतरा 35 साल की उम्र के आसपास तेजी से बढ़ने लगता है. यह समस्या बिना लक्षण के शुरू होती है, इसलिए साइलेंट किलर का काम कर सकती है. हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि पुरुषों को 30 की उम्र से ही नियमित हार्ट चेकअप कराना चाहिए. युवाओं में हार्ट डिजीज की समस्या तेजी से बढ़ रही है. Heart Disease in Young Age: अधिकतर लोगों को लगता है कि हार्ट डिजीज का खतरा 40-50 की उम्र के बाद ज्यादा होता है, लेकिन एक नई स्टडी के अनुसार बड़ी संख्या में पुरुषों में 30 की उम्र से ही हार्ट डिजीज डेवलप होने लगती है. धीरे-धीरे यह बीमारी बढ़ती रहती है और लोग इसे नजरअंदाज करते रहते हैं. जर्नल ऑफ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में प्रकाशित रिसर्च की मानें तो पुरुषों में दिल की बीमारी का खतरा 35 साल की उम्र के आसपास तेजी से बढ़ने लगता है. यह खतरा बिना लक्षण के पैदा हो जाता है, जिससे समय रहते इसकी पहचान नहीं हो पाती है. इसकी वजह से तमाम लोग अपनी जान गंवा देते हैं. इस स्टडी में 5000 से अधिक वयस्कों को 30 साल से ज्यादा समय तक ट्रैक किया गया. शोधकर्ताओं ने पाया कि 35 साल के बाद पुरुषों और महिलाओं के बीच दिल की बीमारी के रिस्क में साफ अंतर दिखने लगता है. पुरुषों में यह रिस्क तेजी से बढ़ता है और मिडिल एज तक महिलाओं की तुलना में अधिक बना रहता है. पुरुषों में हार्ट डिजीज का खतरा महिलाओं की तुलना में लगभग 7 साल पहले 5% तक पहुंच जाता है. कोरोनरी हार्ट डिजीज के मामले में यह अंतर और भी ज्यादा गंभीर पाया गया. पुरुषों में इसका खतरा महिलाओं की तुलना में 10 साल पहले दिखाई देने लगता है, जो इस बात का संकेत है कि उनकी ब्लड वेसल्स में नुकसान जल्दी शुरू हो जाता है. यह अंतर ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज, स्मोकिंग, मोटापा और शारीरिक गतिविधि जैसे फैक्टर्स को ध्यान में रखने के बाद भी बना रहता है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. भारतीय एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह स्थिति भारत में अत्यधिक गंभीर हो सकती है. AIIMS के कार्डियोलॉजी प्रोफेसर डॉ. अंबुज रॉय ने TOI को बताया कि अब दिल की बीमारी को केवल मिडिल एज की समस्या मानना गलत है. भारत में रिस्क फैक्टर्स 30 की उम्र में ही दिखने लगते हैं, इसलिए डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल की जांच जल्दी शुरू करना जरूरी है. दक्षिण एशियाई लोगों में दिल की बीमारी का खतरा पश्चिमी देशों की तुलना में पहले सामने आता है. वहीं महिलाओं में यह जोखिम मेनोपॉज के बाद तेजी से बढ़ता है, लेकिन अक्सर इसे नजरअंदाज कर दिया जाता है. इसलिए जरूरी है कि 30 की उम्र से ही नियमित जांच, सही जीवनशैली और जागरूकता पर ध्यान दिया जाए, ताकि दिल की बीमारियों से समय रहते बचाव किया जा सके. डॉक्टर्स साफ कहते हैं कि युवाओं को हार्ट डिजीज से बचने के लिए अपनी लाइफस्टाइल पर ध्यान देना चाहिए. रोजाना कम से कम 30 मिनट व्यायाम या कोई फिजिकल एक्टिविटी करें, संतुलित और हेल्दी आहार लें जिसमें फल, सब्जियां, साबुत अनाज और हेल्दी फैट शामिल हों. जंक फूड, ज्यादा नमक और शुगर से दूरी बनाए रखें. धूम्रपान और शराब जैसी आदतों से बचें, क्योंकि ये दिल के लिए बेहद नुकसानदायक हैं. साथ ही तनाव को मैनेज करना, पर्याप्त नींद लेना और समय-समय पर ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच कराना भी जरूरी है. छोटी-छोटी अच्छी आदतें अपनाकर युवा लंबे समय तक दिल को स्वस्थ रख सकते हैं. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें First Published : April 05, 2026, 08:15 IST








