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Argentina May Back Falklands Claim Amid UK-US Tensions

Argentina May Back Falklands Claim Amid UK-US Tensions

3 मिनट पहले

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ब्रिटेन और स्पेन ने NATO से जुड़ी एक अमेरिकी रिपोर्ट पर आपत्ति जताई है। इसमें कहा गया था कि ट्रम्प सरकार इन दोनों देशों को सजा देने पर विचार कर रही हैं। इसकी वजह ईरान के खिलाफ जंग में अमेरिका का खुलकर साथ नहीं देना है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा मंत्री यानी पेंटागन के भीतर अधिकारियों के बीच एक ईमेल के जरिए बातचीत हुई, जिसमें अलग-अलग संभावित कदमों (ऑप्शन्स) पर विचार किया जा रहा था।

जैसे कि विरोधी माने जा रहे देशों को NATO के अहम पदों से हटाना, स्पेन जैसे देश को गठबंधन में उसकी भूमिका को सीमित करना और ब्रिटेन के फॉकलैंड द्वीप पर दावे को लेकर अमेरिका की नीति की समीक्षा करना।

हालांकि पेंटागन ने इस ईमेल पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी और यह ईमेल सार्वजनिक रूप से भी सामने नहीं आया है।

ब्रिटेन के पीएम कीर स्टार्मर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 2025 में गाजा सम्मेलन के दौरान।

ब्रिटेन के पीएम कीर स्टार्मर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 2025 में गाजा सम्मेलन के दौरान।

शुरूआत में ब्रिटेन ने एयरबेस देने से इनकार किया था

ईरान पर हमलों के दौरान ट्रम्प और स्टार्मर के बीच तनाव देखने को मिला था। शुरुआत में ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने एयरबेस इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी थी। बाद में ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद ब्रिटेन ने कुछ एयरबेस इस्तेमाल करने की इजाजत दी, ताकि होर्मुज या ब्रिटिश ठिकानों को खतरा पैदा करने वाले ईरानी ठिकानों पर हमला किया जा सके। हालांकि फिर ट्रम्प इससे खुश नहीं हुए।

दूसरी तरफ अर्जेंटीना में इस खबर को लेकर खुशी का माहौल है। सरकार के प्रवक्ता जेवियर लानारी ने कहा कि उनका देश ‘माल्विनास’ को वापस पाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है। अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर मिलेई ट्रम्प के करीबी माने जाते हैं। मिलेई ने भी कहा कि इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा।

फॉकलैंड को लेकर अर्जेंटीना और ब्रिटेन में विवाद

फॉकलैंड द्वीप का मामला ब्रिटेन और अर्जेंटीना दोनों के लिए बहुत बड़ा मुद्दा है। दोनों देश इस पर दावा करते हैं। अर्जेंटीना इस द्वीप को माल्विनास कहता है।

फॉकलैंड दक्षिण अटलांटिक महासागर में स्थित हैं और अर्जेंटीना से सिर्फ 500 किमी दूर है। वहीं ब्रिटेन से यह 13,000 किमी दूर स्थित है।

अर्जेंटीना ऐतिहासिक रूप से इस द्वीप को अपना बताता आया है। अर्जेंटीना का कहना है कि ये द्वीप उसके पास होने चाहिए, क्योंकि ये उसके इलाके के करीब हैं।

वहीं ब्रिटेन कहता है कि वहां रहने वाले लोग खुद को ब्रिटिश मानते हैं और उन्होंने वोट करके भी ब्रिटेन के साथ रहने की इच्छा जताई है, इसलिए यह उसका क्षेत्र है।

1982 में अर्जेंटीना ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था, जिसके बाद ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने सेना भेजकर सिर्फ 10 हफ्ते में इन्हें वापस हासिल किया था।

अर्जेंटीना के आत्मसमर्पण करने से पहले लगभग 650 अर्जेंटीनाई सैनिक और 255 ब्रिटिश सैनिक मारे गए थे।

फॉकलैंड नीति की समीक्षा कर सकता है अमेरिका

अब लीक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका, फॉकलैंड द्वीप को लेकर अमेरिका की नीति की समीक्षा कर सकता है। दरअसल, जब 1982 में फॉकलैंड युद्ध शुरू हुआ तब अमेरिका ने खुद को बीच में रखने की कोशिश की।

अमेरिका चाहता था कि ब्रिटेन और अर्जेंटीना आपस में बात करके मामला सुलझाएं, क्योंकि दोनों ही उसके सहयोगी थे। लेकिन जब बातचीत से हल नहीं निकला, तो अमेरिका ब्रिटेन के पक्ष में आ गया।

अमेरिका ने ब्रिटेन को खुफिया जानकारी, सैन्य सपोर्ट और लॉजिस्टिक मदद दी। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन थे और उन्होंने ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर का साथ दिया।

अमेरिका आधिकारिक तौर पर साफ-साफ नहीं कहता कि फॉकलैंड किसका है, लेकिन व्यवहार में वह ब्रिटेन के बहुत करीब है और उसे अपना अहम सहयोगी मानता है। हाल के समय में ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका, ब्रिटेन पर दबाव डालने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल कर सकता है।

स्पेन बोला- ईमेल के आधार पर फैसले नहीं लेते

वहीं, स्पेन ने भी अमेरिका के रुख का विरोध किया है। प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज ने कहा कि वे किसी ईमेल के आधार पर काम नहीं करते, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों और नीतियों के आधार पर फैसले लेते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि स्पेन अपने सहयोगियों के साथ रहेगा, लेकिन हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में।

NATO के एक अधिकारी ने भी कहा कि संगठन के नियमों में किसी सदस्य देश को सस्पेंड या बाहर करने का प्रावधान ही नहीं है, इसलिए स्पेन को हटाना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं लगता।

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यह खबर भी पढ़ें…

ब्रिटेन ने अमेरिका को एयरबेस देने से इनकार किया:फैसले से डोनाल्ड ट्रम्प नाराज, रिपोर्ट- US एयरबेस से ईरान पर हमला करना चाहता है

ब्रिटेन ने अमेरिका को ईरान पर हमला करने के लिए अपने एयरबेस देने से मना कर दिया है। अमेरिका इन सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करना चाहता था, लेकिन ब्रिटेन ने इनकार कर दिया।

डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन के इस फैसले से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नाराज हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के उस समझौते से समर्थन वापस ले लिया है, जिसमें चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस को सौंपने की बात थी। पूरी खबर पढ़ें…

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जैसे कि विरोधी माने जा रहे देशों को NATO के अहम पदों से हटाना, स्पेन जैसे देश को गठबंधन में उसकी भूमिका को सीमित करना और ब्रिटेन के फॉकलैंड द्वीप पर दावे को लेकर अमेरिका की नीति की समीक्षा करना।

हालांकि पेंटागन ने इस ईमेल पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी और यह ईमेल सार्वजनिक रूप से भी सामने नहीं आया है।

ब्रिटेन के पीएम कीर स्टार्मर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 2025 में गाजा सम्मेलन के दौरान।

ब्रिटेन के पीएम कीर स्टार्मर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 2025 में गाजा सम्मेलन के दौरान।

शुरूआत में ब्रिटेन ने एयरबेस देने से इनकार किया था

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दूसरी तरफ अर्जेंटीना में इस खबर को लेकर खुशी का माहौल है। सरकार के प्रवक्ता जेवियर लानारी ने कहा कि उनका देश ‘माल्विनास’ को वापस पाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है। अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर मिलेई ट्रम्प के करीबी माने जाते हैं। मिलेई ने भी कहा कि इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा।

फॉकलैंड को लेकर अर्जेंटीना और ब्रिटेन में विवाद

फॉकलैंड द्वीप का मामला ब्रिटेन और अर्जेंटीना दोनों के लिए बहुत बड़ा मुद्दा है। दोनों देश इस पर दावा करते हैं। अर्जेंटीना इस द्वीप को माल्विनास कहता है।

फॉकलैंड दक्षिण अटलांटिक महासागर में स्थित हैं और अर्जेंटीना से सिर्फ 500 किमी दूर है। वहीं ब्रिटेन से यह 13,000 किमी दूर स्थित है।

अर्जेंटीना ऐतिहासिक रूप से इस द्वीप को अपना बताता आया है। अर्जेंटीना का कहना है कि ये द्वीप उसके पास होने चाहिए, क्योंकि ये उसके इलाके के करीब हैं।

वहीं ब्रिटेन कहता है कि वहां रहने वाले लोग खुद को ब्रिटिश मानते हैं और उन्होंने वोट करके भी ब्रिटेन के साथ रहने की इच्छा जताई है, इसलिए यह उसका क्षेत्र है।

1982 में अर्जेंटीना ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था, जिसके बाद ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने सेना भेजकर सिर्फ 10 हफ्ते में इन्हें वापस हासिल किया था।

अर्जेंटीना के आत्मसमर्पण करने से पहले लगभग 650 अर्जेंटीनाई सैनिक और 255 ब्रिटिश सैनिक मारे गए थे।

फॉकलैंड नीति की समीक्षा कर सकता है अमेरिका

अब लीक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका, फॉकलैंड द्वीप को लेकर अमेरिका की नीति की समीक्षा कर सकता है। दरअसल, जब 1982 में फॉकलैंड युद्ध शुरू हुआ तब अमेरिका ने खुद को बीच में रखने की कोशिश की।

अमेरिका चाहता था कि ब्रिटेन और अर्जेंटीना आपस में बात करके मामला सुलझाएं, क्योंकि दोनों ही उसके सहयोगी थे। लेकिन जब बातचीत से हल नहीं निकला, तो अमेरिका ब्रिटेन के पक्ष में आ गया।

अमेरिका ने ब्रिटेन को खुफिया जानकारी, सैन्य सपोर्ट और लॉजिस्टिक मदद दी। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन थे और उन्होंने ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर का साथ दिया।

अमेरिका आधिकारिक तौर पर साफ-साफ नहीं कहता कि फॉकलैंड किसका है, लेकिन व्यवहार में वह ब्रिटेन के बहुत करीब है और उसे अपना अहम सहयोगी मानता है। हाल के समय में ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका, ब्रिटेन पर दबाव डालने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल कर सकता है।

स्पेन बोला- ईमेल के आधार पर फैसले नहीं लेते

वहीं, स्पेन ने भी अमेरिका के रुख का विरोध किया है। प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज ने कहा कि वे किसी ईमेल के आधार पर काम नहीं करते, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों और नीतियों के आधार पर फैसले लेते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि स्पेन अपने सहयोगियों के साथ रहेगा, लेकिन हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में।

NATO के एक अधिकारी ने भी कहा कि संगठन के नियमों में किसी सदस्य देश को सस्पेंड या बाहर करने का प्रावधान ही नहीं है, इसलिए स्पेन को हटाना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं लगता।

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डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन के इस फैसले से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नाराज हैं। कहा जा रहा है कि उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के उस समझौते से समर्थन वापस ले लिया है, जिसमें चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस को सौंपने की बात थी। पूरी खबर पढ़ें…

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