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इंपैक्ट फीचर:सेज स्टार्टअप स्पार्क 2.0, स्टूडेंट्स के लिए एंटरप्रेन्योरशिप का लॉन्चपैड, जहां आइडियाज बनेंगे स्टार्टअप और सपने बनेंगे सक्सेस स्टोरीज कंट्री काउंटर्स; दुनिया के सारे देश घूमने का ट्रेंड:भीड़ से ऊबे लोग अनछुए डेस्टिनेशन का रुख कर रहे, एक्सपर्ट- यह प्रतिष्ठा का प्रतीक कंट्री काउंटर्स; दुनिया के सारे देश घूमने का ट्रेंड:भीड़ से ऊबे लोग अनछुए डेस्टिनेशन का रुख कर रहे, एक्सपर्ट- यह प्रतिष्ठा का प्रतीक टीम से बाहर होने के बाद सूर्या का पहला रिएक्शन:स्क्वाड को ‘ऑल द बेस्ट’ कहा; सूर्यवंशी के लिए लिखा- आपने यह मौका कमाया टीम से बाहर होने के बाद सूर्या का पहला रिएक्शन:स्क्वाड को ‘ऑल द बेस्ट’ कहा; सूर्यवंशी के लिए लिखा- आपने यह मौका कमाया ‘लापरवाह उपेक्षा…’: युसूफ पठान से ममता के लिए लोकसभा सीट खाली करने को कहने पर सौरव गांगुली | भारत समाचार
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नई फिल्म:कांस में रिलीज हुआ वामिका की ‘डीसी’ का ट्रेलर

नई फिल्म:कांस में रिलीज हुआ वामिका की ‘डीसी’ का ट्रेलर

वामिका गब्बी मौजूदा वक्त में इंडस्ट्री की सबसे व्यस्त एक्ट्रेसेस में से एक हैं। पिछले महीने ‘भूत बंगला’ की सफलता के बाद कल ही उनकी नई फिल्म ‘पति पत्नी और वो दो’ रिलीज हुई है। अब उनकी आगामी फिल्म ‘डीसी’ रिलीज को तैयार है। फिल्म का ट्रेलर 79वें कांस फिल्म फेस्टिवल में जारी किया गया है। ‘डीसी’ से निर्देशक से एक्टर बने लोकेश कनगराज अपना एक्टिंग डेब्यू कर रहे हैं। 3 मिनट 13 सेकेंड के इस ट्रेलर में लोकेश कनगराज को देवदास और वामिका को चंद्रा के रूप में दिखाया गया है। ट्रेलर में दिखाया जाता है कि चंद्रा के माता-पिता ने कोलकाता में उसे कई साल पहले अवैध रूप से देह व्यापार में बेच दिया था। अब उसके पास रहने की कोई जगह नहीं है। जल्द ही पता चलता है कि देवदास एक पुलिस वाले और डॉक्टर चंद्रा की हत्या के आरोप में वॉन्टेड है। इसके बाद ट्रेलर में जबरदस्त एक्शन, खूनखराबा, बम धमाके और गोलीबारी देखने को मिलती है।

नया खलनायक:राम चरण स्टारर फिल्म ‘पेड्डी’ से दिव्येंदु का फर्स्ट लुक हुआ रिवील

नया खलनायक:राम चरण स्टारर फिल्म ‘पेड्डी’ से दिव्येंदु का फर्स्ट लुक हुआ रिवील

साउथ सुपरस्टार राम चरण की अगली फिल्म ‘पेड्डी’ लगातार चर्चा में बनी हुई है। ‘गेम चेंजर’ के बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं करने के बाद दर्शकों को इस फिल्म से काफी उम्मीदें हैं। फिल्म में जाह्नवी कपूर भी लीड रोल में नजर आएंगी। अब मेकर्स ने फिल्म से दिव्येंदु का पहला लुक भी जारी कर दिया है। वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ से लोकप्रिय हुए दिव्येंदु शर्मा को फिल्म में ‘रामबुज्जी’ के किरदार में पेश किया गया है। पोस्टर में उनका दमदार और आक्रामक अंदाज देखने को मिल रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक दिव्येंदु फिल्म में ग्रामीण आंध्र प्रदेश की क्रिकेट दुनिया पर दबदबा रखने वाले एक खतरनाक खलनायक की भूमिका निभा रहे हैं। उनका लुक कहानी में बड़े टकराव और तीव्र संघर्ष की ओर इशारा करता है। पोस्टर में उनका गंभीर और जोशीला अंदाज सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। फिल्म का निर्देशन बुची बाबू सना कर रहे हैं। इस फिल्म को बड़े स्तर पर तैयार किया जा रहा है और इसे पैन-इंडिया रिलीज के तौर पर पेश किया जाएगा। मेकर्स ने यह भी घोषणा की है कि फिल्म का ट्रेलर 18 मई को रिलीज किया जाएगा। वहीं, यह फिल्म 4 जून को सिनेमाघरों में दस्तक देगी। बता दें कि दिव्येंदु को हाल ही में वेब सीरीज ‘ग्लोरी’में देगा गया था। इस सीरीज में उनके साथ पुलकित सम्राट ने भी लीड रोल प्ले किया है।

मशहूर शेफ विकास खन्ना की स्वीकारोक्ति:मां को मेरे हा​​थ का खाना पसंद नहीं आया, तब लगा भोजन की आत्मा छूना जरूरी

मशहूर शेफ विकास खन्ना की स्वीकारोक्ति:मां को मेरे हा​​थ का खाना पसंद नहीं आया, तब लगा भोजन की आत्मा छूना जरूरी

‘अमृतसर की गलियों में मेरा बचपन बीता और वहां मैंने एक बात सीखी- भोजन सिर्फ पकाया नहीं जाता, ‘अर्पित’ किया जाता है। मुझे याद है, मेरी दादी सुबह के धुंधलके में सहज प्रवृत्ति और अगाध श्रद्धा के साथ बड़े-बड़े पतीले चढ़ाती थीं। वे रसोईघर विलासिता या महंगी सामग्रियों से नहीं सजे थे, लेकिन वे सुंदर अनुष्ठानों और बेपनाह देखभाल से भरे हुए थे। मुझे मिशेलिन स्टार्स मिले, दुनियाभर में सराहना मिली, लेकिन इस दौड़ में मैं उस भोजन से दूर होता गया जिसने मुझे पहली पहचान दी थी। एक पल आज भी मुझे झकझोर देता है- मेरी मां मेरे रेस्त्रां में खाना खाने बैठी थीं और उन्होंने मेरे बनाए भोजन का एक ग्रास भी पसंद नहीं किया। वह बात मेरे मन में गहराई से घर कर गई। मैंने वर्षों उस उत्कृष्टता को पाने में लगाए थे जिसे दुनिया ने परिभाषित किया था, पर जिस व्यक्ति का मैं सबसे ज्यादा सम्मान करता था, वह मेरे भोजन में खुद को नहीं ढूंढ पा रही थीं। उस घटना ने मेरे भीतर एक सवाल जगा दिया जिसे मैं और टाल नहीं सकता था- महान स्वाद तय कौन करता है?’ वैश्विक पाक मानक विशेष इतिहास में विकसित हुए हैं। उन्होंने तकनीक, सटीकता और निरंतरता को महत्व दिया है और इसके लिए वे सम्मान के पात्र हैं, लेकिन वे हमेशा उन व्यंजनों की आत्मा को नहीं पकड़ पाते जो स्मृतियों और जीवन के अनुभवों से आकार लेते हैं। व्यंजन की सफलता सिर्फ स्टार्स या रैंकिंग से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान से आंकी जानी चाहिए- उन लोगों से जो उसमें खुद को देख पाते हैं। हर संस्कृति को एक सांचे में फिट करने के बजाय हमें दायरा बड़ा करना होगा, जहां उत्कृष्टता की कई परिभाषाएं साथ रह सकें। भोजन हमेशा जुड़ाव और हमारी पहचान का प्रतिबिंब रहा है; उसकी इस विविधता को स्वीकार करना ही उसकी सबसे बड़ी जीत है।’ भारतीय भोजन का अस्तित्व हमेशा से घरों, मंदिरों और लंगरों में रहा है। इसे किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं, बल्कि पोषण देने, सबको साथ लाने और घाव भरने के लिए बनाया गया था। पर विडंबना देखिए, लंबे समय तक दुनिया ने भारतीय भोजन को इन्हीं खूबियों की वजह से नजरअंदाज किया। मैंने भारत के कुलीनरी स्कूल में फ्रेंच सॉस और यूरोपीय तकनीकें सीखीं, जिसने अनुशासन और ढांचा दिया। परंतु मन तो भारतीय भोजन की गहराई की ओर खिंचा रहता था, जिसे सिखाया नहीं जाता बल्कि आत्मा से महसूस किया जाता है। उडुपी के कृष्ण मंदिर की अनानास-नारियल करी, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की दाल, पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मीठे चावल और मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर के मोदक… इन स्वादों ने मेरे भीतर कलिनेरी स्कूल की किसी भी सॉस से कहीं गहरी गूंज जगाई। जब सहपाठी यूरोपीय पाठ्यक्रम के तय रास्ते पर बढ़ रहे थे, मैं बार-बार उन्हीं स्वादों की ओर लौट रहा था, जिनके साथ मेरा बचपन और मेरी आत्मा जुड़ी रही। हमारे स्कूल की लाइब्रेरी की दीवार पश्चिमी शेफ की तस्वीरों से भरी थी, जिन्हें आदर्श मानने को कहा जाता था। मैंने एक बार पूछा था,‘यहां कोई मेरी तरह क्यों नहीं दिखता?’ जवाब था…‘क्योंकि दुनिया पर इन्हीं का नियंत्रण है।’ यही नियंत्रण तय करता है कि किस व्यंजन की अहमियत है और किसे कमतर माना जाए। इस तरह खाने-पीने के मामले में समाज में एक तरह का ऊंच-नीच का भेदभाव बन गया है। इसमें कुछ खास तरह के खान-पान (जैसे विदेशी या बड़े शहरों के पकवान) को ‘बेहतर और स्टैंडर्ड’ मान लिया जाता है, जबकि हमारे अपने स्थानीय या गांव-देहात के पारंपरिक खाने को ‘क्षेत्रीय’ कहकर उतना महत्व नहीं दिया जाता। नतीजा यह हुआ कि भोजन का एक ही ढांचा हावी हो गया और बाकी सबसे उसी में ढलने की उम्मीद की जाती रही। कुलीनरी स्कूल के बाद मैंने उसी सिस्टम में नाम कमाया। लगातार 6 बार ‘कुकिंग का ऑस्कर’ जीता, मास्टरशेफ इंडिया के जज रहे शेफ विकास खन्ना ने न्यूयॉर्क स्थित रेस्टोरेंट ‘जुनून’ के लिए लगातार 6 बार (6 साल) मिशेलिन स्टार हासिल किए। ये रेस्टोरेंट की दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान है, जिसे ‘कुकिंग का ऑस्कर’ भी कहा जाता है। विकास ने कोविड-19 के दौरान ‘Feed India’ नाम से दुनिया का सबसे बड़ा फूड ड्राइव चलाया, जिसके लिए उन्हें ‘एशिया गेम चेंजर अवॉर्ड’ से नवाजा गया। उन्होंने ‘मास्टरशेफ इंडिया’ को जज किया है और दर्जनों किताबें लिखी हैं। उनकी किताब ‘उत्सव’ दुनिया की सबसे महंगी और भारी किताबों में गिनी जाती है। 15-16 किलो वजनी इस किताब में 1200 पन्ने हैं। इसकी शुरुआती 12 प्रतियां बहुत खास थीं। इनमें एक प्रति 30 लाख रु. में नीलाम हुई थी, जिसके पैसे दान किए गए थे। इस किताब की एक प्रति का अंकित मूल्य 8 लाख रु. था।

Naomi was criticized for withdrawing from the French Open, Naomi Osaka

Naomi was criticized for withdrawing from the French Open, Naomi Osaka

Hindi News Sports Naomi Was Criticized For Withdrawing From The French Open, Naomi Osaka न्यूयॉर्क13 मिनट पहले कॉपी लिंक मशहूर टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका।- फाइल फोटो दुनिया अक्सर कामयाबी को सिर्फ उपलब्धियों में मापती है। कितने मैच जीते, कितने रिकॉर्ड बनाए, कितनी बार लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरे। लेकिन बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि किसी इंसान की असली ताकत सिर्फ उसके किए हुए कामों में नहीं, बल्कि उन चीजों में भी छिपी होती है जिन्हें करने से उसने इनकार किया। दुनिया की मशहूर टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने सिर्फ जीतना नहीं सीखा, बल्कि सही समय पर ‘ना’ कहना भी सीखा और शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया। जापान की ओसाका जैसे-जैसे सफल होती गईं, वैसे-वैसे उनके आसपास उम्मीदों का दायरा भी बढ़ता गया जैसे कि शानदार प्रदर्शन, मुस्कुराहट, इंटरव्यू, हर मंच पर मौजूदगी। ओसाका भी लंबे समय तक हर किसी को खुश रखने की कोशिश करती रहीं। वे बताती हैं, ‘मुझे हमेशा लगता था कि अगर मैंने किसी चीज के लिए मना किया तो लोग निराश हो जाएंगे।’ लेकिन धीरे-धीरे यह आदत बोझ बनने लगी। लगातार काम, मानसिक दबाव, खुद को हर समय साबित करने की कोशिश ने उन्हें थका दिया। बाहर से वे सफल खिलाड़ी दिखती थीं, लेकिन अंदर एक संघर्ष चल रहा था। फिर उन्होंने साल 2021 के फ्रेंच ओपन से हटने का फैसला कर लिया। यह फैसला खेल जगत के लिए चौंकाने वाला था। आलोचना भी हुई, सवाल भी उठे। लेकिन ओसाका के लिए यह सिर्फ एक फैसला नहीं था, बल्कि खुद को बचाने की शुरुआत थी। वे कहती हैं, ‘उस समय मैंने पहली बार समझा कि मुझे हर वह चीज करने की जरूरत नहीं है, जिसकी लोग मुझसे उम्मीद करते हैं। खुद को बचाना भी जरूरी होता है।’ यही वह मोड़ था, जहां ‘ना’ कहना उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया। उन्होंने महसूस किया कि हर बार दूसरों को खुश करने की कोशिश में इंसान खुद को खो देता है। कई बार इंकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि खुद के प्रति जिम्मेदारी होती है। ओसाका ने धीरे-धीरे सीमाएं तय करनी शुरू कीं। उन्होंने उन कामों से दूरी बनानी शुरू की, जिनमें उनका मन नहीं लगता था। मानसिक शांति को प्राथमिकता देना सीखा। मां बनने के बाद उनकी सोच और मजबूत हो गई। अब उनका हर फैसला सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि बेटी के लिए भी था। ओसाका ने बताया, ‘अब जब मैं ‘ना’ कहती हूं, तो अपराधबोध नहीं होता क्योंकि मैं जानती हूं कि मैं अपनी शांति और परिवार की सुरक्षा के लिए ऐसा कर रही हूं।’ 28 वर्षीय ओसाका की कहानी सिर्फ सफल खिलाड़ी की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है, जिसने दुनिया को समझाया कि सफलता सिर्फ हर मौके को पकड़ने से नहीं मिलती। कई बार जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए यह तय करना जरूरी होता है कि हमें क्या नहीं करना है, और शायद इसी वजह से उनका सबसे मजबूत हथियार कोई टेनिस शॉट नहीं, बल्कि सही समय पर कहा गया एक छोटा-सा ‘ना’ बन गया। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

सॉफ्टवेयर टूल्स से चल रही जापान की अनोखी पार्टी ‘मिराई’:हर मुश्किल का हल डेटा से, जनता से डिजिटल फीडबैक लेते हैं

सॉफ्टवेयर टूल्स से चल रही जापान की अनोखी पार्टी ‘मिराई’:हर मुश्किल का हल डेटा से, जनता से डिजिटल फीडबैक लेते हैं

जापान की राजनीति में एक अनोखी पार्टी ‘टीम फ्यूचर मिराई’ चर्चा में है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) समर्थक एजेंडे और टेक्नोलॉजी आधारित राजनीति के वादे के साथ उभरी इस पार्टी का चेहरा अन्नो ताकाहिरो हैं, जो सॉफ्टवेयर इंजीनियर और एआई उद्यमी से पहले साइंस फिक्शन लेखक भी रहे हैं। ताकाहिरो सरकार और लोकतंत्र में भी इंजीनियरिंग सोच और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की पैरवी कर दुनिया में तकनीक-आधारित राजनीति की नई बहस को आगे बढ़ा रहे हैं। वे 2024 में टोक्यो गवर्नर चुनाव लड़कर राजनीति में आए। सोशल मीडिया और एआई के जरिए वोटरों से फीडबैक लेने के तरीके से वे चर्चा में आए। उन्होंने 2025 में ‘मिराई’ पार्टी बनाई। पार्टी ने पहले ऊपरी सदन में एक सीट, फिर इस साल निचले सदन में 11 सीटें जीतकर मौजूदगी दर्ज कराई। छोटी पार्टी होने के बावजूद मिराई शुरुआती सफल एआई समर्थक राजनीतिक पार्टियों में से एक मानी जा रही है। जब दुनियाभर में लोग डर रहे हैं कि एआई इंसानों की नौकरियां खा जाएगा, अन्नो ताकाहिरो इसे जापान की बड़ी समस्या ‘बूढ़ी होती आबादी’ के समाधान के रूप में देख रहे हैं। एआई के जरिए फीडबैक टीम मिराई में जनता की राय जानने के लिए पारंपरिक सर्वे की बजाय सोशल मीडिया और डिजिटल फीडबैक पर ज्यादा जोर रहता है। अन्नो का दावा है कि इससे जनता की आवाज पहले से ज्यादा गहराई से सुनी जा सकती है। ताइवान की मंत्री ऑड्रे टेंग से ली प्रेरणा अन्नो ताकाहिरो ने ताइवान की पूर्व डिजिटल मंत्री ऑड्रे टेंग से प्रेरणा ली है। अन्नो व्यवस्था बदलने नहीं, बल्कि तकनीक से सिस्टम को बेहतर बनाने की बात करते हैं। मिराई खुद को फैक्ट्स और डेटा आधारित राजनीति वाली पार्टी बताती है। इसी सोच के तहत उसने जापान में उपभोग कर (कंजम्प्शन टैक्स) घटाने का विरोध किया, यह कहते हुए कि इससे भविष्य का बजट प्रभावित हो सकता है। टेक फोकस: प्रत्याशियों की औसत उम्र 40 साल जनता से संवाद का तरीका: मिराई पार्टी ‘ब्रॉड लिसनिंग’ मॉडल अपनाती है। इडोबेटा, टॉकिंग मैनिफेस्टो जैसे टूल्स से एआई इंटरव्यू प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों की राय लेकर उसका विश्लेषण किया जाता है। डिजिटल लोकतंत्र है पार्टी का एजेंडा। उम्मीदवारों की औसत उम्र: 40 साल रखने पर जोर (जापान के बाकी सांसदों की औसत उम्र 55 साल है)। राजनीतिक विचारधारा: न दक्षिणपंथी और न वामपंथी, सिर्फ फैक्ट्स और तकनीक पर है पार्टी का फोकस।

Thousands of teachers take to the streets in Spain demanding a pay raise, disrupting the education of 500,000 students.

Thousands of teachers take to the streets in Spain demanding a pay raise, disrupting the education of 500,000 students.

Hindi News International Thousands Of Teachers Take To The Streets In Spain Demanding A Pay Raise, Disrupting The Education Of 500,000 Students. मैड्रिड7 मिनट पहले कॉपी लिंक यह हड़ताल शिक्षा विभाग के उस प्रस्ताव के बाद शुरू हुई है, जिसमें उन्होंने 2029 तक हर महीने केवल 75 यूरो (करीब 7 हजार भारतीय रुपए) वेतन बढ़ाने की बात कही थी। स्पेन के वेलेंसिया प्रांत में स्कूली शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से ठप पड़ गई है। यहां एक हफ्ते से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर शिक्षक सड़कों पर उतर आए हैं और सरकार के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रमुख शिक्षक संगठनों के आह्वान पर चल रही इस हड़ताल में पूरे राज्य के 78 हजार शिक्षक शामिल हुए हैं। इसका असर प्री-स्कूल, प्राइमरी, सेकेंडरी और वोकेशनल ट्रेनिंग संस्थानों पर पड़ा है। राज्य भर में 5 लाख से अधिक छात्रों की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो गई है। यह हड़ताल शिक्षा विभाग के उस प्रस्ताव के बाद शुरू हुई है, जिसमें उन्होंने 2029 तक हर महीने केवल 75 यूरो (करीब 7 हजार भारतीय रुपए) वेतन बढ़ाने की बात कही थी। यूनियनों ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया और इसके खिलाफ सड़कों पर उतर आए। शिक्षकों की मांग है कि वेतन में इस प्रस्ताव से कहीं अधिक की वृद्धि की जाए, अच्छी शिक्षा के लिए कक्षाओं में छात्रों का अनुपात कम किया जाए, शिक्षकों पर से कागजी और अनावश्यक बोझ घटाया जाए, स्टाफ कटौती का फैसला तुरंत वापस लिया जाए और सभी स्कूलों में एयर कंडीशनर (एसी) की व्यवस्था की जाए। फिलहाल सरकार और यूनियनों के बीच कोई सहमति नहीं बन पाई है, जिससे यह अभूतपूर्व शैक्षिक संकट और गहराता जा रहा है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

40% More Devotees Than Capacity in Kedarnath, Struggle 12,000 feet above

40% More Devotees Than Capacity in Kedarnath, Struggle 12,000 feet above

Hindi News National 40% More Devotees Than Capacity In Kedarnath, Struggle 12,000 Feet Above मनमीत. गौरीकुंड12 मिनट पहले कॉपी लिंक प्रशासन ने इस बार यात्री क्षमता बढ़ाकर 22 से 24 हजार की है, लेकिन यात्रा के पहले दिन से ही इससे ज्यादा श्रद्धालु आ रहे हैं। इस साल उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम में आ रही बेहिसाब भीड़ और इन्हें संभालने के लिए की गई व्यवस्थाएं चिंता बढ़ा रही हैं। हालात ये हैं कि समुद्र तल से 12 हजार फीट ऊपर हजारों श्रद्धालु रोज दर्शन के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं, क्योंकि हर दिन औसतन 25 हजार श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं। प्रशासन का दावा है कि इस बार यात्री क्षमता बढ़ाकर 22 से 24 हजार की है, लेकिन यात्रा के पहले दिन से ही इससे ज्यादा श्रद्धालु आ रहे हैं। इसलिए घोड़ा पड़ाव से मंदिर तक मौजूद सभी दुकानें, टेंट, गेस्ट हाउस, छोटे लॉज सब हाउसफुल हैं और इमरजेंसी में रुकना पड़े तो एक कमरे का रात का किराया 5 से 10 हजार रुपए तक जा रहा है। 5 बाय तीन के टेंट भी बमुश्किल 2 से 6 हजार रुपए में मिल पा रहे हैं। वहीं, 21 किमी नीचे गौरीकुंड और सोनप्रयाग में भी ऐसे ही हालात हैं। रुकने के लिए बजट वाली जगह मिलने में मुश्किल आ रही है। यूं कहें कि केदारनाथ धाम इस समय चारधाम यात्रा के इतिहास के सबसे अधिक श्रद्धालुओं का गवाह बन रहा है। बीते 25 दिन में रिकॉर्ड 5.50 लाख से ज्यादा श्रद्धालु आ चुके हैं। दर्शन के लिए आधी रात से लाइन लगनी शुरू होती है, जो दिनभर में भी 1 से 2 किमी लंबी बनी रहती है। यदि सुबह 4 बजे लाइन में लगे तो 8 से 10 घंटे बाद ही मंदिर तक पहुंच पाते हैं। 21 किमी चढ़ाई के बाद डेढ़ किमी लंबी लाइन। बीकानेर से 12 सदस्यीय परिवार के साथ आए सुरेश पारिख ने बताया कि ऊपर एक कमरे का 20 हजार रु. मांग रहे थे, मोलभाव के बाद 12 हजार में बात बनी। सारा कैश कमरा और भोजन में खत्म हो गया। सुबह चार बजे दर्शन के लिए लाइन में लगे तो दोपहर एक बजे मंदिर पहुंच पाए। दर्शन भी बाहर से हुए। रुकना चाहते थे, लेकिन बजट नहीं था तो लौटना पड़ा। दरअसल, शिवलिंग को स्पर्श करने का समय सुबह 4 से दोपहर 12 बजे तक तय किया गया है। इसके बाद भोजन, हवन, शृंगार के लिए मंदिर के कपाट बंद कर देते हैं। इसलिए हर श्रद्धालु इससे पहले ही दर्शन के लिए जद्दोजहद कर रहा है। पिछले साल केदारनाथ धाम की कैरिंग कैपेसिटी यानी वहन क्षमता मात्र 13 हजार थी, जो इस बार बढ़ाई गई है। सिर्फ 12 नई जगह ज्यादा संख्या में टेंट लगवाए गए हैं। कुछ नई इमारतें भी बनी हैं, जिनमें ऑन स्पॉट जगह होने पर ही रुकने की सुविधा मिल पाती है। ऊपर से एक किमी क्षेत्र में करीब 500 छोटी-छोटी दुकानें हैं, जिनमें दो से तीन लोग खुद रुकते हैं। इस तरह घोड़ा पड़ाव से मंदिर तक हरेक जगह हाउसफुल बनी हुई है। लंबी लाइनों में थकान और झुंझलाहट के कारण यात्रियों के बीच विवाद आम हो गए हैं। मई के अंत से स्कूलों की छुट्टियां पड़ने पर धाम में भीड़ और अधिक बढ़ने का अनुमान है। भीड़ ने यात्रा का स्वरूप बिगाड़ा केदारसभा- केदारसभा मंदिर समिति के अध्यक्ष राजकुमार तिवारी ने बताया कि इस बार भीड़ यात्रा का स्वरूप बिगाड़ रही है। धाम की मर्यादा, यात्रियों व व्यापारियों की सुविधाओं पर प्रभाव पड़ रहा है। वहीं, उखीमठ के उपजिलाधिकारी अनिल राणा ने बताया कि दर्शन के समय को लेकर हो रही परेशानी दूर करने के लिए नई व्यवस्था बना रहे हैं। समस्या क्यों – 12 घंटे की चढ़ाई के बाद 8-10 घंटे दर्शन में लग रहे, तुरंत लौटना मुश्किल, इसलिए रात ऊपर ही बिताने की मजबूरी, अगले दिन फिर नई भीड़। 2500 रुपए में वीआईपी दर्शन, इससे आम लोगों का इंतजार बढ़ रहा – दर्शन का इंतजार वीआईपी व्यवस्था के कारण भी बिगड़ा है। हेलीकॉप्टर से आने वाले श्रद्धालु मं​दिर समिति को 2500 रु. शुल्क देते हैं, इसलिए उन्हें गर्भगृह में पहले जाने दे रहे। इस कारण बाहर लाइन में लगे श्रद्धालुओं के दर्शन का इंतजार बढ़ जाता है। – केदार धाम में इतनी भीड़ के लिए शौचालय की संख्या बहुत कम पड़ रही है। सुलभ इंटरनेशनल के प्रभारी धनंजय पाठक के मुताबिक 239 शौचालय ही हैं। अब 60 नए बना रहे हैं। 412 सफाईकर्मी हैं, जो कई बार 20-20 घंटे ड्यूटी कर रहे हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

पाकिस्तान के लाहौर में 9 जगहों के नाम बदले गए:लाहौर का इस्लामपुरा अब कृष्णनगर, बाबरी चौक फिर से जैन मंदिर चौक

पाकिस्तान के लाहौर में 9 जगहों के नाम बदले गए:लाहौर का इस्लामपुरा अब कृष्णनगर, बाबरी चौक फिर से जैन मंदिर चौक

पाकिस्तान के पंजाब सूबे में कहावत है ‘जिन्ने लाहौर नहीं वेख्या, ओ जमिया ही नहीं’ (जिसने लाहौर नहीं देखा, उसका जन्म ही नहीं हुआ)। अमृतसर से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित लाहौर दशकों तक इस्लामीकरण के शिकंजे में रहने के बाद जड़ों की ओर लौट रहा है। दो महीने के भीतर लाहौर में 9 जगहों के इस्लामी नाम फिर से मूल हिंदू या ब्रिटिश विरासत पर रखे गए हैं। इनमें इस्लामपुरा अब अपने पुराने नाम कृष्णनगर और बाबरी मस्जिद चौक अब पुराने जैन मंदिर चौक के नाम से आधिकारिक रूप से जाना जाएगा। इनके बोर्ड भी लगा दिए गए हैं। खास बात यह भी है कि इस बदलाव के खिलाफ वहां कोई कट्‌टरपंथी मोर्चा भी नहीं खोल पाया। पंजाब सूबे की सीएम मरियम नवाज के अनुसार परकोटा शहर लाहौर के आठों दरवाजे जिनमें दिल्ली गेट भी शामिल है, उसका भी जीर्णोद्धार किया जाएगा। सूत्रों के अनुसार नाम प​रिवर्तन के दूसरे चरण में पाकिस्तान के सिंध और खैबर पख्तूनख्वाह प्रांतों में भी मूल नामों का ऐलान किया जा सकता है। इनके मूल नाम फिर बहाल – इस्लामपुरा फिर से कृष्णनगर – सुन्नतनगर फिर से संतनगर – मौलाना जफर चौक फिर से लक्ष्मी चौक – बाबरी मस्जिद चौक फिर से जैन मंदिर चौक – मुस्तफाबाद फिर से धर्मपुरा – सर आगा खान चौक फिर से डेविस रोड – अल्लामा इकबाल रोड फिर से जेल रोड – फातिमा जिन्ना रोड फिर से क्वींस रोड – बाग-ए-जिन्ना फिर से लॉरेंस रोड – मुस्तफाबाद को भी फिर से मिला पुराना नाम धर्मपुरा लक्ष्मी चौक… हमारी विरासत का हिस्सा लाहौर की बीकनहाउस यूनिवर्सिटी के लेक्चरर साद मलिक कहते हैं- यह वाकई सुखद बदलाव है। मैं इसे हमेशा लक्ष्मी चौक ही कहता रहा, क्योंकि मेरे पिता इसे इसी नाम से बुलाते थे। साद कहते हैं म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने अपने कागजों में भले ही इसका नाम मौलाना जफर अली चौक कर दिया हो, लेकिन मेरे और मेरे जैसे कई लोगों के लिए लक्ष्मी चौक उस विरासत का हिस्सा है, जिसे जफर अली खान के नाम से कोई लेना-देना नहीं है। लक्ष्मी चौक पीढ़ियों से जुड़ा हुआ नाम है। जैन मंदिर… नाम से ईमान पर आंच नहीं जैन मंदिर के पास के अनारकली इलाके के मौलाना वाजिद कादरी का मानना है कि इस्लाम को किसी मंदिर या गुरुद्वारे से समस्या नहीं है। 1990 के दशक में जैन मंदिर चौक का नाम बदलकर बाबरी मस्जिद चौक कर दिया गया। ये सियासी फैसला था। हमने कभी इसे बाबरी मस्जिद चौक नहीं बोला। हमें यह समझना होगा कि जिन पूर्वजों ने ये हिंदू नाम रखे थे, वे भी मुसलमान ही थे, और इससे उनके ईमान पर आंच नहीं आई थी। वो सबकुछ जो आपके लिए जानना जरूरी है नवाज के दौर में बदले थे कई नाम…बेटी अब दुरुस्त कर रही; इमरान खान को नाम बदली से परहेज था नाम बदलने का दौर कब शुरू हुआ? पाक के पूर्व पीएम नवाज शरीफ और पंजाब की सीएम मरियम नवाज ने 19 मार्च को एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई। इसमें लाहौर हेरिटेज एरिया रिवाइवल (एलएचएआर) प्रोजेक्ट पर चर्चा हुई। लाहौर के नए नामों को फिर से पुराने हिंदू या ब्रिटिश विरासत के दौर के नाम पर रखने का फैसला लिया गया था। नवाज और मरियम का क्या कहना था? नवाज शरीफ का कहना था कि हमें यूरोप से सीख लेनी चाहिए। वे ऐतिहासिक नामों से छेड़छाड़ नहीं करते हैं। लाहौर के पुराने नाम हमारा इतिहास हैं, इसे हमें सहेजना है, बदलना नहीं है। मरियम का कहना था कि लाहौर का इतिहास ही इसकी पहचान है। पुराने नाम और इमारतें इसका सबूत हैं। कट्‌टरपंथियों का क्या रवैया रहा? कट्‌टरपंथ के नाम पर सड़कों पर उत्पात मचाने के लिए कुख्यात तहरीक-लब्बैक-पाकिस्तान (टीएलपी) को मरियम सरकार ने बैन कर रखा है। इसलिए कोई विरोध नहीं हुआ। लश्कर-ए-तैयबा ने भी मूल नाम रखने का कोई विरोध नहीं किया है। नाम बदली किसके दौर में हुई? लाहौर में नाम बदलने की कवायद 1990 के दशक में बाबरी मस्जिद के ढांचे को गिराने के बाद हुई। उस दौर में केंद्र में नवाज शरीफ, फिर बेनजीर और परवेज मुशर्रफ की सरकारें रहीं। 2018 से 2022 तक पीएम रहे इमरान खान के समय में नाम बदलने का दौर नहीं चला।

Big revelation in NEET paper leak case

Big revelation in NEET paper leak case

जयपुर21 मिनट पहलेलेखक: अवधेश आकोदिया कॉपी लिंक पुणे से केमेस्ट्री प्रोफेसर पीवी कुलकर्णी की गिरफ्तारी हो चुकी है। CBI कुलकर्णी को ही लीक मामले का मास्टरमाइंड बता रही है। NEET पेपर लीक मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। सीबीआई की जांच में सामने आया है कि नीट-26 के लिए फाइनल हुए पेपर के दोनों सेट प्रिंट होने से पहले ही नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) से लीक हो गए थे। एजेंसी के एक अधिकारी ने बताया कि जो पेपर 3 मई को परीक्षा में आया और जो रिजर्व में रखा गया था, दोनों के बायोलॉजी और केमिस्ट्री के सभी सवाल हूबहू क्वेश्चन बैंक (गेस पेपर) में थे। फिजिक्स के भी कुछ सवाल लीक होने के सबूत मिले असिस्टेंट प्रोफेसर पीवी कुलकर्णी ने केमिस्ट्री और सीनियर टीचर मनीषा गुरुनाथ मांधरे ने बायोलॉजी के सवाल एनटीए से चोरी किए। दोनों पेपर बनाने वाली एक्सपर्ट टीम का हिस्सा थे। सीबीआई को इसी पैटर्न पर फिजिक्स के भी कुछ सवाल लीक होने के सबूत मिले हैं और एजेंसी ने संदिग्ध की पहचान कर ली है। हर साल नीट के पेपर के दो सेट प्रिंट होते हैं हर साल नीट के पेपर के दो सेट प्रिंट होते हैं। इनमें से कौन सा सेट परीक्षा में आएगा, यह आमतौर पर एनटीए के डीजी तय करते हैं। उनके अलावा किसी और को इसकी जानकारी नहीं होती। दूसरे पेपर को रिजर्व में रखा जाता है ताकि ऐन वक्त पर कोई गड़बड़ी होने की स्थिति में इसका इस्तेमाल किया जा सके। सीबीआई की जांच में खुलासा सीबीआई की जांच में यह भी सामने आया है कि जिस क्वेश्चन बैंक की कई राज्यों में खरीद-फरोख्त हुई, उसे पीवी कुलकर्णी और मनीषा गुरुनाथ मांधरे ने मिलकर तैयार किया था। इसमें बायोलॉजी के 180 और केमिस्ट्री के 90 सवाल एनटीए की ओर से प्रिंट करवाए गए पेपर के दोनों सेट से लिए गए थे। चूंकि इनमें से एक पेपर परीक्षा में आया, इसलिए बायोलॉजी के 90 और केमिस्ट्री के 45 सवाल हूबहू क्वेश्चन बैंक से मैच कर गए। नीट पेपर पांच चरणों में फाइनल होता है पीवी कुलकर्णी और मनीषा मांधरे एनटीए की ‘पेपर वेटिंग टीम’ में थे। इस टीम का काम सवालों की गहनता से जांच करना होता है। इसी वजह से कुलकर्णी के पास केमिस्ट्री और मनीषा के पास बायोलॉजी के सवालों का एक्सेस था। नीट पेपर पांच चरणों में फाइनल होता है। पहले चरण में अलग-अलग विषयों के एक्सपर्ट इतने प्रश्न बनाते हैं कि पेपर के 5 सेट बन जाएं। दूसरा चरण मॉडरेशन का होता है। इसमें 5 सेट में से छांटकर 2 सेट बनाए जाते हैं। इसके लिए अलग एक्सपर्ट आते हैं। तीसरा चरण वेटिंग का होता है, जिसमें तीनों विषय के नए एक्सपर्ट प्रश्नों की गलतियां और अशुद्धियां ठीक करते हैं। चौथे चरण में तीनों विषयों के प्रश्नों को एक जगह कंपाइल किया जाता है और पांचवें चरण में पेपर की प्रिंटिंग होती है। सवाल- बिना अंदरूनी मिलीभगत लीक असंभव है, असली मास्टरमाइंड कौन? बायोलॉजी व केमिस्ट्री के सवाल लीक करने वाले एक्सपट्‌र्स तो पकड़ में हैं, पर असली मास्टरमाइंड फरार है। एनटीए दफ्तर में एक्सपर्ट पेपर बनाते हैं, उसकी सुरक्षा इतनी सख्त होती है कि बिना किसी अंदरूनी मिलीभगत के प्रश्न बाहर आना असंभव है। सीसीटीवी के अलावा 10-12 अधिकारी हर एक्सपर्ट पर निगाह रखते हैं। कोई एक्सपर्ट लाइब्रेरी भी जाता है, तो एनटीए के अधिकारी उसके साथ होते हैं। एक्सपट्‌र्स में एनटीए की साख खराब, सीनियर पेपर ही नहीं बनाना चाहते जांच में आया कि पीवी कुलकर्णी और मनीषा मांधरे कई साल से पेपर सेटर टीम में थे। कुलकर्णी असिस्टेंट प्रोफेसर था, जबकि मंधारे सीनियर टीचर। ज्यादातर एक्सपट्‌र्स की प्रोफाइल ऐसी ही है, क्योंकि सीनियर प्रोफेसर एनटीए के साथ काम करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। भास्कर को कुछ एक्सपट्‌र्स ने बताया कि कई साल से नीट किसी न किसी विवाद में है। पता नहीं कब, बिना किसी गड़बड़ी में लिप्त हुए भी गाज गिर जाए। —– ये खबरें भी पढ़िए… 1- NEET पेपरलीक के मास्टरमाइंड लग्जरी लाइफ के शौकीन, परिवार बोला-वे प्रॉपर्टी खरीदते हैं, पेपर नहीं NEET-2026 का लीक पेपर राजस्थान में मास्टरमाइंड भाइयों मांगीलाल और दिनेश ने ही बांटा था। आरोपियों ने एग्जाम से 7 दिन पहले 26 अप्रैल को गुरुग्राम से 30 लाख रुपए एडवांस देकर पेपर खरीदा था। पूरी खबर पढ़िए… 2- NEET पेपर लीक- ‘गेस पेपर’ बनाकर 10 राज्यों में बेचा, 120+ सवाल हूबहू मिले देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET-2026) के रद्द होने के पीछे की असली कहानी सामने आ गई है। भास्कर को सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड नासिक की प्रिंटिंग प्रेस से जुड़ा है। पूरी खबर पढ़िए… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

विदेश में पढ़ाई का अब नया फॉर्मूला:छात्र अब संस्थानों से पूछ रहे- ‘क्या इस महंगी डिग्री से नौकरी मिलेगी?’

विदेश में पढ़ाई का अब नया फॉर्मूला:छात्र अब संस्थानों से पूछ रहे- ‘क्या इस महंगी डिग्री से नौकरी मिलेगी?’

भारतीय छात्रों की पसंद के मामले में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की चमक अब फीकी पड़ती जा रही है। लीप ग्लोबल एजुकेशन की एक रिपोर्ट कहती है कि भारतीय छात्र अब इटली, फ्रांस और न्यूजीलैंड जैसे देशों में नर्सिंग, एआई और फाइनेंस जैसे कोर्स चुन रहे हैं। इन देशों में नौकरी का रास्ता सीधा और पढ़ाई का खर्च कम है। अब इनका नया मंत्र है- डिग्री नहीं, जॉब। यूरोप भारतीय छात्रों के नए पसंदीदा ठिकाने के रूप में उभर रहा है। 30 लाख छात्रों के सर्वे पर आधारित रिपोर्ट यूरोप, न्यूजीलैंड जैसे देशों में ब्रिटेन, यूएस सरीखे एजुकेशन हब से किफायती पढ़ाई करीब 30 लाख छात्रों के विश्लेषण पर आधारित लीप ग्लोबल एजुकेशन की रिपोर्ट के मुताबिक यूरोप के देशों में हेल्थकेयर, मास्टर ऑफ नर्सिंग साइंस, फिजियोथेरेपी, मास्टर ऑफ एआई प्रोग्राम जैसे कोर्सेज लिए आवेदन 37.6% से लेकर 33,800% तक बढ़े हैं। एआई कोर्सेज के मामले में भारतीय छात्र न्यूजीलैंड को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोप और न्यूजीलैंड जैसे देशों में पढ़ाई का खर्च अमेरिका और ब्रि​टेन जैसे पारंपरिक एजुकेशन हब से कम है।