Now the Trump family will bet on betting, Donald Trump, Taj Mahal casino, Truth Predict, Trump Media Group’s New Platform

Hindi News International Now The Trump Family Will Bet On Betting, Donald Trump, Taj Mahal Casino, Truth Predict, Trump Media Group’s New Platform वॉशिंगटन30 मिनट पहले कॉपी लिंक अप्रैल 1990 में डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘ताजमहल’ कैसिनो खोला था। हालांकि अब ट्रम्प परिवार सट्टे से कमाई का नया रास्ता प्रेडिक्शन मार्केट में देख रहा है। वॉशिंगटन में इन दिनों ‘प्रेडिक्शन मार्केट’ (भविष्यवाणी बाजार) को लेकर सियासी और कानूनी पारा चढ़ा हुआ है। विवाद की जड़ में है ट्रम्प मीडिया ग्रुप का नया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ प्रेडिक्ट’ और डोनाल्ड ट्रम्प जूनियर का ‘काल्शी’ व ‘पॉलीमार्केट’ जैसी दिग्गज कंपनियों से जुड़ना। इन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लोग चुनाव से लेकर खेल तक, भविष्य की घटनाओं पर पैसा लगाते हैं। आलोचकों का मानना है कि सरकारी रेगुलेशन वाले इस सेक्टर में राजनीतिक परिवार की मौजूदगी पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े करती है। पारंपरिक कैसिनो बनाम डिजिटल मार्केट के इस बढ़ते बाजार ने पुराने खिलाड़ियों की नींद उड़ा दी है। दिलचस्प बात यह है कि अप्रैल 1990 में डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘ताजमहल’ कैसिनो खोला था, जिसे उन्होंने ‘दुनिया का आठवां अजूबा’ करार दिया था। तीन दशक बाद ट्रम्प परिवार कैसिनो कारोबार से बाहर है और अब खेल सट्टे से कमाई का नया रास्ता प्रेडिक्शन मार्केट में देख रहा है। कैसिनो और स्पोर्ट्सबुक ऑपरेटरों का आरोप है कि ये प्रेडिक्शन कंपनियां बिना लाइसेंस के ‘ऑनलाइन सट्टेबाजी’ चला रही हैं। विवाद तब और गहरा गया जब कमोडिटी फ्यूचर ट्रेडिंग कमीशन (सीएफटीसी) ने इन प्लेटफॉर्म्स को राज्यों के कड़े जुआ कानूनों से छूट देने की दिशा में कदम बढ़ाए। इससे नेवादा और न्यूजर्सी जैसे राज्यों में कानूनी जंग छिड़ गई है, जहां स्पोर्ट्स बेटिंग पर सख्त पाबंदियां हैं। ‘आर्टेमिस एनालिटिक्स’ के मुताबिक, दुनियाभर में इन प्लेटफॉर्म्स पर हर हफ्ते लगभग 41,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का दांव लग रहा है। इस साल फरवरी में ‘सुपर बाउल’ के दिन जहां ‘काल्शी’ ने 1 अरब डॉलर की ट्रेडिंग का दावा किया, वहीं नेवादा के पारंपरिक कैसिनो में सट्टेबाजी 10 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई। साफ है कि डिजिटल बाजार अब पारंपरिक गेमिंग उद्योग को निगल रहा है। विवादों के बीच ट्रम्प जूनियर के प्रवक्ता ने सफाई दी है कि वे न तो खुद ट्रेडिंग करते हैं और न ही सरकार में किसी कंपनी की पैरवी। वहीं, व्हाइट हाउस ने भी स्पष्ट किया है कि प्रशासन के सभी फैसले केवल जनहित को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं। फिलहाल, यह मामला अदालतों और रेगुलेटरी फाइलों के बीच उलझा हुआ है। इनसाइडर ट्रेडिंग पर लगेगी लगाम, इस साल 6 बिल पेश हुए इस बीच अमेरिकी कांग्रेस में सख्ती के संकेत हैं। इस साल कम से कम छह बिल पेश हुए हैं, जिनमें इनसाइडर ट्रेडिंग पर रोक, चुनावी बाजारों पर नियंत्रण और सीएफटीसी की शक्तियां बढ़ाने जैसे प्रावधान शामिल हैं। एक द्विदलीय प्रस्ताव में स्पोर्ट्स, युद्ध, आतंकवाद और हत्या से जुड़े दांव पर प्रतिबंध की मांग की गई है। कुल मिलाकर, प्रेडिक्शन मार्केट का तेजी से बढ़ता दायरा अब नियमन, पारदर्शिता और राजनीतिक हितों के टकराव के बड़े सवाल खड़े कर रहा है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Jordan Anthony, The new sensation of track and field, Jordan Anthony of the United States

Hindi News Sports Jordan Anthony, The New Sensation Of Track And Field, Jordan Anthony Of The United States तोरुन (पोलैंड)56 मिनट पहले कॉपी लिंक जॉर्डन एंथनी ने 6.41 सेकेंड का समय निकाला, जो इतिहास का चौथा सबसे तेज समय है। ट्रैक एंड फील्ड की दुनिया में एक नई स्प्रिंट सनसनी उभरकर सामने आई है। अमेरिका के 21 वर्षीय जॉर्डन एंथनी ने वर्ल्ड इंडोर चैम्पियनशिप की 60 मीटर दौड़ में गोल्ड जीतकर न सिर्फ इतिहास रचा, बल्कि अपनी संघर्ष भरी कहानी से सभी को प्रेरित भी किया। एंथनी ने 6.41 सेकेंड का समय निकाला, जो इतिहास का चौथा सबसे तेज समय है। रेस से सिर्फ 36 घंटे पहले एंथनी को गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा था। पोलैंड पहुंचने के बाद डोप टेस्ट के दौरान एक अधिकारी ने जब खून लिया तो सुई नस में नहीं लगी, बल्कि बाहर लग गई, जिससे उनके हाथ में ब्लड क्लॉट हो गया। वे अपना हाथ ठीक से हिला भी नहीं पा रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और दर्द के साथ ही मैदान में उतरने का फैसला किया। नौ महीने पहले फुटबॉल छोड़कर चुना एथलेटिक्स जॉर्डन एंथनी की कहानी और भी खास इसलिए है क्योंकि उन्होंने महज नौ महीने पहले ही पेशेवर एथलेटिक्स में कदम रखा है। इससे पहले वे कॉलेज फुटबॉल में अर्कांसस रेजरबैक्स टीम से खेलते थे। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने एनएफएल का सपना क्यों छोड़ा, तो उन्होंने साफ कहा, ‘क्योंकि यहां कोई मुझे टक्कर मारने के लिए मेरी तरफ नहीं दौड़ रहा है।’ ओलिंपिक चैम्पियन लायल्स के साथ ट्रेनिंग एंथनी 100 मीटर के ओलिंपिक चैम्पियन नोआ लायल्स के ट्रेनिंग ग्रुप का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं दूसरों की रेस देखता हूं। यह ठीक वैसा ही है जैसे फुटबॉल में हम दूसरी टीम का विश्लेषण करते हैं। ट्रैक एंड फील्ड में कई लोग ऐसा नहीं करते, लेकिन मैं माइंड गेम पर ध्यान देता हूं। मुझे पता होता है कि सामने वाला क्या अच्छा करता है और क्या नहीं।’ डेब्यू में जीता गोल्ड, अब घरेलू ओलिंपिक पर नजर इस जीत से एंथनी का आत्मविश्वास बढ़ गया है। उन्होंने कहा, ‘सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैंने डेब्यू में गोल्ड जीता और इसे अमेरिका लेकर जा रहा हूं। मैंने कॉलेज फुटबॉल में ज्यादा दर्शकों के सामने खेला है, लेकिन यहां आकर मैं ज्यादा उत्साहित था। यह मेरे लिए आसान लगा।’ अब उनका अगला लक्ष्य लॉस एंजिलिस ओलिंपिक 2028 में गोल्ड जीतना है। रोमांचक रहा फाइनल, 0.01 सेकेंड से चूके अजू रोमांचक फाइनल में कांटे की टक्कर दिखी। जमैका के किशाने थॉम्पसन ने 6.45 सेकंड के साथ सिल्वर मेडल जीता, जबकि अमेरिका के ट्रेवॉन ब्रोमेल ने भी 6.45 सेकंड के साथ ब्रॉन्ज हासिल किया। इसका फैसला फोटो फिनिश से हुआ। ब्रिटेन के जेरमायाह अजू महज 0.01 सेकेंड से मेडल से चूक गए। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
फुटबॉल क्लब चेल्सी ने शुरू की ‘बॉल-हडल’ की नई परंपरा:खिलाड़ियों को डांस करने, घास पर चलने जैसी प्री-मैच रस्मों से मिलती है ऊर्जा; इन्हें साथ करें तो पूरी टीम में आती है एकाग्रता

फुटबॉल मैदान पर इन दिनों इंग्लिश क्लब चेल्सी का एक नया तरीका सुर्खियों में है। मैच शुरू होने से ठीक पहले खिलाड़ी मैदान के बीचों-बीच रखी गेंद के चारों ओर एक गोल घेरा (हडल) बनाते हैं। मैनचेस्टर यूनाइटेड के पूर्व दिग्गज गैरी नेविले को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया। उनका मानना है कि फैंस इन हरकतों से बेवकूफ नहीं बनेंगे, वे केवल खेल देखते हैं। हालांकि चेल्सी के कोच लियाम रोसेनियोर का नजरिया अलग है। उनका कहना है कि यह घेरा बनाने का फैसला उनका नहीं, बल्कि खिलाड़ियों के लीडरशिप ग्रुप का था। टीम इसके जरिए अपनी एकजुटता दिखाना चाहती है और ‘गेंद का सम्मान’ करना चाहती है। प्री-मैच रस्में नई बात नहीं खेल जगत में प्री-मैच रस्में (मैच से पहले की आदतें) नई बात नहीं हैं। जीत और हार के बीच के फासले को कम करने के लिए टीमें ऐसे तरीके अपनाती हैं। 2019 वनडे वर्ल्ड कप सेमीफाइनल से पहले ऑस्ट्रेलिया के कोच जस्टिन लैंगर ने अपनी टीम को एजबेस्टन के मैदान पर नंगे पैर घास पर चलने को कहा था। उनका मानना था कि इससे खिलाड़ियों को धरती से ‘सकारात्मक ऊर्जा’ मिलती है। वहीं, लिवरपूल के पूर्व मैनेजर जुर्गन क्लॉप मैच से पहले वॉर्म-अप के दौरान मैदान के बीच खड़े होकर विपक्षी टीम को घूरते थे, ताकि विरोधी खिलाड़ियों की शारीरिक भाषा और कमियों को समझ सकें। रग्बी में भी इसके उदाहरण रग्बी में भी इसके दिलचस्प उदाहरण हैं। 2003 में इंग्लैंड के कप्तान मार्टिन जॉनसन अपनी टीम को लेकर विपक्षी टीम आयरलैंड के ‘रेड कार्पेट’ वाले हिस्से पर खड़े हो गए और हटने से साफ इनकार कर दिया। इस जिद ने इंग्लैंड की टीम में जबरदस्त जोश भर दिया। इसका असर मैच के दौरान खिलाड़ियों की बॉडी लैंग्वेज में साफ दिखा और उन्होंने मैच एकतरफा अंदाज में जीत लिया। ‘हाका’ डांस पूरी दुनिया में मशहूर दूसरी ओर, न्यूजीलैंड की रग्बी टीम का पारंपरिक ‘हाका’ डांस पूरी दुनिया में मशहूर है, जो विरोधी टीम को खुली चुनौती देता है। खेल मनोवैज्ञानिक जमील कुरैशी मानते हैं कि इन रस्मों का खिलाड़ियों पर गहरा असर होता है। चेल्सी का ‘गेंद के प्रति सम्मान’ इस बात का प्रतीक है कि खिलाड़ी उन चीजों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जो उनके नियंत्रण में हैं। जीत की नींव रखने वाला मनोवैज्ञानिक हथियार मैच से पहले एक जैसी रूटीन अपनाने से दिमाग एकाग्र होता है। पूर्व रग्बी खिलाड़ी विल ग्रीनवुड का भी मानना है कि जब पूरी टीम मिलकर ऐसा करती है, तो यह सामूहिक ताकत बन जाती है। जाहिर है, सिर्फ गेंद के चारों ओर खड़े होने या नंगे पैर घास पर चलने से कोई टीम मैच नहीं जीत सकती, लेकिन अगर खिलाड़ी इन रस्मों पर पूरी तरह विश्वास करते हैं, तो यह कोई दिखावा नहीं, बल्कि जीत की नींव रखने वाला एक मजबूत मनोवैज्ञानिक हथियार बन सकता है।
ओलावृष्टि-बारिश से रबी फसलें गिरीं, कांग्रेस ने मांगा मुआवजा

चानक हुई ओलावृष्टि और तेज बारिश से किसानों की तैयार रबी फसलें बर्बाद हो गईं। गेहूं, चना, सरसों की फसलें खेतों में गिर गईं। कई जगह बालियां टूट गईं। उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका है। जिला कांग्रेस अध्यक्ष मोहित रघुवंशी ने शमशाबाद विधानसभा क्षेत्र के ग्राम ऑडिया, मुड़रा, परसोरा, हिनोतिया, सांगूल, ढांडोन पिपारिया में ओलावृष्टि प्रभावित इलाकों का दौरा किया। किसानों से मुलाकात की। नुकसान देखा। रघुवंशी ने कहा कि कटाई के समय आई आपदा से किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ है। खेतों में खड़ी फसलें जमीन पर गिर गईं। पानी और ओलों से दाने खराब होने का खतरा बढ़ा है। फसल सड़ने की आशंका है। रघुवंशी ने प्रशासन से कहा कि फसल नुकसान का सर्वे पारदर्शी तरीके से कराया जाए। मुआवजे की राशि जल्द किसानों के खातों में पहुंचे। किसान अगली फसल की तैयारी कर सकें। मुख्यमंत्री से अपील की गई कि प्रभावित किसानों के कृषि ऋण माफ किए जाएं। केसीसी जमा करने में छूट दी जाए। फसल बीमा का लाभ शीघ्र दिया जाए। जिला कांग्रेस मीडिया प्रभारी सुशील शर्मा ने बताया कि 23 मार्च को कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा जाएगा। किसानों को जल्द राहत देने की मांग की जाएगी। इस दौरान कांग्रेस कार्यकर्ता और ग्रामीणजन मौजूद रहे।
लग्जरी प्रॉपर्टी वाले निवेशकों का पैसा फंसा:अमेरिका-ईरान युद्ध में झुलस रहे दुबई में विला-अपार्टमेंट की मांग घटी; 2-4 करोड़ की छूट, फिर भी नहीं मिल रहे खरीदार

ब्रिटेन के रियलिटी शो स्टार सैम गॉलेंड ने कुछ महीनों पहले दुबई में एक लग्जरी विला खरीदा। विला की कीमत करीब 19 करोड़ रुपए थी, जो रेनोवेशन के बाद और बढ़ गई। सैम ने प्रॉपर्टी बेचने के लिए हाल में इसे बाजार में उतारा, लेकिन इसी दौरान अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू हो गया। मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से हालत यह है कि अब विला के लिए कोई खरीदार नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कम दाम पर भी घर बेचने की कोशिशें की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इस तरह की मुश्किलें सिर्फ सैम तक सीमित नहीं है। युद्ध के बाद से दुबई में लग्जरी प्रॉपर्टी के दाम औसतन 25% तक गिर चुके हैं और प्रॉपर्टी डील्स की संख्या भी पहले के मुकाबले आधी रह गई है। मार्च की शुरुआत में पिछले साल के मुकाबले 31% कम प्रॉपर्टी के सौदे हुए हैं, जबकि फरवरी की तुलना में ये गिरावट 51% की है। मसलन खरीदार कीमतें गिरने से पहले ही बाजार से बाहर हो गए थे। दुबई को अब तक एक टैक्स-फ्री और राजनीतिक रूप से स्थिर इकोनॉमी माना जाता था। लेकिन ईरानी हमलों के चलते उसके यह छवि दरकती दिख रही है। गोल्डमैन सैक्स के एक्सपर्ट्स का मानना है कि शहर का रियल एस्टेट मार्केट काफी हद तक ‘सेंटीमेंट-ड्रिवन’ रहा है। जैसे ही मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें आईं, लोगों में डर बैठ गया और महंगी प्रॉपर्टी के खरीदार गायब हो गए। लग्जरी प्रॉपर्टी के खरीदार नहीं मिलने के कारण एमार जैसे बड़े रियल एस्टेट डेवलपर्स के शेयरों में भारी गिरावट आई है। कई प्रॉपर्टी मालिक जो अपनी प्रॉपर्टी बेचना चाहते हैं उन्होंने कीमतें भी घटा लीं हैं, इसके बावजूद खरीदार नहीं मिल पा रहे हैं। लग्जरी प्रॉपर्टी के दाम 25% गिरे, सौदों में 51% की भारी कमी दुनियाभर के अरबपतियों की पहली पसंद माने जाने वाले दुबई के लानाई आइलैंड, अरेबियन रैंचेस और पाम जुमेराह आइलैंड्स जैसे इलाकों में प्रॉपर्टी के दाम में 20% की कटौती आम बात हो गई है। निवेशक अपने महंगे विला, पेंटहाउस और लग्जरी अपार्टमेंट्स को 2-4 करोड़ रुपए के डिस्काउंट पर बेचने को तैयार हैं। इससे साफ है कि दुबई का रियल एस्टेट बाजार फिलहाल ठहराव की स्थिति में पहुंच गया है, जहां कीमतों से ज्यादा बड़ी समस्या खरीदारों की कमी है। निवेशकों के लिए यह दौर अनिश्चितता भरा है, क्योंकि उनकी पूंजी कागज पर तो मौजूद है, लेकिन उसे नकदी में बदलना मुश्किल हो गया है। जब तक क्षेत्र में तनाव कम नहीं होता, बाजार में यह सुस्ती बनी रह सकती है।
Packaged food market to reach ₹14 lakh crore, midnight orders for chocolates and snacks surge

Hindi News Business Packaged Food Market To Reach ₹14 Lakh Crore, Midnight Orders For Chocolates And Snacks Surge बेंगलुरु.पीरजादा अबरार15 मिनट पहले कॉपी लिंक रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा रफ्तार पर यह बाजार 2030 तक 50% बढ़ेगा। – प्रतीकात्मक फोटो देश का पैकेज्ड फूड और बेवरेज मार्केट रफ्तार पकड़ रहा है। इसकी ग्रोथ का केंद्र अब सिर्फ प्रोडक्ट नहीं, बल्कि खरीदने का तरीका भी बनता जा रहा है। बेंगलुरु की कंसल्टिंग फर्म रेडसीर की रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा रफ्तार पर यह बाजार 2030 तक 50% बढ़कर करीब 14 लाख करोड़ रुपए का हो जाएगा। असल में ब्लिंकिट और इंस्टामार्ट जैसे क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म की लोकप्रियता बढ़ रही है। ये लोगों के खान-पान की आदतों में बदलाव ला रहे हैं। अब उपभोक्ता ऑर्डर करने से पहले ज्यादा प्लानिंग नहीं करते, बल्कि एप पर जाकर 10-15 मिनट के भीतर ही फूड आइटम ऑर्डर कर देते हैं। साथ ही कंपनियां छोटे साइज के पैकेट्स पर फोकस कर रही हैं, ताकि यूजर बार-बार खरीदे। सेल्फ रिवॉर्ड इकोनॉमी नए ट्रेंड से रेडी-टू-कुक, फ्रोजन और चिल्ड फूड सेगमेंट में तेज ग्रोथ देखने को मिल रही है। इसके अलावा चॉकलेट जैसी कैटेगरी में भी बिक्री रात 9 बजे से आधी रात के बीच अचानक बढ़ रही है। इसे ‘सेल्फ रिवॉर्ड इकोनॉमी’ कहा जा रहा है, जहां लोग दिन खत्म होने पर खुद को ट्रीट देते है। युवाओं के बीच ‘मिडनाइट स्नैकिंग’ या आधी रात को स्नैक्स मंगाकर खाने की आदत बढ़ी है। इस ट्रेंड ने एफएमसीजी कंपनियों के लिए नया ग्रोथ सेगमेंट बना दिया है। क्विक कॉमर्स के हिसाब से प्रोडक्ट ला रहीं कंपनियां क्विक कॉमर्स अब निवेशकों और स्टार्टअप्स के लिए बड़ा अवसर बन रहा है। इस सेगमेंट में 2030 तक कुल कारोबार 2.3 लाख करोड़ रुपए तक जा सकता है। ये अब महज एक डिलिवरी चैनल न रहकर बाजार को रफ्तार देने वाला सेक्टर बन गया है। कंपनियां प्रोडक्ट लॉन्च, प्राइसिंग और पैकेजिंग तक की रणनीति क्विक कॉमर्स को ध्यान में रखकर तय कर रही हैं। पैकेज्ड फूड और बेवरेज के कुल बाजार में इसकी हिस्सेदारी 4% से बढ़कर 20% तक पहुंच सकती है। पारंपरिक रिटेल मार्केट पर इस ट्रेंड का नकारात्मक असर पड़ेगा। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Finland tops the list for the 9th consecutive year

Hindi News Happylife International Day Of Happiness: Finland Tops The List For The 9th Consecutive Year हेलसिंकी1 घंटे पहले कॉपी लिंक डिजिटल दुनिया का सबसे गहरा और नकारात्मक असर 15 साल की लड़कियों पर दिख रहा है।- प्रतीकात्मक फोटो फिनलैंड में एक कहावत है…‘बोलना चांदी है, पर खामोशी सोना है।’ एकांत और शांति पसंद यह देश शायद दुनिया की सबसे खुशहाल जगह न लगे, पर 2026 की ‘वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट’ में फिनलैंड ने लगातार 9वीं बार बाजी मारी है। रिपोर्ट ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के वेलबीइंग रिसर्च सेंटर ने जारी की है। गैलप व यूएन सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क की स्टडी के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। 147 देशों की सूची में भारत 116वें स्थान पर है। इसके मुताबिक खुशी घटने की बड़ी वजह आर्थिक असुरक्षा,डिजिटल अकेलापन व सामाजिक सहयोग की कमी है। सोशल मीडिया पर ‘दिखावे की संस्कृति’ असली मानवीय जुड़ाव खत्म कर रही है। अपनों के साथ की कमी मानसिक सुकून को और घटा रही है, भविष्य की अनिश्चितता भी बड़ा कारण है.. तो जानिए खुशी की वजह टॉप-10 में नॉर्वे, स्वीडन और आइसलैंड जैसे देश हैं। समान संपन्नता, शानदार स्वास्थ्य सेवाएं और मजबूत सरकारी सुरक्षा चक्र। यहां अमीर-गरीब की खाई कम है, जो मंदी जैसे मुश्किल दौर में भी लोगों की मुस्कान बनाए रखती है। और उदासी का कारण सबसे चिंताजनक बात यह है की खुशी में गिरावट 25 साल से कम उम्र के युवाओं में सबसे ज्यादा देखी गई है। जहां दुनिया के बाकी हिस्सों में युवा जिंदगी से संतुष्ट हैं, वहीं अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे अमीर देशों के किशोरों की खुशहाली का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है। शोधकर्ता इसके लिए स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है… गैलप में वर्ल्ड न्यूज की मैनेजिंग एडिटर जूली रे कहती हैं, असल समस्या ‘सामाजिक साथ’ की कमी है। जब युवाओं को अपनों से जुड़ाव महसूस नहीं होता, तो वे अकेलेपन को दूर करने के लिए स्क्रीन की शरण लेते हैं। दुर्भाग्य से, सोशल मीडिया की यह डिजिटल निर्भरता उनकी खुशी बढ़ाने के बजाय उदासी को और गहरा कर देती है। ज्यादा असर टीनएज लड़कियों पर डिजिटल दुनिया का सबसे गहरा और नकारात्मक असर 15 साल की लड़कियों पर दिख रहा है। जो लड़कियां 5 घंटे से ज्यादा सोशल मीडिया पर बिताती हैं, वे जिंदगी से सबसे कम संतुष्ट हैं। ‘इन्फ्लुएंसर कल्चर’ व ‘परफेक्ट लाइफ’ वाली रील्स देखकर उनमें खुद को कमतर आंकने की भावना और तुलनात्मक तनाव बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर कंटेंट ‘देखना’ उन्हें मानसिक रूप से उदासी व अकेलेपन की ओर धकेल रहा है, जिससे उनकी असली मुस्कान फीकी पड़ रही है। टॉप-10 खुशहाल देश रैकिंग में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में से कोई भी टॉप-10 में नहीं है। 1.फिनलैंड 2. आइसलैंड 3. डेनमार्क 4. कोस्टा रिका 5. स्वीडन 6.नॉर्वे 7. नीदरलैंड्स 8. इजराइल 9. लक्जमबर्ग 10. स्विट्जरलैंड अब बात भारत में खुशी के स्तर की ताजा रिपोर्ट में भारत की तस्वीर उम्मीद और चुनौती, दोनों दिखाती है। 2024 (126) और 2025 (118) के मुकाबले लगातार स्थिति सुधर रही है। भारत की इस ‘धीमी लेकिन पक्की’ बढ़त के पीछे मजबूत पारिवारिक संरचना व सामाजिक ताना-बाना है, जो मुश्किल वक्त में सुरक्षा कवच बनता है। हालांकि, हम पड़ोसी देशों चीन (65) नेपाल (99) और पाकिस्तान (104) से पीछे हैं। इप्सॉस के हैप्पीनेस सर्वे में 29 देशों की सूची में भारत 22वें स्थान पर है। बीते साल 7वें पर था। दोनों रिपोर्टों के अनुसार खुशी घटने की सबसे बड़ी वजह ‘आर्थिक असुरक्षा’ व ‘ सोशल मीडिया का दबाव’ है। सोशल मीडिया पर बढ़ती तुलनात्मक भावना भारतीयों के मानसिक सुकून घटा रही है। युद्ध से जूझ रहे, पर खुशी कम नहीं होने दी: युद्ध के बावजूद इजराइल 5वें स्थान पर है। एक्सपर्ट के मुताबिक इजरायल में ‘सामाजिक एकजुटता’ और ‘पारिवारिक समर्थन’ बहुत मजबूत है, जो संकट के समय मानसिक संबल देता है। युद्ध के बावजूद यूक्रेन (105वें) में ‘साझा उद्देश्य’ की भावना और रूस (72वें) में मध्यम स्थिरता बनी हुई है, जिससे दोनों की रैंकिंग में बहुत बड़ी गिरावट नहीं आई। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
जेन-जी ने बदला खरीदारी का ट्रेंड:कंपनियों को प्रोडक्ट के साथ कोई कहानी, लाइफस्टाइल पेश करना पड़ रहा

देश का कंज्यूमर मार्केट बदल रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह जेन-जी (1997-2012 के बीच जन्मे) ग्राहकों का बदलती शॉपिंग हैबिट है। यह पीढ़ी खरीदारी को सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि अपनी पहचान और पर्सनैलिटी से जोड़कर देख रही है। आरपी-संजीव गोयनका समूह के वाइस चेयरमैन शाश्वत गोयनका का कहना है कि कंपनियां पहले के कंज्यूमर के हिसाब से रणनीति बना रही हैं, जबकि असल बाजार पूरी तरह बदल चुका है। गोयनका के मुताबिक, पहले जहां लोग घर, कार या सोना जैसी चीजें जुटाकर अपना स्टेटस और सफलता दिखाते थे, वहीं जेन-जी खुद को बेहतर बनाने में निवेश कर रही है। उनका फोकस बाहरी संपत्ति की जगह ‘इंटरनल पोर्टफोलियो’ पर है। इसमें फिटनेस, पर्सनल केयर और ट्रैवल शामिल हैं। यही वजह है कि फिटनेस, ब्यूटी, डाइनिंग और एंटरटेनमेंट जैसे सेक्टर्स तेजी से बढ़ रहे हैं। खास बात ये है कि जेन जी खर्च करने से पीछे नहीं हट रही और अब तक की सबसे आक्रामक उपभोक्ता पीढ़ी बनकर उभर रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने इस बदलाव को और तेज किया है। इससे युवा ज्यादा जागरूक, प्रयोगशील और ब्रांड के प्रति सजग हो गए हैं। इस बदलती सोच का सीधा असर कंपनियों की रणनीति पर पड़ रहा है। अब केवल प्रोडक्ट की उपयोगिता या कीमत ही नहीं, बल्कि उससे मिलने वाला अनुभव और उससे जुड़ी पहचान ज्यादा अहम हो गई है। गोयनका मानते हैं कि अब कंपनियों को प्रोडक्ट के साथ कोई कहानी, मोटिव और लाइफस्टाइल पेश करनी पड़ रही है। जो ब्रांड इस बदलाव को समझ पा रहे हैं, वही तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जबकि पारंपरिक सोच पर टिके ब्रांड पीछे छूट रहे हैं। भारत में करीब 65% लोग 35 साल से कम उम्र के हैं। इसलिए यह बदलाव लंबे समय तक चलने वाला है। इससे खर्च बढ़ेगा और बाजार के पास मौका होगा, लेकिन अब ग्रोथ जेन-जी के ट्रेंड्स और उनके बिहेवियर के हिसाब से होगी। 2035 तक भारतीय उपभोक्ता बाजार में हर दूसरी शॉपिंग जेन-जी करेगी समय के साथ इस ट्रेंड का असर और गहरा होने वाला है। गोयंका कहते हैं कि 2035 तक जेन-जी देश के कंजम्प्शन में करीब 185 लाख करोड़ का योगदान दे सकती है। यानी हर दूसरी खरीद यही पीढ़ी करेगी। कंपनियों के सामने यह चुनौती कम होगी कि वे क्या बेच रही हैं, बल्कि यह होगी वे कंज्यूमर को क्या बनने में मदद कर रही हैं।
अमेरिका में बढ़ रहे मास शूटर:ऑनलाइन कम्युनिटी इन्हें ‘संत’ मान रही; हिंसक कंटेंट दिखाने वाला एल्गोरिदम अपराध की राह पर ले जाता है

अमेरिका में मास शूटर्स की संख्या बढ़ रही है और इसके पीछे एक नया, खतरनाक ट्रेंड उभर रहा है। इंटरनेट पर ‘ट्रू क्राइम’ जैसी कम्युनिटीज तेजी से फैल रही हैं, जो इन हत्यारों को संत और भगवान की तरह पूज रही हैं। यह सिर्फ अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि ऐसी डिजिटल संस्कृति है, जो हिंसा को महिमामंडित कर रही है। एक दशक तक मास शूटिंग पर स्टडी करने वाले क्रिमिनोलॉजिस्ट जेम्स डेंसली व जिलियन पीटरसन कहते हैं, अब हमलावर कम उम्र के हैं, इंटरनेट से गहराई से जुड़े हैं और हिंसा को ही जीवन का अर्थ मानने लगे हैं। इसकी वजह एल्गोरिदम है, जो कम उम्र से ही यूजर्स को गहरे अंधेरे कंटेंट की ओर धकेल देता है। एक मजाकिया पोस्ट से शुरू होकर यह रास्ता हिंसा तक पहुंच सकता है… और किशोरों को इस बात का एहसास भी नहीं होता। एक्सपर्ट कहते हैं, ‘पहले मास शूटर्स को आमतौर पर मध्यम आयु के, अकेलेपन और संकट से जूझते पुरुषों के रूप में देखा जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। नए अपराधी अधिकतर युवा हैं, जो ऑनलाइन नेटवर्क से गहराई से जुड़े हैं। वे मानते हैं कि हिंसा ही उनके जीवन का सबसे ‘महत्वपूर्ण’ काम है। ट्रू क्राइम जैसी कम्युनिटी सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद है। यहां कुख्यात हमलावरों को ‘संत’ कहा जाता है, उनके वीडियो और फैन आर्ट बनाए जाते हैं। प्लेटफॉर्म्स भले ही ऐसे कंटेंट को हटाते हों, पर यह जल्दी ही नए रूप में वापस आ जाता है। 2024 से अब तक अमेरिका में कम से कम 7 स्कूल शूटिंग्स इस कम्युनिटी से जुड़ी रही हैं। यह कम्युनिटी निजी दर्द को सार्वजनिक प्रदर्शन में बदल देती है… ‘देखो, दूसरों ने भी यही किया और वे याद किए जाते हैं।’ इस तरह अपराधियों को एक स्क्रिप्ट मिल जाती है, जिसमें उनका हमला कहानी का चरम बन जाता है। शोधकर्ता कहते हैं,‘इसके लिए स्कूलों में बेहतर काउंसलिंग व हथियारों पर नियंत्रण जरूरी है। बड़ी जिम्मेदारी टेक कंपनियों की है। सोशल प्लेटफॉर्म कुछ पलों में ट्रेंडिंग साउंड या इमेज पहचान लेते हैं। उसी तरह वे हिंसा का महिमामंडन करने वाला कंटेंट फ्लैग कर सकते हैं, फुटेज की री-शेयरिंग धीमी कर सकते हैं और हिंसक कंटेंट दोबारा उभरने से रोक सकते हैं। अपराध को महिमामंडित करती हैं ऑनलाइन कम्युनिटी ‘ट्रू क्राइम’ जैसी कई कम्युनिटीज अपराध को आकर्षक रूप में पेश करती हैं। ‘ब्लड लाइकली’ में लोग खुद को जासूस मानकर अनसुलझे मामलों पर चर्चा करते हैं। ‘अनएक्सप्लेंड मिस्ट्रीज फोरम’ अपराध के साथ पैरानॉर्मल घटनाओं को भी जोड़ता है व रहस्यमयी केसों पर बहस करता है। ‘रेडिट ट्रू क्राइम सबरेडिट’ सबसे सक्रिय जगह है, जहां सीरियल किलर्स व स्कूल शूटिंग्स पर चर्चा होती है व फैन कल्चर भी बनता है। वहीं अनकवर्ड खासतौर पर कोल्ड केस और गुमशुदा पर केंद्रित है, जहां लोग मिलकर पुराने मामले सुलझाते हैं।
अमेरिका में बढ़ रहे मास शूटर:ऑनलाइन कम्युनिटी इन्हें ‘संत’ मान रही; हिंसक कंटेंट दिखाने वाला एल्गोरिदम अपराध की राह पर ले जाता है

अमेरिका में मास शूटर्स की संख्या बढ़ रही है और इसके पीछे एक नया, खतरनाक ट्रेंड उभर रहा है। इंटरनेट पर ‘ट्रू क्राइम’ जैसी कम्युनिटीज तेजी से फैल रही हैं, जो इन हत्यारों को संत और भगवान की तरह पूज रही हैं। यह सिर्फ अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि ऐसी डिजिटल संस्कृति है, जो हिंसा को महिमामंडित कर रही है। एक दशक तक मास शूटिंग पर स्टडी करने वाले क्रिमिनोलॉजिस्ट जेम्स डेंसली व जिलियन पीटरसन कहते हैं, अब हमलावर कम उम्र के हैं, इंटरनेट से गहराई से जुड़े हैं और हिंसा को ही जीवन का अर्थ मानने लगे हैं। इसकी वजह एल्गोरिदम है, जो कम उम्र से ही यूजर्स को गहरे अंधेरे कंटेंट की ओर धकेल देता है। एक मजाकिया पोस्ट से शुरू होकर यह रास्ता हिंसा तक पहुंच सकता है… और किशोरों को इस बात का एहसास भी नहीं होता। एक्सपर्ट कहते हैं, ‘पहले मास शूटर्स को आमतौर पर मध्यम आयु के, अकेलेपन और संकट से जूझते पुरुषों के रूप में देखा जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। नए अपराधी अधिकतर युवा हैं, जो ऑनलाइन नेटवर्क से गहराई से जुड़े हैं। वे मानते हैं कि हिंसा ही उनके जीवन का सबसे ‘महत्वपूर्ण’ काम है। ट्रू क्राइम जैसी कम्युनिटी सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद है। यहां कुख्यात हमलावरों को ‘संत’ कहा जाता है, उनके वीडियो और फैन आर्ट बनाए जाते हैं। प्लेटफॉर्म्स भले ही ऐसे कंटेंट को हटाते हों, पर यह जल्दी ही नए रूप में वापस आ जाता है। 2024 से अब तक अमेरिका में कम से कम 7 स्कूल शूटिंग्स इस कम्युनिटी से जुड़ी रही हैं। यह कम्युनिटी निजी दर्द को सार्वजनिक प्रदर्शन में बदल देती है… ‘देखो, दूसरों ने भी यही किया और वे याद किए जाते हैं।’ इस तरह अपराधियों को एक स्क्रिप्ट मिल जाती है, जिसमें उनका हमला कहानी का चरम बन जाता है। शोधकर्ता कहते हैं,‘इसके लिए स्कूलों में बेहतर काउंसलिंग व हथियारों पर नियंत्रण जरूरी है। बड़ी जिम्मेदारी टेक कंपनियों की है। सोशल प्लेटफॉर्म कुछ पलों में ट्रेंडिंग साउंड या इमेज पहचान लेते हैं। उसी तरह वे हिंसा का महिमामंडन करने वाला कंटेंट फ्लैग कर सकते हैं, फुटेज की री-शेयरिंग धीमी कर सकते हैं और हिंसक कंटेंट दोबारा उभरने से रोक सकते हैं। अपराध को महिमामंडित करती हैं ऑनलाइन कम्युनिटी ‘ट्रू क्राइम’ जैसी कई कम्युनिटीज अपराध को आकर्षक रूप में पेश करती हैं। ‘ब्लड लाइकली’ में लोग खुद को जासूस मानकर अनसुलझे मामलों पर चर्चा करते हैं। ‘अनएक्सप्लेंड मिस्ट्रीज फोरम’ अपराध के साथ पैरानॉर्मल घटनाओं को भी जोड़ता है व रहस्यमयी केसों पर बहस करता है। ‘रेडिट ट्रू क्राइम सबरेडिट’ सबसे सक्रिय जगह है, जहां सीरियल किलर्स व स्कूल शूटिंग्स पर चर्चा होती है व फैन कल्चर भी बनता है। वहीं अनकवर्ड खासतौर पर कोल्ड केस और गुमशुदा पर केंद्रित है, जहां लोग मिलकर पुराने मामले सुलझाते हैं।








