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कंट्री काउंटर्स; दुनिया के सारे देश घूमने का ट्रेंड:भीड़ से ऊबे लोग अनछुए डेस्टिनेशन का रुख कर रहे, एक्सपर्ट- यह प्रतिष्ठा का प्रतीक

कंट्री काउंटर्स; दुनिया के सारे देश घूमने का ट्रेंड:भीड़ से ऊबे लोग अनछुए डेस्टिनेशन का रुख कर रहे, एक्सपर्ट- यह प्रतिष्ठा का प्रतीक

प्रशांत महासागर का छोटा सा द्वीपीय देश ‘तुवालु’… हवाई व ऑस्ट्रेलिया के बीच बसा यह देश दुनिया के उन गिने-चुने कोनों में से है, जहां साल भर में इक्का-दुक्का टूरिस्ट ही पहुंचते हैं। यहां आलीशान होटल या बड़े पर्यटन स्थल नहीं हैं। राजधानी फुनाफुटी में हवाई पट्टी ही शाम को पिकनिक स्पॉट व फुटबॉल ग्राउंड बन जाती है। पर अमेरिका के टेड निम्स के लिए यह कोई आम जगह नहीं थी। जब उन्होंने तुवालु में कदम रखा, तो यह उनके ट्रैवल का 191वां देश बन गया! यूएन के कुल 193 सदस्य देश हैं और टेड बस दो कदम दूर हैं। दुनिया में इन दिनों ‘कंट्री काउंटर्स’ यानी देश गिनने वाले मुसाफिरों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। इन लोगों का बस एक ही मकसद है- दुनिया के हर देश की धरती पर कदम रखना। यानी घूमना और पर्यटन भी खेल बन गया है। ऐसा खेल, जिसमें कोई मेडल नहीं मिलता, लेकिन लोग पूरी दुनिया को जेब में समेटने की होड़ में लगे हैं। जुनूनी यात्रियों के लिए नोमैडमेनिया और मोस्ट ट्रैवल्ड पीपल जैसी वेबसाइट्स एक तरह का डिजिटल मैदान बन गई हैं। यहां लोग अपनी यात्राओं का हिसाब रखते हैं और लीडरबोर्ड पर दिखाते हैं कि उन्होंने कितने देश देखे हैं। बहस भी होती है-क्या सिर्फ एयरपोर्ट पर फ्लाइट बदलना यानी ट्रांजिट को भी ‘देश घूमना’ माना जाए या नहीं। पहले जहां 100 देशों की यात्रा करने वाले लोग कम थे, अब ऐसे क्लबों में हजारों सदस्य जुड़ चुके हैं। यह ट्रेंड दिखाता है कि ट्रैवल अब प्रतियोगिता बन गया है। हाल में 142वें देश सामोआ की यात्रा करने वाली मलेशिया की कैरोल वोंग कहती हैं ‘बड़े व महंगे होटलों में अकेलापन होता है, असली मजा तो स्थानीय लोगों के साथ रहने में है।’ सोशल मीडिया के दौर में यह स्टेटस सिंबल भी बन चुका है। इस होड़ का अच्छा पहलू यह भी है कि लोग अब पेरिस या लंदन की भीड़भाड़ से ऊबकर अनछुए रास्तों की तलाश कर रहे हैं। सिंगापुर के 34 वर्षीय श्यांग कियान सोंग भी तुवालु इसीलिए आए हैं क्योंकि वे उन जगहों को देखना चाहते हैं जहां आधुनिक पर्यटन की परछाई भी नहीं पड़ी। दिलचस्प यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण तुवालु जैसे देश शायद आने वाले वक्त में डूब जाएं। पर्यटन में शीर्ष 10 देशों की हिस्सेदारी में 20% की कमी – सर्वे
स्किफ्ट के सर्वे के अनुसार दिखावे की संस्कृति व पर्यटन स्थलों पर भीड़ के कारण लोग अनछुए देशों का रुख कर रहे हैं। वैश्विक पर्यटन में शीर्ष 10 देशों की हिस्सेदारी 1980 के 60% से घटकर 2024 में 40% रह गई है। नोमैडमेनिया के फाउंडर हैरी मित्सिदिस कहते हैं,‘कंट्री काउंटिंग छुट्टियां मनाने का नहीं, बल्कि यह खुद को चुनौती देने व वैश्विक पहचान बनाने का जरिया बन चुका है। लोग अब सिर्फ ‘घूमने’ नहीं निकलते, बल्कि वे दुनिया को चेकलिस्ट की तरह देखते हैं। यह जुनून इस कदर बढ़ा है कि सालभर में रिकॉर्ड 82 लोगों ने सभी देशों को सफलता के साथ घूमने का दावा किया।

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प्रशांत महासागर का छोटा सा द्वीपीय देश ‘तुवालु’… हवाई व ऑस्ट्रेलिया के बीच बसा यह देश दुनिया के उन गिने-चुने कोनों में से है, जहां साल भर में इक्का-दुक्का टूरिस्ट ही पहुंचते हैं। यहां आलीशान होटल या बड़े पर्यटन स्थल नहीं हैं। राजधानी फुनाफुटी में हवाई पट्टी ही शाम को पिकनिक स्पॉट व फुटबॉल ग्राउंड बन जाती है। पर अमेरिका के टेड निम्स के लिए यह कोई आम जगह नहीं थी। जब उन्होंने तुवालु में कदम रखा, तो यह उनके ट्रैवल का 191वां देश बन गया! यूएन के कुल 193 सदस्य देश हैं और टेड बस दो कदम दूर हैं। दुनिया में इन दिनों ‘कंट्री काउंटर्स’ यानी देश गिनने वाले मुसाफिरों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। इन लोगों का बस एक ही मकसद है- दुनिया के हर देश की धरती पर कदम रखना। यानी घूमना और पर्यटन भी खेल बन गया है। ऐसा खेल, जिसमें कोई मेडल नहीं मिलता, लेकिन लोग पूरी दुनिया को जेब में समेटने की होड़ में लगे हैं। जुनूनी यात्रियों के लिए नोमैडमेनिया और मोस्ट ट्रैवल्ड पीपल जैसी वेबसाइट्स एक तरह का डिजिटल मैदान बन गई हैं। यहां लोग अपनी यात्राओं का हिसाब रखते हैं और लीडरबोर्ड पर दिखाते हैं कि उन्होंने कितने देश देखे हैं। बहस भी होती है-क्या सिर्फ एयरपोर्ट पर फ्लाइट बदलना यानी ट्रांजिट को भी ‘देश घूमना’ माना जाए या नहीं। पहले जहां 100 देशों की यात्रा करने वाले लोग कम थे, अब ऐसे क्लबों में हजारों सदस्य जुड़ चुके हैं। यह ट्रेंड दिखाता है कि ट्रैवल अब प्रतियोगिता बन गया है। हाल में 142वें देश सामोआ की यात्रा करने वाली मलेशिया की कैरोल वोंग कहती हैं ‘बड़े व महंगे होटलों में अकेलापन होता है, असली मजा तो स्थानीय लोगों के साथ रहने में है।’ सोशल मीडिया के दौर में यह स्टेटस सिंबल भी बन चुका है। इस होड़ का अच्छा पहलू यह भी है कि लोग अब पेरिस या लंदन की भीड़भाड़ से ऊबकर अनछुए रास्तों की तलाश कर रहे हैं। सिंगापुर के 34 वर्षीय श्यांग कियान सोंग भी तुवालु इसीलिए आए हैं क्योंकि वे उन जगहों को देखना चाहते हैं जहां आधुनिक पर्यटन की परछाई भी नहीं पड़ी। दिलचस्प यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण तुवालु जैसे देश शायद आने वाले वक्त में डूब जाएं। पर्यटन में शीर्ष 10 देशों की हिस्सेदारी में 20% की कमी – सर्वे
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