Saturday, 06 Jun 2026 | 10:05 PM

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‘असली टीएमसी’ बनाम भाईपो हिट टॉप गियर | क्या रिजिग से संकट हो सकता है? | सुपर सैटरडे डिबेट | न्यूज18 गौतम अडाणी फिर बने एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति:मुकेश अंबानी और मसायोशी सन को पीछे छोड़ा; नेटवर्थ 89.2 अरब डॉलर पहुंची गौतम अडाणी फिर बने एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति:मुकेश अंबानी और मसायोशी सन को पीछे छोड़ा; नेटवर्थ 89.2 अरब डॉलर पहुंची 19 साल की एंड्रीवा ने पहली बार फ्रेंच ओपन जीता:ऐसा करने वाली दूसरी यंगेस्ट प्लेयर; फाइनल में च्वालिंस्का को 6-3, 6-2 से हराया 19 साल की एंड्रीवा ने पहली बार फ्रेंच ओपन जीता:ऐसा करने वाली दूसरी यंगेस्ट प्लेयर; फाइनल में च्वालिंस्का को 6-3, 6-2 से हराया कॉकरोच हटाने के टिप्स: कॉकरोच भगाने का सबसे आसान तरीका, बस इन 6 तरीकों से करें सही तरीके से इस्तेमाल; उल्टे पैर गटर में भागेंगे
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Buffett earns Rs 4,378 crore from low-profile Indian businesses

Buffett earns Rs 4,378 crore from low-profile Indian businesses

बिजनेस स्टेंडर्ड.द इकोनॉमिस्ट10 मिनट पहले कॉपी लिंक भारत की हर बड़ी इंडस्ट्री में बफे की पैठ। मशहूर निवेशक वॉरेन बफे कभी भारत नहीं आए। फिर भी उनकी 1 ट्रिलियन डॉलर (करीब 95 लाख करोड़) की कंपनी बर्कशायर हैथवे ने यहां मजबूत कारोबारी जड़ें जमा लीं हैं। ग्रेग एबेल के सीईओ बनते ही इस ‘अनजान’ पोर्टफोलियो की असली तस्वीर सामने आ रही है। एबेल को ऐसा भारतीय पोर्टफोलियो मिला, जो दशकों से चुपचाप बढ़ रहा है। पेटीएम में 26 करोड़ के निवेश पर 40% नुकसान झेलने वाली बर्कशायर की असली ताकत उसकी 58 गैर-लिस्टेड कंपनियों में हैं, जिनमें से कई भारत में सक्रिय हैं। इनसे बीते साल 4,378 करोड़ की आय हुई। भारत की हर बड़ी इंडस्ट्री में बफे की ‘अदृश्य’ पैठ, आपकी कार के इंजन से लेकर शैंपू तक फैला है बर्कशायर का साम्राज्य इन कंपनियों से हो रहा बर्कशायर हैथवे का भारत में कारोबार कंपनी- आय लुब्रिजोल इंडिया – 3,292 आईएमसी ग्रुप इंडिया – 1,086 कंपनी निवेश CPVC मैन्युफैक्चरिंग -1,238 3 साल का कुल निवेश 2,380 (आंकड़े करोड़ रुपए में 2025 के, स्रोत: फॉर्च्यून इंडिया) इंजन ऑयल से लेकर मेडिकल उपकरण तक, पाइप से लेकर शैंपू तक बर्कशायर का इंडिया कनेक्शन उतना ही गहरा है, जितना कम चर्चित। भारत में लुब्रिजोल इंक की मौजूदगी 6 दशकों से – शुरुआत इंडियन ऑयल के साथ 60:40 जॉइंट वेंचर से। अब भारतीय कंपनी की हिस्सेदारी सिर्फ 26% – मूल बिजनेस – मोबिलिटी एडिटिव्स- कार, ट्रक, 125 सीसी मोटरसाइकिलों के इंजन ऑयल की केमिस्ट्री। – दूसरा बड़ा दांव – सीपीवीसी पाइप रेजिन- ग्रासिम के साथ जॉइंट वेंचर, सालाना उत्पादन क्षमता 1 लाख टन। पेंट बिजनेस से रोजमर्रा के एफएमसीजी तक में पैठ – एशियन पेंट्स, बर्जर पेंट्स, बिड़ला ओपस को उच्च गुणवत्ता वाले रेजिन्स और हाइपर-डिस्पर्सेंट्स की निर्बाध सप्लाई। – पॉलिहोस (चेन्नई) के साथ जॉइंट वेंचर-मेडिकल डिवाइस के लिए पॉलियूरेथेन्स की सप्लाई। – यूनिलीवर को शैंपू, साबुन और फार्मा फार्मा फॉर्मूलेशन के लिए पॉलिमर सप्लाई करती है। विस्तार -भारत में क्विक कॉमर्स से लेकर फूड बिजनेस पर फोकस – 30 करोड़ का टेक्नोलॉजी सेंटर निर्माणाधीन। यहां भारतीय इंजीनियर, भारतीय समस्याओं पर रिसर्च करेंगे। – रुपा ग्रुप के साथ पार्टनरशिप से आगे ब्रैडफोर्ड के जरिए नए पार्टनर की तलाश कर रही बफे की कंपनी। -ई-कॉमर्स ओर क्विक कॉमर्स पर फोकस, वीमन इनरवियर में बड़ी संभावना देख रही बर्कशायर हैथवे। – देवयानी इंटरनेशनल से हाथ मिलाया। हम परदे के पीछे से काम करते हैं जब मेरे ससुर ने स्किपर पाइप्स का वो विज्ञापन देखा जिसमें एमएस धोनी हैं तो उन्हें लुब्रिजोल का नाम कहीं नजर नहीं आया। जब उन्होंने मुझे ये बताया तो मैंने कहा- यही तो चाहिए था। हम परदे के पीछे काम करते हैं, सामने नहीं आते। – अभिषेक श्रीवास्तव, एमडी, लुब्रिजोल इंडिया, मिडल ईस्ट और अफ्रीका दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

आर्थिक फैसलों में महिलाओं की बढ़ी भागीदारी:महिला मुखिया वाले घरों में कम हुई दिहाड़ी; पक्की नौकरियां बढ़ीं- रिपोर्ट

आर्थिक फैसलों में महिलाओं की बढ़ी भागीदारी:महिला मुखिया वाले घरों में कम हुई दिहाड़ी; पक्की नौकरियां बढ़ीं- रिपोर्ट

देश में महिलाओं की आर्थिक भूमिका सिर्फ परिवार तक सीमित नहीं रह गई। एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट में सामने आया है कि महिला मुखिया वाले परिवारों में रोजगार की गुणवत्ता तेजी से सुधर रही है। जब घर में महिला की चलती है, तो परिवार की निर्भरता असुरक्षित दिहाड़ी मजदूरी से हटकर सम्मानजनक नियमित वेतन वाली नौकरियों की ओर बढ़ जाती है। ऐसी महिलाओं में नियमित रोजगार की संभावना 4.4% बढ़ी है, जबकि दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भरता 4.2% घटी है। यह संकेत है कि महिलाएं संरक्षित रोजगार की ओर बढ़ रही हैं। देशभर के 2.70 लाख परिवारों और 11.48 लाख से अधिक लोगों के आंकड़ों पर आधारित सर्वे शहर – सुरक्षित नौकरियों की ओर बड़ी छलांग शहरी क्षेत्रों में जिन घरों की मुखिया महिला है, वहां नियमित वेतन वाली नौकरियों की संभावना 10 फीसदी तक बढ़ गई है। यह डेटा चौंकाने वाला है क्योंकि यह दर्शाता है कि महिलाएं अनिश्चित छोटे-मोटे व्यवसायों के बजाय स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा वाले कॉर्पोरेट या संस्थागत काम को प्राथमिकता दे रही हैं। ग्रामीण भारत – दिहाड़ी मजदूरी में 5% तक की कमी आई महिला नेतृत्व वाले ग्रामीण घरों में दिहाड़ी में शामिल होने की संभावना 5% घटी। इसकी जगह परिवार अब खुद के छोटे उद्यमों या नियमित काम की ओर बढ़ रहे हैं, जो उनकी बढ़ती बार्गेनिंग पावर को दर्शाता है। महिला शिक्षित होती हैं तो तेजी से उन्नति अध्ययन में शिक्षा को भी महिलाओं के रोजगार बदलाव का बड़ा कारण बताया गया है। अशिक्षित महिलाओं में दिहाड़ी मजदूरी की संभावना सबसे ज्यादा है, लेकिन शिक्षा बढ़ने के साथ यह तेजी से घटती है। उच्च माध्यमिक और उससे ऊपर की पढ़ाई करने वाली महिलाओं में नियमित वेतन वाली नौकरी की संभावना सबसे अधिक पाई गई। श्रम में हिस्सेदारी रिकॉर्ड 40 फीसदी पहुंची देश में महिला श्रम भागीदारी दर 40% तक पहुंच चुकी है। ग्रामीण महिलाओं की श्रम भागीदारी दर 45.9% और शहरों में महज 27.7% है। रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी प्रशिक्षण लेने वाली महिलाओं में स्वरोजगार की संभावना बढ़ी है। यदि प्रशिक्षण, रोजगार योजनाओं का विस्तार किया जाए तो महिलाओं को बेहतर रोजगार मिल सकता है। यहां दी मात-परिवहन में महिलाओं की नौकरी पुरुषों से ज्यादा रिपोर्ट में सबसे दिलचस्प बदलाव परिवहन क्षेत्र में दिखा। यहां नियमित वेतन वाली नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी पुरुषों से ज्यादा पाई गई। लंबे समय तक पुरुष प्रधान माने जाने वाले इस क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती मौजूदगी नए रोजगार रुझान का संकेत मानी जा रही है। दूसरी ओर खनन और औद्योगिक क्षेत्रों में महिलाओं की नियमित नौकरी हिस्सेदारी अब भी काफी कम बनी हुई है।

कोच फ्लिक ने बदली बार्सिलोना की तकदीर:97 साल बाद मैड्रिड को हराकर बार्सिलोना बना सरताज, फ्लिक की युवा ब्रिगेड का दबदबा

कोच फ्लिक ने बदली बार्सिलोना की तकदीर:97 साल बाद मैड्रिड को हराकर बार्सिलोना बना सरताज, फ्लिक की युवा ब्रिगेड का दबदबा

स्पेनिश फुटबॉल में इस साल खिताबी जंग किसी ड्रामे या आखिरी पलों के उलटफेर वाली नहीं थी। बार्सिलोना ने रियल मैड्रिड के खिलाफ 2-0 की जीत दर्ज की और पॉइंट टेबल में 14 अंकों के भारी अंतर के साथ ला लिगा का खिताब अपने नाम किया। ‘एल क्लासिको’ पिछले 97 वर्षों में पहला ऐसा मैच बना, जिसने आधिकारिक तौर पर लीग का विजेता तय किया। कोच हेंसी फ्लिक के दो साल के कार्यकाल में यह उनका दूसरा लगातार खिताब है। बार्सिलोना ने 29वीं बार ला लिगा का टाइटल जीता। जर्मनी के फ्लिक पिता के निधन के बावजूद मैच के दौरान टीम के साथ मौजूद थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में बार्सिलोना को ऐसी टीम बनाया, जिसने लीग पर दबदबा कायम किया। फ्लिक की टीम बार्सिलोना फरवरी से ही अविश्वसनीय फॉर्म में रही है और उसने लगातार पिछले 11 मैच जीते हैं। इस पूरे सीजन में बार्सिलोना ने केवल चार लीग मैच गंवाए और होम ग्राउंड पर उनका जीत का रिकॉर्ड 100% रहा। हालांकि, टीम चैम्पियंस लीग और कोपा डेल रे से बाहर हो गई, लेकिन ला लिगा की रेस पर उनका नियंत्रण कभी कम नहीं हुआ। इस सत्र के 53 मैचों में से बार्सिलोना ने 42 जीते हैं- यानी 79% जीत की दर, जो यूरोप की टॉप-5 लीग में केवल बायर्न म्यूनिख (83%) से कम है। फ्लिक के आने के बाद बार्सिलोना की पहचान बदल गई है। उनके आने के बाद टीम ज्यादा अनुशासनात्मक हुई। उन्होंने डायरेक्ट अटैकिंग खेल की रणनीति अपनाई। इस बदलाव के केंद्र में नई पीढ़ी रही, जिसका नेतृत्व लामिने यमाल कर रहे हैं। 18 वर्षीय यमाल ने इस सीजन में 45 खेलों में 24 गोल किए हैं। फ्लिक ने उन पर भरोसा जताते हुए ऐसे टैक्टिकल पैटर्न बनाए जो उनकी ड्रिबलिंग और रचनात्मकता को निखारते हैं। यमाल के साथ-साथ पाउ कुबार्सी और फर्मिन लोपेज जैसे अन्य युवा खिलाड़ियों को भी सिस्टम में बखूबी शामिल किया। फ्लिक की कोचिंग में मार्कस रेशफोर्ड ने अपनी उपयोगिता साबित की है। भले ही वह हर मैच में शुरुआती इलेवन का हिस्सा न रहे हों, लेकिन बेंच से आकर उन्होंने महत्वपूर्ण गोल किए हैं। रियल के खिलाफ क्लासिको में रेशफोर्ड की शानदार फ्री-किक ने जीत की नींव रखी। मैनेजर के तौर पर फ्लिक की संवेदनशीलता की भी प्रशंसा हुई है। दिसंबर में उन्होंने डिफेंडर रोनाल्ड अराउजो को उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए छुट्टी दे दी थी।

500 रु. में नौकरी की, ताने सहे,आज हैं फैशन आइकन:मेट गाला से माइकल जैक्सन तक; मनीष मल्होत्रा के संघर्ष की कहानी

500 रु. में नौकरी की, ताने सहे,आज हैं फैशन आइकन:मेट गाला से माइकल जैक्सन तक; मनीष मल्होत्रा के संघर्ष की कहानी

फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा किसी परिचय के मोहताज नहीं। लेकिन इस मुकाम पर पहुंचने के लिए उन्हें कई चुनौतियां पार करनी पड़ी हैं। अभी मनीष “मेट गाला’ में प्रदर्शित अपने विशेष परिधानों को लेकर चर्चा में हैं। जानते हैं उनकी संघर्ष से सफलता की कहानी…. मुंबई के एक मध्यमवर्गीय पंजाबी परिवार में 5 दिसंबर 1966 को जन्मे मनीष अपने स्कूली दिनों में मां के साथ न सिर्फ साड़ी खरीदने जाते, बल्कि साड़ियों को लेकर उन्हें फैशन टिप्स भी देने लगे थे। यहीं से फैशन और कॉस्ट्यूम डिजाइन के प्रति उनका लगाव बढ़ने लगा। बचपन से ही वे फिल्मों के बेहद शौकीन थे। वे लगभग हर ​फिल्म देखने जाते, लेकिन कलाकारों के अभिनय से ज्यादा मनीष का ध्यान उनके पहनावे पर होता था। कलाकारों के परिधान देख कर वे फैशन की बारीकियां समझने लगे। संघर्ष – डिजाइनिंग की डिग्री नहीं ले पाए, सेट पर लोग कपड़े सिलने वाला बोलते 1980 के दशक में फैशन डिजाइनिंग को पुरुषों का पेशा नहीं माना जाता था। लोग उनका मजाक उड़ाते थे। मनीष कभी डिजाइनिंग की औपचारिक पढ़ाई भी नहीं कर पाए, क्योंकि तब देश में पुरुषों के लिए फैशन डिजाइनिंग कोर्स नहीं होते थे। और विदेश जाकर कोर्स करने के पैसे उनके पास नहीं ​थे। कॅरिअर की शुरुआत में उन्होंने मुम्बई के “इक्विनॉक्स’ बुटीक में महज 500 रुपए महीने की नौकरी की। यहां उन्हें ग्राहकों को कपड़े दिखाने और उन्हें तह करने का काम मिला। खाली समय में मनीष छिप कर डिजाइन स्केच बनाते थे। बॉलीवुड के शुरुआती वर्षों में प्रोड्यूसर उनके डिजाइन को अधिक ग्लैमरस बता कर रिजेक्ट कर देते। सेट पर उनसे कहा जाता कि तुम कपड़े सिलने वाले हो, उन्हें दो और चलते बनो। शुरुआत – “रंगीला’ से बने बॉलीवुड के बड़े चेहरे, जैक्सन की जैकेट डिजाइन की मल्होत्रा ने 1990 में फिल्म “स्वर्ग’ में जूही चावला के लिए कॉस्ट्यूम ​​डिजाइन कर बॉलीवुड में ​डेब्यू किया। मनीष बताते हैं कि “गुमराह’ के लिए उन्हें पहली बार यश जौहर ने 10 हजार रुपए दिए। 1995 में “रंगीला’ में उर्मिला मातोंडकर के आउटफिट ​डिजाइन ने उन्हें रातोंरात बॉलीवुड का बड़ा चेहरा बना दिया। 1996 में माइकल जैक्सन भारत आए थे तो मनीष ने उनकी जैकेट डिजाइन की थी। सफलता – खुद के नाम को ही लग्जरी ब्रांड बनाया, श्रमिकों के कल्याण से भी जुड़े मनीष ने 2005 में अपने नाम से ही डिजाइनर कपड़ों का लग्जरी ब्रांड लॉन्च किया। वे स्किन केयर और ज्वेलरी में भी अपने कलेक्शन लॉन्च कर चुके हैं। आईफा, फिल्मफेयर समेत कई अवॉर्ड उन्हें मिल चुके हैं। वे चिकनकारी की ​महिला श्रमिकों के ​कल्याण की एक सामाजिक संस्था से भी जुड़े हैं। उनकी नेटवर्थ करीब 2500 करोड़ रुपए बताई जाती है।

500 रु. में नौकरी की, ताने सहे, आज फैशन आइकन:मनीष मल्होत्रा के संघर्ष की कहानी, रंगीला से बने बॉलीवुड के बड़े चेहरे

500 रु. में नौकरी की, ताने सहे, आज फैशन आइकन:मनीष मल्होत्रा के संघर्ष की कहानी, रंगीला से बने बॉलीवुड के बड़े चेहरे

फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा किसी परिचय के मोहताज नहीं। लेकिन इस मुकाम पर पहुंचने के लिए उन्हें कई चुनौतियां पार करनी पड़ी हैं। अभी मनीष “मेट गाला’ में प्रदर्शित अपने विशेष परिधानों को लेकर चर्चा में हैं। जानते हैं उनकी संघर्ष से सफलता की कहानी…. मुंबई के एक मध्यमवर्गीय पंजाबी परिवार में 5 दिसंबर 1966 को जन्मे मनीष अपने स्कूली दिनों में मां के साथ न सिर्फ साड़ी खरीदने जाते, बल्कि साड़ियों को लेकर उन्हें फैशन टिप्स भी देने लगे थे। यहीं से फैशन और कॉस्ट्यूम डिजाइन के प्रति उनका लगाव बढ़ने लगा। बचपन से ही वे फिल्मों के बेहद शौकीन थे। वे लगभग हर ​फिल्म देखने जाते, लेकिन कलाकारों के अभिनय से ज्यादा मनीष का ध्यान उनके पहनावे पर होता था। कलाकारों के परिधान देख कर वे फैशन की बारीकियां समझने लगे। संघर्ष – डिजाइनिंग की डिग्री नहीं ले पाए, सेट पर लोग कपड़े सिलने वाला बोलते 1980 के दशक में फैशन डिजाइनिंग को पुरुषों का पेशा नहीं माना जाता था। लोग उनका मजाक उड़ाते थे। मनीष कभी डिजाइनिंग की औपचारिक पढ़ाई भी नहीं कर पाए, क्योंकि तब देश में पुरुषों के लिए फैशन डिजाइनिंग कोर्स नहीं होते थे। और विदेश जाकर कोर्स करने के पैसे उनके पास नहीं ​थे। कॅरिअर की शुरुआत में उन्होंने मुम्बई के “इक्विनॉक्स’ बुटीक में महज 500 रुपए महीने की नौकरी की। यहां उन्हें ग्राहकों को कपड़े दिखाने और उन्हें तह करने का काम मिला। खाली समय में मनीष छिप कर डिजाइन स्केच बनाते थे। बॉलीवुड के शुरुआती वर्षों में प्रोड्यूसर उनके डिजाइन को अधिक ग्लैमरस बता कर रिजेक्ट कर देते। सेट पर उनसे कहा जाता कि तुम कपड़े सिलने वाले हो, उन्हें दो और चलते बनो। शुरुआत – “रंगीला’ से बने बॉलीवुड के बड़े चेहरे, जैक्सन की जैकेट डिजाइन की मल्होत्रा ने 1990 में फिल्म “स्वर्ग’ में जूही चावला के लिए कॉस्ट्यूम ​​डिजाइन कर बॉलीवुड में ​डेब्यू किया। मनीष बताते हैं कि “गुमराह’ के लिए उन्हें पहली बार यश जौहर ने 10 हजार रुपए दिए। 1995 में “रंगीला’ में उर्मिला मातोंडकर के आउटफिट ​डिजाइन ने उन्हें रातोंरात बॉलीवुड का बड़ा चेहरा बना दिया। 1996 में माइकल जैक्सन भारत आए थे तो मनीष ने उनकी जैकेट डिजाइन की थी। सफलता – खुद के नाम को ही लग्जरी ब्रांड बनाया, श्रमिकों के कल्याण से भी जुड़े मनीष ने 2005 में अपने नाम से ही डिजाइनर कपड़ों का लग्जरी ब्रांड लॉन्च किया। वे स्किन केयर और ज्वेलरी में भी अपने कलेक्शन लॉन्च कर चुके हैं। आईफा, फिल्मफेयर समेत कई अवॉर्ड उन्हें मिल चुके हैं। वे चिकनकारी की ​महिला श्रमिकों के ​कल्याण की एक सामाजिक संस्था से भी जुड़े हैं। उनकी नेटवर्थ करीब 2500 करोड़ रुपए बताई जाती है।

फीफा वर्ल्ड कप में यलो फीवर:हिट गाने ‘यलो’ की तर्ज पर 9 देशों की किट का रंग पीला; जर्सी का बॉब मार्ले को ट्रिब्यूट

फीफा वर्ल्ड कप में यलो फीवर:हिट गाने ‘यलो’ की तर्ज पर 9 देशों की किट का रंग पीला; जर्सी का बॉब मार्ले को ट्रिब्यूट

अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा की संयुक्त मेजबानी में होने वाले 48 टीमों के फीफा वर्ल्ड कप में इस बार एक खास रंग का खुमार सिर चढ़कर बोल रहा है। यह रंग है पीला। दुनिया के मशहूर रॉक बैंड ‘कोल्डप्ले’ के सुपरहिट गाने ‘यलो’ की तर्ज पर इस बार 9 देशों ने अपनी होम या अवे किट के लिए सुनहरे और पीले रंग को चुना है। दिलचस्प बात यह है कि वर्ल्ड कप फाइनल के हाफ-टाइम शो में यही कोल्डप्ले बैंड अपनी धुनों का जादू बिखेरता नजर आएगा। पीली जर्सी का जिक्र हो और ब्राजील का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। बास्केटबॉल लेजेंड माइकल जॉर्डन के साथ कोलैबोरेशन वाली जर्सी के भारी बज के बावजूद, ब्राजील की असली पहचान उसकी पारंपरिक ‘क्लीन यलो’ होम जर्सी ही है, जो इस बार भी आकर्षण का केंद्र रहेगी। वहीं, दक्षिणी गोलार्ध के रग्बी दिग्गज देश ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका भी अपनी पारंपरिक ‘यलो-गोल्ड’ जर्सी में नजर आएंगे। ऑस्ट्रेलिया को मेजबान अमेरिका, पराग्वे और तुर्किए के साथ रखा गया है, जहां उन पर खासी नजर रहेगी। वहीं, दक्षिण अफ्रीकी टीम मैक्सिको की धरती पर चेक रिपब्लिक और दक्षिण कोरिया से भिड़ेगा। दूसरी ओर, कोलंबिया ने दशकों पुरानी लाल-नीले ट्रिमिंग्स वाली सिंपल पीली जर्सी रखी है। लेकिन पहली बार उतर रहे जमैका की जर्सी इस बार कोलंबिया को भी फीका कर सकती है। जमैका की किट म्यूजिक लेजेंड बॉब मार्ले को ट्रिब्यूट है। इसमें बोल्ड गोल्ड, हरे और रूबी लाल रंग के साथ साउंड वेव्स, विनाइल रिकॉर्ड्स और कैसेट पैटर्न को उकेरा गया है। इसके अलावा ‘ब्लैकस्टार’ घाना की टीम भी पीली जर्सी में नजर आएगी। स्वीडन की जर्सी इस बार 70 के दशक की एनर्जी से प्रेरित है। इसमें उस दौर की जींस और पारंपरिक स्वीडिश लोक परिधानों पर मिलने वाली खास ‘फ्लावर स्टिचिंग’ (फूलों की कढ़ाई) की झलक दिखेगी। कुल मिलाकर टूर्नामेंट में सफेद रंग के अलावा लाल और नीला रंग अभी भी सबसे ज्यादा लोकप्रिय बेस कलर है। हालांकि, इस वर्ल्ड कप में फैंस को नाइजीरिया की क्रिएटिव जर्सी और इटली की टीम की कमी बहुत खलेगी। इटली के फैंस वर्ल्ड कप में अपनी टीम के न होने के गम को भुलाने के लिए कोल्डप्ले के मशहूर दर्द भरे गीत- ‘फिक्स यू’, ‘लॉस्ट’ और ‘द हार्डेस्ट पार्ट’ सुन सकते हैं। टूर्नामेंट के ग्रुप ई में पीले रंग का सबसे ज्यादा दबदबा टूर्नामेंट के ग्रुप ई में पीले रंग का सबसे ज्यादा दबदबा है। पहली बार वर्ल्ड कप खेल रहा कुराकाओ हल्के पीले रंग की जर्सी पहनकर उतरेगा, जिसके कंधों पर विंटेज रेट्रो स्ट्राइप्स हैं। इसी ग्रुप में इक्वाडोर भी है, जिसकी बोल्ड पीली जर्सी के कॉलर पर लिखा है- ‘सपना देखो, आगे बढ़ो और इतिहास बनाओ।’ आइवरी कोस्ट ने भी पीले रंग के बेस में हल्का नारंगी शेड चुना है।

सुकून बेच रहा ट्रैवल सेक्टर, वेलनेस बना प्रीमियम बिजनेस मॉडल:वेलनेस टूरिज्म मार्केट सालाना 7% बढ़ रहा; 5 साल में करीब दोगुना हो जाएगा

सुकून बेच रहा ट्रैवल सेक्टर, वेलनेस बना प्रीमियम बिजनेस मॉडल:वेलनेस टूरिज्म मार्केट सालाना 7% बढ़ रहा; 5 साल में करीब दोगुना हो जाएगा

देश में वेलनेस अब सिर्फ लग्जरी या छुट्टियों का हिस्सा नहीं रह गया। लोग इसे सेहत और मानसिक संतुलन में निवेश की तरह देखने लगे हैं। यही वजह है कि वेलनेस रिट्रीट्स और माइंडफुल ट्रैवल की मांग तेजी से बढ़ रही है। यही वजह है कि होलिस्टिक वेलनेस अनुभव पारंपरिक स्पा कल्चर की जगह ले रहे हैं। इसमें योग, मेडिटेशन, हेल्दी न्यूट्रिशन और माइंडफुल हॉस्पिटैलिटी जैसी सुविधाएं हैं। यात्री अब दिखावे वाली लग्जरी के बजाय मानसिक सुकून वाले अनुभवों को तरजीह दे रहे हैं। वेलनेस का असर अब केवल बड़े होटलों तक सीमित नहीं है। लोग अब भीड़भाड़ से दूर रेंटल विला और शांत होमस्टे को तरजीह दे रहे हैं। स्लीप रिचुअल्स, डिजिटल डिटॉक्स और स्थानीय शुद्ध भोजन ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं। एक सर्वे के मुताबिक, करीब 60% यात्री ट्रिप में कम से कम एक ऐसी गतिविधि जरूर शामिल करते हैं, जिससे उन्हें मानसिक सुकून मिले। यात्री डिजिटल डिटॉक्स, क्लीन ईटिंग, स्लीप-फोकस्ड स्टे को तवज्जो दे रहे खर्च – घरेलू पर्यटन पर 15.5 लाख करोड़ रुपए खर्च कम्युनिकेट इंडिया के मुताबिक, 2024 में भारतीयों ने यात्रा पर 15.5 लाख करोड़ रुपए खर्च किए, जबकि विदेशी पर्यटकों का खर्च महज 3.1 लाख करोड़ रहा। द लीला पैलेस नई दिल्ली के मुताबिक, अब लोग ऊर्जा बढ़ाने वाली पारंपरिक पद्धतियों को तरजीह दे रहे हैं। इसी कारण से व्यक्तिगत थैरेपी को अब दिनचर्या का हिस्सा बनाया जा रहा है। ट्रेंड – होटल वेलनेस और डाइट चार्ट जैसे ऑफर दे रहे होटलों में अब कस्टमाइज्ड वेलनेस चार्ट बनाए जा रहे हैं। इसमें होटल पहुंचने से पहले विशेषज्ञों से परामर्श और चेक-इन के बाद व्यक्तिगत डाइट प्लान जैसे फीचर्स हैं। लोग इस पर होने वाले खर्च को स्वास्थ्य के लिए जरूरी निवेश मानते हैं। यात्री डिजिटल डिटॉक्स (मोबाइल-गैजेट्स से दूरी) और स्लीप-फोकस्ड स्टे को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। स्वीकार्यता – भारत अब दुनिया का टॉप डेस्टिनेशन ग्लोबल वेलनेस इंस्टीट्यूट (जीडब्ल्यूआई) के अनुसार, भारत अब दुनिया के टॉप डेस्टिनेशंस में शामिल हो चुका है। इस साल वैश्विक स्तर पर इस सेक्टर का मूल्य करीब 641 लाख करोड़ रुपए आंका गया है। भारत अपनी आयुर्वेद और योग जैसी पद्धतियों के कारण बड़े पैमाने पर विदेशियों को आकर्षित कर रहा है। आउटलुक – 2030 तक एशिया में सबसे तेज ग्रोथ विशेषज्ञों के मुताबिक, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत इस सेक्टर का इंजन बनकर उभरेगा। जीडब्ल्यूआई का अंदाजा है कि साल 2030 तक इस क्षेत्र की कुल बढ़त का एक बड़ा हिस्सा भारत और चीन से आएगा। इसका कारण मध्यम वर्ग की बढ़ती आय है। भारत का वेलनेस टूरिज्म बाजार अभी 2.9 लाख करोड़ का है। 2031 तक 4.1 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।

51-year-old Manjinder Nagra, who made rugby history, became Britain’s first Sikh sumo wrestler.

51-year-old Manjinder Nagra, who made rugby history, became Britain's first Sikh sumo wrestler.

Hindi News Sports 51 year old Manjinder Nagra, Who Made Rugby History, Became Britain’s First Sikh Sumo Wrestler. गौरव मारवाह. चंडीगढ़16 मिनट पहले कॉपी लिंक तीन बच्चों की मां मनजिंदर अब सूमो रेसलिंग के रिंग में दुनिया को अपनी ताकत दिखाएंगी। जहां लोग 30 की उम्र में रिटायरमेंट का मन बनाने लगते हैं, वहीं पंजाब की बेटी मनजिंदर नागरा ने साबित कर दिया है कि हौसले की एक्सपायरी डेट नहीं होती। 1990 के दशक में ब्रिटेन की पहली सिख महिला रग्बी खिलाड़ी बनकर इतिहास रचने वाली 51 वर्षीय मनजिंदर अब एक नया अध्याय लिखने जा रही हैं। तीन बच्चों की मां मनजिंदर अब सूमो रेसलिंग के रिंग में दुनिया को अपनी ताकत दिखाएंगी। मनजिंदर ने रग्बी तब शुरू की थी, जब एशियाई मूल की महिलाओं के लिए यह खेल बिल्कुल अनजाना था। यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ में पढ़ाई के दौरान उन्होंने रग्बी को चुना और जल्द ही इंग्लैंड स्टूडेंट्स टीम में अपनी जगह पक्की कर ली। वे मैदान पर अकेली एशियाई खिलाड़ी थीं। मनजिंदर का यह सफर सिर्फ खेल बदलने की कहानी नहीं है। सिख गेम्स में एंबेसडर के तौर पर काम करते हुए उनकी मुलाकात सूमो चैंपियन मंदीप सिंह से हुई। उनकी मोटिवेशन पर मनजिंदर ने मार्च 2026 में सूमो इवेंट में कदम रखा। अप्रैल 2026 में उन्होंने अपनी एज कैटेगरी में नेशनल टाइटल जीता। अब जून में स्कॉटलैंड में होने वाली यूरोपियन सूमो रेसलिंग में वे इंग्लैंड का प्रतिनिधित्व करेंगीं। चुनौतियों पर भारी जीत मनजिंदर कहती हैं- दक्षिण एशियाई लड़कियों के लिए ड्रेस कोड और पारिवारिक दबाव जैसी कई बाधाएं हैं। अगर हम कोशिश नहीं करेंगे, तो कभी पता नहीं चलेगा कि हम क्या कर सकते हैं। बेटियों के लिए खोला रास्ता: 6 से 80 खिलाड़ियों तक का सफर मनजिंदर ने लॉ में करियर बनाया और अन्य लड़कियों के लिए भी रास्ता खोला, ताकि वे सपने पूरे कर सकें। – 2016 में शुरुआत में उन्होंने ‘होव रग्बी क्लब’ में लड़कियों के सेक्शन की शुरुआत की। – 6 लड़कियों से शुरू हुआ यह सफर 80 से ज्यादा विमन प्लेयर्स तक पहुंच चुका है। – वे हंगलटन एंड नॉल प्रोजेक्ट के तहत महिलाओं के लिए ‘वॉकिंग रग्बी’ ग्रुप भी चलाती हैं। ये भी सफलताएं मिल चुकी हैं मनजिंदर को – वे सिख गेम्स (2024) की ग्लोबल एंबेसडर रही हैं। गेम्स को प्रमोट किया। – क्रिकेट डिसिप्लिन पैनल की मेंबर के तौर पर भी काम किया है। – वे युवाओं के लिए मोटिवेशनल स्पीकर और मेंटॉर भी हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

'एक था टाइगर' लिखने वाले नीलेश मिश्रा का इंटरव्यू:‘कूद’ के जरिए मैं एक्टिंग के किंडरगार्टन में आया, शोहरत ही अंतिम लक्ष्य नहीं

'एक था टाइगर' लिखने वाले नीलेश मिश्रा का इंटरव्यू:‘कूद’ के जरिए मैं एक्टिंग के किंडरगार्टन में आया, शोहरत ही अंतिम लक्ष्य नहीं

पत्रकार, कहानीकार, गीतकार और अब अभिनेता के तौर पर नई पारी शुरू कर चुके नीलेश मिश्रा इन दिनों फिल्म ‘कूद’ को लेकर चर्चा में हैं। यह उनके यू-ट्यूब चैनल पर रिलीज हुई है। इस पर उन्होंने खुलकर बातचीत की… क्या एक्टिंग हमेशा से आपके सपनों का हिस्सा थी? सच कहूं तो मैंने कभी खुद को अभिनेता के तौर पर देखा ही नहीं था। कॉलेज के दिनों में एक नाटक लिखा था। उसमें मुख्य भूमिका एक दोस्त को करनी थी, लेकिन आखिरी वक्त पर उसने मना कर दिया। तब मजबूरी में मुझे खुद मंच पर उतरा। उसके बाद जीवन रेडियो, लेखन और कहानियों में आगे बढ़ गया। फिर एक बार विशाल भारद्वाज ने एक मुलाकात में कहा कि अभिनय में 60 प्रतिशत हिस्सा आवाज का होता है। अब जब ‘कूद’ के जरिए कैमरे के सामने आया हूं तो लगता है कि मैं अभी एक्टिंग के किंडरगार्टन में हूं। फिल्म के विषय पर आपके क्या विचार हैं? ‘अपनी मर्जी की मौत’ का अधिकार एक बहुत ही जटिल और दार्शनिक बहस है। जब कोई व्यक्ति किसी रिश्ते में होता है, तो सामने वाला उसमें अपनी संवेदनाएं और जीवन का हिस्सा निवेश करता है। मेरा मानना है कि हमें अपनी मर्जी की मौत के बजाय अपनी मर्जी की जिंदगी की तलाश करनी चाहिए। आपने ‘महारानी’ जैसी चर्चित वेब सीरीज छोड़ दी थी। आखिर ऐसा क्यों किया? ‘महारानी’ सीरीज का प्रस्ताव आया तो मैं लखनऊ से मुंबई गया, लेकिन मेरी एक शर्त थी कि स्क्रीन पर गाली-गलौज नहीं करूंगा। वर्कशॉप के पहले दिन ही एहसास हुआ कि ओटीटी कंटेंट की मांग मेरी ‘लक्ष्मण रेखा’ के बाहर हैं तो मैंने उसी शाम मुकेश छाबड़ा से मुक्त करने की विनती कर दी थी। आज गालियों और आक्रामक भाषा को ‘रियलिज्म’ भी तो कहा जाता है? मेरी परवरिश, संवेदनाएं और भाषा अलग है। मेरा मानना है कि शालीनता भी उतनी ही प्रभावशाली होती है। संवाद की ताकत सिर्फ गाली में नहीं, भाव में भी होती है। अगर मैं अपने मन के खिलाफ जाकर कुछ करूंगा तो वह ईमानदार अभिनय नहीं रह जाएगा। आपकी सफलता का रहस्य क्या है? मेरी सबसे बड़ी ताकत है- ‘किसी चीज के बारे में पहले से न जानना’। जब मैंने रेडियो पर कहानियां सुनाना शुरू किया, मुझे नहीं पता था कि यह कैसे होता है। जब ‘गांव कनेक्शन’ शुरू किया, तो मुझे बिजनेस की जानकारी नहीं थी। यह मेरे लिए एक बिजनेस नहीं, बल्कि ‘मिशन’ था। बस मुझे यह पता था कि गांवों की आवाज को मंच देना है। मैंने अपनी सारी जमा-पूंजी, अपना घर, सब कुछ उसमें लगा दिया। जब कैमरा के सामने इंटरव्यू लेना शुरू किया था तो मुझे कैमरा एंगल्स का ज्ञान नहीं था। चूंकि मुझे पता नहीं था कि यह कैसे किया जाता है, इसलिए मैंने इसे अपने तरीके से किया। यही अनभिज्ञता ही मुझे नए प्रयोग करने की आजादी देती है। मेरा जीवन एक खूबसूरत जर्नी है, जिसे मैं अपनी शर्तों और सादगी के साथ जी रहा हूं। आपके लिए जीवन की सबसे बड़ी विरासत क्या है। लोग आपको कैसे याद रखें? जब मैं पीछे मुड़कर देखूं तो अफसोस कम से कम हो। लोग मुझे एक ईमानदार इंसान और संवेदनशील रचनाकार के रूप में याद रखें। शोहरत आए या न आए, आपकी प्रामाणिकता, शालीनता और ईमानदारी ही अंत में असली विरासत बनती है।

चेस कोई सस्ता खेल नहीं:एक ग्रैंडमास्टर बनने में खर्च होते हैं 50 से 70 लाख रुपए, हालिया ग्रैंडमास्टर्स के माता-पिता को बेचने पड़े गहने

चेस कोई सस्ता खेल नहीं:एक ग्रैंडमास्टर बनने में खर्च होते हैं 50 से 70 लाख रुपए, हालिया ग्रैंडमास्टर्स के माता-पिता को बेचने पड़े गहने

अक्सर लोगों को लगता है कि शतरंज एक सस्ता खेल है, क्योंकि इसमें अन्य खेलों की तरह महंगे उपकरण, बड़े स्टेडियम या स्पोर्ट्स साइंस टीम की जरूरत नहीं होती। लेकिन भारत के नए शतरंज ग्रैंडमास्टर्स की सफलता की सच्चाई ने इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया है। असलियत यह है कि आज एक बच्चे को ग्रैंडमास्टर (जीएम) बनाने में 50 से 70 लाख रुपए का भारी खर्च आता है। हाल ही में भारत के 95वें ग्रैंडमास्टर बने आरोन्यक घोष और 94वें ग्रैंडमास्टर मयंक चक्रवर्ती के परिवारों का संघर्ष इसका जीता-जागता प्रमाण है। आरोन्यक के पिता मृणाल घोष बताते हैं कि उन्होंने अपने बेटे के ऊपर पिछले 15 सालों में लगभग 46 लाख रुपए खर्च किए। उनका मानना है कि भारत में जीएम बनने के लिए यह शायद सबसे कम राशि है। बैंकॉक चेस क्लब ओपन में तीसरा और अंतिम जीएम नॉर्म हासिल करने वाले आरोन्यक के लिए पिता को पुश्तैनी जमीन और मां संचिता को शादी के गहने बेचने पड़े। इनामी राशि की पाई-पाई खेल में वापस लगा दी गई। वहीं, पूर्वोत्तर भारत के इकलौते जीएम मयंक की मां मोनोमिता चक्रवर्ती कहती हैं कि शुरुआत से जीएम बनने तक माता-पिता को 70 लाख रुपए तैयार रखने चाहिए। यह सिर्फ जीएम बनने तक का खर्च है। 12 वर्षीय फीडे मास्टर (जीएम से दो कदम पीछे) आरव सरबलिया के पिता यतिन का अनुमान है कि केवल 2025 में उन्होंने आरव पर 25-30 लाख रुपए खर्च किए। वे टूर्नामेंट के लिए 4 महीने तक विदेश में रहे। स्पॉन्सरशिप न मिलने पर उन्होंने कमाई के लिए सोशल मीडिया पर कंटेंट बनाना शुरू कर दिया। चेस में सबसे बड़ा खर्च कोचिंग है। ग्रैंडमास्टर कोच की फीस 10,000 से 20,000 रुपए प्रति घंटा होती है और एक से ज्यादा कोच रखने पड़ते हैं। नॉर्म्स के लिए साल में 6-8 यूरोप दौरों का खर्च 15-20 लाख रुपए आता है। प्रैक्टिस के लिए ट्रेनिंग पार्टनर और ‘सेकेंड्स’ (जो मैच की तैयारी कराते हैं) को घंटे के हिसाब से भारी फीस देनी पड़ती है। कई बार ये कोच इनामी राशि में भी हिस्सा मांगते हैं। मृणाल घोष कहते हैं कि 2500 रेटिंग पार कर जीएम बनने पर आयोजक रुकने व फ्लाइट का खर्च उठाते हैं, लेकिन मेरा बेटा 2550 रेटिंग पर है। इसे 2650 तक ले जाने में इतना पैसा लगेगा कि मैं सपने देखने से भी डरता हूं। स्पॉन्सरशिप मुश्किल, शेयरिंग अपार्टमेंट्स में रहते हैं – चेस के खेल में स्पॉन्सर मिलना मुश्किल है। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया की प्रोत्साहन राशि भी बंद हो गई है। ऐसे में गुवाहाटी से आने वाले मयंक को विदेशी दौरे पर कनेक्टिंग फ्लाइट का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। – खर्च बचाने के लिए परिवार यूरोप में सस्ते शेयरिंग अपार्टमेंट में रुकते हैं और घर का खाना ले जाते हैं।