Sunday, 19 Apr 2026 | 06:27 PM

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भारत की लोक परंपराओं से सीखें खुश रहने के सूत्र:हैप्पीनेस का फॉर्मूला हमारी संस्कृति में; उत्तराखंड के फूलदेई त्योहार से केरल की नौका दौड़ तक, ये परंपराएं सिखाती हैं जीना

भारत की लोक परंपराओं से सीखें खुश रहने के सूत्र:हैप्पीनेस का फॉर्मूला हमारी संस्कृति में; उत्तराखंड के फूलदेई त्योहार से केरल की नौका दौड़ तक, ये परंपराएं सिखाती हैं जीना

हर साल वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में नॉर्वे-स्वीडन जैसे देश शीर्ष पर रहते हैं, लेकिन खुशी के जो सिद्धांत वहां मापे जाते हैं, जैसे- सामाजिक भरोसा, सामूहिक जीवन, प्रकृति से जुड़ाव, रिश्तों की मजबूती। वे भारत की लोक परंपराओं में सदियों से मौजूद हैं। देश की ये अलग-अलग परंपराएं बताती हैं कि खुशी कोई भावना नहीं, बल्कि जीने का तरीका है। सामूहिकता साथ हो तो मुश्किल भी आसान लगती है – भारत की कई परंपराएं ‘मैं’ नहीं, ‘हम’ पर आधारित हैं। – उत्तराखंड में फूलदेई का त्योहार हर साल चैत्र माह की शुरुआत में मनाया जाता है। सर्दियों के बाद जब पहाड़ों में नए-नए फूल खिलते हैं, तब बच्चे घर-घर जाकर दहलीज पर फूल सजाते हैं और सबके सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। पूरा गांव एक-दूसरे के दरवाजे से जुड़ता है और बसंत का स्वागत अकेले नहीं, बल्कि सामूहिक खुशी के साथ करता है। – केरल की वल्लम कली (नौका दौड़) में 100 से भी ज्यादा लोग एक लंबी नाव में सवार होकर एक ही ताल और लय में चप्पू चलाते हैं। यह इस बात को दर्शाता है कि इतने लोग एक लक्ष्य के लिए पूरी एकता के साथ साथ चल रहे हैं। कृतज्ञता शुक्रिया कहना सिखाता है; जो है, वही काफी है – ओडिशा की नुआखाई में नई फसल पहले धरती और देवी को अर्पित की जाती है, फिर गांव साथ खाना खाता है। कृतज्ञता हमें सिखाती है कि जो है, वही काफी है। – तमिलनाडु का कोलम सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि छोटे जीवों के लिए भोजन है। यानी दिन की शुरुआत ही दान से होती है। रिश्ते और संवाद, अकेलेपन का सबसे बड़ा इलाज – असम में ‘भेलघर’ नाम का अस्थायी घर बनाकर लोग रात भर साथ जश्न मनाते हैं और अगली सुबह उसे जला देते हैं। यह सिखाती है कि खुशी लोगों के बीच होती है। – नागालैंड का मोरुंग सामुदायिक केंद्र है। बुजुर्ग युवाओं को जीवन कौशल सिखाते हैं, इससे पीढ़ियों के बीच जुड़ाव बना रहता है। प्रकृति और धैर्य, स्थायी खुशियों का सूत्र – मेघालय में खासी और जयंतिया जनजाति के लोग पेड़ों की जीवित जड़ों को मोड़-तोड़कर पुल बनाते हैं। ये पुल प्रकृति के साथ मिलकर तैयार होते हैं और पूरी तरह बनने में 15 से 30 साल लग जाते हैं। यह परंपरा हमें धैर्य और दूरदृष्टि सिखाती है। आज मेहनत करके आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ टिकाऊ बनाना ही संतोष है। भरोसा, जिंदगी में कोई भी डर मायने नहीं रखता – गुजरात के डांग क्षेत्र के आदिवासी इलाकों में होली के दौरान एक साहसिक परंपरा निभाई जाती है। लोग एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर मानव मीनार बनाते हैं और उस पर नाचते हैं। – सीख: यह परंपरा आपसी भरोसा सिखाती है… ऊपर खड़ा व्यक्ति जानता है कि नीचे खड़े लोग उसे गिरने नहीं देंगे।

अमेरिका में बच्चों के लिए ‘द बैलेंस प्रोजेक्ट’:फोन-फ्री बचपन; असली दुनिया को इतना दिलचस्प बनाइए कि बच्चे स्क्रीन भूल जाएं

अमेरिका में बच्चों के लिए ‘द बैलेंस प्रोजेक्ट’:फोन-फ्री बचपन; असली दुनिया को इतना दिलचस्प बनाइए कि बच्चे स्क्रीन भूल जाएं

अमेरिका के न्यू जर्सी राज्य के लिटिल सिल्वर शहर में 7 साल की मौली रोज साइकिल से अकेले स्कूल जाती है। कुछ समय पहले तक यह सामान्य बात थी, लेकिन आज के स्क्रीन-डोमिनेटेड दौर में यह आंदोलन बन चुका है। मौली और उसके दोस्त ‘द बैलेंस प्रोजेक्ट’ नाम की पहल का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य बच्चों को मोबाइल से दूर कर स्वतंत्र बचपन लौटाना है। यह पहल अभिभावकों द्वारा शुरू की गई है। उन्होंने शहर में सुरक्षित साइकिल रूट मैप बनाए, बच्चों के लिए ‘बाइक-बडी’ समूह बनाए और स्कूलों में फोन-फ्री माहौल की मांग की। रेस्टोरेंट में बच्चों को मोबाइल देने के बजाय बैलेंस बॉक्स दिए जाते हैं…, जिनमें रंग, खिलौने और छोटे गेम होते हैं। पहल का लक्ष्य असली दुनिया को इतना रोचक बनाना है कि बच्चे खुद स्क्रीन छोड़ दें। विशेष साइकिल रूट मैप, बाइक-बडी जैसे समूह बने इसके तहत पार्क, प्ले-स्पेस और थर्ड स्पेस यानी घर और स्कूल से अलग मिलने-जुलने की जगहें विकसित की जा रही हैं। सर्वे बताते हैं कि ज्यादातर बच्चे ऑनलाइन रहने के बजाय दोस्तों के साथ बाहर खेलना पसंद करते हैं, लेकिन अवसर नहीं मिलते।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं चरमराईं:प्रोबेशन में ही शहर चले गए 158 डॉक्टर, इलाज के बजाय कर रहे बाबूगीरी

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं चरमराईं:प्रोबेशन में ही शहर चले गए 158 डॉक्टर, इलाज के बजाय कर रहे बाबूगीरी

2 फरवरी… पचमढ़ी में गैस सिलेंडर ब्लास्ट के बाद 6-7 झुलसे लोग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे। यहां डॉक्टर नहीं मिले। सबको पिपरिया रेफर कर दिया। 15 मार्च… लीवर सिरोसिस का मरीज तड़पता हुआ यहां लाया गया। इस बार भी रेफर करना पड़ा। यह तस्वीर प्रदेश के अकेले हिल स्टेशन पचमढ़ी की है। यहां अस्पताल तो है, लेकिन डॉक्टर एक भी नहीं। जो एक डॉक्टर यहां आए भी थे, उन्हें नियम विरुद्ध तरीके से दूसरे अपस्ताल में अटैच कर दिया गया। प्रदेश के 43 सामुदायिक और 445 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं, जहां मरीज पहुंचते हैं… लेकिन डॉक्टर नहीं मिलते। मप्र में डॉक्टरों के अटैचमेंट और गैर-चिकित्सीय कार्य लेने से ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह चरमरा गईं हैं। प्रदेश में 158 डॉक्टरों को जिलों और ब्लॉक अस्पतालों से हटाकर बड़े शहरों में अटैच कर दिया गया जबकि प्रोबेशन में अटैचमेंट का प्रावधान नहीं है। पचमढ़ी के अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं, सिर्फ एक नर्स 12 हजार की आबादी वाले पचमढ़ी के 30 बिस्तरों वाले सामुदायिक अस्पताल में एक भी डॉक्टर नहीं है। सभी के अटैचमेंट हो चुके हैं। सिर्फ एक स्टॉफ नर्स अशोका वर्मा हैं। वे सिर्फ रेफर करती हैं। वे कहती हैं- डॉक्टर नहीं है, इसलिए न ओपीडी पर्ची बनेंगी और ना दवाएं दी जाएंगी। छतरपुर के बारीगढ़ में बस पैरामेडिकल स्टाफ छतरपुर के 30 पलंग वाले बारीगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एक भी डॉक्टर नहीं बचा। यहां पदस्थ डॉ. ललिता यादव को अटैच कर राष्ट्रीय कार्यक्रम में लगा दिया है। अब मरीज आते हैं तो उन्हें पैरामेडिकल स्टाफ देखता है और छतरपुर रेफर कर देता है। “अभी हमारे यहां चिकित्सकों की भर्ती होने वाली है, उसमें पूर्ति की जाएगी। अटैचमेंट को लेकर भी जानकारी मंगाई जा रही है। यदि ऐसी स्थिति है तो कार्रवाई की जाएगी।” – एस. धनराजू, आयुक्त स्वास्थ्य

अमेरिका की वर्ल्ड कप जर्सी की कहानी:2022 के विद्रोह के बाद खिलाड़ियों ने खुद तय की 2026 की डिजाइन; अवे जर्सी तो नाइट क्लब में पहन सकते हैं

अमेरिका की वर्ल्ड कप जर्सी की कहानी:2022 के विद्रोह के बाद खिलाड़ियों ने खुद तय की 2026 की डिजाइन; अवे जर्सी तो नाइट क्लब में पहन सकते हैं

जून में शुरू हो रहे 2026 फीफा वर्ल्ड कप का खुमार छाने लगा है। इस बीच, अमेरिकी पुरुष फुटबॉल टीम ने इस महाकुंभ के लिए अपनी नई जर्सी लॉन्च की है। लेकिन इस जर्सी के पीछे सिर्फ डिजाइनरों की मेहनत नहीं है, बल्कि खिलाड़ियों की एक दिलचस्प बगावत की कहानी भी छिपी है। यह किट खिलाड़ियों ने खुद अपनी पसंद और शर्तों पर तैयार करवाई है। इसकी शुरुआत जून 2022 में टेक्सास के ऑस्टिन शहर से हुई। अमेरिकी टीम 2022 वर्ल्ड कप की अपनी नई किट के फोटोशूट के लिए वहां मौजूद थी। लेकिन जब खिलाड़ियों ने वह जर्सी देखी, तो वे भड़क गए। टीम के स्टार मिडफील्डर टायलर एडम्स ने तब कहा था, ‘हमें नहीं लगा कि यह किट हमारी सही पहचान पेश करती है।’ नाराजगी इस कदर थी कि खिलाड़ियों ने सेट पर काम रोक दिया। लगभग 30 मिनट तक शूटिंग रुकी रही, जिससे नाइकी और अमेरिकी फेडरेशन के अधिकारियों के बीच अफरा-तफरी मच गई। बाद में जैसे-तैसे शूट पूरा हुआ, लेकिन खिलाड़ियों की इस बगावत ने फेडरेशन को कड़ा संदेश दे दिया था। 2022 के उस अनुभव के बाद नाइकी और अमेरिकी सॉकर ने 2026 वर्ल्ड कप के लिए रणनीति पूरी तरह बदल दी। इस बार बंद कमरों में डिजाइन फाइनल करने के बजाय, खिलाड़ियों को शुरुआत से ही इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया। नवंबर 2023 और 2024 में कई ट्रेनिंग कैंप्स के दौरान नाइकी के डिजाइनरों ने खिलाड़ियों को एक-एक कर मीटिंग में बुलाया। उनसे पूछा गया कि वे कैसी जर्सी चाहते हैं और उनके लिए अमेरिका का प्रतिनिधित्व करने का क्या मतलब है। टायलर एडम्स कहते हैं, ‘इस बार हमने सचमुच हर एक चीज खुद चुनी है।’ खिलाड़ियों और डिजाइनरों की लंबी माथापच्ची के बाद दो जर्सी तैयार की गईं। होम जर्सी पर लाल और सफेद स्ट्रिप्स हैं। खिलाड़ी चाहते थे कि ब्राजील के पीले या नीदरलैंड्स के नारंगी रंग की तरह अमेरिका की भी एक पक्की पहचान हो। इसलिए इस जर्सी में अमेरिकी झंडे की लहराती हुई धारियों को शामिल किया गया। यह उन जोशीले फैंस के लिए है, जो स्टैंड्स में ‘U-S-A’ के नारे लगाते हैं। वहीं, अवे जर्सी ऐसी है, जिसे पहनकर नाइट क्लब में भी जा सकते हैं। इसके लिए जब नाइकी ने पहली बार सितारों वाला एक चमकीला डिजाइन दिखाया, तो खिलाड़ियों ने उसे रिजेक्ट कर दिया। खिलाड़ियों की एक खास मांग थी, ‘हमें एक ऐसी कूल जर्सी चाहिए, जिसे हम जींस के साथ पहनकर किसी क्लब में भी जा सकें।’ इसके बाद डिजाइन को बदला गया और इसे लगभग काले रंग का बनाया गया, जिसमें पास से देखने पर चमकते हुए सितारे नजर आते हैं। खिलाड़ियों का मानना है कि यह 2026 की नई जर्सी सिर्फ एक कपड़े का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से उनकी और उनके देश की भावना का प्रतिनिधित्व करती है।

घर के बाहर से मंडी व्यापारी की कार चोरी

घर के बाहर से मंडी व्यापारी की कार चोरी

चिमनगंज थाना क्षेत्र में चोर सक्रिय हो गए। यहां रतन एवेन्यू कॉलोनी में रहने वाले मंडी व्यापारी विकास अग्रवाल की घर के बाहर खड़ी कार बदमाश चुरा ले गए। सीसीटीवी कैमरे में पांच बदमाश दिखाई दिए हैं। इसी तरह अगस्त 2025 में भी चिमनगंज थाना क्षेत्र में ही कानीपुरा मार्ग की कॉलोनी में बदमाशों का गिरोह आया था और एक साथ चार बाइके चुरा ले गए थे। कोचिंग संचालक अमित सक्सेना के घर दो गाड़ियां थी, लेकिन बदमाश अब तक नहीं पकड़ाए। अब मंडी व्यापारी की घर के बाहर खड़ी कार को बदमाश चुरा ले गए। पांच बदमाश सीसीटीवी में कैद हुए, जो बाइक पर सवार होकर आए थे और चंद मिनट में घर के बाहर खड़ी कार का लॉक खोलकर उसमें दो बदमाश गाड़ी में बैठकर बेखौफ उसे ले गए। बदमाश अन्य कैमरों में कैद हुए और कार को कानीपुरा मार्ग की तरफ ले जाते दिखाई दिए। व्यापारी अग्रवाल ने कुछ साल पहले ही कार खरीदी थी। बुधवार सुबह उन्होंने चिमनगंज थाने पहुंच पुलिस को चोरी की घटना से अवगत कराते हुए रिपोर्ट की।

आयरलैंड में सेंट पैट्रिक्स डे की धूम:हरे रंग में रंगी राजधानी डबलिन, 5 लाख पर्यटक पहुंचे

आयरलैंड में सेंट पैट्रिक्स डे की धूम:हरे रंग में रंगी राजधानी डबलिन, 5 लाख पर्यटक पहुंचे

आयरलैंड के सबसे बड़े नेशनल फेस्टिवल ‘सेंट पैट्रिक्स डे’ के मौके पर राजधानी डबलिन में चार दिनों से जश्न का माहौल है। इस महोत्सव में दुनियाभर से करीब 5 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए। उत्सव का मुख्य आकर्षण 17 मार्च को निकाली गई नेशनल परेड रही। इस दौरान सड़कों पर अंतरराष्ट्रीय मार्चिंग बैंड, डांसर और रंग-बिरंगी झांकियां नजर आईं। पूरा शहर हरे रंग में रंगा दिखा इस सेंट पैट्रिक दिवस पर डबलिन में जिधर भी देखो हरा रंग ही दिखाई दे रहा था और दुनिया भर के विभिन्न लहजे सुनाई दे रहे थे। उत्सव का माहौल पूरे जोश में था और आयरलैंड के राष्ट्रपति माइकल डी हिगिंस के सामने एक विशाल परेड निकाली गई। आयरलैंड की राजधानी में आए वैश्विक आगंतुकों ने हरे रंग के विभिन्न रंगों के परिधान पहने हुए थे, और आयरिश पारंपरिक संगीत, स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मार्चिंग बैंड और सड़कों पर लगातार चलने वाले मनोरंजन की धुनें सुनाई दे रही थीं। डबलिन समेत कई इलाकों में भी सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। यह उत्सव आयरलैंड के संरक्षक संत ‘सेंट पैट्रिक’ की पुण्यतिथि पर आयोजित होता है, जिन्होंने 5वीं सदी में यहां ईसाई धर्म का प्रचार किया था। साल 1631 में चर्च से धार्मिक मान्यता मिलने के बाद अब यह एक वैश्विक सांस्कृतिक महोत्सव बन चुका है। पहली बार परेड 1931 में हुआ था।

कम वेतन पर काम को मजबूर युवा:खेती छोड़कर गांव से निकले, पर शहरों में स्थायी नौकरी मुश्किल, 15 हजार आईटीआई फिर भी स्किल की कमी

कम वेतन पर काम को मजबूर युवा:खेती छोड़कर गांव से निकले, पर शहरों में स्थायी नौकरी मुश्किल, 15 हजार आईटीआई फिर भी स्किल की कमी

देश का युवा अब खेती में भविष्य नहीं देखता। वह अच्छी नौकरी और बेहतर लाइफ स्टाइल के लिए गांवों से निकलकर शहर जा रहा है। लेकिन वहां न तो स्थायी नौकरी मिल रही है और न ही पढ़ाई और मेहनत के हिसाब से वेतन। नतीजतन सबसे ऊर्जावान वर्ग एक ऐसे चक्र में फंसता जा रहा है, जहां काम तो है पर तरक्की नहीं। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ के मुताबिक, 1983 से 2023 के बीच खेती में 20-29 साल के युवाओं की हिस्सेदारी 56% से घटकर 27% रह गई। लेकिन शहरों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, स्किल की कमी और कमजोर जॉब मार्केट के बीच युवाओं को मुफीद काम नहीं मिल रहा है। देश में स्किल डेवलपमेंट का ढांचा, खास तौर पर आईटीआई तेजी से फैले हैं। लेकिन कई नए संस्थान प्रशिक्षण के मामले में राष्ट्रीय मानकों पर खरे नहीं उतरते। देश में 15,000 से ज्यादा आईटीआई हैं, फिर भी उद्योगों को स्किल वर्कर्स नहीं मिल पा रहे हैं। पहले आईटीआई शहरों और औद्योगिक केंद्रों के आसपास बनाए जाते थे, ताकि ट्रेनिंग के बाद सीधे नौकरी मिल सके। लेकिन अब 70% नए आईटीआई गांवों में खुल रहे हैं और ज्यादातर ट्रेनिंग वहीं हो रही है। दूसरी तरफ 66% कारखानें शहरों में हैं। यानी जहां स्किल तैयार हो रही है, वहां नौकरी नहीं है और जहां नौकरी है, वहां स्किल की सप्लाई नहीं है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि काम में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। लेकिन इसका बड़ा हिस्सा बिना वेतन के पारिवारिक काम या छोटे-मोटे स्वरोजगार से आता है, जहां न तो स्थिर आमदनी होती है न पहचान। इसके चलते शहरों में पढ़ी-लिखी महिलाएं अब गिग वर्क या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की तरफ जा रही हैं, ताकि नौकरी और घर की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बना सकें। इन कामों में लचीलापन तो है, पर नौकरी की सुरक्षा और स्थिरता नहीं है। रिपोर्ट कहती है कि सिर्फ स्किल डेवलपमेंट से समस्या हल नहीं होगी। जब तक बड़े पैमाने पर सुरक्षित नौकरियां नहीं होंगी, युवा आबादी कम उत्पादक कामों में ही उलझी रहेगी। 7% से भी कम ग्रेजुएट्स एक साल के भीतर स्थायी नौकरी पा रहे, 12वीं पास में यह औसत सिर्फ 4% रिपोर्ट बताती है कि भारत में 7 फीसदी से भी कम ग्रेजुएट्स को एक साल के भीतर स्थायी नौकरी मिलती है। 12वीं पास युवाओं में तो यह आंकड़ा 4 फीसदी ही है। वाइट-कॉलर जॉब, मसलन ऑफिस एग्जीक्यूटिव, बैंक कर्मचारी, आईटी प्रोफेशनल में हालात ज्यादा नाजुक हैं। ग्रेजुएट्स में बस 3.7 फीसदी को और 12वीं पास युवाओं में सिर्फ 1.5 फीसदी को ऐसी नौकरियां मिल पाती हैं।

अमेरिका में शराब की खपत घटी, कमाई पर बड़ा झटका:सर्वे 31% ऑपरेटर्स ने शराब बिक्री में गिरावट की बात कही

अमेरिका में शराब की खपत घटी, कमाई पर बड़ा झटका:सर्वे 31% ऑपरेटर्स ने शराब बिक्री में गिरावट की बात कही

अमेरिका में शराब की खपत घट रही है। इसका सबसे बड़ा असर रेस्तरां बिजनेस पर पड़ रहा है। 2025 के गैलप पोल के मुताबिक अमेरिका में शराब पीने वालों की हिस्सेदारी निचले स्तर पर है। सिर्फ 54% लोगों ने कहा कि वे शराब पीते हैं। जो पीते हैं, वे भी पहले से कम पी रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण सेहत पर असर और शराब की कीमतों में बढ़ोतरी माना जा रहा है। 2025 में 31% अमेरिकी ऑपरेटर्स ने शराब बिक्री में गंभीर गिरावट की बात कही। न्यू जर्सी के मोंटक्लेयर में रेस्टोरेंट चलाने वाले डेमन वाइज ने बताया कि पहले उनकी कमाई का फॉर्मूला 40% खाना और 60% शराब था। पहले 50-50 हुआ। फिर 70% कमाई खाने से और सिर्फ 30% शराब से आने लगी। मिलेनियल्स ने कम की शराब, जेन-जी ने फेरा मुंह टेक्नोमिक की 2026 रिपोर्ट के अनुसार, शराब के सबसे बड़े शौकीन रहे मिलेनियल्स (31-45 वर्ष) अब इससे दूरी बना रहे हैं। वहीं जेन-जी युवा उस खालीपन को नहीं भर पा रहे हैं। वे रेस्टोरेंट में अक्सर सिर्फ एक ड्रिंक और फोटो तक सीमित हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक महंगाई या कैनाबिस जैसे विकल्पों के कारण नई पीढ़ी शराब पर पैसा खर्च नहीं करना चाहती। सेहत, आदतें और जीएलपी-1 दवाएं भी एक बड़ी वजह जनवरी 2025 में यूएस सर्जन जनरल विवेक मूर्ति की रिपोर्ट में हल्की या मध्यम शराब खपत को भी कैंसर रिस्क से जोड़ा गया। इसके अलावा सेहत को लेकर बढ़ती जागरूकता, पीढ़ियों की बदलती आदतें और करीब 6% अमेरिकियों का जीएलपी-1 दवाओं का इस्तेमाल भी वजह मानी जा रही है। इन दवाओं से शराब की इच्छा कम होने के संकेत मिले हैं। महंगी शराब और बेरोजगारी ने तोड़ी युवाओं की कमर लॉस एंजिल्स के व्यवसायी डस्टिन लैंकेस्टर के अनुसार बढ़ती लागत युवाओं को शराब से दूर कर रही है। पहले व्हिस्की और बीयर 8 डॉलर यानी करीब 730 रुपए में मिल जाती थी, जिसकी कीमत अब 20 डॉलर यानी 1,800 रुपए तक पहुंच गई है। टेक्नोमिक रिपोर्ट के मुताबिक 9.2% बेरोजगारी दर के कारण जेन-जी की जेब पर भी दबाव बढ़ा है।

बीसीजी रिपोर्ट-अंतिम: यूएस में भारतवंशियों का कितना दमखम:सत्ता से दूर, अमेरिका के निचले सदन में 1%, सीनेट में कोई भारतवंशी नहीं

बीसीजी रिपोर्ट-अंतिम: यूएस में भारतवंशियों का कितना दमखम:सत्ता से दूर, अमेरिका के निचले सदन में 1%, सीनेट में कोई भारतवंशी नहीं

जहां पैसे और नॉलेज की बात आती है तो भारतीय मूल के अमेरिकी अपनी जनसंख्या से कहीं आगे हैं, लेकिन जब सत्ता और प्रतिनिधित्व की बात होती है, तो वहां वे अपनी जनसंख्या के अनुपात तक भी नहीं पहुंचे हैं। यानी यह समुदाय अमेरिका को बनाने में तो बड़ी भूमिका निभा रहा है, लेकिन अमेरिका की दिशा तय करने में उसकी भूमिका अभी बहुत छोटी है। बीसीजी और इंडियास्पोरा द्वारा तैयार रिपोर्ट ‘अमेरिका में भारतवंशियों के दमखम की कहानी’ के आखिरी हिस्से में पढ़िए, अमेरिका की सत्ता में भारतवंशियों का कितना वजन है? अमेरिका में भारतवंशियों की राजनीतिक यात्रा 1955 में एक सांसद से शुरू होकर 6 सांसदों तक ही पहुंच पाई है। मतलब अमेरिकी संसद में अब भी भारतवंशियों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। उच्च सदन सीनेट में तो एक भी भारतवंशी नहीं है। 2024 के चुनावों के बाद निचले सदन में भारतवंशियों की संख्या बढ़कर 6 हो गई। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने काश पटेल को एफबीआई डायरेक्टर बनाया है। डॉक्टर जय भट्टाचार्य को नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया है। श्रीराम कृष्णन को सरकार के लिए एआई नीति मार्गदर्शन के लिए अहम भूमिका सौंपी गई, जो भारतवंशियों की बढ़ती मौजूदगी दर्शाता है। संसद; 435 सीटों में 6 पर ही भारतवंशी – अमेरिकी संसद के निचले सदन (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) की कुल 435 सीटों में से केवल 6 सीटों (1.4%) पर भारतवंशी। – 2012 से पहले केवल दो भारतवंशी पहुंचे थे। 1955 में दलीप सिंह सौंद और 2004 में बॉबी जिंदल। 2012 में अमी बेरा के बाद धीरे-धीरे यह संख्या अब आधा दर्जन हो पाई है। – उच्च सदन यानी सीनेट में इस वक्त एक भी भारतवंशी नहीं है। 100 सीनेटर होते हैं, 50 राज्यों से 2-2, निचले सदन से पास बिल में सीनेट की मुहर जरूरी। – कमला हैरिस 2016 में पहली भारतीय-अमेरिकी उच्च सदन की सदस्य बनीं। 2020 में उपराष्ट्रपति बनने के बाद उच्च सदन में कोई भारतवंशी नहीं है। शीर्ष सरकारी एजेंसियों में… सिर्फ 3% – हेल्थकेयर और साइंस के क्षेत्र में भारतवंशियों का बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन ‘सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल’ (सीडीसी) और ‘नेशनल साइंस फाउंडेशन’ (एनएसएफ) जैसी अमेरिका की शीर्ष सरकारी एजेंसियों के उच्च पदों पर केवल 3% भारतवंशी। – मतलब ये कि काम करने की जगह पर तो भारतवंशियों की हिस्सेदारी 10% है, पर फैसले लेने वाली जगह पर 3% ही है। – किस शोध को पैसा मिले, किस विश्वविद्यालय को अनुदान मिले, किस तकनीक पर निवेश हो… ये सब यही संस्थान तय करते हैं। – इन पदों पर भारतीय-अमेरिकी कम होने से उनके समुदाय की जरूरतें, उनके शोध के विषय व प्राथमिकताएं पीछे रह जाती हैं। जबकि चुनाव में ये बड़े गेम चेंजर हैं – अमेरिका के कुल योग्य वोटर्स में भारतवंशियों की हिस्सेदारी भले ही 1% है, लेकिन वे ‘स्विंग स्टेट्स’ (चुनावों में निर्णायक माने जाने वाले राज्य) में अपना खासा प्रभाव रखते हैं। ये वोटर अब इमिग्रेशन रिफॉर्म, नागरिक अधिकारों और भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों जैसे मुद्दों पर मुखर होकर मतदान कर रहे हैं। – रिपोर्ट कहती है कि ये मतदाता करीबी मुकाबलों में परिणाम तय करने या पलटने में बहुत अहम। – 2024 के रिपब्लिकन प्राथमिक चुनाव में निक्की हेली और विवेक रामास्वामी, दोनों भारतीय मूल के उम्मीदवार थे। डेमोक्रेट में कमला हैरिस राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी थीं। ये इस समुदाय की राजनीतिक अहमियत बताता है। आईएमएफ, डब्ल्यूएचओ और वर्ल्ड बैंक में अपनी छाप छोड़ी भारतीय मूल के पेशेवर वैश्विक संस्थानों में महत्वपूर्ण नेतृत्व निभा रहे हैं। आईएमएफ में गीता गोपीनाथ ने कोविड में आर्थिक पुनरुद्धार और टीकाकरण रणनीतियों को दिशा दी। आईएमएफ के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने 2008 के वित्तीय संकट की पहले से चेतावनी देकर वैश्विक वित्तीय नीति को प्रभावित किया। विश्व बैंक में इंदरमीत गिल और ममता मूर्ति ने विकास नीतियों को नए विचारों के साथ मजबूत किया। 2023 से अध्यक्ष अजय बंगा जलवायु परियोजनाओं व गरीबी उन्मूलन पर ध्यान दे रहे हैं। डब्ल्यूएचओ में सौम्या स्वामीनाथन ने स्वास्थ्य क्षेत्र में वैश्विक सहयोग मजबूत किया।

नालियों में गोबर बहाने पर डेयरी संचालकों पर जुर्माना

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नगर निगम अमले ने शहर को स्वच्छ रखने के लिए गंदगी फैलाने, अमानक पॉलीथिन के उपयोग और नालियों में गोबर बहाने पर जुर्माने की कार्रवाई की। मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी वैभव श्रीवास्तव के अनुसार। वार्ड 46 में भैंस डेयरी संचालकों द्वारा नाली में गोबर बहाने पर 6500 रुपये का जुर्माना वसूला गया। वार्ड 43 में दुकानदारों से अमानक पॉलीथिन पर 2500 रुपये और अन्य स्थानों पर गंदगी फैलाने पर अलग-अलग जुर्माने लगाए गए। वार्ड 32 में खुले में कचरा फेंकने पर 2900 रुपए वसूले गए।