This is the most expensive house in America, worth Rs 3778 crore

लॉस एंजिलिस25 मिनट पहले कॉपी लिंक इस घर में अत्याधुनिक जिम, पिलाटे स्टूडियो, स्पा और ब्यूटी सैलून भी है। अमेरिका के रियल एस्टेट इतिहास में एक नया रिकॉर्ड बना है। फोर्ब्स के अनुसार, लॉस एंजिल्स के बेल-एयर इलाके में स्थित एक आलीशान घर $400 मिलियन (करीब ₹3,778 करोड़ रु.) की कीमत के साथ ‘सबसे महंगी लिस्टिंग’ बना है। मतलब ये कि बिक्री के लिए रखे गए मकानों में ये सबसे महंगा है। इसे ‘लॉस एंजिलिस का क्राउन ज्वेल’ कहा जाता है। इस संपत्ति का स्वामित्व कतर के शाही परिवार (अल-थानी परिवार) से जुड़ी एक संस्था के पास है। उन्होंने 2010 में यह जमीन $35 मिलियन (करीब 330 करोड़ रुपए) में खरीदी थी। 10 साल लगे इसे बनाने में इस घर में अत्याधुनिक जिम, पिलाटे स्टूडियो, स्पा और ब्यूटी सैलून भी है। इस ‘मेगा-मेंशन’ को बनाने में लगभग 10 साल लगे थे। इसे मशहूर वास्तुकार पीटर मैरिनो ने डिजाइन किया है। इसके निर्माण में $350 मिलियन (3,304 करोड़) खर्च हुए। घर की खूबियां 39 बेडरूम 50 बाथरूम 3 स्विमिंग पुल 1 एक्स-रे रूम 1 सिनेमा हॉल 1 टेनिस कोर्ट 8 एकड़ स्पेस 70 हजार वर्ग फीट में घर है 25 कारों का अंडरग्राउंड गैरेज दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला मिशेल ओबामा का लेख:मां होने का अर्थ बच्चों को मुश्किलों से बचाना नहीं, उनसे लड़ना सिखाना है

मैंने नहीं सोचा था कि मां बनना मुझे एक साथ सबसे मजबूत और सबसे संवेदनशील दोनों महसूस कराएगा। बेटियों के आने के बाद मेरी जिंदगी का केंद्र बदल गया। मेरा हर फैसला, हर जॉब, हर रूटीन, हर जोखिम एक ही सवाल से गुजरने लगा- मैं उनके लिए कैसी दुनिया बनाने जा रही हूं? मेरी इच्छा थी कि मेरी बेटियां इस बात को समझते हुए बड़ी हों कि वे जैसी हैं, वैसी ही अच्छी हैं। वे बुद्धिमान, आत्मनिर्भर, अनुशासित, संवेदनशील हों और अपनी आवाज उठाने से भी न डरें। मैं नहीं चाहती थी कि मशहूर होना या व्हाइट हाउस में रहना उन्हें खास बना दे और वे जिम्मेदारियों से बचने लगें। बराक और मैं सजग थे। हमारी बेटियां बिस्तर खुद ठीक करती थीं। सफाई खुद करती थीं। मैं उन्हें कहती थी कि दुनिया खुद को तुम्हारे हिसाब से नहीं बदलेगी। मैं राजकुमारियां नहीं, जिम्मेदार इंसान तैयार करना चाहती थी। एक मां होने की सबसे कठिन बात यह समझना है कि आपका काम अस्थायी है। आप बच्चों की रक्षा करते हैं, उन्हें दिशा देते हैं, सुधारते हैं, उनकी चिंता करते हैं और फिर धीरे-धीरे आपको उन्हें छोड़ना पड़ता है। माता-पिता होने का अर्थ है बच्चों को आत्मनिर्भर बनने के लिए तैयार करना। यह दर्दनाक होता है, क्योंकि एक समय के बाद बच्चे पूरी तरह आपके नहीं रहते। वे अलग पहचान वाले इंसान बन जाते हैं। बेटियों के जन्म से पहले मैंने गर्भपात का दर्द झेला था। मैं आहत और शर्मिंदा महसूस करती थी। लगता था कि मैं असफल हो गई हूं। बाद में एहसास हुआ कि कितनी ही महिलाएं अपने भीतर कई दर्द लिए रहती हैं, जबकि बाहर से प्रकट करती हैं कि सबकुछ ठीक है। महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे यह सब चुपचाप सहें और फिर भी सहज और संतुलित दिखाई दें। और फिर लगातार बना रहने वाला अपराधबोध भी है। मां हमेशा खुद को असंभव पैमानों पर परखती रहती है। क्या मैं पर्याप्त समय दे रही हूं? क्या मैं बहुत सख्त हूं? या बहुत नरम? हमेशा कोई न कोई ऐसा दिखता है जो आपसे बेहतर तरीके से मां की भूमिका निभा रहा है। दूसरी तरफ मैंने कभी यह नहीं माना कि मां बनने का मतलब अपने व्यक्तित्व को मिटा देना है। मैं चाहती थी कि मेरी बेटियां मुझे एक पूर्ण इंसान के रूप में देखें, जिसकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हों, जिम्मेदारियां हों, दोस्त हों, विचार हों और ऐसा काम हो जिसकी उसे गहरी परवाह हो। मां बनने ने मुझे बेहतर पेशेवर बनाया और पेशेवर जीवन ने मुझे बेहतर मां बनाया। आज बेटियों को बड़ा करना आसान नहीं है। वे ऐसी दुनिया में बढ़ रही हैं जो पहले से ज्यादा शोर, दबाव और दखल से भरी हुई है। सोशल मीडिया है, लगातार मूल्यांकन है, सौंदर्य मानक हैं, डर है और हर दिशा से लड़कियों पर पड़ता दबाव है। एक मां के रूप में आप बच्चों को इन सबसे पूरी तरह बचा नहीं सकतीं। लेकिन आप उन्हें मजबूत आधार दे सकती हैं। उन्हें आलोचनात्मक सोच, गरिमा और संघर्ष से उबरने की शक्ति सिखाती हैं। मैंने सीखा कि डर परवरिश का आधार नहीं हो सकता। हम बच्चों को सुरक्षित घेरे में बंद कर उनके रास्ते की हर बाधा नहीं हटा सकते। बच्चों को निराशा का अनुभव होना चाहिए। उन्हें जवाबदेही सीखनी चाहिए। उन्हें कभी-कभी असफल भी होना चाहिए ताकि वे दोबारा उठना सीख सकें। ताकत कठिनाइयों से बचने में नहीं आती। ताकत तब आती है जब आप कठिनाइयों से गुजरते हैं और उनसे उबरते हैं। मातृत्व के बारे में जो कुछ मैंने सीखा, उसका बड़ा हिस्सा मुझे अपनी मां मेरियन रॉबिन्सन से मिला। उन्होंने परिवार को स्थिरता दी। वे शांत रहती थीं और मुझे शांति बनाए रखने में अक्सर कठिनाई होती थी। उन्होंने मुझे सिखाया कि बच्चों को हर समय दखल की जरूरत नहीं होती। कई बार उन्हें सिर्फ सुरक्षा, ध्यान और बिना शर्त प्यार चाहिए होता है। समय के साथ मुझे एहसास हुआ कि मातृत्व राह दिखाने का नाम है। मेरा मानना है कि मांएं केवल परिवार नहीं बनातीं, वे भावनात्मक संस्कृति भी गढ़ती हैं। बच्चे दुनिया में जो मूल्य लेकर जाते हैं, उनकी शुरुआत घर से होती है। मातृत्व सुंदर है, लेकिन यह अनिश्चित, भावनात्मक और विनम्र बना देने वाला अनुभव भी है। कई बार मुझे खुद पर संदेह हुआ। लगा कि मैं सबको निराश कर रही हूं। लेकिन मां होने के एहसास ने मुझे ऐसी दृढ़ता सिखाई, जैसी किसी और अनुभव ने नहीं सिखाई। अगर एक चीज थी जो मैं अपनी बेटियों को देना चाहती थी, तो वह पूर्णता नहीं थी। वह था- अपनी कहानी को स्वीकार करने का आत्मविश्वास, अपनी आवाज पर भरोसा, असफलताओं से उबरने की क्षमता और दुनिया में यह जानते हुए आगे बढ़ना कि हम वास्तव में कौन हैं।
मेरा बंगाल, मेरी उम्मीद:इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा… ‘आमार सोनार बांग्ला’ सिर्फ नोस्टेल्जिया नहीं, एक सुनहरे भविष्य का हकदार

Hindi News National Harsh Goenka, Harsh Goenka’s Article, Standing At A Turning Point In History… ‘Amar Sonar Bangla’ Is Not Just Nostalgia, It Deserves A Golden Future. हर्ष गोयनका. कोलकाता35 मिनट पहले कॉपी लिंक आरपीजी इंटरप्राइजेज के चेयरमैन हर्ष गोयनका। – फाइल फोटो ‘समय बदलता है, जिंदगी कई मोड़ लेती है, लेकिन कुछ जगहें ऐसी हैं जो कभी साथ नहीं छोड़तीं। वे चुपचाप हमारी यादों, हमारी सोच और हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बनी रहती हैं। ऐसी जगह मेरे लिए बंगाल है। यह मेरी जन्मभूमि है और आज भी ऐसी जगह है जो मुझे सुकून देती है, चाहे मैं दुनिया में कहीं भी चला जाऊं। संकरी गलियां, पुराने औपनिवेशिक भवन, दोपहर की खामोशी को चीरती ट्राम की घंटियां, स्कूल के मैदानों में गूंजती दोस्तों की हंसी, ये सब मेरी पहचान का हिस्सा हैं। मेरा बचपन बंगाल की उसी लय में बीता। मैदान में क्रिकेट, चाय पर गरमागरम बहस या बस उन सड़कों पर चलना जो कहानियों से भरी लगती थीं। सेंट जेवियर्स कॉलेज की कैंटीन में मेरे विचारों की दुनिया बसती थी। हम बहस करते थे, सवाल पूछते थे, सपने देखते थे। वो स्वर्णिम काल जब बंगाल सबसे आगे था बंगाल कभी भी सिर्फ भौगोलिक क्षेत्र नहीं रहा है। एक समय था जब यह पूरे भारत की औद्योगिक धड़कन था। हुगली नदी के किनारे खड़े जूट के कारखाने, हावड़ा के इस्पात संयंत्र, बर्नपुर की कोयला खदानें, ये सब इस राज्य की महत्वाकांक्षा के जीवित प्रतीक थे। आजादी के बाद के दो दशकों में पश्चिम बंगाल भारत के औद्योगिक रूप से सबसे विकसित राज्यों में गिना जाता था। चितरंजन में रेलवे इंजन बनते थे, दुर्गापुर में इस्पात ढलता था। टाटा, बिड़ला, सिंघानिया, मार्टिन बर्न जैसे व्यापारिक घराने यहीं से पले-बढ़े थे। कोलकाता भारत का व्यापारिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक मुख्यालय था। देश के किसी भी कोने में जाइए, ‘बंगाली बाबू’ की बुद्धिमत्ता और ‘कोलकाता के व्यापारी’ का रुतबा, दोनों का सम्मान होता था। वाम मोर्चा का लंबा अध्याय और उद्योग का पलायन फिर 1977 में वाम मोर्चा सत्ता में आया। धीरे-धीरे एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई जिसमें उद्योग को संदेह की नजर से देखा जाने लगा। तीन दशकों से ज्यादा चले इस शासन में श्रमिक आंदोलनों ने हिंसक रूप लिया, कारखानों में ‘काम बंद, हड़ताल जारी’ की संस्कृति जड़ें जमाने लगीं। उद्योगपतियों ने एक-एक करके कोलकाता छोड़ना शुरू किया। जो कारखाने कभी राज्य की शान थे, वे बंद होने लगे। निवेश मुंबई, दिल्ली और बाद में बेंगलुरु की ओर चला गया। वाम मोर्चे ने बौद्धिक गर्व तो बनाए रखा, लेकिन आर्थिक उद्यमिता को किनारे पर धकेल दिया। बंगाल में नया निवेश आना लगभग बंद हो गया। बंगाल के सर्वश्रेष्ठ दिमाग बाहर जाने लगे चाहे वो इंजीनियर, डॉक्टर, उद्यमी या कलाकार हों। यह उनकी पसंद नहीं, मजबूरी थी। तृणमूल का दौर- उम्मीदें, और फिर निराशा 2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के साथ तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। जनता को उम्मीद थी कि अब बदलाव आएगा। और कुछ हद तक आया भी। बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ, कनेक्टिविटी बढ़ी। लेकिन उद्योग के मोर्चे पर जो होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। बंगाल बिजनेस समिट जैसे आयोजन भव्य होते रहे। हजारों करोड़ के निवेश के वादे, विदेशी प्रतिनिधिमंडल, बड़े मंच और चमकदार घोषणाएं। लेकिन जमीन पर उतरता क्या था? बहुत कम। और इसका सबसे बड़ा कारण था- जमीन। सिंगूर और नंदीग्राम का जख्म अभी भरा नहीं था। टाटा का नैनो प्रोजेक्ट, जो बंगाल के औद्योगिक पुनर्जन्म का प्रतीक बन सकता था, राजनीतिक हिंसा और अनिश्चितता की भेंट चढ़ गया। यह सिर्फ एक कारखाने का जाना नहीं था, यह एक संदेश था जो पूरे देश के निवेशकों तक पहुंचा कि बंगाल में पूंजी सुरक्षित नहीं है। उसके बाद से हर बड़े निवेशक ने बंगाल की फाइल खोलने से पहले दो बार सोचा। तृणमूल के शासन में राजनीतिक हिंसा, प्रशासनिक पक्षपात और एकाधिकार की शिकायतें भी बढ़ती रहीं। उद्योग को यह भरोसा कभी नहीं मिला कि सरकार उनकी साझेदार है। बंगाल फिर अवसरों की दौड़ में पीछे रहा। अब एक नई सुबह- भाजपा की जीत और उम्मीद का उजाला और अब, ऐतिहासिक चुनाव परिणाम के बाद बंगाल में एक नई भावना जागी है। यह राजनीतिक बदलाव उस बंगाल की करवट है जो दशकों से सोया हुआ था। वो जानता था कि उसके भीतर कितनी ताकत है, लेकिन उसे मौका नहीं मिला। राज्य और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार को लेकर भाजपा जिस ‘डबल इंजन’ की बात करती रही है, उसका असली असर अब दिखना चाहिए। यह पल उम्मीद भी लाता है और जिम्मेदारी भी, लेकिन उम्मीद से काम नहीं चलता। नारों से कारखाने नहीं खुलते। इस बार बंगाल को ठोस और साहसी फैसले चाहिए। सबसे पहले जमीन का सवाल हल करना होगा- पारदर्शी, विवाद-मुक्त और डिजिटल। सिंगूर का सबक याद रहे। कोई भी निवेशक वहां नहीं जाता जहां उसकी जमीन कल छिन सकती है। दूसरा, प्रशासनिक संस्कृति बदलनी होगी। नौकरशाही को ‘ना’ कहने की आदत से ‘हां, और कैसे?’ की आदत में लाना होगा। तीसरा, केमिकल्स, फार्मास्यूटिकल्स, लेदर, फूड प्रोसेसिंग व पोर्ट-आधारित लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में जहां बंगाल की स्वाभाविक ताकत है, वहां केंद्रित निवेश लाना होगा। और सबसे बड़ा काम, प्रवासी बंगालियों को वापस जोड़ना। मुंबई के बोर्डरूम से लेकर सिलिकॉन वैली के स्टार्टअप तक, बंगाली प्रतिभा हर जगह है। उन्हें बुलाइए, भरोसा दीजिए, और उनके लिए घर वापसी को सार्थक बनाइए। वो बंगाल जो मेरे भीतर बसा है मेरे मन में फिर वही बंगाल उभरता है जो जिज्ञासु, संवेदनशील और संभावनाओं से भरा हुआ था। वो कोलकाता जहां दोपहर की धूप में चाय की चुस्की के साथ दुनिया बदलने की बातें होती थीं। वो बंगाल जो टैगोर की कविता में था, विवेकानंद के संकल्प में था, बोस की प्रयोगशाला में था। वो बंगाल मरा नहीं है। वो इंतजार कर रहा था। बंगाल पहले भी मुश्किलों से उबर चुका है, विभाजन से, हिंसा से, निराशा से। उसने हर बार अपनी आत्मा बचाई है। और आज, शायद हम फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं जहां से इतिहास मुड़ता है। भावना शुरुआत कर सकती है, लेकिन असली बदलाव के लिए उसे काम में बदलना होगा… और बदलना होगा बहस को निर्णय में, विचार को क्रियान्वयन में, और स्वप्न को वास्तविकता में। बंगाल
स्कूलों में पढ़ाया जा रहा गणित असल जिंदगी में फेल:गणना के बजाय डेटा-रीजनिंग पर फोकस बढ़ाएं, सेहत से लेकर निवेश तक में होंगे सफल

गणित का नाम सुनते ही अक्सर लोगों के जेहन में स्कूल के दिनों की वे डरावनी यादें ताजा हो जाती हैं- अलजेब्रा, ज्योमेट्री, ट्रिगोनोमेट्री और कैलकुलस का एक अंतहीन चक्रवात… लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस गणित के लिए हमने हजारों घंटे बर्बाद किए, वह हमारे वास्तविक जीवन में कितना काम आता है? आधुनिक शोध और विशेषज्ञों का मानना है कि हम न सिर्फ गलत गणित पढ़ रहे हैं, बल्कि उसे आंकने का हमारा तरीका भी पूरी तरह गलत है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि अमेरिका समेत दुनिया के कई हिस्सों में गणित का वर्तमान पाठ्यक्रम 1893 की ‘कमेटी ऑफ टेन’ द्वारा निर्धारित किया गया था। उस दौर में रटकर गणना करना (रोट मैथ) आर्किटेक्ट, खगोलविदों और सिविल इंजीनियरों के लिए जरूरी था। पर आज, जब हमारे हाथ में सुपरकंप्यूटर जैसे स्मार्टफोन हैं, तब भी हम बच्चों को हाथ से जटिल समीकरण हल करना सिखा रहे हैं। ‘आफ्टरमैथ: द लाइफ-चेंजिंग मैथ दैट स्कूल्स वॉन्ट टीच यू’ के लेखक टेड डिनर्टस्मिथ कहते हैं, आज की दुनिया डेटा, एल्गोरिदम, सांख्यिकी व एआई से चलती है। पर हमारी शिक्षा नीति अब भी 19वीं सदी के रटने वाले गणित व मल्टीपल चॉइस टेस्ट स्कोर के पीछे भाग रही है।’ एक्सपर्ट मानते हैं अगर कंप्यूटर कोई काम बेहतर व तेज कर सकता है, तो बच्चों को उसी काम में उलझाए रखना गुणवत्ता का पैमाना नहीं हो सकता। गणित की अज्ञानता से जोखिम ओईसीडी के एजुकेशन डायरेक्टर एंड्रियास श्लीचर के मुताबिक गणित की व्यावहारिक समझ न होना सिर्फ अकादमिक कमी नहीं, बल्कि जिंदगी व स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा जोखिम है। डेटा की समझ न होने से लोग मेडिकल टेस्ट की रिपोर्ट व डॉक्टरों द्वारा डेटा की गलत व्याख्या से जीवन-मरण से जुड़े गलत फैसले ले लेते हैं। वहीं, ‘मैथ एंग्जायटी’ के शिकार 93% लोग वित्तीय जाल में फंस रहे हैं; वे महंगाई व ब्याज के गणित को न समझ पाने से निवेश व भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। यही अज्ञानता जनता को नीति-निर्धारकों के आंकड़ों के मायाजाल में भी उलझाती है। कई देशों में बेरोजगारी के आधिकारिक आंकड़े हकीकत छुपाते हैं, जबकि असली दर ज्यादा है। पर गणित से दूरी, यह गफलत समझा नहीं पाती। जनगणना जैसी प्रक्रियाओं में भी डेटा की गलतियों से संसाधनों का गलत आवंटन होता है। जब तक हम आंकड़ों में छिपा सच नहीं समझेंगे, तब तक गुमराह होते रहेंगे। एक्सपर्ट कहते हैं,‘गणित का सही ज्ञान न सिर्फ व्यक्तिगत सफलता के लिए जरूरी है, बल्कि यह लोकतंत्र को भी मजबूत करता है। जब नागरिक डेटा व आंकड़ों को समझना शुरू करेंगे, तभी सही सवाल पूछ सकेंगे। वक्त आ गया है कि हम रटने वाले गणित से बाहर निकलें और उस गणित को अपनाएं जो हमारा कल संवार सके। 80% वक्त गणना पर खर्च हो रहा, इसे एआई-कंप्यूटर को करने दें अमेरिकी शिक्षाविद् कॉनराड वोल्फ्राम का तर्क है कि हमें ‘डेटा एनालिटिक्स’ व ‘फाइनेंशियल लिटरेसी’ को महत्व देना चाहिए। वर्तमान शिक्षा 80% समय ‘गणना’ पर खर्च करती है, जबकि यह काम कंप्यूटर व एआई कहीं बेहतर कर सकते हैं। छात्रों को गणना के बोझ से मुक्त कर समस्या सुलझाने पर ध्यान देना चाहिए। छात्र सांख्यिकीय तर्क व वित्तीय फैसले सीखें जो जीवन को प्रभावित करते हैं। यदि छात्र स्कूल से निकलने के बाद टैक्स, निवेश या ब्याज दर नहीं समझ सकते, तो उनकी गणित की शिक्षा अधूरी है। इन व्यावहारिक आंकड़ों में दक्षता ही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।
इंडोनेशिया बना क्रिकेट का नया हब:स्कूलों में दी जा रही ट्रेनिंग, ढाई लाख लोग खेल रहे, स्टेडियम का निर्माण

बैडमिंटन के लिए मशहूर इंडोनेशिया क्रिकेट की दुनिया में भी अपनी पहचान बनाने में जुटा है। वही इंडोनेशिया, जिसने ओलिंपिक में बैडमिंटन के जरिए आठ गोल्ड जीते और दुनिया को कई बड़े खिलाड़ी दिए, अब क्रिकेट में रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बना रहा है। यह मानना मुश्किल लगता है कि भारत-ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े देशों से ज्यादा टी20 कोई और देश खेल सकता है, लेकिन 2025 में इंडोनेशिया ने ऐसा कर दिखाया। उसकी पुरुष टीम ने एक साल में 45 टी20 इंटरनेशनल मुकाबले खेले, जो किसी टीम द्वारा एक कैलेंडर ईयर में सबसे ज्यादा हैं। इंडोनेशिया ने कंबोडिया के खिलाफ नौ मैचों की सीरीज 8-0 से जीती। पिछले चार वर्षों में क्रिकेट ने वहां तेजी से जगह बनाई है। 17 हजार से ज्यादा द्वीपों और करीब 28 करोड़ आबादी वाले इस देश में अब ढाई लाख से ज्यादा लोग क्रिकेट खेल रहे हैं। इंडोनेशिया क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष अभिराम एस यादव कहते हैं ‘क्रिकेट अब राष्ट्रीय खेल महोत्सव का हिस्सा है और ओलिंपिक में क्रिकेट की वापसी ने खेल को नई ताकत दी है। सरकार भी अब क्रिकेट को गंभीरता से देखने लगी है।’ इंडोनेशिया अब अपने क्रिकेट ढांचे को भी मजबूत कर रहा है। बाली में देश का पहला अंतरराष्ट्रीय स्तर का टर्फ मैदान तैयार हो रहा है, जहां राष्ट्रीय क्रिकेट एकेडमी भी बनेगी। उम्मीद है कि 2027 से वहां आईसीसी के बड़े क्वालिफायर मैच आयोजित किए जाएंगे। स्कूलों में क्रिकेट की ट्रेनिंग दी जा रही है। देश के 482 कोच और 335 अंपायरों को आईसीसी फाउंडेशन कोर्स एक्रेडिटेशन मिला है। क्रिकेट की यह कहानी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि संघर्ष और जुनून से भी भरी हुई है। देश के 38 में से 21 प्रांतों में क्रिकेट खेला जा रहा है। यहां मुस्लिम, हिंदू, बौद्ध, ईसाई और कैथोलिक खिलाड़ी एक ही टीम में खेलते हैं। कई महिला खिलाड़ी हिजाब पहनकर मैदान में उतरती हैं। इस पूरी कहानी का सबसे भावुक चेहरा तेज गेंदबाज मैक्सी कोडा हैं। छोटे से द्वीप में पेड़ काटने का काम करने वाले कोडा हर सप्ताह नाव से जकार्ता पहुंचते हैं, मैच खेलते हैं और फिर काम पर लौट जाते हैं। क्रिकेट के बड़े देशों के बीच इंडोनेशिया छोटा नाम हो सकता है, लेकिन वहां जो जुनून दिखाई दे रहा है, उसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक ओवर में 5 विकेट का रिकॉर्ड इंडोनेशियाई गेंदबाज के नाम इंडोनेशिया की महिला टीम पुरुषों से ज्यादा सफल है। उसने 2023 में देश को पहली बार अंडर-19 वर्ल्ड कप तक पहुंचाया। दक्षिण-पूर्व एशियाई खेलों में भी टीम लगातार मेडल जीत रही है। महिला टीम फिलहाल दुनिया में 22वें स्थान पर है। देश ने कुछ अनोखे रिकॉर्ड भी बनाए हैं। इंडोनेशिया के गेंदबाज गेडे प्रियंदाना टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में एक ओवर में पांच विकेट लेने वाले पहले खिलाड़ी बने। वहीं, टीनएजर गेंदबाज रोहमालिया ने महिला टी20 में बिना रन दिए 7 विकेट लेने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था।
क्राइम थ्रिलर वेब सीरीज:रणदीप हुड्डा स्टारर ‘इंस्पेक्टर अविनाश 2’ का ट्रेलर रिलीज, उर्वशी रौतेला का भी लीड रोल

रणदीप हुड्डा के शो ‘इंस्पेक्टर अविनाश’ के दूसरे सीजन का ट्रेलर रिलीज हो चुका है। नीरज पाठक निर्देशित इस शो में 1990 के दशक के उत्तर प्रदेश की वो झलक है जिसमें पुलिस, प्रशासन और गुंडाराज के साथ-साथ खून-खराबा है। इस नए सीजन में इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा के जीवन में जबरदस्त तूफान खड़ा हो जाता है। अविनाश को इस बार एक ऐसी लड़ाई लड़नी पड़ती है जो पुलिस की खाकी वर्दी से कहीं आगे तक जाती है। इस ट्रेलर में अपराध, राजनीति और भ्रष्टाचार के साथ-साथ कहानी का रोमांच भी जबरदस्त है। अपराध सरगना शेख और उसकी साथी रहस्यमयी देवी का एक घातक हथियार गिरोह है। यहां सिस्टम के अंदर धोखा खाकर निलंबित और गिरफ्तार होकर, इंस्पेक्टर अविनाश एक बहुत बड़े साजिश का शिकार हो जाता है। अविनाश के इर्द-गिर्द एक ऐसा खेल रचा गया है जो उसके सिद्धांतों को तबाह करने को तैयार है। इस बार इंस्पेक्टर केवल अपराध से नहीं लड़ रहा, बल्कि अपने परिवार, अपनी सच्चाई और अपने अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़ता दिख रहा है। इस ट्रेलर में जबरदस्त एक्शन हैं और दुश्मन कहीं अधिक घातक हैं। यह सीरीज उत्तर प्रदेश के पुलिस अधिकारी अविनाश मिश्रा की सच्ची घटनाओं और जीवन पर बेस्ड है, जिन्हें राज्य में अपराधों को रोकने का अधिकार दिया गया था। इस शो में उर्वशी रौतेला, अमित सियाल, अभिमन्यु सिंह, रजनीश दुग्गल, शालिन भनोट और फ्रेडी दारूवाला भी अहम भूमिकाओं में हैं।
In ‘Raaka’, the characters will become the film’s defining feature; the film could be the beginning of a new universe.

Hindi News Entertainment In ‘Raaka’, The Characters Will Become The Film’s Defining Feature; The Film Could Be The Beginning Of A New Universe. मुंबई17 मिनट पहले कॉपी लिंक इस बार भी फिल्म का टाइटल अल्लू अर्जुन के किरदार के नाम पर रखा गया है। अल्लू अर्जुन की फिल्म ‘पुष्पा’ और ‘पुष्पा 2: द रूल’ ने जिस तरह देशभर में रिकॉर्ड तोड़ सफलता हासिल की, उसके बाद अब उनकी अगली फिल्म ‘राका’ को लेकर भी जबरदस्त चर्चा शुरू हो गई है। खास बात यह है कि इस बार भी फिल्म का टाइटल सीधे अल्लू अर्जुन के किरदार के नाम पर रखा गया है। इंडस्ट्री में इसे एक सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है, जहां स्टार की स्क्रीन इमेज को ही फिल्म की सबसे बड़ी ब्रांडिंग बनाया जा रहा है। निर्देशक एटली की इस मेगा बजट फिल्म में दीपिका पादुकोण भी अहम भूमिका में नजर आएंगी। सूत्रों के मुताबिक, ‘पुष्पा’ की सफलता के बाद मेकर्स ने यह समझ लिया कि अल्लू के किरदार सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं रहते, बल्कि खुद एक कल्ट पहचान बन जाते हैं। यही वजह है कि ‘राका’ में भी किरदार के नाम को ही फिल्म का टाइटल बनाया गया है, ताकि दर्शकों के बीच सीधा कनेक्शन तैयार हो सके। ट्रेड एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि ‘राका’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक नई सिनेमैटिक यूनिवर्स की शुरुआत साबित हो सकती है। वहीं एटली और अल्लू की जोड़ी को दक्षिण और हिंदी में बड़े गेम चेंजर साबित होगी। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
कोलकाता की तंग गलियों में हॉकी का मैदान बना उम्मीद:दो भाइयों की एकेडमी, खेल के सहारे गरीब बच्चों की जिंदगी को नई दिशा

कोलकाता की उमस भरी सुबह, घड़ी में सात बज रहे हैं। सियालदह स्टेशन के बाहर रोज की तरह भीड़ भाग रही है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव की वजह से दीवारों से लेकर बिजली के खंभों तक नेताओं के चेहरे रंगे हुए हैं, लेकिन डॉ. सुरेश सरकार रोड से तीसरी गली में मुड़ते ही माहौल अचानक बदल जाता है। यहां सिर्फ हॉकी स्टिक की ‘टक-टक’ सुनाई देती है। छोटे-छोटे कदमों की ताल, बच्चों की दौड़ और एक कोच की सख्त, लेकिन उम्मीद से भरी आवाज। यह है एंटाली हॉकी एकेडमी। कोलकाता के सबसे पुराने हॉकी सेंटर में से एक। बाहर से देखने पर यह जगह किसी छोटे फुटबॉल मैदान से भी छोटी लगती है] लेकिन इस छोटे से मैदान ने न जाने कितने बच्चों के सपनों को जगह दी है। यह एकेडमी इलाके के बच्चों के लिए उम्मीद का ठिकाना है। यहां आने वाले ज्यादातर बच्चे गरीब परिवारों से हैं। किसी के पिता रिक्शा चलाते हैं, तो किसी की मां सड़क किनारे खाना बेचती हैं। एंटाली की तंग गलियों में जहां कई बार हालात बच्चों का भविष्य निगल लेते हैं, वहां यह मैदान उन्हें हाथ में हॉकी स्टिक देकर लड़ना सिखाता है। यहां के कई बच्चे आगे चलकर कलकत्ता हॉकी लीग के अलग-अलग डिवीजन क्लबों तक पहुंचे हैं। एकेडमी बच्चों को सिर्फ खेल नहीं सिखाती, बल्कि उन्हें अनुशासन, दोस्ती और संघर्ष का मतलब भी समझाती है। पैसों की कमी हमेशा रहती है। बच्चों को बेसिक उपकरण देना भी मुश्किल हो जाता है। फिर भी यहां आने वाले बच्चों के चेहरे पर शिकायत नहीं दिखती। उनके लिए यह मैदान किसी मंदिर जैसा है। चौथी कक्षा में पढ़ने वाली एंजेला की मां पुतुल मंडल बताती हैं, ‘मेरी बेटी यहां पहले ड्रॉइंग प्रतियोगिता में आई थी। फिर उसने जिद पकड़ ली कि हॉकी सीखनी है।’ इसी तरह जुड़वां बहनें तापुर और तुपुर पांच साल से यहां अभ्यास कर रही हैं। अब वे 11 साल की हो चुकी हैं। उनके पिता सुदीप बैद्य कहते हैं, ‘आजकल बच्चों का खुले मैदान में खेलना बहुत कम हो गया है। यह जगह उनके लिए सुरक्षित ठिकाना बन गई है।’ बच्चों को गलत रास्ते से दूर रखने के लिए शुरू हुई थी एकेडमी एकेडमी के संयुक्त सचिव और कोच सुभीर कुमार पान कहते हैं, ‘हमारे लिए हॉकी सिर्फ खेल नहीं, जिंदगी है। इसी खेल ने हमें नौकरी दी, पहचान दी। अब हम इसे बच्चों को लौटाना चाहते हैं।’ सुभीर और उनके भाई प्रबीर दोनों राज्य स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं। उनके गुरु असीम गांगुली ने इस एकेडमी की शुरुआत इसलिए की थी, ताकि इलाके के बच्चों को गलत रास्तों से दूर रखा जा सके। उस छोटी सी गली में शायद देश का अगला बड़ा खिलाड़ी तैयार हो रहा हो। लेकिन, वहां सबसे बड़ी जीत यह है कि कुछ बच्चे सपने देखना सीख रहे हैं।
एआई चैटबॉट का झूठा दावा:ब्रिटेन से मेडिकल की पढ़ाई, 7 साल का अनुभव; फर्जी लाइसेंस नंबर भी दिया, पहली बार AI कंपनी पर मुकदमा

क्या आप अपनी बीमारी के लक्षण गूगल पर सर्च करते हैं या इलाज के लिए किसी एआई चैटबॉट से सलाह ले रहे हैं? अगर हां, तो संभल जाइए। आप जिसे अपना हमदर्द डॉक्टर समझकर दिल की बात बता रहे हैं, दरअसल वह महज एक कोड और डेटा का पुलिंदा हो सकता है। अमेरिका के पेंसिल्वेनिया प्रांत ने ‘कैरेक्टर.एआई’ नाम की कंपनी पर ऐसे ही मामले को लेकर ऐतिहासिक मुकदमा किया है। आरोप है कि इस कंपनी के चैटबॉट खुद को ‘लाइसेंस प्राप्त डॉक्टर’ बताकर लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, क्योंकि चैटबॉट सिर्फ डेटा को दोहराते हैं। कोई नैतिकता नहीं होती है। जांचकर्ता ने पकड़ा झूठ पेंसिल्वेनिया का यह मामला पिछले दिनों तब खुला, जब एक जांच अधिकारी ने इस प्लेटफॉर्म पर ‘साइकियाट्री’ (मनोचिकित्सा) सर्च किया। वहां उसे एक ऐसा ‘कैरेक्टर’ मिला, जिसने दावा किया कि वह एक डॉक्टर है। इस मामले से अचंभित प्रांत के गवर्नर जोश शापिरो ने कहा, ‘पेंसिल्वेनिया के लोग यह जानने के हकदार हैं कि वे इंसान से बात कर रहे हैं या मशीन से। हम एआई को डॉक्टरी के नाम पर लोगों को गुमराह करने की इजाजत नहीं देंगे।’ तकनीक दवा नहीं हो सकती एआई के इस ‘डॉक्टर अवतार’ का काला पक्ष भयावह है। हाल ही में एक महिला ने गूगल और कैरेक्टर एआई पर मुकदमा किया। इसमें आरोप था कि चैटबॉट ने उसके किशोर बेटे को आत्महत्या के लिए उकसाया था। कारनेगी मेलन यूनिवर्सिटी के एथिक्स एक्सपर्ट डेरेक लेबेन कहते हैं, ‘यह मामला पूरी दुनिया के लिए नजीर बनेगा कि क्या एआई को ‘मेडिकल प्रैक्टिस’ का दोषी माना जा सकता है।’ वहीं, कॉमन सेंस मीडिया की अमीना फजलुल्लाह का कहना है कि सोशल मीडिया की तरह एआई की स्व-नियमन प्रणाली भी फेल साबित हो रही है, जिससे बच्चों और मानसिक रूप से कमजोर लोगों को सबसे ज्यादा खतरा है। असली का भ्रम: जांच में एआई कंपनी का झूठ सामने आया अमेरिका के कैरेक्टर टेक्नोलॉजीज इंक (कैरेक्टर एआई संचालक) पर ‘अवैध चिकित्सा प्रैक्टिस’ का आरोप लगाया गया है। पहली बार किसी एआई कंपनी पर ऐसा केस किया गया है। जांच में पाया गया था कि ‘एमिली’ नामक कैरेक्टर को ‘डॉक्टर ऑफ साइकियाट्री (मनोचिकित्सक) लेबल दिया गया था। एमिली ने झूठे दावे किए। एक लाइसेंस नंबर भी दिया, जो नकली था। इम्पीरियल कॉलेज लंदन से मेडिकल की पढ़ाई करने का दावा करते हुए कहा कि 7 साल का अनुभव है और ब्रिटेन में प्रैक्टिस करती हूं।
बड़ी म्यूजिक कंपनियां क्षेत्रीय गानों पर दांव लगा रहीं:5,900 करोड़ का हुआ घरेलू म्यूजिक बाजार, स्ट्रीमिंग की घटती कमाई से बदली रणनीति

म्यूजिक इंडस्ट्री में अब बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जिसका सीधा फायदा क्षेत्रीय कलाकारों और संगीत प्रेमियों को होगा। टाइम्स म्यूजिक, वार्नर म्यूजिक और सारेगामा जैसी बड़ी कंपनियां अब स्थानीय गानों के कैटलॉग खरीदने पर भारी निवेश कर रही हैं। दरअसल, हिंदी फिल्म म्यूजिक की बढ़ती लागत और स्ट्रीमिंग से घटती कमाई ने कंपनियों को छोटे लेकिन मजबूत क्षेत्रीय बाजारों की ओर मोड़ा है। इस कन्सॉलिडेशनं से क्षेत्रीय संगीत कंपनियों की पहुंच ग्लोबल प्लेटफॉर्म और बेहतर तकनीक तक होगी। इससे न केवल गानों की क्वालिटी सुधरेगी, बल्कि डिजिटल वितरण प्रणाली भी पारदर्शी बनेगी। फिक्की-ईवाई की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में भारतीय म्यूजिक सेगमेंट का रेवेन्यू 10% बढ़कर 5,900 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। अब म्यूजिक कंपनियां नए कंटेंट पर पैसा लगाने के बजाय स्थापित क्षेत्रीय कैटलॉग के जरिए अपना रिस्क कम कर रही हैं। बड़ी कंपनियों के आने से क्षेत्रीय स्तर पर रॉयल्टी और अधिकारों का प्रबंधन काफी सरल और व्यवस्थित हो जाएगा। अब तक जिन गानों का सही डिजिटल हिसाब नहीं मिल पाता था, वे भी मुख्यधारा की स्ट्रीमिंग का हिस्सा बनेंगे। इससे छोटे और मध्यम स्तर के म्यूजिक लेबल्स को वैश्विक बुनियादी ढांचे और पूंजी तक पहुंच मिलेगी। साझा मार्केटिंग और डेटा-संचालित रणनीतियों से गानों को सही दर्शकों तक पहुंचाना आसान होगा। म्यूजिक लेबल वर्तमान समय में अपनी कमाई के पुराने तरीकों को बदलने के लिए मजबूर हैं। पिछले एक साल में ऑडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने प्रति स्ट्रीम भुगतान की दरों को करीब आधा कर दिया है। इसकी मुख्य वजह यूट्यूब पर दर्शकों का रुझान संगीत से हटकर स्टैंड-अप कॉमेडी और पॉडकास्ट की ओर बढ़ना है। इसके बावजूद फिल्म निर्माता अपने म्यूजिक राइट्स महंगे बेच रहे हैं, जिससे कंपनियों के लिए रिकवरी करना चुनौतीपूर्ण हो गया है। साल 2025 का ट्रेंड बताता है कि कंपनियां अब केवल गानों के ट्रांजेक्शन के बजाय आईपी (बौद्धिक संपदा) पर नियंत्रण चाहती हैं। वे ऐसे निवेश पर ध्यान दे रही हैं जहां कंटेंट का फ्लो तय हो और वैश्विक स्तर पर कमाई की जा सके। छोटी लेकिन प्रासंगिक क्षेत्रीय कंपनियों का अधिग्रहण जोखिम कम करने का सबसे बेहतर तरीका बन गया है। इससे क्षेत्रीय संगीत की दुनिया में प्रोफेशनल वर्क कल्चर का विस्तार होगा। अगले 3 साल में 50% बढ़ेगी क्षेत्रीय गानों की पहुंच, कलाकारों की मांग बढ़ेगी बड़े कंपनियों के उतरने से कलाकारों के भुगतान में अस्थायी रूप से उछाल आ सकता है। अगले दो-तीन वर्षों में क्षेत्रीय भाषाओं के गानों की पहुंच 50% तक बढ़ने की उम्मीद है। जब ग्लोबल मंच पर भोजपुरी, पंजाबी या मराठी गाने बजेंगे, तो इससे न केवल सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि जमीनी स्तर पर छिपे हुए हुनर को भी अपनी पहचान बनाने के लिए बड़े शहरों का मोहताज नहीं होना पड़ेगा।









