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बड़ी म्यूजिक कंपनियां क्षेत्रीय गानों पर दांव लगा रहीं:5,900 करोड़ का हुआ घरेलू म्यूजिक बाजार, स्ट्रीमिंग की घटती कमाई से बदली रणनीति

बड़ी म्यूजिक कंपनियां क्षेत्रीय गानों पर दांव लगा रहीं:5,900 करोड़ का हुआ घरेलू म्यूजिक बाजार, स्ट्रीमिंग की घटती कमाई से बदली रणनीति

म्यूजिक इंडस्ट्री में अब बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जिसका सीधा फायदा क्षेत्रीय कलाकारों और संगीत प्रेमियों को होगा। टाइम्स म्यूजिक, वार्नर म्यूजिक और सारेगामा जैसी बड़ी कंपनियां अब स्थानीय गानों के कैटलॉग खरीदने पर भारी निवेश कर रही हैं। दरअसल, हिंदी फिल्म म्यूजिक की बढ़ती लागत और स्ट्रीमिंग से घटती कमाई ने कंपनियों को छोटे लेकिन मजबूत क्षेत्रीय बाजारों की ओर मोड़ा है। इस कन्सॉलिडेशनं से क्षेत्रीय संगीत कंपनियों की पहुंच ग्लोबल प्लेटफॉर्म और बेहतर तकनीक तक होगी। इससे न केवल गानों की क्वालिटी सुधरेगी, बल्कि डिजिटल वितरण प्रणाली भी पारदर्शी बनेगी। फिक्की-ईवाई की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में भारतीय म्यूजिक सेगमेंट का रेवेन्यू 10% बढ़कर 5,900 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। अब म्यूजिक कंपनियां नए कंटेंट पर पैसा लगाने के बजाय स्थापित क्षेत्रीय कैटलॉग के जरिए अपना रिस्क कम कर रही हैं। बड़ी कंपनियों के आने से क्षेत्रीय स्तर पर रॉयल्टी और अधिकारों का प्रबंधन काफी सरल और व्यवस्थित हो जाएगा। अब तक जिन गानों का सही डिजिटल हिसाब नहीं मिल पाता था, वे भी मुख्यधारा की स्ट्रीमिंग का हिस्सा बनेंगे। इससे छोटे और मध्यम स्तर के म्यूजिक लेबल्स को वैश्विक बुनियादी ढांचे और पूंजी तक पहुंच मिलेगी। साझा मार्केटिंग और डेटा-संचालित रणनीतियों से गानों को सही दर्शकों तक पहुंचाना आसान होगा।
म्यूजिक लेबल वर्तमान समय में अपनी कमाई के पुराने तरीकों को बदलने के लिए मजबूर हैं। पिछले एक साल में ऑडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने प्रति स्ट्रीम भुगतान की दरों को करीब आधा कर दिया है। इसकी मुख्य वजह यूट्यूब पर दर्शकों का रुझान संगीत से हटकर स्टैंड-अप कॉमेडी और पॉडकास्ट की ओर बढ़ना है। इसके बावजूद फिल्म निर्माता अपने म्यूजिक राइट्स महंगे बेच रहे हैं, जिससे कंपनियों के लिए रिकवरी करना चुनौतीपूर्ण हो गया है। साल 2025 का ट्रेंड बताता है कि कंपनियां अब केवल गानों के ट्रांजेक्शन के बजाय आईपी (बौद्धिक संपदा) पर नियंत्रण चाहती हैं। वे ऐसे निवेश पर ध्यान दे रही हैं जहां कंटेंट का फ्लो तय हो और वैश्विक स्तर पर कमाई की जा सके। छोटी लेकिन प्रासंगिक क्षेत्रीय कंपनियों का अधिग्रहण जोखिम कम करने का सबसे बेहतर तरीका बन गया है। इससे क्षेत्रीय संगीत की दुनिया में प्रोफेशनल वर्क कल्चर का विस्तार होगा। अगले 3 साल में 50% बढ़ेगी क्षेत्रीय गानों की पहुंच, कलाकारों की मांग बढ़ेगी बड़े कंपनियों के उतरने से कलाकारों के भुगतान में अस्थायी रूप से उछाल आ सकता है। अगले दो-तीन वर्षों में क्षेत्रीय भाषाओं के गानों की पहुंच 50% तक बढ़ने की उम्मीद है। जब ग्लोबल मंच पर भोजपुरी, पंजाबी या मराठी गाने बजेंगे, तो इससे न केवल सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि जमीनी स्तर पर छिपे हुए हुनर को भी अपनी पहचान बनाने के लिए बड़े शहरों का मोहताज नहीं होना पड़ेगा।

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म्यूजिक लेबल वर्तमान समय में अपनी कमाई के पुराने तरीकों को बदलने के लिए मजबूर हैं। पिछले एक साल में ऑडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने प्रति स्ट्रीम भुगतान की दरों को करीब आधा कर दिया है। इसकी मुख्य वजह यूट्यूब पर दर्शकों का रुझान संगीत से हटकर स्टैंड-अप कॉमेडी और पॉडकास्ट की ओर बढ़ना है। इसके बावजूद फिल्म निर्माता अपने म्यूजिक राइट्स महंगे बेच रहे हैं, जिससे कंपनियों के लिए रिकवरी करना चुनौतीपूर्ण हो गया है। साल 2025 का ट्रेंड बताता है कि कंपनियां अब केवल गानों के ट्रांजेक्शन के बजाय आईपी (बौद्धिक संपदा) पर नियंत्रण चाहती हैं। वे ऐसे निवेश पर ध्यान दे रही हैं जहां कंटेंट का फ्लो तय हो और वैश्विक स्तर पर कमाई की जा सके। छोटी लेकिन प्रासंगिक क्षेत्रीय कंपनियों का अधिग्रहण जोखिम कम करने का सबसे बेहतर तरीका बन गया है। इससे क्षेत्रीय संगीत की दुनिया में प्रोफेशनल वर्क कल्चर का विस्तार होगा। अगले 3 साल में 50% बढ़ेगी क्षेत्रीय गानों की पहुंच, कलाकारों की मांग बढ़ेगी बड़े कंपनियों के उतरने से कलाकारों के भुगतान में अस्थायी रूप से उछाल आ सकता है। अगले दो-तीन वर्षों में क्षेत्रीय भाषाओं के गानों की पहुंच 50% तक बढ़ने की उम्मीद है। जब ग्लोबल मंच पर भोजपुरी, पंजाबी या मराठी गाने बजेंगे, तो इससे न केवल सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि जमीनी स्तर पर छिपे हुए हुनर को भी अपनी पहचान बनाने के लिए बड़े शहरों का मोहताज नहीं होना पड़ेगा।

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