Tuesday, 22 Sep 2026 | 09:45 PM

Trending :

कोलकाता की तंग गलियों में हॉकी का मैदान बना उम्मीद:दो भाइयों की एकेडमी, खेल के सहारे गरीब बच्चों की जिंदगी को नई दिशा

कोलकाता की तंग गलियों में हॉकी का मैदान बना उम्मीद:दो भाइयों की एकेडमी, खेल के सहारे गरीब बच्चों की जिंदगी को नई दिशा

कोलकाता की उमस भरी सुबह, घड़ी में सात बज रहे हैं। सियालदह स्टेशन के बाहर रोज की तरह भीड़ भाग रही है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव की वजह से दीवारों से लेकर बिजली के खंभों तक नेताओं के चेहरे रंगे हुए हैं, लेकिन डॉ. सुरेश सरकार रोड से तीसरी गली में मुड़ते ही माहौल अचानक बदल जाता है। यहां सिर्फ हॉकी स्टिक की ‘टक-टक’ सुनाई देती है। छोटे-छोटे कदमों की ताल, बच्चों की दौड़ और एक कोच की सख्त, लेकिन उम्मीद से भरी आवाज। यह है एंटाली हॉकी एकेडमी। कोलकाता के सबसे पुराने हॉकी सेंटर में से एक। बाहर से देखने पर यह जगह किसी छोटे फुटबॉल मैदान से भी छोटी लगती है] लेकिन इस छोटे से मैदान ने न जाने कितने बच्चों के सपनों को जगह दी है। यह एकेडमी इलाके के बच्चों के लिए उम्मीद का ठिकाना है। यहां आने वाले ज्यादातर बच्चे गरीब परिवारों से हैं। किसी के पिता रिक्शा चलाते हैं, तो किसी की मां सड़क किनारे खाना बेचती हैं। एंटाली की तंग गलियों में जहां कई बार हालात बच्चों का भविष्य निगल लेते हैं, वहां यह मैदान उन्हें हाथ में हॉकी स्टिक देकर लड़ना सिखाता है। यहां के कई बच्चे आगे चलकर कलकत्ता हॉकी लीग के अलग-अलग डिवीजन क्लबों तक पहुंचे हैं। एकेडमी बच्चों को सिर्फ खेल नहीं सिखाती, बल्कि उन्हें अनुशासन, दोस्ती और संघर्ष का मतलब भी समझाती है। पैसों की कमी हमेशा रहती है। बच्चों को बेसिक उपकरण देना भी मुश्किल हो जाता है। फिर भी यहां आने वाले बच्चों के चेहरे पर शिकायत नहीं दिखती। उनके लिए यह मैदान किसी मंदिर जैसा है। चौथी कक्षा में पढ़ने वाली एंजेला की मां पुतुल मंडल बताती हैं, ‘मेरी बेटी यहां पहले ड्रॉइंग प्रतियोगिता में आई थी। फिर उसने जिद पकड़ ली कि हॉकी सीखनी है।’ इसी तरह जुड़वां बहनें तापुर और तुपुर पांच साल से यहां अभ्यास कर रही हैं। अब वे 11 साल की हो चुकी हैं। उनके पिता सुदीप बैद्य कहते हैं, ‘आजकल बच्चों का खुले मैदान में खेलना बहुत कम हो गया है। यह जगह उनके लिए सुरक्षित ठिकाना बन गई है।’ बच्चों को गलत रास्ते से दूर रखने के लिए शुरू हुई थी एकेडमी एकेडमी के संयुक्त सचिव और कोच सुभीर कुमार पान कहते हैं, ‘हमारे लिए हॉकी सिर्फ खेल नहीं, जिंदगी है। इसी खेल ने हमें नौकरी दी, पहचान दी। अब हम इसे बच्चों को लौटाना चाहते हैं।’ सुभीर और उनके भाई प्रबीर दोनों राज्य स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं। उनके गुरु असीम गांगुली ने इस एकेडमी की शुरुआत इसलिए की थी, ताकि इलाके के बच्चों को गलत रास्तों से दूर रखा जा सके। उस छोटी सी गली में शायद देश का अगला बड़ा खिलाड़ी तैयार हो रहा हो। लेकिन, वहां सबसे बड़ी जीत यह है कि कुछ बच्चे सपने देखना सीख रहे हैं।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
बड़वानी में पांच दिवसीय कथक कार्यशाला का समापन:अंतरराष्ट्रीय नृत्यांगना ने छात्राओं को सिखाईं बारीकियां; बालिकाओं ने दी मनमोहक प्रस्तुतियां

April 23, 2026/
9:59 am

बड़वानी में भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं लोक कला को समर्पित संस्था SPIC MACAY और जनजातीय कार्य विभाग के संयुक्त देखरेख...

तमिलनाडु चुनाव के लिए बीजेपी की लिस्ट जारी, कई दिग्गजों को टिकट, अन्नामलाई का नाम गायब

April 3, 2026/
2:43 pm

भाजपा तमिलनाडु उम्मीदवार सूची 2026: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने शुक्रवार को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए अपनी 27 जनजातियों...

इंडिगो को चौथी तिमाही में ₹2,536 करोड़ का घाटा हुआ:पिछले साल ₹3,068 करोड़ का मुनाफा हुआ था; महंगे फ्यूल से कंपनी का नुकसान बढ़ा

May 29, 2026/
6:59 pm

इंडिगो एयरलाइन की पैरेंट कंपनी इंटरग्लोब एविएशन ने 29 मई 2026 को समाप्त हुई चौथी तिमाही (Q4FY26) के नतीजे घोषित...

अक्षय की ‘भूत बंगला’ की वर्ल्डवाइड कमाई 60 करोड़ पहुंची:धुरंधर 2 रिलीज के 31 दिन बाद भी फिल्म को टक्कर दे रही

April 19, 2026/
3:39 pm

अक्षय कुमार की नई फिल्म ‘भूत बंगला’ को बॉक्स ऑफिस पर रणवीर सिंह की ‘धुरंधर 2’ से चुनौती मिल रही...

सारा अली खान ने उत्तराखंड में की ट्रैकिंग:तीन दिन तक 18km पैदल चली, मंडवे की रोटी और लिंगड़ी की सब्जी खाई

April 14, 2026/
8:41 am

सारा अली खान तीन दिन के लिए उत्तराखंड में ट्रैकिंग के लिए पहुंचीं। इस दौरान वे टिहरी में 18 किलोमीटर...

जॉब - शिक्षा

राजनीति

कोलकाता की तंग गलियों में हॉकी का मैदान बना उम्मीद:दो भाइयों की एकेडमी, खेल के सहारे गरीब बच्चों की जिंदगी को नई दिशा

कोलकाता की तंग गलियों में हॉकी का मैदान बना उम्मीद:दो भाइयों की एकेडमी, खेल के सहारे गरीब बच्चों की जिंदगी को नई दिशा

कोलकाता की उमस भरी सुबह, घड़ी में सात बज रहे हैं। सियालदह स्टेशन के बाहर रोज की तरह भीड़ भाग रही है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव की वजह से दीवारों से लेकर बिजली के खंभों तक नेताओं के चेहरे रंगे हुए हैं, लेकिन डॉ. सुरेश सरकार रोड से तीसरी गली में मुड़ते ही माहौल अचानक बदल जाता है। यहां सिर्फ हॉकी स्टिक की ‘टक-टक’ सुनाई देती है। छोटे-छोटे कदमों की ताल, बच्चों की दौड़ और एक कोच की सख्त, लेकिन उम्मीद से भरी आवाज। यह है एंटाली हॉकी एकेडमी। कोलकाता के सबसे पुराने हॉकी सेंटर में से एक। बाहर से देखने पर यह जगह किसी छोटे फुटबॉल मैदान से भी छोटी लगती है] लेकिन इस छोटे से मैदान ने न जाने कितने बच्चों के सपनों को जगह दी है। यह एकेडमी इलाके के बच्चों के लिए उम्मीद का ठिकाना है। यहां आने वाले ज्यादातर बच्चे गरीब परिवारों से हैं। किसी के पिता रिक्शा चलाते हैं, तो किसी की मां सड़क किनारे खाना बेचती हैं। एंटाली की तंग गलियों में जहां कई बार हालात बच्चों का भविष्य निगल लेते हैं, वहां यह मैदान उन्हें हाथ में हॉकी स्टिक देकर लड़ना सिखाता है। यहां के कई बच्चे आगे चलकर कलकत्ता हॉकी लीग के अलग-अलग डिवीजन क्लबों तक पहुंचे हैं। एकेडमी बच्चों को सिर्फ खेल नहीं सिखाती, बल्कि उन्हें अनुशासन, दोस्ती और संघर्ष का मतलब भी समझाती है। पैसों की कमी हमेशा रहती है। बच्चों को बेसिक उपकरण देना भी मुश्किल हो जाता है। फिर भी यहां आने वाले बच्चों के चेहरे पर शिकायत नहीं दिखती। उनके लिए यह मैदान किसी मंदिर जैसा है। चौथी कक्षा में पढ़ने वाली एंजेला की मां पुतुल मंडल बताती हैं, ‘मेरी बेटी यहां पहले ड्रॉइंग प्रतियोगिता में आई थी। फिर उसने जिद पकड़ ली कि हॉकी सीखनी है।’ इसी तरह जुड़वां बहनें तापुर और तुपुर पांच साल से यहां अभ्यास कर रही हैं। अब वे 11 साल की हो चुकी हैं। उनके पिता सुदीप बैद्य कहते हैं, ‘आजकल बच्चों का खुले मैदान में खेलना बहुत कम हो गया है। यह जगह उनके लिए सुरक्षित ठिकाना बन गई है।’ बच्चों को गलत रास्ते से दूर रखने के लिए शुरू हुई थी एकेडमी एकेडमी के संयुक्त सचिव और कोच सुभीर कुमार पान कहते हैं, ‘हमारे लिए हॉकी सिर्फ खेल नहीं, जिंदगी है। इसी खेल ने हमें नौकरी दी, पहचान दी। अब हम इसे बच्चों को लौटाना चाहते हैं।’ सुभीर और उनके भाई प्रबीर दोनों राज्य स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं। उनके गुरु असीम गांगुली ने इस एकेडमी की शुरुआत इसलिए की थी, ताकि इलाके के बच्चों को गलत रास्तों से दूर रखा जा सके। उस छोटी सी गली में शायद देश का अगला बड़ा खिलाड़ी तैयार हो रहा हो। लेकिन, वहां सबसे बड़ी जीत यह है कि कुछ बच्चे सपने देखना सीख रहे हैं।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.