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रिपोर्ट- 90% जापानियों ने चीनी कारों का बहिष्कार किया:फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका ईवी से दूर भाग रहे; इंडोनेशिया, भारत जैसे देश अपनाने में आगे

रिपोर्ट- 90% जापानियों ने चीनी कारों का बहिष्कार किया:फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका ईवी से दूर भाग रहे; इंडोनेशिया, भारत जैसे देश अपनाने में आगे

दुनिया के 31 देशों में औसतन 43% लोग कहते हैं कि बिना कार के जीना उनके लिए असंभव है। 22 देशों में लोग कार को पसंदीदा ट्रांसपोर्ट मानते हैं। 65% अमेरिकी बिना कार लिए नहीं रह सकते हैं। लेकिन भारत के लोगों की पहली पसंद पब्लिक ट्रांसपोर्ट है। देश के 62% लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट को चुनना चाहते हैं। इप्सॉस की ग्लोबल मोबिलिटी रिपोर्ट 2026 में यह खुलासा हुआ है। लेकिन ईवी के सबसे बड़े पैरोकार रहे फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका और कनाडा जैसे देशों का इससे मोहभंग हो रहा है। जापान में यह आंकड़ा -28% तक गिर चुका है। इसके विपरीत इंडोनेशिया (60%), मेक्सिको (60%) और चिली (57%) सबसे आगे हैं। यह सर्वे 31 देशों में किया गया। 23,722 लोगों ने हिस्सा लिया। सेल्फ-ड्राइविंग कार – भारत डरता नहीं – भारत में ईवी अपील 40% है, जो ग्लोबल औसत 47% से थोड़ा कम है। लेकिन यह यूरोप और नॉर्थ अमेरिका से बेहतर स्थिति में है। – 36% लोग सेल्फ-ड्राइविंग कार को असुरक्षित मानते हैं। सबसे आगे फ्रांस (-37%), नीदरलैंड्स (-35%), अमेरिका (-25%) है। – भारत में करीब 47% लोग इस तकनीक में सुरक्षित महसूस करते हैं, जबकि ग्लोबल औसत 36% है। भारतीय बाजार में हर कंपनी के लिए बड़े मौके भारत में 16% किसी टेक कंपनी से कार खरीदना पसंद करेंगे, 22% की पसंद पारंपरिक ऑटोमेकर हैं। – 62% को कोई प्राथमिकता नहीं है। यानी बाजार किसी के लिए बंद नहीं है। टाटा, महिंद्रा से लेकर गूगल, शाओमी जैसी टेक कंपनियों के लिए दरवाजे खुले हैं। एशिया में चीन विरोध बढ़ रहा, भारत के लिए बड़े मौके – जापान में 90% लोग चीनी कार नहीं लेंगे। दक्षिण कोरिया में भी चीन-विरोधी भावना प्रबल है। – कनाडा में 48% लोग अमेरिकी कार नहीं खरीदेंगे। यानी इस माहौल में भारत के लिए बड़े मौके भी हैं। – चीन के खिलाफ यह अविश्वास भारतीय ब्रांड्स के लिए एशियाई बाजारों में रास्ता खोल सकता है। – 42% लोग किसी न किसी खास देश की कार खरीदने से बच रहे हैं। इस लिस्ट में चीनी सबसे ऊपर है। उसका बॉयकॉट रेट (41%) और अमेरिकी कारों के लिए यह आंकड़ा करीब 24% है।

Players are improving their performance with the ‘Batman Effect’

Players are improving their performance with the 'Batman Effect'

Hindi News Sports Players Are Improving Their Performance With The ‘Batman Effect’ रस्टिन डॉड. द न्यूयॉर्क टाइम्स15 मिनट पहले कॉपी लिंक विशेषज्ञों का मानना है कि यह तरीका हमारे दिमाग को नई दिशा देता है। जब हम खुद को किसी मजबूत, आत्मविश्वासी व्यक्ति की तरह देखते हैं, तो हमारा व्यवहार भी वैसा ही होने लगता है। आज की तेज और प्रतिस्पर्धी दुनिया में सफलता सिर्फ प्रतिभा से नहीं मिलती, बल्कि मानसिक मजबूती भी उतनी ही जरूरी है। इसी मानसिक मजबूती के लिए खेल की दुनिया में एक दिलचस्प तरीका सामने आया है- ‘ऑल्टर ईगो’, यानी खुद को कुछ समय के लिए किसी और के रूप में देखना और उसी तरह व्यवहार करना। यह तरीका न सिर्फ खिलाड़ियों, बल्कि आम लोगों के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहा है। एनबीए के स्टार खिलाड़ी शाई गिलगेयस-अलेक्जेंडर की कहानी इसका बेहतरीन उदाहरण है। जब वे 13 साल के थे, तब उनकी सबसे बड़ी समस्या थी उनकी कम हाइट। करीब 5 फुट 6 इंच के इस खिलाड़ी को उनके कोच ने एक अनोखी सलाह दी कि खुद को स्टार एलन आइवरसन की तरह सोचो और खेलो। शुरुआत में यह सिर्फ एक खेल जैसा लगा, लेकिन धीरे-धीरे यह उनकी ताकत बन गया। उन्होंने डरना छोड़ दिया और आत्मविश्वास के साथ खेलना शुरू किया। यह सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि विज्ञान भी इसे सही ठहराता है। मनोवैज्ञानिकों ने एक प्रयोग में बच्चों को अलग-अलग तरीकों से काम करने को कहा। कुछ बच्चों ने खुद के बारे में सोचा, कुछ ने अपने नाम से खुद को देखा, और कुछ बच्चों को बैटमैन या डोरा बनने का मौका दिया गया। नतीजा चौंकाने वाला था, जो बच्चे किरदार में थे, उन्होंने सबसे ज्यादा मेहनत की। इस प्रयोग को ‘बैटमैन इफेक्ट’ कहा गया। दरअसल, जब हम खुद से दूरी बनाकर किसी और की तरह सोचते हैं, तो डर और झिझक कम हो जाती है। यही कारण है कि कई बड़े खिलाड़ी इस टेक्निक का इस्तेमाल करते हैं। महान बास्केटबॉल खिलाड़ी कोबे ब्रायंट ने अपने लिए ‘ब्लैक मांबा’ नाम का किरदार बनाया था। इस किरदार में वे खुद को ज्यादा फोकस्ड और आक्रामक महसूस करते थे। इसी तरह पूर्व बास्केटबॉल खिलाड़ी स्टीव केर ने भी खुद को किसी और खिलाड़ी की तरह सोचकर खेला, जिससे आत्मविश्वास बढ़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तरीका हमारे दिमाग को नई दिशा देता है। जब हम खुद को किसी मजबूत, आत्मविश्वासी व्यक्ति की तरह देखते हैं, तो हमारा व्यवहार भी वैसा ही होने लगता है। धीरे-धीरे यह आदत असली जिंदगी में भी असर दिखाने लगती है। परीक्षा और इंटरव्यू में भी काम आता है यह तरीका यह तरीका सिर्फ खिलाड़ियों के लिए नहीं है। अगर कोई छात्र परीक्षा से डरता है, तो वह खुद को एक आत्मविश्वासी छात्र के रूप में देख सकता है। अगर कोई व्यक्ति इंटरव्यू में घबराता है, तो वह खुद को एक सफल प्रोफेशनल की तरह सोच सकता है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

5 दिग्गज बिजनेस लीडर्स से जानें, नौकरी से क्या सीखा:कोई भी काम छोटा नहीं; कभी आइसक्रीम बेचने वाला आज गोल्डमैन सैक्स का सीईओ

5 दिग्गज बिजनेस लीडर्स से जानें, नौकरी से क्या सीखा:कोई भी काम छोटा नहीं; कभी आइसक्रीम बेचने वाला आज गोल्डमैन सैक्स का सीईओ

हर बड़े लीडर की शुरुआत किसी छोटे काम से ही होती है। महत्वपूर्ण बात ये है कि आप अपने शुरुआती कामों से क्या सीख हासिल करते हैं। अगर दुनिया के कुछ सफल बिजनेस लीडर्स की बात करें तो उन्होंने भी अपनी शुरुआत छोटी-मोटी नौकरी से की। इनमें आइसक्रीम बेचने से लेकर गोल्फ कार्ट साफ करने तक के काम शामिल हैं। लेकिन इन्हीं अनुभवों ने उन्हें वो स्किल्स सिखाईं, जो आगे चलकर उनकी लीडरशिप की पहचान बनीं। आइए जानते हैं ऐसे ही 5 बड़े बॉसेज की पहली नौकरी से मिली सीख.. अपने काम पर फोकस रखें, हमेशा सतर्क रहें डेविड सोलोमन 2018 से दुनिया के कुछ सबसे बड़े निवेश बैंकों में शुमार गोल्डमैन सैक्स ग्रुप इंक. के सीईओ हैं। वे 1999 से वहीं कार्यरत हैं; फिर भी, उन्हें न्यूयॉर्क के वेस्टचेस्टर काउंटी में अपनी पहली नौकरी की यादें आज भी ताजा हैं। डेविड कहते हैं, ‘मैंने 15 साल की उम्र में बास्किन-रॉबिन्स में काम शुरू किया और कॉलेज तक वहीं काम करता रहा।’ डेविड के मुताबिक, ‘जब आप ग्राहक-केंद्रित रिटेल में काम करते हैं, तो आप काम पर फोकस करने और सतर्क रहने का महत्व सीखते हैं। काम के लक्ष्य निर्धारित करें, अनुशासित रहें एंड्रयू मैकडोनाल्ड की पहली नौकरी टोरंटो में एक नौ-होल गोल्फ कोर्स में थी। समय बिताने के लिए उन्होंने अपने दिमाग में छोटे-छोटे खेल बना लिए। इस काम ने उन्हें सिखाया कि लक्ष्य निर्धारित करने से नियमित काम भी सार्थक लगने लगता है। इसने उन्हें अनुशासन भी सिखाया। काम पसंद हो, तो कड़ी मेहनत थकाती नहीं कैटेरिना श्नाइडर की पहली नौकरी लेहमन ब्रदर्स में थी, जो इतिहास का सबसे बड़ा दिवालिया बैंक था। यहां काम करते हुए उन्होंने सीखा कि अगर आप ऐसा काम करते हैं जो आपको रुचिकर और संतुष्टिदायक लगता है, तो आप बिना थके लंबे समय तक कड़ी मेहनत कर सकते हैं। आपके हर खर्च का औचित्य होना चाहिए करियर की शुरुआत में, कैथी ओ’ब्रायन इलेक्ट्रा रिकॉर्ड्स में मार्केटिंग की प्रमुख थीं। एक दिन मुख्य वित्तीय अधिकारी ने उन्हें बुलाया और कहा कि हमेशा अपने खर्च का हिसाब रखना।’ उस नौकरी में उन्होंने जरूरी और गैर-जरूरी खर्च का महत्व और हर खर्च का औचित्य समझना सीखा। टीम के रूप में काम करना महत्वपूर्ण, अपनी छोटी कमाई का भी आनंद लें सिमोज की पहली नौकरी 15 साल की उम्र में एक अकाउंटेंसी फर्म ऑफिस में लगी। यहां उन्हें वित्तीय रिपोर्टों को वर्णमाला क्रम में व्यवस्थित करना होता था। इसने कम उम्र में ही कार्य में नैतिकता का महत्व सिखाया।

33% more expensive, yet advance bookings are available

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Hindi News Business Indian Mango Craze: 33% More Expensive, Yet Advance Bookings Are Available न्यूयॉर्क8 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिका में भारतीय आमों के प्रति दीवानगी देखी जा रही है। लोग आमों की खेप वाली फ्लाइट्स को ट्रैक कर रहे हैं। अप्रैल में पहली खेप आने से पहले ही सारे प्री-ऑर्डर बिक गए। लोग 10-12 आमों के एक बॉक्स के लिए 5,600 रुपए तक खर्च करने को तैयार हैं। यही बॉक्स पिछले साल करीब 3700- 4200 रु. में मिल जा रहे थे। 33% तक आम महंगे हुए हैं। इसकी बड़ी वजह ईरान युद्ध के बाद तेल के दाम बढ़ना, शिपमेंट महंगा होना है। एक साल में भारतीय आम के दाम 4,200 से 5,600 रु. प्रति बॉक्स हुए फ्लाइट्स कम होने से कुछ शिपमेंट लेट या कैंसिल भी हुए, जिससे खर्च और बढ़ा। अमेरिका के ग्रोसरी स्टोर में सालभर मिलने वाले मेक्सिकन आम जहां करीब 945 में मिल जाते हैं, वहीं भारतीय आमों को लोग स्वाद में अलग और ज्यादा मीठा मानते हैं। महाराष्ट्र का अल्फांसो, गुजरात का केसर, उत्तर भारत का चौसा और लंगड़ा, दक्षिण भारत का बंगनपल्ली वहां सबसे ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं। दशकों तक लगा रहा बैन, 2007 में हटा प्रतिबंध, तब अमेरिका पहुंचा भारतीय स्वाद दुनिया की आधी मैंगो सप्लाई भारत करता है, फिर भी दशकों तक यह अमेरिका में बैन रहा। इसका कारण ‘हॉट-वॉटर ट्रीटमेंट’ (गर्म पानी से कीड़े मारना) था, जिससे भारतीय आम खराब हो जाते थे। साथ ही दक्षिण अमेरिकी लॉबी का भी दबाव था। बाद में ‘गामा रेडिएशन’ (किरणों के जरिए कीटाणु मुक्त करना) तकनीक समाधान बनी। साल 2006 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और पीएम मनमोहन सिंह के बीच समझौते के बाद, 2007 में भारतीय आम आधिकारिक तौर पर अमेरिका पहुंचे। अमेरिकी ग्राहक वफादार, मैंगो पास भी बिक रहा भारतीय आमों के सबसे वफादार ग्राहक अब खुद अमेरिकी नागरिक बन रहे हैं, जबकि भारतीय प्रवासी अक्सर इसकी कीमतों पर नाराजगी जताते हैं। भारी मांग को देखते हुए ‘जीजी मैंगो’ जैसी कंपनियां 1000 डॉलर (करीब 94 हजार रुपए) में पूरे सीजन का ‘मैंगो पास’ ऑफर कर रही हैं। अब वॉलमार्ट और कोस्टको जैसे बड़े रिटेलर्स के जरिए भी इसे बेचने की तैयारी है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

द ओडिसी’ का ट्रेलर जारी:ट्रोजन युद्ध के बाद ओडीसियस की घर लौटने की जर्नी पर है कहानी

द ओडिसी’ का ट्रेलर जारी:ट्रोजन युद्ध के बाद ओडीसियस की घर लौटने की जर्नी पर है कहानी

हॉलीवुड के मशहूर निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ‘द ओडिसी’ का नया ट्रेलर जारी कर दिया गया है। मेकर्स ने 5 मई को ट्रेलर के साथ फिल्म की रिलीज डेट का भी ऐलान किया। यह फिल्म ग्रीक पौराणिक कथा के नायक ओडीसियस की रोमांचक कहानी पर आधारित है। इस किरदार में मैट डेमन नजर आएंगे, जबकि टॉम हॉलैंड उनके बेटे टेलीमाकस की भूमिका निभा रहे हैं। ट्रेलर में भव्य विजुअल्स और नोलन की सिग्नेचर स्टाइल साफ दिखाई दे रही है, जिससे फिल्म को लेकर दर्शकों में उत्साह और बढ़ गया है। ‘द ओडिसी’ तकनीकी रूप से भी खास मानी जा रही है। यह पूरी तरह IMAX कैमरों से शूट की जाने वाली पहली कथात्मक फिल्म होगी, जिससे बड़े पर्दे पर इसका अनुभव और भी शानदार बनने की उम्मीद है। खास बात यह है कि मेकर्स ने फिल्म के प्रमोशन के लिए जुलाई 2025 में ही 70mm स्क्रीनिंग के टिकट जारी कर दिए थे, जो इसकी लोकप्रियता को दर्शाता है। फिल्म की कहानी ट्रोजन युद्ध के बाद ओडीसियस की अपने घर इथाका लौटने की साहसिक यात्रा के इर्द-गिर्द घूमती है। यह फिल्म 17 जुलाई को रिलीज होगी।

2 मिनट वाले एपिसोड का क्रेज:हर महीने 1 हजार शोज बनाने की तैयारी; 2030 तक 42 हजार करोड़ के बाजार का अनुमान

2 मिनट वाले एपिसोड का क्रेज:हर महीने 1 हजार शोज बनाने की तैयारी; 2030 तक 42 हजार करोड़ के बाजार का अनुमान

भारत में मनोरंजन देखने का तरीका तेजी से बदल रहा है। लंबी फिल्में और टीवी सीरियल की जगह अब लोग मोबाइल पर माइक्रो-ड्रामा ज्यादा देख रहे हैं। इन शोज के एपिसोड 2 मिनट से भी कम के होते हैं और लोग इन्हें दिन के छोटे-छोटे ब्रेक में बिंज-वॉच कर रहे हैं। यह मुख्य रूप से मोबाइल फोन के लिए वर्टिकल फॉर्म में डिजाइन किया गया है, जिसे कहीं भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। निवेश फर्म लुमिकाई की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में माइक्रो-ड्रामा का बाजार अभी करीब 2,856 करोड़ रुपए का है, जो 2030 तक 42,844 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। 68% ऑडियंस छोटे शहरों से, 40% दर्शक महिलाएं एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत में हर महीने करीब 4 करोड़ यूजर माइक्रो-ड्रामा देखते हैं। करीब 68% ऑडियंस टियर-2/टियर-3 शहरों से आती है, जहां सिनेमाघर कम, टीवी कमजोर और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की पहुंच सीमित रहती है। करीब 40% दर्शक महिलाएं हैं। बड़े प्रोड्यूसर व एआई से बढ़ा निवेश इसमें अब बड़े प्रोड्यूसर भी निवेश कर रहे हैं। मुकेश अंबानी की कंपनी जियोस्टार ने ‘तड़का’ नाम से प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है, जिस पर 100 से ज्यादा शोज हैं। जी एंटरटेनमेंट और बालाजी टेलीफिल्म्स भी इस फॉर्मेट में उतर चुके हैं। कई कंपनियां अब एआई की मदद से इसे 1 हजार प्रति माह तक ले जाने की योजना बना रही हैं। ओटीटी से 90% सस्ता माइक्रो-ड्रामा माइक्रो-ड्रामा फिल्ममेकर के मुताबिक माइक्रो-ड्रामा का पूरा सीजन बनाना ओटीटी सीरीज के मुकाबले 70-90% सस्ता पड़ता है। शूटिंग 3-4 दिन में हो जाती है। लागत करीब 15 हजार से 20 हजार रुपए प्रति मिनट कंटेंट बताई गई है। पूरा सीजन 10-15 लाख रुपए में बन जाता है, जिसे 20 से 50 रुपए महीने की सब्सक्रिप्शन से उठाया जाता है।

आमिर खान ने ‘4 इडियट्स’ को दी हरी झंडी:AI और आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर आधारित होगी कहानी, विकी कौशल की एंट्री लगभग तय

आमिर खान ने ‘4 इडियट्स’ को दी हरी झंडी:AI और आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर आधारित होगी कहानी, विकी कौशल की एंट्री लगभग तय

भारतीय सिनेमा की कल्ट फिल्म ‘3 इडियट्स’ के सीक्वल को लेकर चल रही अटकलों पर अब विराम लग गया है। आमिर खान ने खुद इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है, जिससे यह साफ हो गया है कि ‘इडियट्स’ की दुनिया एक बार फिर परदे पर लौटने वाली है। सोशल मीडिया पर इसे फिलहाल ‘4 इडियट्स’ के नाम से चर्चा मिल रही है और इंडस्ट्री में इसे 2026-27 के सबसे बड़े प्रोजेक्ट्स में गिना जा रहा है। निर्देशक राजकुमार हिरानी और लेखक अभिजात जोशी ने कहानी को अंतिम रूप देने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। सीक्वल की कहानी पहली फिल्म के अंत के करीब 10 से 15 साल बाद की होगी, जहां रैंचो, फरहान और राजू की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी होगी। कहानी इस बात को दिखाएगी कि सफलता के बाद भी नई चुनौतियां कैसे उन्हें फिर एक साथ लाती हैं और बदलते समय में शिक्षा व्यवस्था से उनका टकराव कैसे होता है। आमिर ने खुद स्वीकार किया है कि उन्होंने कहानी का नरेशन सुन लिया है और यह बेहद अतरंगी है। फिल्म के लिए कई मीटिंग्स हो चुकीं रोचक ये भी है कि हिरानी के साथ ‘संजू’ और ‘डंकी’ जैसी फिल्मों में काम कर चुके विकी को स्क्रिप्ट काफी पसंद आई है। बताया जा रहा है कि उनका किरदार कहानी में एक नया इमोशनल और फ्रेश एंगल जोड़ेगा। विकी, आमिर और हिरानी के बीच इस प्रोजेक्ट को लेकर कई दौर की मीटिंग्स भी हो चुकी हैं। विकी ने मौखिक तौर पर भूमिका के लिए हामी भर दी है। शूटिंग 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत में शुरू हो सकती है। इस बार फिल्म का नाम ‘4 इडियट्स’ रखने के पीछे की वजह भी काफी दिलचस्प बताई जा रही है। सूत्रों की मानें तो कहानी इस बार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक दौर की ‘प्रेशर कुकर’ वाली शिक्षा प्रणाली पर टारगेट करेगी। सीक्वल इस बात पर केंद्रित हो सकता है कि कैसे डिजिटल दुनिया में मशीन बनने की दौड़ ने इंसानी जज्बातों को पीछे छोड़ दिया है। विकी कौशल भी बन सकते हैं फिल्म का हिस्सा फिल्म की कास्टिंग को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुकता बनी हुई है। आमिर एक बार फिर रैंचो उर्फ फुंसुख वांगडू के किरदार में नजर आएंगे, यह लगभग तय हो चुका है। वहीं आर. माधवन और शरमन जोशी की वापसी को लेकर आधिकारिक घोषणा भले न हुई हो, लेकिन तीनों एक्टर्स ने एक साथ शूट करने के लिए दिलचस्पी दिखाई है। सीक्वल में सबसे बड़ा बदलाव ‘चौथे इडियट’ की एंट्री को लेकर बताया जा रहा है। चर्चा है कि राजकुमार हिरानी इस नई भूमिका के लिए विकी कौशल को कास्ट कर सकते हैं।

भारतीय पत्रकार आनंद और सुपर्णा को पुलित्जर प्राइज:इलस्ट्रेशन और दमदार कमेंट्री से बताई थी डिजिटल अरेस्ट-साइबर फ्रॉड की भयावहता

भारतीय पत्रकार आनंद और सुपर्णा को पुलित्जर प्राइज:इलस्ट्रेशन और दमदार कमेंट्री से बताई थी डिजिटल अरेस्ट-साइबर फ्रॉड की भयावहता

दो भारतीय पत्रकारों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत की है। आनंद आरके और सुपर्णा शर्मा ने साइबर अपराध को उजागर करने वाली अहम खोजी रिपोर्टिंग के लिए प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार जीता है। उन्हें यह सम्मान नताली ओबिको पियर्सन के साथ इलस्ट्रेटेड रिपोर्टिंग और कमेंट्री श्रेणी में दिया गया। ‘पत्रकारिता के नोबेल’ के तौर पर चर्चित यह पुरस्कार उन्हें ब्लूमबर्ग के लिए तैयार की गई विशेष रिपोर्ट ‘ट्रैप्ड’ के लिए मिला। जानिए इस इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट और दोनों की उपलब्धियों के बारे में… इस पत्रकार जोड़ी द्वारा बनाई गई रिपोर्ट ‘ट्रैप्ड’ लखनऊ की न्यूरोलॉजिस्ट रुचिरा टंडन के साथ हुई सच्ची घटना के जरिए ‘डिजिटल अरेस्ट’ के भयानक तंत्र को उजागर करती है। आनंद के प्रभावशाली चित्रण और सुपर्णा की गहन पत्रकारिता का यह अनूठा मेल दिखाता है कि कैसे साइबर अपराधी तकनीक का इस्तेमाल कर किसी व्यक्ति को मानसिक रूप से बंधक बना लेते हैं। यह स्टोरी सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि निगरानी तंत्र के दुरुपयोग और वैश्विक स्तर पर बढ़ते संगठित डिजिटल घोटालों की एक गंभीर चेतावनी भी है। आइजनर पुरस्कार भी जीत चुके हैं आनंद मुंबई में रहने वाले आनंद इलस्ट्रेटर और विजुअल आर्टिस्ट हैं। उन्होंने 2021 में इमेज कॉमिक्स द्वारा प्रकाशित ग्राफिक उपन्यास ‘ब्लू इन ग्रीन’ के लिए कलरिस्ट जॉन पीयरसन के साथ ‘बेस्ट पेंटर/मल्टीमीडिया आर्टिस्ट’ का आइजनर पुरस्कार भी जीता था। सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से स्नातक आनंद ने डार्क हॉर्स कॉमिक्स की ‘ग्रैफिटीज वॉल’, वॉल्ट की ‘रेडियो एपोकैलिप्स’ और डीसी कॉमिक्स की ‘रेजरेक्शन मैन’ जैसी कृतियों का चित्रण किया है। उन्होंने बूम! स्टूडियोज, 2000 एडी, टाइनी अनियन व इमेज कॉमिक्स जैसे प्रकाशकों के लिए कवर आर्ट बनाया है। उन्होंने हुंडई, भारतीय नौसेना, इमेजिन-एफएक्स मैगजीन व हैवी मेटल मैगजीन जैसे क्लाइंट्स के साथ भी काम किया है। केयर सेंटर में लापरवाही का खुलासा कर चुकी हैं सुपर्णा सुपर्णा फ्रीलांस खोजी पत्रकार और संपादक हैं। इन्हें अपराध, संघर्ष, आपदाओं व भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग का तीन दशकों का अनुभव है। 2023 में अल जजीरा के लिए दिल्ली के एक केयर फैसिलिटी में लगी भीषण आग पर उनकी जांच ने बुजुर्गों की देखभाल के क्षेत्र में लापरवाही और सच्चाई को दबाने के कथित प्रयासों का पर्दाफाश किया था। भारतीय मूल के अनिरुद्ध भी विजेता हनोई में रहने वाले भारतवंशी पत्रकार अनिरुद्ध घोषाल ने इंटरनेशनल रिपोर्टिंग श्रेणी में पुलित्जर जीता। एसोसिएटेड प्रेस (एपी) से जुड़े अनिरुद्ध की रिपोर्ट अमेरिकी बॉर्डर पैट्रोल द्वारा सिलिकॉन वैली व चीन में विकसित निगरानी उपकरणों पर थी। वहीं, दक्षिण-पूर्व एशिया में साइबर क्राइम व मानव तस्करी नेक्सस का पर्दाफाश करने वाले बैंकॉक के भारतवंशी पत्रकार देवज्योत फाइनलिस्ट रहे।

भारतीय पत्रकार आनंद और सुपर्णा को पुलित्जर प्राइज:इलस्ट्रेशन और दमदार कमेंट्री से बताई थी डिजिटल अरेस्ट-साइबर फ्रॉड की भयावहता

भारतीय पत्रकार आनंद और सुपर्णा को पुलित्जर प्राइज:इलस्ट्रेशन और दमदार कमेंट्री से बताई थी डिजिटल अरेस्ट-साइबर फ्रॉड की भयावहता

दो भारतीय पत्रकारों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान मजबूत की है। आनंद आरके और सुपर्णा शर्मा ने साइबर अपराध को उजागर करने वाली अहम खोजी रिपोर्टिंग के लिए प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार जीता है। उन्हें यह सम्मान नताली ओबिको पियर्सन के साथ इलस्ट्रेटेड रिपोर्टिंग और कमेंट्री श्रेणी में दिया गया। ‘पत्रकारिता के नोबेल’ के तौर पर चर्चित यह पुरस्कार उन्हें ब्लूमबर्ग के लिए तैयार की गई विशेष रिपोर्ट ‘ट्रैप्ड’ के लिए मिला। जानिए इस इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट और दोनों की उपलब्धियों के बारे में… इस पत्रकार जोड़ी द्वारा बनाई गई रिपोर्ट ‘ट्रैप्ड’ लखनऊ की न्यूरोलॉजिस्ट रुचिरा टंडन के साथ हुई सच्ची घटना के जरिए ‘डिजिटल अरेस्ट’ के भयानक तंत्र को उजागर करती है। आनंद के प्रभावशाली चित्रण और सुपर्णा की गहन पत्रकारिता का यह अनूठा मेल दिखाता है कि कैसे साइबर अपराधी तकनीक का इस्तेमाल कर किसी व्यक्ति को मानसिक रूप से बंधक बना लेते हैं। यह स्टोरी सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि निगरानी तंत्र के दुरुपयोग और वैश्विक स्तर पर बढ़ते संगठित डिजिटल घोटालों की एक गंभीर चेतावनी भी है। आइजनर पुरस्कार भी जीत चुके हैं आनंद मुंबई में रहने वाले आनंद इलस्ट्रेटर और विजुअल आर्टिस्ट हैं। उन्होंने 2021 में इमेज कॉमिक्स द्वारा प्रकाशित ग्राफिक उपन्यास ‘ब्लू इन ग्रीन’ के लिए कलरिस्ट जॉन पीयरसन के साथ ‘बेस्ट पेंटर/मल्टीमीडिया आर्टिस्ट’ का आइजनर पुरस्कार भी जीता था। सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से स्नातक आनंद ने डार्क हॉर्स कॉमिक्स की ‘ग्रैफिटीज वॉल’, वॉल्ट की ‘रेडियो एपोकैलिप्स’ और डीसी कॉमिक्स की ‘रेजरेक्शन मैन’ जैसी कृतियों का चित्रण किया है। उन्होंने बूम! स्टूडियोज, 2000 एडी, टाइनी अनियन व इमेज कॉमिक्स जैसे प्रकाशकों के लिए कवर आर्ट बनाया है। उन्होंने हुंडई, भारतीय नौसेना, इमेजिन-एफएक्स मैगजीन व हैवी मेटल मैगजीन जैसे क्लाइंट्स के साथ भी काम किया है। केयर सेंटर में लापरवाही का खुलासा कर चुकी हैं सुपर्णा सुपर्णा फ्रीलांस खोजी पत्रकार और संपादक हैं। इन्हें अपराध, संघर्ष, आपदाओं व भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग का तीन दशकों का अनुभव है। 2023 में अल जजीरा के लिए दिल्ली के एक केयर फैसिलिटी में लगी भीषण आग पर उनकी जांच ने बुजुर्गों की देखभाल के क्षेत्र में लापरवाही और सच्चाई को दबाने के कथित प्रयासों का पर्दाफाश किया था। भारतीय मूल के अनिरुद्ध भी विजेता हनोई में रहने वाले भारतवंशी पत्रकार अनिरुद्ध घोषाल ने इंटरनेशनल रिपोर्टिंग श्रेणी में पुलित्जर जीता। एसोसिएटेड प्रेस (एपी) से जुड़े अनिरुद्ध की रिपोर्ट अमेरिकी बॉर्डर पैट्रोल द्वारा सिलिकॉन वैली व चीन में विकसित निगरानी उपकरणों पर थी। वहीं, दक्षिण-पूर्व एशिया में साइबर क्राइम व मानव तस्करी नेक्सस का पर्दाफाश करने वाले बैंकॉक के भारतवंशी पत्रकार देवज्योत फाइनलिस्ट रहे।

पाकिस्तान में जन्म, न्यूजीलैंड से रिकॉर्ड:पिता की कोचिंग और अकरम से प्रेरणा; अब्बास ने डेब्यू मैच में ही रचा इतिहास

पाकिस्तान में जन्म, न्यूजीलैंड से रिकॉर्ड:पिता की कोचिंग और अकरम से प्रेरणा; अब्बास ने डेब्यू मैच में ही रचा इतिहास

लाहौर में जन्मे मुहम्मद अब्बास जब एक साल के थे, तब उनका परिवार हजारों किलोमीटर दूर न्यूजीलैंड के ऑकलैंड चला गया ​था। अब पाकिस्तान की कोई याद उनके पास नहीं बची। लेकिन पहचान दो देशों से मिलकर बनी है- खून में पाकिस्तान और परवरिश में न्यूजीलैंड। अब्बास कहते हैं, ‘मैं बहुत छोटा था, इसलिए कुछ याद नहीं है। लेकिन मेरी पूरी परवरिश न्यूजीलैंड में हुई।’ यही दोहरी पहचान उनकी कहानी को खास बनाती है। अब्बास के पिता की वजह से उनका क्रिकेट से बचपन से ही लगाव था। अब्बास के शुरुआती हीरो पाकिस्तानी पेसर वसीम अकरम रहे। अब्बास कहते हैं, ‘मैंने उनके करियर का आखिरी हिस्सा ही देखा, लेकिन मेरे पापा हमेशा उनके बारे में बताते थे।’ बाद में न्यूजीलैंड के खिलाड़ियों ने उन्हें प्रेरित किया। केन विलियमसन और ट्रेंट बोल्ट उनके रोल मॉडल बने। कुछ साल पहले उनकी जिंदगी में एक बड़ा मोड़ आया। पिता को वेलिंगटन में कोच की नौकरी मिली। अब अब्बास के सामने दो रास्ते थे, ऑकलैंड में रहना या परिवार के साथ वेलिंगटन जाना। उन्होंने परिवार को चुना। यही बदलाव उन्हें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट तक ले आया। मार्च 2025 में उन्हें न्यूजीलैंड के लिए वनडे डेब्यू का मौका मिला। खास बात यह थी कि मुकाबला पाकिस्तान के खिलाफ नेपियर में था। अब्बास कहते हैं ‘यह थोड़ा अजीब अहसास था। मैं उम्मीद नहीं कर रहा था कि खेलूंगा, लेकिन अचानक प्लेइंग इलेवन में आ गया। यह मेरे लिए सपने जैसा था।’ उन्होंने डेब्यू को यादगार बना दिया। नंबर-6 पर बल्लेबाजी करते हुए 26 गेंदों में 52 रन ठोक दिए और डेब्यू मैच में सबसे तेज फिफ्टी का रिकॉर्ड बना दिया। वे मुस्कुराते हुए कहते हैं, ‘मुझे उस समय पता ही नहीं था कि यह रिकॉर्ड है। बाद में बताया गया। अभी भी विश्वास नहीं होता।’ टॉम लैथम जैसे खिलाड़ियों के साथ ड्रेसिंग रूम साझा करना उन्हें अब भी खास लगता है। हालांकि, पाकिस्तान से उनका रिश्ता अब भी कायम है। वे कहते हैं ‘मेरे कई रिश्तेदार वहां हैं। मैं 2018 तक नियमित जाता था। अब क्रिकेट की वजह से नहीं जा पाता, लेकिन दोनों देशों से मेरा गहरा जुड़ाव है।’ क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं बल्कि​ पिता से जुड़ा खास रिश्ता अब्बास के क्रिकेटिंग करियर की शुरुआत उनके पिता से होती है। उनके पिता ही उनके कोच भी रहे हैं। क्रिकेट उनके लिए सिर्फ खेल नहीं, बल्कि पिता से जुड़ा रिश्ता भी है। वे बताते हैं, ‘मेरे पिता ही मेरे सबसे बड़े कोच हैं। वे बॉलिंग कोच हैं और बचपन से मैंने उन्हीं के साथ ट्रेनिंग की है। उन्होंने ही मुझे क्रिकेट से जोड़ा।’ पिता के साथ बिताए गए समय, अभ्यास और अनुशासन ने उन्हें एक मजबूत खिलाड़ी बनाया।