Sunday, 19 Apr 2026 | 08:06 PM

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घरेलू सिलेंडरों की कालाबाजारी बढ़ी:सरकार ने कमर्शियल सिलेंडर की शुरू की डिलीवरी, लेकिन ग्वालियर में अभी बंद

घरेलू सिलेंडरों की कालाबाजारी बढ़ी:सरकार ने कमर्शियल सिलेंडर की शुरू की डिलीवरी, लेकिन ग्वालियर में अभी बंद

बुकिंग प्रक्रिया को धीमा कर बेशक गैस की किल्लत को कम दिखाया जा रहा हो। लेकिन हकीकत में ये किल्लत अब भी उतनी ही बनी हुई है। क्योंकि, ग्वालियर को अपेक्षाकृत सिलेंडर की सप्लाई नहीं मिल पा रही। एक तरफ जहां केंद्र सरकार ने कमर्शियल सिलेंडर देने पर लगी रोक हटा दी। मगर ग्वालियर में अब भी इस पर प्रतिबंध ही लगाकर रखा गया है। जिसका नतीजा यह है कि खानपान के सभी सेंटर घरेलू सिलेंडरों को लेकर व्यापार कर रहे हैं। जिससे घरेलू सिलेंडरों की कालाबाजारी बढ़ गई है। दूसरी तरफ खाद्य आपूर्ति विभाग और गैस कंपनियों के अधिकारी दावा कर रहे हैं कि जिले की गैस एजेंसियों के पास करीब 16 हजार घरेलू और 1400 कमर्शियल सिलेंडरों का स्टॉक मौजूद है। जिसमें से कमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई अस्पताल व जरुरी सेवाओं के लिए दी जा रही है। रिफिलिंग सेंटर और चूल्हा दुकानों की जांच नहीं गैस को लेकर चल रही परेशानियों के बाद भी शहर में ऐसी दुकानों पर टीमें नहीं पहुंची हैं। जहां से गैस सिलेंडर बेचे जाते हैं। हजीरा में पटेल स्कूल के पास, चंद्रनगर, कॉलोनीपुरा,शील नगर, ट्रांसपोर्ट नगर, गोल पहाडिया, ढोलीबुआ का पुल, गिरवाई चौकी के पीछे, गोवर्धन कॉलोनी, हुरावली आदि क्षेत्रों में ये दुकानें हैं। जिन पर लोग सिलेंडर मनमाने दामों में बेच रहे हैं। वहीं एजेंसी हॉकर्स भी कालाबाजारी कर कमर्शियल उपयोग करने वालों को घरेलू सिलेंडर दे रहे हैं। सिलेंडर आएंगे तभी मिलेगा कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई के लिए गाइडलाइन तो आ गई है। लेकिन ग्वालियर के लिए झांसी से सिलेंडर नहीं आ पा रहे हैं। जिस कारण ये सप्लाई रोकी गई है। सिलेंडर आने के बाद इस सप्लाई को शुरू कर दिया जाएगा। – कल्पेश मौर्य, नोलि अधिकारी

यूनाइटेड एयरलाइंस की महिला पायलट क्रैस्टन की दिलचस्प कहानी:9 की उम्र में पायलट बनने की ठानी, 22 में बिना डिग्री संभाला कॉकपिट; अब 18 हजार लोगों में सबसे सीनियर महिला अफसर हैं क्रैस्टन

यूनाइटेड एयरलाइंस की महिला पायलट क्रैस्टन की दिलचस्प कहानी:9 की उम्र में पायलट बनने की ठानी, 22 में बिना डिग्री संभाला कॉकपिट; अब 18 हजार लोगों में सबसे सीनियर महिला अफसर हैं क्रैस्टन

अमेरिका की 64 वर्षीय कैप्टन क्रैस्टन विल्सन दुनिया की दिग्गज यूनाइटेड एयरलाइंस के 18 हजार पायलटों में सबसे ‘सीनियर’ महिला पायलट बनने जा रही हैं। यह उपलब्धि बेहद खास है क्योंकि इस एयरलाइन के 100 साल के सफर में अब तक कोई महिला इस पद पर नहीं पहुंची। पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में, जहां आज भी महिला पायलटों की हिस्सेदारी महज 6% है, क्रैस्टन का यह सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। उनका मुकाम यह साबित करता है कि अगर इरादे बुलंद हों, तो बिना किसी कॉलेज डिग्री के भी कड़ी मेहनत के दम पर सालाना ₹3.70 करोड़ रुपए (4 लाख डॉलर) का पैकेज हासिल किया जा सकता है। पढ़िए इनके जीवन की कहानी… लिंगभेद की दीवार तोड़ी क्रैस्टन के सफर की शुरुआत 9 साल की उम्र में हुई, जब उन्होंने पहली बार हवाई जहाज की खिड़की से दुनिया को देखा था। वे बताती हैं, ‘तब मेरे पिता मुझे फोटोग्राफी के लिए एक छोटी हवाई यात्रा पर ले गए थे। मैं उस दिन बहुत खुश होकर मुस्कुरा रही थी।’ पिता ने खुशी का कारण पूछा, तो क्रैस्टन का जवाब सीधा और स्पष्ट था, ‘बड़ी होकर मैं यही काम करूंगी।’ हालांकि तब उन्हें किसी ने ये नहीं बताया था कि लड़कियां अक्सर पायलट नहीं बनती, इसलिए क्रैस्टन ने कभी असंभव नहीं माना। पहली बार आवेदन देते हुए असफल होने का डर था क्रैस्टन ने कॉलेज में पढ़ाई के साथ उड़ान का प्रशिक्षण लेना शुरू किया। उन्होंने स्टूडेंट पायलट सर्टिफिकेट, प्राइवेट पायलट लाइसेंस और अन्य उड़ान प्रमाणपत्र हासिल किए। रोचक बात यह है कि इसके लिए उन्हें तब किसी पारंपरिक डिग्री की जरूरत नहीं पड़ी। उनका ‘फ्लाइंग आवर्स’ ही असली डिग्री बना। क्रैस्टन के मुताबिक पहली बार नौकरी के लिए जब उनके एक छात्र ने उन्हें एयरलाइंस का आवेदन पत्र दिया, तो उन्हें अपनी सफलता पर शक था। विल्सन कहती हैं, ‘मुझे लगा था कि मेरा चुना जाना नामुमकिन है’। लेकिन 22 साल की उम्र में उनकी काबिलियत ने उन्हें कॉकपिट तक पहुंचा दिया। फिर को-पायलट, पायलट का सफर तय करते हुए 31 साल से कैप्टन हैं। त्योहारों में घर से दूर रहीं, बच्चों के जन्मदिन में शामिल नहीं हो सकी क्रैस्टन का शीर्ष पर पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था। वे बताती हैं कि शुरुआती दिनों में उन्हें परिवार से दूर रहना पड़ता था। वे कहती हैं, ‘पायलट होने का मतलब है कि आप बच्चों के जन्मदिन और उनके मैच मिस करेंगे। अगर आप हर त्योहार पर घर रहना चाहते हैं, तो शायद यह क्षेत्र आपके लिए नहीं है।’ आज वे बोइंग 787 उड़ाती हैं और महीने में 12 दिन हवाई यात्रा में गुजरते हैं। उनका अपने क्रू से बस एक ही मंत्र होता है, ‘हमें इतनी सुरक्षित लैंडिंग करनी है कि अगले दिन खबरों में नहीं, बल्कि मुसाफिरों के दिलों में जगह मिल सके।’

डॉ.हेल्म्सटेटर की बुक से पढ़ें सोच का जादू:मैं बूढ़ा हो गया, यह सोच बदलें; छोटे काम पूरे करके खुद की तारीफ करें

डॉ.हेल्म्सटेटर की बुक से पढ़ें सोच का जादू:मैं बूढ़ा हो गया, यह सोच बदलें; छोटे काम पूरे करके खुद की तारीफ करें

आप क्या चाहते हैं व उसे कैसे हासिल करें? दरअसल हमारा दिमाग रोज हजारों बार खुद से बात करता है। यदि ये बातें नकारात्मक हों तो मुश्किलें आती हैं। खासकर बुजुर्ग अक्सर सोचते हैं कि अब कुछ नहीं हो सकता। इस सोच को बदलें, छोटे काम पूरे करके खुद की तारीफ करें। इससे आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा और अकेलापन कम महसूस होगा। आपके मन में नकारात्मक बातें आएं तो ये 3 काम करें, आत्मविश्वास बढ़ेगा और खुशी मिलेगी नकारात्मक बातों को तुरंत रोकें जब भी मन में ‘मैं बूढ़ा हो गया’ जैसी बातें आएं तो तुरंत रोकें। उनकी जगह पॉजिटिव वाक्य बोलें-‘मैं अभी भी सीख सकता हूं’। रोजाना 10 बार यह अभ्यास करें। इससे आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा। सफलता की कल्पना करें रोज सुबह 5 मिनट आंखें बंद करके सोचें कि आप क्या चाहते हैं-परिवार के साथ घूमना, नया हुनर सीखना या पोते-पोतियों को कुछ सिखाना। इसे इतना साफ देखें जैसे वह सच हो चुका है। छोटे लक्ष्य बनाएं और खुशी मनाएं सप्ताह में एक छोटा काम चुनें। जैसे रोज 10 मिनट वॉक करना या एक पुरानी किताब पढ़ना। जब पूरा हो जाए तो खुद को तारीफ दें-‘मैंने अच्छा किया’। यह आदत बन जाएगी तो आप खुश रहेंगे।

बुजुर्गों को लंबी नींद से ज्यादा जरूरी गहरी नींद:बबल फुलाएं, गुनगुने पानी में पैर डुबोएं; नींद अच्छी आएगी

बुजुर्गों को लंबी नींद से ज्यादा जरूरी गहरी नींद:बबल फुलाएं, गुनगुने पानी में पैर डुबोएं; नींद अच्छी आएगी

बढ़ती उम्र में अच्छी नींद दवाई के जैसी है। इसमें भी लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहने से ज्यादा जरूरी है गहरी नींद। यह बात नींद पर हुईं कई रिसर्च में साबित हो चुकी है। अब सवाल यह है कि गहरी नींद आएगी कैसे? इसमें सोने से पहले बबल फुलाना, नमक के गुनगुने पानी में पैर रखकर बैठने जैसे तरीके मदद करेंगे। अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन की रिसर्च कहती है अच्छी नींद के दौरान शरीर खुद को रिपेयर करता है। याददाश्त मजबूत, इम्युनिटी बेहतर होती है। इन परेशानियों को नजरअंदाज न करें, डॉक्टर से मिलें नीचे दी परेशानियों में से यदि 2-3 लगातार 2-3 हफ्ते या उससे ज्यादा समय से हों रही हैं तो नींद विशेषज्ञ या जनरल फिजिशियन से मिलें। रात के वक्त सोने में देर लगना- 30-60 मिनट या उससे ज्यादा समय लगना। रात में 3-4 बार उठना और फिर नींद न आना। जोर से खर्राटे और सांस रुकना – स्लीप एप्निया, ये अटैक का खतरा बढ़ाता है। पैरों में दर्द या अकड़न रेस्टलेस लेग सिंड्रोम। चिंता या पुरानी यादों से परेशानी – दिमाग का लंबे समय तक शांत नहीं होना रात 2-3 बजे उठकर फिर से नहीं सो पाना। ये 5 तरीके आपको गहरी नींद लाने में करेंगे मदद एक रूटीन बनाएं – सोने-उठने का समय रोज एक रखें। रात में चाय-कॉफी से बचें। तरीका – खासकर सोने के लिए अलार्म लगाएं। जैसे रात 10 बजे। वहीं रोज सुबह बिना अलार्म उठने के लिए माइंडसेट करें। बबल ब्लोइंग – सोने से पहले बुलबुले फुलाने से अनिद्रा दूर होती है। तरीका- बिस्तर या कुर्सी पर बैठें। बबल मेकर लें। नाक से 4 सेकंड सांस लें, फिर मुंह से 8-10 सेकंड धीरे-धीरे सांस बाहर फूंकें। इसे 5 से 8 बार दोहराएं। सोने का माहौल बनाएं – कमरा अंधेरा, मन शांत व तापमान सेहत अनुकूल रखें। तरीका – पर्दे बंद करें, फोन को ‘नाइट मोड’ पर डालें। बेडरूम सिर्फ सोने के लिए यूज करें। सोने से पहले टीवी न देखें। पैर डुबोएं- गुनगुने पानी से पैरासिम्पैथेटिक नर्व सक्रिय होते हैं। नींद अच्छी आती है। तरीका- बाल्टी में गुनगुना पानी लें। 1 से 2 चम्मच नमक डालें। सोने से 15-20 मिनट पहले 10 मिनट तक पैर डुबोएं। दिनचर्या – सुबह 20 मिनट वॉक या योग, शाम को सैर करें। रात में हल्का भोजन लें। तरीका- एकाग्र होकर वॉक करें। डाइट में रात में दलिया, खिचड़ी जैसा खाना खाएं। बिना छिलके के भीगे बादाम, गुनगुना दूध लें।

नंगे पैर खेलने से ‘गोल ऑफ द टूर्नामेंट’ तक:एशियन कप फुटबॉल में 30 गज से गोल दागकर चर्चा में आईं पंजाब की मनीषा कल्याण

नंगे पैर खेलने से ‘गोल ऑफ द टूर्नामेंट’ तक:एशियन कप फुटबॉल में 30 गज से गोल दागकर चर्चा में आईं पंजाब की मनीषा कल्याण

2026 विमंस एशियन कप के मैच में भारतीय टीम चीनी ताइपे से 1-0 से पीछे थी। 39वें मिनट में भारत को गोल से 30 गज की दूरी पर फ्री-किक मिली। सामने सफेद जर्सी में चार डिफेंडर दीवार बनकर खड़ी थीं। ऐसे में 24 वर्षीय मनीषा कल्याण एक पल के लिए रुकीं और अपने बाएं पैर से एक ऐसा करारा शॉट दागा कि गेंद क्रॉसबार के निचले हिस्से से टकराकर सीधे गोल लाइन के पार चली गई। वीएआर ने गोल की पुष्टि की और कमेंटेटर ने इसे देखते ही ‘गोल ऑफ द टूर्नामेंट’ करार दिया। भले ही भारतीय टीम यह मैच 1-3 से हारकर ग्रुप में सबसे नीचे रही, लेकिन पंजाब के होशियारपुर की इस बेटी ने दुनिया को भारतीय फुटबॉल की एक उजली तस्वीर जरूर दिखा दी। यह सिर्फ एक गोल की नहीं, बल्कि उस लड़की की कहानी है जिसके नसीब में कभी खेल के जूते नहीं थे। आठ साल पहले पंजाब के मुग्गोवाल गांव के एक सरकारी स्कूल में पीटी टीचर ब्रह्मजीत सिंह ने एक लड़की को लड़कों के साथ नंगे पैर खेलते देखा। वह बेखौफ गोल दाग रही थी। मनीषा के पिता नरेंद्रपाल सिंह की गांव में एक छोटी सी कॉस्मेटिक की दुकान थी। वह अपनी चार बेटियों को सिर्फ पढ़ाना चाहते थे; उनके पास स्पोर्ट्स शूज और ट्रेनिंग के पैसे नहीं थे। कोच ब्रह्मजीत ने पिता को एक महीने तक मनाया और भरोसा दिलाया कि पैसा कभी रुकावट नहीं बनेगा। जब पिता राजी हुए, तो पड़ोसियों ने ताने कसे कि लड़की शॉर्ट्स पहनकर लड़कों के साथ खेलती है, आगे चलकर इसका कुछ नहीं होगा। लेकिन माता-पिता ने इन तानों को अनसुना कर दिया। गांव में लड़कियों की कोई टीम नहीं थी, इसलिए मनीषा खेलने के लिए अक्सर 15 किलोमीटर पैदल चलती या दौड़ती थीं। उनके शानदार खेल और खास हेयरस्टाइल के कारण दोस्तों ने उन्हें ब्राजीलियाई दिग्गज रोनाल्डिन्हो के नाम पर प्यार से ‘डिनो’ बुलाना शुरू कर दिया। नवंबर 2021 में एक बड़ा बदलाव आया। भारत ने ब्राजील के खिलाफ मैच 6-1 से गंवाया, लेकिन इकलौता गोल मनीषा ने किया। वह सीनियर फुटबॉल में ब्राजील के खिलाफ गोल दागने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। इस गोल ने उनके लिए दुनिया के दरवाजे खोल दिए। साइप्रस के क्लब ‘अपोलोन लेडीज’ ने उन्हें साइन किया। शुरुआत में अंग्रेजी न आने के कारण उन्हें मैदान पर पास नहीं मिलते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और भाषा सीखी। अगस्त 2022 में वह यूईएफए विमंस चैम्पियंस लीग खेलने और गोल करने वाली पहली भारतीय बनीं। ग्रीस के क्लब ‘पाओक’ के लिए 23 मैचों में 8 गोल दागने के बाद, अब वह पेरू के चैम्पियन क्लब ‘एलियांजा लीमा’ में शामिल हैं। सिडनी गई 26 सदस्यीय भारतीय महिला फुटबॉल टीम में मनीषा अकेली खिलाड़ी थीं जो विदेश में इतने ऊंचे स्तर पर खेल रही हैं। यही वजह है कि मनीषा के बेसिक्स, पासिंग और तकनीक बाकी खिलाड़ियों से कहीं ऊंचे स्तर के हैं।

हेल्थकेयर सर्विसेज महंगी, स्टार्टअप्स सस्ते विकल्प दे रहे:अमेरिका में आधे खर्च में पूरे शरीर का एमआरआई स्कैन, ब्लड टेस्ट की सुविधा, ताकि बड़ी बीमारियों का शुरुआत में ही पता लग सके

हेल्थकेयर सर्विसेज महंगी, स्टार्टअप्स सस्ते विकल्प दे रहे:अमेरिका में आधे खर्च में पूरे शरीर का एमआरआई स्कैन, ब्लड टेस्ट की सुविधा, ताकि बड़ी बीमारियों का शुरुआत में ही पता लग सके

अमेरिका में महंगी स्वास्थ्य व्यवस्था को टेक कंपनियों और स्टार्टअप्स से चुनौती मिल रही है। ये कंपनियां डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म, वर्चुअल क्लीनिक और एआई आधारित सुविधाओं के जरिये इलाज, जांच और स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएं मुहैया करा रही हैं। हेल्थकेयर की बढ़ती लागत के बीच मरीज भी अब इलाज के नए विकल्प तलाश रहे हैं। स्टार्टअप्स की फंडिंग भी बढ़ी है। 2025 में अमेरिका के डिजिटल हेल्थ स्टार्टअप्स की वेंचर कैपिटल फंडिंग 35% बढ़कर 1.3 लाख करोड़ रुपए हो गई। ये पब्लिक हेल्थ सिस्टम में बदलाव का संकेत है। हालांकि पहले ऐसे प्रयोग विफल हो चुके हैं। जेपी मॉर्गन चेज और बर्कशायर हैथवे ने मिलकर 2018 में ‘हेवन’ नाम की पहल शुरू की थी, जिसे 3 साल में ही बंद करना पड़ा। स्वास्थ्य सेवाओं में टेक कंपनियों, स्टार्टअप्स की पैठ बढ़ने के बड़े कारण 20% सरकारी खर्च स्वास्थ्य पर, फिर भी 33% लोग लागत नहीं उठा पा रहे अमेरिकी सरकार हर साल स्वास्थ्य सेवाओं पर करीब 463 लाख करोड़ रुपए खर्च करती है। यह अमेरिका की जीडीपी का पांचवां हिस्सा यानी तकरीबन 20 फीसदी है। इलाज इतना महंगा है कि करीब एक तिहाई (33%) लोगों ने बीते एक साल में बेहिसाब खर्च के कारण या तो इलाज नहीं कराया या टाल दिया। खर्च बढ़ने का असर हेल्थ इंश्योरेंस पर भी दिख रहा है। अमेरिका में 65 साल से कम उम्र के ज्यादातर लोग प्राइवेट बीमा पर निर्भर हैं। गैर-लाभकारी संस्था केएफएफ के मुताबिक, 2015 से परिवार के लिए सालाना इंश्योरेंस प्रीमियम (बीमे की लागत) 50% बढ़ गया है। 45 फीसदी अमेरिकियों को हेल्थ सिस्टम पर भरोसा नहीं, अब वे विकल्प तलाश रहे अमेरिकी जनता का हेल्थ सिस्टम पर भरोसा साल दर साल घट रहा है। गैलप की एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड महामारी की शुरुआत में जहां मरीजों को डॉक्टरों पर 75% भरोसा था, वहीं 2025 में यह घटकर 55% रह गया। यानी 45% अमेरिकी हेल्थ सिस्टम पर भरोसा नहीं करते। डॉक्टर अपॉइंटमेंट से लेकर, बीमा कंपनी चुनने तक पूरी चेन डिजिटल प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में डिजिटल प्लेटफॉर्म बदलाव ला रहे हैं। ‘सेसम’ और ‘वन मेडिकल’ जैसे प्लेटफॉर्म डॉक्टर से सस्ते ऑनलाइन अपॉइंटमेंट लेने में मदद कर रहे हैं। वीसी फर्म जनरल कैटलिस्ट ने हॉस्पिटल और हेल्थ केयर चेन सुम्मा हेल्थ का अधिग्रहण किया है। ये कंपनी बीमा चुनने से लेकर इलाज और बिल पेमेंट तक पूरे सिस्टम को डिजिटली कनेक्ट कर रही है। अब वर्चुअल क्लिनिक; कंसल्टेशन, दवाइयों के प्रिस्क्रिप्शन भी दे रहे कई स्टार्टअप मरीजों को नई टेक्नोलॉजी के जरिये हेल्थ सर्विस दे रहे हैं। ‘हिम्स एंड हर्स’ और ‘रो’ जैसे वर्चुअल क्लीनिक ऑनलाइन कंसल्टेशन व दवाइयों के प्रिस्क्रिप्शन दे रहे हैं। ‘प्रीनुवो’ और ‘फंक्शन हेल्थ’ लगभग आधे खर्च 1,000 से 4,500 डॉलर (4 लाख रुपए तक) में पूरे शरीर का एमआरआई और ब्लड टेस्ट की सुविधा दे रहे हैं, ताकि बड़ी बीमारियां पकड़ में आ सकें। एआई – एक चौथाई यूजर कम से कम एक सवाल स्वास्थ्य संबंधी पूछ रहे हेल्थ सेक्टर में जेनरेटिव एआई की भूमिका बढ़ी है। चैटजीपीटी के डेवलपर्स का कहना है कि उनके करीब 80 करोड़ साप्ताहिक यूजर्स में से एक चौथाई से ज्यादा कम से कम एक सवाल स्वास्थ्य संबंधी पूछते हैं। ओपनएआई में हेल्थ केयर लीड कर रहे डॉ. नेट ग्रॉस का कहना है कि जेनरेटिव एआई इंटरनेट स्क्रॉल करने के पुराने तरीके में बड़ा सुधार ला रहा है। अब यूजर्स ऐसे सॉफ्टवेयर से सीधे बातचीत कर सकते हैं जो उनके लक्षणों, उम्र और मेडिकल हिस्ट्री को ध्यान में रखते हुए उन्हें सलाह देता है।

बीसीजी रिपोर्ट: पार्ट-2 यूएस में भारतवंशियों का कितना दमखम?:अमेरिकी पेटेंट में भारतवंशियों की हिस्सेदारी 50 साल में 5 गुना तक बढ़ गई

बीसीजी रिपोर्ट: पार्ट-2 यूएस में भारतवंशियों का कितना दमखम?:अमेरिकी पेटेंट में भारतवंशियों की हिस्सेदारी 50 साल में 5 गुना तक बढ़ गई

जब अमेरिका को नोबेल चाहिए, तो भारतीय दिमाग काम आता है। जब स्पेलिंग बी का ताज चाहिए, तो भारतीय बच्चे मैदान मारते हैं। जब नए पेटेंट चाहिए, तो भारतीय वैज्ञानिक कलम उठाते हैं। यह महज संयोग नहीं, यह उस भारतवंशी समुदाय की कहानी है, जो अमेरिका की धरती पर आया तो 2% बनकर, लेकिन अब बौद्धिक दुनिया में अपनी हिस्सेदारी दस गुना से भी ज्यादा बढ़ा ली। बीसीजी और इंडियास्पोरा द्वारा तैयार की गई ‘अमेरिका में भारतवंशियों के दमखम की कहानी’ के दूसरे हिस्से में पढ़िए, कैसे अमेरिका की बौद्धिक ताकत बने भारतवंशी… यदि अमेरिका आज विज्ञान और स्वास्थ्य के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है, तो उसमें भारतीय दिमागों का बहुत बड़ा योगदान है। पेटेंट फाइल करने से लेकर वैज्ञानिक शोध पत्रों के प्रकाशन तक, भारतीय डायस्पोरा का ग्राफ 1975 से अब तक पांच गुना बढ़ चुका है। हर 10 में से 1 अमेरिकी डॉक्टर भारतीय मूल का है, जो देश के सबसे दुर्गम इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं दे रहा है। हर साल 1,800 नए भारतीय डॉक्टर सिस्टम में जुड़ रहे हैं, जो डॉक्टरों की कमी पूरा करने में सबसे आगे हैं। रिसर्च के क्षेत्र में भी यही कहानी है। अमेरिका के शीर्ष 50 कॉलेजों में से 35 में भारतवंशी नेतृत्व की भूमिकाओं में हैं। अमेरिका में 38,000 भारतीय मूल की नर्सें कार्यरत हैं। दो बार नोबेल अवॉर्ड जीत चुके; स्पेलिंग बी में 26 साल में 34 में से 28 विजेता भारतवंशी, शोध पत्रों में 13% भागीदारी है… भारतीय मूल के अमेरिकियों की कहां-कितनी हिस्सेदारी नोबेल पुरस्कार 2 बार फील्ड्स मेडल 1 बार ट्यूरिंग अवॉर्ड 1 बार स्पेलिंग बी विजेता 82% पेटेंट में हिस्सेदारी 10% कंप्यूटर पेटेंट 11% वैज्ञानिक शोध पत्र 13% फोर्ब्स 30 अंडर 30 11% (स्रोत: फोर्ब्स, यूएसपीटीओ और नेचर इंडेक्स के आंकड़े।) -1968 में हर गोविंद खुराना और 2019 में अभिजीत बनर्जी को नोबेल अवॉर्ड प्रदान किया गया। -मंजुल भार्गव ने साल 2014 में फील्ड्स मेडल जीता था, जिसे ‘गणित का नोबेल’ कहा जाता है। -स्पेलिंग बी में 2000 के बाद से 34 में से 28 विजेता भारतवंशी। -2022 से 2024 के बीच पूरे उत्तरी अमेरिका में फोर्ब्स 30 अंडर 30 पुरस्कारों में 11% हिस्सेदारी। -1975 में पेंटेंट में भारतवंशियों की हिस्सेदारी 1.9% थी, जो 2019 में बढ़कर 10% पर पहुंची। शिक्षा – टॉप-50 में से 35 कॉलेजों में यही शीर्ष पर – 22,000 से अधिक भारतीय मूल के प्रोफेसर्स अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। – हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड जैसे संस्थानों के डीन और प्रेसिडेंट के पदों पर भारतीयों का होना अब सामान्य। – अमेरिका के टॉप-50 कॉलेजों पर नजर डालें तो 35 में भारतीय अमेरिकी नेतृत्व की भूमिका में। यानी अमेरिका के हर दूसरे शीर्ष विश्वविद्यालय में कोई न कोई भारतीय अमेरिकी नेतृत्व में है। सेहत – अमेरिका के लिए भारतवंशी ‘संकटमोचक’ – 2032 तक अमेरिका में 1.22 लाख डॉक्टरों की कमी होगी। – 2027 तक अमेरिका की 8 लाख नर्सें काम छोड़ देंगी। – हेल्थकेयर में जॉब 2030 तक 10-20% बढ़ेंगी, पर लोग नहीं। – भारतवंशियों का मेडिकल स्कूल में एडमिशन औसत से करीब चार गुना की तेजी से बढ़ रहा है। – भारत दूसरा सबसे बड़ा देश है जो अमेरिका को नर्सें भेजता है। – सीडीसी और एनएसएफ जैसी बड़ी सरकारी एजेंसियों में भारतीय अमेरिकी 3% टॉप पोजीशन पर हैं। ये डॉक्टर अक्सर सबसे दूरदराज और वंचित इलाकों में सेवा देते हैं, जहां कोई और जाना नहीं चाहता।

बीसीजी रिपोर्ट: पार्ट-2 यूएस में भारतवंशियों का कितना दमखम?:अमेरिकी पेटेंट में भारतवंशियों की हिस्सेदारी 50 साल में 5 गुना तक बढ़ गई

बीसीजी रिपोर्ट: पार्ट-2 यूएस में भारतवंशियों का कितना दमखम?:अमेरिकी पेटेंट में भारतवंशियों की हिस्सेदारी 50 साल में 5 गुना तक बढ़ गई

जब अमेरिका को नोबेल चाहिए, तो भारतीय दिमाग काम आता है। जब स्पेलिंग बी का ताज चाहिए, तो भारतीय बच्चे मैदान मारते हैं। जब नए पेटेंट चाहिए, तो भारतीय वैज्ञानिक कलम उठाते हैं। यह महज संयोग नहीं, यह उस भारतवंशी समुदाय की कहानी है, जो अमेरिका की धरती पर आया तो 2% बनकर, लेकिन अब बौद्धिक दुनिया में अपनी हिस्सेदारी दस गुना से भी ज्यादा बढ़ा ली। बीसीजी और इंडियास्पोरा द्वारा तैयार की गई ‘अमेरिका में भारतवंशियों के दमखम की कहानी’ के दूसरे हिस्से में पढ़िए, कैसे अमेरिका की बौद्धिक ताकत बने भारतवंशी… यदि अमेरिका आज विज्ञान और स्वास्थ्य के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है, तो उसमें भारतीय दिमागों का बहुत बड़ा योगदान है। पेटेंट फाइल करने से लेकर वैज्ञानिक शोध पत्रों के प्रकाशन तक, भारतीय डायस्पोरा का ग्राफ 1975 से अब तक पांच गुना बढ़ चुका है। हर 10 में से 1 अमेरिकी डॉक्टर भारतीय मूल का है, जो देश के सबसे दुर्गम इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं दे रहा है। हर साल 1,800 नए भारतीय डॉक्टर सिस्टम में जुड़ रहे हैं, जो डॉक्टरों की कमी पूरा करने में सबसे आगे हैं। रिसर्च के क्षेत्र में भी यही कहानी है। अमेरिका के शीर्ष 50 कॉलेजों में से 35 में भारतवंशी नेतृत्व की भूमिकाओं में हैं। अमेरिका में 38,000 भारतीय मूल की नर्सें कार्यरत हैं। दो बार नोबेल अवॉर्ड जीत चुके; स्पेलिंग बी में 26 साल में 34 में से 28 विजेता भारतवंशी, शोध पत्रों में 13% भागीदारी है… भारतीय मूल के अमेरिकियों की कहां-कितनी हिस्सेदारी नोबेल पुरस्कार 2 बार फील्ड्स मेडल 1 बार ट्यूरिंग अवॉर्ड 1 बार स्पेलिंग बी विजेता 82% पेटेंट में हिस्सेदारी 10% कंप्यूटर पेटेंट 11% वैज्ञानिक शोध पत्र 13% फोर्ब्स 30 अंडर 30 11% (स्रोत: फोर्ब्स, यूएसपीटीओ और नेचर इंडेक्स के आंकड़े।) -1968 में हर गोविंद खुराना और 2019 में अभिजीत बनर्जी को नोबेल अवॉर्ड प्रदान किया गया। -मंजुल भार्गव ने साल 2014 में फील्ड्स मेडल जीता था, जिसे ‘गणित का नोबेल’ कहा जाता है। -स्पेलिंग बी में 2000 के बाद से 34 में से 28 विजेता भारतवंशी। -2022 से 2024 के बीच पूरे उत्तरी अमेरिका में फोर्ब्स 30 अंडर 30 पुरस्कारों में 11% हिस्सेदारी। -1975 में पेंटेंट में भारतवंशियों की हिस्सेदारी 1.9% थी, जो 2019 में बढ़कर 10% पर पहुंची। शिक्षा – टॉप-50 में से 35 कॉलेजों में यही शीर्ष पर – 22,000 से अधिक भारतीय मूल के प्रोफेसर्स अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। – हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड जैसे संस्थानों के डीन और प्रेसिडेंट के पदों पर भारतीयों का होना अब सामान्य। – अमेरिका के टॉप-50 कॉलेजों पर नजर डालें तो 35 में भारतीय अमेरिकी नेतृत्व की भूमिका में। यानी अमेरिका के हर दूसरे शीर्ष विश्वविद्यालय में कोई न कोई भारतीय अमेरिकी नेतृत्व में है। तकनीक – एआई की नींव रखने में भी अहम भूमिका जेनरेटिव एआई की नींव रखने वाला 2017 का शोध पत्र गूगल के आठ इंजीनियरों द्वारा लिखा गया था, जिनमें से दो भारतीय मूल के थे। इस शोध को लार्ज मॉडल्स की आधारशिला मानते हैं यानी आज जो चैटजीपीटी आदि चल रहे हैं, वे सब इसी पेपर की देन हैं यानी एआई की नींव रखने में भी बड़ा योगदान। सेहत – अमेरिका के लिए भारतवंशी ‘संकटमोचक’ – 2032 तक अमेरिका में 1.22 लाख डॉक्टरों की कमी होगी। – 2027 तक अमेरिका की 8 लाख नर्सें काम छोड़ देंगी। – हेल्थकेयर में जॉब 2030 तक 10-20% बढ़ेंगी, पर लोग नहीं। – भारतवंशियों का मेडिकल स्कूल में एडमिशन औसत से करीब चार गुना की तेजी से बढ़ रहा है। – भारत दूसरा सबसे बड़ा देश है जो अमेरिका को नर्सें भेजता है। – सीडीसी और एनएसएफ जैसी बड़ी सरकारी एजेंसियों में भारतीय अमेरिकी 3% टॉप पोजीशन पर हैं। ये डॉक्टर अक्सर सबसे दूरदराज और वंचित इलाकों में सेवा देते हैं, जहां कोई और जाना नहीं चाहता।

राजपाल यादव बोले:‘भूत बंगला’ में हॉरर और कॉमेडी दोनों, प्रियन सर की फिल्म के लिए रोल नहीं पूछता

राजपाल यादव बोले:‘भूत बंगला’ में हॉरर और कॉमेडी दोनों, प्रियन सर की फिल्म के लिए रोल नहीं पूछता

अक्षय कुमार और निर्देशक प्रियदर्शन की फिल्म ‘भूत बंगला’ में राजपाल यादव भी नजर आएंगे। तीनों की यह तिकड़ी पहले ‘भूल भुलैया’ में काम कर चुकी है। राजपाल कहते हैं कि ‘भूत बंगला’ की कहानी सिर्फ एक हॉरर कॉमेडी नहीं, बल्कि एक रहस्य से भरी दुनिया है। टीजर में दिखाया गया ‘वधुसुर’ और मंगलपुर की हवेली दरअसल उस बड़े रहस्य की झलक भर है।’ करीब 25 साल के करियर में सैकड़ों किरदार कर चुके राजपाल खुद को आज भी छात्र ही मानते हैं। वह कहते हैं कि ‘जब एक्टर किरदार की सोच को समझ लेता है तो उसकी बॉडी लैंग्वेज अपने आप बदल जाती है। मैं कभी किसी की नकल नहीं करता हूं।’ प्रियन सर के साथ काम करना मनोरंजन का विज्ञान पढ़ने जैसा राजपाल बताते हैं कि, ‘प्रियदर्शन के साथ मेरा रिश्ता दो दशक से भी पुराना है। मैंने कभी उनसे स्क्रिप्ट तक नहीं पूछी। जब भी उनका फोन आता है, सिर्फ यही कहते हैं-“राजपाल, आना है…’ तो मैं बिना कुछ पूछे सेट पर पहुंच जाता हूं। इस फिल्म में हॉरर और कॉमेडी दोनों है। प्रियदर्शन सर के साथ काम करना किसी यूनिवर्सिटी में मनोरंजन का विज्ञान पढ़ने जैसा है। जहां हर एक्टर छात्र होता है।’ ‘छोटा पंडित’ के बाद मेरा नया किरदार भी दर्शक पसंद करेंगे “भूल भुलैया’ के बाद से ‘छोटा पंडित’ के नाम से भी लोकप्रियता मिली। इस पर राजपाल का कहना है कि ‘कोई दबाव महसूस नहीं होता। एक कलाकार के लिए हर किरदार ‘रसगुल्ले’ की तरह होता है, छोटा हो या बड़ा उसका स्वाद मीठा ही होता है। ‘भूत बंगला’ में भी मेरा किरदार बारीकी से गढ़ा गया है और प्रियदर्शन सर ने इसमें आम आदमी के ऐसे शेड्स दिए हैं, जिनसे दर्शक आसानी से जुड़ पाएंगे और पसंद भी करेंगे।’ ‘भूत बंगला’ की हवेली का आर्किटेक्चर ही डर पैदा करता है बकौल राजपाल, ‘किसी भी फिल्म में लोकेशन सिर्फ एक जगह नहीं बल्कि एक किरदार होती है। जहां ‘भूल भुलैया’ की हवेली में राजपूताना ठाठ और रहस्य का माहौल था, वहीं ‘भूत बंगला’ की हवेली का आर्किटेक्चर और अंधेरा अपने आप में अलग तरह का डर पैदा करता है। प्रियदर्शन सर ने इसे ब्यूटीफुल हॉरर की तरह ट्रीट किया है, जिससे दर्शकों को लगेगा कि वे खुद उस बंगले के भीतर मौजूद हैं।’ अक्की पाजी के साथ काम करना हमेशा रोलर कोस्टर जैसा अक्षय के साथ फिर से काम करने को लेकर राजपाल कहते हैं कि ‘अक्की पाजी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह हर वक्त लाइव एक्टर जैसे रहते हैं। कैमरा ऑन हो या ऑफ, सेट पर उनका एनर्जी लेवल वही रहता है। शॉट के बीच भी दोनों कलाकार लगातार रिहर्सल करते रहते हैं और सीन में छोटे-छोटे इम्प्रोवाइजेशन जोड़ते हैं ताकि सीन और ज्यादा जीवंत बन सके। अक्षय के साथ काम करना हमेशा रोलर कोस्टर जैसा अनुभव होता है।’

Vicky Deol of Kapurthala created a world record, Vicky Deol performing 64 push-ups in 40 seconds, 64 push-ups in 40 seconds, push-ups world record

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Hindi News National Vicky Deol Of Kapurthala Created A World Record, Vicky Deol Performing 64 Push ups In 40 Seconds, 64 Push ups In 40 Seconds, Push ups World Record चंडीगढ़/नई दिल्ली38 मिनट पहले कॉपी लिंक विक्की ने 40 सेकेंड में 3 फीट हाइट पर 3 लोहे की रॉड पर हवा में रहते हुए अंगूठों के सहारे 64 पुश-अप्स कर डाले। – फाइल फोटो स्पोर्ट्स एथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) के फिट इंडिया कार्निवल का दूसरा दिन बेहद खास रहा है। पंजाब के सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) में जन्मे हरप्रीत सिंह उर्फ विक्की देओल ने वर्ल्ड बुक्स ऑफ रिकॉर्ड में अपना नाम बेहतर किया। उन्होंने 40 सेकेंड में 3 फीट हाइट पर 3 लोहे की रॉड पर हवा में रहते हुए अंगूठों के सहारे 64 पुश-अप्स कर डाले। इसी के साथ उन्होंने उस रिकॉर्ड को बेहतर किया, जो उन्होंने साल 2021 में कायम किया था। विक्की साल 2015 से इस तरह पुश-अप्स करने का अभ्यास कर रहे हैं, लेकिन पहली बार उन्होंने रिकॉर्ड के लिए पहली बार 2021 में प्रयास किया। 15 अगस्त, 2021 के दिन उन्होंने 40 बार इस तरह से पुश-अप्स करते हुए रिकॉर्ड बनाया था और अब उन्होंने रिकॉर्ड को बेहतर करते हुए 64 कर दिया। कराटे में 3 बार के ब्लैक बेल्ड होल्डर विक्की पंजाब के फिटनेस आइकन हैं। उनके इस प्रयास को वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के अपूर्व मेनन, रणदीप सिंह कोहली, जसवीर सिंह शिंदा, संदीप डोगरा, गुरप्रीत सिंह और पंकज ठाकुर ने प्रमाणित किया। विक्की देओल ने कहा कि मेरा हमेशा यही प्रयास रहा है कि मैं खुद को फिट रखूं और दूसरों को भी फिटनेस के लिए मोटिवेट करूं। – फाइल फोटो मेरा मकसद फिटनेस को घर-घर पहुंचाना है भास्कर से बात करते हुए विक्की ने कहा कि मैं तीसरी क्लास से खेलों के साथ जुड़ा हूं। मेरा हमेशा प्रयास यही रहा है कि मैं खुद को फिट रखूं और दूसरों को भी फिटनेस के लिए मोटिवेट करूं। मैं अपने जैसे फिटनेस लवर्स के साथ पंजाब के कई गवर्नमेंट स्कूलों में स्टूडेंट्स के साथ काम करता हूं, ताकि वे फिटनेस के प्रति बचपन से ही जागरूक हों। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔