यूएमसी सेवा एप: टैक्स सहित अन्य सेवाएं घर बैठे

उज्जैन | नगर निगम ने यूएमसी सेवा एप को अपडेट किया है। अब शहरवासी घर बैठे ही जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकते हैं। साथ ही प्रॉपर्टी टैक्स और जलकर ऑनलाइन जमा कर सकते हैं। इससे पहले इस एप पर केवल शिकायतें दर्ज की जाती थी।एप को प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। एप से नागरिक मोहल्ला, वार्ड और जोन से जुड़ी समस्याएं दर्ज कर सकते हैं। शिकायत की स्थिति और समाधान पूरी पारदर्शिता के साथ एप पर दिखाई देगा। समाधान के बाद नागरिक का फीडबैक रिकॉर्ड किया जाएगा। एप पर कचरा गाड़ी ट्रैकिंग और स्वच्छता संबंधी जानकारी, स्वास्थ्य और प्रकाश विभाग से जुड़ी सेवाएं, नजदीकी सुविधाघर, कम्युनिटी हॉल बुकिंग और महाकाल लाइव दर्शन सुविधाएं भी होंेगी।
कैबिनेट में सीएम ने मंत्रियों से कहा:जिन राज्यों में यूसीसी लागू हो चुका, वहां का अध्ययन करें- कैसे लागू किया, क्या चुनौती आई

मध्यप्रदेश अब समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की तैयारी में है। असम और गुजरात के बाद मप्र भी इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। मंगलवार को कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंत्रियों से कहा कि यूसीसी का अध्ययन करें, इसे राज्य में लागू करना . सीएम के संकेत के बाद गृह विभाग में प्रक्रिया तेज हो गई है, क्योंकि यूसीसी बिल तैयार करने की जिम्मेदारी इसी विभाग की है। सूत्रों के अनुसार, जल्द राज्य स्तर पर एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित होगी। राज्य सरकार छह माह के भीतर यूसीसी बिल लाने की तैयारी में है। इसके लिए दिल्ली से भी मप्र को संकेत मिल चुके हैं। उत्तराखंड-गुजरात-असम जैसे बहुविवाह के नियम बदलेंगे, लिव इन का रजिस्ट्रेशन जरूरी Q. यूसीसी लागू होने पर मूल बदलाव क्या होगा? – सभी धर्मों के लिए शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने के नियम एक समान हो जाएंगे। अलग-अलग पर्सनल लॉ खत्म हो जाएंगे। Q. शादी और तलाक के नियम कैसे बदलेंगे? – अभी हर धर्म के अपने नियम हैं। यूसीसी के बाद विवाह पंजीकरण अनिवार्य होगा। न्यूनतम आयु समान होगी, तलाक के कानूनी आधार सभी के लिए एक होंगे। Q. बहुविवाह और विरासत के नियमों पर क्या असर? – कई पर्सनल लॉ में एक से अधिक विवाह की अनुमति या गुंजाइश है। यूसीसी लागू होते ही पूरी तरह प्रतिबंधित। – बेटियों को पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार मिलेगा। यह नियम सभी धर्मों पर समान लागू होगा। Q. यूसीसी लागू करने में मप्र में सबसे बड़ी चुनौती क्यों मानी जा रही है? – मप्र में बड़ी संख्या में जनजातीय और विशेष पिछड़ी जनजातियां हैं, जहां पारंपरिक विवाह पद्धतियां प्रचलित हैं। इन परंपराओं को यूसीसी में शामिल करना या अलग प्रावधान चुनौती होगी। दापा प्रथा: वधु मूल्य देना। भगेली/लम्सना विवाह: युवक-युवती भागकर शादी करते हैं, बाद में समाज मान्यता देता है। सेवा विवाह: वधु मूल्य न देने पर लड़का ससुराल में रहकर सेवा करता है। नातरा प्रथा: विधवा पुनर्विवाह या साथी बदलने की अनुमति। Q. किन राज्यों में यूसीसी लागू या प्रक्रिया में है? उत्तराखंड: फरवरी 2024 में बिल पास, 27 जनवरी 2025 से लागू। गुजरात: मार्च 2026 में बिल पास, लागू करने की तैयारी। गोवा: 1867 के पुर्तगाली सिविल कोड के कारण यहां यूसीसी पहले से लागू। असम: नवंबर 2025 में बहुविवाह निषेध कानून पास, यूसीसी की दिशा में कदम उत्तर प्रदेश: यूसीसी लागू की तैयारी चल रही है। एसटी 3 राज्यों में कानून से बाहर Q. उत्तराखंड मॉडल में क्या है? -स्वतंत्र भारत का पहला राज्य जहां यूसीसी लागू हुआ। शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है। लिव-इन रिलेशनशिप का 30 दिन में रजिस्ट्रेशन भी अनिवार्य किया। ऐसा न करने पर 3 महीने तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। Q. गुजरात मॉडल की खास बातें क्या हैं? -उत्तराखंड जैसा ढांचा। धोखे, दबाव या पहचान छिपाकर शादी अपराध है। इस पर 7 साल तक की जेल हो सकती है। 60 दिन में लिव-इन रजिस्ट्रेशन कराना होगा। संपत्ति में बेटा-बेटी बराबर होंगे। एसटी को कानून से बाहर रखा गया है। Q असम का मॉडल क्या है? – यहां यूसीसी पूरी तरह लागू नहीं। बहुविवाह अपराध घोषित किया है। छठी अनुसूची क्षेत्र और एसटी कानून से बाहर।
ऑटिज्म से जूझ रहे युवा बेहतर शेफ साबित हो रहे:कुकिंग जॉब्स में छिपी संभावनाओं को तराशने के लिए ‘शेफ्स ऑन द स्पेक्ट्रम’ पहल

ऑटिज्म से पीड़ित जोसेफ वैलेंटिनो 5 साल की उम्र तक बोल तक नहीं पाते थे। उनके लिए शेफ बनने का सपना नामुमकिन सा लगता था। लेकिन आज 27 की उम्र में, वह मैनहट्टन के ‘पॉइंट सेवन’ रेस्तरां में बतौर कुक काम कर रहे हैं। वैलेंटिनो का सफर आसान नहीं था। वे कहते हैं, ‘मैं खुद को एक बोझ के रूप में देखा करता था।’ रिजेक्शन और अवसाद के दौर से गुजरने के बाद अब उनका करियर एक नई पहल ‘शेफ्स ऑन द स्पेक्ट्रम’ के लिए प्रेरणा बन गया है। इसका उद्देश्य ऑटिज्म से जूझ रहे लोगों को ट्रेनिंग देकर बेहतरीन डाइनिंग जॉब्स दिलाना है। पॉइंट सेवन के मालिक शेफ फ्रैंकलिन बेकर ने कहते हैं कि यह कार्यक्रम दो समस्याओं को हल करेगा। रेस्तरां में कुशल श्रम की कमी और ऑटिज्म वयस्कों के बीच उच्च बेरोजगारी दर। बेकर कहते हैं कि असली जोखिम इन्हें काम पर रखने में नहीं, बल्कि उनकी अविश्वसनीय प्रतिभा को नजरअंदाज करने में है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऑटिज्म से पीड़ित लोग किचन के लिए वरदान साबित हो सकते हैं। टीएसीटी के मार्क फिएरो कहते हैं कि ये बेहद व्यवस्थित होते हैं और सुरक्षा प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करते हैं। यदि उन्हें मीट, सब्जी का एक निश्चित कट बनाने को कहा जाए, तो वे हर बार उसे बिल्कुल एक जैसा ही बनाएंगे। ऑटिज्म स्पीक्स के सीईओ कीथ वारगो के अनुसार, इन कर्मचारियों के लिए थोड़े बदलाव जरूरी हैं। जैसे इंटरव्यू के बजाय सीधे काम का ट्रायल लेना या शोर करने वाली फ्लोरोसेंट लाइटों के बजाय एलईडी बल्ब लगाना। स्टेप्स कंपनी की कोर्टनी कोनिन कहती हैं कि किचन में मैप और लेबल लगाने से न केवल ऑटिस्टिक, बल्कि सभी कर्मचारियों की कार्यक्षमता बढ़ती है। वैलेंटिनो अब ‘शेफ्स ऑन द स्पेक्ट्रम’ के जरिए दूसरों का मार्गदर्शन करेंगे। वो कहते हैं, मेरा सपना है एग्जीक्यूटिव शेफ बनना है और दिखाना चाहता हूं कि ऑटिज्म के बावजूद शीर्ष पर पहुंचा जा सकता है।’ किचन में 100% सटीकता और जीरो एक्सीडेंट की गारंटी बन रहे हैं ये खास शेफ शोध के अनुसार, ऑटिस्टिक कर्मचारियों में जटिल रेसिपी और कुकिंग स्टेप्स को याद रखने की अद्भुत क्षमता होती है। वे डेटा और प्रोसेस को बहुत बारीकी से समझते हैं। ये कर्मचारी सेफ्टी प्रोटोकॉल और सफाई के नियमों का सख्ती से पालन करते हैं, जिससे किचन में दुर्घटनाओं की आशंका कम हो जाती है। इनका दिमाग ‘आउट ऑफ द बॉक्स’ सोचता है। वे फ्लेवर और इंग्रीडिएंट्स के बीच ऐसे संबंध जोड़ सकते हैं, जो अक्सर सामान्य लोग नहीं देख पाते। छोटी से छोटी गलती को पकड़ लेना और काम को व्यवस्थित रखना इनकी सबसे बड़ी ताकत है।
लंबी उम्र के ‘जेनेटिक ब्लूप्रिंट’ पर काम:लॉन्जिविटी इंडिया बना रहा है भारतीयों के लिए सेहत का ‘स्वदेशी पैमाना’

जब आप ब्लड टेस्ट करवाते हैं और रिपोर्ट में आपकी वैल्यू नॉर्मल आती है, तो क्या आप वाकई सुरक्षित हैं? अब तक भारत में इस्तेमाल होने वाले स्वास्थ्य के मानक या तो पश्चिमी देशों की नकल हैं या बहुत पुराने डेटा पर आधारित हैं। लेकिन अब भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) बेंगलुरु इस विसंगति को दूर करने के लिए एक मिशन चला रहा है-लॉन्जिविटी इंडिया प्रोजेक्ट। भारतीयों का शरीर, जेनेटिक्स, खान-पान और प्रदूषण पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है। इसलिए, हमारे स्वास्थ्य को नापने का पैमाना भी अलग होना चाहिए। वर्तमान में हम जिन नॉर्मल वैल्यू को आधार मानकर इलाज करते हैं, वे भारतीयों के लिए सटीक नहीं हैं। उदाहरण, भारत में महिलाओं का हीमोग्लोबिन स्तर अक्सर कम पाया जाता है। अगर हम 20 हजार स्वस्थ भारतीयों के सैंपल का वैज्ञानिक विश्लेषण करें, तो मुमकिन है कि भारत के लिए एक नई और ज्यादा सटीक नॉर्मल वैल्यू सामने आए। यह प्रोजेक्ट स्वदेशी बेसलाइन तैयार करने की कोशिश है। रिसर्चर खोज रहे हैं उम्र बढ़ने के साथ इम्यून सिस्टम में क्या बदलाव आते हैं इस मिशन के तहत दो प्रमुख रिसर्च चल रही हैं। एक है – BHARAT स्टडी। इसका मतलब है बायोमार्कर्स ऑफ हेल्दी एजिंग, रेजिलिएंस, एडवर्सिटी एंड ट्रांजिशन। इसके जरिए स्वस्थ भारतीयों के मॉलिक्यूलर डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है ताकि यह समझा जा सके कि उम्र बढ़ने के साथ हमारे इम्यून सिस्टम में क्या बदलाव आते हैं। दूसरी रिसर्च है – ऑर्गन एजिंग प्रोजेक्ट: इसके तहत शोध चल रहा है कि शरीर के अलग-अलग अंग किस रफ्तार से बूढ़े होते हैं। इन प्रोजेक्ट्स के लिए 2030 तक 10,000 स्वस्थ भारतीयों के सैंपल इकट्ठा करना (आदर्श लक्ष्य 1 लाख का)है। इस प्रोजेक्ट में आईआईएससी के साथ-साथ आईआईटी दिल्ली, एम्स और आईआईटी हैदराबाद जैसे संस्थान भी जुड़ रहे हैं। हालांकि अभी यह डेटा कलेक्शन के चरण में है, लेकिन वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि 2027 से 2030 के बीच इसके ऐसे परिणाम आएंगे, जो चिकित्सा जगत की दिशा बदल देंगे। यह कोई ‘अमृत’ खोजने का दावा नहीं है। उम्र को रोका नहीं जा सकता, लेकिन बुढ़ापे में लाचारी को कम किया जा सकता है। इस रिसर्च का अंतिम लक्ष्य भारतीयों के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है, ताकि हम उम्र के आखिरी पड़ाव तक सक्रिय और स्वस्थ रहें। इन रिसर्च से होगा यह फायदा – कैंसर के पैटर्न को समझना आसान होगा – ऑर्गन फेल्योर की दर को कम किया जा सकेगा। – भारतीयों की औसत उम्र में इजाफा हो सकेगा।
ऑल्टोस लैब खोज रही है जवान रहने का फॉर्मूला:अब बीमारी नहीं, बुढ़ापे का भी होगा इलाज

कैलिफोर्निया की सिलिकॉन वैली। इंसान ने सदियों से अमृत की तलाश की है और विज्ञान की दुनिया में अब यह तलाश माइक्रोस्कोप के नीचे कोशिकाओं तक पहुंच गई है। इसी काम में लगी है ऑल्टोस लैब्स। हालांकि इसका लक्ष्य सिर्फ उम्र बढ़ाना नहीं, बुढ़ापे का उपचार करना भी है। असल में उम्र बढ़ना केवल जेनेटिक्स का खेल नहीं है। यह एपिजेनेटिक बदलावों का परिणाम है। सरल शब्दों में कहें तो हमारे शरीर की कोशिकाओं के पास एक बायोलॉजिकल सॉफ्टवेयर होता है। समय के साथ, प्रदूषण, तनाव और उम्र के कारण इस सॉफ्टवेयर में बग्स आ जाते हैं, जिससे कोशिकाएं अपना काम भूलने लगती हैं। ऑल्टोस लैब्स इसी सॉफ्टवेयर को रीसेट करने पर काम कर रही हैं। इसके केंद्र में हैं यामानाका फैक्टर्स। यानी वो जादुई प्रोटीन जो किसी बूढ़ी कोशिका को वापस उसकी युवा अवस्था में ले जा सकते हैं। हम कोशिकाओं की आंशिक रीप्रोग्रामिंग कर रहे हैं। यानी कोशिका की पहचान वही रहेगी, बस उसकी ऊर्जा और मरम्मत करने की क्षमता युवा जैसी हो जाएगी। इस प्रोजेक्ट में बेजोस का धन और नोबेल विजेता वैज्ञानिकों का दिमाग ऑल्टोस लैब्स की ताकत दो स्तंभों पर टिकी है- पूंजी और नोबेल स्तर का ज्ञान। अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस और यूरी मिलनर जैसे अरबपतियों ने इसमें लगभग 25,000 करोड़ रुपए (3 अरब डॉलर) का निवेश किया है। यह इतिहास का सबसे बड़ा स्टार्टअप निवेश माना जाता है। जबकि लैब की कमान नोबेल विजेता वैज्ञानिक शिन्या यामानाका (कोशिका रीप्रोग्रामिंग के जनक) और स्टीव होर्वाथ (बायोलॉजिकल क्लॉक के विशेषज्ञ) जैसे दिग्गजों के हाथों में है। 80 साल की उम्र में कोशिकाओं में होगी 30 की उम्र जैसी ऊर्जा और क्षमता 2022 में शुरुआत के बाद से लैब ने प्रयोगों से साबित कर दिया है कि उम्र के संकेतों को पलटना संभव है। एआई अब कोशिकाओं के व्यवहार को ट्रैक कर रहा है, जिससे यह समझना आसान हो गया है कि कोशिकाएं कब थकती हैं। यदि ऑल्टोस लैब्स सफल होती है, तो हम लंबे समय तक जिएंगे ही नहीं, अंतिम सांस तक स्वस्थ भी रहेंगे। कैंसर, हृदय रोगों का इलाज करने के बजाय, डॉक्टर सीधे बुढ़ापे का इलाज करेंगे। खराब अंगों को बदलने के बजाय, शरीर उन्हें भीतर से खुद ठीक कर लेगा। हम ऐसे भविष्य की ओर जा रहे हैं, जहां 80 साल की उम्र में भी शरीर की कोशिकाएं 30 साल जैसी ऊर्जा से भरी होंगी। हम उम्र के साथ आने वाली कमजोरी को हराना चाहते हैं।
सट्टेबाजी का दबाव खिलाड़ियों को तोड़ रहा:टारगेट पूरे करने के लिए एथलीट्स को परिजनों की हत्या की धमकी; अपशब्दों की बौछार

एक कॉलेज बास्केटबॉल खिलाड़ी मैच शुरू होने से पहले अपना मोबाइल खोलता है। स्क्रीन पर अजनबी का संदेश दिखता है,‘सुनो, यह मजाक नहीं है। अगर तुमने आज 22 पॉइंट्स व 12 बाउंड्स नहीं बनाए, तो तुम्हारे सभी करीबी मार दिए जाएंगे।’ यह डरावना संदेश किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि 2024 के एनसीएए (नेशनल कॉलेजिएट एथलेटिक एसोसिएशन) की स्टडी का हिस्सा है। उस खिलाड़ी ने अभी कोर्ट पर कदम भी नहीं रखा था, न ही कोई शॉट मिस किया था। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि सट्टेबाजी की दुनिया में उसकी काबिलियत पर ‘दांव’ लगा था। हालांकि वह मैदान में उतरा और स्वाभाविक खेलने की कोशिश भी की। एक्सपर्ट कहते हैं,हम इस समय ‘मार्च मैडनेस’ के बीच में हैं- जो अमेरिकी खेलों में सबसे अधिक सट्टेबाजी वाला आयोजन है। अनुमान है कि अकेले इस साल के टूर्नामेंट पर 25 हजार करोड़ रुपए दांव पर लगे हैं। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की प्रोफेसर और मनोवैज्ञानिक एमी कडी कहती हैं,‘आज के एथलीट सिर्फ शारीरिक थकान से नहीं, बल्कि नए मनोवैज्ञानिक खतरे से जूझ रहे हैं, जिसे ‘सोशल-इवैल्यूएटिव थ्रेट’ (सामाजिक परख का खतरा) कहते हैं। यह वह तनाव है जो दूसरों द्वारा नकारात्मक निर्णय लिए जाने या अपमानित होने के डर से पैदा होता है। 1995 में एक खिलाड़ी को सिर्फ स्टेडियम में मौजूद दर्शकों की हूटिंग सुनाई देती थी। लेकिन आज, एक खिलाड़ी नाश्ते से पहले ही सोशल मीडिया पर सैकड़ों नफरत भरे संदेश पढ़ चुका होता है। 2025 की स्टडी के अनुसार, 51% बास्केटबॉल खिलाड़ियों को प्रदर्शन के आधार पर और 46% को सीधे तौर पर सट्टेबाजों से धमकी भरे संदेश मिलते हैं। ख्यात मनोवैज्ञानिक एमी कहती हैं,‘खेल जगत अब तक नींद, पोषण व रिकवरी पर ध्यान देता आया है, लेकिन अब इसे ‘जजमेंट रिकवरी’ की जरूरत है। इसे ‘लोड मैनेजमेंट’ की तरह देखना होगा। जिस तरह खिलाड़ी मैच के बाद मांसपेशियों को आराम देते हैं, वैसी ही ‘रिकवरी’ उन्हें सोशल मीडिया और बाहरी आलोचनाओं से भी करनी जरूरी है।’ तनाव इतना ज्यादा कि जान का जोखिम तक हो सकता है मनोवैज्ञानिक सैली डिकरसन कहती हैं, ‘यह खतरा शरीर में कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर इतना बढ़ा देता है कि शरीर इसे ‘जान के जोखिम’ की तरह लेने लगता है। सामान्य तनाव समय के साथ कम हो जाता है, पर ‘दूसरों के जजमेंट’ का डर हर बार शरीर पर ऐसा प्रभाव डालता है, जैसे पहली बार मिला हो। टेनिस स्टार इगा स्विएतेक और जेसिका पेगुला जैसे खिलाड़ी इसे ‘मानसिक स्वास्थ्य’ की नहीं, बल्कि ‘प्रदर्शन’ की समस्या मान रहे हैं। जब अरमांडो बैकॉट जैसे खिलाड़ी जीत दिलाकर लौटते हैं, तब भी उनके इनबॉक्स में अपशब्द होते हैं क्योंकि उन्होंने सट्टेबाजों का निजी लक्ष्य पूरा नहीं किया होता।
40 प्लस लोगों की डेटिंग एप पर बढ़ रही सक्रियता:भारत के 2027 तक दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा डेटिंग सर्विस मार्केट बनने की उम्मीद

देश में डेटिंग एप की लोकप्रियता बढ़ रही है। भारत दुनिया में तेजी से बढ़ते डेटिंग एप मार्केट में से एक है। इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक देश में डेटिंग एप्स के करीब 10 करोड़ से ज्यादा उपयोगकर्ता हैं। निवेश प्लेटफॉर्म स्मॉलकेस की रिसर्च के अनुसार, भारत के 2027 तक दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा डेटिंग सर्विस मार्केट बनने की उम्मीद है। खास बात ये है कि इन डेटिंग एप पर युवाओं के साथ ही 40 साल से अधिक उम्र के लोगों की सक्रियता बढ़ रही है। एडल्टरी को अपराध के दायरे से बाहर करने के बाद विवाहेत्तर संबंधों के लिए भी लोग डेटिंग एप पर जा रहे हैं। ग्लीडेन जैसे विवाहेत्तर संबंधों पर केंद्रित डेटिंग एप के भी देश में 40 लाख से ज्यादा यूजर हैं। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक इस एप पर महिलाओं की संख्या बीते कुछ वर्षों में ढाई गुना तक बढ़ गई है। ये सिर्फ ट्रेंड नहीं, बदलते सामाजिक मानदंडों का भी प्रतीक है। त्वरित और अक्सर आभासी संतुष्टि के लिए लोग सामाजिक वर्जनाएं तोड़ने से भी नहीं हिचक रहे हैं। गहरे सामाजिक परिवर्तन का संकेत फोर्ब्स इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 40 प्लस लोगों की डेटिंग एप पर सक्रियता केवल ‘अफेयर’ या ‘कैजुअल डेटिंग’ तक सीमित नहीं है। यह एक गहरे सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। समाजशास्त्री कहते हैं, विवाह अब भी महत्वपूर्ण संस्था है, लेकिन उसके भीतर और बाहर रिश्तों की परिभाषा बदल रही है। कॉर्पोरेट लाइफ की भाग-दौड़ और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच आपस में भावनात्मक जुड़ाव की कमी लोगों को डिजिटल दुनिया की ओर धकेलती है। इप्सोस के एक सर्वे के मुताबिक लोग अफेयर करने के लिए हमेशा गलत कारण नहीं रखते। कुछ लोग डिजिटल दुनिया में छोटा सा थ्रिल या रोमांच ढूंढते हैं। 40+ पुरुषों और महिलाओं के लिए डेटिंग के लक्ष्य अलग 40 प्लस में रोमांस के प्रति पुरुष और महिलाओं का नजरिया बिल्कुल अलग हो सकता है। डेटिंग एप क्वैकक्वैक की एक रिपोर्ट के मुताबिक 40 वर्ष की आयु के बाद महिलाएं, ऐसा प्यार तलाशती हैं जो भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करे। जो खुले विचारों वाले हों, अपने आप को अभिव्यक्त कर सकें। इन महिलाओं के लिए भावनात्मक उपस्थिति आवश्यक है। दूसरी ओर, पुरुष आमतौर पर ऐसे संबंधों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं जो भरोसेमंद और प्रबंधनीय हों। पुरुष भावनात्मक शांति को प्राथमिकता देते हैं। एप के फाउंडर रवि मित्तल कहते हैं, ‘भारत में डेटिंग के मामले में उम्र अब बड़ी बाधा नहीं रह गई है। अलग-अलग पीढ़ी के बीच प्राथमिकता अलग-अलग हैं।’ रिश्तों से जुड़े अपराधों में हो रही बढ़ोतरी – देश में पिछले कुछ समय से शादी, डेटिंग या लिव‑इन जैसे अंतरंग रिश्तों में हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की सितंबर 2025 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में महिलाओं के खिलाफ 4.48 लाख अपराध दर्ज हुए, जो 10 साल में सबसे ज्यादा हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराधों में यूपी, महाराष्ट्र, प. बंगाल और राजस्थान सबसे आगे हैं। एक सर्वे के मुताबिक करीब 59% शादियां पार्टनर की बेवफाई की वजह से टूट रही हैं। – चाइल्डलाइट ग्लोबल चाइल्ड सेफ्टी इंस्टीट्यूट की स्वाइप रॉन्ग’ नामक रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों के खिलाफ अपराध करने वाले पुरुषों द्वारा डेटिंग साइटों का उपयोग करने की संभावना गैर-अपराधियों की तुलना में करीब चार गुना अधिक होती है। रिपोर्ट कहती है, बैंकिंग और गेमिंग में इस्तेमाल होने वाले मजबूत उपयोगकर्ता पहचान तरीकों को डेटिंग एप प्लेटफॉर्म द्वारा भी अपनाया जाना चाहिए। पहचान छिपाने की आसानी, क्षणिक आनंद इसकी वजह क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. काकोली राय कहती हैं, समाज में बड़ा बदलाव आ रहा है। वैवाहिक संबंधों में तनाव के मामले पिछले कुछ वर्षों में डेढ़ गुना तक बढ़ गए हैं। इसके पीछे डेटिंग एप भी बड़ी वजह हैं। पहले सामाजिक ताना-बाना बहुत मजबूत होता था, संयुक्त परिवार और समाज का डर लोगों को बंधनों से बाहर जाने से रोकता था। डेटिंग एप पर लोग क्षणिक और अस्थायी आनंद के लिए जाते हैं। इनमें अपनी पहचान छिपाने की आसानी होती है और अक्सर एप पर बने रिश्तों में कोई उत्तरदायित्व नहीं होता। जीवन के दूसरे पड़ाव में साथी मिलने में आसानी के कारण भी इन एप पर जा रहे हैं। कुछ लोग वैवाहिक जीवन की नीरसता के बीच डिजिटल दुनिया में रोमांच ढूंढने की कोशिश में सामाजिक नियम तोड़ रहे हैं। डिजिटल कनेक्टिविटी में आसानी होने से लोगों के बीच ऐसे एप का उपयोग बढ़ रहा है। अधिकतर लोग शुरुआत में भावनात्मक अकेलापन दूर करने के लिए डेटिंग एप पर जाते हैं लेकिन जब इनको इसमें अनूठापन मिलता है और रोमांच पैदा होता है तो फिर वे बार-बार इसमें जाते हैं। उन्हें इसमें आत्मसंतुष्टि मिलती है। समाज और कानून का डर नहीं रहता।’ – डॉ. ओपी रायचंदानी, वरिष्ठ मनोचिकित्सक
बास्केटबॉल चैम्पियन का ‘कैंडी’ सीक्रेट:मिलन शॉट से पहले दिमाग में दोहराते हैं ‘जेलीबीन’, ओवरथिंकिंग दूर करने का मिला अचूक फॉर्मूला

बड़े मैचों के दबाव में अक्सर दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों का दिमाग भी सुन्न पड़ जाता है। ऐसे में वे अपने ही खेल पर शक करने लगते हैं। अमेरिका के कॉलेज बास्केटबॉल टूर्नामेंट में इस साल के सर्वश्रेष्ठ 3-पॉइंट शूटर मिलन मोमसिलोविक भी इसी ओवरथिंकिंग का शिकार हो रहे थे। लेकिन इस 6 फीट 8 इंच लंबे स्नाइपर ने अपने दिमाग को शांत करने का एक बेहद अजीब, लेकिन 100% अचूक तरीका खोज निकाला है। यह तरीका है एक शब्द ‘जेलीबीन’। आयोवा स्टेट के मिलन इस वक्त डिवीजन-1 कॉलेज बास्केटबॉल के सबसे सटीक शूटर हैं। लेकिन एक वक्त था जब हर शॉट से पहले उनका आत्मविश्वास डगमगा जाता था। मिलन बताते हैं, ‘मुझे हमेशा लगता था कि मेरे शॉट में कुछ कमी है। शायद गेंद का आर्क सही नहीं है या मैं सही तरीके से थ्रो नहीं कर रहा हूं।’ लगातार गिरते कॉन्फिडेंस को बचाने के लिए उन्होंने एक मशहूर स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट डॉ. मैथ्यू मायरविक से संपर्क किया। डॉ. मैथ्यू ने उन्हें एक बेहद आसान मनोवैज्ञानिक तरकीब बताई- ‘थ्रो करने से ठीक पहले दिमाग में किसी एक चीज, खासकर किसी खाने की चीज का नाम सोचो।’ मिलन ने इसके लिए ‘जेलीबीन’ शब्द चुना। वे कहते हैं, ‘शायद यह शब्द बोलने में थोड़ा लंबा है, इसलिए मैंने इसे चुना। मजेदार बात यह है कि जेलीबीन मेरी फेवरेट कैंडी भी नहीं है।’ मिलन यह शब्द जोर से नहीं बोलते, शॉट लेने से ठीक पहले वे इसे बस अपने दिमाग में दोहराते हैं। यह टेक्निक उनके दिमाग में आने वाले नकारात्मक ख्यालों को ब्लॉक कर देती है, जिससे उनका फोकस सिर्फ थ्रो पर रहता है। जैसे ही दिमाग ओवरथिंकिंग करना बंद करता है, शरीर की ‘मसल मेमोरी’ अपना काम बिल्कुल सटीक तरीके से करने लगती है। यह तकनीक खिलाड़ी का ध्यान नतीजे से हटाकर प्रोसेस पर ले आती है। आयोवा स्टेट के हेड कोच टीजे ओत्जेल्बर्गर इस बदलाव से बेहद खुश हैं। उनका कहना है, ‘पहले अगर वह एक-दो शॉट मिस करता था, तो अगला शॉट लेने से डरने लगता था। लेकिन अब उसका माइंडसेट बदल गया है। अब वह सिर्फ अपनी कोशिशों पर फोकस करता है, नतीजों पर नहीं।’ इस एक शब्द ने मिलन के खेल को पूरी तरह बदल दिया है। वे इस सीजन में 49.3% की सटीकता से 3-पॉइंट्स स्कोर कर रहे हैं, जो पूरे टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा है। उन्होंने अब तक 134 थ्री-पॉइंटर्स दागे हैं, जो किसी भी अन्य खिलाड़ी से अधिक है। वे 17.2 पॉइंट्स प्रति मैच के औसत के साथ अपनी टीम के टॉप स्कोरर बन गए हैं।
दो भाई और एआई ने बनाई 15,000 करोड़ की कंपनी:ऑल्टमैन की भविष्यवाणी सच, कहा था- एआई की बदौलत अकेला इंसान 1 अरब डॉलर की कंपनी खड़ी करेगा

मैथ्यू गैलेगर (41) लॉस एंजिलिस के एक घर से जो कर दिखाया, वो दुनिया के बड़े-बड़े उद्यमियों को हैरत में डाल रहा है। न कोई बड़ी टीम और न चमचमाता दफ्तर- बस एक लैपटॉप, कुछ एआई टूल्स और गजब का जुनून। नतीजा- महज दो महीने और 20,000 डॉलर (अभी के हिसाब से 18.5 लाख रुपए) के निवेश से एक ऐसी कंपनी खड़ी हो गई, जो इस साल 16,700 करोड़ रुपए का कारोबार करने की राह पर है। गैलेगर की कंपनी मेडवी टेलीहेल्थ प्लेटफॉर्म चलाती है, जो वजन घटाने वाली जीएलपी-1 दवाएं ऑनलाइन बेचता है। सितंबर 2024 में जब मेडवी शुरू हुई, तो पहले ही महीने 300 ग्राहक जुड़ गए। दूसरे महीने यह संख्या 1,000 और बढ़ गई। 2025 में कंपनी के पहले पूरे कारोबारी साल में मेडवी ने 40.1 करोड़ डॉलर (3,700 करोड़ रुपए) की बिक्री की। इस पर 16.2% यानी करीब 600 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ, जो इस सेक्टर की दिग्गज कंपनी हिम्स के 5.5% मुनाफे से कई गुना ज्यादा है। तेज निर्णय मेडवी की सबसे बड़ी ताकत है – गैलेगर ओपन एआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने 2024 में कहा था कि एआई की बदौलत जल्द एक अकेला इंसान 1 अरब डॉलर की कंपनी खड़ी कर सकेगा। मेडवी की कहानी सुनकर ऑल्टमैन ने कहा कि उन्होंने तकनीकी दोस्तों से एक दांव लगाया था और शायद वो जीत गए। गैलेगर ने कहा, ‘मैं तेजी से फैसले करता हूं। यही मेडवी की सबसे बड़ी ताकत है।’ 12 से ज्यादा एआई टूल्स संभाल रहे मेडवी का पूरा बिजनेस गैलेगर ने कंपनी बनाने में दर्जनभर एआई टूल्स की मदद ली। चैटजीपीटी, क्लॉड, ग्रोक से कोडिंग करवाई। ‘मिडजर्नी’ और ‘रनवे’ से विज्ञापन के लिए तस्वीरें और वीडियो बनाए। इलेवनलैब्स से ग्राहक सेवा के लिए एआई वॉइस सिस्टम तैयार किया। अपनी आवाज का एआई क्लोन भी बनाया, ताकि व्यक्तिगत अपॉइंटमेंट लेने जैसे काम एआई संभाल सकें। दवा डिलीवरी, डॉक्टरों का नेटवर्क और कंप्लायंस जैसे काम केयरवैलिडेट, ओपनलूप हेल्थ जैसे प्लेटफॉर्म्स कर रहे हैं। एकमात्र कर्मचारी, वो भी संस्थापक का अपना ही भाई काम बढ़ा तो गैलेगर ने छोटे भाई एलियट को रखा। ये कंपनी के इकलौते कर्मचारी हैं। एलियट का काम है भाई तक आने वाले फालतू संदेश, कॉल्स फिल्टर करना, ताकि वो असली काम पर ध्यान दे सकें। इससे पहले गैलेगर ने 60 कर्मियों वाली ‘वॉच गैंग’ कंपनी चलाई थी। वो मुनाफे में नहीं आ पाई। इससे उन्होंने सीखा- ज्यादा लोग मतलब ज्यादा खर्च और धीमे फैसले। रोजाना 28 करोड़ रुपए कमाई, इससे बेघर युवाओं की मदद गैलेगर अब हर रोज 30 लाख डॉलर (28 करोड़ रुपए) से ज्यादा की कमाई कर रहे हैं। लेकिन पूरी कमाई वो खुद नहीं रखते। मुनाफे के एक बड़े हिस्से से बेघर युवाओं और पशु कल्याण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं/लोगों की मदद करते हैं। गैलेगर का बिजनेस मॉडल अब प्रेरणा का रोचक स्रोत है। बेघर बचपन से शुरू हुई यह यात्रा आज एक मिसाल बन गई है- इस बात की कि एआई के मौजूदा दौर में कल्पना और हुनर हो, तो कुछ भी असंभव नहीं है।
खुरई में नरवाई जलाने पर तीन किसानों के खिलाफ FIR

सागर/ खुरई | जिले में नरवाई जलाने के मामले में किसानों के खिलाफ पहली एफआईआर खुरई क्षेत्र से दर्ज की गई है। कलेक्टर संदीप जीआर के निर्देश पर खुरई तहसील में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए टीहर गांव के तीन किसानों के खिलाफ मामला दर्ज किया। पुलिस के मुताबिक जिन किसानों पर एफआईआर हुई है, उनमें बृजेन्द्र सिंह लोधी, निहाल सिंह लोधी और दीपेश सिंह लोधी शामिल हैं।









