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सट्टेबाजी का दबाव खिलाड़ियों को तोड़ रहा:टारगेट पूरे करने के लिए एथलीट्स को परिजनों की हत्या की धमकी; अपशब्दों की बौछार

सट्टेबाजी का दबाव खिलाड़ियों को तोड़ रहा:टारगेट पूरे करने के लिए एथलीट्स को परिजनों की हत्या की धमकी; अपशब्दों की बौछार

एक कॉलेज बास्केटबॉल खिलाड़ी मैच शुरू होने से पहले अपना मोबाइल खोलता है। स्क्रीन पर अजनबी का संदेश दिखता है,‘सुनो, यह मजाक नहीं है। अगर तुमने आज 22 पॉइंट्स व 12 बाउंड्स नहीं बनाए, तो तुम्हारे सभी करीबी मार दिए जाएंगे।’ यह डरावना संदेश किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि 2024 के एनसीएए (नेशनल कॉलेजिएट एथलेटिक एसोसिएशन) की स्टडी का हिस्सा है। उस खिलाड़ी ने अभी कोर्ट पर कदम भी नहीं रखा था, न ही कोई शॉट मिस किया था। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि सट्टेबाजी की दुनिया में उसकी काबिलियत पर ‘दांव’ लगा था। हालांकि वह मैदान में उतरा और स्वाभाविक खेलने की कोशिश भी की। एक्सपर्ट कहते हैं,हम इस समय ‘मार्च मैडनेस’ के बीच में हैं- जो अमेरिकी खेलों में सबसे अधिक सट्टेबाजी वाला आयोजन है। अनुमान है कि अकेले इस साल के टूर्नामेंट पर 25 हजार करोड़ रुपए दांव पर लगे हैं। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की प्रोफेसर और मनोवैज्ञानिक एमी कडी कहती हैं,‘आज के एथलीट सिर्फ शारीरिक थकान से नहीं, बल्कि नए मनोवैज्ञानिक खतरे से जूझ रहे हैं, जिसे ‘सोशल-इवैल्यूएटिव थ्रेट’ (सामाजिक परख का खतरा) कहते हैं। यह वह तनाव है जो दूसरों द्वारा नकारात्मक निर्णय लिए जाने या अपमानित होने के डर से पैदा होता है। 1995 में एक खिलाड़ी को सिर्फ स्टेडियम में मौजूद दर्शकों की हूटिंग सुनाई देती थी। लेकिन आज, एक खिलाड़ी नाश्ते से पहले ही सोशल मीडिया पर सैकड़ों नफरत भरे संदेश पढ़ चुका होता है। 2025 की स्टडी के अनुसार, 51% बास्केटबॉल खिलाड़ियों को प्रदर्शन के आधार पर और 46% को सीधे तौर पर सट्टेबाजों से धमकी भरे संदेश मिलते हैं। ख्यात मनोवैज्ञानिक एमी कहती हैं,‘खेल जगत अब तक नींद, पोषण व रिकवरी पर ध्यान देता आया है, लेकिन अब इसे ‘जजमेंट रिकवरी’ की जरूरत है। इसे ‘लोड मैनेजमेंट’ की तरह देखना होगा। जिस तरह खिलाड़ी मैच के बाद मांसपेशियों को आराम देते हैं, वैसी ही ‘रिकवरी’ उन्हें सोशल मीडिया और बाहरी आलोचनाओं से भी करनी जरूरी है।’ तनाव इतना ज्यादा कि जान का जोखिम तक हो सकता है मनोवैज्ञानिक सैली डिकरसन कहती हैं, ‘यह खतरा शरीर में कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर इतना बढ़ा देता है कि शरीर इसे ‘जान के जोखिम’ की तरह लेने लगता है। सामान्य तनाव समय के साथ कम हो जाता है, पर ‘दूसरों के जजमेंट’ का डर हर बार शरीर पर ऐसा प्रभाव डालता है, जैसे पहली बार मिला हो। टेनिस स्टार इगा स्विएतेक और जेसिका पेगुला जैसे खिलाड़ी इसे ‘मानसिक स्वास्थ्य’ की नहीं, बल्कि ‘प्रदर्शन’ की समस्या मान रहे हैं। जब अरमांडो बैकॉट जैसे खिलाड़ी जीत दिलाकर लौटते हैं, तब भी उनके इनबॉक्स में अपशब्द होते हैं क्योंकि उन्होंने सट्टेबाजों का निजी लक्ष्य पूरा नहीं किया होता।

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सट्टेबाजी का दबाव खिलाड़ियों को तोड़ रहा:टारगेट पूरे करने के लिए एथलीट्स को परिजनों की हत्या की धमकी; अपशब्दों की बौछार

एक कॉलेज बास्केटबॉल खिलाड़ी मैच शुरू होने से पहले अपना मोबाइल खोलता है। स्क्रीन पर अजनबी का संदेश दिखता है,‘सुनो, यह मजाक नहीं है। अगर तुमने आज 22 पॉइंट्स व 12 बाउंड्स नहीं बनाए, तो तुम्हारे सभी करीबी मार दिए जाएंगे।’ यह डरावना संदेश किसी फिल्म की पटकथा नहीं, बल्कि 2024 के एनसीएए (नेशनल कॉलेजिएट एथलेटिक एसोसिएशन) की स्टडी का हिस्सा है। उस खिलाड़ी ने अभी कोर्ट पर कदम भी नहीं रखा था, न ही कोई शॉट मिस किया था। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि सट्टेबाजी की दुनिया में उसकी काबिलियत पर ‘दांव’ लगा था। हालांकि वह मैदान में उतरा और स्वाभाविक खेलने की कोशिश भी की। एक्सपर्ट कहते हैं,हम इस समय ‘मार्च मैडनेस’ के बीच में हैं- जो अमेरिकी खेलों में सबसे अधिक सट्टेबाजी वाला आयोजन है। अनुमान है कि अकेले इस साल के टूर्नामेंट पर 25 हजार करोड़ रुपए दांव पर लगे हैं। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की प्रोफेसर और मनोवैज्ञानिक एमी कडी कहती हैं,‘आज के एथलीट सिर्फ शारीरिक थकान से नहीं, बल्कि नए मनोवैज्ञानिक खतरे से जूझ रहे हैं, जिसे ‘सोशल-इवैल्यूएटिव थ्रेट’ (सामाजिक परख का खतरा) कहते हैं। यह वह तनाव है जो दूसरों द्वारा नकारात्मक निर्णय लिए जाने या अपमानित होने के डर से पैदा होता है। 1995 में एक खिलाड़ी को सिर्फ स्टेडियम में मौजूद दर्शकों की हूटिंग सुनाई देती थी। लेकिन आज, एक खिलाड़ी नाश्ते से पहले ही सोशल मीडिया पर सैकड़ों नफरत भरे संदेश पढ़ चुका होता है। 2025 की स्टडी के अनुसार, 51% बास्केटबॉल खिलाड़ियों को प्रदर्शन के आधार पर और 46% को सीधे तौर पर सट्टेबाजों से धमकी भरे संदेश मिलते हैं। ख्यात मनोवैज्ञानिक एमी कहती हैं,‘खेल जगत अब तक नींद, पोषण व रिकवरी पर ध्यान देता आया है, लेकिन अब इसे ‘जजमेंट रिकवरी’ की जरूरत है। इसे ‘लोड मैनेजमेंट’ की तरह देखना होगा। जिस तरह खिलाड़ी मैच के बाद मांसपेशियों को आराम देते हैं, वैसी ही ‘रिकवरी’ उन्हें सोशल मीडिया और बाहरी आलोचनाओं से भी करनी जरूरी है।’ तनाव इतना ज्यादा कि जान का जोखिम तक हो सकता है मनोवैज्ञानिक सैली डिकरसन कहती हैं, ‘यह खतरा शरीर में कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर इतना बढ़ा देता है कि शरीर इसे ‘जान के जोखिम’ की तरह लेने लगता है। सामान्य तनाव समय के साथ कम हो जाता है, पर ‘दूसरों के जजमेंट’ का डर हर बार शरीर पर ऐसा प्रभाव डालता है, जैसे पहली बार मिला हो। टेनिस स्टार इगा स्विएतेक और जेसिका पेगुला जैसे खिलाड़ी इसे ‘मानसिक स्वास्थ्य’ की नहीं, बल्कि ‘प्रदर्शन’ की समस्या मान रहे हैं। जब अरमांडो बैकॉट जैसे खिलाड़ी जीत दिलाकर लौटते हैं, तब भी उनके इनबॉक्स में अपशब्द होते हैं क्योंकि उन्होंने सट्टेबाजों का निजी लक्ष्य पूरा नहीं किया होता।

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