China is also gaining an edge over America in the pharmaceutical industry.

Hindi News Business China Is Also Gaining An Edge Over America In The Pharmaceutical Industry. द न्यूयॉर्क टाइम्सकुछ ही क्षण पहले कॉपी लिंक शिकागो में कैंसर विशेषज्ञों की सालाना कॉन्फ्रेंस।- फाइल फोटो नई दवाओं के विकास में चीन तेजी से उभरती ताकत बनता दिख रहा है। दशकों तक कैंसर विशेषज्ञों की सालाना कॉन्फ्रेंस में दवाइयों के ट्रायल्स मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोप के अस्पताल चलाते थे, लेकिन पिछले सप्ताह शिकागो में आयोजित अमेरिकन सोसायटी ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी (एएससीओ) की वार्षिक बैठक ने संकेत दिया कि वैश्विक बायोटेक्नोलॉजी परिदृश्य बदल रहा है। कभी अपेक्षाकृत छोटी मानी जाने वाली चीन की बायोटेक इंडस्ट्री कुछ ही वर्षों में नई दवाओं के शोध, विकास और क्लीनिकल परीक्षण का बड़ा केंद्र बन गई है। 1989 से एएससीओ सम्मेलन में भाग ले रहे जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. ओटिस ब्रॉली के अनुसार, चीन की बायोटेक इंडस्ट्री अब वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा चुकी है। हालांकि इस प्रगति ने अमेरिकी अधिकारियों, दवा कंपनियों और चिकित्सा विशेषज्ञों की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं। उनकी आशंका नई दवाओं के विकास पर नियंत्रण और बायोटेक क्षेत्र में अमेरिका की लंबे समय से बनी बढ़त के कमजोर पड़ने से भी जुड़ी है। अमेरिकी बायोटेक स्टार्टअप्स का कहना है कि उन्हें पेटेंट, रिसर्च पब्लिकेशन और क्लीनिकल ट्रायल्स के क्षेत्र में चीनी कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या चीन में विकसित दवाएं अमेरिकी मरीजों पर भी उतनी ही प्रभावी साबित होंगी, जितनी चीनी नागरिकों पर होती हैं। दरअसल, लंग कैंसर के एशियाई मरीज लंबे समय तक जीवित रहते हैं और अन्य नस्ल के लोगों की तुलना में उन्हें इलाज से ज्यादा फायदा होता है। सम्मेलन में सबसे अधिक चर्चा चीनी कंपनी अकेसो बायोफार्मा की कैंसर-रोधी दवा इवोनेसिमैब को लेकर रही। कंपनी इस दवा का अमेरिकी मरीजों पर भी परीक्षण कर रही है। कई बड़ी दवा कंपनियों के चीन से सौदे पिछले कुछ वर्षों से दुनिया की बड़ी फार्मास्युटिकल्स कंपनियां चीन की दवाइयां और कच्चे माल का बड़े पैमाने पर आयात कर रही हैं। इस साल अब तक ऐसे लगभग आधे सौदे चीनी कंपनियों से हुए हैं। ये 2020 से बहुत अधिक हैं। कॉन्फ्रेंस में इवोनेसिमैब सहित कैंसर की अन्य दवाइयों के सौदे फाइजर, मर्क और ब्रिस्टल मायर्स स्क्विब जैसी बड़ी कंपनियों ने किए हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
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Hindi News Business China Is Also Gaining An Edge Over America In The Pharmaceutical Industry. द न्यूयॉर्क टाइम्स17 मिनट पहले कॉपी लिंक शिकागो में कैंसर विशेषज्ञों की सालाना कॉन्फ्रेंस।- फाइल फोटो नई दवाओं के विकास में चीन तेजी से उभरती ताकत बनता दिख रहा है। दशकों तक कैंसर विशेषज्ञों की सालाना कॉन्फ्रेंस में दवाइयों के ट्रायल्स मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोप के अस्पताल चलाते थे, लेकिन पिछले सप्ताह शिकागो में आयोजित अमेरिकन सोसायटी ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी (एएससीओ) की वार्षिक बैठक ने संकेत दिया कि वैश्विक बायोटेक्नोलॉजी परिदृश्य बदल रहा है। कभी अपेक्षाकृत छोटी मानी जाने वाली चीन की बायोटेक इंडस्ट्री कुछ ही वर्षों में नई दवाओं के शोध, विकास और क्लीनिकल परीक्षण का बड़ा केंद्र बन गई है। 1989 से एएससीओ सम्मेलन में भाग ले रहे जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. ओटिस ब्रॉली के अनुसार, चीन की बायोटेक इंडस्ट्री अब वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा चुकी है। हालांकि इस प्रगति ने अमेरिकी अधिकारियों, दवा कंपनियों और चिकित्सा विशेषज्ञों की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं। उनकी आशंका नई दवाओं के विकास पर नियंत्रण और बायोटेक क्षेत्र में अमेरिका की लंबे समय से बनी बढ़त के कमजोर पड़ने से भी जुड़ी है। अमेरिकी बायोटेक स्टार्टअप्स का कहना है कि उन्हें पेटेंट, रिसर्च पब्लिकेशन और क्लीनिकल ट्रायल्स के क्षेत्र में चीनी कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या चीन में विकसित दवाएं अमेरिकी मरीजों पर भी उतनी ही प्रभावी साबित होंगी, जितनी चीनी नागरिकों पर होती हैं। दरअसल, लंग कैंसर के एशियाई मरीज लंबे समय तक जीवित रहते हैं और अन्य नस्ल के लोगों की तुलना में उन्हें इलाज से ज्यादा फायदा होता है। सम्मेलन में सबसे अधिक चर्चा चीनी कंपनी अकेसो बायोफार्मा की कैंसर-रोधी दवा इवोनेसिमैब को लेकर रही। कंपनी इस दवा का अमेरिकी मरीजों पर भी परीक्षण कर रही है। कई बड़ी दवा कंपनियों के चीन से सौदे पिछले कुछ वर्षों से दुनिया की बड़ी फार्मास्युटिकल्स कंपनियां चीन की दवाइयां और कच्चे माल का बड़े पैमाने पर आयात कर रही हैं। इस साल अब तक ऐसे लगभग आधे सौदे चीनी कंपनियों से हुए हैं। ये 2020 से बहुत अधिक हैं। कॉन्फ्रेंस में इवोनेसिमैब सहित कैंसर की अन्य दवाइयों के सौदे फाइजर, मर्क और ब्रिस्टल मायर्स स्क्विब जैसी बड़ी कंपनियों ने किए हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
अमेरिका का पहला एआई स्कूल:हाईटेक लैब होते हुए भी बच्चों को दिमाग दौड़ाने के लिए प्रोत्साहन, कोशिश यही कि इंसानी खूबियां बची रहें

जॉर्जिया राज्य के हार्मनी एलीमेंट्री स्कूल की लाइब्रेरी में पहली क्लास के बच्चे रंग-बिरंगे प्लास्टिक ब्लॉक्स से घर बनाने में जुटे हैं। टीचर शानाज लखानी प्लास्टिक के खिलौने को दिखाकर पूछती हैं,‘यह हमारा ‘यूजर’ है। हमें इसके लिए मजबूत घर बनाना है, जो भूकंप में भी न गिरे।’ टीचर यहां बच्चों को ‘यूजर एक्सपीरियंस’ और ‘एआई एप्लीकेशंस’ जैसे भारी-भरकम तकनीकी शब्द सिखा रही हैं। वाइटबोर्ड पर डेटा साइंस और प्रोग्रामिंग के रंग-बिरंगे ट्राएंगल्स बने हैं। पर, 7 साल के इन मासूमों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसका एआई से क्या कनेक्शन है, वे तो बस अपनी टीचर की गोद में बैठकर, दोस्तों के साथ मिलकर खिलौनों का घर बनाने का आनंद ले रहे हैं। भविष्य की कल्पनाओं में अक्सर ऐसे स्कूल दिखते हैं जहां रोबोट पढ़ा रहे हों और बच्चे चैटबॉट्स से बातें कर रहे हों। लेकिन, हकीकत में यह स्कूल तकनीक से ज्यादा इंसानी जुड़ाव पर टिका है। असली शिक्षा वही है जहां टीचर्स का व्यक्तिगत मार्गदर्शन, बच्चों का आपसी जुड़ाव और खुद से सोचने की क्षमता अहम रहती है। इस हाई स्कूल को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ‘नौकरियां बदलने वाली’ रिपोर्ट देखकर डिजाइन किया गया था। पूर्व छात्र मोहम्मद रिजवान व जोसेफ श्राग ने बताया कि ‘एआई स्कूल’ का दावा हकीकत से अलग था। उन्होंने कहा कि हम एआई का उतना इस्तेमाल नहीं करते। रोबोटिक्स जैसी कुछ क्लास छोड़ दें तो बाकी पढ़ाई पारंपरिक तरीके से होती है। भाषा व इतिहास में टीचर्स बच्चों से हाथ से निबंध लिखवाते हैं ताकि वे एआई से मदद न ले सकें। स्कूल के मैकेनिकल इंजीनियरिंग रूम में कार्डबोर्ड से बड़ा स्पिनिंग गेम बना रहे एक छात्र से जब पूछा गया कि क्या उसने इसके लिए किसी एआई टूल या चैटबॉट का इस्तेमाल किया? तो उसका जवाब था, ‘नहीं, मैं सिर्फ अपने दिमाग का इस्तेमाल कर रहा हूं।’ इतिहास की क्लास में जब बच्चे चैटबॉट से सवाल-जवाब करते हैं, तो टीचर केसी होलीक्रॉस उनका मार्गदर्शन करती हैं। पैरेंट लिडिया क्लार्क कहती हैं,‘हमारे बच्चे तकनीक की वजह से नहीं, बल्कि स्कूल के सुरक्षित माहौल और बेहतरीन टीचर्स के मानवीय जुड़ाव की वजह से आगे बढ़ रहे हैं। एआई सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी ‘खान एकेडमी’ के प्रमुख सलमान खान ने स्वीकार किया है कि कई छात्रों के लिए एआई टूल से पढ़ना बेहद निराशाजनक रहा, क्योंकि मशीनें बच्चों की मानसिक उलझन को इंसानों की तरह नहीं समझ सकतीं। ’ स्कूल के अधिकारियों ने भी अंततः माना कि उनके लिए एआई का मतलब सिर्फ कोडिंग सिखाना नहीं, बल्कि उन ‘ड्यूरेबल स्किल्स’ (जैसे- नैतिक सोच, आपसी सहयोग और रचनात्मकता को बचाना है जो मशीनें कभी नहीं सीख सकतीं। आपसी चर्चा, एक्टिविटी को महत्व ताकि मौलिक सोच बनी रहे स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने 800 से ज्यादा रिसर्च पेपर्स की स्टडी करके चेतावनी दी है कि एआई टूल तुरंत काम पूरा करने में तो मदद करते हैं, पर लंबे वक्त में बच्चों की खुद सोचने की क्षमता खत्म हो रही है। इसे वैज्ञानिकों ने ‘कॉग्निटिव सरेंडर’ कहा है, जहां इंसान अपने फैसले मशीनों पर छोड़ देता है। हार्मनी स्कूल इस खतरे को भांपते हुए ‘ह्यूमन टच’ पर जोर दे रहा है। यहां एआई सिर्फ टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जबकि मुख्य फोकस आपसी चर्चा, फिजिकल एक्टिविटी और टीचर्स के मार्गदर्शन पर है ताकि बच्चों की मौलिक सोच बनी रहे।
मुंबई की लाइफलाइन रहे डिब्बावालों का वजूद संकट में:हार्वर्ड ने कभी लॉजिस्टिक्स का मास्टरक्लास बताया था, प्रिंस चार्ल्स खुद देखने आए थे

जब मुंबई पूरी तरह जागी भी नहीं होती, सफेद टोपी और कुर्ते में कुछ लोग साइकिलों पर ऊंचे-ऊंचे टिफिन के ढेर लेकर रेलवे स्टेशनों पर पहुंच जाते हैं। ट्रेन में चढ़ते हैं, शहर पार करते हैं और फिर पैदल या साइकिल से घर का बना गरम खाना दफ्तरों तक पहुंचाते हैं। ये हैं मुंबई के डिब्बावाले- एक ऐसी व्यवस्था, जिसे हार्वर्ड बिजनेस स्कूल ने कम लागत के लॉजिस्टिक्स का मास्टरक्लास बताया और जिसे देखने 2003 में तत्कालीन प्रिंस चार्ल्स खुद मुंबई आए थे। लेकिन आज यही डिब्बावाले वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं। डिब्बावाला व्यवस्था की शुरुआत 19वीं सदी के आखिर में हुई, जब ब्रिटिश राज के दौरान बॉम्बे (अब मुंबई) तेजी से फैल रहा था। दफ्तर जाने वाले लोगों को घर का खाना चाहिए था। बीबीसी वर्ल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, 1890 में महादेव बाचचे ने 100 कामगारों के साथ इसे व्यवस्थित रूप दिया। धीरे-धीरे यह व्यवस्था इतनी सटीक हो गई कि बिना किसी एप या जीपीएस के रोज हजारों टिफिन सही पते पर पहुंचने लगे। अपने चरम पर 4,500 डिब्बावाले रोज 50,000 से ज्यादा टिफिन पहुंचाते थे। फिर कोरोना आया और सब बदल गया। दफ्तर बंद हुए, वर्क फ्रॉम होम शुरू हुआ और टिफिन की जरूरत अचानक खत्म हो गई। रिपोर्ट में मुंबई टिफिन बॉक्स सप्लायर्स एसोसिएशन के सचिव किरण गवंडे के हवाले से कहा गया है, ‘लॉकडाउन के बाद से कई लोग हफ्ते में सिर्फ 2-3 दिन दफ्तर जाते हैं। इसका डिब्बावालों पर बड़ा असर हुआ। 2018 में जो संख्या 4,500 थी, वह अब 1,500 रह गई है।’ जो बचे हैं, उनकी हालत भी अच्छी नहीं हैं। बालू शिंदे 20 साल तक डिब्बावाला रहे। रोज 15-20 टिफिन पहुंचाते थे। हर माह 20,000 रुपए कमाते थे। 2020 के अंत तक सिर्फ दो ग्राहक बचे। अब वे ऑटो चलाते हैं। जो टिके हैं, वे दो-दो काम कर रहे हैं। एसोसिएशन अब शिफ्ट आधारित काम की योजना बना रही है। लेकिन अध्यक्ष रामदास कार्वांडे कहते हैं, ‘अभी तो चल रहा है, लेकिन आगे क्या होगा, कह नहीं सकते।’ हर सुबह मुंबई की ट्रेनों में स्टील के टिफिन लिए ये लोग अब भी दिखते हैं। ये एक ऐसी परंपरा को जिंदा रखते हुए जो कभी इस शहर की रफ्तार की पहचान थी, पर अब उसी रफ्तार से पीछे छूटती जा रही है। स्विगी-जोमैटो, क्लाउड किचन और महंगाई ने बढ़ाई डिब्बावालों की चुनौती डिब्बावाला सिर्फ 2,000 रुपए प्रति माह में घर का खाना पहुंचाता था। अब स्विगी और जोमैटो जैसे फूड डिलीवरी एप स्क्रीन के एक टच पर बिरयानी से बर्गर तक उपलब्ध करा रहे हैं। इस बीच उभरते क्लाउड किचन ने मुकाबला कड़ा कर दिया है। नतीजतन कभी एकछत्र राज करने वाला डिब्बावाला सिस्टम सिमट रहा है। 35 साल से डिब्बावाले रहे बाबन कदम कहते हैं, ‘आज की महंगाई में नई पीढ़ी इस काम में नहीं आएगी। सब बेहतर नौकरी या कारोबार चाहते हैं।’
Bhuvi’s speed reached 140 kmph in IPL

नई दिल्लीकुछ ही क्षण पहले कॉपी लिंक भुवनेश्वर के पर्सनल ट्रेनर सूर्या यादव के मुताबिक, चोट से बचने और ताकत बढ़ाने के लिए भुवी को भारी वजन उठाने की आदत डालनी पड़ी।- फाइल फोटो आईपीएल 2026 में स्विंग के सुल्तान 36 वर्षीय भुवनेश्वर कुमार ने 28 विकेट झटके, जो किसी भी भारतीय गेंदबाज द्वारा सबसे ज्यादा हैं। उनकी इस उम्र को मात देने वाली परफॉर्मेंस के पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि जिम में बहाया गया पसीना, भारी वजन उठाना (वेटलिफ्टिंग) और गजब का अनुशासन है। एक समय था जब लगातार चोटों (कमर, घुटने और टखने) की वजह से भुवी का इंटरनेशनल करियर थम सा गया था। तीन साल पहले उनके शरीर में फैट 20% के करीब था। लेकिन आज, 36 साल की उम्र में उनका फैट प्रतिशत घटकर सिर्फ 13-14% रह गया है। हालांकि, उन्होंने अपने शरीर का फैट तो कम किया, लेकिन वजन नहीं। उनका वजन आज भी 73-74 किलो है, जिसका मतलब है कि उन्होंने फैट को मसल (मांसपेशियों) में बदला है। इसी ताकत और लीन बॉडी की वजह से पिछले तीन सालों से वे लगातार बिना चोटिल हुए पूरा सीजन खेल रहे हैं। भुवनेश्वर के पर्सनल ट्रेनर सूर्या यादव के मुताबिक, चोट से बचने और ताकत बढ़ाने के लिए भुवी को भारी वजन उठाने की आदत डालनी पड़ी। पहले भुवी सिर्फ 40 किलो वजन के साथ स्क्वैट्स करते थे। लेकिन अब उनकी ताकत दोगुनी हो गई है और वे आसानी से 110-120 किलो वजन उठा लेते हैं। भारी वजन उठाने और फिटनेस सुधारने का सीधा असर उनकी गेंदबाजी पर दिखा है। इस सीजन के फाइनल में भुवी की स्पीड लगभग 139-140 kmph तक पहुंच गई थी। भुवी हमेशा से अपनी इनस्विंग और आउटस्विंग के लिए जाने जाते हैं। लेकिन इस बार उन्होंने एक नया हथियार ‘वॉबल सीम’ जोड़ा। गेंद सीधी लाइन में आकर दोनों तरफ स्विंग होती है। भुवी ने अपनी सबसे बड़ी ताकत ‘बैकस्पिन’ को भी वापस पा लिया है। एक फिट शरीर के लिए सिर्फ जिम नहीं, डाइट भी जरूरी है। अब भुवी मिठाइयों से पूरी तरह दूर रहते हैं और अपने शरीर के वजन से दोगुना प्रोटीन लेते हैं। उनकी डाइट में प्रोटीन बार, प्रोटीन शेक, घर के बने चीले और जरूरत पड़ने पर अंडे शामिल हैं। सोशल मीडिया की चकाचौंध से दूर रहने वाले भुवनेश्वर कुमार रोजाना 5 से 7 घंटे क्रिकेट और फिटनेस को देते हैं। इसी कड़ी मेहनत का नतीजा है कि आज एक बार फिर से टीम इंडिया में उनकी वापसी की चर्चाएं तेज हो गई हैं। दिन में डेढ़ घंटा बैटिंग प्रैक्टिस भी, बुखार में भी नहीं छोड़ा मैदान भुवी बल्लेबाजी पर भी खूब मेहनत कर रहे हैं। मुंबई इंडियंस के खिलाफ पहली गेंद पर ही छक्के ने उनकी टीम को रोमांचक जीत दिलाई। वे हर दिन 1 से 1.5 घंटे सिर्फ बैटिंग की प्रैक्टिस करते हैं। यूपी टी20 लीग का एक किस्सा उनकी लगन को दर्शाता है। उनकी पूरी टीम वायरल की चपेट में थी और भुवी को मैदान पर ही ग्लूकोज चढ़ानी पड़ी। ट्रेनर ने आराम करने को कहा, लेकिन अगले दिन वे मैच खेलने के लिए तैयार थे। उनका जवाब था ‘मुझे क्रिकेट से प्यार है, बॉलिंग से प्यार है। इसलिए मैं खेलता हूं।’ दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Bhuvi’s speed reached 140 kmph in IPL

नई दिल्ली37 मिनट पहले कॉपी लिंक भुवनेश्वर के पर्सनल ट्रेनर सूर्या यादव के मुताबिक, चोट से बचने और ताकत बढ़ाने के लिए भुवी को भारी वजन उठाने की आदत डालनी पड़ी।- फाइल फोटो आईपीएल 2026 में स्विंग के सुल्तान 36 वर्षीय भुवनेश्वर कुमार ने 28 विकेट झटके, जो किसी भी भारतीय गेंदबाज द्वारा सबसे ज्यादा हैं। उनकी इस उम्र को मात देने वाली परफॉर्मेंस के पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि जिम में बहाया गया पसीना, भारी वजन उठाना (वेटलिफ्टिंग) और गजब का अनुशासन है। एक समय था जब लगातार चोटों (कमर, घुटने और टखने) की वजह से भुवी का इंटरनेशनल करियर थम सा गया था। तीन साल पहले उनके शरीर में फैट 20% के करीब था। लेकिन आज, 36 साल की उम्र में उनका फैट प्रतिशत घटकर सिर्फ 13-14% रह गया है। हालांकि, उन्होंने अपने शरीर का फैट तो कम किया, लेकिन वजन नहीं। उनका वजन आज भी 73-74 किलो है, जिसका मतलब है कि उन्होंने फैट को मसल (मांसपेशियों) में बदला है। इसी ताकत और लीन बॉडी की वजह से पिछले तीन सालों से वे लगातार बिना चोटिल हुए पूरा सीजन खेल रहे हैं। भुवनेश्वर के पर्सनल ट्रेनर सूर्या यादव के मुताबिक, चोट से बचने और ताकत बढ़ाने के लिए भुवी को भारी वजन उठाने की आदत डालनी पड़ी। पहले भुवी सिर्फ 40 किलो वजन के साथ स्क्वैट्स करते थे। लेकिन अब उनकी ताकत दोगुनी हो गई है और वे आसानी से 110-120 किलो वजन उठा लेते हैं। भारी वजन उठाने और फिटनेस सुधारने का सीधा असर उनकी गेंदबाजी पर दिखा है। इस सीजन के फाइनल में भुवी की स्पीड लगभग 139-140 kmph तक पहुंच गई थी। भुवी हमेशा से अपनी इनस्विंग और आउटस्विंग के लिए जाने जाते हैं। लेकिन इस बार उन्होंने एक नया हथियार ‘वॉबल सीम’ जोड़ा। गेंद सीधी लाइन में आकर दोनों तरफ स्विंग होती है। भुवी ने अपनी सबसे बड़ी ताकत ‘बैकस्पिन’ को भी वापस पा लिया है। एक फिट शरीर के लिए सिर्फ जिम नहीं, डाइट भी जरूरी है। अब भुवी मिठाइयों से पूरी तरह दूर रहते हैं और अपने शरीर के वजन से दोगुना प्रोटीन लेते हैं। उनकी डाइट में प्रोटीन बार, प्रोटीन शेक, घर के बने चीले और जरूरत पड़ने पर अंडे शामिल हैं। सोशल मीडिया की चकाचौंध से दूर रहने वाले भुवनेश्वर कुमार रोजाना 5 से 7 घंटे क्रिकेट और फिटनेस को देते हैं। इसी कड़ी मेहनत का नतीजा है कि आज एक बार फिर से टीम इंडिया में उनकी वापसी की चर्चाएं तेज हो गई हैं। दिन में डेढ़ घंटा बैटिंग प्रैक्टिस भी, बुखार में भी नहीं छोड़ा मैदान भुवी बल्लेबाजी पर भी खूब मेहनत कर रहे हैं। मुंबई इंडियंस के खिलाफ पहली गेंद पर ही छक्के ने उनकी टीम को रोमांचक जीत दिलाई। वे हर दिन 1 से 1.5 घंटे सिर्फ बैटिंग की प्रैक्टिस करते हैं। यूपी टी20 लीग का एक किस्सा उनकी लगन को दर्शाता है। उनकी पूरी टीम वायरल की चपेट में थी और भुवी को मैदान पर ही ग्लूकोज चढ़ानी पड़ी। ट्रेनर ने आराम करने को कहा, लेकिन अगले दिन वे मैच खेलने के लिए तैयार थे। उनका जवाब था ‘मुझे क्रिकेट से प्यार है, बॉलिंग से प्यार है। इसलिए मैं खेलता हूं।’ दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
फोर्ब्स बिलियनेयर्स की लिस्ट में माइक्रॉन के भारतवंशी सीईओ शामिल:संजय ने कोडेक का ऑफर ठुकराकर सैंडिस्क को घर-घर पहुंचाया

अमेरिकी चिप कंपनी माइक्रॉन टेक्नोलॉजी के सीईओ संजय मेहरोत्रा फोर्ब्स की चिप कंपनियों के अरबपतियों की लिस्ट में शामिल हो गए हैं। फोर्ब्स के मुताबिक उनकी संपत्ति 11,406 करोड़ रुपए है। वे इस लिस्ट में शामिल इकलौते भारतीय हैं। इसमें शीर्ष पर एनवीडिया के सीईओ जेन्संग हुआंग हैं जिनकी नेटवर्थ 17.46 लाख करोड़ रु. है। कानपुर में जन्मे मेहरोत्रा (67) ने सैंडिस्क की सह-स्थापना से लेकर माइक्रॉन को 104 लाख करोड़ मार्केट कैप तक पहुंचाने में काफी योगदान दिया है। 1976 में संजय ने अमेरिका में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए स्टूडेंट वीसा मांगा, लेकिन तीन बार दूतावास ने मना कर दिया। अंत में पिता उनके साथ नई दिल्ली दूतावास पहुंचे और काउंसलर अधिकारी के लंच पर जाने के बावजूद लॉबी में डटे रहे। अंत में उन्हें वीसा मिला। इंटेल में पहली नौकरी के दौरान वे रात दो बजे तक नौकरी करते थे। 1988 में संजय ने दो दोस्तों के साथ मिलकर सैंडिस्क की नींव रखी। उस समय फ्लैश मेमोरी नई तकनीक थी, लेकिन संजय ने इसी पर दांव लगाया। आगे चलकर पेनड्राइव, एसडी कार्ड और मोबाइल मेमोरी को दुनिया भर तक पहुंचाने में सैनडिस्क की बड़ी भूमिका रही। 90 के दशक में जब सैनडिस्क एक स्टार्टअप था, तब कोडेक ने उनकी डिजिटल मेमोरी तकनीक को सिर्फ अपने लिए बनाने का ऑफर दिया और इसके बदले बड़ी रकम देने की बात कही, लेकिन संजय और उनके साथी एली हरारी ने इसे ठुकरा दिया। उन्होंने तकनीक को खुले मानक के रूप में रखने का फैसला किया। इसी सोच से कॉम्पैक्ट फ्लैश और आगे एसडी कार्ड बने, जो आज हर डिवाइस में इस्तेमाल होते हैं। उसी दौरान जब वैश्विक मंदी आई तो कंपनी पर दबाव बढ़ गया, लेकिन संजय ने कर्मचारियों की छंटनी के बजाय अलग रास्ता चुना। उन्होंने अपनी बेसिक सैलरी शून्य कर दी और बड़े अधिकारियों की सैलरी भी घटाई। उनका मानना था कि मुश्किल समय में सबसे पहले त्याग नेतृत्व को करना चाहिए। इस फैसले ने उन्हें कर्मचारियों के बीच खास भरोसा दिलाया। पद से ज्यादा तकनीक पसंद थी इसलिए नौकरी तक छोड़ दी 80 के दशक में संजय आईडीटी में थे। कंपनी उन्हें बेहतर पद देने को तैयार थी, लेकिन जिस नॉन-वोलेटाइल मेमोरी प्रोजेक्ट पर वे काम कर रहे थे, उसे बंद कर दिया गया। तब पसंदीदा तकनीक के चलते उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बाद में कहा, ‘मुझे मेमोरी का जुनून था।’ यही जिद सैनडिस्क की नींव बनी। 2017 में वे माइक्रॉन से जुड़े, जो अब गुजरात के साणंद में 26 हजार करोड़ रुपए की चिप फैसिलिटी बना रही है, जिसमें कंपनी की हिस्सेदारी 7838 करोड़ रुपए है।
5 जून को रिलीज होगी करिश्मा कपूर स्टारर सीरीज:‘ब्राउन’ में दिखेगा कोलकाता का अनदेखा चेहरा; डायरेक्टर अभिनय देव से खास बातचीत

बॉलीवुड अभिनेत्री करिश्मा कपूर जल्द ही जी 5 की वेब सीरीज ‘ब्राउन’ में नजर आने वाली हैं। अभिनय देव के निर्देशन में बनी यह सीरीज 5 जून को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर स्ट्रीम होगी। इस नियो-नोयर क्राइम थ्रिलर सीरीज में करिश्मा के साथ जिस्सू सेनगुप्ता, सूर्या शर्मा, सोनी राजदान और अनुभवी अभिनेत्री हेलेन शामिल हैं। वहीं परेश पाहुजा, मेघना मलिक, अजिंक्य देव, के.के. रैना और गायक शान भी विशेष भूमिकाओं में नजर आएंगे। इस सीरीज और इसकी शूटिंग के अनुभव को लेकर अभिनय देव ने दैनिक भास्कर से बातचीत की। अपराध से ज्यादा किरदारों की कहानी बताएगी यह सीरीज इस कहानी की सबसे अच्छी बात को लेकर अभिनय ने कहा कि जब मैंने इस पर बेस्ड किताब पढ़ी थी, तब मुझे यह बात बहुत पसंद आई कि यह एक क्राइम स्टोरी की तरह लिखी गई है, लेकिन इसके सभी किरदार बेहद बेहतरीन हैं। किताब में इन पात्रों को बहुत गहराई से लिखा गया है और हमने सीरीज में भी उन्हें उसी संवेदनशीलता के साथ दिखाने की कोशिश की है। ये ऐसे किरदार हैं, जो हमें रोजमर्रा की जिंदगी में तो दिखाई देते हैं, लेकिन फिल्मों में कम नजर आते हैं। कोलकाता की अनदेखी गलियों में हुई इस वेब सीरीज की शूटिंग अभिनय ने बताया कि पूरी सीरीज की शूटिंग वास्तविक लोकेशनों पर की गई है और इसके लिए एक भी सेट नहीं बनाया गया। हमने पूरी शूटिंग कोलकाता में की, लेकिन जानबूझकर शहर के उन हिस्सों को चुना जो आमतौर पर फिल्मों में दिखाई नहीं देते। इसमें आपको कोलकाता का ऐसा चेहरा देखने को मिलेगा, जिसे शायद पहले किसी फिल्म या सीरीज में नहीं दिखाया गया है। कई लोकेशन इतनी रहस्यमयी और भयावह थीं कि अगर किसी को वहां आधे घंटे खड़े रहने के लिए भी कहा जाए, तो वह सहज महसूस नहीं करेगा। सस्पेंस और ड्रामा का संतुलन सबसे बड़ी चुनौती रही क्राइम थ्रिलर बनाते समय सबसे महत्वपूर्ण बात क्या होती है, इस पर अभिनय ने कहा कि ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट में सस्पेंस और ड्रामा दोनों को साथ लेकर चलना पड़ता है। एक निर्देशक की पकड़ इन दोनों पहलुओं पर समान रूप से मजबूत होनी चाहिए, क्योंकि दर्शकों को कहानी से जोड़े रखने के लिए रहस्य और भावनात्मक जुड़ाव, दोनों जरूरी हैं। उनके मुताबिक, अगर कोई निर्देशक इन दोनों तत्वों को बराबर महत्व देने की कोशिश करता है, तो वह अपने लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर लेता है, क्योंकि दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता।
5 जून को रिलीज होगी करिश्मा कपूर स्टारर सीरीज:‘ब्राउन’ में दिखेगा कोलकाता का अनदेखा चेहरा; डायरेक्टर अभिनय देव से खास बातचीत

बॉलीवुड अभिनेत्री करिश्मा कपूर जल्द ही जी 5 की वेब सीरीज ‘ब्राउन’ में नजर आने वाली हैं। अभिनय देव के निर्देशन में बनी यह सीरीज 5 जून को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर स्ट्रीम होगी। इस नियो-नोयर क्राइम थ्रिलर सीरीज में करिश्मा के साथ जिस्सू सेनगुप्ता, सूर्या शर्मा, सोनी राजदान और अनुभवी अभिनेत्री हेलेन शामिल हैं। वहीं परेश पाहुजा, मेघना मलिक, अजिंक्य देव, के.के. रैना और गायक शान भी विशेष भूमिकाओं में नजर आएंगे। इस सीरीज और इसकी शूटिंग के अनुभव को लेकर अभिनय देव ने दैनिक भास्कर से बातचीत की। अपराध से ज्यादा किरदारों की कहानी बताएगी यह सीरीज इस कहानी की सबसे अच्छी बात को लेकर अभिनय ने कहा कि जब मैंने इस पर बेस्ड किताब पढ़ी थी, तब मुझे यह बात बहुत पसंद आई कि यह एक क्राइम स्टोरी की तरह लिखी गई है, लेकिन इसके सभी किरदार बेहद बेहतरीन हैं। किताब में इन पात्रों को बहुत गहराई से लिखा गया है और हमने सीरीज में भी उन्हें उसी संवेदनशीलता के साथ दिखाने की कोशिश की है। ये ऐसे किरदार हैं, जो हमें रोजमर्रा की जिंदगी में तो दिखाई देते हैं, लेकिन फिल्मों में कम नजर आते हैं। कोलकाता की अनदेखी गलियों में हुई इस वेब सीरीज की शूटिंग अभिनय ने बताया कि पूरी सीरीज की शूटिंग वास्तविक लोकेशनों पर की गई है और इसके लिए एक भी सेट नहीं बनाया गया। हमने पूरी शूटिंग कोलकाता में की, लेकिन जानबूझकर शहर के उन हिस्सों को चुना जो आमतौर पर फिल्मों में दिखाई नहीं देते। इसमें आपको कोलकाता का ऐसा चेहरा देखने को मिलेगा, जिसे शायद पहले किसी फिल्म या सीरीज में नहीं दिखाया गया है। कई लोकेशन इतनी रहस्यमयी और भयावह थीं कि अगर किसी को वहां आधे घंटे खड़े रहने के लिए भी कहा जाए, तो वह सहज महसूस नहीं करेगा। सस्पेंस और ड्रामा का संतुलन सबसे बड़ी चुनौती रही क्राइम थ्रिलर बनाते समय सबसे महत्वपूर्ण बात क्या होती है, इस पर अभिनय ने कहा कि ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट में सस्पेंस और ड्रामा दोनों को साथ लेकर चलना पड़ता है। एक निर्देशक की पकड़ इन दोनों पहलुओं पर समान रूप से मजबूत होनी चाहिए, क्योंकि दर्शकों को कहानी से जोड़े रखने के लिए रहस्य और भावनात्मक जुड़ाव, दोनों जरूरी हैं। उनके मुताबिक, अगर कोई निर्देशक इन दोनों तत्वों को बराबर महत्व देने की कोशिश करता है, तो वह अपने लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर लेता है, क्योंकि दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता।
महबूब खान ने बदला नाम और फातिमा बन गईं नरगिस:नरगिस की 97वीं जयंती पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े रोमांचक किस्से

‘आवारा’, ‘श्री 420’ और ‘मदर इंडिया’ जैसी कल्ट फिल्मो की अभिनेत्री नरगिस दत्त सिर्फ एक स्टार नहीं, हिंदी सिनेमा की एक विरासत थीं। अपने करियर में 50 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाली नरगिस की 97वीं जयंती पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ रोमांचक किस्से। नरगिस का जन्म ऐसे परिवार में हुआ, जहां कला और संगीत विरासत का हिस्सा थे। उनकी मां जद्दन बाई अपने दौर की मशहूर गायिका, संगीतकार, फिल्म निर्माता और अभिनेत्री थीं। बचपन में नरगिस का नाम फातिमा तेजेश्वरी रखा गया था, लेकिन फिल्मकार महबूब खान ने उन्हें नया नाम दिया- नरगिस। उनका मानना था कि ‘न’ अक्षर से शुरू होने वाले नाम भाग्यशाली होते हैं। महज 14 वर्ष की उम्र में नरगिस को महबूब खान की फिल्म ‘तकदीर’ मिली। स्क्रीन टेस्ट के दौरान ही उनकी प्रतिभा ने सभी को प्रभावित कर दिया और वे रातोंरात फिल्मी दुनिया की नई खोज बन गईं। हालांकि उनकी औपचारिक शिक्षा सीमित रही, लेकिन वे हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, गुजराती और मराठी भाषाएं जानती थीं। इतना ही नहीं, वे अच्छी सितार वादक भी थीं और उन्होंने उस्ताद विलायत खान से सितार सीखा था। फिल्मों में आने से पहले वे ‘बेबी रानी’ के नाम से जानी जाती थीं। राजकपूर के साथ एक अधूरी प्रेमकथा नरगिस और राज कपूर की कहानी हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित प्रेम कहानियों में शामिल है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों की पहली मुलाकात तब हुई थी, जब वे बच्चे थे। वर्षों बाद जब राज अपनी पहली फिल्म ‘आग’ के लिए नायिका की तलाश कर रहे थे, तो उनकी पसंद नरगिस पर जाकर रुकी। ‘आग’ के साथ शुरू हुई यह साझेदारी जल्द ही निजी रिश्ते में बदल गई। 1948 से 1956 के बीच दोनों ने लगभग 16 फिल्मों में साथ काम किया और उनकी जोड़ी दर्शकों की पसंदीदा बन गई। ‘बरसात’, ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ जैसी फिल्मों ने उन्हें पर्दे का सबसे लोकप्रिय रोमांटिक जोड़ा बना दिया। करीबी मित्र और अभिनेत्री निम्मी के अनुसार…‘दोनों एक-दूसरे को प्यार से ‘बेब्स’ और ‘बेबी’ कहकर बुलाते थे। लेकिन इस रिश्ते की सबसे बड़ी बाधा यह थी कि राज पहले से शादीशुदा थे।‘ ‘मदर इंडिया’ ने बदली नरगिस की जिंदगी 1957 में आई ‘मदर इंडिया’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि भारतीय सिनेमा का मील का पत्थर साबित हुई। इसी फिल्म ने नरगिस को अभिनय के उस शिखर पर पहुंचाया, जहां बहुत कम कलाकार पहुंच पाते हैं। लेकिन शूटिंग के दौरान घटी एक घटना ने उनकी निजी जिंदगी भी बदल दी। शूटिंग के दौरान सेट पर लगी आग में नरगिस फंस गईं। उस समय सुनील दत्त ने अपनी जान जोखिम में डालकर उन्हें बाहर निकाला। इस हादसे में दोनों घायल हुए, लेकिन यहीं से उनके बीच भावनात्मक नजदीकियां बढ़ीं। धीरे-धीरे यह रिश्ता प्रेम में बदल गया और 1958 में दोनों ने विवाह कर लिया। उन दिनों उनके रिश्ते को लेकर कई तरह की चर्चाएं और अफवाहें भी उड़ीं, लेकिन सुनील दत्त हर परिस्थिति में नरगिस के साथ खड़े रहे। विवाह के बाद नरगिस ने फिल्मों से लगभग दूरी बना ली और पूरी तरह परिवार को समय देना शुरू कर दिया। सुनील दत्त उन्हें प्यार से मनरो कहकर बुलाते थे, जबकि नरगिस ने उन्हें फ्रैंसली नाम दिया था।







