महबूब खान ने बदला नाम और फातिमा बन गईं नरगिस:नरगिस की 97वीं जयंती पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े रोमांचक किस्से

‘आवारा’, ‘श्री 420’ और ‘मदर इंडिया’ जैसी कल्ट फिल्मो की अभिनेत्री नरगिस दत्त सिर्फ एक स्टार नहीं, हिंदी सिनेमा की एक विरासत थीं। अपने करियर में 50 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाली नरगिस की 97वीं जयंती पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ रोमांचक किस्से। नरगिस का जन्म ऐसे परिवार में हुआ, जहां कला और संगीत विरासत का हिस्सा थे। उनकी मां जद्दन बाई अपने दौर की मशहूर गायिका, संगीतकार, फिल्म निर्माता और अभिनेत्री थीं। बचपन में नरगिस का नाम फातिमा तेजेश्वरी रखा गया था, लेकिन फिल्मकार महबूब खान ने उन्हें नया नाम दिया- नरगिस। उनका मानना था कि ‘न’ अक्षर से शुरू होने वाले नाम भाग्यशाली होते हैं। महज 14 वर्ष की उम्र में नरगिस को महबूब खान की फिल्म ‘तकदीर’ मिली। स्क्रीन टेस्ट के दौरान ही उनकी प्रतिभा ने सभी को प्रभावित कर दिया और वे रातोंरात फिल्मी दुनिया की नई खोज बन गईं। हालांकि उनकी औपचारिक शिक्षा सीमित रही, लेकिन वे हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, गुजराती और मराठी भाषाएं जानती थीं। इतना ही नहीं, वे अच्छी सितार वादक भी थीं और उन्होंने उस्ताद विलायत खान से सितार सीखा था। फिल्मों में आने से पहले वे ‘बेबी रानी’ के नाम से जानी जाती थीं। राजकपूर के साथ एक अधूरी प्रेमकथा नरगिस और राज कपूर की कहानी हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित प्रेम कहानियों में शामिल है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों की पहली मुलाकात तब हुई थी, जब वे बच्चे थे। वर्षों बाद जब राज अपनी पहली फिल्म ‘आग’ के लिए नायिका की तलाश कर रहे थे, तो उनकी पसंद नरगिस पर जाकर रुकी। ‘आग’ के साथ शुरू हुई यह साझेदारी जल्द ही निजी रिश्ते में बदल गई। 1948 से 1956 के बीच दोनों ने लगभग 16 फिल्मों में साथ काम किया और उनकी जोड़ी दर्शकों की पसंदीदा बन गई। ‘बरसात’, ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ जैसी फिल्मों ने उन्हें पर्दे का सबसे लोकप्रिय रोमांटिक जोड़ा बना दिया। करीबी मित्र और अभिनेत्री निम्मी के अनुसार…‘दोनों एक-दूसरे को प्यार से ‘बेब्स’ और ‘बेबी’ कहकर बुलाते थे। लेकिन इस रिश्ते की सबसे बड़ी बाधा यह थी कि राज पहले से शादीशुदा थे।‘ ‘मदर इंडिया’ ने बदली नरगिस की जिंदगी 1957 में आई ‘मदर इंडिया’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि भारतीय सिनेमा का मील का पत्थर साबित हुई। इसी फिल्म ने नरगिस को अभिनय के उस शिखर पर पहुंचाया, जहां बहुत कम कलाकार पहुंच पाते हैं। लेकिन शूटिंग के दौरान घटी एक घटना ने उनकी निजी जिंदगी भी बदल दी। शूटिंग के दौरान सेट पर लगी आग में नरगिस फंस गईं। उस समय सुनील दत्त ने अपनी जान जोखिम में डालकर उन्हें बाहर निकाला। इस हादसे में दोनों घायल हुए, लेकिन यहीं से उनके बीच भावनात्मक नजदीकियां बढ़ीं। धीरे-धीरे यह रिश्ता प्रेम में बदल गया और 1958 में दोनों ने विवाह कर लिया। उन दिनों उनके रिश्ते को लेकर कई तरह की चर्चाएं और अफवाहें भी उड़ीं, लेकिन सुनील दत्त हर परिस्थिति में नरगिस के साथ खड़े रहे। विवाह के बाद नरगिस ने फिल्मों से लगभग दूरी बना ली और पूरी तरह परिवार को समय देना शुरू कर दिया। सुनील दत्त उन्हें प्यार से मनरो कहकर बुलाते थे, जबकि नरगिस ने उन्हें फ्रैंसली नाम दिया था।
From hardship to captaincy; once had no money to buy a bat, today he is leading the team

Hindi News Sports From Hardship To Captaincy; Once Had No Money To Buy A Bat, Today He Is Leading The Team नई दिल्ली19 मिनट पहले कॉपी लिंक तिलक वर्मा, भारतीय क्रिकेटर।- फाइल फोटो बाएं हाथ के विस्फोटक बल्लेबाज तिलक वर्मा आज भले ही प्रशंसकों के दिल में जगह बना चुके हों, लेकिन उनका करिअर गंभीर चुनौतियों से भरा रहा है। फिलहाल वे त्रिकोणीय सीरीज के लिए भारत-ए टीम के कप्तान बनाए गए हैं। जानते हैं उनकी संघर्ष से सफलता की कहानी. हैदराबाद में 8 नवंबर 2002 को जन्मे तिलक वर्मा का बचपन गहरी आर्थिक तंगी में बीता। उनके पिता नंबूरी नागराजू तब एक मामूली इलेक्ट्रिशियन थे, जो छोटे-मोटे रिपेयरिंग वर्क करके परिवार का पेट पालते थे। माता-पिता के साथ तिलक और उनके बड़े भाई तरुण एक छोटे-से किराए के मकान में रहते थे। पिता की इच्छा थी कि तिलक बड़े होकर डॉक्टर बनें, लेकिन बचपन से ही तिलक का मन क्रिकेट में रम गया। संघर्ष – बैट खरीदने के पैसे नहीं थे, रोजाना 40 किमी का सफर कर जाते थे एकेडमी एक वक्त ऐसा था जब तिलक के पास बैट और अन्य गियर खरीदने के पैसे भी नहीं थे। तिलक की बैटिंग स्टाइल से प्रभावित होकर स्थानीय कोच सलाम बायश ने उन्हें कोचिंग का सुझाव दिया, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते परिवार ने मना कर दिया। बायश ने उन्हें न सिर्फ मुफ्त कोचिंग दी, बल्कि उनके किट और अन्य उपकरणों का खर्च भी उठाया। तिलक को रोजाना 40 किमी का सफर कर एकेडमी जाना पड़ता था। एक साक्षात्कार में तिलक ने बताया कि 2022 में उन्हें रैबडोमायोलिसिस नामक दुर्लभ बीमारी हो गई थी, जिसमें अत्यधिक दबाव के कारण मांसपेशियां टूटने लगती हैं। मुम्बई इंडियन के मैनेजमेंट ने उनका इलाज कराया। फिर 2026 में ही विजय हजारे ट्रॉफी खेलते हुए उन्हें टेस्टिकल टॉर्शन की समस्या हो गई, जिसकी बाद में सर्जरी करानी पड़ी। शुरुआत- पहले जूनियर टीम में रिजेक्ट हुए, फिर विश्वकप टीम में बनाई अपनी जगह महज 12 साल की उम्र में तिलक ने हैदराबाद की अंडर-14 टीम से क्रिकेट कॅरिअर की शुरुआत की। हालांकि इसके चयन में भी उन्हें शुरुआती रिजेक्शन झेलने पड़े थे। 2018 में उन्होंने हैदराबाद के लिए रणजी ट्राफी डेब्यू किया। फिर 2020 में उन्हें साउथ अफ्रीका में हुए अंडर-19 विश्व कप की भारतीय टीम में चुना गया। हालांकि वे 3 पारियों में 86 रन ही बना पाए सफलता – एमआई ने 1.70 करोड़ में खरीदा, पाकिस्तान के खिलाफ पारी से चमके 2022 तिलक का टर्निंग पॉइंट था, जब मुम्बई इंडियन ने उन्हें 1.70 करोड़ रुपए में खरीदा। 2023 में वे सीनियर भारतीय टीम में चुने गए और इसी साल उन्होंने टी20 और वनडे फॉर्मेट में डेब्यू किया। 2025 के एशिया कप फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ 69 रनों की मैच विनिंग पारी ने उन्हें क्रिकेट जगत में प्रसिद्ध कर दिया। अब तिलक अपनी पुरानी एकेडमी में गरीब बच्चों की आर्थिक मदद भी करते हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
एआई का खौफ, फ्रेंचाइजी बिजनेस की वापसी:लैपटॉप वाली नौकरी छोड़ ‘खुद का बॉस’ बनने की होड़; अमेरिकी मॉडल में भारतीयों का दबदबा

एआई के बढ़ते खतरे और महंगी पढ़ाई के बीच कॉरपोरेट नौकरियों के मुकाबले फ्रेंचाइजी बिजनेस का क्रेज बढ़ रहा है। अब लोग लैपटॉप वाली वाइट-कॉलर नौकरियों के बजाय पिलेट्स (खास तरह का व्यायाम) सिखाने और खाना पकाने जैसे व्यावहारिक बिजनेस को सुरक्षित मान रहे हैं। अमेरिका के 8.5 लाख फ्रेंचाइजी आउटलेट्स को 2.5 लाख मालिक संभाल रहे हैं। ये 90 लाख रोजगार देते हैं। अमेरिकी जीडीपी में 3% योगदान कर रहे हैं। आईएफए के मैट हॉलर का कहना है कि एक दशक पहले तक, अमीर बनने का रास्ता कॉलेज की डिग्री और लैपटॉप वाली वाइट-कॉलर नौकरी माना जाता था। लेकिन अब महंगी पढ़ाई और एआई के आने से युवाओं का ध्यान पारंपरिक और जमीनी व्यवसायों की तरफ गया है। पायलट क्लास सिखाना या खाना पकाना जैसे बिजनेस अब ज्यादा सुरक्षित लगते हैं, क्योंकि इन्हें इंसानों के बिना नहीं चलाया जा सकता। जो इंसानों के बिना नहीं चल सकते, उन बिजनेस की मांग अमेरिका में डंकिन डोनट्स से लेकर यूपीएस स्टोर और अधिकांश मैरियट होटल इसी मॉडल पर चलते हैं। अब यह मॉडल फिटनेस स्टूडियो, घरेलू सेवाओं और चाइल्ड केयर जैसे नए क्षेत्रों में भी फैल रहा है। ये मॉडल लंबे समय से प्रवासियों को आकर्षित करता आया है। अमेरिका के कुल मोटल्स में से दो-तिहाई के मालिक भारतीय मूल के हैं। अधिकांश उन गुजरातियों के वंशज हैं, जिन्होंने 1980 के दशक में सुपर 8 और ट्रैवलॉज की फ्रेंचाइजी खरीदी थी। सफलता – मैकडॉनल्ड्स से बने ज्यादा करोड़पति मैकडॉनल्ड्स के अमेरिका में स्थित लगभग 14,000 आउटलेट्स में से करीब 95% को स्वतंत्र फ्रेंचाइजी मालिक चलाते हैं। इस चेन ने इतिहास में किसी भी अन्य कंपनी के मुकाबले सबसे ज्यादा आम लोगों को करोड़पति बनाया है। लागत – अमेरिका में 3 से 9.5 करोड़ रुपए तक खर्च एक फिटनेस स्टूडियो शुरू करने में 3-8 करोड़ रुपए का खर्च होते हैं। वहीं, रेस्टोरेंट फ्रेंचाइजी में 9.5 करोड़ का निवेश करना पड़ सकता है। सफलता की दर स्वतंत्र बिजनेस की तुलना में पहले 1-2 साल बेहतर होती है, लेकिन बाद में जोखिम बराबर ही रहता है। भारत – फ्रेंचाइजी बाजार सालाना 30% की गति से बढ़ रहा भारतीय रिटेल और कंज्यूमर मार्केट में फ्रेंचाइजी मॉडल अब सबसे सुरक्षित और तेजी से बढ़ने वाला बिजनेस बन चुका है। अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा फ्रेंचाइजी बाजार है। फ्रैंकोर्प इंडिया और फैनकास्ट की संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का फ्रेंचाइजी बाजार सालाना 30% बढ़ रहा है। अभी यह करीब 95 हजार करोड़ रुपए का है। अगले 5 वर्षों में इसके 14.25 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। इसके लिए हर साल 72% कम्पाउंडेड ग्रोथ की जरूरत होगी। नेटवर्क – देश में 5 हजार से अधिक एक्टिव ब्रांड्स भारत में 5,000 से अधिक सक्रिय फ्रेंचाइजर ब्रांड हैं। आउटलेट्स 2 लाख से ज्यादा हैं। 5 साल बाद लक्ष्य पूरा होने पर जीडीपी में यह सेक्टर 4.2% का बड़ा योगदान देगा। अभी यह योगदान 2-2.2% है। विस्तार – छोटे शहरों में बढ़ रहे फ्रेंचाइजी आउटलेट्स महानगरों के मुकाबले टियर-2, 3 शहरों में फ्रेंचाइजी आउटलेट्स तेजी से बढ़ रहे हैं। नए उद्यमी बैंक लोन और जमा पूंजी का इस्तेमाल करके फ्रेंचाइजी मॉडल में निवेश कर रहे हैं। फूड, प्री-स्कूल कोचिंग, डायग्नोस्टिक लैब्स और ब्यूटी-वेलनेस डिमांड में हैं। लागत – भारत में न्यूनतम 5 लाख निवेश की जरूरत देश में छोटे स्तर के कियोस्क या सेंटर के लिए 5-15 लाख की जरूरत होती है। इंटरनेशनल ब्रांड्स के लिए 1 करोड़ तक की जरूरत होती है। स्वतंत्र स्टार्टअप्स के मुकाबले भारत में फ्रेंचाइजी बिजनेस टिके रहने की दर 85% ज्यादा है। तैयार सिस्टम और स्थापित ब्रांड वैल्यू के कारण रिस्क काफी कम हो जाता है।
एआई का खौफ, फ्रेंचाइजी बिजनेस की वापसी:लैपटॉप वाली नौकरी छोड़ ‘खुद का बॉस’ बनने की होड़; अमेरिकी मॉडल में भारतीयों का दबदबा

एआई के बढ़ते खतरे और महंगी पढ़ाई के बीच कॉरपोरेट नौकरियों के मुकाबले फ्रेंचाइजी बिजनेस का क्रेज बढ़ रहा है। अब लोग लैपटॉप वाली वाइट-कॉलर नौकरियों के बजाय पिलेट्स (खास तरह का व्यायाम) सिखाने और खाना पकाने जैसे व्यावहारिक बिजनेस को सुरक्षित मान रहे हैं। अमेरिका के 8.5 लाख फ्रेंचाइजी आउटलेट्स को 2.5 लाख मालिक संभाल रहे हैं। ये 90 लाख रोजगार देते हैं। अमेरिकी जीडीपी में 3% योगदान कर रहे हैं। आईएफए के मैट हॉलर का कहना है कि एक दशक पहले तक, अमीर बनने का रास्ता कॉलेज की डिग्री और लैपटॉप वाली वाइट-कॉलर नौकरी माना जाता था। लेकिन अब महंगी पढ़ाई और एआई के आने से युवाओं का ध्यान पारंपरिक और जमीनी व्यवसायों की तरफ गया है। पायलट क्लास सिखाना या खाना पकाना जैसे बिजनेस अब ज्यादा सुरक्षित लगते हैं, क्योंकि इन्हें इंसानों के बिना नहीं चलाया जा सकता। जो इंसानों के बिना नहीं चल सकते, उन बिजनेस की मांग अमेरिका में डंकिन डोनट्स से लेकर यूपीएस स्टोर और अधिकांश मैरियट होटल इसी मॉडल पर चलते हैं। अब यह मॉडल फिटनेस स्टूडियो, घरेलू सेवाओं और चाइल्ड केयर जैसे नए क्षेत्रों में भी फैल रहा है। ये मॉडल लंबे समय से प्रवासियों को आकर्षित करता आया है। अमेरिका के कुल मोटल्स में से दो-तिहाई के मालिक भारतीय मूल के हैं। अधिकांश उन गुजरातियों के वंशज हैं, जिन्होंने 1980 के दशक में सुपर 8 और ट्रैवलॉज की फ्रेंचाइजी खरीदी थी। सफलता – मैकडॉनल्ड्स से बने ज्यादा करोड़पति मैकडॉनल्ड्स के अमेरिका में स्थित लगभग 14,000 आउटलेट्स में से करीब 95% को स्वतंत्र फ्रेंचाइजी मालिक चलाते हैं। इस चेन ने इतिहास में किसी भी अन्य कंपनी के मुकाबले सबसे ज्यादा आम लोगों को करोड़पति बनाया है। लागत – अमेरिका में 3 से 9.5 करोड़ रुपए तक खर्च एक फिटनेस स्टूडियो शुरू करने में 3-8 करोड़ रुपए का खर्च होते हैं। वहीं, रेस्टोरेंट फ्रेंचाइजी में 9.5 करोड़ का निवेश करना पड़ सकता है। सफलता की दर स्वतंत्र बिजनेस की तुलना में पहले 1-2 साल बेहतर होती है, लेकिन बाद में जोखिम बराबर ही रहता है। भारत – फ्रेंचाइजी बाजार सालाना 30% की गति से बढ़ रहा भारतीय रिटेल और कंज्यूमर मार्केट में फ्रेंचाइजी मॉडल अब सबसे सुरक्षित और तेजी से बढ़ने वाला बिजनेस बन चुका है। अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा फ्रेंचाइजी बाजार है। फ्रैंकोर्प इंडिया और फैनकास्ट की संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का फ्रेंचाइजी बाजार सालाना 30% बढ़ रहा है। अभी यह करीब 95 हजार करोड़ रुपए का है। अगले 5 वर्षों में इसके 14.25 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है। इसके लिए हर साल 72% कम्पाउंडेड ग्रोथ की जरूरत होगी। नेटवर्क – देश में 5 हजार से अधिक एक्टिव ब्रांड्स भारत में 5,000 से अधिक सक्रिय फ्रेंचाइजर ब्रांड हैं। आउटलेट्स 2 लाख से ज्यादा हैं। 5 साल बाद लक्ष्य पूरा होने पर जीडीपी में यह सेक्टर 4.2% का बड़ा योगदान देगा। अभी यह योगदान 2-2.2% है। विस्तार – छोटे शहरों में बढ़ रहे फ्रेंचाइजी आउटलेट्स महानगरों के मुकाबले टियर-2, 3 शहरों में फ्रेंचाइजी आउटलेट्स तेजी से बढ़ रहे हैं। नए उद्यमी बैंक लोन और जमा पूंजी का इस्तेमाल करके फ्रेंचाइजी मॉडल में निवेश कर रहे हैं। फूड, प्री-स्कूल कोचिंग, डायग्नोस्टिक लैब्स और ब्यूटी-वेलनेस डिमांड में हैं। लागत – भारत में न्यूनतम 5 लाख निवेश की जरूरत देश में छोटे स्तर के कियोस्क या सेंटर के लिए 5-15 लाख की जरूरत होती है। इंटरनेशनल ब्रांड्स के लिए 1 करोड़ तक की जरूरत होती है। स्वतंत्र स्टार्टअप्स के मुकाबले भारत में फ्रेंचाइजी बिजनेस टिके रहने की दर 85% ज्यादा है। तैयार सिस्टम और स्थापित ब्रांड वैल्यू के कारण रिस्क काफी कम हो जाता है।
39 वर्षीय नडाल ने चोटों को लेकर किए खुलासे:कहा- दर्द से ज्यादा बड़ा था टेनिस के लिए जुनून, इंजेक्शन लगाकर जीता था 22वां ग्रैंडस्लैम

साल 2024 में पेरिस की लाल मिट्टी पर जब राफेल नडाल आखिरी बार उतरे, तब दुनिया उन्हें सिर्फ एक महान टेनिस खिलाड़ी के रूप में नहीं देख रही थी। लोग उस इंसान को देख रहे थे, जिसने दो दशक तक दर्द के साथ जीते हुए खेल को अपना सब कुछ दिया। नेटफ्लिक्स की एक नई सीरीज में, 39 वर्षीय स्पेनिश स्टार नडाल ने इस बात का खुलासा किया है कि महानता हासिल करने के लिए उन्होंने अपनी सेहत के साथ कितने जोखिम उठाए। साल 2005 में 19 वर्षीय नडाल ने पहली बार फ्रेंच ओपन खेला और पहले ही प्रयास में खिताब जीत लिया। लंबे बाल, जबरदस्त ताकत और कभी हार न मानने वाले जज्बे ने दुनिया को अपना दीवाना बना लिया, लेकिन उसी साल एक ऐसी समस्या सामने आई, जिसने उनके पूरे करियर में पीछा नहीं छोड़ा। मैड्रिड ओपन के दौरान उनके बाएं पैर में गंभीर चोट लगी। पता चला कि उन्हें म्यूलर-वाईस सिंड्रोम नाम की दुर्लभ बीमारी है। इसमें पैर की हड्डियों में असहनीय दर्द होता है। डॉक्टरों को डर था कि शायद वे दोबारा टेनिस नहीं खेल पाएंगे, लेकिन नडाल ने हार नहीं मानी। विशेष इनसोल (जूते के अंदर का पैड) की मदद से उन्होंने कोर्ट पर वापसी की। हालांकि इसके बाद उन्हें लगभग हर मैच दर्द के साथ खेलना पड़ा। नडाल को हमेशा लगता था कि शायद यह उनका आखिरी सीजन हो। यही सोच उन्हें रुकने नहीं देती थी। वह दर्द सहते रहे, क्योंकि उनके लिए खेल के प्रति जुनून हर तकलीफ से बड़ा था। पैर की समस्या का असर धीरे-धीरे शरीर के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ने लगा। घुटनों में गंभीर चोटें हुईं। दर्द कम करने के लिए उन्हें लगातार दवाइयों का सहारा लेना पड़ता था। ज्यादा पेनकिलर दवाओं के कारण उनकी आंतों में भी परेशानी पैदा हो गई, लेकिन नडाल का सफर यहीं नहीं रुका। फ्रेंच ओपन 2022 में उनके पैर का दर्द इतना बढ़ चुका था कि डॉक्टरों ने नस को सुन्न करने वाले इंजेक्शन लगाए। हालत यह थी कि उन्हें अपने पैर का एहसास तक नहीं हो रहा था। फिर भी उन्होंने रोलां गैरो का 14वां और अपने करियर का आखिरी फ्रेंच ओपन खिताब जीत लिया। नडाल की यह जिद बचपन से ही उनके स्वभाव का हिस्सा थी। उनके कोच और चाचा टोनी नडाल उन्हें मुश्किल परिस्थितियों में अभ्यास कराते थे। बचपन में टूटी अंगुली के साथ भी उन्होंने एक टूर्नामेंट जीता था। हालांकि लगातार दबाव और तनाव का असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ा। एक समय उन्हें मनोचिकित्सक की मदद लेनी पड़ी। बाद में उन्होंने अपने खेल और सोच में बदलाव किया। 2016 में कार्लोस मोया को कोचिंग टीम में शामिल किया और जीवन को थोड़ा खुलकर जीना सीखा। 2017 से 2024 के बीच उन्होंने आठ और ग्रैंड स्लैम जीते। कुल 22 ग्रैंड स्लैम खिताबों के साथ उन्होंने करियर को अलविदा कहा। नडाल मानते हैं कि अगर उन्होंने दर्द और जोखिम के साथ जीने का फैसला नहीं किया होता, तो शायद उनके नाम 10-12 ग्रैंड स्लैम कम होते।
केनेथ लॉ को कोर्ट ने 14 आरोपों में दोषी ठहराया:आत्महत्या के लिए लोगों को उकसाता था, 41 देशों में 1200 जहरीले पैकेट भेजे

कनाडा में कोर्ट ने एक ऐसे अपराधी को कोर्ट ने सजा सुनाई है, जो दुनिया के कई देशों में लोगों को आत्महत्या के लिए उकसाता था। उसका नाम है केनेथ लॉ। उम्र- 60 साल। लॉ ने सैकड़ों लोगों को जहर वाले सुसाइड पैकेट भेजने के मामले में 14 आरोपों में दोष स्वीकार किया है। ये पैकेट कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका, इटली, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड समेत 41 देशों में भेजे गए थे। जांचकर्ताओं के मुताबिक उसने कम से कम ऐसे 1,209 पैकेट भेजे। ओंटारियो में न्यूमार्केट की कोर्ट में लॉ के खिलाफ आत्महत्या में मदद से जुड़े कई आरोपों में सजा सितंबर में तय होने की उम्मीद है। कोर्ट में 16 से 36 साल के 14 पीड़ितों की मौत में अपनी भूमिका की पुष्टि के दौरान परिजन भावुक हो गए। लॉ ने यह भी माना कि ब्रिटेन में 79 मौतों में इस्तेमाल हुए घातक पदार्थ उसने भेजे थे। लॉ पहले इंजीनियर था। टोरंटो के एक होटल में कुक भी रह चुका है। उसने कई वेबसाइट के जरिए आत्महत्या के तरीके खोज रहे लोगों को घातक केमिकल बेचे। पहचान से बचने के लिए वह हॉट सॉस जैसे दूसरे प्रोडक्ट भी लिस्ट करता था। इससे वह खुद को फूड-प्रेप होलसेलर दिखाता था। सिल्वर पैकेट पर चेतावनी रहती थी कि इस्तेमाल की जिम्मेदारी यूजर की है। वह सुसाइड में मदद के लिए रसायन आदि के साथ इस्तेमाल के विस्तृत निर्देश भी देता था। गिरफ्तारी के समय लॉ के शॉफिाई और पेपाल के अकाउंट में ₹2.05 करोड़ रु. जमा थे। इस मामले से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सुसाइड-प्रमोशन फोरम की निगरानी पर भी सवाल उठ रहे हैं। लॉ ने जस्टिस मिशेल फ्यूरस्ट के सामने कहा कि वह अपने अपराधों का दायरा समझता है। उसने स्वेच्छा से दोष स्वीकार किया। कोर्ट में 14 मामलों के आरोप पढ़े गए। हर आरोप पर लॉ ने अपनी भूमिका की पुष्टि की। अभियोजन पक्ष ने 60 पेज से ज्यादा के आरोपपत्र दायर किए। सुनवाई के दौरान पीड़ित परिवारों की मौजूदगी और उनकी प्रतिक्रिया ने केस की गंभीरता को गहराई से सामने ला दिया। पीड़ितों का दर्द: कइयों ने जहर खाने के बाद मदद मांगी कई मामलों में पीड़ितों के माता-पिता ने लॉ पर आरोप लगाए। एक युवक ने ऐसा जहरीला केमिकल खाने के बाद उल्टी करते हुए माता-पिता से मदद मांगी। एक 29 साल के व्यक्ति ने खुद 911 कॉल किया। उसने कहा कि उसने जहरीला पदार्थ लिया है। वह बार-बार बोला, प्लीज, मैं जल्द मर जाऊंगा। फिर रोने लगा। बचाव दल के पहुंचने पर वह बेहोश था। सांस लेने में दिक्कत थी। अस्पताल में मृत घोषित हुआ। ब्रिटेन में एक पीड़ित ने इमरजेंसी को बताया कि उसने खुद को मारने के लिए पदार्थ लिया, पर मरना नहीं चाहता। पैरामेडिक्स 30 मिनट से कम में पहुंचे। उसे बचाया नहीं जा सका। कई जगह पीड़ितों के पास लॉ की कंपनियों के पैकेट मिले।
6 करोड़ की इलेक्ट्रिक फेरारी पर उठे सवाल:शेयर 8% टूटे, सीईओ बोले- यह कीमत नहीं, इनोवेशन की वैल्यू, ग्राहकों को नायाब कार दे रहे

फेरारी की पहली इलेक्ट्रिक कार ‘ल्यूस’ की करीब 6 करोड़ कीमत को लेकर दुनियाभर में बहस छिड़ गई है। लॉन्चिंग के बाद कंपनी के शेयरों में 8% तक गिरावट आई। निवेशकों ने सवाल उठाए और इटली के राजनीतिक गलियारों से लेकर ऑटो इंडस्ट्री तक आलोचना शुरू हो गई। लेकिन फेरारी के सीईओ बेनेडेटो विग्ना इस कीमत को जायज ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक इलेक्ट्रिक कार नहीं, बल्कि नायाब रियल इनोवेशन है। मोडेना में एक राउंड टेबल बैठक में विग्ना ने कहा कि ल्यूस की तुलना बाजार में मौजूद चीनी या अन्य इलेक्ट्रिक कारों से नहीं की जा सकती। इस मॉडल के पीछे जिस स्तर की इंजीनियरिंग, डिजाइन और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हुआ है, वही इसकी ऊंची कीमत की सबसे बड़ी वजह है। विग्ना का दावा है कि इस कार ने ऐसे नए ग्राहकों को आकर्षित किया है, जो अलग तरह की लग्जरी तलाशते हैं। असल में 6 करोड़ रुपए इसकी कीमत नहीं, इनोवेशन की वैल्यू है। चारों पहियों के लिए अलग-अलग मोटर, सिर्फ 2.5 सेकंड में 96 किमी/घंटा स्पीड टेक्नोलॉजी – ल्यूस को खास बनाने वाली 4-मोटर टेक्नोलॉजी है। आम इलेक्ट्रिक कारों में एक या दो मोटर होते हैं। इस सुपरकार में चारों पहियों के लिए अलग-अलग मोटर हैं। फेरारी का कहना है कि यही तकनीक इसे सबसे एडवांस इलेक्ट्रिक सुपरकार बनाती है। रफ्तार – ल्यूस महज 2.5 सेकंड में 0 से 96 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार पकड़ सकती है। इसकी टॉप स्पीड 309 किमी/घंटा है। कंपनी का तर्क है कि इतनी रफ्तार और नियंत्रण हासिल करने के लिए बेहद जटिल तकनीक और भारी निवेश की जरूरत होती है। डिजाइन – इसकी बॉडी इस तरह बनाई गई है कि स्पोर्ट्स कारों में आमतौर पर दिखने वाले एयर वेंट्स, कट्स और एयरोडायनामिक एलिमेंट्स लगभग पूरी तरह छिप जाते हैं। यही खूबी इसे सबसे खास स्पोर्ट्स कार बनाती है, जिसमें काफी निवेश किया गया है। 5-सीटों वाली पहली फेरारी, एपल के डिजाइनर ने तराशा – ल्यूस का फ्यूचरिस्टिक और मिनिमलिस्ट लुक एपल के पूर्व चीफ डिजाइन ऑफिसर जॉनी आइव की डिजाइन एजेंसी ने बनाया है। – फेरारी अब तक मुख्य रूप से 2-सीटर स्पोर्ट्स कारें बनाती रही है, लेकिन ल्यूस कंपनी की पहली 4-दरवाजों वाली 5-सीटर कार है। – स्केटबोर्ड प्लेटफॉर्म के कारण इसमें ज्यादा स्पेस मिलता है। इस कार की तकनीक और लगभग हर हिस्सा इटली के मरानेलो प्लांट में ही बना है। आउटसोर्स नहीं किया गया है।
ऑनलाइन शॉपिंग में प्रोटीन पर खर्च तीन गुना बढ़ा:फास्ट फूड में ‘हाई प्रोटीन’ का चलन, सितारे भी शुरू कर रहे फूड ब्रांड्स

भारत में अब ‘हाई-प्रोटीन’ फूड्स का ट्रेंड सिर्फ फिटनेस की दुनिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि फास्ट फूड्स में भी शामिल होता जा रहा है। दरअसल मार्केट रिसर्च ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में 73% लोगों की डाइट में प्रोटीन की कमी है, इसी वजह से अब ब्रांड्स और सेलेब्रिटीज ‘हाई-प्रोटीन’ डाइट को बढ़ावा दे रहे हैं। कई सेलेब्रिटीज तो प्रोटीन के बिजनेस में एंट्री तक ले चुके हैं। बिजनेस – लोगों का प्रोटीन पर खर्च तीन गुना तक बढ़ा स्विगी इंस्टामार्ट की रिपोर्ट बताती है कि देश में 2023 से 2025 के बीच प्रोटीन ऑर्डर्स में 150% की बढ़ोतरी हुई। लोगों का प्रोटीन पर खर्च 3 गुना तक बढ़ चुका है। रिपोर्ट के अनुसार टियर-2 शहरों में प्रोटीन उत्पादों की वृद्धि मेट्रो शहरों से 200% ज्यादा तेज है। नागपुर, जयपुर, चंडीगढ़ और गुवाहाटी जैसे शहर इस ट्रेंड को आगे बढ़ा रहे हैं। डाइट – नाश्ते में सबसे ज्यादा प्रोटीन पर जोर दे रहे लोग देश में सबसे ज्यादा प्रोटीन उत्पाद सुबह 7 बजे से 11 बजे के बीच ऑर्डर किए जा रहे हैं, यानी अब लोग हाई-प्रोटीन ब्रेकफास्ट ले रहे हैं। इसमें पीनट बटर और ग्रीक योगर्ट सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। वहीं, प्रोटीन स्नैक्स और ग्रीक योगर्ट श्रेणी में लगभग 300% की सालाना वृद्धि दर्ज हुई। इसी तरह सत्तू की मांग भी दोगुनी से ज्यादा बढ़ी है। ब्रांड्स – मैकडॉनल्ड्स ने शुरू की प्रोटीन स्लाइस, अमूल भी ऐसे प्रोडक्ट्स बेच रहा मैकडॉनल्ड्स ने भारत में शाकाहारी प्रोटीन स्लाइस लॉन्च की है, जिसे किसी भी बर्गर में अतिरिक्त रूप से जोड़ा जा सकता है। यह स्लाइस लगभग 5 ग्राम अतिरिक्त प्रोटीन देती है। इसी तरह पेप्सिको की ब्रांड डोरिटोज ने प्रोटीन आधारित चिप्स लॉन्च किए हैं और स्टारबक्स ने प्रोटीन वाले कॉफी लाते शुरू किए हैं। अमूल भी ऐसे प्रोटीन रिच प्रोडक्ट्स बेच रहा है और फूड डिलीवरी एप्स जैसे जोमैटो-स्विगी में ‘प्रोटीन-फूड्स’ का अलग सेक्शन भी है। सेलेब्रिटीज – रणवीर सिंह – ऋतिक रोशन प्रोटीन बिजनेस में उतरे रणवीर सिंह – रणवीर की ब्रांड सुपरयू अब प्रोटीन वेफर्स, चिप्स और प्रोटीन पाउडर बेच रही है। ऋतिक रोशन – इनकी ब्रांड HRX ने कंट्री डिलाइट के साथ मिशन प्रोटीन इंडिया अभियान शुरू किया है। इसमें नए प्रोडक्ट्स शुरू किए हैं। रणदीप हुड्डा – फूड स्टार्टअप टीनप्रो में पार्टनर व निवेशक हैं। यह प्रोटीन बार जैसे प्रोडक्ट्स बेचती है। एमएस धोनी – ‘शाका हैरी’ नाम की कंपनी में निवेश किया है। यह कंपनी प्रोटीन स्नैक्स और मीट का शाकाहारी विकल्प तैयार करती है। एक्सपर्ट ओपिनियन – प्रोटीन फूड खरीदते समय लेबल जरूर पढ़ें भारत में लोग प्रोटीन कम लेते हैं, पर अति भी नुकसानदेह हो सकती है। कुछ लोग ट्रेंड के कारण जरूरत से ज्यादा प्रोटीन सप्लीमेंट्स ले रहे। मात्रा धीरे-धीरे व प्राकृतिक स्रोतों से बढ़ाएं। – कई प्रोटीन बार, चिप्स और पैकेज्ड फूड्स अब भी अत्यधिक प्रोसेस्ड होते हैं। इनमें अतिरिक्त चीनी, नमक, प्रिजर्वेटिव्स और कई कृत्रिम तत्व हो सकते हैं। कंपनियां हेल्दी दिखने वाले लेबल्स के जरिए मार्केटिंग करती हैं, इसलिए सिर्फ पैकेट के दावों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। – चीनी, हाई फ्रक्टोज कॉर्न सिरप और आर्टिफिशियल स्वीटनर्स प्रिजर्वेटिव्स जैसे तत्वों से सावधान रहें। यह भी देखें कि सामग्री सूची में सबसे पहला तत्व वास्तव में प्रोटीन का स्रोत है या नहीं। हाई-प्रोटीन, जीरो फैट या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित जैसे दावों पर सतर्क हों।
ऑनलाइन शॉपिंग में प्रोटीन पर खर्च तीन गुना बढ़ा:फास्ट फूड में ‘हाई प्रोटीन’ का चलन, सितारे भी शुरू कर रहे फूड ब्रांड्स

भारत में अब ‘हाई-प्रोटीन’ फूड्स का ट्रेंड सिर्फ फिटनेस की दुनिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि फास्ट फूड्स में भी शामिल होता जा रहा है। दरअसल मार्केट रिसर्च ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में 73% लोगों की डाइट में प्रोटीन की कमी है, इसी वजह से अब ब्रांड्स और सेलेब्रिटीज ‘हाई-प्रोटीन’ डाइट को बढ़ावा दे रहे हैं। कई सेलेब्रिटीज तो प्रोटीन के बिजनेस में एंट्री तक ले चुके हैं। बिजनेस – लोगों का प्रोटीन पर खर्च तीन गुना तक बढ़ा स्विगी इंस्टामार्ट की रिपोर्ट बताती है कि देश में 2023 से 2025 के बीच प्रोटीन ऑर्डर्स में 150% की बढ़ोतरी हुई। लोगों का प्रोटीन पर खर्च 3 गुना तक बढ़ चुका है। रिपोर्ट के अनुसार टियर-2 शहरों में प्रोटीन उत्पादों की वृद्धि मेट्रो शहरों से 200% ज्यादा तेज है। नागपुर, जयपुर, चंडीगढ़ और गुवाहाटी जैसे शहर इस ट्रेंड को आगे बढ़ा रहे हैं। डाइट – नाश्ते में सबसे ज्यादा प्रोटीन पर जोर दे रहे लोग देश में सबसे ज्यादा प्रोटीन उत्पाद सुबह 7 बजे से 11 बजे के बीच ऑर्डर किए जा रहे हैं, यानी अब लोग हाई-प्रोटीन ब्रेकफास्ट ले रहे हैं। इसमें पीनट बटर और ग्रीक योगर्ट सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। वहीं, प्रोटीन स्नैक्स और ग्रीक योगर्ट श्रेणी में लगभग 300% की सालाना वृद्धि दर्ज हुई। इसी तरह सत्तू की मांग भी दोगुनी से ज्यादा बढ़ी है। ब्रांड्स – मैकडॉनल्ड्स ने शुरू की प्रोटीन स्लाइस, अमूल भी ऐसे प्रोडक्ट्स बेच रहा मैकडॉनल्ड्स ने भारत में शाकाहारी प्रोटीन स्लाइस लॉन्च की है, जिसे किसी भी बर्गर में अतिरिक्त रूप से जोड़ा जा सकता है। यह स्लाइस लगभग 5 ग्राम अतिरिक्त प्रोटीन देती है। इसी तरह पेप्सिको की ब्रांड डोरिटोज ने प्रोटीन आधारित चिप्स लॉन्च किए हैं और स्टारबक्स ने प्रोटीन वाले कॉफी लाते शुरू किए हैं। अमूल भी ऐसे प्रोटीन रिच प्रोडक्ट्स बेच रहा है और फूड डिलीवरी एप्स जैसे जोमैटो-स्विगी में ‘प्रोटीन-फूड्स’ का अलग सेक्शन भी है। सेलेब्रिटीज – रणवीर सिंह – ऋतिक रोशन प्रोटीन बिजनेस में उतरे रणवीर सिंह – रणवीर की ब्रांड सुपरयू अब प्रोटीन वेफर्स, चिप्स और प्रोटीन पाउडर बेच रही है। ऋतिक रोशन – इनकी ब्रांड HRX ने कंट्री डिलाइट के साथ मिशन प्रोटीन इंडिया अभियान शुरू किया है। इसमें नए प्रोडक्ट्स शुरू किए हैं। रणदीप हुड्डा – फूड स्टार्टअप टीनप्रो में पार्टनर व निवेशक हैं। यह प्रोटीन बार जैसे प्रोडक्ट्स बेचती है। एमएस धोनी – ‘शाका हैरी’ नाम की कंपनी में निवेश किया है। यह कंपनी प्रोटीन स्नैक्स और मीट का शाकाहारी विकल्प तैयार करती है। एक्सपर्ट ओपिनियन – प्रोटीन फूड खरीदते समय लेबल जरूर पढ़ें भारत में लोग प्रोटीन कम लेते हैं, पर अति भी नुकसानदेह हो सकती है। कुछ लोग ट्रेंड के कारण जरूरत से ज्यादा प्रोटीन सप्लीमेंट्स ले रहे। मात्रा धीरे-धीरे व प्राकृतिक स्रोतों से बढ़ाएं। – कई प्रोटीन बार, चिप्स और पैकेज्ड फूड्स अब भी अत्यधिक प्रोसेस्ड होते हैं। इनमें अतिरिक्त चीनी, नमक, प्रिजर्वेटिव्स और कई कृत्रिम तत्व हो सकते हैं। कंपनियां हेल्दी दिखने वाले लेबल्स के जरिए मार्केटिंग करती हैं, इसलिए सिर्फ पैकेट के दावों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। – चीनी, हाई फ्रक्टोज कॉर्न सिरप और आर्टिफिशियल स्वीटनर्स प्रिजर्वेटिव्स जैसे तत्वों से सावधान रहें। यह भी देखें कि सामग्री सूची में सबसे पहला तत्व वास्तव में प्रोटीन का स्रोत है या नहीं। हाई-प्रोटीन, जीरो फैट या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित जैसे दावों पर सतर्क हों।
‘Chacha Cricket’ will not be seen holding the Pakistan flag in his hands.

Hindi News Sports ‘Chacha Cricket’ Will Not Be Seen Holding The Pakistan Flag In His Hands. लाहौर15 मिनट पहले कॉपी लिंक अब्दुल जलील(चाचा क्रिकेट) को 1996 में पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने शुभंकर घोषित किया था। – फाइल फोटो लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम में अगले हफ्ते जब पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया के बीच तीसरा वनडे खेला जाएगा, तब मैदान में एक चेहरा ऐसा भी होगा जिसे देखकर करोड़ों पाकिस्तानी भावुक हो जाएंगे। हरे रंग का कुर्ता, टोपी, हाथ में पाकिस्तान का झंडा और चेहरे पर वही मुस्कान। यह होंगे ‘चाचा क्रिकेट’। 77 साल के अब्दुल जलील, जिन्हें पूरी दुनिया चाचा क्रिकेट के नाम से जानती है, इस मैच के बाद पाकिस्तान में मैचों में चीयर करना छोड़ देंगे। करीब पांच दशक तक टीम के साथ हर जीत-हार में खड़े रहने वाले चाचा अब रिटायरमेंट की तैयारी कर रहे हैं। 1968-69 में लाहौर में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट देखकर उन्हें क्रिकेट से ऐसा प्यार हुआ कि जिंदगी ही बदल गई। बाद में नौकरी के लिए यूएई गए, लेकिन पाकिस्तान का मैच देखने के लिए अबु धाबी से शारजाह तक तीन-तीन बसें बदलकर पहुंचते थे। धीरे-धीरे उनका हरा पहनावा और जोश भरा अंदाज पाकिस्तान क्रिकेट की पहचान बन गया। 1996 में उन्हें पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने शुभंकर घोषित किया। साल 1998 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरी जिंदगी पाकिस्तान क्रिकेट को समर्पित कर दी। 1999 वर्ल्ड कप में वे इंग्लैंड तक पहुंचे। इसके बाद दुनिया के लगभग हर बड़े क्रिकेट मैदान में पाकिस्तान का झंडा लहराते दिखे। चाचा कहते हैं कि उन्होंने 500 मैचों में टीम को चीयर करने का सपना देखा था, जो पूरा हो चुका है। अब उनका सपना सियालकोट में एक रेस्टोरेंट और क्रिकेट म्यूजियम खोलने का है, जहां वह जुटाए गए अपने यादगार सामान को रखेंगे। हालांकि, टीम के हालिया खराब फॉर्म के कारण वे श्रीलंका में 2026 टी20 वर्ल्ड कप में टीम का समर्थन करने नहीं गए। भले ही हालिया प्रदर्शन खराब हो, लेकिन चाचा क्रिकेट ने पाक के दबदबे का सुनहरा दौर भी करीब से देखा है। उन्हें आज भी 1986 में जावेद मियांदाद का आखिरी गेंद पर छक्का याद है। वहीं, 2011 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल (मोहाली) और 2024 टी20 वर्ल्ड कप (न्यूयॉर्क) में भारत से हार उनके दिल में दर्द छोड़ गई। लेकिन चाचा क्रिकेट अब भी वही बात दोहराते हैं- ‘कभी खुशी, कभी गम… कभी तुम, कभी हम। खेल में ऐसा होता है।’ शायद यही वजह है कि चाचा क्रिकेट सिर्फ एक फैन नहीं, बल्कि पाकिस्तान क्रिकेट की चलती-फिरती याद बन चुके हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔






