Social Anxiety Reasons; Childhood Influences Vs Self-Esteem

Hindi News Lifestyle Social Anxiety Reasons; Childhood Influences Vs Self Esteem How To Improve It 6 मिनट पहले कॉपी लिंक सवाल- मेरी उम्र 37 साल है। मैं एक गवर्नमेंट स्कूल में टीचर हूं। मेरी प्रॉब्लम थोड़ी अजीब है। मुझे हर वक्त ये डर लगता रहता है कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं। अपने कपड़ों, लुक, बातचीत को लेकर हमेशा एक डर और शर्मिंदगी महसूस होती है। मैं लोगों के बीच इसलिए बहुत बात भी नहीं कर पाती। मुझे डर लगता रहता है कि वे मुझे जज करेंगे या मुझे मूर्ख समझेंगे। स्कूल में स्टाफ रूम में भी मैं इस डर से हमेशा चुप ही रहती हूं। मेरा बचपन ऐसे माहौल में बीता, जहां थोड़ी भी गलती करने पर बहुत डांट पड़ती थी और उससे भी ज्यादा शर्मिंदा किया जाता था। शादी के बाद ससुराल में भी मुझे हर वक्त ये डर लगा रहता था कि लोग मुझे जज कर रहे हैं। हालांकि यहां मुझे कभी किसी ने शर्मिंदा नहीं किया, लेकिन ये जजमेंट का डर, शर्म का एहसास मेरे मन से जाता नहीं। मैं क्या करूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। हर इंसान चाहता है कि लोग उसे पसंद करें, लेकिन अगर यह चिंता हर वक्त मन में बनी रहे कि “लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे,” तो यह आत्मविश्वास और रिश्तों, दोनों को प्रभावित करने लगती है। बचपन की आलोचना मन में असुरक्षा पैदा कर सकती है। लेकिन अच्छी बात यह है कि यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक सीखा हुआ डर है, जिसे सही समझ, छोटे-छोटे अभ्यास और सपोर्ट से बदला जा सकता है। आपके बचपन में ऐसा माहौल रहा, जहां गलती करने पर सिर्फ डांट ही नहीं पड़ती, बल्कि शर्मिंदा भी किया जाता था। ऐसे अनुभव धीरे-धीरे दिमाग में एक गहरा विश्वास बना देते हैं कि— “मैं अच्छी नहीं हूं” या “मुझसे गलती हुई तो लोग मुझे खराब समझेंगे।” यही वजह है कि अब बड़े होने के बाद भी, भले ही लोग आपको कुछ न कहें, लेकिन भीतर हमेशा ये एक डर बना रहता है कि लोग मुझे जज करेंगे। यह समस्या कैसे पैदा होती है? यह समस्या कैसे बनती और बनी रहती है, इसे समझने के लिए नीचे के पॉइंट्स देखें: 1. चाइल्डहुड बार-बार आलोचना होना और शर्मिंदा किया जाना। इससे अंदर यह सोच बैठ गई– “मुझे परफेक्ट होना पड़ेगा, नहीं तो मैं गलत हूं।” 2. थिंकिंग पैटर्न छोटी-सी गलती को बहुत बड़ा मान लेना। जैसे– “अगर मैं कुछ गलत बोल दूंगी, तो लोग मुझे मूर्ख समझेंगे।” यानी एक घटना से पूरे व्यक्तित्व के बारे में नतीजा निकाल लेना। 3. बिहेवियर लोगों के सामने कम बोलना। खुद को रोक लेना। बार-बार यह सोचना कि मैं कैसी दिख रही हूं। दूसरों से कन्फर्मेशन लेना। 4. इमोशंस हर समय हल्का डर बने रहना। खुद को लेकर असहज रहना। बिना वजह शर्म या झिझक महसूस होना। 5. समस्या का चक्र यह समस्या एक चक्र की तरह चलती है– आपको डर लगता है। इसलिए आप लोगों से बचते हैं। → इसलिए आपको पॉजिटिव एक्सपीरियंस नहीं मिलते। इस तरह आपका डर और मजबूत होता जाता है। आपकी मुख्य समस्या क्या है? सोशल एंग्जायटी लोगों के सामने जज किए जाने या गलत दिखने का डर। लो सेल्फ-इस्टीम खुद को कम समझना या खुद पर भरोसा कम होना। शर्मिंदगी की सोच अंदर से यह महसूस करना कि “मुझमें ही कुछ कमी है।” आसान शब्दों में पूरी बात समस्या यह नहीं है कि आप कमजोर हैं। असल में आपका दिमाग पुराने अनुभवों के हिसाब से आज भी प्रतिक्रिया दे रहा है। यानी आज की सिचुएशन सेफ है, लेकिन आपका दिमाग उसे पुराने खतरे जैसा ही मान रहा है। आप खुद को कितना पसंद करते हैं? करें सेल्फ एस्टीम एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 10 सवाल हैं। आपको इन सवालों को 0 से 4 के स्केल पर रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए अगर आपका जवाब ‘पूर्ण असहमति’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘पूर्ण सहमति’ है तो 4 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। जिन सवालों के आगे R लिखा है, उनकी रिवर्स स्कोरिंग करें। सेल्फ इस्टीम कैसे बढ़ाएं चार हफ्तों का सेल्फ हेल्प प्लान सप्ताह 1 खुद को समझना और ध्यान से देखना लक्ष्य: अपने अंदर चलने वाली आलोचनात्मक आवाज को पहचानना और यह समझना कि शर्म/डर कहां से आ रहा है। एक्सरसाइज: सेल्फ–टॉक डायरी हर दिन 3 ऐसे मौके लिखें, जब आपको घबराहट या जज किए जाने का डर लगा– क्या वजह थी? उस समय आपने खुद से क्या कहा? वह सोच कितनी सच थी? सीख: धीरे-धीरे समझ में आएगा कि अंदर की “जज करने वाली आवाज” अक्सर माता-पिता या टीचर्स जैसी लगती है। प्रैक्टिस: रोज 10 मिनट धीरे-धीरे सांस लें या मेडिटेशन करें। खुद से कहें: “यह भावना मेरे अतीत की है, वर्तमान की नहीं।” सप्ताह 2 सोच बदलना और खुद का ख्याल रखना लक्ष्य: आलोचना की जगह एक सपोर्ट वाली आवाज बनाना। एक्सरसाइज 1: मिरर टॉक हर सुबह आईने में देखकर अपने बारे में एक अच्छी बात कहें। (जैसे: आपकी मेहनत, आपकी अच्छाई, या आपकी लुक्स) एक्सरसाइज 2: डर की सच्चाई जांचें जब मन में ये डर आए कि “लोग मुझे जज करेंगे” तो खुद से पूछें: मेरे पास इसका क्या सबूत है? क्या कोई दूसरा कारण भी हो सकता है? अगर कोई स्टूडेंट ऐसा महसूस करे तो मैं उसे क्या कहूंगी? सप्ताह 3 खुद पर भरोसा बनाना लक्ष्य: दूसरों की राय की बजाय अपनी सोच पर भरोसा करना। एक्सरसाइज 1: डेली सक्सेस लॉग हर दिन की 3 छोटी-छोटी सफलताएं लिखें। (जैसे: समय पर पहुंचना, अच्छा पढ़ाना, दोस्त से बात करना) एक्सरसाइज 2: ‘आय डिसाइड’ (मेरा फैसला) हर छोटी-छोटी चीज में खुद को याद दिलाएं कि– “मैं वही चुनती हूं, जो मुझे सही लगता है।” प्रैक्टिस: धीरे-धीरे एक्सपोजर बढ़ाएं। रोज स्टाफ रूम में एक छोटी लाइन बोलें। सप्ताह 4 काम करके आत्मविश्वास बढ़ाना लक्ष्य: छोटे-छोटे काम करके खुद को साबित करना कि आप सक्षम हैं। याद रखें: कॉन्फिडेंस सोचने से नहीं, करने से आता है। स्टेप 1: धीरे-धीरे बोलना सीखें रोज
Bengal Govt Accuses BJP Social Media Weapon

नई दिल्ली/कोलकाता4 मिनट पहले कॉपी लिंक कोलकाता में 8 जनवरी को I-PAC डायरेक्टर प्रतीक जैन के घर ED रेड के दौरान ममता पहुंच गई थीं। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को लगातार दूसरे दिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ ED की याचिका पर सुनवाई जारी है। ED की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश कीं। बंगाल सरकार की ओर से सीनियर एडवोक्ट मेनका गुरुस्वामी पेश हुईं। उन्होंने आरोप लगाया कि एक राजनीतिक पार्टी कोर्ट की कार्यवाही को सोशल मीडिया पर हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है। उन्होंने कोर्ट से इस पर रोक लगाने की मांग की। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने ED की रेड के बीच CM ममता बनर्जी के दखल को गलत बताया था। कोर्ट ने कहा- यह राज्य और केंद्र के बीच का विवाद नहीं है। किसी भी राज्य का सीएम ऐसा करता है तो यह लोकतंत्र को खतरे में डालना है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Bengal Govt Accuses BJP Social Media Weapon

नई दिल्ली/कोलकाता14 मिनट पहले कॉपी लिंक कोलकाता में 8 जनवरी को I-PAC डायरेक्टर प्रतीक जैन के घर ED रेड के दौरान ममता पहुंच गई थीं। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को लगातार दूसरे दिन I-PAC रेड मामले पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ ED की याचिका पर सुनवाई जारी है। ED की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश कीं। बंगाल सरकार की ओर से सीनियर एडवोक्ट मेनका गुरुस्वामी पेश हुईं। उन्होंने आरोप लगाया कि एक राजनीतिक पार्टी कोर्ट की कार्यवाही को सोशल मीडिया पर हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है। उन्होंने कोर्ट से इस पर रोक लगाने की मांग की। जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने कल कहा था कि जब कोई मुख्यमंत्री किसी केंद्रीय एजेंसी की चल रही जांच में दखल देता है, तो इसे केंद्र और राज्य सरकार के बीच का विवाद नहीं कहा जा सकता। दरअसल 8 जनवरी को ED ने कोलकाता स्थित पॉलिटिकल कंसल्टेंसी कंपनी I-PAC डायरेक्टर प्रतीक जैन के घर और दफ्तर पर छापा मारा था। इस दौरान ममता वहां पहुंचीं और कुछ फाइलें लेकर चली गईं। इसके बाद ED जांच में बाधा डालने के आरोप में ममता और बंगाल पुलिस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची। ममता की 4 दलीलें ममता की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील रखी। उन्होंने कहा- ED को जांच करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है। यह सिर्फ उनका काम है, अधिकार नहीं। ED का अधिकारी जब काम कर रहा है, तो वह सिर्फ ‘सरकारी कर्मचारी’ है। वह अपने विभाग से अलग किसी अधिकार का दावा नहीं कर सकता। ED ने कहा कि उनके अधिकारों का उल्लंघन हुआ। ऐसा नहीं है, क्योंकि अधिकारी सिर्फ ड्यूटी निभा रहा है, मौलिक अधिकार का सवाल ही नहीं उठता। ईडी खुद एक ताकतवर एजेंसी है वह खुद को ‘जनता का रक्षक’ बताकर कोर्ट में नहीं आ सकती। सुप्रीम कोर्ट के 4 कमेंट यह असल में किसी एक व्यक्ति का काम है। इसे पूरे सिस्टम या लोकतंत्र का विवाद बताना सही नहीं। संविधान बनाते समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक मुख्यमंत्री किसी जांच एजेंसी के दफ्तर में पहुंच जाएगा। सिर्फ कानूनी सिद्धांत से काम नहीं चलेगा। हमें जमीन की हकीकत भी देखनी होगी। संविधान की व्याख्या समय के साथ बदलती रहती है। हर नए हालात में कोर्ट को नए सिरे से सोचना पड़ता है। ऐसे समझें… तृणमूल के लिए I-PAC इतनी जरूरी क्यों 2021 के चुनाव में: ममता के लिए I-PAC ने रणनीति बनाई। उन्होंने फर्म को संगठन का काम दिया। प्रत्याशी चयन, बूथ लेवल मैनेजमेंट, भाषण, सोशल पोस्ट, पोस्टर, नारे सब कुछ I-PAC ही कर रही थी। इस चुनाव में: टीएमसी डेटा पर फोकस कर रही है। 2021 विस और 2024 लोकसभा चुनाव के बूथ स्तरीय आंकड़ों का विश्लेषण I-PAC ने ही किया। हर सीट को 3 कैटेगरी में बांटा: मजबूत, कमजोर और लो वोट मार्जिन। 15 हजार तक मार्जिन की सीटें चुनीं। टीम एसआईआर को भी ट्रैक कर रही है: पार्टी का मानना है कि वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में नाम हटने से गणित बिगड़ सकता है, इसलिए शैडो एजेंट्स लाए गए। ये एजेंट्स नाम कटने वाले वोटरों तक पहुंचे: उनसे फार्म भरवाए, री-एंट्री करवाई। बीएलओ को ट्रैक करना, वोटर लिस्ट की गड़बड़ी पकड़ना, फील्ड से रियल टाइम इनपुट देना, ये काम शैडो एजेंट्स ही कर रहे थे। हर सीट पर अलग वॉर रूम है: जहां 20 सदस्यीय टीम काम करती है। छोटी बैठकें अरेंज करती है। I-PAC रेड मामला : 2,742 करोड़ का मनी लॉन्ड्रिंग केस I-PAC यानी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी एक पॉलिटिकल कंसल्टेंसी कंपनी है। यह राजनीतिक दलों के लिए बड़े स्तर पर चुनावी अभियानों का काम करती है। कंपनी और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन पर करोड़ों रुपए के कोयला चोरी घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। CBI ने इस मामले में 27 नवंबर 2020 को FIR दर्ज की थी। पूरा मामला ₹2,742 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है। आरोप है कि ₹20 करोड़ हवाला के जरिए I-PAC तक ट्रांसफर हुए। ED ने 28 नवंबर 2020 को इसकी जांच शुरू की थी। 8 जनवरी 2026 को ED ने कोलकाता में I-PAC और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के घर और ऑफिस पर छापा मारा था। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Punjab Land Registry Bribe | Ex-Cricketer Claims 28 People Took Bribe; Social Media Account Suspende

पूर्व क्रिकेटर पुलकित ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए रिश्वत मांगे जाने का खुलासा किया। पंजाब में जमीनों के रजिस्ट्रेशन अब ऑनलाइन होते हैं। सरकार का दावा है कि रजिस्ट्री ऑनलाइन अपलोड की जाती है और वेरिफिकेशन के बाद खरीदार किसी सब रजिस्ट्रार दफ्तर में जाकर फोटो करवा सकता है। . सरकार के इस दावे की पोल पुलकित नाम के एक पूर्व क्रिकेटर ने खोली है। पुलकित ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट (X) पर लिखा कि पंजाब में एक जमीन खरीदी और उसकी रजिस्ट्री करवाई। रजिस्ट्री करवाने के लिए तहसीलदार समेत 28 लोगों को रिश्वत देनी पड़ी। पोस्ट के आखिर में उसने शेमफुल लिखा। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि पंजाब में उन्होंने कहां और कब जमीन खरीदी। पुलकित शर्मा ने पोस्ट में सुखबीर बादल, हरसिमरत बादल, आम आदमी पार्टी (AAP) और सीएम भगवंत मान को टैग किया। अकाली दल के वरिष्ठ नेता सुखबीर बादल ने पुलकित शर्मा की पोस्ट को रीट्वीट भी किया और सरकार के दावों पर सवाल खड़े किए। पुलकित की इस पोस्ट को सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने शेयर किया है। जब पोस्ट वायरल होने लगी तो 18 अप्रैल को पुलकित शर्मा का X अकाउंट सस्पेंड कर दिया गया। पुलकित ने जिस अकाउंट से पोस्ट की थी, वह ब्लूटिक अकाउंट था। हालांकि, अभी इस पर सरकार की ओर से कोई रिएक्शन नहीं दिया गया है। उधर, AAP के सोशल मीडिया जालंधर के इंचार्ज प्रिंस शर्मा ने X हैंडल पर लिखा- यह नैरेटिव ज़ोर-शोर से फैलाया जा रहा है, लेकिन तथ्य इसका समर्थन नहीं करते। क्रिकेटर पुलकित शर्मा ने अपना X (ट्विटर) अकाउंट खुद डिलीट किया था- इसे सरकार ने ‘सस्पेंड’ नहीं किया था। पुलकित के एकाउंट को सस्पेंड कर दिया गया है। उनकी यूजर आईडी सर्च करने पर अब यह दिखाई दे रहा है। वकील ने कहा चूक हुई तो फाइल अटक जाएगी पुलकित शर्मा ने पंजाब के सब रजिस्ट्रार दफ्तरों में चले नेक्सेस का पर्दाफाश किया है। उनका कहना है कि वकील ने रजिस्ट्री करवाने से पहले ही कह दिया था कि यहां अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग रेट हैं। सभी को देना पड़ेगा। अगर न दें तो वे फाइल अटका देंगे और आपकी रजिस्ट्री लेट होती जाएगी। फिर उन्हें सभी के हिस्से की रिश्वत तय फीस के साथ देनी पड़ी। पुलकित शर्मा ने खुद को बताया फॉर्मर नेशनल क्रिकेटर पुलकित शर्मा का X पर @Pulkits77 के नाम से एकाउंट था। एकाउंट की प्रोफाइल में उन्होंने खुद को फॉर्मर नेशनल क्रिक्रेटर लिखा। इनलाइन हॉकी के स्टेट गोल्ड मेडलिस्ट के अलावा खुद को विदेशी यूनिवर्सिटी से पोस्टग्रेजुएट बताया था। इसके अलावा उन्होंने खुद को फिटनेस, आईआर एंड टेक एक्सपर्ट लिखा है। पुलकित शर्मा कहां से क्रिकेट खेलते रहे, इस बारे में उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी है। पुलकित शर्मा ने अपने X एकाउंट पर क्रिकेट में जीते मेडल और सर्टिफिकेट का यह फोटो पोस्ट कर रखा था। पुलकित ने ये 2 बातें लिखीं… हर किसी का अपना तय रेट: पुलकित शर्मा ने X पर लिखा- मैंने हाल ही में पंजाब में एक जमीन की रजिस्ट्री पूरी की है। तहसीलदार और 28 अन्य लोगों को जो रिश्वत हमें देनी पड़ी, उसकी रकम बहुत ज्यादा थी। वकील ने कहा कि हर किसी का अपना तय रेट है। अगर एक भी कदम चूक जाएं, तो आपकी फाइल अटक जाएगी। कानूनी चीज के लिए भी रिश्वत देनी पड़ी: पुलकित ने लिखा- मैंने जो जमीन खरीदी, वह पूरी तरह व्हाइट (कानूनी और पारदर्शी) है। इतनी पारदर्शी चीज के लिए भी मुझे पंजाब प्रशासन के भ्रष्ट लोगों को रिश्वत देनी पड़ी। पंजाब में निवेश करना जैसे अपराध बन गया है। शर्मनाक… 17 अप्रैल को पुलकित ने सोशल मीडिया पर यह पोस्ट लिखा था। सुखबीर बादल ने रीट्वीट किया अकाली दल के नेता वरिष्ठ नेता और पूर्व डिप्टी CM सुखबीर बादल ने सोशल मीडिया पर पुलकित का पोस्ट रीट्वीट किया। इसके साथ उन्होंने लिखा- मुख्यमंत्री भगवंत मान और उनके भ्रष्ट सहयोगियों पर लानत है। राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी पुलकित शर्मा को भी पंजाब में एक साफ-सुथरी जमीन की रजिस्ट्री कराने के लिए तहसीलदार और 28 अन्य लोगों को रिश्वत देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उन्होंने लिखा- AAP के मंच पर किए जाने वाले ऑन-द-स्पॉट कार्रवाई के ड्रामे अब पूरी तरह बेनकाब हो चुके हैं। तय रेट, जानबूझकर देरी, फाइलों को जानबूझकर अटकाना, यही AAP का असली काम करने का तरीका है। यह गहराई तक फैली लूट निवेशकों को दूर भगा रही है और पंजाब के भविष्य को बर्बाद कर रही है। इसे तुरंत ठीक करें, वरना अपनी विफलता स्वीकार करें और इस्तीफा दें। सुखबीर बादल ने पुलकित के पोस्ट को रीट्वीट किया। पंजाब में रजिस्ट्री करवाने की यह प्रकिया पंजाब में जमीन खरीदने वाले को रेवेन्यू डिपार्टमेंट के पोर्टल पर पुरानी रजिस्ट्री, फर्द, बेचने वाले का आधार कार्ड, खरीदने वाले का आधार कार्ड, दो गवाहों के आधार कार्ड अपलोड करने होते हैं। इसके साथ एनआरसी भी अपलोड करनी होती है। दस्तावेज अपलोड होने के बाद सब-रजिस्ट्रार यानी तहसीलदार या नायब तहसीलदार के पास जाते हैं। वे दस्तावेजों की जांच करते हैं। अगर दस्तावेज सही पाए जाते हैं तो वह अप्रूवल दे देते हैं। उसके बाद रजिस्ट्री करवाने वाले को मैसेज जाता है। रजिस्ट्री करवाने वाला फिर अपॉइंटमेंट लेकर किसी भी सब-रजिस्ट्रार दफ्तर में जाकर फोटो करवाकर रजिस्ट्री करवा सकता है। अगर तहसीलदार या नायब तहसीलदार दस्तावेजों पर ऑब्जेक्शन लगाता है तो उस ऑब्जेक्शन को दूर कर पूरी प्रक्रिया दोबारा अपनानी पड़ती है। AAP बोली- खुद अकाउंट डिलीट किया AAP के सोशल मीडिया जालंधर के इंचार्ज प्रिंस शर्मा ने X हैंडल पर लिखा- यह नैरेटिव ज़ोर-शोर से फैलाया जा रहा है, लेकिन तथ्य इसका समर्थन नहीं करते। क्रिकेटर पुलकित शर्मा ने अपना X (ट्विटर) अकाउंट खुद डिलीट किया था- इसे सरकार ने ‘सस्पेंड’ नहीं किया था। अगर उनके आरोपों में कोई सच्चाई होती, तो वह पोस्ट करने के बाद गायब होने के बजाय सबूत पेश करते। बिना सबूत के भ्रष्टाचार के आरोप लगाना आसान है, लेकिन उन पर कायम रहना ही असली बात होती है। बिना किसी आधार के ऐसे आरोप लगाना केवल अनावश्यक डर और भ्रम पैदा करता है। भगवंत मान और AAP सरकार को निशाना बनाने से पहले ज़मीनी हकीकत देखना ज़रूरी है- भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई
Gwalior High Court Restores Petition with Social Responsibility Condition

ग्वालियर5 मिनट पहले कॉपी लिंक ग्वालियर हाईकोर्ट का फाइल फोटो मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम फैसले में न्यायिक संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का अनोखा उदाहरण पेश किया है। कोर्ट ने साफ कहा कि वकील की गलती की सजा याचिकाकर्ता को नहीं दी जा सकती। मामला गोविंद स्वरूप श्रीवास्तव की याचिका से जुड़ा है, जो सुनवाई के दौरान उनके वकील के उपस्थित न रहने के कारण खारिज हो गई थी। बाद में बहाली के लिए दिया गया आवेदन भी सिंगल बेंच ने खारिज कर दिया था। डिवीजन बेंच ने दिया राहत का फैसला इस आदेश को चुनौती देने पर डिवीजन बेंच ने पाया कि वकील दूसरी अदालत में व्यस्त होने के कारण पेश नहीं हो सके थे। ऐसे में याचिकाकर्ता के अधिकारों को प्रभावित करना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने पूर्व आदेशों को निरस्त करते हुए याचिका को पुनः बहाल करने के निर्देश दिए। ‘सजा’ नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी की शर्त हालांकि, अदालत ने याचिका बहाल करते हुए एक विशेष शर्त भी जोड़ी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता या उसका वकील माधव अंध आश्रम जाकर कम से कम 2 हजार रुपए की खाद्य सामग्री प्रदान करे और वहां के बच्चों व जरूरतमंदों के साथ कम से कम एक घंटा समय बिताए। ‘सोशल ऑडिट’ को बढ़ावा अदालत ने स्पष्ट किया कि यह शर्त दंड नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन है। कोर्ट ने ‘सोशल ऑडिट’ की अवधारणा को बढ़ावा देते हुए कहा कि समाज के जिम्मेदार लोगों को समय-समय पर ऐसे संस्थानों का निरीक्षण करना चाहिए, ताकि वहां रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुधार हो सके। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Indore Bail Not Cancelled | Social Media Post No Proof

इंदौर3 घंटे पहले कॉपी लिंक शादी का झांसा देकर दुष्कर्म के आरोप में दर्ज प्रकरण में आरोपी दीपक विश्नोई की अग्रिम जमानत निरस्त करने की मांग को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी द्वारा व्हाट्सएप स्टेटस लगाने मात्र से पीड़िता या साक्ष्य प्रभावित होने का कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। दरअसल 25 वर्षीय पीड़िता ने जून 2025 में थाना बाणगंगा में देवास निवासी दीपक विश्नोई के खिलाफ वर्ष 2020 से 2024 के बीच शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने की एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोपी की ओर से एडवोकेट मनीष यादव और पं. करण बैरागी ने हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर कर तर्क दिया था कि दोनों पक्षों के बीच पैसों का लेन-देन विवाद है और इसी कारण पांच वर्ष पुराने घटनाक्रम को आधार बनाकर झूठी रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। बचाव पक्ष ने कोर्ट के समक्ष दोनों के विवाह से संबंधित फोटो भी प्रस्तुत किए थे। तर्कों से सहमत होकर कोर्ट ने पिछले साल में आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ दिया था। इसके बाद पीड़िता ने जमानत निरस्ती के लिए आवेदन प्रस्तुत कर आरोप लगाया कि जमानत मिलने के बाद आरोपी ने व्हाट्सएप स्टेटस पर द्विअर्थी शायरी पोस्ट कर उसे प्रभावित करने का प्रयास किया है, इसलिए जमानत निरस्त की जाए। इस पर आरोपी पक्ष के एडवोकेट ने जवाब में कहा कि संबंधित स्टेटस आरोपी के निजी मोबाइल पर लगाया गया था, जिसमें पीड़िता का नाम तक उल्लेखित नहीं है। मात्र किसी के द्वारा अपने मोबाइल पर स्टेटस लगाने से यह सिद्ध नहीं होता कि वह पीड़िता को प्रभावित करने का प्रयास है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस सुबोध अभ्यंकर ने जमानत निरस्ती आवेदन खारिज करते हुए आदेश में उल्लेख किया कि आरोपी द्वारा स्टेटस लगाए जाने से पीड़िता या साक्ष्य किस प्रकार प्रभावित हो सकते हैं, यह स्पष्ट नहीं किया गया। साथ ही कहा कि पीड़िता आरोपी का स्टेटस देखने के लिए बाध्य नहीं है। इन परिस्थितियों में जमानत निरस्त करने का कोई आधार नहीं बनता। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Doctors are prescribing fishing, gardening, and social service alongside medication; these can improve mental health.

Hindi News Happylife Doctors Are Prescribing Fishing, Gardening, And Social Service Alongside Medication; These Can Improve Mental Health. लंदन / वॉशिंगटन7 घंटे पहले कॉपी लिंक फिश एंड चैट सेशन में बुजुर्ग। ब्रिटेन के कैंट में रहने वाले स्टीफन (58) की पत्नी को हार्ट अटैक आया। इसके बाद वे मानसिक संकट में घिर गए। स्टीफन बताते हैं, ‘एक समय ऐसा आया था जब मुझे अपनी जिंदगी समझ ही नहीं आ रही थी। 50 साल के ली भी उन्हीं की तरह विषम परिस्थितियों से जूझ रहे थे। अवसाद हावी होने लगा था… दोनों को फैमिली डॉक्टर्स ने मछली पकड़ना, आर्ट ग्रुप, वॉकिंग ग्रुप और वॉलंटियरिंग से जुड़ने को कहा। यह सोशल प्रिस्क्राइविंग है… इलाज का पारंपरिक तरीका। दोनों ने फिशिंग चुनी। वे गैर लाभकारी संस्था ‘कास्ट ए थॉट’ से जुड़ गए। यहां उन्हें बचपन की पसंदीदा गतिविधि के साथ समान अनुभव वाले लोग भी मिले। स्टीफन कहते हैं, ‘यहां आकर लोगों से मिलना और पानी के किनारे बैठना जादू जैसा रहा। यह थेरेपिस्ट के सामने सूट पहनकर बैठने से कहीं आसान और असरदार है। इस सेशन का नाम ‘फिश एंड चैट’ रखा गया। दो घंटे फिशिंग होती है। फिर कैफे में कॉफी। दोस्त बनते हैं। कोई तय स्क्रिप्ट नहीं होती। दुनियाभर में हेल्थ केयर सिस्टम दबाव में हैं। कोविड के बाद वेटिंग लिस्ट लंबी हुई, स्टाफ की कमी बढ़ी। ऐसे में डॉक्टर ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग’ की ओर लौट रहे हैं। इसमें डॉक्टर मरीज की बीमारी के सामाजिक और मानसिक कारणों को समझते हुए उन्हें ऐसी गतिविधियों से जोड़ते हैं जो उनके अकेलेपन को दूर करें और मानसिक सेहत में सुधार लाएं। ब्रिटेन और नीदरलैंड्स में इसकी सफलता के बाद अमेरिका में पायलट शुरू हुए हैं। ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग यूएसए’ संगठन 2035 तक अमेरिकियों को कला, संगीत व प्रकृति आधारित उपचार दिलाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। रोमानिया व डेनमार्क में नए प्रोजेक्ट शुरू हुए। मकसद है पोस्टनेटल डिप्रेशन घटाना। नई मांओं को गाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। नीदरलैंड्स में साइक्लिंग क्लब, म्यूजियम विजिट, ताई ची जैसी एक्टिविटी पर सब्सिडी मिलती है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2030 तक दुनिया में करीब 1.1 करोड़ स्वास्थ्य कर्मियों की कमी होगी। ऐसे में बीमारियों को रोकने के लिए ‘रोकथाम और सामाजिक जुड़ाव’ ही सबसे सस्ता व प्रभावी रास्ता दिख रहा है। सोशल प्रिस्क्राइविंग यूएसए के कोफाउंडर एलन सीगल कहते हैं, ‘डिप्रेशन में उनके पास थेरेपी और दवा के बाद विकल्प जल्दी खत्म हो जाते हैं। कई लोग साइड इफेक्ट झेलते हैं। कई थेरेपिस्ट के पास नहीं जाना चाहते। उनके मुताबिक इलाज का बड़ा हिस्सा क्लिनिक के बाहर की जिंदगी में होता है। ऐसे में सोशल प्रिस्क्राइविंग बेहतर विकल्प बन सकता है।’ एक्टिविटी कोच डेव एलस्टोन कहते हैं, ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग उसी दौर की याद दिलाता है जब डॉक्टर घर-घर जाकर मरीजों की बातें सुना करते थे। डेव कहते हैं, ‘चाहे ताजी हवा से काम हो या गप्पे मारने से, सच तो यह है कि यह काम करता है… हमने लोगों को ठीक होते देखा है।’ दवाइयों की जरूरत कम पड़ रही, डिप्रेशन भी आध आधाः एक्सपर्ट यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर डेजी फैनकोर्ट के शोध के अनुसार, जो लोग महीने में कम से कम एक बार संगीत बजाने या बुनाई जैसी गतिविधियां करते हैं, उनमें डिप्रेशन का खतरा करीब आधा हो जाता है। ग्लोबल मेटा-एनालिसिस में पाया गया कि सर्जरी के बाद संगीत सुनने वाले मरीजों को कम दर्द हुआ और उन्हें दवाइयों की जरूरत भी कम पड़ी। यही वजह है कि डॉक्टर्स इसे महत्व दे रहे हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Successful People Comparison Anxiety; Social Media Self Worth

Hindi News Lifestyle Successful People Comparison Anxiety; Social Media Self Worth | Working Professional Stress 4 घंटे पहले कॉपी लिंक सवाल- मैं 26 साल की वर्किंग प्रोफेशनल हूं। मेरी प्रॉब्लम ये है कि मैं हर वक्त अपनी तुलना सक्सेसफुल लोगों से करती रहती हूं। फिर चाहे वो सेलिब्रिटीज हों या मेरे आसपास के लोग। मैं हर सफल व्यक्ति के पैरलल खुद को रखकर उससे कंपैरिजन करने लगती हूं। कई बार मैं देर रात तक उन्हें सोशल मीडिया पर स्टॉक करती रहती हूं, उनके वेकेशन के फोटोज देखती रहती हूं। सोचती हूं कि सब कितने खुश, कितने सक्सेसफुल हैं और मेरा जीवन कितना बोरिंग है। इससे मेरी सेल्फ वर्थ भी कम हो रही है। मैं क्या करूं? एक्सपर्ट- डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। जवाब- आप जो महसूस कर रही हैं, वह बहुत रियल और कॉमन है, खासतौर पर आज के सोशल मीडिया दौर में। अच्छी बात यह है कि ये कोई स्थायी समस्या नहीं है। यह एक समझने और बदलने योग्य पैटर्न है। मैं साइकोलॉजी के कुछ टूल्स और फ्रेमवर्क्स की मदद से आपको एक प्रैक्टिकल रोडमैप देने की कोशिश करूंगा। आपकी स्थिति की क्लिनिकल अंडरस्टैंडिंग सबसे पहले हम आपकी सिचुएशन को मनोविज्ञान के नजरिए से समझने की कोशिश करेंगे। आप ट्रिगर महसूस करती हैं। फिर आप सोशल मीडिया स्क्रॉल करती हैं। वहां आप दूसरों की ‘सक्सेस’ और उनकी ‘हैप्पी लाइफ’ देखती हैं। ये देखकर मन में ऑटोमैटिक ये ख्याल आते हैं- “सब मुझसे आगे हैं।” “मैं कुछ खास नहीं कर रही।” “मेरा जीवन बिल्कुल बोरिंग है।” साइकोलॉजिकल एनालिसिस: ऐसा क्यों हो रहा है? मनोविज्ञान में एक कॉन्सेप्ट है, सोशल कंपैरिजन थ्योरी। यह थ्योरी कहती है कि हम खुद को समझने के लिए दूसरों से तुलना करते हैं। लेकिन समस्या तब होती है, जब यह तुलना “अपवर्ड कंपैरिजन” बन जाती है। यानी हम हमेशा सिर्फ हमसे बेहतर, अमीर, सुंदर या सफल लोगों से ही तुलना करते हैं। अपवर्ड कंपैरिजन का प्रभाव अपवर्ड कंपैरिजन के कुछ ऐसे साइकोलॉजिकल प्रभाव हो सकते हैं- खुद को कमतर महसूस करना। यह सोचना कि “मैं पीछे रह गई।” हमेशा असंतुष्ट रहना। सोशल मीडिया की झूठी दुनिया सोशल मीडिया पर आप कुछ लोगों की जो जिंदगी देख रही हैं, वो उनकी पूरी लाइफ नहीं है। वो सिर्फ उतनी ही है, जो वो आपको दिखाना चाहते हैं। इसलिए हमें ये बात याद रखनी चाहिए- लोग सोशल मीडिया पर सच पोस्ट नहीं करते। लोग सोशल मीडिया पर अपना बेस्ट पोस्ट करते हैं। ज्यादा सोशल मीडिया यूज के नुकसान सोशल मीडिया का बहुत ज्यादा इस्तेमाल इसलिए खतरनाक है क्योंकि मेंटल, इमोशनल और हेल्थ संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। इससे सिर्फ सेल्फ वर्थ ही कम नहीं होती बल्कि नींद, भूख जैसे बेसिक हेल्थ पैरामीटर्स पर भी इसका नेगेटिव प्रभाव पड़ता है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें- डोपामिन लूप और स्टॉकिंग बिहेवियर सोशल मीडिया पर बार-बार किसी की फोटो, वीडियो और लाइफ अपडेट को देखते हुए हम एक तरह के डोपामिन लूप में फंसते जाते हैं। यह एक तरह का बिहेवियरल लूप बन जाता है- सोशल मीडिया पर फोटो देखना। फोटो से और जिज्ञासा होना। प्रोफाइल को आगे स्क्रॉल करना। और ज्यादा फोटो-वीडियो देखना। फिर अपनी लाइफ से तुलना करना। तुलना से दुख महसूस होना। फिर अपने लिए वैलिडेशन ढूंढना। इसके लिए और ज्यादा स्क्रॉल करना। एक बिहेवियरल लूप में फंसते जाना। सेल्फ वर्थ: सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 9 सवाल हैं। आपको इन सवालों को ध्यान से पढ़ना है और 0 से 3 के स्केल पर इसे रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए आपका जवाब अगर ‘बिल्कुल नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘बहुत ज्यादा’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। नंबर के हिसाब से उसका इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। अगर आपका टोटल स्कोर 0 से 8 के बीच में है तो ये सामान्य हल्का प्रभाव है। लेकिन अगर आपका स्कोर 19 से 27 के बीच है तो कंपैरिजन स्केल पर आपका स्कोर बहुत ज्यादा है। आप बहुत ज्यादा तुलना करती हैं और आपकी सेल्फ वर्थ कम है। ऐसे में आपको एक्टिव कदम उठाने की जरूरत है। 2. संभावित डायग्नोस्टिक फॉर्मुलेशन यह कोई स्पष्ट मानसिक बीमारी नहीं है। यह सिर्फ लो सेल्फ एस्टीम और गलत कंपैरिजन पैटर्न में फंसने का मामला है। हालांकि अगर यह पैटर्न ज्यादा बढ़ जाए और एडिक्टिव स्टेज तक पहुंच जाए तो ये जोखिम हो सकते हैं- एडजस्टमेंट डिफिकल्टीज माइल्ड डिप्रेसिव सिंपटम्स CBT आधारित सेल्फ हेल्प प्लान यहां मैं आपको कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी पर आधारित एक सेल्फ हेल्प प्लान दे रहा हूं। स्टेप 1 अवेयरनेस सबसे पहली और जरूरी चीज है सजग होना। जब भी मन में तुलना की भावना आए तो उसे अटेंशन दें। इस बात को नोट करें। जैसेकि आपने इंस्टाग्राम देखा और आपके मन में ख्याल आया कि ‘सब खुश हैं और मैं ही दुखी हूं’ तो इस बात को नोट करें। नोटिस करना ही बदलाव की दिशा में पहला कदम है। स्टेप 2 अपनी सोच को चुनौती देना अपने मन में आने वाले नकारात्मक ख्यालों को चुनौती दें। नेगेटिव ख्याल– “सब खुश हैं, मैं ही दुखी और अकेली हूं।” पॉजिटिव रीफ्रेमिंग– “लोग सिर्फ अपनी खुशी ही शेयर करते हैं, अपने स्ट्रगल शेयर नहीं करते।” नेगेटिव ख्याल– “सब आगे निकल रहे हैं। मैं ही पीछे रह गई हूं।” पॉजिटिव रीफ्रेमिंग– “हर सक्सेस की अपनी अलग टाइमलाइन होती है।” स्टेप 3 व्यवहार में बदलाव 1. सोशल मीडिया से जुड़े नए नियम अपने लिए सोशल मीडिया रूल बनाएं। दिन में सिर्फ दो बार सोशल मीडिया देखेंगी। हर बार सिर्फ 20 मिनट देखेंगी। रात 9 बजे के बाद सोशल मीडिया से दूर रहेंगी। 2. सोशल मीडिया का पैसिव नहीं, एक्टिव उपयोग आप सोशल मीडिया को सिर्फ दूसरों की जिंदगी देखने के लिए यूज नहीं करेंगी। यह पैसिव यूज है। आप उसका एक्टिव यूज करेंगी। सिर्फ देखने की बजाय खुद अर्थपूर्ण बातचीत या जानकारी डालेंगी। 3. कंपैरिजन डिटॉक्स एक्सरसाइज जब भी मन में दूसरों से तुलना का ख्याल आए तो खुद से पूछें- “क्या मैं पूरी कहानी देख पा रही हूं?” क्या मैं अपनी पूरी जिंदगी की तुलना किसी के
Political Ads on Social Media Need Certificate

Hindi News National Election Commission Strict: Political Ads On Social Media Need Certificate नई दिल्लीकुछ ही क्षण पहले कॉपी लिंक चुनाव आयोग (ECI) ने आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। अब सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर किसी भी पॉलिटिकल एड से पहले मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमेटी (MCMC) से परमिशन लेना जरूरी होगा। यह निर्देश पांच राज्यों असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों और छह राज्यों के उपचुनावों के लिए लागू होगा। आयोग के मुताबिक बिना प्रमाणन के कोई भी राजनीतिक विज्ञापन टीवी, रेडियो, सार्वजनिक स्थानों पर ऑडियो-वीडियो डिस्प्ले, ई-पेपर, बल्क SMS/वॉयस मैसेज, इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जारी नहीं किया जा सकेगा। पेड न्यूज और सोशल मीडिया पर निगरानी चुनाव आयोग ने MCMC को पेड न्यूज के मामलों पर कड़ी निगरानी रखने और आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। उम्मीदवारों को अपने नामांकन पत्र में अपने सभी आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी देना भी अनिवार्य होगा। खर्च का पूरा हिसाब देना होगा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77(1) और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत, राजनीतिक दलों को चुनाव खत्म होने के 75 दिनों के भीतर पूरा खर्च विवरण देना होगा। इसमें इंटरनेट और सोशल मीडिया पर विज्ञापन, कंटेंट तैयार करने और अकाउंट संचालन से जुड़े सभी खर्च शामिल होंगे। फेक न्यूज, भ्रामक जानकारी और दुष्प्रचार पर नियंत्रण के लिए 19 मार्च को आयोग ने सभी चुनावी राज्यों के अधिकारियों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के प्रतिनिधियों के साथ बैठक भी की। फोटो AI जनरेटेड। 5 राज्यों में अप्रैल में चुनाव अप्रैल में असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं। बंगाल में दो फेज 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग होगी। तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में सिंगल फेज में चुनाव होंगे। तमिलनाडु में 23 अप्रैल, केरल, असम और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को मतदान होगा। पांचों राज्यों का रिजल्ट 4 मई को आएगा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने 15 मार्च को इसका ऐलान किया था। पांच राज्यों-केंद्र शासित प्रदेश में 17.4 करोड़ मतदाता हैं। यहां 824 सीटों पर चुनाव होने हैं। 2021 में इन सभी पांच राज्यों के चुनाव का ऐलान 26 फरवरी को किया गया था। पिछली बार बंगाल में 8 चरणों में चुनाव हुए थे। ——————————————— ये खबर भी पढ़ें… ममता का ऐलान- SC-ST महिलाओं को हर महीने ₹1700 देंगे, बाकी को ₹1500 मिलेंगे, TMC घोषणापत्र में पक्के घर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया। ममता ने लक्ष्मी भंडार योजना के तहत महिलाओं को हर महीने मिलने वाली सहायता राशि 500-500 रुपए बढ़ाने का वादा किया है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Sant Gorakhnath Life Lessons; Yoga Social Equality

Hindi News Lifestyle Sant Gorakhnath Life Lessons; Yoga Social Equality | Spiritual Mental Health 3 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी कॉपी लिंक किताब- लोककथाएं प्रेम की और संत गोरखनाथ (लोर्स ऑफ लव एंड सैंट गोरखनाथ का हिंदी अनुवाद) लेखक- नलिन वर्मा, लालू प्रसाद यादव अनुवाद- विजय कुमार झा प्रकाशक- पेंगुइन मूल्य- 299 रुपए भारतीय संत परंपरा में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने सिर्फ आध्यात्मिक मार्ग नहीं दिखाया, बल्कि समाज और संस्कृति को भी प्रभावित किया। संत गोरखनाथ ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। ‘लोककथाएं प्रेम की और संत गोरखनाथ‘ किताब में गोरखनाथ के विचारों और लोकजीवन पर पड़े उनके प्रभाव को समझाया गया है। यह किताब बताती है कि गोरखनाथ केवल एक योगी या संत नहीं, बल्कि ऐसे विचारक थे, जिनकी शिक्षा ने समाज की सोच और जीवनशैली पर भी गहरा असर डाला। किताब क्या कहती है? यह किताब बताती है कि गोरखनाथ के लिए योग सिर्फ शरीर की कसरत नहीं, बल्कि मन को जीतने का रास्ता भी है। उनकी शिक्षाओं का मूल मंत्र है, बाहरी दिखावे को छोड़कर अपने भीतर की शक्ति को पहचानना। भारतीय योग परंपरा में संत गोरखनाथ का नाम अनुशासन और आत्मज्ञान का पर्याय है। समाज को जोड़ने का संदेश इस किताब का सबसे सशक्त पक्ष ‘समानता’ है। नाथ संप्रदाय ने उस दौर में जात-पात की बेड़ियां तोड़ीं, जब समाज में यह सब बहुत गहरे व्याप्त था। इसमें किसान, जुलाहे और चरवाहे सभी को बराबर का स्थान मिला। गोरखनाथ की यह समावेशी दृष्टि आज के दौर में भी उतनी ही जरूरी है। किताब के 9 सबक ग्राफिक में देखिए- योग और वैराग्य के संत गोरखनाथ भारतीय योग परंपरा के प्रमुख संत माने जाते हैं और नाथ संप्रदाय के सबसे प्रभावशाली गुरु के रूप में उनकी पहचान है। उनकी शिक्षा का मूल आधार योग, संयम और आत्मानुशासन है। उनका मानना था कि मनुष्य अपने भीतर की शक्ति को पहचानकर ही जीवन का सही अर्थ समझ सकता है। उनकी शिक्षा में यह संदेश भी मिलता है कि बाहरी वैभव और मोह से दूर रहकर सादगी और संतुलन का जीवन अपनाना ही वास्तविक आध्यात्मिकता है। समाज और संस्कृति का दस्तावेज है ये किताब यह किताब केवल धार्मिक या आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि अपने समय के समाज और संस्कृति का दस्तावेज भी है। इसमें दिखता है कि नाथ संप्रदाय में विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग शामिल थे। इससे यह संकेत मिलता है कि उस दौर में भी आध्यात्मिक परंपराएं सामाजिक सीमाओं को तोड़ने का प्रयास कर रही थीं। नाथ परंपरा ने साधारण लोगों, जुलाहों, किसानों और चरवाहों को भी आध्यात्मिक मार्ग में स्थान दिया। लोकभाषा और आसान शैली किताब की भाषा सरल है। इसमें भारी-भरकम दार्शनिक शब्दों की जगह सहज तरीका अपनाया गया है। यही वजह है कि पाठक इन कथाओं को पढ़ते समय केवल जानकारी ही नहीं प्राप्त करता, बल्कि लोकजीवन की जीवंतता भी महसूस करता है। लेखक ने लोकगाथाओं और संत परंपरा की कहानियों को इस तरह लिखा है कि वो रोचक लगती हैं और प्रेरित भी करती हैं। प्रेम और वैराग्य का संतुलन इस किताब की सबसे रोचक बात यह है कि इसमें प्रेम और वैराग्य दोनों साथ-साथ चलते हैं। एक ओर लोककथाएं प्रेम की तीव्रता और भावनात्मकता को दिखाती हैं, तो दूसरी ओर गोरखनाथ की शिक्षाएं वैराग्य और आत्मसंयम की ओर संकेत करती हैं। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि जीवन का संतुलन है। प्रेम मनुष्य को संवेदनशील बनाता है, जबकि वैराग्य उसे संतुलित और जागरूक बनाता है। किताब का यही संतुलन इसे अलग और अर्थपूर्ण बनाता है। आधुनिक समय में प्रासंगिकता आज के समय में जब रिश्तों में धैर्य कम और अपेक्षाएं अधिक हो गई हैं, तब ऐसी लोककथाएं हमें याद दिलाती हैं कि प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। इसी तरह संत गोरखनाथ की शिक्षाएं यह भी बताती हैं कि जीवन में सादगी, संयम और आत्मचिंतन का महत्व हमेशा बना रहता है। इसलिए यह किताब केवल अतीत की कहानियां नहीं बताती, बल्कि वर्तमान जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देती है। इसे क्यों पढ़ें? इसमें संत गोरखनाथ के प्रभाव से उपजी लोककथाओं को बेहद सहज अंदाज में लिखा गया है। यह केवल आध्यात्मिक विचार नहीं देती, बल्कि प्रेम, सादगी, समानता और आत्मचिंतन जैसे जीवन के जरूरी मूल्यों को भी समझाती है। मौजूदा वक्त में यह किताब और भी प्रासंगिक है, जो सोच को संतुलित और संवेदनशील बनाती है। किताब के बारे में मेरी राय ये किताब कोई भारी-भरकम लेक्चर नहीं देती, बल्कि हाथ पकड़कर गांव की गलियों में घुमाती है। हर कहानी में एक सबक छिपा है कि आस्था कोई बड़ी चीज नहीं, यह तो हमारे रोजमर्रा के हर छोटे-मोटे काम में है। किताब में कुछ कहानियां अचानक खत्म हो जाती हैं। अगर इसमें थोड़ा और तुलनात्मक इतिहास शामिल किया जाता तो यह ज्यादा इंटरेस्टिंग होता। किताब को पढ़ने में बोरियत नहीं महसूस होती है। अगर आप भी कभी सोचते हैं कि आस्था कहां बची है, तो ये किताब बताती है कि आपके आसपास, आपकी मिट्टी में, आपके सपनों में हर जगह आस्था बसी हुई है। अगर आप लोककथाओं, आस्था और इंसानी जज्बातों को पढ़ने के शौकीन हैं, तो ये किताब आपके लिए अनमोल है। ……………… ये खबर भी पढ़िए बुक रिव्यू- एक शानदार एपिक करियर कैसे बनाएं: सबसे जरूरी है जानना अपना पैशन और पर्पज, इसी से बनेगा ग्रोथ माइंडसेट, आएगा डिसिप्लिन अंकुर वारिकू ने इस किताब में अपनी जिंदगी के रियल एक्सपीरियंस शेयर किए हैं और बताया है कि अपना पैशन कैसे पहचानें। उन्होंने किताब में बताया है कि सक्सेस माइंडसेट कैसे बनाएं, अच्छी आदतें कैसे डेवलप करें और खुद को कैसे पहचानें। यह ट्रेडिशनल सेल्फ-हेल्प बुक नहीं, बल्कि एक एक्शन-ओरिएंटेड किताब है। आगे पढ़िए… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं… बुक रिव्यू: ताकत बाहर नहीं, भीतर है: हर दिन एक नया मौका है, कुछ सीखने, जीतने, विनम्र होने का, अपने मन की शक्ति को अनलॉक करें 1:31 कॉपी लिंक शेयर बुक रिव्यू- फीलिंग से हीलिंग तक: जो भी महसूस करते हैं, उसे दबाएं नहीं, समझें और सही दिशा दें, यही सिखाती है किताब ‘फील टू हील’ 1:49 कॉपी लिंक शेयर बुक रिव्यू- मंजिल तक पहुंचने का ‘फ्लाइट प्लान’: मुश्किलें तो आएंगी, लेकिन उनसे लड़ें कैसे, यही सीक्रेट बताती है ये किताब 1:27 कॉपी लिंक







