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Social Media Mental Health Impact: डिजिटल दुनिया की चकाचौंध भारतीय युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रही है. मशहूर डॉक्टर संजीव बगई ने चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया की लत के चलते युवाओं में डिप्रेशन, एंग्जायटी और अनिद्रा जैसी गंभीर समस्याएं पैर पसार रही हैं. साथ ही आपसी रिश्तों में भी कड़वाहट आ रही है. इस संकट से निपटने के लिए उन्होंने सरकार से सोशल मीडिया इस्तेमाल की उम्र सीमा तय करने और सख्त गाइडलाइंस बनाने की मांग की है. इसके साथ ही उन्होंने जोर दिया कि बच्चों को इस चक्रव्यूह से निकालने में माता-पिता और स्कूलों को आगे आना होगा.

दिल्ली: भारत में युवाओं के बीच मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. डिप्रेशन, एंग्जायटी और क्रॉनिक स्ट्रेस जैसी परेशानियां अब केवल उदासी या मूड स्विंग्स तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि युवाओं की सेहत, पढ़ाई, रिश्तों और भविष्य पर गहरा असर डाल रही हैं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं की वजह क्या है. इसी सवाल का जवाब जानने के लिए हमने बात की डॉ.संजीव बगई से. उन्होंने सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल को युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा बताया.

सोशल मीडिया की लत बन रही बड़ी समस्या
डॉ. संजीव बगई के मुताबिक, किशोर, युवा और खासकर युवा महिलाएं सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा समय बिता रही हैं. उन्होंने बताया कि कई अंतरराष्ट्रीय स्टडीज में सामने आया है कि 80% से ज्यादा किशोर सोशल मीडिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. भारत में भी स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाली बड़ी आबादी इस लत का शिकार बनती जा रही है. डॉक्टर के अनुसार, सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल दिमाग में डोपामाइन (Dopamine) का तेज उछाल पैदा करता है. जिसे हैप्पी हार्मोन कहा जाता है. यही वजह है कि बार-बार फोन चेक करने और रील्स देखने की आदत बन जाती है.

दिमाग और दिल दोनों पर पड़ रहा असर
डॉ. बगई ने बताया कि जरूरत से ज्यादा सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से दिमाग और शरीर दोनों प्रभावित होते हैं. खासकर रात में सोने से पहले घंटों तक मोबाइल चलाना सबसे ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है.
उनके मुताबिक,

  • इससे एंग्जायटी और पैनिक अटैक बढ़ सकते हैं
  • याददाश्त कमजोर हो सकती है
  • पढ़ाई और ध्यान लगाने की क्षमता कम हो सकती है
  • नींद का पैटर्न बिगड़ सकता है
  • लोगों से बातचीत और रिश्तों में दूरी बढ़ सकती है
  • लगातार खराब नींद से शरीर में कॉर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन बढ़ता है, जो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंचाता है.

रील्स की दुनिया में बच्चे खो रहे असली दुनिया
डॉ. संजीव बगई का मानना है कि कम उम्र में बच्चे सोशल मीडिया के जरिए एक अवास्तविक दुनिया Unreal World में जीने लगते हैं. लाइक्स, फॉलोअर्स और वायरल होने की दौड़ बच्चों पर मानसिक दबाव बनाती है. इससे वे अपने असली लक्ष्य, करियर और सामाजिक जिम्मेदारियों से भटक सकते हैं.उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी के लिए यह समझना जरूरी है कि जिंदगी सिर्फ रील्स, पोस्ट और लाइक्स तक सीमित नहीं है.

भारत में उम्र सीमा तय करने की वकालत
डॉ. बगई ने कई देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ देशों में किशोरों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल पर उम्र सीमा तय की गई है. उनका मानना है कि भारत में भी 15–16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कुछ प्रतिबंध या सख्त नियम होने चाहिए, ताकि बच्चों के मानसिक विकास पर नकारात्मक असर कम हो.

माता-पिता और स्कूल की अहम भूमिका
डॉ. बगई ने कहा कि केवल सरकार ही नहीं, बल्कि माता-पिता और स्कूलों की भी बड़ी जिम्मेदारी है. अभिभावकों को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए और सही मूल्य सिखाने चाहिए. वहीं स्कूलों में सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों पर अलग अध्याय पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि बच्चे शुरुआत से ही इसके फायदे और नुकसान समझ सकें.

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Amit ranjan

मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें

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Social Media Mental Health Impact: डिजिटल दुनिया की चकाचौंध भारतीय युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रही है. मशहूर डॉक्टर संजीव बगई ने चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया की लत के चलते युवाओं में डिप्रेशन, एंग्जायटी और अनिद्रा जैसी गंभीर समस्याएं पैर पसार रही हैं. साथ ही आपसी रिश्तों में भी कड़वाहट आ रही है. इस संकट से निपटने के लिए उन्होंने सरकार से सोशल मीडिया इस्तेमाल की उम्र सीमा तय करने और सख्त गाइडलाइंस बनाने की मांग की है. इसके साथ ही उन्होंने जोर दिया कि बच्चों को इस चक्रव्यूह से निकालने में माता-पिता और स्कूलों को आगे आना होगा.

दिल्ली: भारत में युवाओं के बीच मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. डिप्रेशन, एंग्जायटी और क्रॉनिक स्ट्रेस जैसी परेशानियां अब केवल उदासी या मूड स्विंग्स तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि युवाओं की सेहत, पढ़ाई, रिश्तों और भविष्य पर गहरा असर डाल रही हैं. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं की वजह क्या है. इसी सवाल का जवाब जानने के लिए हमने बात की डॉ.संजीव बगई से. उन्होंने सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल को युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा बताया.

सोशल मीडिया की लत बन रही बड़ी समस्या
डॉ. संजीव बगई के मुताबिक, किशोर, युवा और खासकर युवा महिलाएं सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा समय बिता रही हैं. उन्होंने बताया कि कई अंतरराष्ट्रीय स्टडीज में सामने आया है कि 80% से ज्यादा किशोर सोशल मीडिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. भारत में भी स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाली बड़ी आबादी इस लत का शिकार बनती जा रही है. डॉक्टर के अनुसार, सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल दिमाग में डोपामाइन (Dopamine) का तेज उछाल पैदा करता है. जिसे हैप्पी हार्मोन कहा जाता है. यही वजह है कि बार-बार फोन चेक करने और रील्स देखने की आदत बन जाती है.

दिमाग और दिल दोनों पर पड़ रहा असर
डॉ. बगई ने बताया कि जरूरत से ज्यादा सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से दिमाग और शरीर दोनों प्रभावित होते हैं. खासकर रात में सोने से पहले घंटों तक मोबाइल चलाना सबसे ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है.
उनके मुताबिक,

  • इससे एंग्जायटी और पैनिक अटैक बढ़ सकते हैं
  • याददाश्त कमजोर हो सकती है
  • पढ़ाई और ध्यान लगाने की क्षमता कम हो सकती है
  • नींद का पैटर्न बिगड़ सकता है
  • लोगों से बातचीत और रिश्तों में दूरी बढ़ सकती है
  • लगातार खराब नींद से शरीर में कॉर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन बढ़ता है, जो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंचाता है.

रील्स की दुनिया में बच्चे खो रहे असली दुनिया
डॉ. संजीव बगई का मानना है कि कम उम्र में बच्चे सोशल मीडिया के जरिए एक अवास्तविक दुनिया Unreal World में जीने लगते हैं. लाइक्स, फॉलोअर्स और वायरल होने की दौड़ बच्चों पर मानसिक दबाव बनाती है. इससे वे अपने असली लक्ष्य, करियर और सामाजिक जिम्मेदारियों से भटक सकते हैं.उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी के लिए यह समझना जरूरी है कि जिंदगी सिर्फ रील्स, पोस्ट और लाइक्स तक सीमित नहीं है.

भारत में उम्र सीमा तय करने की वकालत
डॉ. बगई ने कई देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ देशों में किशोरों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल पर उम्र सीमा तय की गई है. उनका मानना है कि भारत में भी 15–16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कुछ प्रतिबंध या सख्त नियम होने चाहिए, ताकि बच्चों के मानसिक विकास पर नकारात्मक असर कम हो.

माता-पिता और स्कूल की अहम भूमिका
डॉ. बगई ने कहा कि केवल सरकार ही नहीं, बल्कि माता-पिता और स्कूलों की भी बड़ी जिम्मेदारी है. अभिभावकों को बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए और सही मूल्य सिखाने चाहिए. वहीं स्कूलों में सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों पर अलग अध्याय पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि बच्चे शुरुआत से ही इसके फायदे और नुकसान समझ सकें.

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मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें

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