Gwalior High Court Restores Petition with Social Responsibility Condition

ग्वालियर5 मिनट पहले कॉपी लिंक ग्वालियर हाईकोर्ट का फाइल फोटो मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम फैसले में न्यायिक संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का अनोखा उदाहरण पेश किया है। कोर्ट ने साफ कहा कि वकील की गलती की सजा याचिकाकर्ता को नहीं दी जा सकती। मामला गोविंद स्वरूप श्रीवास्तव की याचिका से जुड़ा है, जो सुनवाई के दौरान उनके वकील के उपस्थित न रहने के कारण खारिज हो गई थी। बाद में बहाली के लिए दिया गया आवेदन भी सिंगल बेंच ने खारिज कर दिया था। डिवीजन बेंच ने दिया राहत का फैसला इस आदेश को चुनौती देने पर डिवीजन बेंच ने पाया कि वकील दूसरी अदालत में व्यस्त होने के कारण पेश नहीं हो सके थे। ऐसे में याचिकाकर्ता के अधिकारों को प्रभावित करना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने पूर्व आदेशों को निरस्त करते हुए याचिका को पुनः बहाल करने के निर्देश दिए। ‘सजा’ नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी की शर्त हालांकि, अदालत ने याचिका बहाल करते हुए एक विशेष शर्त भी जोड़ी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता या उसका वकील माधव अंध आश्रम जाकर कम से कम 2 हजार रुपए की खाद्य सामग्री प्रदान करे और वहां के बच्चों व जरूरतमंदों के साथ कम से कम एक घंटा समय बिताए। ‘सोशल ऑडिट’ को बढ़ावा अदालत ने स्पष्ट किया कि यह शर्त दंड नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन है। कोर्ट ने ‘सोशल ऑडिट’ की अवधारणा को बढ़ावा देते हुए कहा कि समाज के जिम्मेदार लोगों को समय-समय पर ऐसे संस्थानों का निरीक्षण करना चाहिए, ताकि वहां रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुधार हो सके। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Indore Bail Not Cancelled | Social Media Post No Proof

इंदौर3 घंटे पहले कॉपी लिंक शादी का झांसा देकर दुष्कर्म के आरोप में दर्ज प्रकरण में आरोपी दीपक विश्नोई की अग्रिम जमानत निरस्त करने की मांग को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी द्वारा व्हाट्सएप स्टेटस लगाने मात्र से पीड़िता या साक्ष्य प्रभावित होने का कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। दरअसल 25 वर्षीय पीड़िता ने जून 2025 में थाना बाणगंगा में देवास निवासी दीपक विश्नोई के खिलाफ वर्ष 2020 से 2024 के बीच शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने की एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोपी की ओर से एडवोकेट मनीष यादव और पं. करण बैरागी ने हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर कर तर्क दिया था कि दोनों पक्षों के बीच पैसों का लेन-देन विवाद है और इसी कारण पांच वर्ष पुराने घटनाक्रम को आधार बनाकर झूठी रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। बचाव पक्ष ने कोर्ट के समक्ष दोनों के विवाह से संबंधित फोटो भी प्रस्तुत किए थे। तर्कों से सहमत होकर कोर्ट ने पिछले साल में आरोपी को अग्रिम जमानत का लाभ दिया था। इसके बाद पीड़िता ने जमानत निरस्ती के लिए आवेदन प्रस्तुत कर आरोप लगाया कि जमानत मिलने के बाद आरोपी ने व्हाट्सएप स्टेटस पर द्विअर्थी शायरी पोस्ट कर उसे प्रभावित करने का प्रयास किया है, इसलिए जमानत निरस्त की जाए। इस पर आरोपी पक्ष के एडवोकेट ने जवाब में कहा कि संबंधित स्टेटस आरोपी के निजी मोबाइल पर लगाया गया था, जिसमें पीड़िता का नाम तक उल्लेखित नहीं है। मात्र किसी के द्वारा अपने मोबाइल पर स्टेटस लगाने से यह सिद्ध नहीं होता कि वह पीड़िता को प्रभावित करने का प्रयास है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस सुबोध अभ्यंकर ने जमानत निरस्ती आवेदन खारिज करते हुए आदेश में उल्लेख किया कि आरोपी द्वारा स्टेटस लगाए जाने से पीड़िता या साक्ष्य किस प्रकार प्रभावित हो सकते हैं, यह स्पष्ट नहीं किया गया। साथ ही कहा कि पीड़िता आरोपी का स्टेटस देखने के लिए बाध्य नहीं है। इन परिस्थितियों में जमानत निरस्त करने का कोई आधार नहीं बनता। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Doctors are prescribing fishing, gardening, and social service alongside medication; these can improve mental health.

Hindi News Happylife Doctors Are Prescribing Fishing, Gardening, And Social Service Alongside Medication; These Can Improve Mental Health. लंदन / वॉशिंगटन7 घंटे पहले कॉपी लिंक फिश एंड चैट सेशन में बुजुर्ग। ब्रिटेन के कैंट में रहने वाले स्टीफन (58) की पत्नी को हार्ट अटैक आया। इसके बाद वे मानसिक संकट में घिर गए। स्टीफन बताते हैं, ‘एक समय ऐसा आया था जब मुझे अपनी जिंदगी समझ ही नहीं आ रही थी। 50 साल के ली भी उन्हीं की तरह विषम परिस्थितियों से जूझ रहे थे। अवसाद हावी होने लगा था… दोनों को फैमिली डॉक्टर्स ने मछली पकड़ना, आर्ट ग्रुप, वॉकिंग ग्रुप और वॉलंटियरिंग से जुड़ने को कहा। यह सोशल प्रिस्क्राइविंग है… इलाज का पारंपरिक तरीका। दोनों ने फिशिंग चुनी। वे गैर लाभकारी संस्था ‘कास्ट ए थॉट’ से जुड़ गए। यहां उन्हें बचपन की पसंदीदा गतिविधि के साथ समान अनुभव वाले लोग भी मिले। स्टीफन कहते हैं, ‘यहां आकर लोगों से मिलना और पानी के किनारे बैठना जादू जैसा रहा। यह थेरेपिस्ट के सामने सूट पहनकर बैठने से कहीं आसान और असरदार है। इस सेशन का नाम ‘फिश एंड चैट’ रखा गया। दो घंटे फिशिंग होती है। फिर कैफे में कॉफी। दोस्त बनते हैं। कोई तय स्क्रिप्ट नहीं होती। दुनियाभर में हेल्थ केयर सिस्टम दबाव में हैं। कोविड के बाद वेटिंग लिस्ट लंबी हुई, स्टाफ की कमी बढ़ी। ऐसे में डॉक्टर ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग’ की ओर लौट रहे हैं। इसमें डॉक्टर मरीज की बीमारी के सामाजिक और मानसिक कारणों को समझते हुए उन्हें ऐसी गतिविधियों से जोड़ते हैं जो उनके अकेलेपन को दूर करें और मानसिक सेहत में सुधार लाएं। ब्रिटेन और नीदरलैंड्स में इसकी सफलता के बाद अमेरिका में पायलट शुरू हुए हैं। ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग यूएसए’ संगठन 2035 तक अमेरिकियों को कला, संगीत व प्रकृति आधारित उपचार दिलाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। रोमानिया व डेनमार्क में नए प्रोजेक्ट शुरू हुए। मकसद है पोस्टनेटल डिप्रेशन घटाना। नई मांओं को गाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। नीदरलैंड्स में साइक्लिंग क्लब, म्यूजियम विजिट, ताई ची जैसी एक्टिविटी पर सब्सिडी मिलती है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2030 तक दुनिया में करीब 1.1 करोड़ स्वास्थ्य कर्मियों की कमी होगी। ऐसे में बीमारियों को रोकने के लिए ‘रोकथाम और सामाजिक जुड़ाव’ ही सबसे सस्ता व प्रभावी रास्ता दिख रहा है। सोशल प्रिस्क्राइविंग यूएसए के कोफाउंडर एलन सीगल कहते हैं, ‘डिप्रेशन में उनके पास थेरेपी और दवा के बाद विकल्प जल्दी खत्म हो जाते हैं। कई लोग साइड इफेक्ट झेलते हैं। कई थेरेपिस्ट के पास नहीं जाना चाहते। उनके मुताबिक इलाज का बड़ा हिस्सा क्लिनिक के बाहर की जिंदगी में होता है। ऐसे में सोशल प्रिस्क्राइविंग बेहतर विकल्प बन सकता है।’ एक्टिविटी कोच डेव एलस्टोन कहते हैं, ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग उसी दौर की याद दिलाता है जब डॉक्टर घर-घर जाकर मरीजों की बातें सुना करते थे। डेव कहते हैं, ‘चाहे ताजी हवा से काम हो या गप्पे मारने से, सच तो यह है कि यह काम करता है… हमने लोगों को ठीक होते देखा है।’ दवाइयों की जरूरत कम पड़ रही, डिप्रेशन भी आध आधाः एक्सपर्ट यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर डेजी फैनकोर्ट के शोध के अनुसार, जो लोग महीने में कम से कम एक बार संगीत बजाने या बुनाई जैसी गतिविधियां करते हैं, उनमें डिप्रेशन का खतरा करीब आधा हो जाता है। ग्लोबल मेटा-एनालिसिस में पाया गया कि सर्जरी के बाद संगीत सुनने वाले मरीजों को कम दर्द हुआ और उन्हें दवाइयों की जरूरत भी कम पड़ी। यही वजह है कि डॉक्टर्स इसे महत्व दे रहे हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Successful People Comparison Anxiety; Social Media Self Worth

Hindi News Lifestyle Successful People Comparison Anxiety; Social Media Self Worth | Working Professional Stress 4 घंटे पहले कॉपी लिंक सवाल- मैं 26 साल की वर्किंग प्रोफेशनल हूं। मेरी प्रॉब्लम ये है कि मैं हर वक्त अपनी तुलना सक्सेसफुल लोगों से करती रहती हूं। फिर चाहे वो सेलिब्रिटीज हों या मेरे आसपास के लोग। मैं हर सफल व्यक्ति के पैरलल खुद को रखकर उससे कंपैरिजन करने लगती हूं। कई बार मैं देर रात तक उन्हें सोशल मीडिया पर स्टॉक करती रहती हूं, उनके वेकेशन के फोटोज देखती रहती हूं। सोचती हूं कि सब कितने खुश, कितने सक्सेसफुल हैं और मेरा जीवन कितना बोरिंग है। इससे मेरी सेल्फ वर्थ भी कम हो रही है। मैं क्या करूं? एक्सपर्ट- डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। जवाब- आप जो महसूस कर रही हैं, वह बहुत रियल और कॉमन है, खासतौर पर आज के सोशल मीडिया दौर में। अच्छी बात यह है कि ये कोई स्थायी समस्या नहीं है। यह एक समझने और बदलने योग्य पैटर्न है। मैं साइकोलॉजी के कुछ टूल्स और फ्रेमवर्क्स की मदद से आपको एक प्रैक्टिकल रोडमैप देने की कोशिश करूंगा। आपकी स्थिति की क्लिनिकल अंडरस्टैंडिंग सबसे पहले हम आपकी सिचुएशन को मनोविज्ञान के नजरिए से समझने की कोशिश करेंगे। आप ट्रिगर महसूस करती हैं। फिर आप सोशल मीडिया स्क्रॉल करती हैं। वहां आप दूसरों की ‘सक्सेस’ और उनकी ‘हैप्पी लाइफ’ देखती हैं। ये देखकर मन में ऑटोमैटिक ये ख्याल आते हैं- “सब मुझसे आगे हैं।” “मैं कुछ खास नहीं कर रही।” “मेरा जीवन बिल्कुल बोरिंग है।” साइकोलॉजिकल एनालिसिस: ऐसा क्यों हो रहा है? मनोविज्ञान में एक कॉन्सेप्ट है, सोशल कंपैरिजन थ्योरी। यह थ्योरी कहती है कि हम खुद को समझने के लिए दूसरों से तुलना करते हैं। लेकिन समस्या तब होती है, जब यह तुलना “अपवर्ड कंपैरिजन” बन जाती है। यानी हम हमेशा सिर्फ हमसे बेहतर, अमीर, सुंदर या सफल लोगों से ही तुलना करते हैं। अपवर्ड कंपैरिजन का प्रभाव अपवर्ड कंपैरिजन के कुछ ऐसे साइकोलॉजिकल प्रभाव हो सकते हैं- खुद को कमतर महसूस करना। यह सोचना कि “मैं पीछे रह गई।” हमेशा असंतुष्ट रहना। सोशल मीडिया की झूठी दुनिया सोशल मीडिया पर आप कुछ लोगों की जो जिंदगी देख रही हैं, वो उनकी पूरी लाइफ नहीं है। वो सिर्फ उतनी ही है, जो वो आपको दिखाना चाहते हैं। इसलिए हमें ये बात याद रखनी चाहिए- लोग सोशल मीडिया पर सच पोस्ट नहीं करते। लोग सोशल मीडिया पर अपना बेस्ट पोस्ट करते हैं। ज्यादा सोशल मीडिया यूज के नुकसान सोशल मीडिया का बहुत ज्यादा इस्तेमाल इसलिए खतरनाक है क्योंकि मेंटल, इमोशनल और हेल्थ संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। इससे सिर्फ सेल्फ वर्थ ही कम नहीं होती बल्कि नींद, भूख जैसे बेसिक हेल्थ पैरामीटर्स पर भी इसका नेगेटिव प्रभाव पड़ता है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें- डोपामिन लूप और स्टॉकिंग बिहेवियर सोशल मीडिया पर बार-बार किसी की फोटो, वीडियो और लाइफ अपडेट को देखते हुए हम एक तरह के डोपामिन लूप में फंसते जाते हैं। यह एक तरह का बिहेवियरल लूप बन जाता है- सोशल मीडिया पर फोटो देखना। फोटो से और जिज्ञासा होना। प्रोफाइल को आगे स्क्रॉल करना। और ज्यादा फोटो-वीडियो देखना। फिर अपनी लाइफ से तुलना करना। तुलना से दुख महसूस होना। फिर अपने लिए वैलिडेशन ढूंढना। इसके लिए और ज्यादा स्क्रॉल करना। एक बिहेवियरल लूप में फंसते जाना। सेल्फ वर्थ: सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 9 सवाल हैं। आपको इन सवालों को ध्यान से पढ़ना है और 0 से 3 के स्केल पर इसे रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए आपका जवाब अगर ‘बिल्कुल नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘बहुत ज्यादा’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। नंबर के हिसाब से उसका इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। अगर आपका टोटल स्कोर 0 से 8 के बीच में है तो ये सामान्य हल्का प्रभाव है। लेकिन अगर आपका स्कोर 19 से 27 के बीच है तो कंपैरिजन स्केल पर आपका स्कोर बहुत ज्यादा है। आप बहुत ज्यादा तुलना करती हैं और आपकी सेल्फ वर्थ कम है। ऐसे में आपको एक्टिव कदम उठाने की जरूरत है। 2. संभावित डायग्नोस्टिक फॉर्मुलेशन यह कोई स्पष्ट मानसिक बीमारी नहीं है। यह सिर्फ लो सेल्फ एस्टीम और गलत कंपैरिजन पैटर्न में फंसने का मामला है। हालांकि अगर यह पैटर्न ज्यादा बढ़ जाए और एडिक्टिव स्टेज तक पहुंच जाए तो ये जोखिम हो सकते हैं- एडजस्टमेंट डिफिकल्टीज माइल्ड डिप्रेसिव सिंपटम्स CBT आधारित सेल्फ हेल्प प्लान यहां मैं आपको कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी पर आधारित एक सेल्फ हेल्प प्लान दे रहा हूं। स्टेप 1 अवेयरनेस सबसे पहली और जरूरी चीज है सजग होना। जब भी मन में तुलना की भावना आए तो उसे अटेंशन दें। इस बात को नोट करें। जैसेकि आपने इंस्टाग्राम देखा और आपके मन में ख्याल आया कि ‘सब खुश हैं और मैं ही दुखी हूं’ तो इस बात को नोट करें। नोटिस करना ही बदलाव की दिशा में पहला कदम है। स्टेप 2 अपनी सोच को चुनौती देना अपने मन में आने वाले नकारात्मक ख्यालों को चुनौती दें। नेगेटिव ख्याल– “सब खुश हैं, मैं ही दुखी और अकेली हूं।” पॉजिटिव रीफ्रेमिंग– “लोग सिर्फ अपनी खुशी ही शेयर करते हैं, अपने स्ट्रगल शेयर नहीं करते।” नेगेटिव ख्याल– “सब आगे निकल रहे हैं। मैं ही पीछे रह गई हूं।” पॉजिटिव रीफ्रेमिंग– “हर सक्सेस की अपनी अलग टाइमलाइन होती है।” स्टेप 3 व्यवहार में बदलाव 1. सोशल मीडिया से जुड़े नए नियम अपने लिए सोशल मीडिया रूल बनाएं। दिन में सिर्फ दो बार सोशल मीडिया देखेंगी। हर बार सिर्फ 20 मिनट देखेंगी। रात 9 बजे के बाद सोशल मीडिया से दूर रहेंगी। 2. सोशल मीडिया का पैसिव नहीं, एक्टिव उपयोग आप सोशल मीडिया को सिर्फ दूसरों की जिंदगी देखने के लिए यूज नहीं करेंगी। यह पैसिव यूज है। आप उसका एक्टिव यूज करेंगी। सिर्फ देखने की बजाय खुद अर्थपूर्ण बातचीत या जानकारी डालेंगी। 3. कंपैरिजन डिटॉक्स एक्सरसाइज जब भी मन में दूसरों से तुलना का ख्याल आए तो खुद से पूछें- “क्या मैं पूरी कहानी देख पा रही हूं?” क्या मैं अपनी पूरी जिंदगी की तुलना किसी के
Political Ads on Social Media Need Certificate

Hindi News National Election Commission Strict: Political Ads On Social Media Need Certificate नई दिल्लीकुछ ही क्षण पहले कॉपी लिंक चुनाव आयोग (ECI) ने आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। अब सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर किसी भी पॉलिटिकल एड से पहले मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमेटी (MCMC) से परमिशन लेना जरूरी होगा। यह निर्देश पांच राज्यों असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों और छह राज्यों के उपचुनावों के लिए लागू होगा। आयोग के मुताबिक बिना प्रमाणन के कोई भी राजनीतिक विज्ञापन टीवी, रेडियो, सार्वजनिक स्थानों पर ऑडियो-वीडियो डिस्प्ले, ई-पेपर, बल्क SMS/वॉयस मैसेज, इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जारी नहीं किया जा सकेगा। पेड न्यूज और सोशल मीडिया पर निगरानी चुनाव आयोग ने MCMC को पेड न्यूज के मामलों पर कड़ी निगरानी रखने और आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। उम्मीदवारों को अपने नामांकन पत्र में अपने सभी आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी देना भी अनिवार्य होगा। खर्च का पूरा हिसाब देना होगा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77(1) और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत, राजनीतिक दलों को चुनाव खत्म होने के 75 दिनों के भीतर पूरा खर्च विवरण देना होगा। इसमें इंटरनेट और सोशल मीडिया पर विज्ञापन, कंटेंट तैयार करने और अकाउंट संचालन से जुड़े सभी खर्च शामिल होंगे। फेक न्यूज, भ्रामक जानकारी और दुष्प्रचार पर नियंत्रण के लिए 19 मार्च को आयोग ने सभी चुनावी राज्यों के अधिकारियों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के प्रतिनिधियों के साथ बैठक भी की। फोटो AI जनरेटेड। 5 राज्यों में अप्रैल में चुनाव अप्रैल में असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं। बंगाल में दो फेज 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग होगी। तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में सिंगल फेज में चुनाव होंगे। तमिलनाडु में 23 अप्रैल, केरल, असम और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को मतदान होगा। पांचों राज्यों का रिजल्ट 4 मई को आएगा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने 15 मार्च को इसका ऐलान किया था। पांच राज्यों-केंद्र शासित प्रदेश में 17.4 करोड़ मतदाता हैं। यहां 824 सीटों पर चुनाव होने हैं। 2021 में इन सभी पांच राज्यों के चुनाव का ऐलान 26 फरवरी को किया गया था। पिछली बार बंगाल में 8 चरणों में चुनाव हुए थे। ——————————————— ये खबर भी पढ़ें… ममता का ऐलान- SC-ST महिलाओं को हर महीने ₹1700 देंगे, बाकी को ₹1500 मिलेंगे, TMC घोषणापत्र में पक्के घर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया। ममता ने लक्ष्मी भंडार योजना के तहत महिलाओं को हर महीने मिलने वाली सहायता राशि 500-500 रुपए बढ़ाने का वादा किया है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Sant Gorakhnath Life Lessons; Yoga Social Equality

Hindi News Lifestyle Sant Gorakhnath Life Lessons; Yoga Social Equality | Spiritual Mental Health 3 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी कॉपी लिंक किताब- लोककथाएं प्रेम की और संत गोरखनाथ (लोर्स ऑफ लव एंड सैंट गोरखनाथ का हिंदी अनुवाद) लेखक- नलिन वर्मा, लालू प्रसाद यादव अनुवाद- विजय कुमार झा प्रकाशक- पेंगुइन मूल्य- 299 रुपए भारतीय संत परंपरा में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने सिर्फ आध्यात्मिक मार्ग नहीं दिखाया, बल्कि समाज और संस्कृति को भी प्रभावित किया। संत गोरखनाथ ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। ‘लोककथाएं प्रेम की और संत गोरखनाथ‘ किताब में गोरखनाथ के विचारों और लोकजीवन पर पड़े उनके प्रभाव को समझाया गया है। यह किताब बताती है कि गोरखनाथ केवल एक योगी या संत नहीं, बल्कि ऐसे विचारक थे, जिनकी शिक्षा ने समाज की सोच और जीवनशैली पर भी गहरा असर डाला। किताब क्या कहती है? यह किताब बताती है कि गोरखनाथ के लिए योग सिर्फ शरीर की कसरत नहीं, बल्कि मन को जीतने का रास्ता भी है। उनकी शिक्षाओं का मूल मंत्र है, बाहरी दिखावे को छोड़कर अपने भीतर की शक्ति को पहचानना। भारतीय योग परंपरा में संत गोरखनाथ का नाम अनुशासन और आत्मज्ञान का पर्याय है। समाज को जोड़ने का संदेश इस किताब का सबसे सशक्त पक्ष ‘समानता’ है। नाथ संप्रदाय ने उस दौर में जात-पात की बेड़ियां तोड़ीं, जब समाज में यह सब बहुत गहरे व्याप्त था। इसमें किसान, जुलाहे और चरवाहे सभी को बराबर का स्थान मिला। गोरखनाथ की यह समावेशी दृष्टि आज के दौर में भी उतनी ही जरूरी है। किताब के 9 सबक ग्राफिक में देखिए- योग और वैराग्य के संत गोरखनाथ भारतीय योग परंपरा के प्रमुख संत माने जाते हैं और नाथ संप्रदाय के सबसे प्रभावशाली गुरु के रूप में उनकी पहचान है। उनकी शिक्षा का मूल आधार योग, संयम और आत्मानुशासन है। उनका मानना था कि मनुष्य अपने भीतर की शक्ति को पहचानकर ही जीवन का सही अर्थ समझ सकता है। उनकी शिक्षा में यह संदेश भी मिलता है कि बाहरी वैभव और मोह से दूर रहकर सादगी और संतुलन का जीवन अपनाना ही वास्तविक आध्यात्मिकता है। समाज और संस्कृति का दस्तावेज है ये किताब यह किताब केवल धार्मिक या आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि अपने समय के समाज और संस्कृति का दस्तावेज भी है। इसमें दिखता है कि नाथ संप्रदाय में विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग शामिल थे। इससे यह संकेत मिलता है कि उस दौर में भी आध्यात्मिक परंपराएं सामाजिक सीमाओं को तोड़ने का प्रयास कर रही थीं। नाथ परंपरा ने साधारण लोगों, जुलाहों, किसानों और चरवाहों को भी आध्यात्मिक मार्ग में स्थान दिया। लोकभाषा और आसान शैली किताब की भाषा सरल है। इसमें भारी-भरकम दार्शनिक शब्दों की जगह सहज तरीका अपनाया गया है। यही वजह है कि पाठक इन कथाओं को पढ़ते समय केवल जानकारी ही नहीं प्राप्त करता, बल्कि लोकजीवन की जीवंतता भी महसूस करता है। लेखक ने लोकगाथाओं और संत परंपरा की कहानियों को इस तरह लिखा है कि वो रोचक लगती हैं और प्रेरित भी करती हैं। प्रेम और वैराग्य का संतुलन इस किताब की सबसे रोचक बात यह है कि इसमें प्रेम और वैराग्य दोनों साथ-साथ चलते हैं। एक ओर लोककथाएं प्रेम की तीव्रता और भावनात्मकता को दिखाती हैं, तो दूसरी ओर गोरखनाथ की शिक्षाएं वैराग्य और आत्मसंयम की ओर संकेत करती हैं। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि जीवन का संतुलन है। प्रेम मनुष्य को संवेदनशील बनाता है, जबकि वैराग्य उसे संतुलित और जागरूक बनाता है। किताब का यही संतुलन इसे अलग और अर्थपूर्ण बनाता है। आधुनिक समय में प्रासंगिकता आज के समय में जब रिश्तों में धैर्य कम और अपेक्षाएं अधिक हो गई हैं, तब ऐसी लोककथाएं हमें याद दिलाती हैं कि प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। इसी तरह संत गोरखनाथ की शिक्षाएं यह भी बताती हैं कि जीवन में सादगी, संयम और आत्मचिंतन का महत्व हमेशा बना रहता है। इसलिए यह किताब केवल अतीत की कहानियां नहीं बताती, बल्कि वर्तमान जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देती है। इसे क्यों पढ़ें? इसमें संत गोरखनाथ के प्रभाव से उपजी लोककथाओं को बेहद सहज अंदाज में लिखा गया है। यह केवल आध्यात्मिक विचार नहीं देती, बल्कि प्रेम, सादगी, समानता और आत्मचिंतन जैसे जीवन के जरूरी मूल्यों को भी समझाती है। मौजूदा वक्त में यह किताब और भी प्रासंगिक है, जो सोच को संतुलित और संवेदनशील बनाती है। किताब के बारे में मेरी राय ये किताब कोई भारी-भरकम लेक्चर नहीं देती, बल्कि हाथ पकड़कर गांव की गलियों में घुमाती है। हर कहानी में एक सबक छिपा है कि आस्था कोई बड़ी चीज नहीं, यह तो हमारे रोजमर्रा के हर छोटे-मोटे काम में है। किताब में कुछ कहानियां अचानक खत्म हो जाती हैं। अगर इसमें थोड़ा और तुलनात्मक इतिहास शामिल किया जाता तो यह ज्यादा इंटरेस्टिंग होता। किताब को पढ़ने में बोरियत नहीं महसूस होती है। अगर आप भी कभी सोचते हैं कि आस्था कहां बची है, तो ये किताब बताती है कि आपके आसपास, आपकी मिट्टी में, आपके सपनों में हर जगह आस्था बसी हुई है। अगर आप लोककथाओं, आस्था और इंसानी जज्बातों को पढ़ने के शौकीन हैं, तो ये किताब आपके लिए अनमोल है। ……………… ये खबर भी पढ़िए बुक रिव्यू- एक शानदार एपिक करियर कैसे बनाएं: सबसे जरूरी है जानना अपना पैशन और पर्पज, इसी से बनेगा ग्रोथ माइंडसेट, आएगा डिसिप्लिन अंकुर वारिकू ने इस किताब में अपनी जिंदगी के रियल एक्सपीरियंस शेयर किए हैं और बताया है कि अपना पैशन कैसे पहचानें। उन्होंने किताब में बताया है कि सक्सेस माइंडसेट कैसे बनाएं, अच्छी आदतें कैसे डेवलप करें और खुद को कैसे पहचानें। यह ट्रेडिशनल सेल्फ-हेल्प बुक नहीं, बल्कि एक एक्शन-ओरिएंटेड किताब है। आगे पढ़िए… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं… बुक रिव्यू: ताकत बाहर नहीं, भीतर है: हर दिन एक नया मौका है, कुछ सीखने, जीतने, विनम्र होने का, अपने मन की शक्ति को अनलॉक करें 1:31 कॉपी लिंक शेयर बुक रिव्यू- फीलिंग से हीलिंग तक: जो भी महसूस करते हैं, उसे दबाएं नहीं, समझें और सही दिशा दें, यही सिखाती है किताब ‘फील टू हील’ 1:49 कॉपी लिंक शेयर बुक रिव्यू- मंजिल तक पहुंचने का ‘फ्लाइट प्लान’: मुश्किलें तो आएंगी, लेकिन उनसे लड़ें कैसे, यही सीक्रेट बताती है ये किताब 1:27 कॉपी लिंक
Blunt Speaking Child Psychology; Social Skills Guidance

Hindi News Lifestyle Blunt Speaking Child Psychology; Social Skills Guidance | Comm Skill Parenting Tips 4 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल कॉपी लिंक सवाल- मैं पटना से हूं। मेरी 10 साल की बेटी बहुत होशियार, समझदार है। लेकिन उसकी एक आदत बहुत परेशान करने वाली है। वो जो सोचती है, फट से बोल देती है। अगर उसे किसी की ड्रेस अच्छी नहीं लगी तो सीधे कह देती है, “ये अच्छी नहीं है।” अगर कोई दोस्त गलत खेले तो कह देगी, “तुम्हें खेलना नहीं आता।” वह बोलने से पहले सोचती नहीं है। दोस्त उसकी बातों का बुरा मान जाते हैं। उसकी कुछ दोस्तियां भी टूट चुकी हैं। ये साफगोई है या मुंहफटपन। मैं कन्फ्यूज हूं। समझ नहीं पा रही, उसे कैसे गाइड करूं। मुझे क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- सवाल पूछने के लिए आपका शुक्रिया। सबसे पहले तो मैं आपको आश्वस्त करना चाहूंगी कि ये कोई ‘अवगुण’ नहीं है। ये आपकी बेटी की पर्सनैलिटी का एक ‘रॉ’ यानी कच्चा रूप है। 10 साल की उम्र में बच्चे अपने विचारों को साफ तरीके से रखना सीख रहे होते हैं। उनमें लॉजिकल ब्रेन विकसित हो रहा होता है। लेकिन ‘सोशल इंटेलिजेंस’ (सामाजिक समझ) अभी पूरी तरह मेच्यौर नहीं हुई होती है। उनमें अभी यह समझ पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती कि सच बोलने का तरीका भी मायने रखता है। साइकोलॉजी में इसे ‘सोशल फिल्टर डेवलपमेंट’ कहा जाता है। यह समझ जन्म से नहीं होती है, बल्कि धीरे-धीरे सीखने वाली चीज है। इसलिए बेटी को कम्युनिकेशन स्किल सिखाना जरूरी है। बच्चे के बिना फिल्टर बोलने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। आइए पहले इसे समझते हैं। बच्चे बिना फिल्टर के क्यों बोलते हैं? डेवलपमेंटल साइकोलॉजी के मुताबिक, टीनएज से पहले बच्चे दुनिया को ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ नजरिए से देखते हैं। उनके दिमाग में ‘सही’ और ‘गलत’ दो ही चीजें होती हैं। वह डिप्लोमेसी के महत्व को नहीं समझते हैं। उन्हें लगता है कि अगर कोई चीज बुरी दिख रही है, तो उसे बुरा कहना ही ईमानदारी है। वह ये नहीं समझ पाते कि उनके शब्द किसी के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा सकते हैं। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। क्या यह चिंता की बात है? यहां समझने वाली बात ये है कि अगर आपकी बच्ची जानबूझकर किसी को नीचा दिखाने या मजाक उड़ाने के लिए ऐसा करती है, तो यह बिहेवियरल प्रॉब्लम है। लेकिन अगर वह अनजाने में सिर्फ ‘सच’ कह रही है, तो यह केवल सोशल स्किल की कमी है। अच्छी बात यह है कि 10-12 साल की उम्र में इसे बहुत आसानी से सुधारा जा सकता है। ‘मुंहफट’ बच्चे को कैसे गाइड करें? सबसे पहले यह समझ लें कि आपकी बच्ची की ‘साफगोई‘ ही उसकी असली ताकत है। उसे बदलने की कोशिश करना उसके आत्मविश्वास को चोट पहुंचा सकता है। ऐसे में जरूरत उसे चुप कराने की नहीं, बल्कि उसे बातचीत का तरीका सिखाने की है। उसे समझाएं कि सच बोलना अच्छी बात है, लेकिन हर सच उसी रूप में और उसी समय बोलना जरूरी नहीं होता है। बोलने से पहले रुकना, सोचना और सामने वाले की भावना को समझना भी उतना ही जरूरी है। बच्ची को यह सिखाएं कि वह अपनी बात रखते समय लहजा नरम रखे। शब्दों का चुनाव सोच-समझकर करे और सामने वाले के नजरिए को भी समझे। आप रोल-प्ले, कहानियों और रोजमर्रा की छोटी घटनाओं के जरिए उसे यह कला सिखा सकती हैं। याद रखें, आपका उद्देश्य उसे बदलना नहीं, बल्कि उसकी बेबाकी को थोड़ा संवेदनशील बनाना है। नीचे दिए गए ग्राफिक में कुछ आसान और व्यवहारिक तरीके दिए गए हैं, जिनका ध्यान रखना जरूरी है। ‘सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात’ आपकी बेटी में ईमानदारी है, ये अच्छी बात है। लेकिन उसे ये नहीं पता कि ‘सच’ और ‘कड़वे सच’ के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है। संस्कृत का एक श्लोक है- “सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।” इसका अर्थ है, ‘’सच बोलो, मीठा बोलो। लेकिन ऐसा सच न बोलो, जो दिल को आहत करे।’’ बेटी को समझाएं कि सच बोले, लेकिन इसे ऐसे बोले कि सामने वाले का दिल न दुखे। उसे ये बातें उदाहरण के साथ समझाएं। जैसेकि– मान लो आपके पास एक खिलौना है। आपका कोई दोस्त कहे कि खिलौना खराब है तो आपको कैसा लगेगा? बुरा लगेगा न। वैसे ही हमें किसी को ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए, जिससे उसका दिल दुखे। जब क्लास में कोई स्पीच देता है तो टीचर अंत में हमेशा क्या कहती हैं– “वेरी गुड।” वो कभी ऐसे तो नहीं बोलतीं कि ये स्पीच गंदी थी, तुम्हें बोलना नहीं आता। वैसे ही हमें हमेशा दूसरों को इनकरेज करना चाहिए। अगर उन्होंने बहुत अच्छा नहीं बोला, अच्छा नहीं किया, तो भी हमें “वेरी गुड” ही बोलना चाहिए। तभी तो वो आगे और कोशिश करेंगे। मान लो, आपकी दोस्त ने एक ड्रॉइंग बनाई और आपको दिखाकर पूछा- “कैसी है?” तो आप क्या कहोगी? क्या ये कहना चाहिए कि ये पेंटिंग अच्छी नहीं लगी। नहीं न। हम यही कहेंगे, “ये तो बहुत सुंदर है। लेकिन अगर इसमें एक और पेड़ बना लो तो ये और सुंदर हो जाएगी।“ इस तरह हमने सच भी बोला, फीडबैक भी दिया और उसका दिल भी नहीं दुखाया। ‘रुको, सोचो, फिर बोलो’ का फॉर्मूला बताएं बच्ची को यह बताना जरूरी है कि बोलना एक जिम्मेदारी का काम है। उसे बताएं कि जो शब्द हम एक बार बोल देते हैं, वे कभी वापस नहीं आते। इसलिए प्रतिक्रिया देने से पहले थोड़ा रुकना और सोचना बहुत जरूरी है। उसे कम्युनिकेशन का ‘थिंक’ फॉर्मूला समझाएं। बताएं कि कुछ भी बोलने से पहले खुद से ये 5 सवाल जरूर पूछे- ‘मुंहफट’ बच्चों के साथ पेरेंट्स न करें ये गलतियां कई बार पेरेंट्स बच्चे को सुधारने के इरादे से ऐसी प्रतिक्रियाएं देते हैं, जो अनजाने में समस्या को और बढ़ा देती है। तुरंत डांटना, सबके सामने टोकना या बार-बार उसकी कमी गिनाना बच्चे को सुधारता नहीं, बल्कि उसे डिफेंसिव बना देता है। ऐसे में बच्चा या तो चुप हो जाता है या और ज्यादा जिद्दी। इसलिए सुधार का तरीका संतुलित होना चाहिए। इसलिए पेरेंट्स को कभी भी ये गलतियां नहीं करनी चाहिए- बच्ची को ‘मुंहफट’ या ‘बदतमीज’ न कहें। सबके
Ayesha Khan Sexual Comments & Rape Threats On Social Media

12 घंटे पहले कॉपी लिंक एक्ट्रेस आयशा खान ने हाल ही में बताया कि सोशल मीडिया पर अक्सर उन्हें बॉडी को लेकर सेक्शुअल कमेंट्स मिलते हैं और लगभग हर दिन उन्हें रेप की धमकियां भी दी जाती हैं। मोजो स्टोरी की समिट में आयशा ने कहा कि हाल ही में उन्होंने फिल्म धुरंधर के गाने शरारत की शूटिंग से जुड़ा एक अनुभव शेयर किया था। उन्होंने बताया था कि उस गाने की शूटिंग उन्होंने पीरियड्स के दौरान की थी। इसके बाद सोशल मीडिया पर उन्हें काफी ट्रोल किया गया। आयशा ने कहा कि उन्हें लगा कि उनके पीरियड्स पर होना अचानक एक नेशनल जोक बन गया है। एक्ट्रेस ने कहा कि सोशल मीडिया पर लोग उनके कपड़ों को लेकर भी कमेंट करते हैं। उन्होंने कहा, “मैं इंस्टाग्राम पर लगभग हर दिन अपनी बॉडी को लेकर सेक्शुअल कमेंट्स का सामना करती हूं। अगर मैं नॉर्मल टॉप पहनती हूं तो लोगों को समस्या होती है। अगर मैं स्कर्ट पहनती हूं तो भी लोगों को दिक्कत होती है। मुझे कुछ पोस्ट करने से पहले भी सोचना पड़ता है।” उन्होंने कहा कि कई बार इस तरह की बातें उन्हें इमोशनली परेशान करती हैं। उनके मुताबिक अगर किसी को कपड़े पहनने या फोटो पोस्ट करने से पहले सोचना पड़े, सिर्फ इसलिए कि लोग उसे सेक्शुअल तरीके से देखेंगे, तो यह एक दुखद स्थिति है। आयशा खान फिल्म ‘धुरंधर’ के गाने ‘शरारत’ में नजर आईं, जिसके लिए उन्हें काफी सराहना मिली। गलत कमेंट्स से डर लगता है: आयशा आयशा ने कहा कि कुछ दिनों में वह इन बातों को नजरअंदाज कर देती हैं, लेकिन कई बार ऐसे कमेंट्स ज्यादा परेशान करते हैं, खासकर जब लोग हिंसा की बात करते हैं। उन्होंने कहा, “जब लोग लिखते हैं कि अगर उनके पास ताकत होती तो वह कुछ भी कर सकते थे, तो यह डराने वाला होता है। क्योंकि यह असली लोग हैं जो हमारे आसपास ही रहते हैं।” लगभग हर दिन रेप की धमकियां भी मिलती हैं: आयशा समिट के दौरान आयशा से पूछा गया कि क्या उन्हें ऑनलाइन रेप की धमकियां मिलती हैं? इस पर उन्होंने कहा, “हां, लगभग हर दिन। मैं अभी अपना फोन खोलकर दिखा सकती हूं। यह अब बहुत नॉर्मल हो गया है।” उन्होंने कहा कि इंटरव्यू और सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग के सवाल अक्सर उठते हैं, लेकिन इस पर ज्यादा कार्रवाई नहीं होती। उनके मुताबिक यह कोई नई समस्या नहीं है। यह काफी समय से चली आ रही है। आयशा ने यह भी कहा कि यह समस्या सिर्फ उनके साथ नहीं है। पब्लिक लाइफ में रहने वाली लगभग हर महिला को इस तरह की ट्रोलिंग और धमकियों का सामना करना पड़ता है। एक्ट्रेस ने बताया- उनके साथ रेप की कोशिश हुई आयशा ने अपने जीवन की एक निजी घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनके साथ एक बार रेप की कोशिश भी हो चुकी है। उन्होंने कहा, “मैंने पहले भी एक इंटरव्यू में इसके बारे में बात की है। मैं इस विषय पर ज्यादा नहीं जाना चाहती। कुछ दिन ऐसे होते हैं जब यह घटना फिर याद आ जाती है और मन को परेशान करती है।” आयशा खान एक्ट्रेस, मॉडल और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं, जिन्हें रियलिटी शो ‘बिग बॉस 17’ से पहचान मिली। आयशा ने कहा कि ऑनलाइन धमकियों के असल जिंदगी में सच हो जाने का डर भी उन्हें रहता है। उन्होंने कहा कि जब कोई महिला सफर कर रही होती है या किसी फिल्म के सेट पर काम कर रही होती है, तब भी उसे याद रहता है कि ऐसे कमेंट करने वाले लोग असल में आसपास ही मौजूद हो सकते हैं। आयशा ने एक घटना का भी जिक्र किया जो शूटिंग के दौरान हुई थी। उन्होंने बताया कि वह एक फिल्म की शूटिंग कर रही थीं और उस दिन उनके पिता भी सेट पर मौजूद थे। उसी समय उन्होंने इंस्टाग्राम खोला। वहां एक ऐसा मैसेज दिखा जो उन्हें लंबे समय से मिल रहा था। उसमें वॉइस नोट भी थे। बाद में उन्हें पता चला कि वह मैसेज सेट पर काम करने वाले एक स्पॉट बॉय का था। उन्होंने तुरंत अपने पिता और प्रोडक्शन टीम को इसकी जानकारी दी। इसके बाद उस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की गई। आयशा ने कहा कि इस घटना से उन्हें यह एहसास हुआ कि ऑनलाइन ट्रोलिंग और धमकियां कभी-कभी असल जिंदगी के बहुत करीब भी हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति पब्लिक लाइफ में है और सोशल मीडिया अकाउंट पब्लिक है, तो वह हमेशा लोगों की नजर में रहता है। ऐसे में ट्रोलिंग और गलत कमेंट्स का खतरा भी बढ़ जाता है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Child Performance Anxiety; Social Shyness Vs Confidence

Hindi News Lifestyle Child Performance Anxiety; Social Shyness Vs Confidence | Healthy Parenting Tips 14 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल कॉपी लिंक सवाल- मैं दिल्ली से हूं। मेरा 6 साल का बेटा बहुत तेज और समझदार है। उसे कविताएं, कहानियां और स्कूल का काम बहुत अच्छे से याद रहता है। घर में वह पूरे आत्मविश्वास के साथ हमें सुनाता भी है, एक्टिंग भी करता है। लेकिन जैसे ही घर में मेहमान आते हैं या हम किसी रिश्तेदार के यहां जाते हैं और कोई उससे कुछ सुनाने या बोलने के लिए कहता है, तो उसका व्यवहार अचानक बदल जाता है। वह चुप हो जाता है, मेरे पीछे छिप जाता है या वहां से हटने की कोशिश करता है। कई बार लोग उसे ‘शर्मीला’ कहते हैं। मैं समझ नहीं पा रही हूं कि यह सिर्फ सामान्य शर्मीलापन है या कुछ और। एक मां के रूप में मुझे इस स्थिति को कैसे समझना और संभालना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- सबसे पहले तो मैं आपसे यह कहना चाहूंगी कि इसमें घबराने की बात नहीं है। 6 साल की उम्र में बच्चों का ऐसा व्यवहार सामान्य है। बेटा घर में आपके सामने खुलकर बोलता है। इसका मतलब है कि उसके अंदर क्षमता और कॉन्फिडेंस दोनों हैं। मेहमानों के सामने जो बदलाव आप उसमें देख रही हैं, वह अक्सर ‘सोशल शाइनेस‘ या ‘परफॉर्मेंस एंग्जाइटी‘ से जुड़ा होता है। बच्चों को जब लगता है कि लोग उन्हें देख रहे हैं, जज कर रहे हैं या उनसे उम्मीद कर रहे हैं तो वे असहज महसूस करते हैं। यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि बच्चों में विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है। हम इस बारे में विस्तार से बात करेंगे, लेकिन इसके पहले कुछ जरूरी बातें समझिए- अक्सर हम अनजाने में अपने बच्चे को एक ‘परफॉर्मिंग आर्टिस्ट’ की तरह देखने लगते हैं, जिससे हमें हर महफिल में उससे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने की उम्मीद होने लगती है। कई बार बच्चा हमारी ‘सोशल इमेज’ को बेहतर बनाने का एक जरिया मात्र बनकर रह जाता है, जहां हम चाहते हैं कि वह मेहमानों के सामने अच्छा परफॉर्म करे ताकि हमारी पेरेंटिंग की तारीफ हो। हमें यह समझना होगा कि बच्चा कोई ‘रोबोट’ नहीं है, जो रिमोट का बटन दबते ही हंसने लगे या कविता सुनाने लगे। हर बच्चे का अपना एक स्वभाव और इच्छा होती है। उसे यह हक है कि जब उसका मन न हो, तो वह चुप रहे या अपने लिए थोड़ा एकांत चुन सके। एक 6 साल के मासूम के लिए अजनबियों की भीड़ और उनकी उम्मीद भरी नजरें काफी डरावनी हो सकती हैं। कभी-कभी बच्चे के मन में यह डर भी आ सकता है कि अगर उसने कोई गलती की या लाइन भूल गया, तो बाद में उसे डांट या नाराजगी का सामना करना पड़ेगा। कुल मिलाकर, हमें बच्चे के मानसिक दायरे और उसकी सहजता का सम्मान करना चाहिए, ताकि वह दबाव में नहीं बल्कि खुशी से अपनी बात रख सके। दबाव बनाना, पेरेंटिंग का हेल्दी तरीका नहीं अक्सर पेरेंट्स मेहमानों के सामने बच्चे की प्रतिभा का प्रदर्शन करके ‘गुड पेरेंटिंग’ का सर्टिफिकेट चाहते हैं। वे चाहते हैं कि लोग कहें, “वाह! आपका बच्चा कितना टैलेंटेड है।” लेकिन इस दिखावे की दौड़ में हम यह भूल जाते हैं कि बच्चा कोई ‘परफॉर्मिंग आर्टिस्ट’ नहीं है। जब हम बच्चे को सबके सामने परफॉर्म करने के लिए मजबूर करते हैं, तो अनजाने में उसे यह मैसेज दे रहे होते हैं कि उसकी वैल्यू तभी है, जब वह दूसरों को खुश करे या ‘परफॉर्म’ करे। इसलिए सबसे पहले तो आप मेहमानों के सामने जबरदस्ती कुछ सुनाने का प्रेशर देना बंद करें। ये पेरेंटिंग का हेल्दी तरीका नहीं है। आइए, अब बच्चे की चुप्पी का कारण समझते हैं। बच्चे की चुप्पी का कारण समझें बच्चा जब मेहमानों के सामने छिपता है तो वह खुद को ‘इनसिक्योर’ महसूस करता है। 6 साल की उम्र में बच्चे अपनी पहचान को लेकर जागरूक होने लगते हैं। उन्हें डर होता है कि अगर उन्होंने कुछ गलत सुनाया, तो लोग क्या सोचेंगे या उस पर हंसेंगे? बच्चे अपने घर में पेरेंट्स के सामने तो सहज होते हैं, लेकिन बाहरी माहौल में उन्हें थोड़ी इनसिक्योरिटी महसूस हो सकती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। क्या यह चिंता की बात है? अगर आपका बच्चा स्कूल में सामान्य रूप से बात करता है, दोस्तों के साथ खेलता है और घर में खुलकर बात करता है तो यह केवल ‘सिचुएशनल शाइनेस’ हो सकती है। यह स्थिति तब चिंताजनक हो सकती है, जब बच्चा हर वक्त, हर जगह चुप रहे, दोस्तों से भी न मिले या लगातार डरा हुआ दिखे। आपके बताए अनुसार, अभी यह एक सामान्य सामाजिक झिझक लगती है। आइए, अब समझते हैं कि इस स्थिति को कैसे हैंडल करना चाहिए। बच्चे में साेशल कॉन्फिडेंस कैसे बढ़ाएं? बच्चे को किसी ‘परफॉर्मिंग आर्टिस्ट’ की तरह पेश करने की बजाय उसे मेहमानों के सामने सहज महसूस कराना जरूरी है। जब वह मेहमानों के सामने चुप हो तो ये काम न करें- उसे डांटें नहीं। ‘शर्मीला’ न कहें। इसके बजाय उसका सपोर्ट करें। साथ ही कुछ बातों का खास ख्याल रखें। आइए, अब कुछ जरूरी पॉइंट्स को विस्तार से समझते हैं। उसे ‘शर्मीला’ न कहें जब आप मेहमानों के सामने कहती हैं, “पता नहीं इसे क्या हो गया, ये बहुत शर्मीला है,” तो बच्चा मान लेता है कि वह वाकई ऐसा ही है। वह इस ‘शर्मीलेपन’ को अपनी पहचान बना लेता है। इसके बजाय कहें, “इसे अभी थोड़ा समय चाहिए, यह थोड़ी देर में बात करेगा।” मेहमानों को ‘ऑडियंस’ न बनाएं अक्सर हम बच्चे से कहते हैं, “चलो अंकल को पोएम सुनाओ।” इससे बच्चे को लगता है कि उसे जज किया जा रहा है। इसके बजाय बातचीत को सामान्य रखें। उसे सीधे कुछ सुनाने को कहने के बजाय मेहमानों के साथ बैठने को कहें। इससे उसकी झिझक कम होगी। प्रैक्टिस को मजेदार बनाएं घर पर ‘फेक पार्टी’ का खेल खेलें। आप मेहमान बनें और उसे होस्ट बनाएं। बच्चे को सिखाएं कि नमस्ते कैसे करते हैं या नाम कैसे बताते हैं। जब वह खेल-खेल में यह सीखेगा, तो मेहमानों के सामने उसे डर नहीं लगेगा। जबरदस्ती न करें अगर बच्चा रो रहा है या
NCERT Class 8 Social Science Chapter Removed Over Judicial Corruption Controversy

Hindi News National NCERT Class 8 Social Science Chapter Removed Over Judicial Corruption Controversy 5 मिनट पहले कॉपी लिंक यह पहली बार है जब 8वीं के बच्चे ज्यूडीशियरी में करप्शन क्या होता है इसके बारे में पढ़ेंगे। क्लास 8 की सोशल साइंस की टेक्स्टबुक में ‘ज्यूडीशियल करप्शन’ विवाद पर NCERT ने बुधवार को पहली प्रतिक्रिया दी। NCERT ने कहा कि वे ज्यूडिशियरी का बहुत सम्मान करते हैं। किताब में गलती अनजाने में हुई है और NCERT को उस चैप्टर में गलत मटीरियल शामिल करने का अफसोस है। NCERT ने 24 फरवरी को क्लास 8 के स्टूडेंट्स के लिए सोशल साइंस की नई टेक्स्टबुक जारी की थी। ये किताब एकेडमिक सेशन 2026-27 से स्कूलों में पढ़ाई जानी थी। इसका पहला पार्ट जुलाई 2025 में रिलीज किया गया था। किताब का नाम ‘एक्सप्लोरिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड पार्ट 2’ है। इसमें ‘द रोल ऑफ द ज्यूडीशियरी इन अवर सोसायटी’ चैप्टर के अंदर ‘करप्शन इन द ज्यूडिशियरी’ का टॉपिक जोड़ा गया है। इसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार, बड़ी संख्या में पेंडिंग मामले और जजों की भारी कमी ज्यूडिशियल सिस्टम के सामने प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं। विवाद बढ़ने के बाद NCERT ने किताब की बिक्री पर रोक लगा दी है। साथ ही कहा कि, विवादित चैप्टर को फिर से लिखा जाएगा। किताब का वो हिस्सा जिसमें करप्शन और पेंडिंग केस का जिक्र है। अब पढ़िए NCERT का पूरा बयान ‘तय प्रोसेस के अनुसार, NCERT ने 24 फरवरी को क्लास 8 के लिए सोशल साइंस की टेक्स्टबुक, एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड, वॉल्यूम II निकाली। टेक्स्टबुक मिलने पर यह देखा गया कि कुछ गलत टेक्स्ट मटीरियल अनजाने में चैप्टर नंबर 4 में आ गया। मिनिस्ट्री ऑफ़ एजुकेशन ने भी ऐसा ही ऑब्ज़र्वेशन किया और निर्देश दिया कि अगले ऑर्डर तक इस किताब का डिस्ट्रीब्यूशन पूरी तरह से रोक दिया जाए। NCERT दोहराता है कि नई टेक्स्टबुक्स का मकसद संवैधानिक अधिकारों को मजबूत करना है। स्टूडेंट्स के बीच लिटरेसी, इंस्टीट्यूशनल रिस्पेक्ट, और डेमोक्रेटिक पार्टिसिपेशन की जानकारी देना था। हमारा किसी भी कॉन्स्टिट्यूशनल बॉडी के अधिकार पर सवाल उठाने या उसे कम करने का कोई इरादा नहीं है। NCERT कंस्ट्रक्टिव फीडबैक के लिए तैयार है। इसलिए विवादित चैप्टर को सही अथॉरिटी से सलाह लेकर फिर से लिखा जाएगा और एकेडमिक सेशन 2026-27 के शुरू होने पर क्लास 8 के स्टूडेंट्स को अवेलेबल कराया जाएगा। NCERT एक बार फिर इस फैसले की गलती पर अफसोस जताता है।’ नई किताब में ज्यूडीशियरी से जुड़े अहम पॉइंट्स… इसमें कोर्ट की हायरार्की और न्याय तक पहुंच को समझाने से ज्यादा ज्यूडिशियल सिस्टम के सामने आने वाली चुनौतियों जैसे करप्शन और केस बैकलॉग को बताया गया है। करप्शन वाले सेक्शन में बताया गया है कि जज एक कोड ऑफ कंडक्ट से बंधे होते हैं जो न केवल कोर्ट में बल्कि कोर्ट के बाहर भी उनके व्यवहार को कंट्रोल करता है। ज्यूडिशियरी के अंदरूनी अकाउंटेबिलिटी सिस्टम को भी समझाया गया है। सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रीवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (CPGRAMS) के जरिए शिकायतें लेने के तय तरीके भी बताए गए हैं। किताब के मुताबिक CPGRAMS सिस्टम के जरिए 2017 और 2021 के बीच 1,600 ज्यादा शिकायतें मिली थीं। किताब में गंभीर मामलों में जजों को हटाने के संवैधानिक नियम के बारे में भी बताया गया है कि पार्लियामेंट इंपीचमेंट मोशन पास करके जज को हटा सकती है। बच्चे पढ़ेंगे कि ऐसे मोशन पर सही जांच के बाद ही विचार किया जाता है। इस दौरान जज को मामले में अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाता है। चैप्टर में लिखा है- लोग ज्यूडिशियरी के अलग-अलग लेवल पर करप्शन का सामना करते हैं। गरीबों और जरूरतमंदों की न्याय तक पहुंच की समस्या और बिगड़ सकती है। यह भी बताया है कि राज्य और केंद्र ट्रांसपेरेंसी और पब्लिक ट्रस्ट को मजबूत करने की कोशिशें कर रहे हैं। इसमें टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल और करप्शन के मामलों के खिलाफ फास्ट एक्शन लेना शामिल है। किताब में पूर्व CJI बीआर गवई का भी जिक्र किताब में भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई का भी जिक्र है, जिन्होंने जुलाई 2025 में कहा था कि ज्यूडिशियरी के अंदर करप्शन और गलत कामों के मामलों का पब्लिक ट्रस्ट पर बुरा असर पड़ता है। उन्होंने कहा था, “हालांकि, इस ट्रस्ट को फिर से बनाने का रास्ता इन मुद्दों को सुलझाने के लिए उठाए गए तेज, निर्णायक और ट्रांसपेरेंट एक्शन में है… ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी डेमोक्रेटिक गुण हैं।” CJI बोले- न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं देंगे सिब्बल ने CJI सूर्यकांत, जस्टिस विपुल एम पंचोली और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच को बताया कि क्लास 8 के बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जा रहा है। यह निंदनीय है। सिंघवी ने कहा कि NCERT ने मान लिया है कि राजनीति, ब्यूरोक्रेसी और अन्य संस्थानों में भ्रष्टाचार है ही नहीं। इसपर CJI सूर्यकांत ने कहा- दुनिया में किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। यह एक सोची-समझी और गहरी साजिश लगती है। मुझे पता है इससे कैसे निपटना है।मैं यह केस खुद हैंडल करूंगा। हम इस बारे में और कुछ नहीं कहना चाहते। NCERT की किताब वेबसाइट पर मौजूद नहीं NCERT की 8वीं क्लास की सोशल साइंस का पार्ट 2 इसी हफ्ते जारी हुआ था। CJI की टिप्पणी के बाद ये किताब NCERT की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है। एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक किताबों की ऑफलाइन बिक्री भी मंगलवार 24 फरवरी से बंद कर दी गई है। हालांकि अब तक NCERT की तरफ इसको लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। NCERT की वेबसाइट पर किताब का दूसरा पार्ट लिस्ट में मौजूद नहीं है। NCERT ने नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क यानी NCF और NEP-2020 के तहत सभी क्लासेज की नई किताबें तैयार की हैं। कोरोना महामारी के बाद पुरानी किताबों के टॉपिक्स को बदलकर नए टॉपिक्स किताबों में जोड़े जा रहे हैं। पहली से 8वीं क्लास तक की नई किताबें 2025 में ही पब्लिश की जा चुकी हैं। ——————— दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…









