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Sweden Ministers Baby Speech: Mom Career Not Hindered

Sweden Ministers Baby Speech: Mom Career Not Hindered

6 मिनट पहले कॉपी लिंक स्वीडन की जलवायु मंत्री रोमिना पोरमोख्तारी अपने तीन महीने के बेटे एडम को लेकर यूरोपीय संघ (EU) के जलवायु मंत्रियों की बैठक में पहुंचीं। लक्जमबर्ग में गुरुवार को हुई इस बैठक का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में रोमिना अपने बेटे को गोद में लेकर मीटिंग में हिस्सा लेती और भाषण देती नजर आ रही हैं। इस दौरान वह बच्चे को शांत भी कराती रहीं, लेकिन साथ ही बैठक में अपनी बात भी रखती रहीं। रॉयटर्स से बातचीत में पोरमोख्तारी ने कहा कि उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया, ताकि यह मैसेज दिया जा सके कि महिलाओं को करियर और परिवार में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। उनका कहना था कि मां बनने का मतलब यह नहीं है कि किसी महिला का करियर रुक जाए। EU काउंसिल के एक अधिकारी के मुताबिक, उनकी जानकारी में पहली बार किसी EU मंत्रियों की बैठक में एक बच्चा शामिल हुआ है। बेटे के साथ EU मीटिंग में रोमिना… देखिए 2 तस्वीरें यूरोपीय संघ की जलवायु समिट के दौरान स्वीडिश मंत्री रोमिना अपनी बात रखती और बच्चे को चुप कराती दिख रही हैं। EU समिट खत्म होने के बाद रोमिना ने पत्रकारों से बात करते हुए बताया कि वह ये दिखाना चाहती थी कि मां बनने के बाद करियर खत्म नहीं होता है। सोशल मीडिया पर लोगों ने मंत्री की सरहाना की सोशल मीडिया पर कई लोगों ने स्वीडन की मंत्री के इस कदम की तारीफ की है। लोगों ने इसे कामकाजी महिलाओं के लिए प्रेरणादायक बताया। उनका कहना है कि मां बनने के बाद भी महिलाएं परिवार और करियर दोनों की जिम्मेदारियां एक साथ निभा सकती हैं। बैठक से पहले पत्रकारों से बातचीत में रोमिना पोरमोख्तारी ने कहा कि वह यही मैसेज देना चाहती हैं कि मां बनने के बाद भी महिलाएं सार्वजनिक जीवन और नौकरी में सक्रिय रह सकती हैं। उन्होंने कहा कि यूरोप में परिवार के हित में बनाई गई नीतियां माता-पिता को बच्चों की देखभाल और काम के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद करती हैं। रोमिना ने अपने पार्टनर का जिक्र करते हुए कहा, “सिर्फ सरकार की नीतियां ही काफी नहीं होतीं। इसके लिए ऐसा साथी भी होना चाहिए, जो पुराने विचारों वाला न हो, बल्कि आधुनिक सोच रखता हो और जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो।” उन्होंने कहा कि अब स्वीडन में पिता का बच्चे की देखभाल के लिए घर पर रहना पहले जितना असामान्य या विवादित नहीं माना जाता। यह बदलाव देश की पारिवारिक नीतियों और समाज की बदलती सोच का नतीजा है। पोरमोख्तारी स्वीडन की सबसे युवा मंत्री हैं रोमिना पोरमोख्तारी 2022 में सासंद बनी थीं। उसे साल उन्हें सरकार में मंत्री बनाया गया। उस समय वह देश के इतिहास की सबसे कम उम्र की मंत्री बनी थीं। हाल ही में वह पैरेंटल लीव पूरी कर काम पर लौटी हैं। उनके पति फिलहाल स्वीडन में सितंबर में होने वाले चुनाव तक पैरेंटल लीव पर हैं। वह भी लक्जमबर्ग पहुंचे थे और बैठक के दौरान एडम की देखभाल कर रहे थे। पोरमोख्तारी का कहना है कि उनके सहयोगियों का समर्थन भी इसे आसान बनाता है। रोमिना पोरमोख्तारी स्वीडन के इतिहास में सबसे युवा नेता रही हैं। स्वीडन में माता-पिता बनने पर 16 महीने की पेड लीव स्वीडन उन देशों में शामिल है जहां माता-पिता को बच्चों की देखभाल के लिए सबसे ज्यादा सुविधाएं मिलती हैं। इन सुविधाओं का खर्च सरकार उठाती है और इन दिनों यह मुद्दा वहां चुनावी बहस का भी हिस्सा बना हुआ है। स्वीडन में माता-पिता को बच्चे के जन्म के बाद करीब 16 महीने की सवेतन छुट्टी (पेड लीव) मिलती है। इसमें 90 दिन सिर्फ मां के लिए और 90 दिन सिर्फ पिता के लिए तय होते हैं। बाकी करीब 300 दिन दोनों अपनी जरूरत के हिसाब से आपस में बांट सकते हैं। ये छुट्टियां एक-दूसरे को नहीं दी जा सकतीं। अगर कोई अपनी तय छुट्टी नहीं लेता, तो वह खत्म हो जाती है। पिता के लिए तय इन छुट्टियों को आमतौर पर ‘डैड मंथ्स’ कहा जाता है। इसका मकसद यह है कि पिता भी बच्चों की परवरिश में बराबर की जिम्मेदारी निभाएं। इटली, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसे उदाहरण 2010: इटली की सांसद बच्ची को लेकर यूरोपीय संसद पहुंचीं इटली की यूरोपीय सांसद लिसिया रोंजुली अपनी छह हफ्ते की बेटी विट्टोरिया को गोद में लेकर यूरोपीय संसद की कार्यवाही में शामिल हुई थीं। उस दौरान उनकी बच्ची उनकी गोद में ही बैठी रही, जबकि रोंजुली संसद में वोटिंग और बहस में हिस्सा लेती रहीं। तब पहली बार था जब कोई सांसद यूरोपीय संसद की कार्यवाही में शामिल हुई। बाद में भी वह कई मौके पर ऐसा करती नजर आईं। यूरोपीय संसद की कार्यवाही के दौरान इटली की सांसद लिसिया रोंजुली की बेटी विट्टोरिया सदन के अंदर। यह तस्वीर 19 नवंबर 2013 को फ्रांस के स्ट्रासबर्ग में ली गई थी। 2018: न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री 3 महीने की बेटी के साथ UN पहुंचीं सितंबर 2018 में न्यूजीलैंड की तत्कालीन प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न अपनी तीन महीने की बेटी नेवे को लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) पहुंची थीं। ऐसा करने वाली वह दुनिया की पहली निर्वाचित महिला प्रधानमंत्री बनी थीं। उस समय उनके पार्टनर क्लार्क गेफोर्ड भी न्यूयॉर्क गए थे और बैठकों के दौरान बेटी की देखभाल करते थे। जेसिंडा ने कहा था कि मां बनने के बाद भी महिलाएं दुनिया की सबसे बड़ी जिम्मेदारियां निभा सकती हैं। 2017: ऑस्ट्रेलियाई सांसद ने संसद में बच्चे को स्तनपान कराया जून 2017 में ऑस्ट्रेलिया की सीनेटर लारिसा वॉटर्स ने संसद की कार्यवाही के दौरान अपनी दो महीने की बेटी आलिया जॉय को स्तनपान कराते हुए भाषण दिया था। उस समय ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में संसद में स्तनपान कराने की अनुमति देने वाला नियम लागू किया था। उनकी तस्वीरें दुनियाभर में वायरल हुईं और उन्हें कामकाजी माताओं के लिए एक मजबूत संदेश माना गया। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

Sweden Ministers Baby Speech: Mom Career Not Hindered

Sweden Ministers Baby Speech: Mom Career Not Hindered

12 मिनट पहले कॉपी लिंक स्वीडन की जलवायु मंत्री रोमिना पोरमोख्तारी अपने तीन महीने के बेटे एडम को लेकर यूरोपीय संघ (EU) के जलवायु मंत्रियों की बैठक में पहुंचीं। लक्जमबर्ग में गुरुवार को हुई इस बैठक का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में रोमिना अपने बेटे को गोद में लेकर मीटिंग में हिस्सा लेती और भाषण देती नजर आ रही हैं। इस दौरान वह बच्चे को शांत भी कराती रहीं, लेकिन साथ ही बैठक में अपनी बात भी रखती रहीं। रॉयटर्स से बातचीत में पोरमोख्तारी ने कहा कि उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया, ताकि यह मैसेज दिया जा सके कि महिलाओं को करियर और परिवार में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। उनका कहना था कि मां बनने का मतलब यह नहीं है कि किसी महिला का करियर रुक जाए। EU काउंसिल के एक अधिकारी के मुताबिक, उनकी जानकारी में पहली बार किसी EU मंत्रियों की बैठक में एक बच्चा शामिल हुआ है। बेटे के साथ EU मीटिंग में रोमिना… देखिए 2 तस्वीरें यूरोपीय संघ की जलवायु समिट के दौरान स्वीडिश मंत्री रोमिना अपनी बात रखती और बच्चे को चुप कराती दिख रही हैं। EU समिट खत्म होने के बाद रोमिना ने पत्रकारों से बात करते हुए बताया कि वह ये दिखाना चाहती थी कि मां बनने के बाद करियर खत्म नहीं होता है। सोशल मीडिया पर लोगों ने मंत्री की सरहाना की सोशल मीडिया पर कई लोगों ने स्वीडन की मंत्री के इस कदम की तारीफ की है। लोगों ने इसे कामकाजी महिलाओं के लिए प्रेरणादायक बताया। उनका कहना है कि मां बनने के बाद भी महिलाएं परिवार और करियर दोनों की जिम्मेदारियां एक साथ निभा सकती हैं। बैठक से पहले पत्रकारों से बातचीत में रोमिना पोरमोख्तारी ने कहा कि वह यही मैसेज देना चाहती हैं कि मां बनने के बाद भी महिलाएं सार्वजनिक जीवन और नौकरी में सक्रिय रह सकती हैं। उन्होंने कहा कि यूरोप में परिवार के हित में बनाई गई नीतियां माता-पिता को बच्चों की देखभाल और काम के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद करती हैं। रोमिना ने अपने पार्टनर का जिक्र करते हुए कहा, “सिर्फ सरकार की नीतियां ही काफी नहीं होतीं। इसके लिए ऐसा साथी भी होना चाहिए, जो पुराने विचारों वाला न हो, बल्कि आधुनिक सोच रखता हो और जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो।” उन्होंने कहा कि अब स्वीडन में पिता का बच्चे की देखभाल के लिए घर पर रहना पहले जितना असामान्य या विवादित नहीं माना जाता। यह बदलाव देश की पारिवारिक नीतियों और समाज की बदलती सोच का नतीजा है। पोरमोख्तारी स्वीडन की सबसे युवा मंत्री हैं रोमिना पोरमोख्तारी 2022 में सासंद बनी थीं। उसे साल उन्हें सरकार में मंत्री बनाया गया। उस समय वह देश के इतिहास की सबसे कम उम्र की मंत्री बनी थीं। हाल ही में वह पैरेंटल लीव पूरी कर काम पर लौटी हैं। उनके पति फिलहाल स्वीडन में सितंबर में होने वाले चुनाव तक पैरेंटल लीव पर हैं। वह भी लक्जमबर्ग पहुंचे थे और बैठक के दौरान एडम की देखभाल कर रहे थे। पोरमोख्तारी का कहना है कि उनके सहयोगियों का समर्थन भी इसे आसान बनाता है। रोमिना पोरमोख्तारी स्वीडन के इतिहास में सबसे युवा नेता रही हैं। स्वीडन में माता-पिता बनने पर 16 महीने की पेड लीव स्वीडन उन देशों में शामिल है जहां माता-पिता को बच्चों की देखभाल के लिए सबसे ज्यादा सुविधाएं मिलती हैं। इन सुविधाओं का खर्च सरकार उठाती है और इन दिनों यह मुद्दा वहां चुनावी बहस का भी हिस्सा बना हुआ है। स्वीडन में माता-पिता को बच्चे के जन्म के बाद करीब 16 महीने की सवेतन छुट्टी (पेड लीव) मिलती है। इसमें 90 दिन सिर्फ मां के लिए और 90 दिन सिर्फ पिता के लिए तय होते हैं। बाकी करीब 300 दिन दोनों अपनी जरूरत के हिसाब से आपस में बांट सकते हैं। ये छुट्टियां एक-दूसरे को नहीं दी जा सकतीं। अगर कोई अपनी तय छुट्टी नहीं लेता, तो वह खत्म हो जाती है। पिता के लिए तय इन छुट्टियों को आमतौर पर ‘डैड मंथ्स’ कहा जाता है। इसका मकसद यह है कि पिता भी बच्चों की परवरिश में बराबर की जिम्मेदारी निभाएं। इटली, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसे उदाहरण 2010: इटली की सांसद बच्ची को लेकर यूरोपीय संसद पहुंचीं इटली की यूरोपीय सांसद लिसिया रोंजुली अपनी छह हफ्ते की बेटी विट्टोरिया को गोद में लेकर यूरोपीय संसद की कार्यवाही में शामिल हुई थीं। उस दौरान उनकी बच्ची उनकी गोद में ही बैठी रही, जबकि रोंजुली संसद में वोटिंग और बहस में हिस्सा लेती रहीं। तब पहली बार था जब कोई सांसद यूरोपीय संसद की कार्यवाही में शामिल हुई। बाद में भी वह कई मौके पर ऐसा करती नजर आईं। यूरोपीय संसद की कार्यवाही के दौरान इटली की सांसद लिसिया रोंजुली की बेटी विट्टोरिया सदन के अंदर। यह तस्वीर 19 नवंबर 2013 को फ्रांस के स्ट्रासबर्ग में ली गई थी। 2018: न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री 3 महीने की बेटी के साथ UN पहुंचीं सितंबर 2018 में न्यूजीलैंड की तत्कालीन प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न अपनी तीन महीने की बेटी नेवे को लेकर संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) पहुंची थीं। ऐसा करने वाली वह दुनिया की पहली निर्वाचित महिला प्रधानमंत्री बनी थीं। उस समय उनके पार्टनर क्लार्क गेफोर्ड भी न्यूयॉर्क गए थे और बैठकों के दौरान बेटी की देखभाल करते थे। जेसिंडा ने कहा था कि मां बनने के बाद भी महिलाएं दुनिया की सबसे बड़ी जिम्मेदारियां निभा सकती हैं। न्यूयॉर्क में 2018 में 73वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न अपनी 3 महीने की बेटी को लेकर पहुंची थीं। 2017: ऑस्ट्रेलियाई सांसद ने संसद में बच्चे को स्तनपान कराया जून 2017 में ऑस्ट्रेलिया की सीनेटर लारिसा वॉटर्स ने संसद की कार्यवाही के दौरान अपनी दो महीने की बेटी आलिया जॉय को स्तनपान कराते हुए भाषण दिया था। उस समय ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में संसद में स्तनपान कराने की अनुमति देने वाला नियम लागू किया था। उनकी तस्वीरें दुनियाभर में वायरल हुईं और उन्हें कामकाजी माताओं के लिए एक मजबूत संदेश माना गया। 2017 में ऑस्ट्रेलिया की सीनेटर लारिसा वाटर्स ने संसद में अपनी बेटी को स्तनपान कराया था। ——————– ये खबर भी पढ़ीं… अमेरिका में बच्ची

PM Modi LIVE | Narendra Modi France Visit Speech Photos Update; Emmanuel Macron

PM Modi LIVE | Narendra Modi France Visit Speech Photos Update; Emmanuel Macron

Hindi News National PM Modi LIVE | Narendra Modi France Visit Speech Photos Update; Emmanuel Macron G7 Summit 2026 नई दिल्ली/पेरिस/ब्रातिस्लावा10 मिनट पहले कॉपी लिंक पीएम नरेंद्र मोदी शनिवार को फ्रांस और स्लोवाकिया की यात्रा पर रवाना हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 से 18 जून तक फ्रांस और स्लोवाकिया के दौरे पर रहेंगे। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी 7वीं बार फ्रांस जा रहे हैं। 13-14 जून को नीस शहर में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। साथ ही ‘इंडिया इनोवेट्स’ कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे। 16 जून को मोदी फ्रांस वापस लौटेंगे। मोदी 17 जून को G7 समिट में हिस्सा लेंगे। समिट में वैश्विक अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, नई साझेदारियों और AI के मुद्दे पर चर्चा होगी। पीएम मोदी की कई वर्ल्ड लीडर्स समेत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मुलाकात हो सकती है। इसके बाद मोदी पेरिस जाएंगे। दो दिन 14 से 16 जून पीएम स्लोवाकिया में रहेंगे। यहां प्रधानमंत्री रोबर्ट फिको और राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रीनी से मुलाकात करेंगे। 1993 में स्लोवाकिया के आजाद देश बनने के बाद किसी भारतीय पीएम का यहां का पहला दौरा है। पीएम मोदी पिछले साल भी कनाडा में हुए G7 समिट में शामिल हुए थे। भारत इनोवेट्स क्या है ‘भारत इनोवेट्स’ शिक्षा मंत्रालय की नया ग्लोबल इनोशिएटिव है, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री मोदी ने फरवरी 2026 में भारत-फ्रांस इनोवेशन साल के उद्घाटन के दौरान की थी। इसका उद्देश्य भारतीय स्टार्टअप, IITs, IISc, विश्वविद्यालयों और रिसर्च संस्थानों को वैश्विक निवेशकों, कंपनियों, विश्वविद्यालयों और रिसर्च संगठनों से जोड़ना है। यह कार्यक्रम 14 से 16 जून तक नीस शहर में पैलेस डेस एक्सपोजिशन्स (Palais des Expositions) में होगा। इस मेगा समिट का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों करेंगे। G7 क्या है, इसमें कौन-कौन से देश हैं? G7 यानी ‘ग्रुप ऑफ सेवन’, दुनिया के उन 7 देशों का समूह है, जिन्हें दुनिया की ‘मॉडर्न इकोनॉमी’ वाला देश कहा जाता है। ये देश हैं- अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, इटली, कनाडा और जर्मनी। पहले इसका नाम G-8 हुआ करता था। 2014 में रूस ने पड़ोसी देश क्रीमिया पर कब्जा कर लिया तो बाकी सदस्य देशों ने रूस को ग्रुप से बाहर कर दिया। इसका नाम G7 हो गया। G7 समिट में सबसे ज्यादा 7 बार शामिल होंगे पीएम मोदी G7 समिट के लिए आमतौर पर भारतीय प्रधानमंत्रियों को बुलाया जाता रहा है। 2004 से 2014 तक पीएम रहे मनमोहन सिंह ने पांच बार G-8 समिट में हिस्सा लिया था। पीएम मोदी को पहली बार 2019 में फ्रांस के बियारिट्ज में हुई समिट में बुलाया गया था। इसके बाद 2020 में अमेरिका को मेजबानी करनी थी, लेकिन अमेरिका ने तब समिट रद्द कर दी। इस एक साल को छोड़ दें तो 2019 से 2024 तक हर साल पीएम मोदी G7 समिट में शामिल हुए। 2021 में वे वर्चुअल मीडियम से इसमें शामिल हुए। 2022 में जर्मनी, 2023 में जापान और 2024 में इटली में हुई G7 समिट में शामिल हुए। 2025 में कनाडा में हुई समिट में शामिल हुए। भारत के टॉप-2 हथियार सप्लायर्स में शामिल फ्रांस साल 2025 में फ्रेंच अखबार ला मोंड की खबर के मुताबिक फ्रांस ऐसे वक्त में भी भारत का साथ देता आया है, जब अमेरिका समेत दुनिया की तमाम बड़ी शक्तियों ने भारत का साथ छोड़ दिया था। पोखरण में परमाणु टेस्ट के बाद अमेरिका, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों ने भारत पर कई प्रतिबंध लगा दिए, लेकिन फ्रांस ने भारत का समर्थन किया। फ्रांस ने अमेरिकी प्रतिबंधों की अनदेखी करते हुए भारत को हथियार बेचना शुरू किया और अब वो रूस के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा हथियार आपूर्तिकर्ता बन गया है। भारत को फ्रांस से मिराज 2000 फाइटर जेट, राफेल फाइटर जेट और स्कॉर्पीन पनडुब्बी मिल चुकी है। फ्रांस ने इंटरनेशनल फोरम पर हमेशा भारत को सपोर्ट किया सितंबर 2023 में हुई G20 समिट के दौरान PM मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को 2024 के गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होने का न्योता दिया था, लेकिन दिसंबर में उन्होंने भारत आने से इनकार कर दिया। ऐसे वक्त में भारत ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को गणतंत्र दिवस में शामिल होने का न्योता भेजा। उन्होंने इसे तुरंत स्वीकार भी कर लिया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फ्रांस ने भारत का हमेशा समर्थन किया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सितंबर 2024 में संयुक्त राष्ट्र में भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने की मांग की थी। इसके अलावा फ्रांस, न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप (NSG) में भी भारत को सदस्य बनाने का पक्षधर है। G7 समिट क्या है, इस बार इसके एजेंडे की खास बात क्या है? एक तय एजेंडे पर बातचीत के लिए हर साल G7 समिट होती है, जिसका आयोजन G7 का अध्यक्ष देश करता है। दरअसल, G7 के सभी 7 देश बारी-बारी से इसकी अध्यक्षता करते हैं। इस साल फ्रांस अध्यक्षता कर रहा है। ऐसे में G7 समिट फ्रांस के एवियां शहर में होगी। इस समिट के एजेंडे में जियोपॉलिटिक्स क्राइसेस (यूक्रेन युद्ध, ईरान-इजराइल तनाव, गाजा, लेबनान और होर्मुज रूट की स्थिति, मध्य पूर्व की सुरक्षा चुनौतियां), वैश्विक आर्थिक सहयोग और असंतुलन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के मुद्दे शामिल हैं। इसके अलावा G7 के सदस्य देशों के लीडर्स और ऑफिसर्स साल में कई बैठकें करते हैं, जिनमें कई समझौते होते हैं और दुनिया की बड़ी घटनाओं पर आधिकारिक बयान जारी किए जाते हैं। शुरुआत में G7 का एजेंडा आर्थिक चुनौतियों और क्लाइमेट चेंज जैसे मुद्दों का हल निकालना था। बाद में राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी इसमें शामिल हो गए। वैश्विक मुद्दों पर G7 के फैसलों का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। उदाहरण के लिए G7 ने 2002 में मलेरिया और एड्स से लड़ने के लिए ग्लोबल फंड बनाया। 1998 में वित्तीय संकट के दौरान इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों को आर्थिक मदद की। रूस-यूक्रेन जंग के दौरान रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने और यूक्रेन की मदद करने का फैसला किया। G20 से कैसे अलग है G7 ? G7 का कोई स्थायी कार्यालय नहीं है और इसके सदस्य देश कोई अंतरराष्ट्रीय कानून पारित नहीं कर सकते। G20 में सबसे बड़ा मुद्दा वर्ल्ड इकोनॉमी होता है, जबकि G7 के लिए राजनीतिक मुद्दे भी अहम होते हैं। 1999 में बने G20

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Hindi News National PM Modi LIVE | Narendra Modi France Visit Speech Photos Update; Emmanuel Macron G7 Summit 2026 नई दिल्ली/पेरिस/ब्रातिस्लावा4 मिनट पहले कॉपी लिंक पीएम नरेंद्र मोदी शनिवार को फ्रांस और स्लोवाकिया की यात्रा पर रवाना हुए। पीएम मोदी 13 से 18 जून तक 6 दिवसीय यात्रा पर फ्रांस और स्लोवाकिया के लिए रवाना हो गए हैं। पीएम बनने के बाद मोदी की यह 7वीं फ्रांस यात्रा है। 13-14 जून को नीस शहर में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। साथ ही ‘इंडिया इनोवेट्स’ कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे। इसके बाद स्लोवाकिया रवाना हो जाएंगे। यहां वे 15 जून तक रहेंगे। 16 जून को पेरिस लौट आएंगे। मोदी 17 जून को G7 समिट में हिस्सा लेंगे। समिट में वैश्विक अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, नई साझेदारियों और AI के मुद्दे पर चर्चा होगी। पीएम मोदी की कई वर्ल्ड लीडर्स समेत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मुलाकात हो सकती है। इसके बाद मोदी पेरिस जाएंगे। यहां प्रधानमंत्री रोबर्ट फिको और राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रीनी से मुलाकात करेंगे। 1993 में स्लोवाकिया के आजाद देश बनने के बाद किसी भारतीय पीएम का यहां का पहला दौरा है। पीएम मोदी पिछले साल भी कनाडा में हुए G7 समिट में शामिल हुए थे। भारत इनोवेट्स क्या है ‘भारत इनोवेट्स’ शिक्षा मंत्रालय की नया ग्लोबल इनोशिएटिव है, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री मोदी ने फरवरी 2026 में भारत-फ्रांस इनोवेशन साल के उद्घाटन के दौरान की थी। इसका उद्देश्य भारतीय स्टार्टअप, IITs, IISc, विश्वविद्यालयों और रिसर्च संस्थानों को वैश्विक निवेशकों, कंपनियों, विश्वविद्यालयों और रिसर्च संगठनों से जोड़ना है। यह कार्यक्रम 14 से 16 जून तक नीस शहर में पैलेस डेस एक्सपोजिशन्स (Palais des Expositions) में होगा। इस मेगा समिट का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों करेंगे। G7 क्या है, इसमें कौन-कौन से देश हैं? G7 यानी ‘ग्रुप ऑफ सेवन’, दुनिया के उन 7 देशों का समूह है, जिन्हें दुनिया की ‘मॉडर्न इकोनॉमी’ वाला देश कहा जाता है। ये देश हैं- अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, इटली, कनाडा और जर्मनी। पहले इसका नाम G-8 हुआ करता था। 2014 में रूस ने पड़ोसी देश क्रीमिया पर कब्जा कर लिया तो बाकी सदस्य देशों ने रूस को ग्रुप से बाहर कर दिया। इसका नाम G7 हो गया। G7 समिट में सबसे ज्यादा 7 बार शामिल होंगे पीएम मोदी G7 समिट के लिए आमतौर पर भारतीय प्रधानमंत्रियों को बुलाया जाता रहा है। 2004 से 2014 तक पीएम रहे मनमोहन सिंह ने पांच बार G-8 समिट में हिस्सा लिया था। पीएम मोदी को पहली बार 2019 में फ्रांस के बियारिट्ज में हुई समिट में बुलाया गया था। इसके बाद 2020 में अमेरिका को मेजबानी करनी थी, लेकिन अमेरिका ने तब समिट रद्द कर दी। इस एक साल को छोड़ दें तो 2019 से 2024 तक हर साल पीएम मोदी G7 समिट में शामिल हुए। 2021 में वे वर्चुअल मीडियम से इसमें शामिल हुए। 2022 में जर्मनी, 2023 में जापान और 2024 में इटली में हुई G7 समिट में शामिल हुए। 2025 में कनाडा में हुई समिट में शामिल हुए। भारत के टॉप-2 हथियार सप्लायर्स में शामिल फ्रांस साल 2025 में फ्रेंच अखबार ला मोंड की खबर के मुताबिक फ्रांस ऐसे वक्त में भी भारत का साथ देता आया है, जब अमेरिका समेत दुनिया की तमाम बड़ी शक्तियों ने भारत का साथ छोड़ दिया था। पोखरण में परमाणु टेस्ट के बाद अमेरिका, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों ने भारत पर कई प्रतिबंध लगा दिए, लेकिन फ्रांस ने भारत का समर्थन किया। फ्रांस ने अमेरिकी प्रतिबंधों की अनदेखी करते हुए भारत को हथियार बेचना शुरू किया और अब वो रूस के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा हथियार आपूर्तिकर्ता बन गया है। भारत को फ्रांस से मिराज 2000 फाइटर जेट, राफेल फाइटर जेट और स्कॉर्पीन पनडुब्बी मिल चुकी है। फ्रांस ने इंटरनेशनल फोरम पर हमेशा भारत को सपोर्ट किया सितंबर 2023 में हुई G20 समिट के दौरान PM मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को 2024 के गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होने का न्योता दिया था, लेकिन दिसंबर में उन्होंने भारत आने से इनकार कर दिया। ऐसे वक्त में भारत ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को गणतंत्र दिवस में शामिल होने का न्योता भेजा। उन्होंने इसे तुरंत स्वीकार भी कर लिया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फ्रांस ने भारत का हमेशा समर्थन किया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सितंबर 2024 में संयुक्त राष्ट्र में भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने की मांग की थी। इसके अलावा फ्रांस, न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप (NSG) में भी भारत को सदस्य बनाने का पक्षधर है। G7 समिट क्या है, इस बार इसके एजेंडे की खास बात क्या है? एक तय एजेंडे पर बातचीत के लिए हर साल G7 समिट होती है, जिसका आयोजन G7 का अध्यक्ष देश करता है। दरअसल, G7 के सभी 7 देश बारी-बारी से इसकी अध्यक्षता करते हैं। इस साल फ्रांस अध्यक्षता कर रहा है। ऐसे में G7 समिट फ्रांस के एवियां शहर में होगी। इस समिट के एजेंडे में जियोपॉलिटिक्स क्राइसेस (यूक्रेन युद्ध, ईरान-इजराइल तनाव, गाजा, लेबनान और होर्मुज रूट की स्थिति, मध्य पूर्व की सुरक्षा चुनौतियां), वैश्विक आर्थिक सहयोग और असंतुलन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के मुद्दे शामिल हैं। इसके अलावा G7 के सदस्य देशों के लीडर्स और ऑफिसर्स साल में कई बैठकें करते हैं, जिनमें कई समझौते होते हैं और दुनिया की बड़ी घटनाओं पर आधिकारिक बयान जारी किए जाते हैं। शुरुआत में G7 का एजेंडा आर्थिक चुनौतियों और क्लाइमेट चेंज जैसे मुद्दों का हल निकालना था। बाद में राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी इसमें शामिल हो गए। वैश्विक मुद्दों पर G7 के फैसलों का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। उदाहरण के लिए G7 ने 2002 में मलेरिया और एड्स से लड़ने के लिए ग्लोबल फंड बनाया। 1998 में वित्तीय संकट के दौरान इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों को आर्थिक मदद की। रूस-यूक्रेन जंग के दौरान रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने और यूक्रेन की मदद करने का फैसला किया। G20 से कैसे अलग है G7 ? G7 का कोई स्थायी कार्यालय नहीं है और इसके सदस्य देश कोई अंतरराष्ट्रीय कानून पारित नहीं कर सकते। G20 में सबसे बड़ा मुद्दा वर्ल्ड इकोनॉमी होता है, जबकि G7 के लिए राजनीतिक मुद्दे भी अहम

Child Speech Disorder Impact; How To Help Kids With Stammering

Child Speech Disorder Impact; How To Help Kids With Stammering

Hindi News Lifestyle Child Speech Disorder Impact; How To Help Kids With Stammering | Parenting Tips 12 मिनट पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल कॉपी लिंक सवाल- मैं इंदौर से हूं। मेरी 13 साल की बेटी हकलाती है। हमने इसे सुधारने की बहुत कोशिश की। डॉक्टरों को दिखाया, स्पीच थेरेपिस्ट के पास गए, लेकिन कोई खास सुधार नहीं हुआ। वो जैसे-जैसे बड़ी हो रही है, अपने बोलने को लेकर बहुत कॉन्शस होती जा रही है। बचपन से ही बच्चे स्कूल में उसका मजाक उड़ाते रहे हैं। इसलिए वह क्लास में भी कुछ नहीं बोलती। अब तो सबसे अलग-थलग और चुपचाप रहने लगी है। हमें समझ नहीं आता कि हम क्या करें। उसे कैसे समझाएं, कैसे सपोर्ट करें। एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। सबसे पहले तो मैं यह बताना चाहूंगी कि आप अकेली नहीं हैं। आपकी तरह बहुत से माता-पिता इस स्थिति से गुजरते हैं। हकलाना (Stuttering) कोई ’कमजोरी’ नहीं है, बल्कि यह एक स्पीच फ्लुएंसी डिसऑर्डर है, जो अक्सर भावनात्मक दबाव, आत्मविश्वास की कमी या न्यूरोलॉजिकल कारणों से जुड़ा होता है। ‘द स्टटरिंग फाउंडेशन’ के मुताबिक, दुनियाभर में लगभग 1% यानी 8 करोड़ से ज्यादा लोग हकलाते हैं। महिलाओं की तुलना में पुरुषों में यह समस्या लगभग चार गुना ज्यादा होती है। करीब 5% बच्चे उम्र के किसी-न-किसी दौर में हकलाहट का सामना करते हैं। इनमें से लगभग 75% बच्चे बड़े होते-होते ठीक हो जाते हैं, जबकि करीब 1% में यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है। आपकी बेटी अभी टीनएजर है। ये उम्र वैसे भी थोड़ी वलनरेबल होती है। ऐसे में उसका कॉन्शस होना और क्लास में बोलने से बचना बिल्कुल स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। लेकिन अच्छी बात यह है कि सही सपोर्ट और समझदारी से आप इसमें सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं। बच्चा रुक-रुककर क्यों बोलता है? बच्चे का रुक-रुककर बोलना सिर्फ एक साधारण बोलने का तरीका भर नहीं है। इसके पीछे कई कारण होते हैं। हर बच्चे में इसकी वजह अलग हो सकती है। कुछ बच्चों में यह डर या झिझक से जुड़ा होता है, तो कुछ में सोचने और बोलने की गति में तालमेल न होने से होता है। कई बार घर का माहौल, पेरेंट्स का व्यवहार और बच्चे के अपने अनुभव भी इस पर असर डालते हैं। इसलिए इस समस्या को समझने के लिए इसके असली कारण तक पहुंचना और उसे समझना जरूरी है। बच्चे पर इसका क्या असर पड़ता है? जिन बच्चों को बोलने में समस्या होती है, वे सोचते हैं- “मैं ठीक से बोल नहीं पाता/पाती।” “लोग मुझे जज करेंगे।” “सब मेरा मजाक उड़ाएंगे।” “मेरा चुप रहना ही बेहतर है।” यही सोच धीरे-धीरे बच्चे पर हावी हो जाती है। लंबे समय में उसके मनोविज्ञान पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पेरेंट्स को क्या करना चाहिए? जो बच्चे हकलाकर बोलते हैं, उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की होती है कि उन्हें समझा जाए, उन्हें जज न किया जाए और उन्हें सपोर्ट किया जाए। ऐसे में पेरेंट्स का पहला कदम बच्चे को तुरंत सुधारने की कोशिश करना नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित और सहज महसूस कराना होना चाहिए। जब बच्चा बिना डर और झिझक के अपनी बात कह पाएगा, तभी उसकी बोलने की फ्लुएंसी धीरे-धीरे अपने आप बेहतर होने लगेगी। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स धैर्य रखें और सही तरीके से उसका साथ दें। नीचे ग्राफिक में ऐसे ही आसान और एक्शन लेने योग्य टिप्स दिए गए हैं। आइए अब इन पॉइंट्स को विस्तार से समझते हैं- 1. बच्चे की बात ध्यान से सुनें बच्चे की बात पूरी होने दें। बीच में उसकी बात खुद पूरी न करें। क्यों जरूरी? जब बच्चे को बिना जज किए सुना जाता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। फायदा बच्चा खुलकर बोलता है। झिझक कम होती है। 2. इमोशनल सेफ्टी दें बच्चे से रोज 10–15 मिनट बिना किसी जजमेंट के बात करें। जब वह बोले तो बीच में टोकने या सुधारने से बचें। उसकी बात पर रिएक्ट करने की बजाय पहले उसे ध्यान से सुनें। “मैं तुम्हारे साथ हूं,” जैसे भरोसा देने वाले शब्द कहें। उसके डर या शर्म को हल्के में न लें। घर में ऐसा माहौल बनाएं, जहां वह खुलकर बोल सके। क्यों जरूरी? जब बच्चा खुद को सुरक्षित महसूस करता है, तब उसकी झिझक दूर होती है। हकलाने की वजह अक्सर डर और एंग्जाइटी होती है। इमोशनल सेफ्टी मिलने पर धीरे-धीरे सबकुछ सामान्य हो जाता है। फायदा बच्चा खुलकर अपनी बात रखने लगता है। आत्मविश्वास बढ़ता है। बोलने का डर कम होता है। पेरेंट्स और बच्चे के बीच बॉन्ड मजबूत होता है। हकलाहट धीरे-धीरे कम हो जाती है। 3. कोशिश की तारीफ करें रिजल्ट की नहीं, कोशिश की तारीफ करें। छोटे-छोटे सुधार को नोटिस करें। पॉजिटिव शब्दों का इस्तेमाल करें। क्यों जरूरी? तारीफ बच्चे को आगे बढ़ने के लिए मोटिवेट करती है। फायदा आत्मविश्वास बढ़ता है। बच्चा प्रयास करना जारी रखता है। 4. बुलीइंग को इग्नोर न करें स्कूल में बुलीइंग होने पर टीचर से बात करें। बच्चे को जवाब देने के तरीके सिखाएं। क्यों जरूरी? बुलीइंग बच्चे के आत्मसम्मान को गहराई से प्रभावित करती है। फायदा बच्चा खुद को सुरक्षित महसूस करता है। डर और शर्म कम होती है। 5. बच्चे की ताकत पहचानें उसकी रुचियों और टैलेंट पर ध्यान दें। उसे उन एक्टिविटीज में प्रोत्साहित करें, जो उसे पसंद हो। उसकी उपलब्धियों को नोटिस करें। क्यों जरूरी? जब बच्चा अपनी स्ट्रेंथ पहचानता है, तो वह अपनी कमजोरी से ऊपर उठ पाता है। फायदा आत्मसम्मान बढ़ता है। पॉजिटिव सोच विकसित होती है। 6. बच्चे को जज न करें “तुम सही से क्यों नहीं बोलते?” जैसे सवाल न पूछें। दूसरे बच्चों से तुलना न करें। उसके बोलने की स्पीड को एक्सेप्ट करें। क्यों जरूरी? जजमेंट बच्चे में शर्म और डर पैदा करता है। फायदा बच्चा सहज महसूस करता है। खुद को स्वीकार करना सीखता है। 7. पॉजिटिव स्टोरीज सुनाएं ऐसे लोगों की कहानियां सुनाएं, जिन्होंने हकलाहट के बावजूद सफलता पाई। मोटिवेशनल उदाहरण दें। स्टोरी के जरिए आत्मविश्वास बढ़ाएं। क्यों जरूरी? रोल मॉडल बच्चे को उम्मीद और प्रेरणा देते हैं। फायदा बच्चा खुद को सीमित नहीं समझता है। उसे आगे बढ़ने का हौसला मिलता है। 8. धैर्य बनाए रखें बच्चे को समय दें। बहुत जल्दी सुधार की उम्मीद

Donald Trump Presidency Plan Video; White House Speech

Donald Trump Presidency Plan Video; White House Speech

वॉशिंगटन डीसी8 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर से राष्ट्रपति बनने की इच्छा जताई है। व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प ने कहा कि वे 8-9 साल बाद पद छोड़ेंगे। यह सुनकर वहां मौजूद लोग हंसने लगे तो ट्रम्प ने कहा कि वह मजाक नहीं कर रहे। उन्हें काम करना पसंद है। ट्रम्प ने यह भी कहा कि अभी उनके कार्यकाल की शुरुआत ही है और बहुत काम बाकी है। ट्रम्प अगले महीने 80 साल के हो जाएंगे। उन्होंने अपनी उम्र को लेकर भी मजाक किया। उन्होंने कहा, “मैं बुजुर्ग नहीं हूं; मैं बुजुर्ग से कहीं ज्यादा जवान हूं। मुझे आज भी वैसा ही महसूस होता है जैसा 50 साल पहले होता था।” इससे पहले भी ट्रम्प कई बार तीसरे टर्म का संकेत दे चुके हैं। ट्रम्प को तीसरी बार राष्ट्रपति बनाने का बिल पेश, फिर आगे नहीं बढ़ पाया इससे पहले एंडी ओगल्स ने 23 जनवरी 2025 को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में एक बिल पेश किया था। इस बिल का मकसद अमेरिकी संविधान में बदलाव करके डोनाल्ड ट्रम्प के लिए तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता खोलना था। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि जो व्यक्ति लगातार दो बार राष्ट्रपति नहीं रहा है, वह तीसरी बार चुनाव लड़ सके। चूंकि ट्रम्प 2020 में चुनाव हार गए थे, इसलिए इस बदलाव के बाद वे फिर से राष्ट्रपति बनने के लिए योग्य हो सकते थे। हालांकि यह बिल आगे नहीं बढ़ पाया और हाउस में वोटिंग तक भी नहीं पहुंच सका। दरअसल, अमेरिका में संविधान बदलना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए हाउस और सीनेट दोनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है। मौजूदा हालात में रिपब्लिकन पार्टी के पास इतना बहुमत नहीं है। इसके अलावा, ऐसे बदलाव को लागू करने के लिए 50 में से कम से कम 38 राज्यों की मंजूरी भी जरूरी होती है। अभी कई राज्यों में विपक्षी डेमोक्रेट पार्टी की सरकार है, इसलिए इस तरह का प्रस्ताव पास होना बहुत मुश्किल माना जाता है। 73 साल पहले 2 बार राष्ट्रपति बनने का नियम बना अमेरिका में पहले किसी व्यक्ति के सिर्फ 2 ही बार राष्ट्रपति बनने को लेकर कोई प्रावधान नहीं था। 1951 में संविधान में 22 संशोधन किया गया। इसके तहत ये नियम बनाया गया कि अमेरिका में कोई शख्स सिर्फ 2 बार ही राष्ट्रपति बन सकता है। दरअसल, अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने दो टर्म के बाद रिटायरमेंट ले लिया था। उसके बाद से राष्ट्रपति के दो टर्म से ज्यादा सेवाएं न देने का अनौपचारिक नियम ही बन गया। इसके बाद अमेरिका में यह प्रथा बन गई। 31 अमेरिकी राष्ट्रपतियों में से किसी भी राष्ट्रपति ने इस प्रथा को नहीं तोड़ा, लेकिन फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट के दौर में यह नियम टूट गया। वे 1933 से 1945 चार बार राष्ट्रपति चुनकर आए। क्या ट्रम्प संविधान बदल सकते हैं? ट्रम्प को तीसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव के लिए उतरना है तो उन्हें अमेरिकी संविधान में बदलाव करना होगा, जो इतना आसान नहीं है। ट्रम्प को इसके लिए अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव दोनों में दो-तिहाई बहुमत से एक बिल पास कराना होगा। ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास दोनों सदनों में इतने सदस्य नहीं हैं। सीनेट में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास 100 में से 52 सीनेटर है। वहीं, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में 435 में से 220 सदस्य हैं। ये संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो तिहाई यानी 67% बहुमत से काफी कम है। अगर ट्रम्प ये बहुमत हासिल कर लेते हैं तब भी उनके लि​​​​​​ए संविधान में संशोधन करना इतना आसान नहीं होगा। अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों से बिल पास होने के बाद इस संशोधन के लिए राज्यों से मंजूरी लेनी होती है। इसके लिए तीन चौथाई राज्यों का बहुमत मिलन के बाद ही संविधान में संशोधन हो सकता है। यानी 50 अमेरिकी राज्यों में से अगर 38 संविधान में बदलाव के लिए राजी हो जाए तो ही नियम बदल सकते हैं। पुतिन की स्ट्रैटजी अपना सकते हैं ट्रम्प ट्रम्प खुद भी कई बार कह चुके हैं कि वो दो कार्यकाल के बाद भी सत्ता में बने रहना चाहते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ट्रम्प को तीसरा कार्यकाल नहीं मिलता तो वे सत्ता में बने रहने के लिए दूसरे तरीके अपना सकते हैं। हैमिल्टन कॉलेज के प्रोफेसर फिलिप क्लिंकनर ने मुताबिक ट्रम्प 2028 में उपराष्ट्रपति बन सकते हैं और जेडी वेंस या किसी और को नाममात्र का राष्ट्रपति बना सकते हैं। ऐसा ही कुछ पुतिन ने रूस में किया था। इसके अलावा वो अपने परिवार के किसी सदस्य को राष्ट्रपति बना सकते हैं, ताकि पर्दे के पीछे से सरकार पर उनका कंट्रोल बना रहे। पुतिन 2000 से 2008 तक लगातार 2 बार रूस के राष्ट्रपति रह चुके थे। रूस के संविधान के मुताबिक वे लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकते थे। ऐसे में उन्होंने अपने खास दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बना दिया था। इस दौरान पुतिन उपराष्ट्रपति के पद पर रहे थे। ———————— यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प के बाद कौन संभालेगा अमेरिका: पहले उपराष्ट्रपति वेंस आगे थे, वेनेजुएला पर हमले के बाद विदेश मंत्री रूबियो का रुतबा बढ़ा अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के अगले अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की संभावनाएं अचानक काफी बढ़ गई हैं। ब्रिटिश अखबार द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक इसकी वजह वेनेजुएला पर की गई अमेरिकी कार्रवाई है। अमेरिकी सेना ने 3 जनवरी की रात वेनेजुएला पर हमला किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा कर अमेरिका लेकर आ गए। यह मिलिट्री एक्शन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मंजूरी से हुआ। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

Donald Trump Presidency Plan Video; White House Speech

Donald Trump Presidency Plan Video; White House Speech

वॉशिंगटन डीसी1 घंटे पहले कॉपी लिंक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर से राष्ट्रपति बनने की इच्छा जताई है। व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प ने कहा कि वे 8-9 साल बाद पद छोड़ेंगे। यह सुनकर वहां मौजूद लोग हंसने लगे तो ट्रम्प ने कहा कि वह मजाक नहीं कर रहे। उन्हें काम करना पसंद है। ट्रम्प ने यह भी कहा कि अभी उनके कार्यकाल की शुरुआत ही है और बहुत काम बाकी है। ट्रम्प अगले महीने 80 साल के हो जाएंगे। उन्होंने अपनी उम्र को लेकर भी मजाक किया। उन्होंने कहा, “मैं बुजुर्ग नहीं हूं; मैं बुजुर्ग से कहीं ज्यादा जवान हूं। मुझे आज भी वैसा ही महसूस होता है जैसा 50 साल पहले होता था।” इससे पहले भी ट्रम्प कई बार तीसरे टर्म का संकेत दे चुके हैं। ट्रम्प को तीसरी बार राष्ट्रपति बनाने का बिल पेश, फिर आगे नहीं बढ़ पाया इससे पहले एंडी ओगल्स ने 23 जनवरी 2025 को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में एक बिल पेश किया था। इस बिल का मकसद अमेरिकी संविधान में बदलाव करके डोनाल्ड ट्रम्प के लिए तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता खोलना था। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि जो व्यक्ति लगातार दो बार राष्ट्रपति नहीं रहा है, वह तीसरी बार चुनाव लड़ सके। चूंकि ट्रम्प 2020 में चुनाव हार गए थे, इसलिए इस बदलाव के बाद वे फिर से राष्ट्रपति बनने के लिए योग्य हो सकते थे। हालांकि यह बिल आगे नहीं बढ़ पाया और हाउस में वोटिंग तक भी नहीं पहुंच सका। दरअसल, अमेरिका में संविधान बदलना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए हाउस और सीनेट दोनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है। मौजूदा हालात में रिपब्लिकन पार्टी के पास इतना बहुमत नहीं है। इसके अलावा, ऐसे बदलाव को लागू करने के लिए 50 में से कम से कम 38 राज्यों की मंजूरी भी जरूरी होती है। अभी कई राज्यों में विपक्षी डेमोक्रेट पार्टी की सरकार है, इसलिए इस तरह का प्रस्ताव पास होना बहुत मुश्किल माना जाता है। 73 साल पहले 2 बार राष्ट्रपति बनने का नियम बना अमेरिका में पहले किसी व्यक्ति के सिर्फ 2 ही बार राष्ट्रपति बनने को लेकर कोई प्रावधान नहीं था। 1951 में संविधान में 22 संशोधन किया गया। इसके तहत ये नियम बनाया गया कि अमेरिका में कोई शख्स सिर्फ 2 बार ही राष्ट्रपति बन सकता है। दरअसल, अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने दो टर्म के बाद रिटायरमेंट ले लिया था। उसके बाद से राष्ट्रपति के दो टर्म से ज्यादा सेवाएं न देने का अनौपचारिक नियम ही बन गया। इसके बाद अमेरिका में यह प्रथा बन गई। 31 अमेरिकी राष्ट्रपतियों में से किसी भी राष्ट्रपति ने इस प्रथा को नहीं तोड़ा, लेकिन फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट के दौर में यह नियम टूट गया। वे 1933 से 1945 चार बार राष्ट्रपति चुनकर आए। क्या ट्रम्प संविधान बदल सकते हैं? ट्रम्प को तीसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव के लिए उतरना है तो उन्हें अमेरिकी संविधान में बदलाव करना होगा, जो इतना आसान नहीं है। ट्रम्प को इसके लिए अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव दोनों में दो-तिहाई बहुमत से एक बिल पास कराना होगा। ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास दोनों सदनों में इतने सदस्य नहीं हैं। सीनेट में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास 100 में से 52 सीनेटर है। वहीं, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में 435 में से 220 सदस्य हैं। ये संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो तिहाई यानी 67% बहुमत से काफी कम है। अगर ट्रम्प ये बहुमत हासिल कर लेते हैं तब भी उनके लि​​​​​​ए संविधान में संशोधन करना इतना आसान नहीं होगा। अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों से बिल पास होने के बाद इस संशोधन के लिए राज्यों से मंजूरी लेनी होती है। इसके लिए तीन चौथाई राज्यों का बहुमत मिलन के बाद ही संविधान में संशोधन हो सकता है। यानी 50 अमेरिकी राज्यों में से अगर 38 संविधान में बदलाव के लिए राजी हो जाए तो ही नियम बदल सकते हैं। पुतिन की स्ट्रैटजी अपना सकते हैं ट्रम्प ट्रम्प खुद भी कई बार कह चुके हैं कि वो दो कार्यकाल के बाद भी सत्ता में बने रहना चाहते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ट्रम्प को तीसरा कार्यकाल नहीं मिलता तो वे सत्ता में बने रहने के लिए दूसरे तरीके अपना सकते हैं। हैमिल्टन कॉलेज के प्रोफेसर फिलिप क्लिंकनर ने मुताबिक ट्रम्प 2028 में उपराष्ट्रपति बन सकते हैं और जेडी वेंस या किसी और को नाममात्र का राष्ट्रपति बना सकते हैं। ऐसा ही कुछ पुतिन ने रूस में किया था। इसके अलावा वो अपने परिवार के किसी सदस्य को राष्ट्रपति बना सकते हैं, ताकि पर्दे के पीछे से सरकार पर उनका कंट्रोल बना रहे। पुतिन 2000 से 2008 तक लगातार 2 बार रूस के राष्ट्रपति रह चुके थे। रूस के संविधान के मुताबिक वे लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकते थे। ऐसे में उन्होंने अपने खास दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बना दिया था। इस दौरान पुतिन उपराष्ट्रपति के पद पर रहे थे। ———————— यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प के बाद कौन संभालेगा अमेरिका: पहले उपराष्ट्रपति वेंस आगे थे, वेनेजुएला पर हमले के बाद विदेश मंत्री रूबियो का रुतबा बढ़ा अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के अगले अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की संभावनाएं अचानक काफी बढ़ गई हैं। ब्रिटिश अखबार द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक इसकी वजह वेनेजुएला पर की गई अमेरिकी कार्रवाई है। अमेरिकी सेना ने 3 जनवरी की रात वेनेजुएला पर हमला किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा कर अमेरिका लेकर आ गए। यह मिलिट्री एक्शन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मंजूरी से हुआ। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

PM Narendra Modi BJP Headquarter LIVE Speech Update; West Bengal Election Result – Assam

PM Narendra Modi BJP Headquarter LIVE Speech Update; West Bengal Election Result - Assam

Hindi News National PM Narendra Modi BJP Headquarter LIVE Speech Update; West Bengal Election Result Assam | TMC Congress नई दिल्ली1 मिनट पहले कॉपी लिंक पीएम मोदी ने 14 नवंबर को बिहार में जीत के बाद दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित किया था। भाजपा का 5 राज्यों में से 3 (पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी) में सरकार बनाना तय है। केरल में कांग्रेस और तमिलनाडु में एक्टर विजय की TVK सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आज शाम 6:30 बजे दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय पहुंचेंगे और कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे। मोदी ने पिछले साल 14 नवंबर को बिहार में जीत के बाद कहा था कि गंगाजी बिहार से बहते हुए बंगाल जाती है। बिहार ने बंगाल में भाजपा की विजय का रास्ता बना दिया है। BJP कार्यकर्ताओं के जश्न से जुड़ी 4 तस्वीरें… 3 राज्यों के चुनाव में जीत के बाद दिल्ली में भाजपा कार्यकर्ता पीएम मोदी की फोटो को मिठाई को खिलाते हुए। कोलकाता में जीत के बाद जश्न मनाते भाजपा कार्यकर्ता। कर्नाटक के चिकमंगलूर में भाजपा कार्यकर्ताओं ने पटाखे फोड़े। भाजपा को बहुमत मिलने की खुशी में दिल्ली में पार्टी कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाया। 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… 1. बंगाल में भाजपा सरकार, 159 सीटों पर बढ़त; 6% वोट बढ़ा 2. तमिलनाडु में उलटफेर, TVK नंबर वन पार्टी, DMK तीसरे नंबर पर खिसकी 3. कोलकाता में TMC ऑफिस पर सन्नाटा, भाजपा हेडक्वार्टर में जलेबी बनी पिछले 5 मौके, जब चुनाव में जीत के बाद PM मोदी पार्टी हेडक्वार्टर पहुंचे 14 नवंबर 2025: बिहार चुनाव में बीजेपी की जीत भाजपा ने बिहार में NDA की जीत का दिल्ली हेडक्वार्टर में जश्न मनाया। इस मौके पर पीएम ने 42 मिनट के भाषण में कहा, बिहार के लोगों ने गर्दा उड़ा दिया। अब कट्टा सरकार कभी वापस नहीं आएगी। उन्होंने छठी मईया के जयकारे भी लगाए। उन्होंने कहा कि जो छठ पूजा को ड्रामा कह सकते हैं, वे बिहार की क्या इज्जत करेंगे। पूरी खबर पढ़ें… 8 फरवरी 2025: दिल्ली चुनाव में बीजेपी की जीत दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद पीएम मोदी ने भाजपा हेडक्वॉर्टर में कार्यकर्ताओं को संबोधित किया था। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत यमुना मैया की जय के नारे के साथ की थी। उन्होंने कहा था कि आज दिल्ली में दिल्ली के लोगों में एक उत्साह भी है और सुकून भी है। उत्साह विजय का है, सुकून दिल्ली को आप-दा से मुक्त कराने का है। आपने दिल खोलकर प्यार दिया। मैं दिल्लीवालों को नमन करता हूं। पूरी खबर पढ़ें… 23 नवंबर 2024: महाराष्ट्र में महायुति की जीत तस्वीर 23 नवंबर की है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में महायुति की जीत के बाद पीएम मोदी दिल्ली में बीजेपी हेडक्वार्टर पहुंचे थे। महाराष्ट्र चुनाव में महायुति (बीजेपी-शिवसेना-NCP) की जीत के बाद पीएम मोदी पार्टी हेडक्वार्टर पहुंचे थे। उन्होंने कहा था कि महाराष्ट्र ने कुर्सी फर्स्ट वालों को नकारते हुए डंके की चोट पर कहा- एक हैं तो सेफ हैं। अपने 49 मिनट के भाषण की शुरुआत पीएम मोदी ने जय भवानी, जय शिवाजी के नारे के साथ की और समापन भारत माता की जय और वंदेमातरम से किया था। पूरी खबर पढ़ें… 8 अक्टूबर 2024: हरियाणा में बीजेपी की जीत 8 अक्टूबर 2024 को हरियाणा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद पीएम मोदी भाजपा मुख्यालय पहुंचे थे। उन्होंने 35 मिनट भाषण दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा और जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के नतीजों पर पार्टी कार्यकर्ताओं को दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में संबोधित किया था। उन्होंने 35 मिनट भाषण दिया था। पीएम ने कहा- जनता के सामने कांग्रेस की पोल खुल चुकी है। उनका डिब्बा गोल हो गया है। सरकार से बाहर होते ही कांग्रेस जल बिन मछली जैसी हो जाती है। वो समाज में जाति का जहर फैला रही है। पूरी खबर पढ़ें… 4 जून 2024: लगातार तीसरी बार मोदी सरकार बनी तस्वीर 4 जून 2024 की है। लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में NDA की सरकार बनने पर पीएम मोदी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया था। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद 4 जून की शाम प्रधानमंत्री मोदी पार्टी मुख्यालय पहुंचे थे। उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया, लेकिन जबान पर भाजपा कम और NDA का नाम ज्यादा रहा था। 34 मिनट के धन्यवाद भाषण में भाजपा का नाम 8 बार लिया तो NDA (भाजपा के सहयोगी दल) का हवाला 10 बार आया था। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

Supreme Court Dismisses Hate Speech Petitions; Cant Force Parliament Lawmaking

Supreme Court Dismisses Hate Speech Petitions; Cant Force Parliament Lawmaking

Hindi News National Supreme Court Dismisses Hate Speech Petitions; Cant Force Parliament Lawmaking नई दिल्ली10 मिनट पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि अदालत संसद को कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर कानून बनाना विधायिका का अधिकार है। अदालत केवल जरूरत की ओर ध्यान दिला सकती है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि नीति बनाना और कानून तैयार करना विधायिका के दायरे में आता है। अदालत इसमें दखल नहीं दे सकती। कोर्ट ने यह फैसला उन याचिकाओं पर दिया, जिनमें केंद्र सरकार को हेट स्पीच और अफवाह फैलाने से जुड़े कानूनों की समीक्षा कर नया कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। कोर्ट बोला- हेट स्पीच को लेकर कानून में कोई खालीपन नहीं बेंच ने कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचा हेट स्पीच जैसे मामलों से निपटने के लिए सक्षम है। समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके लागू होने में देरी या असमानता की है। कोर्ट के मुताबिक कई मामलों में कार्रवाई समय पर नहीं होती या एक जैसी नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि इस क्षेत्र में कोई कानूनी खालीपन है। कानून मौजूद हैं और उनमें ऐसे प्रावधान हैं, जो सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने या समुदायों के बीच तनाव फैलाने वाले व्यवहार से निपट सकते हैं। दिक्कत कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके लागू होने के तरीके में है। कई मामलों में कार्रवाई में देरी होती है या कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल एक जैसा नहीं होता। SC की 5 मुख्य बातें… सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसका काम नए अपराध तय करना या अलग से कोई नया ढांचा बनाना नहीं है, बल्कि मौजूदा कानूनों का सही तरीके से पालन सुनिश्चित करना है। केवल तब हस्तक्षेप किया जा सकता है, जब कानून लागू करने में स्पष्ट विफलता दिखे। जहां पूरा कानूनी ढांचा मौजूद है, वहां अदालत को संयम रखना चाहिए और शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का पालन करना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अहम आधार है, लेकिन यह असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, गरिमा और सामाजिक सौहार्द के लिए इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। ऐसा भाषण जो समाज में नफरत फैलाए या समुदायों के बीच तनाव बढ़ाए, वह लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता, बल्कि भाईचारे, गरिमा और समानता के मूल्यों को नुकसान पहुंचाता है। हेट स्पीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विकृत रूप है। केंद्र और राज्य सरकारें अपने विवेक से तय कर सकती हैं कि बदलती परिस्थितियों में नए कानून या संशोधन की जरूरत है या नहीं, जिसमें लॉ कमीशन की 2017 की 267वीं रिपोर्ट के सुझाव भी शामिल हो सकते हैं। ———- ये खबर भी पढ़ें… 15 साल साथ रहे, बच्चा भी है, यौन उत्पीड़न कैसे:सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन रिलेशन पर कहा-इसमें जोखिम, कोई कभी भी अलग हो सकता है सुप्रीम कोर्ट ने महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए पूछा कि जब रिश्ता सहमति से था तो अपराध का सवाल कहां उठता है। महिला आरोपी के साथ 15 साल लिव इन रिलेशन में रही उससे उसे एक बच्चा भी है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

Supreme Court Dismisses Hate Speech Petitions; Cant Force Parliament Lawmaking

Supreme Court Dismisses Hate Speech Petitions; Cant Force Parliament Lawmaking

Hindi News National Supreme Court Dismisses Hate Speech Petitions; Cant Force Parliament Lawmaking नई दिल्ली41 मिनट पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि अदालत संसद को कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर कानून बनाना विधायिका का अधिकार है। अदालत केवल जरूरत की ओर ध्यान दिला सकती है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि नीति बनाना और कानून तैयार करना विधायिका के दायरे में आता है। अदालत इसमें दखल नहीं दे सकती। कोर्ट ने यह फैसला उन याचिकाओं पर दिया, जिनमें केंद्र सरकार को हेट स्पीच और अफवाह फैलाने से जुड़े कानूनों की समीक्षा कर नया कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। कोर्ट बोला- हेट स्पीच को लेकर कानून में कोई खालीपन नहीं बेंच ने कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचा हेट स्पीच जैसे मामलों से निपटने के लिए सक्षम है। समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके लागू होने में देरी या असमानता की है। कोर्ट के मुताबिक कई मामलों में कार्रवाई समय पर नहीं होती या एक जैसी नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि इस क्षेत्र में कोई कानूनी खालीपन है। कानून मौजूद हैं और उनमें ऐसे प्रावधान हैं, जो सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने या समुदायों के बीच तनाव फैलाने वाले व्यवहार से निपट सकते हैं। दिक्कत कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके लागू होने के तरीके में है। कई मामलों में कार्रवाई में देरी होती है या कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल एक जैसा नहीं होता। SC की 5 मुख्य बातें… सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसका काम नए अपराध तय करना या अलग से कोई नया ढांचा बनाना नहीं है, बल्कि मौजूदा कानूनों का सही तरीके से पालन सुनिश्चित करना है। केवल तब हस्तक्षेप किया जा सकता है, जब कानून लागू करने में स्पष्ट विफलता दिखे। जहां पूरा कानूनी ढांचा मौजूद है, वहां अदालत को संयम रखना चाहिए और शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का पालन करना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अहम आधार है, लेकिन यह असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, गरिमा और सामाजिक सौहार्द के लिए इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। ऐसा भाषण जो समाज में नफरत फैलाए या समुदायों के बीच तनाव बढ़ाए, वह लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता, बल्कि भाईचारे, गरिमा और समानता के मूल्यों को नुकसान पहुंचाता है। हेट स्पीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विकृत रूप है। केंद्र और राज्य सरकारें अपने विवेक से तय कर सकती हैं कि बदलती परिस्थितियों में नए कानून या संशोधन की जरूरत है या नहीं, जिसमें लॉ कमीशन की 2017 की 267वीं रिपोर्ट के सुझाव भी शामिल हो सकते हैं। ———- ये खबर भी पढ़ें… 15 साल साथ रहे, बच्चा भी है, यौन उत्पीड़न कैसे:सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन रिलेशन पर कहा-इसमें जोखिम, कोई कभी भी अलग हो सकता है सुप्रीम कोर्ट ने महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए पूछा कि जब रिश्ता सहमति से था तो अपराध का सवाल कहां उठता है। महिला आरोपी के साथ 15 साल लिव इन रिलेशन में रही उससे उसे एक बच्चा भी है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔