CRPF Jawan Murder Case: Accused Arrested in Betul

बैतूल जिले के गंज थाना क्षेत्र में पूर्व सीआरपीएफ जवान बाबूराव सातनकर हत्याकांड के फरार आरोपी नवीन यादव को पुलिस ने शनिवार को गिरफ्तार कर लिया। इस मामले में अब तक तीन मुख्य आरोपियों को पकड़ा जा चुका है। . पुलिस के मुताबिक, शुक्रवार को हमलापुर निवासी विशाल सातनकर ने शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने बताया था कि खेत की मेढ़ के विवाद को लेकर ओमप्रकाश यादव, नवीन यादव, पिल्लू उर्फ फूलचंद करोचे और अन्य आरोपियों ने उनके पिता बाबूराव सातनकर पर लाठी-डंडों और नोजल पाइप से हमला किया था। गंभीर रूप से घायल बाबूराव की जिला अस्पताल में इलाज के दौरान मृत्यु हो गई। इस मामले में ओमप्रकाश यादव और पिल्लू उर्फ फूलचंद को पहले ही गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया जा चुका था। बस स्टैंड पर घेराबंदी कर तीसरा आरोपी पकड़ा फरार चल रहे आरोपी नवीन उर्फ नवीन्द्र यादव को 19 अप्रैल को मुखबिर की सूचना पर लाखापुर बस स्टैंड क्षेत्र से घेराबंदी कर पकड़ा गया। पूछताछ के दौरान नवीन यादव ने अपने साथियों के साथ मिलकर पुरानी रंजिश और खेत की मेढ़ के विवाद को लेकर बाबूराव की पीट-पीटकर हत्या करने की बात स्वीकार की है। पुलिस ने आरोपी के पास से वारदात में इस्तेमाल किया गया बांस का डंडा भी बरामद किया है। बाबूराव और आरोपी पक्ष के बीच लंबे समय से जमीन और मेढ़ को लेकर विवाद चल रहा था। इसी पुरानी रंजिश के कारण 17 अप्रैल को यह घटना हुई। पुलिस अन्य फरार आरोपियों की तलाश कर रही है और मामले की आगे की जांच जारी है। फोटो- पूर्व CRPF जवान बाबूराव सातनकर।
ईरान के सस्ते ड्रोन अमेरिका के लिए बने बड़ा सिरदर्द:₹32 लाख के ड्रोन को रोकने लाखों-करोड़ों खर्च, अमेरिका की ऑपरेशनल कॉस्ट तेजी से बढ़ी

ईरान के सस्ते और कम तकनीक वाले ड्रोन अमेरिका के लिए बड़ा सिरदर्द बन गए हैं। करीब 35,000 डॉलर (लगभग ₹32 लाख) में बनने वाला शाहेद-136 ड्रोन गिराने के लिए अमेरिका को कई बार लाखों से लेकर करोड़ों रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इससे अमेरिका के लिए युद्ध की लागत तेजी से बढ़ी है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के पहले छह दिनों में ही अमेरिका ने 11.3 बिलियन डॉलर (करीब ₹1.04 लाख करोड़) खर्च कर दिए। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के अनुसार अप्रैल की शुरुआत तक यह खर्च 25 से 35 बिलियन डॉलर (करीब ₹2.31 लाख करोड़ से ₹3.24 लाख करोड़) के बीच पहुंच गया। इसमें ज्यादातर हिस्सा इंटरसेप्टर मिसाइलों का रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगे इंटरसेप्टर के लगातार इस्तेमाल से इनके स्टॉक तेजी से कम हो रहे हैं। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के टॉम कराको ने कहा, “डर यह है कि हम इन्हें खत्म कर देंगे, न कि पैसे की वजह से, बल्कि इसलिए कि इन्हें समय पर इनकी भरपाई नहीं कर पाएंगे।” सस्ते ड्रोन बनाम महंगी सुरक्षा ईरान के ड्रोन आम कॉमर्शियल तकनीक से बनाए जाते हैं और इनकी लागत करीब ₹32 लाख होती है। इसके उलट, इन्हें गिराने के लिए इस्तेमाल होने वाले इंटरसेप्टर मिसाइल और डिफेंस सिस्टम कई गुना महंगे होते हैं। यही असंतुलन अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना है। डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिकी रक्षा निवेश लंबे समय तक महंगे लेकिन सटीक हथियारों पर केंद्रित रहा, जिससे सस्ते ड्रोन जैसे खतरों के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं हो पाई। युद्ध की रणनीति में बड़ा बदलाव यूक्रेन युद्ध के बाद ड्रोन युद्ध की रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ईरान ने भी इसी मॉडल को अपनाया है और एक साथ कई ड्रोन लॉन्च कर हमले करता है। शाहेद-136 जैसे ड्रोन करीब 2500 किमी तक उड़ान भर सकते हैं और लॉन्च से पहले ही टारगेट प्रोग्राम कर दिए जाते हैं। इससे पूरे मध्य पूर्व में बड़े क्षेत्र खतरे में आ जाते हैं। एयर-बेस्ड डिफेंस: असरदार लेकिन सीमित ड्रोन को दूर से गिराने का सबसे बेहतर तरीका एयर डिफेंस माना जाता है। इसमें शुरुआती चेतावनी देने वाले एयरक्राफ्ट ड्रोन को ट्रैक करते हैं और F-16 जैसे फाइटर जेट APKWS रॉकेट से उन्हें गिराते हैं। यह तरीका अपेक्षाकृत सस्ता है, लेकिन हर समय और हर जगह उपलब्ध नहीं होता। इसके अलावा, ईरान ने ऐसे चेतावनी सिस्टम को भी निशाना बनाया है, जिससे यह रणनीति कमजोर पड़ती है। विशेषज्ञ माइकल होरोविट्ज के मुताबिक, “कम लागत वाले प्रिसिजन स्ट्राइक की यह कैटेगरी उस समय मौजूद ही नहीं थी, जब अमेरिका के ज्यादातर एयर डिफेंस सिस्टम विकसित किए गए थे।” नेवी डेस्ट्रॉयर की क्षमता और लागत अमेरिकी नौसेना के डेस्ट्रॉयर में लगा रडार सिस्टम लगभग 50 किमी दूर से ड्रोन का पता लगा सकता है। इसके बाद उन्हें स्टैंडर्ड मिसाइल-2 (SM-2) इंटरसेप्टर से मार गिराया जाता है। सैन्य प्रोटोकॉल के तहत किसी लक्ष्य को नष्ट करने के लिए कम से कम दो मिसाइल दागी जाती हैं, जिससे लागत और बढ़ जाती है। यह असंतुलन शीत युद्ध के बाद शुरू हुआ, जब संभावित खतरों को कम संख्या में, लेकिन तेज और हाई-एंड प्रोजेक्टाइल्स के रूप में देखा गया था। उस समय बड़े पैमाने पर ड्रोन हमलों की कल्पना नहीं की गई थी। ग्राउंड सिस्टम की चुनौती जमीन आधारित रडार सिस्टम ड्रोन को पकड़ने में सीमित होते हैं, खासकर तब जब ड्रोन कम ऊंचाई पर उड़ रहे हों। पृथ्वी के कर्वेचर के कारण रडार की रेंज प्रभावित होती है और समय पर पहचान मुश्किल हो जाती है। Coyote सिस्टम: सस्ता और असरदार, लेकिन कमी छोटी दूरी के लिए Coyote एंटी-ड्रोन सिस्टम काफी प्रभावी और किफायती है। यह करीब 15 किमी दूर तक ड्रोन को इंटरसेप्ट कर सकता है। हालांकि, अमेरिकी सेना के पास इसकी संख्या काफी कम है। 2023-24 में हुए हमलों के दौरान इसे अलग-अलग सैन्य ठिकानों के बीच बार-बार शिफ्ट करना पड़ा। मिसाइल डिफेंस सिस्टम: सबसे महंगा विकल्प लंबी दूरी के लिए अमेरिका SM-2 और Patriot जैसे सिस्टम का इस्तेमाल करता है। ये सिस्टम ड्रोन के साथ-साथ विमान और बैलिस्टिक मिसाइल गिराने के लिए बनाए गए हैं, इसलिए इनकी लागत बहुत ज्यादा है। एक ड्रोन को गिराने के लिए अक्सर 2 मिसाइल दागनी पड़ती हैं, जिससे लागत और बढ़ जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह समस्या शीत युद्ध के बाद शुरू हुई, जब अमेरिका ने अपने डिफेंस सिस्टम को बड़े और तेज हथियारों के हिसाब से डिजाइन किया, न कि सस्ते ड्रोन के लिए। आखिरी विकल्प: गन सिस्टम जब ड्रोन लक्ष्य के बेहद करीब पहुंच जाता है, तब Centurion C-RAM जैसे गन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। यह अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प है, लेकिन इसकी रेंज बहुत कम होती है और यह अंतिम समय में ही काम आता है। भविष्य का समाधान: AI और इंटरसेप्टर ड्रोन भविष्य में ड्रोन से लड़ने के लिए AI आधारित इंटरसेप्टर ड्रोन अहम भूमिका निभा सकते हैं। Merops जैसे सिस्टम दुश्मन ड्रोन को ट्रैक कर नष्ट करने में सक्षम बताए जाते हैं। अमेरिका ने ऐसे हजारों सिस्टम मध्य पूर्व भेजे हैं, लेकिन इनके इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं है। लेजर हथियार: सस्ता लेकिन अभी प्रयोग से दूर पेंटागन ने लेजर आधारित हथियारों पर एक अरब डॉलर से ज्यादा (करीब ₹9,260 करोड़) निवेश किया है। इनसे ड्रोन को मात्र 3 डॉलर (करीब ₹278) प्रति शॉट में गिराया जा सकता है और इनकी रेंज करीब 12 मील होती है। हालांकि, ये तकनीक अभी युद्ध के मैदान में इस्तेमाल नहीं की गई है। आगे क्या विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ बढ़ता खर्च नहीं, बल्कि हथियारों का घटता स्टॉक भी है। आशंका है कि इंटरसेप्टर मिसाइलें तेजी से खत्म हो सकती हैं और उन्हें समय पर रिप्लेस करना मुश्किल होगा। अगर सस्ते ड्रोन के खिलाफ किफायती समाधान जल्दी नहीं विकसित किए गए, तो आने वाले समय में यह अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ी सुरक्षा चुनौती बन सकता है।
ईरान के सस्ते ड्रोन अमेरिका के लिए बने बड़ा सिरदर्द:₹32 लाख के ड्रोन को रोकने लाखों-करोड़ों खर्च, अमेरिका की ऑपरेशनल कॉस्ट तेजी से बढ़ी

ईरान के सस्ते और कम तकनीक वाले ड्रोन अमेरिका के लिए बड़ा सिरदर्द बन गए हैं। करीब 35,000 डॉलर (लगभग ₹32 लाख) में बनने वाला शाहेद-136 ड्रोन गिराने के लिए अमेरिका को कई बार लाखों से लेकर करोड़ों रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इससे अमेरिका के लिए युद्ध की लागत तेजी से बढ़ी है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के पहले छह दिनों में ही अमेरिका ने 11.3 बिलियन डॉलर (करीब ₹1.04 लाख करोड़) खर्च कर दिए। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के अनुसार अप्रैल की शुरुआत तक यह खर्च 25 से 35 बिलियन डॉलर (करीब ₹2.31 लाख करोड़ से ₹3.24 लाख करोड़) के बीच पहुंच गया। इसमें ज्यादातर हिस्सा इंटरसेप्टर मिसाइलों का रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगे इंटरसेप्टर के लगातार इस्तेमाल से इनके स्टॉक तेजी से कम हो रहे हैं। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के टॉम कराको ने कहा, “डर यह है कि हम इन्हें खत्म कर देंगे, न कि पैसे की वजह से, बल्कि इसलिए कि इन्हें समय पर इनकी भरपाई नहीं कर पाएंगे।” सस्ते ड्रोन बनाम महंगी सुरक्षा ईरान के ड्रोन आम कॉमर्शियल तकनीक से बनाए जाते हैं और इनकी लागत करीब ₹32 लाख होती है। इसके उलट, इन्हें गिराने के लिए इस्तेमाल होने वाले इंटरसेप्टर मिसाइल और डिफेंस सिस्टम कई गुना महंगे होते हैं। यही असंतुलन अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना है। डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिकी रक्षा निवेश लंबे समय तक महंगे लेकिन सटीक हथियारों पर केंद्रित रहा, जिससे सस्ते ड्रोन जैसे खतरों के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं हो पाई। युद्ध की रणनीति में बड़ा बदलाव यूक्रेन युद्ध के बाद ड्रोन युद्ध की रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ईरान ने भी इसी मॉडल को अपनाया है और एक साथ कई ड्रोन लॉन्च कर हमले करता है। शाहेद-136 जैसे ड्रोन करीब 2500 किमी तक उड़ान भर सकते हैं और लॉन्च से पहले ही टारगेट प्रोग्राम कर दिए जाते हैं। इससे पूरे मध्य पूर्व में बड़े क्षेत्र खतरे में आ जाते हैं। एयर-बेस्ड डिफेंस: असरदार लेकिन सीमित ड्रोन को दूर से गिराने का सबसे बेहतर तरीका एयर डिफेंस माना जाता है। इसमें शुरुआती चेतावनी देने वाले एयरक्राफ्ट ड्रोन को ट्रैक करते हैं और F-16 जैसे फाइटर जेट APKWS रॉकेट से उन्हें गिराते हैं। यह तरीका अपेक्षाकृत सस्ता है, लेकिन हर समय और हर जगह उपलब्ध नहीं होता। इसके अलावा, ईरान ने ऐसे चेतावनी सिस्टम को भी निशाना बनाया है, जिससे यह रणनीति कमजोर पड़ती है। विशेषज्ञ माइकल होरोविट्ज के मुताबिक, “कम लागत वाले प्रिसिजन स्ट्राइक की यह कैटेगरी उस समय मौजूद ही नहीं थी, जब अमेरिका के ज्यादातर एयर डिफेंस सिस्टम विकसित किए गए थे।” नेवी डेस्ट्रॉयर की क्षमता और लागत अमेरिकी नौसेना के डेस्ट्रॉयर में लगा रडार सिस्टम लगभग 50 किमी दूर से ड्रोन का पता लगा सकता है। इसके बाद उन्हें स्टैंडर्ड मिसाइल-2 (SM-2) इंटरसेप्टर से मार गिराया जाता है। सैन्य प्रोटोकॉल के तहत किसी लक्ष्य को नष्ट करने के लिए कम से कम दो मिसाइल दागी जाती हैं, जिससे लागत और बढ़ जाती है। यह असंतुलन शीत युद्ध के बाद शुरू हुआ, जब संभावित खतरों को कम संख्या में, लेकिन तेज और हाई-एंड प्रोजेक्टाइल्स के रूप में देखा गया था। उस समय बड़े पैमाने पर ड्रोन हमलों की कल्पना नहीं की गई थी। ग्राउंड सिस्टम की चुनौती जमीन आधारित रडार सिस्टम ड्रोन को पकड़ने में सीमित होते हैं, खासकर तब जब ड्रोन कम ऊंचाई पर उड़ रहे हों। पृथ्वी के कर्वेचर के कारण रडार की रेंज प्रभावित होती है और समय पर पहचान मुश्किल हो जाती है। Coyote सिस्टम: सस्ता और असरदार, लेकिन कमी छोटी दूरी के लिए Coyote एंटी-ड्रोन सिस्टम काफी प्रभावी और किफायती है। यह करीब 15 किमी दूर तक ड्रोन को इंटरसेप्ट कर सकता है। हालांकि, अमेरिकी सेना के पास इसकी संख्या काफी कम है। 2023-24 में हुए हमलों के दौरान इसे अलग-अलग सैन्य ठिकानों के बीच बार-बार शिफ्ट करना पड़ा। मिसाइल डिफेंस सिस्टम: सबसे महंगा विकल्प लंबी दूरी के लिए अमेरिका SM-2 और Patriot जैसे सिस्टम का इस्तेमाल करता है। ये सिस्टम ड्रोन के साथ-साथ विमान और बैलिस्टिक मिसाइल गिराने के लिए बनाए गए हैं, इसलिए इनकी लागत बहुत ज्यादा है। एक ड्रोन को गिराने के लिए अक्सर 2 मिसाइल दागनी पड़ती हैं, जिससे लागत और बढ़ जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह समस्या शीत युद्ध के बाद शुरू हुई, जब अमेरिका ने अपने डिफेंस सिस्टम को बड़े और तेज हथियारों के हिसाब से डिजाइन किया, न कि सस्ते ड्रोन के लिए। आखिरी विकल्प: गन सिस्टम जब ड्रोन लक्ष्य के बेहद करीब पहुंच जाता है, तब Centurion C-RAM जैसे गन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। यह अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प है, लेकिन इसकी रेंज बहुत कम होती है और यह अंतिम समय में ही काम आता है। भविष्य का समाधान: AI और इंटरसेप्टर ड्रोन भविष्य में ड्रोन से लड़ने के लिए AI आधारित इंटरसेप्टर ड्रोन अहम भूमिका निभा सकते हैं। Merops जैसे सिस्टम दुश्मन ड्रोन को ट्रैक कर नष्ट करने में सक्षम बताए जाते हैं। अमेरिका ने ऐसे हजारों सिस्टम मध्य पूर्व भेजे हैं, लेकिन इनके इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं है। लेजर हथियार: सस्ता लेकिन अभी प्रयोग से दूर पेंटागन ने लेजर आधारित हथियारों पर एक अरब डॉलर से ज्यादा (करीब ₹9,260 करोड़) निवेश किया है। इनसे ड्रोन को मात्र 3 डॉलर (करीब ₹278) प्रति शॉट में गिराया जा सकता है और इनकी रेंज करीब 12 मील होती है। हालांकि, ये तकनीक अभी युद्ध के मैदान में इस्तेमाल नहीं की गई है। आगे क्या विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ बढ़ता खर्च नहीं, बल्कि हथियारों का घटता स्टॉक भी है। आशंका है कि इंटरसेप्टर मिसाइलें तेजी से खत्म हो सकती हैं और उन्हें समय पर रिप्लेस करना मुश्किल होगा। अगर सस्ते ड्रोन के खिलाफ किफायती समाधान जल्दी नहीं विकसित किए गए, तो आने वाले समय में यह अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ी सुरक्षा चुनौती बन सकता है।
खदान में नहाते समय 16 वर्षीय किशोर की डूबकर मौत:सतना में डेढ़ घंटे सर्च के बाद मिला शव, लापरवाही पर सवाल

सतना जिले के कोलगवां थाना अंतर्गत बाबूपुर चौकी क्षेत्र में रविवार को एक 16 वर्षीय किशोर की अवैध खदान में डूबने से मौत हो गई। पुलिस ने मर्ग कायम कर मामले की जांच शुरू कर दी है। मृतक की पहचान साइडिंग निवासी बरकत खान, पिता स्व. राजू खान के रूप में हुई है। बरकत रविवार सुबह करीब 10 बजे अपने दोस्तों के साथ साइडिंग की लालपुर स्थित एक खदान में नहाने गया था। नहाने के दौरान वह अचानक खदान के बीच गहराई में चला गया और डूब गया। उसके साथ मौजूद दोस्तों ने उसे बचाने का प्रयास किया, लेकिन अधिक गहराई के कारण वे सफल नहीं हो सके। डेढ़ घंटे तक चला सर्च ऑपरेशन घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय युवक मौके पर पहुंचे और तुरंत तलाश अभियान शुरू किया। लगभग डेढ़ घंटे तक चले सर्च ऑपरेशन के बाद दोपहर करीब 12:30 बजे बरकत खान को पानी से बाहर निकाला गया। परिजन और साथी उसे तत्काल निजी वाहन से नजदीकी अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। बाबूपुर पुलिस भी घटना स्थल पर पहुंची और मामले की जांच शुरू की। पुलिस ने पंचनामा की कार्रवाई पूरी कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। इस घटना के बाद क्षेत्र में शोक का माहौल है। स्थानीय लोगों ने प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा है कि क्षेत्र में संचालित अवैध खदानें लगातार जानलेवा साबित हो रही हैं, लेकिन इन पर रोक नहीं लगाई जा रही। लोगों ने प्रशासन से ऐसी खदानों को जल्द बंद कराने की मांग की है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
कूड़े में न फेंकें लौकी के बीज! दिल की बीमारी से लेकर बढ़ते वजन तक में है रामबाण, स्किन के लिए भी फायदेमंद

Last Updated:April 19, 2026, 16:34 IST Lauki Ke Beej Ke Fayde: अक्सर हम लौकी की सब्जी तो बड़े चाव से खाते हैं, लेकिन उसके बीजों को बेकार समझकर फेंक देते हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लौकी के ये छोटे से दिखने वाले बीज असल में प्रोटीन, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स का पावरहाउस हैं. दिल की सेहत सुधारने से लेकर वजन घटाने और चमकती त्वचा पाने तक, इन बीजों के फायदे आपको हैरान कर देंगे. आयुष चिकित्सा अधिकारी डॉ. मोहम्मद इकबाल से जानिए कैसे कूड़े में फेंके जाने वाले ये बीज आपकी डाइट का सबसे हेल्दी हिस्सा बन सकते हैं और इन्हें इस्तेमाल करने का सही तरीका क्या है. अक्सर हम लौकी काटते वक्त उसके बीज सीधे कूड़े में फेंक देते हैं, लेकिन ये छोटी-छोटी चीजें सेहत का बड़ा खजाना हैं. आपको शायद पता न हो, लौकी के बीजों में प्रोटीन, फाइबर, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. यही कारण है कि ये पाचन से लेकर दिल की सेहत तक कई फायदे देते हैं. अगर आप रोजमर्रा की डाइट में थोड़ा सा बदलाव करके इन बीजों को शामिल कर लें, तो शरीर को कई जरूरी पोषक तत्व आसानी से मिल सकते हैं. आयुष चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर मोहम्मद इकबाल के मुताबिक, पाचन की समस्या आजकल आम हो गई है, लेकिन लौकी के बीज इसमें काफी राहत दिला सकते हैं. इनमें मौजूद फाइबर पेट को साफ रखने में मदद करता है और कब्ज जैसी दिक्कतों को दूर करता है. अगर सुबह खाली पेट या दिन में हल्के स्नैक के तौर पर इनका सेवन किया जाए, तो पेट हल्का महसूस होता है. साथ ही ये आंतों को भी स्वस्थ रखते हैं, जिससे खाना अच्छे से पचता है. इम्युनिटी यानी शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत बढ़ाने में भी लौकी के बीज काफी मददगार होते हैं. इनमें पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं. अक्सर मौसम बदलते ही लोगों को सर्दी-खांसी या कमजोरी महसूस होने लगती है, ऐसे में ये बीज शरीर को एक्स्ट्रा सपोर्ट देते हैं. नियमित रूप से इनका सेवन करने से छोटी-मोटी मौसमी बीमारियों से बचाव करने में मदद मिलती है. Add News18 as Preferred Source on Google दिल को स्वस्थ रखने के लिए भी लौकी के बीज बहुत फायदेमंद माने जाते हैं. इनमें मैग्नीशियम और हेल्दी फैट्स होते हैं, जो ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखने में मदद करते हैं. इससे हार्ट पर दबाव कम पड़ता है और दिल सही तरीके से काम करता है. जो लोग हाई बीपी या दिल से जुड़ी परेशानियों से जूझ रहे हैं, उनके लिए ये बीज एक आसान और प्रभावी घरेलू उपाय बन सकते हैं. अगर आप वजन कम करना चाहते हैं, तो लौकी के बीज आपके बड़े काम आ सकते हैं. इन्हें हल्का भूनकर खाने से पेट देर तक भरा महसूस होता है, जिससे बार-बार भूख नहीं लगती. इससे ओवरईटिंग की आदत कम होती है और वजन धीरे-धीरे कंट्रोल में आने लगता है. सबसे अच्छी बात यह है कि ये एक हेल्दी स्नैक हैं, जो जंक फूड खाने की क्रेविंग को भी कम करते हैं. सुंदरता के मामले में भी लौकी के बीज पीछे नहीं हैं. इनका पेस्ट बनाकर फेस पैक की तरह इस्तेमाल करने से त्वचा में कुदरती निखार आता है. इसके लिए लौकी के बीजों को धोकर धूप में सुखा लें और फिर पीसकर बारीक पाउडर बना लें. इसमें थोड़ा सा गुलाब जल या दूध मिलाकर पेस्ट तैयार करें और चेहरे पर 15 मिनट के लिए लगाएं. अगर स्किन बहुत सेंसिटिव है, तो इस्तेमाल से पहले पैच टेस्ट जरूर करें. यह केमिकल वाले प्रोडक्ट्स से बचने का एक बेहतरीन नेचुरल तरीका है. बालों को मजबूत बनाने के लिए भी लौकी के बीज काफी असरदार होते हैं. इनके तेल से सिर की मालिश करने पर बालों की जड़ें मजबूत होती हैं और हेयर फॉल कम होता है. आजकल बाल झड़ना एक बड़ी समस्या बन गई है, ऐसे में यह घरेलू उपाय बालों को पोषण देने और उन्हें घना बनाने में काफी मदद कर सकता है. अगर आप नेचुरल तरीके से बालों की देखभाल करना चाहते हैं, तो इन्हें जरूर आजमाएं. लौकी के बीजों को इस्तेमाल करना बहुत ही आसान है. आप इन्हें सुखाकर हल्का भून लें और सेंधा नमक के साथ स्नैक की तरह खा सकते हैं. चाहें तो इनका पाउडर बनाकर सूप या सलाद में भी मिला सकते हैं. हालांकि ध्यान रखें कि इनकी तासीर ठंडी होती है, इसलिए सर्दी या बुखार के समय इनका सेवन थोड़ा कम करें. सही मात्रा में इस्तेमाल करने पर ये आपकी सेहत के लिए बहुत गुणकारी साबित होंगे. First Published : April 19, 2026, 16:34 IST
‘आदिवासी हैं ममता के विरोधी, बदल रही बंगाल की संस्कृति के घुसपैठिए’, पीएम मोदी ने टीएमसी पर लगाया गंभीर आरोप

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (19 अप्रैल) को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में त्रिलोक कांग्रेस को आड़े हाथ लेते हुए एक रैली की। उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे युवा विरोधी हैं। पीएम मोदी ने मोटरसाइकल को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि घुसपैठिए की वजह से बंगाल की भाषा और संस्कृति बदल रही है। उन्होंने महाराजगंज प्लांट पर आरोप लगाया। मोदी ने आरोप लगाया कि ओथियोड ने गरीबों की अनदेखी की, उनकी जमीनों पर कब्जा कर लिया और इस क्षेत्र को बर्बाद कर दिया, भय और बख्तरबंद के चक्र में विस्फोट कर दिया। उन्होंने कहा, ‘घुसपैठ के कारण बंगाल की भाषा और संस्कृति में बदलाव देखा जा रहा है।’ वर्ष 2026 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने अस्मिता और नामांकन पर अपना रुख और तेज कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि जबकि कैथोलिक सरकार के तहत संथाली भाषा और आदिवासी अस्मिता का अपमान हो रहा है, मदरसा शिक्षा के लिए रिकॉर्ड बजट जारी किया जा रहा है। मोदी ने कहा, ‘संथाली भाषा का अपमान किया जा रहा है, जबकि मदरसा शिक्षा के लिए रिकॉर्ड बजट दिया जा रहा है।’ यह सिर्फ तुष्टिकरण है।’ नींव की जमीनों पर अलौकिक टुकड़ों ने कब्ज़ा कर लिया – प्रधानमंत्री मोदी प्रधानमंत्री ने दावा किया कि बंगाल के युवाओं में सड़क, रोजगार, बेरोजगारी और भव्यता की भारी कमी है। उन्होंने आरोप लगाया कि फर्मों ने फर्मों की जमीनों पर कब्जा कर लिया है। मोदी ने कहा, ‘तृणमूल के महाजंगलराज में ‘कट मनी’ (रिश्वत) के बिना कोई काम नहीं होता।’ उन्होंने ममता बनर्जी सरकार को ‘निर्मम सरकार’ अधिकार देते हुए कहा कि वह केवल ”लूट” में रुचि रखती हैं, अधिकार के कल्याण में नहीं। अंतिम चरण में संग्रहालय का आरोप मोदी ने कहा, ‘तृणमूल ने अत्याचार, लूट, लूट और महाजंगलराज के अलावा कुछ नहीं दिया।’ उन्होंने कहा कि पुरुलिया, बैंका और झाड़फूंक के लोगों ने सबसे पहले भाजपा का समर्थन इसलिए किया था क्योंकि वे ”डर और वैश्या से मुक्ति” चाहते थे। प्रधानमंत्री ने दावा किया कि पुरुलिया का मराठा साम्राज्य अब शांति के खिलाफ हो गया है। उन्होंने कहा, ‘पूरा पुरुलिया बदलाव चाहता है और कह रहा है’ बदलाव जरूरी है। (पलटानो दरकार)’ इस नारे का प्रयोग करते हुए उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के पश्चिमी हिस्सों में विपक्ष के खिलाफ जनता का गुस्सा बढ़ रहा है। मोदी ने आरोप लगाया कि लेकिन लोकतंत्र के ”भ्रष्टाचार अत्याचारी” ने बंगाल के लोगों को आतंकित कर दिया, अब जनता भाजपा को ”एकमात्र विश्वसनीय विकल्प” मान रही है। यह भी पढ़ें: बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त होंगे पूर्व रेल मंत्री डायना डायना, बंगाल चुनाव से पहले बीजेपी का बड़ा दांव!
पैन इंडिया एक्शन ड्रामा फिल्म:‘मैसा’ के लिए मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग ले रही हैं रश्मिका

रश्मिका मंदाना अपनी आने वाली पैन इंडिया एक्शन ड्रामा फिल्म ‘मैसा’ के लिए लगातार तैयारी कर रही हैं। इस फिल्म में वह एक गोंड आदिवासी लड़की का किरदार निभा रही हैं, जो उनके लिए इमोशनली और फिजिकली बेहद चैलेंजिंग रोल है। इसके एक्शन को असली और प्रभावशाली बनाने के लिए इंटरनेशनल स्टंट डायरेक्टर एंडी लॉन्ग भी इस प्रोजेक्ट से जुड़े हैं। रश्मिका ने अपने किरदार को बेहतर ढंग से निभाने के लिए बैंकॉक में एक इंटेंस मार्शल आर्ट्स और स्टंट बूटकैंप जॉइन किया है। यहां वह रोज लगभग 8 घंटे ट्रेनिंग कर रही हैं, जिसमें हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट, एडवांस स्टंट तकनीक और हाई-स्पीड एक्शन कोऑर्डिनेशन शामिल है। उनकी ट्रेनिंग की तस्वीरों में उनका बिल्कुल नया और फोकस्ड अवतार देखने को मिल रहा है, जो उनके अब तक के सॉफ्ट रोल्स से काफी अलग है। केरल में शुरू होगा 16 दिनों का एक्शन शेड्यूल टीम जल्द ही केरल में फिल्म का 16 दिनों का महत्वपूर्ण एक्शन शेड्यूल शुरू करने वाली है। यह शेड्यूल फिल्म के सबसे मुश्किल हिस्सों में से एक माना जा रहा है। रश्मिका की मौजूदा ट्रेनिंग इसी के लिए उन्हें तैयार कर रही है। फिल्म का निर्देशन डेब्यू डायरेक्टर रविंद्र पुल्ले कर रहे हैं और इसे अनफॉर्मूला फिल्म्स प्रोड्यूस कर रही है।
पेट की गर्मी को जड़ से शांत कर देगी ये देसी ड्रिंक, डॉक्टर भी करते हैं सलाह

गर्मियों की शुरुआत होते ही ठंडा और तरोताजा पेय पीने का मन करने लगता है. तेज धूप, गर्म हवाएं और उमस भरा मौसम शरीर को जल्दी थका देता है, जिससे बार-बार प्यास लगती है. ऐसे समय में ज्यादातर लोग कोल्ड ड्रिंक्स, सोडा या पैक्ड जूस का सहारा लेते हैं, लेकिन इनमें ज्यादा चीनी और कृत्रिम तत्व मौजूद होते हैं, जो सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं. ऐसे में आयुर्वेद छाछ को गर्मियों के लिए सबसे बेहतर और प्राकृतिक ड्रिंक मानता है, जो शरीर को ठंडक देने के साथ कई स्वास्थ्य लाभ भी पहुंचाता है. छाछ दही को मथकर तैयार किया जाने वाला हल्का, स्वादिष्ट और पौष्टिक पेय है. इसमें पानी की मात्रा अधिक होती है, इसलिए यह शरीर को तेजी से हाइड्रेट करने में मदद करता है. गर्मियों में पसीना ज्यादा निकलने से शरीर में पानी और जरूरी मिनरल्स की कमी होने लगती है, जिसे छाछ पूरा करने में मदद कर सकता है. इसका स्वाद भी काफी अच्छा होता है और इसमें भुना जीरा, पुदीना या काला नमक मिलाने से यह और भी स्वादिष्ट बन जाता है. यही वजह है कि इसे भारतीय घरों में लंबे समय से गर्मियों का पारंपरिक हेल्दी ड्रिंक माना जाता है. पाचन तंत्र को रखता है दुरुस्तआयुर्वेद के अनुसार, छाछ पाचन क्रिया को मजबूत बनाने में बेहद असरदार माना जाता है. दोपहर के भोजन के बाद एक गिलास छाछ पीने से गैस, एसिडिटी, अपच और पेट भारी होने जैसी समस्याओं में राहत मिल सकती है. इसमें मौजूद प्रोबायोटिक्स आंतों में अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ावा देते हैं, जिससे पेट साफ रहता है और कब्ज की परेशानी कम हो सकती है. जिन लोगों को गर्मियों में पेट खराब रहने की शिकायत रहती है, उनके लिए छाछ फायदेमंद विकल्प हो सकता है. शरीर को रखता है ठंडा और एनर्जेटिकछाछ शरीर की अंदरूनी गर्मी को शांत करने में मदद करता है. तेज गर्मी में इसे पीने से शरीर को तुरंत ठंडक और ताजगी महसूस होती है. यह डिहाइड्रेशन से बचाने में भी मदद करता है. पसीने के कारण शरीर से निकलने वाले इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी को पूरा करने में भी छाछ उपयोगी माना जाता है. इसलिए गर्मियों में कमजोरी, चक्कर या थकान महसूस होने पर छाछ राहत दे सकता है. हड्डियों और वजन के लिए भी फायदेमंदछाछ में कैल्शियम, प्रोटीन और जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं. साथ ही इसमें कैलोरी कम होती है, इसलिए यह वजन नियंत्रित रखने वालों के लिए भी अच्छा विकल्प माना जाता है. जो लोग मीठे पेय पदार्थ छोड़ना चाहते हैं, वे छाछ को अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं. घर पर ऐसे बनाएं स्वादिष्ट छाछताजी दही को अच्छी तरह फेंट लें और उसमें जरूरत अनुसार ठंडा या सामान्य पानी मिला लें. इसके बाद स्वाद के अनुसार सेंधा नमक, भुना जीरा पाउडर, काली मिर्च और बारीक कटा पुदीना डालें. सभी चीजों को अच्छे से मिलाकर ठंडा सर्व करें. चाहें तो इसमें करी पत्ता या धनिया भी डाल सकते हैं. कब पिएं छाछ?गर्मियों में छाछ सुबह नाश्ते के साथ, दोपहर के भोजन के बाद या दिन में प्यास लगने पर पी जा सकती है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, रोज एक से दो गिलास छाछ पीना फायदेमंद हो सकता है. यह शरीर को ठंडा, हाइड्रेटेड और पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद करता है. गर्मियों में छाछ सचमुच किसी वरदान से कम नहीं है.
पद्मश्री भगवानदास रायकवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई:अखाड़ा कला के उस्ताद को शिष्यों ने करतब से श्रद्धांजलि दी

सागर के पद्मश्री भगवानदास रायकवार का भोपाल में इलाज के दौरान शनिवार को निधन हो गया। निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को सागर लाया गया। रविवार को सागर में अंतिम यात्रा निकाली गई। उनकी अंतिम यात्रा सागर के रामपुरा स्थित छत्रसाल अखाड़ा से शुरू हुई। यात्रा में बुंदेलखंड के अखाड़े शामिल हुए। अखाड़ों में कलाकारों ने करतब दिखाए। रास्तेभर लोगों की भीड़ उमड़ती चली गई। शिष्यों, समर्थकों और आम नागरिकों ने नम आंखों से दाऊ भगवानदास रायकवार को विदाई दी। अंतिम यात्रा नरयावली नाका स्थित मुक्तिधाम पहुंची। जहां राजकीय सम्मान गार्ड ऑफ ऑनर के साथ वे पंचतत्व में विलीन हुए। इस दौरान एक भावुक दृश्य तब देखने को मिला। जब उनके बेटे सहित शिष्यों ने अपने गुरु को श्रद्धांजलि देने के लिए पारंपरिक बुंदेली अखाड़ा मार्शल आर्ट का प्रदर्शन किया। लेजम और लाठी के साथ किए गए, इस प्रदर्शन ने सभी को भावुक कर दिया। यह वही कला थी, जिसे भगवानदास रायकवार ने जीवनभर सहेजा और नई पीढ़ी तक पहुंचाया। इसी कला में उन्हें पद्मश्री सम्मान मिला है। पिता जी गए नहीं, वे कला के रूप में हमारे बीच हैं अंतिम संस्कार में जनप्रतिनिधि, अधिकारी और शहर के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। उनके बेटे राजकुमार रायकवार ने कहा कि उनके पिता का जाना सिर्फ परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे बुंदेलखंड और देश के लिए बड़ी क्षति है। उन्होंने बताया कि पिता ने अपना पूरा जीवन अखाड़ा कला को समर्पित कर दिया और उसे नई पहचान दिलाई। पिताजी गए नहीं है, वह हमारे बीच हैं। उनकी कला को जिंदा रखेंगे। उन्होंने अपना पूरा जीवन इस कला के लिए दिया। नौकरी छोड़ी, परिवार पर ध्यान नहीं दिया। वे हमेशा कला के लिए काम करते रहे। वह बुंदेलखंड के कलाकारों और अखाड़ों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। उन्होंने अखाड़े को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई नरयावली विधायक प्रदीप लारिया ने कहा कि पद्मश्री से सम्मानित भगवानदास रायकवार दाऊ ने मार्शल ऑर्ट्स के क्षेत्र में अलख जगाई थी। उन्होंने पूरा जीवन इसके लिए समर्पित किया। बच्चों को आगे लाने की दिशा में काम किया है। वह प्रेरणा के केंद्र हैं। प्राचीन विधा को बुंदेलखंड के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। उनके जाने से हमसब दुखी हैं।
मसल पेन और नर्व पेन में क्या अंतर है? कैसे पहचानें आप किस दर्द से जूझ रहे, स्पाइन के डॉक्टर से समझिए

Muscle Pain vs Nerve Pain Difference: मसल पेन और नर्व पेन दोनों आम लेकिन अलग प्रकार के दर्द हैं, जिन्हें अक्सर लोग एक जैसा समझ लेते हैं, जिससे सही इलाज में देरी हो सकती है. मसल पेन आमतौर पर मांसपेशियों में खिंचाव, थकान, चोट या गलत पोस्चर के कारण होता है और यह एक सीमित जगह पर महसूस होता है, जिसे दबाने पर दर्द बढ़ सकता है. यह अक्सर आराम, गर्म सेक, मसाज और हल्की स्ट्रेचिंग से ठीक हो जाता है. वहीं नर्व पेन नसों से जुड़ा दर्द होता है, जो तेज, जलन जैसा या बिजली के झटके जैसा महसूस हो सकता है और यह शरीर में एक जगह से दूसरी जगह फैल सकता है. डॉक्टर के अनुसार अगर दर्द लंबे समय तक बना रहे, फैलता जाए या झुनझुनी और सुन्नपन जैसे लक्षण दिखें तो यह नर्व पेन का संकेत हो सकता है.









