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पद्मश्री भगवानदास रायकवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई:अखाड़ा कला के उस्ताद को शिष्यों ने करतब से श्रद्धांजलि दी

पद्मश्री भगवानदास रायकवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई:अखाड़ा कला के उस्ताद को शिष्यों ने करतब से श्रद्धांजलि दी

सागर के पद्मश्री भगवानदास रायकवार का भोपाल में इलाज के दौरान शनिवार को निधन हो गया। निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को सागर लाया गया। रविवार को सागर में अंतिम यात्रा निकाली गई। उनकी अंतिम यात्रा सागर के रामपुरा स्थित छत्रसाल अखाड़ा से शुरू हुई। यात्रा में बुंदेलखंड के अखाड़े शामिल हुए। अखाड़ों में कलाकारों ने करतब दिखाए। रास्तेभर लोगों की भीड़ उमड़ती चली गई। शिष्यों, समर्थकों और आम नागरिकों ने नम आंखों से दाऊ भगवानदास रायकवार को विदाई दी। अंतिम यात्रा नरयावली नाका स्थित मुक्तिधाम पहुंची। जहां राजकीय सम्मान गार्ड ऑफ ऑनर के साथ वे पंचतत्व में विलीन हुए। इस दौरान एक भावुक दृश्य तब देखने को मिला। जब उनके बेटे सहित शिष्यों ने अपने गुरु को श्रद्धांजलि देने के लिए पारंपरिक बुंदेली अखाड़ा मार्शल आर्ट का प्रदर्शन किया। लेजम और लाठी के साथ किए गए, इस प्रदर्शन ने सभी को भावुक कर दिया। यह वही कला थी, जिसे भगवानदास रायकवार ने जीवनभर सहेजा और नई पीढ़ी तक पहुंचाया। इसी कला में उन्हें पद्मश्री सम्मान मिला है। पिता जी गए नहीं, वे कला के रूप में हमारे बीच हैं
अंतिम संस्कार में जनप्रतिनिधि, अधिकारी और शहर के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। उनके बेटे राजकुमार रायकवार ने कहा कि उनके पिता का जाना सिर्फ परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे बुंदेलखंड और देश के लिए बड़ी क्षति है। उन्होंने बताया कि पिता ने अपना पूरा जीवन अखाड़ा कला को समर्पित कर दिया और उसे नई पहचान दिलाई। पिताजी गए नहीं है, वह हमारे बीच हैं। उनकी कला को जिंदा रखेंगे। उन्होंने अपना पूरा जीवन इस कला के लिए दिया। नौकरी छोड़ी, परिवार पर ध्यान नहीं दिया। वे हमेशा कला के लिए काम करते रहे। वह बुंदेलखंड के कलाकारों और अखाड़ों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। उन्होंने अखाड़े को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई
नरयावली विधायक प्रदीप लारिया ने कहा कि पद्मश्री से सम्मानित भगवानदास रायकवार दाऊ ने मार्शल ऑर्ट्स के क्षेत्र में अलख जगाई थी। उन्होंने पूरा जीवन इसके लिए समर्पित किया। बच्चों को आगे लाने की दिशा में काम किया है। वह प्रेरणा के केंद्र हैं। प्राचीन विधा को बुंदेलखंड के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। उनके जाने से हमसब दुखी हैं।

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पद्मश्री भगवानदास रायकवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई:अखाड़ा कला के उस्ताद को शिष्यों ने करतब से श्रद्धांजलि दी

पद्मश्री भगवानदास रायकवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई:अखाड़ा कला के उस्ताद को शिष्यों ने करतब से श्रद्धांजलि दी

सागर के पद्मश्री भगवानदास रायकवार का भोपाल में इलाज के दौरान शनिवार को निधन हो गया। निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को सागर लाया गया। रविवार को सागर में अंतिम यात्रा निकाली गई। उनकी अंतिम यात्रा सागर के रामपुरा स्थित छत्रसाल अखाड़ा से शुरू हुई। यात्रा में बुंदेलखंड के अखाड़े शामिल हुए। अखाड़ों में कलाकारों ने करतब दिखाए। रास्तेभर लोगों की भीड़ उमड़ती चली गई। शिष्यों, समर्थकों और आम नागरिकों ने नम आंखों से दाऊ भगवानदास रायकवार को विदाई दी। अंतिम यात्रा नरयावली नाका स्थित मुक्तिधाम पहुंची। जहां राजकीय सम्मान गार्ड ऑफ ऑनर के साथ वे पंचतत्व में विलीन हुए। इस दौरान एक भावुक दृश्य तब देखने को मिला। जब उनके बेटे सहित शिष्यों ने अपने गुरु को श्रद्धांजलि देने के लिए पारंपरिक बुंदेली अखाड़ा मार्शल आर्ट का प्रदर्शन किया। लेजम और लाठी के साथ किए गए, इस प्रदर्शन ने सभी को भावुक कर दिया। यह वही कला थी, जिसे भगवानदास रायकवार ने जीवनभर सहेजा और नई पीढ़ी तक पहुंचाया। इसी कला में उन्हें पद्मश्री सम्मान मिला है। पिता जी गए नहीं, वे कला के रूप में हमारे बीच हैं
अंतिम संस्कार में जनप्रतिनिधि, अधिकारी और शहर के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। उनके बेटे राजकुमार रायकवार ने कहा कि उनके पिता का जाना सिर्फ परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे बुंदेलखंड और देश के लिए बड़ी क्षति है। उन्होंने बताया कि पिता ने अपना पूरा जीवन अखाड़ा कला को समर्पित कर दिया और उसे नई पहचान दिलाई। पिताजी गए नहीं है, वह हमारे बीच हैं। उनकी कला को जिंदा रखेंगे। उन्होंने अपना पूरा जीवन इस कला के लिए दिया। नौकरी छोड़ी, परिवार पर ध्यान नहीं दिया। वे हमेशा कला के लिए काम करते रहे। वह बुंदेलखंड के कलाकारों और अखाड़ों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। उन्होंने अखाड़े को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई
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