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ईरान के सस्ते ड्रोन अमेरिका के लिए बने बड़ा सिरदर्द:₹32 लाख के ड्रोन को रोकने लाखों-करोड़ों खर्च, अमेरिका की ऑपरेशनल कॉस्ट तेजी से बढ़ी

ईरान के सस्ते ड्रोन अमेरिका के लिए बने बड़ा सिरदर्द:₹32 लाख के ड्रोन को रोकने लाखों-करोड़ों खर्च, अमेरिका की ऑपरेशनल कॉस्ट तेजी से बढ़ी

ईरान के सस्ते और कम तकनीक वाले ड्रोन अमेरिका के लिए बड़ा सिरदर्द बन गए हैं। करीब 35,000 डॉलर (लगभग ₹32 लाख) में बनने वाला शाहेद-136 ड्रोन गिराने के लिए अमेरिका को कई बार लाखों से लेकर करोड़ों रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इससे अमेरिका के लिए युद्ध की लागत तेजी से बढ़ी है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के पहले छह दिनों में ही अमेरिका ने 11.3 बिलियन डॉलर (करीब ₹1.04 लाख करोड़) खर्च कर दिए। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के अनुसार अप्रैल की शुरुआत तक यह खर्च 25 से 35 बिलियन डॉलर (करीब ₹2.31 लाख करोड़ से ₹3.24 लाख करोड़) के बीच पहुंच गया। इसमें ज्यादातर हिस्सा इंटरसेप्टर मिसाइलों का रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगे इंटरसेप्टर के लगातार इस्तेमाल से इनके स्टॉक तेजी से कम हो रहे हैं। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के टॉम कराको ने कहा, “डर यह है कि हम इन्हें खत्म कर देंगे, न कि पैसे की वजह से, बल्कि इसलिए कि इन्हें समय पर इनकी भरपाई नहीं कर पाएंगे।”
सस्ते ड्रोन बनाम महंगी सुरक्षा
ईरान के ड्रोन आम कॉमर्शियल तकनीक से बनाए जाते हैं और इनकी लागत करीब ₹32 लाख होती है। इसके उलट, इन्हें गिराने के लिए इस्तेमाल होने वाले इंटरसेप्टर मिसाइल और डिफेंस सिस्टम कई गुना महंगे होते हैं। यही असंतुलन अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना है। डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिकी रक्षा निवेश लंबे समय तक महंगे लेकिन सटीक हथियारों पर केंद्रित रहा, जिससे सस्ते ड्रोन जैसे खतरों के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं हो पाई। युद्ध की रणनीति में बड़ा बदलाव
यूक्रेन युद्ध के बाद ड्रोन युद्ध की रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ईरान ने भी इसी मॉडल को अपनाया है और एक साथ कई ड्रोन लॉन्च कर हमले करता है। शाहेद-136 जैसे ड्रोन करीब 2500 किमी तक उड़ान भर सकते हैं और लॉन्च से पहले ही टारगेट प्रोग्राम कर दिए जाते हैं। इससे पूरे मध्य पूर्व में बड़े क्षेत्र खतरे में आ जाते हैं।
एयर-बेस्ड डिफेंस: असरदार लेकिन सीमित
ड्रोन को दूर से गिराने का सबसे बेहतर तरीका एयर डिफेंस माना जाता है। इसमें शुरुआती चेतावनी देने वाले एयरक्राफ्ट ड्रोन को ट्रैक करते हैं और F-16 जैसे फाइटर जेट APKWS रॉकेट से उन्हें गिराते हैं।
यह तरीका अपेक्षाकृत सस्ता है, लेकिन हर समय और हर जगह उपलब्ध नहीं होता। इसके अलावा, ईरान ने ऐसे चेतावनी सिस्टम को भी निशाना बनाया है, जिससे यह रणनीति कमजोर पड़ती है।
विशेषज्ञ माइकल होरोविट्ज के मुताबिक, “कम लागत वाले प्रिसिजन स्ट्राइक की यह कैटेगरी उस समय मौजूद ही नहीं थी, जब अमेरिका के ज्यादातर एयर डिफेंस सिस्टम विकसित किए गए थे।”
नेवी डेस्ट्रॉयर की क्षमता और लागत
अमेरिकी नौसेना के डेस्ट्रॉयर में लगा रडार सिस्टम लगभग 50 किमी दूर से ड्रोन का पता लगा सकता है। इसके बाद उन्हें स्टैंडर्ड मिसाइल-2 (SM-2) इंटरसेप्टर से मार गिराया जाता है। सैन्य प्रोटोकॉल के तहत किसी लक्ष्य को नष्ट करने के लिए कम से कम दो मिसाइल दागी जाती हैं, जिससे लागत और बढ़ जाती है।
यह असंतुलन शीत युद्ध के बाद शुरू हुआ, जब संभावित खतरों को कम संख्या में, लेकिन तेज और हाई-एंड प्रोजेक्टाइल्स के रूप में देखा गया था। उस समय बड़े पैमाने पर ड्रोन हमलों की कल्पना नहीं की गई थी। ग्राउंड सिस्टम की चुनौती
जमीन आधारित रडार सिस्टम ड्रोन को पकड़ने में सीमित होते हैं, खासकर तब जब ड्रोन कम ऊंचाई पर उड़ रहे हों। पृथ्वी के कर्वेचर के कारण रडार की रेंज प्रभावित होती है और समय पर पहचान मुश्किल हो जाती है। Coyote सिस्टम: सस्ता और असरदार, लेकिन कमी छोटी दूरी के लिए Coyote एंटी-ड्रोन सिस्टम काफी प्रभावी और किफायती है। यह करीब 15 किमी दूर तक ड्रोन को इंटरसेप्ट कर सकता है। हालांकि, अमेरिकी सेना के पास इसकी संख्या काफी कम है। 2023-24 में हुए हमलों के दौरान इसे अलग-अलग सैन्य ठिकानों के बीच बार-बार शिफ्ट करना पड़ा। मिसाइल डिफेंस सिस्टम: सबसे महंगा विकल्प लंबी दूरी के लिए अमेरिका SM-2 और Patriot जैसे सिस्टम का इस्तेमाल करता है। ये सिस्टम ड्रोन के साथ-साथ विमान और बैलिस्टिक मिसाइल गिराने के लिए बनाए गए हैं, इसलिए इनकी लागत बहुत ज्यादा है। एक ड्रोन को गिराने के लिए अक्सर 2 मिसाइल दागनी पड़ती हैं, जिससे लागत और बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह समस्या शीत युद्ध के बाद शुरू हुई, जब अमेरिका ने अपने डिफेंस सिस्टम को बड़े और तेज हथियारों के हिसाब से डिजाइन किया, न कि सस्ते ड्रोन के लिए। आखिरी विकल्प: गन सिस्टम
जब ड्रोन लक्ष्य के बेहद करीब पहुंच जाता है, तब Centurion C-RAM जैसे गन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। यह अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प है, लेकिन इसकी रेंज बहुत कम होती है और यह अंतिम समय में ही काम आता है।
भविष्य का समाधान: AI और इंटरसेप्टर ड्रोन
भविष्य में ड्रोन से लड़ने के लिए AI आधारित इंटरसेप्टर ड्रोन अहम भूमिका निभा सकते हैं। Merops जैसे सिस्टम दुश्मन ड्रोन को ट्रैक कर नष्ट करने में सक्षम बताए जाते हैं। अमेरिका ने ऐसे हजारों सिस्टम मध्य पूर्व भेजे हैं, लेकिन इनके इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं है। लेजर हथियार: सस्ता लेकिन अभी प्रयोग से दूर
पेंटागन ने लेजर आधारित हथियारों पर एक अरब डॉलर से ज्यादा (करीब ₹9,260 करोड़) निवेश किया है। इनसे ड्रोन को मात्र 3 डॉलर (करीब ₹278) प्रति शॉट में गिराया जा सकता है और इनकी रेंज करीब 12 मील होती है।
हालांकि, ये तकनीक अभी युद्ध के मैदान में इस्तेमाल नहीं की गई है। आगे क्या
विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ बढ़ता खर्च नहीं, बल्कि हथियारों का घटता स्टॉक भी है। आशंका है कि इंटरसेप्टर मिसाइलें तेजी से खत्म हो सकती हैं और उन्हें समय पर रिप्लेस करना मुश्किल होगा। अगर सस्ते ड्रोन के खिलाफ किफायती समाधान जल्दी नहीं विकसित किए गए, तो आने वाले समय में यह अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ी सुरक्षा चुनौती बन सकता है।

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ईरान के सस्ते ड्रोन अमेरिका के लिए बने बड़ा सिरदर्द:₹32 लाख के ड्रोन को रोकने लाखों-करोड़ों खर्च, अमेरिका की ऑपरेशनल कॉस्ट तेजी से बढ़ी

ईरान के सस्ते और कम तकनीक वाले ड्रोन अमेरिका के लिए बड़ा सिरदर्द बन गए हैं। करीब 35,000 डॉलर (लगभग ₹32 लाख) में बनने वाला शाहेद-136 ड्रोन गिराने के लिए अमेरिका को कई बार लाखों से लेकर करोड़ों रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इससे अमेरिका के लिए युद्ध की लागत तेजी से बढ़ी है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के पहले छह दिनों में ही अमेरिका ने 11.3 बिलियन डॉलर (करीब ₹1.04 लाख करोड़) खर्च कर दिए। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के अनुसार अप्रैल की शुरुआत तक यह खर्च 25 से 35 बिलियन डॉलर (करीब ₹2.31 लाख करोड़ से ₹3.24 लाख करोड़) के बीच पहुंच गया। इसमें ज्यादातर हिस्सा इंटरसेप्टर मिसाइलों का रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगे इंटरसेप्टर के लगातार इस्तेमाल से इनके स्टॉक तेजी से कम हो रहे हैं। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के टॉम कराको ने कहा, “डर यह है कि हम इन्हें खत्म कर देंगे, न कि पैसे की वजह से, बल्कि इसलिए कि इन्हें समय पर इनकी भरपाई नहीं कर पाएंगे।”
सस्ते ड्रोन बनाम महंगी सुरक्षा
ईरान के ड्रोन आम कॉमर्शियल तकनीक से बनाए जाते हैं और इनकी लागत करीब ₹32 लाख होती है। इसके उलट, इन्हें गिराने के लिए इस्तेमाल होने वाले इंटरसेप्टर मिसाइल और डिफेंस सिस्टम कई गुना महंगे होते हैं। यही असंतुलन अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना है। डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिकी रक्षा निवेश लंबे समय तक महंगे लेकिन सटीक हथियारों पर केंद्रित रहा, जिससे सस्ते ड्रोन जैसे खतरों के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं हो पाई। युद्ध की रणनीति में बड़ा बदलाव
यूक्रेन युद्ध के बाद ड्रोन युद्ध की रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ईरान ने भी इसी मॉडल को अपनाया है और एक साथ कई ड्रोन लॉन्च कर हमले करता है। शाहेद-136 जैसे ड्रोन करीब 2500 किमी तक उड़ान भर सकते हैं और लॉन्च से पहले ही टारगेट प्रोग्राम कर दिए जाते हैं। इससे पूरे मध्य पूर्व में बड़े क्षेत्र खतरे में आ जाते हैं।
एयर-बेस्ड डिफेंस: असरदार लेकिन सीमित
ड्रोन को दूर से गिराने का सबसे बेहतर तरीका एयर डिफेंस माना जाता है। इसमें शुरुआती चेतावनी देने वाले एयरक्राफ्ट ड्रोन को ट्रैक करते हैं और F-16 जैसे फाइटर जेट APKWS रॉकेट से उन्हें गिराते हैं।
यह तरीका अपेक्षाकृत सस्ता है, लेकिन हर समय और हर जगह उपलब्ध नहीं होता। इसके अलावा, ईरान ने ऐसे चेतावनी सिस्टम को भी निशाना बनाया है, जिससे यह रणनीति कमजोर पड़ती है।
विशेषज्ञ माइकल होरोविट्ज के मुताबिक, “कम लागत वाले प्रिसिजन स्ट्राइक की यह कैटेगरी उस समय मौजूद ही नहीं थी, जब अमेरिका के ज्यादातर एयर डिफेंस सिस्टम विकसित किए गए थे।”
नेवी डेस्ट्रॉयर की क्षमता और लागत
अमेरिकी नौसेना के डेस्ट्रॉयर में लगा रडार सिस्टम लगभग 50 किमी दूर से ड्रोन का पता लगा सकता है। इसके बाद उन्हें स्टैंडर्ड मिसाइल-2 (SM-2) इंटरसेप्टर से मार गिराया जाता है। सैन्य प्रोटोकॉल के तहत किसी लक्ष्य को नष्ट करने के लिए कम से कम दो मिसाइल दागी जाती हैं, जिससे लागत और बढ़ जाती है।
यह असंतुलन शीत युद्ध के बाद शुरू हुआ, जब संभावित खतरों को कम संख्या में, लेकिन तेज और हाई-एंड प्रोजेक्टाइल्स के रूप में देखा गया था। उस समय बड़े पैमाने पर ड्रोन हमलों की कल्पना नहीं की गई थी। ग्राउंड सिस्टम की चुनौती
जमीन आधारित रडार सिस्टम ड्रोन को पकड़ने में सीमित होते हैं, खासकर तब जब ड्रोन कम ऊंचाई पर उड़ रहे हों। पृथ्वी के कर्वेचर के कारण रडार की रेंज प्रभावित होती है और समय पर पहचान मुश्किल हो जाती है। Coyote सिस्टम: सस्ता और असरदार, लेकिन कमी छोटी दूरी के लिए Coyote एंटी-ड्रोन सिस्टम काफी प्रभावी और किफायती है। यह करीब 15 किमी दूर तक ड्रोन को इंटरसेप्ट कर सकता है। हालांकि, अमेरिकी सेना के पास इसकी संख्या काफी कम है। 2023-24 में हुए हमलों के दौरान इसे अलग-अलग सैन्य ठिकानों के बीच बार-बार शिफ्ट करना पड़ा। मिसाइल डिफेंस सिस्टम: सबसे महंगा विकल्प लंबी दूरी के लिए अमेरिका SM-2 और Patriot जैसे सिस्टम का इस्तेमाल करता है। ये सिस्टम ड्रोन के साथ-साथ विमान और बैलिस्टिक मिसाइल गिराने के लिए बनाए गए हैं, इसलिए इनकी लागत बहुत ज्यादा है। एक ड्रोन को गिराने के लिए अक्सर 2 मिसाइल दागनी पड़ती हैं, जिससे लागत और बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह समस्या शीत युद्ध के बाद शुरू हुई, जब अमेरिका ने अपने डिफेंस सिस्टम को बड़े और तेज हथियारों के हिसाब से डिजाइन किया, न कि सस्ते ड्रोन के लिए। आखिरी विकल्प: गन सिस्टम
जब ड्रोन लक्ष्य के बेहद करीब पहुंच जाता है, तब Centurion C-RAM जैसे गन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है। यह अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प है, लेकिन इसकी रेंज बहुत कम होती है और यह अंतिम समय में ही काम आता है।
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भविष्य में ड्रोन से लड़ने के लिए AI आधारित इंटरसेप्टर ड्रोन अहम भूमिका निभा सकते हैं। Merops जैसे सिस्टम दुश्मन ड्रोन को ट्रैक कर नष्ट करने में सक्षम बताए जाते हैं। अमेरिका ने ऐसे हजारों सिस्टम मध्य पूर्व भेजे हैं, लेकिन इनके इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं है। लेजर हथियार: सस्ता लेकिन अभी प्रयोग से दूर
पेंटागन ने लेजर आधारित हथियारों पर एक अरब डॉलर से ज्यादा (करीब ₹9,260 करोड़) निवेश किया है। इनसे ड्रोन को मात्र 3 डॉलर (करीब ₹278) प्रति शॉट में गिराया जा सकता है और इनकी रेंज करीब 12 मील होती है।
हालांकि, ये तकनीक अभी युद्ध के मैदान में इस्तेमाल नहीं की गई है। आगे क्या
विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ बढ़ता खर्च नहीं, बल्कि हथियारों का घटता स्टॉक भी है। आशंका है कि इंटरसेप्टर मिसाइलें तेजी से खत्म हो सकती हैं और उन्हें समय पर रिप्लेस करना मुश्किल होगा। अगर सस्ते ड्रोन के खिलाफ किफायती समाधान जल्दी नहीं विकसित किए गए, तो आने वाले समय में यह अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ी सुरक्षा चुनौती बन सकता है।

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