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अमेरिका ने ईरान युद्ध पर 25 अरब डॉलर खर्च किए:ईरान बोला- जंग किसी समस्या का समाधान नहीं, बातचीत ही एकमात्र रास्ता

अमेरिका ने ईरान युद्ध पर 25 अरब डॉलर खर्च किए:ईरान बोला- जंग किसी समस्या का समाधान नहीं, बातचीत ही एकमात्र रास्ता

अमेरिका ईरान युद्ध पर पिछले 2 महीने में अब तक 25 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के सीनियर अधिकारी जूल्स डब्ल्यू. हर्स्ट ने बुधवार को इसकी जानकारी संसद की आर्म्ड सर्विसेज कमेटी की सुनवाई में दी। हर्स्ट के मुताबिक कुल खर्च का बड़ा हिस्सा हथियारों, मिसाइलों और गोला-बारूद पर हुआ है। दूसरी तरफ ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खातिबजादेह ने कहा कि जंग किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि मौजूदा संकट से निकलने का एकमात्र रास्ता बातचीत और कूटनीति है। खातिबजादेह ने कहा कि ईरान कई हफ्तों से युद्ध खत्म करने के लिए प्रस्ताव देता रहा है। युद्धविराम की कोशिशों के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि ईरान ने समान शर्तों और बराबरी के आधार पर बातचीत का रास्ता सुझाया है। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… 1. ट्रम्प ने राइफल के साथ फोटो शेयर की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने राइफल के साथ फोटो पोस्ट कर ईरान को चेतावनी दी। फोटो पर लिखा था- नो मोर मिस्टर नाइस गाइ। 2. स्वीडिश PM ने अमेरिकी रणनीति पर सवाल उठाए स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन ने कहा कि ईरान जंग में अमेरिका के पास कोई साफ रणनीति नजर नहीं आ रही। 3. ईरान ने UN में अमेरिका की शिकायत की ईरान ने संयुक्त राष्ट्र में शिकायत कर अमेरिका पर जहाज जब्त करने और 38 लाख बैरल तेल कब्जाने का आरोप लगाया। 4. लेबनान में 12 लाख लोगों पर भूखमरी का खतरा UN से जुड़ी रिपोर्ट में कहा गया कि युद्ध, विस्थापन और आर्थिक दबाव के कारण लेबनान में 12 लाख से ज्यादा लोग खाद्य संकट झेल सकते हैं। 5. भारत-ईरान विदेश मंत्रियों की फोन पर बातचीत विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने युद्धविराम, द्विपक्षीय रिश्तों और क्षेत्रीय हालात पर फोन पर चर्चा की। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग गुजर जाइए…

500 रुपये किलो बिक रहा झारखंड का ये फूल, जोड़ों के दर्द और डायबिटीज का है रामबाण, यहां साग बनाकर खा रहे हैं लोग

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Last Updated:April 30, 2026, 06:31 IST Koderma Korea Phool: झारखंड में कोडरमा के जंगलों में कोरिया फूल बड़ी मात्रा में पाया जाता है. यहां के ग्रामीण इसे साग सब्जी की तरह खाते हैं. इसकी इस समय बाजार में कीमत करीब 500 रुपये किलो है. बता दें कि जोड़ों के दर्द और डायबिटीज के मरीजों के लिए यह रामबाण है. ख़बरें फटाफट कोडरमा: झारखंड का जंगल केवल प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि औषधीय और पोषक वन संपदाओं के लिए भी खास पहचान रखता है. इन्हीं में एक है कोरिया फूल, जो इन दिनों कोडरमा के जंगलों में खूब नजर आ रहा है. सालभर में केवल कुछ महीने मिलने वाला यह सफेद और खुशबूदार फूल स्थानीय लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है. ग्रामीण इसे जंगलों से तोड़कर साग और सब्जी के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं. पौष्टिकता और औषधीय गुणों से भरपूर इस फूल की मांग बाजार में भी बढ़ रही है. आइये जानते हैं इस फूल के बारे में. जानें इस फूल की खासियत कोडरमा के स्थानीय लोगों के अनुसार कोरिया फूल स्वादिष्ट होने के साथ शरीर के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है. इसके फूलों से साग, सब्जी और कई पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं. कोरिया का पौधा आमतौर पर 8 से 10 फीट तक ऊंचा होता है. इसका तना खुरदुरा होता है. जबकि पत्तियां नुकीली और मुलायम होती हैं. इस पौधे पर खिलने वाले सफेद रंग के फूल बेहद आकर्षक और सुगंधित होते हैं. जोड़ों की दर्द और डायबिटीज में देता है राहत बता दें कि यह फूल सीमित समय के लिए उपलब्ध होता है. इसलिए इसकी विशेष अहमियत है. जंगलों तक पहुंच रखने वाले लोग ही इसे आसानी से प्राप्त कर पाते हैं. यही वजह है कि बाजार में पहुंचने पर इसकी कीमत 500 रुपये प्रति किलो तक हो जाती है. कृषि विज्ञान केंद्र कोडरमा के वरीय कृषि वैज्ञानिक डॉ. ए.के. राय ने बताया कि कोरिया फूल न सिर्फ पौष्टिक है. बल्कि इसमें कई औषधीय गुण भी मौजूद हैं. उन्होंने बताया कि इसका सेवन जोड़ों के दर्द और डायबिटीज में भी राहत देने वाला माना जाता है. बरसात में लगा सकते हैं इसका पौधा उन्होंने कहा कि यह जंगली पौधा होने के कारण इसकी देखभाल भी ज्यादा नहीं करनी पड़ती. लोग चाहें तो अपने खेत की मेड़, बागान या खाली जमीन पर इसकी खेती कर सकते हैं. बरसात के मौसम में जंगल या नर्सरी से पौधा मंगाकर इसे आसानी से लगाया जा सकता है. About the Author Brijendra Pratap Singh बृजेंद्र प्रताप सिंह डिजिटल-टीवी मीडिया में (2021) लगभग 5 सालों से सक्रिय हैं. मेट्रो न्यूज 24 टीवी चैनल मुंबई, ईटीवी भारत डेस्क, दैनिक भास्कर डिजिटल डेस्क के अनुभव के साथ 14 मई 2024 से News.in में सीनियर कंटें…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Kodarma,Jharkhand First Published : April 30, 2026, 06:31 IST

कटनी में जनऔषधि केंद्र प्लेटफार्म से दूर:साइन बोर्ड नहीं रहने से यात्रियों को नहीं मिल पा रहा सस्ती दवाओं का लाभ

कटनी में जनऔषधि केंद्र प्लेटफार्म से दूर:साइन बोर्ड नहीं रहने से यात्रियों को नहीं मिल पा रहा सस्ती दवाओं का लाभ

कटनी स्टेशन पर रेलवे की ओर से यात्रियों के लिए शुरू किया गया प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्र अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पा रहा है। केंद्र की स्थापना स्टेशन के बाहर पार्किंग क्षेत्र में होने और सूचना के अभाव के कारण यात्री सस्ती दवाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। यह जनऔषधि केंद्र कटनी स्टेशन पर पिछले लगभग डेढ़ वर्षों से संचालित है। नियमों के अनुसार, इसे प्लेटफॉर्म पर या यात्रियों की आसान पहुंच वाली जगह पर होना चाहिए था। हालांकि, यह केंद्र वर्तमान में स्टेशन के मुख्य भवन से बाहर सर्कुलेटिंग एरिया में पार्किंग क्षेत्र के पास स्थित है। प्लेटफॉर्म से इसकी अधिक दूरी के कारण, ट्रेन के ठहराव के समय यात्री यहां आकर दवा खरीदने में असमर्थ रहते हैं। सूचना अभाव से केंद्र तक नहीं पहुंच पाते यात्री केंद्र की असफलता का एक प्रमुख कारण रेलवे का कमजोर सूचना तंत्र भी है। स्टेशन परिसर या प्लेटफॉर्मों पर इस केंद्र के संबंध में कोई साइन बोर्ड या दिशा-सूचक नहीं लगाए गए हैं। इसके अलावा, स्टेशन पर होने वाली आधिकारिक घोषणाओं में भी जनऔषधि केंद्र का उल्लेख नहीं किया जाता। नतीजतन, बाहर से आने वाले यात्रियों को स्टेशन परिसर में सस्ती दवाओं की सुविधा उपलब्ध होने की जानकारी नहीं मिल पाती। गर्मी के मौसम में या अचानक तबीयत बिगड़ने पर प्लेटफॉर्म पर दवा न मिलने के कारण यात्रियों को रेलवे हेल्पलाइन का सहारा लेना पड़ता है। ऐसी आपात स्थिति में रेलवे की ओर से डॉक्टर को बुलाया जाता है, जिसके लिए यात्रियों को डॉक्टर की फीस और दवाओं का अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है। यदि यह केंद्र प्लेटफॉर्म पर स्थित होता, तो यात्री स्वयं जाकर प्राथमिक इलाज की दवाएं किफायती दरों पर प्राप्त कर सकते थे। यात्री बोले-जानकारी देने वाला कोई नहीं एक यात्री विजय कुमार ने बताया, ‘सफर में अचानक तबीयत खराब होने पर प्लेटफॉर्म पर दवा न मिलना बड़ी मुसीबत है। अगर केंद्र प्लेटफॉर्म पर हो तो राहत मिले, यहां तो जानकारी देने वाला भी कोई नहीं है।’ बच्चों के साथ सफर के दौरान अचानक दवाओं की जरूरत पड़ती है, लेकिन कटनी स्टेशन पर यह सुविधा आसानी से उपलब्ध नहीं है। यात्री कंचन सिंह ने बताया कि स्टेशन के अंदर दवा केंद्र नहीं होने से परेशानी होती है। स्टेशन प्रबंधक बोले-जल्द लगवाया जाएगा साइन बोर्ड स्टेशन के बाहर संचालित जन औषधि केंद्र का संचालन निजी फर्म की ओर से किया जा रहा है, जहां संचालक को रेलवे को तय किराया देना होता है और दवाएं निर्धारित छूट पर उपलब्ध करानी होती हैं। हालांकि, स्टेशन परिसर के बाहर होने के कारण यहां ग्राहकों की संख्या कम रहती है, जिससे यात्रियों को इसका लाभ नहीं मिल पाता। केंद्र के कर्मचारियों के अनुसार, अधिकांश यात्री ट्रेन के दौरान इस सुविधा तक पहुंच ही नहीं पाते और बाहर निकलने पर ही यहां आते हैं, जिससे इसकी उपयोगिता सीमित हो जाती है। स्टेशन प्रबंधक संजय दुबे ने बताया कि यात्रियों की सुविधा के लिए जन औषधि केंद्र संचालित किया जा रहा है और जल्द ही इसे लेकर साइन बोर्ड भी लगवाया जाएगा, ताकि यात्रियों को इसकी जानकारी मिल सके।

गाय-बछड़ा चुराने वाले तीन गिरफ्तार

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सागर| शहर में पिछले कुछ दिनों से गाय-बछड़ों को ऑटो व अन्य वाहनों से चोरी करने की वारदात सामने आने के बाद गोपालगंज पुलिस ने सीसीटीवी कंट्रोल रूम की टीम के साथ मिलकर तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। गोपालगंज थाना प्रभारी घनश्याम शर्मा ने बताया कि एकता कॉलोनी से सफेद गाय और लाल बछड़े की चोरी के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद क्षेत्र में आक्रोश था। कंट्रोल रूम के प्रभारी आरकेएस चौहान व रेखा रजक ने शहर के सैकड़ों सीसीटीवी कैमरों को खंगाला। सूक्ष्म विश्लेषण के दौरान एक संदिग्ध पीले-काले रंग का ऑटो दिखाई दिया। जिस पर हरे रंग का स्टिकर लगा था। इसी क्लू के आधार पर पुलिस ने मुखबिर तंत्र सक्रिय किया और आरोपियों को दबोच लिया। पुलिस ने बाघराज निवासी कासिम कुरैशी व राहतगढ़ बस स्टैंड के पास रहने वाले शाहरुख कुरैशी व चांद उर्फ दिलावर को गिरफ्तार किया है।

खांसी की जांच कराने आई अविवाहित को बताया प्रेग्नेंट:स्वस्थ युवक को हैपेटाइटिस का मरीज, गड़बड़ी या फ्री जांच का मॉडल फेल करने की कोशिश?

खांसी की जांच कराने आई अविवाहित को बताया प्रेग्नेंट:स्वस्थ युवक को हैपेटाइटिस का मरीज, गड़बड़ी या फ्री जांच का मॉडल फेल करने की कोशिश?

अलवर में खांसी की जांच कराने आई अविवाहित युवती को प्रेग्नेंट बता दिया। युवक को हैपेटाइटिस सी की जांच में निगेटिव की बजाय पॉजिटिव बता दिया। ये तो सिर्फ 2 उदाहरण हैं। राजस्थान में स्वास्थ्य जांच के लिए अपनाए गए मदर-हब और स्पॉक मॉडल में ऐसी ही गलत रिपोट्‌र्स ने कई मरीजों का बीपी बढ़ा दिया। दरअसल, मरीजों को घर के पास के ही चिकित्सा संस्थानों में जांच की सुविधा के लिए राज्य सरकार ने मदर-हब और स्पॉक मॉडल लागू किया है। इस मॉडल के तहत प्रदेश के जिला-सैटेलाइट अस्पतालों और सीएचसी पर जांचों का काम कृष्णा डायग्नोस्टिक लैब प्राइवेट लिमिटेड को सौंपा गया। स्वास्थ्य विभाग ने भी माना है कि लापरवाही हुई है। कर्मचारियों पर एक्शन पर लिया है, लेकिन बड़ा सवाल है कि ऐसी गलतियां हो क्यों रही हैं? भास्कर रिपोर्टर ने इसी सवाल का जवाब जानने की कोशिश की। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… केस 1 : एक नाम की 3 युवतियां, बदली रिपोर्ट अलवर के काला कुआं सैटेलाइट अस्पताल में अविवाहित युवती खांसी का इलाज कराने आई थी। डॉक्टर ने कुछ जांचें लिखीं। रिपोर्ट आई तो युवती और उसके परिजन हैरान हो गए। जांच रिपोर्ट में उसे प्रेग्नेंट बता दिया। परिजनों के हंगामे के बाद मामले की जांच की तो सामने आया कि उस वक्त एक ही नाम की 3 युवतियां आई हुई थीं। प्रेग्नेंट युवती की रिपोर्ट अविवाहित युवती को थमा दी गई। तथ्यात्मक रिपोर्ट में लैब ने तर्क दिया है कि लैब के बाहर काफी भीड़ थी। एक ही नाम की तीन युवतियां थीं और उस युवती ने ओपीडी पर्ची या लैब द्वारा जारी जीरो बिल की प्रति भी नहीं दिखाई। हालांकि हंगामे के बाद रिपोर्ट बदल दी गई। मामले में कृष्णा लैब के स्टाफ के दस्तावेजों के सत्यापन के लिए कमेटी का गठन किया गया। लापरवाह कर्मचारियों को सेवा से अलग कर दिया गया। इसके अलावा कृष्णा लैब डायग्नोस्टिक के मैनेजर को रिपोर्ट वितरण में लापरवाही को लेकर चेतावनी जारी की गई है। केस 2 : निगेटिव रिपोर्ट को बताया पॉजिटिव टोंक के लाम्बा हरिसिंह सीएचसी में एक मरीज का सैंपल सेरोलॉजी जांच के लिए लिया गया। प्रारंभिक रिपोर्ट में हैपेटाइटिस सी पॉजिटिव बता दिया गया। जांच की तो सामने आया कि लैब टेक्निशियन गायत्री ने कम्प्यूटर में डेटा एंट्री के दौरान गलती कर दी थी। ऐसे में रिपोर्ट गलत तैयार हो गई। अगले दिन फिर जांच कराई गई। इस बार रिपोर्ट निगेटिव आई। दूसरी जांचों में भी रिपोर्ट निगेटिव आई। मामले में संबंधित लैब टेक्नीशियन को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। केस 3 : एक दिन में 2 जांच, दोनों रिपोर्ट अलग पिछले महीने उदयपुर के बड़गांव सैटेलाइट अस्पताल में भी एक मामला सामने आया था। मरीज की एक ही दिन में 2 बार जांच कराई गई। दोनों की रिपोर्ट में अंतर था। मामले की तथ्यात्मक रिपोर्ट के अनुसार 450 की ओपीडी वाले अस्पताल में सैम्पलिंग, कम्प्यूटर कार्य, रिपोर्टिंग और अन्य कार्यों के लिए एक ही स्टाफ लगाया गया था। स्टाफ के दस्तावेत मांगने पर उपलब्ध नहीं कराए गए। रिपोर्ट में लिखा है कि मामले में मैनेजर ने कमेटी के समक्ष लिखित और मौखिक रूप से स्टाफ का अप्रशिक्षित होना स्वीकार किया। हालांकि अब बड़गांव में दूसरा स्टाफ लगा दिया है। फर्म ने गड़बड़ी के आरोपों को नकारा कृष्णा डायग्नोस्टिक लैब प्राइवेट लिमिटेड के जोन हैड विपिन दीक्षित ने बताया कीफर्म के पास जांच करने, मशीनें लगाने, कंज्यूमेबल और स्टाफ गैप फिलिंग का जिम्मा है। अगर किसी अस्पताल में 10 लैब टेक्नीशियन की जरूरत है और 7 पहले से हैं तो फर्म को 3 लैब टेक्नीशियन ही लगाने होते हैं। प्रदेश भर में हमारी फर्म ने करीब साढ़े तीन हजार लैब टेक्नीशियन लगा रखे हैं। हमने गाइड लाइन के तहत राजस्थान पैरामेडिकल काउंसिल से रजिस्टर्ड लैब टेक्नीशियन ही लगा रखे हैं। हमारी जांच रिपोर्ट में किसी भी प्रकार की गड़बड़ सामने नहीं आई है। मामले में स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉ.रविप्रकाश शर्मा ने बताया कि जो भी शिकायतें सामने आ रही हैं, उसके लिए संबंधित चिकित्सा संस्थान प्रभारियों को जांच के लिए निर्देश दिए गए हैं। इस मामले में कुछ जगहों पर सेवा प्रदाता फर्म को नोटिस भी जारी किए गए हैं। लापरवाहियों के पीछे ये भी कारण? राज्य सरकार ने मरीजों को ज्यादा से ज्यादा जांच की सुविधा उनके पास के ही चिकित्सा संस्थान में देने की मंशा ये मॉडल लागू किया है। मॉडल के प्रॉपर तरीके से लागू नहीं होने के पीछे कई तरह के इश्यूज हैं। स्वास्थ्य विभाग की जांच में कुछ जगहों पर स्टाफ की कमी और कर्मचारियों की लापरवाही की बात सामने आ चुकी है। वहीं कुछ जगहों पर इस मॉडल को फेल करने की कोशिशें भी बताई जा रही हैं। ऑफ द रिकॉर्ड कुछ अधिकारियों ने बताया कि अब तक इन अस्पतालों में सीमित जांचें होती थी। अब जांचों का दायरा बढ़ गया है तो काम का प्रेशर भी बढ़ गया है। जो जांचें पहले निजी लैब में कराई जाती थीं, वो जांचें भी अब इन्हीं लैब में निशुल्क कराई जाने लगी हैं। माना जा रहा है कि इस कारण ये इस मॉडल को फेल करने की भी कोशिशें हो रही हैं। क्या है मदर-हब और स्पॉक मॉडल भारत सरकार की फ्री डायग्नोस्टिक सर्विस इनिशिएटिव गाइडलाइन के अनुसार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत निशुल्क जांचों को हब-स्पॉक मॉडल पर प्रदेशभर में लागू किया गया है। इसमें ट्रोपोनिन, कैंसर मार्कर, बायोप्सी, ब्लड और बॉडी फ्लूड कल्चर, विटामिन्स, थैलेसीमिया, हीमोफिलिया, मौसमी बीमारियों व थायराइड समेत अन्य जांचें शामिल की गई है। जिला अस्पतालों में 56 के बजाय 145, उप जिला व सैटेलाइट अस्पतालों में 56 से बढ़ाकर 117, सीएचसी में 37 की जगह 101 और पीएचसी व डिस्पेंसरी में 15 से बढ़ाकर 66 प्रकार की जांचें आउटसोर्स मोड पर उपलब्ध कराई जाएंगी। इस मॉडल को लागू करने के लिए प्रदेशभर में एक ही फर्म को काम सौंपा गया है। जिसमें फर्म को अतिरिक्त मशीनें और स्टाफ लगाने की भी जिम्मेदारी सौंपी गई है। …. राजस्थान में हेल्थ सर्विसेज से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… 2.50 लाख वाला इलाज मुफ्त, लेकिन नंबर 4 महीने बाद:गैलरी में बेड लगाकर ट्रीटमेंट के लिए मजबूर मरीज, बोले- बिना ठीक हुए कैसे लौटें पंचकर्म से लकवा, गठिया, स्लिप डिस्क जैसी बीमारियों का इलाज

UP Banda Heatwave Alert; Temperature Increase Reason

UP Banda Heatwave Alert; Temperature Increase Reason

यूपी के बांदा की चर्चा इन दिनों देश-दुनिया में है। कारण है, भीषण गर्मी। 27 अप्रैल को यहां का तापमान 47.6°C तक पहुंच गया। इस दिन यह दुनिया का सबसे गर्म शहर दर्ज किया गया। सवाल उठा कि दुनिया में भीषण तपने वाले रेगिस्तानों से भी यह गर्म है? अगर हां, तो . मौसम वैझानिक कहते हैं- बांदा का तापमान पिछले 20 साल से लगातार बढ़ रहा है। जून, 2019 में तो यहां का पारा 49°C पार कर गया था। मौसम वेबसाइट एक्यूवेदर के मुताबिक, 27 अप्रैल, 2026 को राजस्थान के थार रेगिस्तान का तापमान 46°C और अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान का 30°C था। ऊपर अधिकतम और नीचे न्यूनतम तापमान दिखाया गया है। दुनिया में डेथ वैली, लुत रेगिस्तान गर्मी का पर्याय, वहां कितनी गर्मी… दुनिया में सबसे गर्म स्थानों में डेथ वैली, लुत मरुस्थल और इथियोपिया देश का डलोल है। यहां तापमान अलग-अलग तरीकों से मापा जाता है। हवा के तापमान के आधार पर- विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक, अमेरिका की डेथ वैली को दुनिया की सबसे गर्म जगह माना जाता है। 10 जुलाई, 1913 को यहां हवा का तापमान 56.7°C दर्ज किया गया था। हालांकि, 27 अप्रैल, 2026 को यहां का तापमान 28°C था। जमीन के तापमान के आधार पर- जमीन के तापमान के आधार पर ईरान का लुत मरुस्थल दुनिया में सबसे ज्यादा गर्म रहता है। नासा के सैटेलाइट ने 2003 से 2009 के बीच यहां की जमीन का तापमान 70.7°C दर्ज किया था। यहां के कुछ हिस्से इतने गर्म हैं कि जीवन असंभव है। 27 अप्रैल को यहां का तापमान 27°C था। औसत तापमान के आधार पर- औसत तापमान के आधार पर इथियोपिया देश की डलोल एक ऐसी जगह है, जहां सालभर गर्मी रहती है। यहां सालभर तापमान करीब 34-35°C रहता है। 27 अप्रैल को यहां का तापमान 35°C था। बांदा में इतनी गर्मी क्यों… लखनऊ के आंचलिक मौसम विज्ञान केंद्र के सीनियर साइंटिस्ट अतुल कुमार सिंह कहते हैं- बांदा की जमीनें उबड़-खाबड़ पठार और मैदान हैं। यहां की जमीन में ग्रेनाइट और विंध्य पर्वत की चट्टानें हैं। पत्थर और चट्टानों की खूबी होती है कि ये सूरज के ताप से बहुत जल्दी गर्म हो जाती हैं, लेकिन ठंडी धीरे-धीरे होती हैं। इससे सूरज डूबने के बाद भी वातावरण में भीषण गर्मी महसूस होती रहती है। बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के मौसम विज्ञानी डॉ. दिनेश शाह कहते हैं- राजस्थान से आ रही गर्म हवाएं बांदा का तापमान और बढ़ा रही हैं। तेज धूप और वातावरण में नमी की कमी के कारण तपन ज्यादा महसूस हो रही है। पारे वाले थर्मामीटर, ऑटोमैटिक सेंसर से मापते हैं तापमान मौसम वैज्ञानिक अतुल कुमार सिंह बताते हैं- तापमान मापने के लिए लकड़ी के एक बॉक्स में पारे वाला थर्मामीटर रखा जाता है। ये बॉक्स इस तरह से बना होता है कि हवा इसके अंदर से गुजर सके। जिस इलाके का तापमान मापना होता है, वहां इसे 24 घंटे के लिए छोड़ दिया जाता है। थर्मामीटर दिनभर तापमान मापता है और सबसे ऊंचे तापमान वाले पॉइंट पर जाकर रुक जाता है। बाद में इसे मौसम वैज्ञानिक रिकॉर्ड कर लेते हैं। बांदा कृषि विश्वविद्यालय के मौसम विज्ञानी डॉ. दिनेश शाह ने बताया- तीन विभाग बांदा में तापमान मापते हैं। मौसम विभाग कलेक्ट्रेट के आसपास तापमान रिकॉर्ड करता है। यूपी डिजास्टर मैनेजमेंट ने हर तहसील में डिजिटल और ऑटोमैटिक सेंसर लगाए हैं। बांदा कृषि विश्वविद्यालय ऑटोमैटिक सेंसर और पारे वाला थर्मामीटर से तापमान मापता है। ये यूनिवर्सिटी शहर से 5-6 किलोमीटर दूर है। विश्वविद्यालय की रीडिंग देहात क्षेत्र की मानी जाती है। बांदा से सटे शहर भी क्या इतने ही गर्म हैं बांदा के आसपास के जिलों में भी तेज गर्मी पड़ रही है। हालांकि, तापमान बांदा से कम है। 27 अप्रैल को जब बांदा का तापमान 47.6°C पहुंचा, तब उससे लगने वाले फतेहपुर, हमीरपुर, महोबा और चित्रकूट में भी तापमान 46 के करीब था। मौसम विभाग के मुताबिक, आने वाले दिनों में वहां भी तापमान धीरे-धीरे बढ़ेगा। बुंदेलखंड के बांदा, झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, महोबा और चित्रकूट में गर्मी का पैटर्न लगभग एक जैसा रहने वाला है। मतलब सारे जिले 44 से 46°C तापमान तक गर्म होते हैं। बांदा में हीटवेव का असर, अस्पतालों में बढ़े मरीज बांदा में भीषण गर्मी से अस्पतालों में मरीज बढ़ने लगे हैं। जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक के. कुमार ने बताया- हर दिन 500-600 मरीज आते हैं। कभी-कभी ये संख्या एक हजार के पार हो जाती है। इनमें सैकड़ों लोगों को भर्ती करना पड़ रहा है। ये मरीज उल्टी, दस्त और पेट दर्द से परेशान हैं। 2024 में गर्मी से 200 चमगादड़ों की मौत हो गई थी। इसके साथ ही कुछ तोते ने भी दम तोड़ दिया था। मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी निर्मल कुमार ने इसकी पुष्टि की थी। बांदा नगर पालिका ने हीटवेव से बचने के किए कूलिंग सेंटर बनाए हैं। गर्मी से बचने के लिए बच्चे केन नदी में नहाते रहते हैं। ———————– ये खबर भी पढ़ें… यूपी में अचानक मौसम पलटा, 6 जिलों में ओले गिरे, 15 शहरों में आंधी-बारिश; लखनऊ में अंधेरा छाया यूपी में मौसम ने करवट ले ली है। बुधवार दोपहर प्रयागराज, जौनपुर, आगरा, उन्नाव और अमेठी में ओले गिरे। आंधी के साथ तेज बारिश हुई। लखनऊ में अंधेरा छा गया। आसमान काले बादलों से ढक गया। तेज हवाओं के साथ बारिश शुरू हो गई। कुछ इलाकों में ओले भी गिरे। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

हिमाचल में UP के टूरिस्ट व्हीकल का ₹3500 का चालान:ओवरटेक करने पर मनाली पुलिस का एक्शन, अटल टनल के भीतर ट्रैफिक रूल्स तोड़े

हिमाचल में UP के टूरिस्ट व्हीकल का ₹3500 का चालान:ओवरटेक करने पर मनाली पुलिस का एक्शन, अटल टनल के भीतर ट्रैफिक रूल्स तोड़े

हिमाचल प्रदेश में एक टूरिस्ट को यातायात नियमों की अनदेखी महंगी पड़ी है। मनाली पुलिस ने अटल टनल के भीतर ओवर-स्पीडिंग का 3500 रुपए का चालान काटा है। उत्तर प्रदेश नंबर की एक कार रोंग साइड से ओवर टेक कर रही थी। इसका वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने चालान काटा है। अटल टनल के भीतर ओवर टेकिंग अलाउड नहीं है। फिर भी उतर प्रदेश के पर्यटक ने दूसरी लेन से ओवर टेक किया। जिस गाड़ी का चालान हुआ है, वह उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ निवासी अक्षय कुमार के नाम पर पंजीकृत है। गाड़ी का नंबर UP-81-DZ-6835 है। टनल के भीतर ओवरटेक करना प्रतिबंधित: DSP डीएसपी मनाली केडी शर्मा ने बताया कि टनल के अंदर वाहन रोकना, ओवरटेक करना, सनरूफ से बाहर निकलना और तय गति सीमा से तेज गाड़ी चलाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। टनल के भीतर सीसीटीवी कैमरे और साइन बोर्ड: शर्मा केडी शर्मा ने बताया कि अटल टनल के साउथ पोर्टल पर तैनात पुलिसकर्मी लगातार पर्यटकों को नियमों की जानकारी देते हैं। उन्होंने कहा कि टनल में सीसीटीवी कैमरे और गति सीमा दर्शाने वाले साइन बोर्ड भी लगाए गए हैं, इसके बावजूद कुछ पर्यटक नियमों की अनदेखी करते हैं। उन्होंने कहा कि जो भी यातायात नियमों की अवहेलना करेगा, उनके खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।

परमवीर ने ‘मर्दानी3’ और ‘धुरंधर’ का ऑफर ठुकरा दिया था:बोले- सही वक्त नहीं था, सीरीज की स्टारकास्ट बोली- सपना टूटना मरने जैसा है

परमवीर ने ‘मर्दानी3’ और ‘धुरंधर’ का ऑफर ठुकरा दिया था:बोले- सही वक्त नहीं था, सीरीज की स्टारकास्ट बोली- सपना टूटना मरने जैसा है

सीरीज ‘सपने वर्सेस एवरीवन’ का दूसरा सीजन सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, टूटने और फिर खड़े होने की असली जर्नी है। दैनिक भास्कर से बातचीत में लेखक- निर्देशक-एक्टर अंबरीश वर्मा, एक्टर परमवीर सिंह चीमा और विजयंत कोहली ने खुलकर बताया कि कैसे यह शो उनकी जिंदगी के बेहद करीब है। जहां अंबरीश इसे जिम्मेदारी मानते हैं, वहीं परमवीर मानते हैं कि इस शो ने उन्हें अंदर से बदला। बातचीत में रिजेक्शन, बर्नआउट, और सपनों के टूटने का दर्द भी सामने आया, साथ ही ‘धुरंधर’ और ‘मर्दानी 3’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट छोड़ने के फैसले पर भी साफ जवाब मिले। पेश है कुछ प्रमुख अंश.. सवाल ‘सपने वर्सेस एवरीवन’ आपके लिए क्या मायने रखता है? सीजन 2 कितना खास है? जवाब/अंबरीश वर्मा: ये मेरे जीवन का सबसे क्लोज शो है। इसकी कहानियां बहुत पर्सनल हैं और ऐसी कहानियां बार-बार नहीं मिलतीं, जो किसी की सोच या जिंदगी बदल सकें। सीजन 2 मेरे लिए सिर्फ करियर का मौका नहीं, एक जिम्मेदारी है- कुछ ऐसा कहने की, जो लोगों पर असर डाले। विजयंत कोहली: सीजन 1 एक हैप्पी एंडिंग पर खत्म हुआ था, इसलिए लोगों के मन में सवाल था कि सीजन 2 आएगा या नहीं। लेकिन जब पहला सीजन इतना पसंद किया गया, तो दूसरा बनाना एक जिम्मेदारी बन गया। इस बार एक्सपेक्टेशन भी ज्यादा है। परमवीर सिंह चीमा: ये शो सिर्फ अच्छा नहीं है, लोगों को मोटिवेट करता है। इसने मुझे भी अंदर से बदला है। मैं आज भी इसे देखकर खुद को याद दिलाता हूं कि अपने असली स्वभाव से मत भटक। सवाल : क्या इस शो ने आपकी सोच बदली? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: हां, बहुत। इंडस्ट्री में धीरे-धीरे इंसान थोड़ा शातिर हो जाता है, लेकिन इस शो ने मुझे खुद के मूल्यों पर टिके रहने की याद दिलाई। जब भी नेगेटिव सोच आती है, मैं खुद से कहता हूं- “डर छोड़, आगे बढ़।” सवाल: सपना टूटना मरने जैसा है, क्या आपने ऐसा महसूस किया है? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: हर इंसान इस फेज से गुजरता है। कोविड के दौरान मैंने सपने छोड़ भी दिए थे और घर लौट गया था। कई बार इतना बर्नआउट हो जाता है कि लगता है सब खत्म हो गया। लेकिन फिर खुद को टाइम देकर, थोड़ा रुककर, फिर से उठना पड़ता है, यही असली जंग है। सवाल: क्या कभी लगा कि ये जंग छोड़ दें? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: हां, कोविड के समय छोड़ दिया था। पैसों की दिक्कत थी, सर्वाइवल मुश्किल था। मैं किसान परिवार से हूं, जानता था घर से पैसे कैसे आ रहे हैं। लेकिन मेरे पिता ने कहा- “मैं तेरे साथ हूं, तू क्यों हार मान रहा है?” वही बात मेरे लिए टर्निंग पॉइंट बनी। सवाल: अंबरीश, आपकी कहानी इतनी रिलेटेबल कैसे बनी? क्या आप खुद टूटे हैं? जवाब/अंबरीश वर्मा: टूटना हर किसी की जिंदगी का हिस्सा है। पहले ये चीजें मुझे बहुत ज्यादा हिट करती थीं और लंबे समय तक असर रहता था। फिर समझ आया कि हम चीजों को जरूरत से ज्यादा महत्व दे देते हैं, इसलिए दर्द ज्यादा होता है। जब पर्सपेक्टिव बदलता है, तो वही चीजें उतनी भारी नहीं लगतीं। सवाल: लाइफ में मंजिल ज्यादा जरूरी है या सफर? जवाब/अंबरीश वर्मा: हम लाइफ को माइलस्टोन्स से जोड़ देते हैं- जैसे प्रमोशन, पैसा, शादी। लेकिन असल लाइफ वो है जो इनके बीच में होती है। जब ये समझ आता है, तो चीजों का असर कम हो जाता है। विजयंत कोहली: हम भागते रहते हैं, लेकिन रुककर जीना भूल जाते हैं। अगर छोटी खुशियां एन्जॉय नहीं कीं, तो ये दौड़ कभी खत्म नहीं होगी। सवाल : सबसे बड़ा चांस क्या मिला जिंदगी में? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: इस शो में मुझे नॉन-पंजाबी किरदार मिला, यही मेरे लिए लाइफ-चेंजिंग मौका था। इससे लोगों ने मुझे एक अलग नजर से देखना शुरू किया। अंबरीश वर्मा: नौकरी छोड़कर लिखना शुरू करना सबसे बड़ा चांस था। कुछ भी नहीं था, लेकिन वही रिस्क मेरी जिंदगी बदल गया। विजयंत कोहली: इस शो ने मेरी “सॉफ्ट” इमेज तोड़ी और मुझे एक अलग तरह का किरदार निभाने का मौका दिया। सवाल: सबसे मुश्किल दौर या रिजेक्शन? जवाब/अंबरीश वर्मा: 2019 में नौकरी छोड़ने के बाद कोई काम नहीं था। गिल्ट और डर दोनों थे- क्या कर रहा हूं मैं? वो फेज बहुत भारी था, लेकिन वहीं से रास्ता बना। विजयंत कोहली: एक्टर की जिंदगी में रिजेक्शन रोज होता है। इसे स्वीकार करना ही सबसे बड़ी सीख है। सवाल : क्या कभी लगा कि फैसला गलत था? जवाब/अंबरीश वर्मा: अगर आप किसी से पूछ रहे हो कि छोड़ूं या नहीं , तो आप तैयार नहीं हो। जब आप अंदर से कन्विंस्ड होते हो, तो खुद ही कदम उठाते हो। मैंने भी बिना पूछे नौकरी छोड़ी थी। सवाल: ‘मर्दानी 3’ और ‘धुरंधर’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स छोड़ने की खबरें आईं, सच क्या है? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: ‘मर्दानी 3’ का मामला सीधा था, उस समय मैं एक ही फिल्म कर सकता था। मेरे पास ऑप्शन था ‘तेरे इश्क में’ और ‘मर्दानी 3’ का। मैंने ‘तेरे इश्क में’ चुनी, क्योंकि मैं आनंद सर के साथ काम करना चाहता था और उस वक्त वही सही लगा। जहां तक ‘धुरंधर’ जैसे रोल की बात है तो हर रोल की एक टाइमिंग होती है। अगर वही रोल मुझे 2 साल पहले मिलता, तो शायद मैं कर लेता। लेकिन अब लगा कि वो मेरे लिए सही फिट नहीं है। मैं मानता हूं कि हर इंसान की अपनी किस्मत और अपनी यात्रा होती है। और एक बात, अगर मैं हर रोल खुद ही करता रहूंगा, तो बाकी लोग क्या करेंगे? सवाल: क्या अब आपको सपने जैसे ही रोल ऑफर होते हैं? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: हां, कई बार कॉल आते हैं कि “सपने वाला ही किरदार करना है।” लेकिन मैं साफ कहता हूं, अगर वही करना है, तो किसी और को ले लो। मैं खुद को रिपीट नहीं करना चाहता। विजयंत कोहली: मेरे साथ भी ऐसा होता है। लोग उसी तरह का रोल ऑफर करते हैं। तब हमें कहना पड़ता है,थोड़ा अलग लिखो, कुछ नया दो, तभी मजा आएगा। सवाल : सबसे यादगार मौका या चांस? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: जब अंबरीश भाई ने मुझे इस किरदार के लिए चुना, वो मेरे लिए लाइफ-चेंजिंग था। मैं आज भी उन्हें मैसेज

परमवीर ने ‘मर्दानी3’ और ‘धुरंधर’ का ऑफर ठुकरा दिया था:बोले- सही वक्त नहीं था, सीरीज की स्टारकास्ट बोली- सपना टूटना मरने जैसा है

परमवीर ने ‘मर्दानी3’ और ‘धुरंधर’ का ऑफर ठुकरा दिया था:बोले- सही वक्त नहीं था, सीरीज की स्टारकास्ट बोली- सपना टूटना मरने जैसा है

सीरीज ‘सपने वर्सेस एवरीवन’ का दूसरा सीजन सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, टूटने और फिर खड़े होने की असली जर्नी है। दैनिक भास्कर से बातचीत में लेखक- निर्देशक-एक्टर अंबरीश वर्मा, एक्टर परमवीर सिंह चीमा और विजयंत कोहली ने खुलकर बताया कि कैसे यह शो उनकी जिंदगी के बेहद करीब है। जहां अंबरीश इसे जिम्मेदारी मानते हैं, वहीं परमवीर मानते हैं कि इस शो ने उन्हें अंदर से बदला। बातचीत में रिजेक्शन, बर्नआउट, और सपनों के टूटने का दर्द भी सामने आया, साथ ही ‘धुरंधर’ और ‘मर्दानी 3’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट छोड़ने के फैसले पर भी साफ जवाब मिले। पेश है कुछ प्रमुख अंश.. सवाल ‘सपने वर्सेस एवरीवन’ आपके लिए क्या मायने रखता है? सीजन 2 कितना खास है? जवाब/अंबरीश वर्मा: ये मेरे जीवन का सबसे क्लोज शो है। इसकी कहानियां बहुत पर्सनल हैं और ऐसी कहानियां बार-बार नहीं मिलतीं, जो किसी की सोच या जिंदगी बदल सकें। सीजन 2 मेरे लिए सिर्फ करियर का मौका नहीं, एक जिम्मेदारी है- कुछ ऐसा कहने की, जो लोगों पर असर डाले। विजयंत कोहली: सीजन 1 एक हैप्पी एंडिंग पर खत्म हुआ था, इसलिए लोगों के मन में सवाल था कि सीजन 2 आएगा या नहीं। लेकिन जब पहला सीजन इतना पसंद किया गया, तो दूसरा बनाना एक जिम्मेदारी बन गया। इस बार एक्सपेक्टेशन भी ज्यादा है। परमवीर सिंह चीमा: ये शो सिर्फ अच्छा नहीं है, लोगों को मोटिवेट करता है। इसने मुझे भी अंदर से बदला है। मैं आज भी इसे देखकर खुद को याद दिलाता हूं कि अपने असली स्वभाव से मत भटक। सवाल : क्या इस शो ने आपकी सोच बदली? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: हां, बहुत। इंडस्ट्री में धीरे-धीरे इंसान थोड़ा शातिर हो जाता है, लेकिन इस शो ने मुझे खुद के मूल्यों पर टिके रहने की याद दिलाई। जब भी नेगेटिव सोच आती है, मैं खुद से कहता हूं- “डर छोड़, आगे बढ़।” सवाल: सपना टूटना मरने जैसा है, क्या आपने ऐसा महसूस किया है? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: हर इंसान इस फेज से गुजरता है। कोविड के दौरान मैंने सपने छोड़ भी दिए थे और घर लौट गया था। कई बार इतना बर्नआउट हो जाता है कि लगता है सब खत्म हो गया। लेकिन फिर खुद को टाइम देकर, थोड़ा रुककर, फिर से उठना पड़ता है, यही असली जंग है। सवाल: क्या कभी लगा कि ये जंग छोड़ दें? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: हां, कोविड के समय छोड़ दिया था। पैसों की दिक्कत थी, सर्वाइवल मुश्किल था। मैं किसान परिवार से हूं, जानता था घर से पैसे कैसे आ रहे हैं। लेकिन मेरे पिता ने कहा- “मैं तेरे साथ हूं, तू क्यों हार मान रहा है?” वही बात मेरे लिए टर्निंग पॉइंट बनी। सवाल: अंबरीश, आपकी कहानी इतनी रिलेटेबल कैसे बनी? क्या आप खुद टूटे हैं? जवाब/अंबरीश वर्मा: टूटना हर किसी की जिंदगी का हिस्सा है। पहले ये चीजें मुझे बहुत ज्यादा हिट करती थीं और लंबे समय तक असर रहता था। फिर समझ आया कि हम चीजों को जरूरत से ज्यादा महत्व दे देते हैं, इसलिए दर्द ज्यादा होता है। जब पर्सपेक्टिव बदलता है, तो वही चीजें उतनी भारी नहीं लगतीं। सवाल: लाइफ में मंजिल ज्यादा जरूरी है या सफर? जवाब/अंबरीश वर्मा: हम लाइफ को माइलस्टोन्स से जोड़ देते हैं- जैसे प्रमोशन, पैसा, शादी। लेकिन असल लाइफ वो है जो इनके बीच में होती है। जब ये समझ आता है, तो चीजों का असर कम हो जाता है। विजयंत कोहली: हम भागते रहते हैं, लेकिन रुककर जीना भूल जाते हैं। अगर छोटी खुशियां एन्जॉय नहीं कीं, तो ये दौड़ कभी खत्म नहीं होगी। सवाल : सबसे बड़ा चांस क्या मिला जिंदगी में? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: इस शो में मुझे नॉन-पंजाबी किरदार मिला, यही मेरे लिए लाइफ-चेंजिंग मौका था। इससे लोगों ने मुझे एक अलग नजर से देखना शुरू किया। अंबरीश वर्मा: नौकरी छोड़कर लिखना शुरू करना सबसे बड़ा चांस था। कुछ भी नहीं था, लेकिन वही रिस्क मेरी जिंदगी बदल गया। विजयंत कोहली: इस शो ने मेरी “सॉफ्ट” इमेज तोड़ी और मुझे एक अलग तरह का किरदार निभाने का मौका दिया। सवाल: सबसे मुश्किल दौर या रिजेक्शन? जवाब/अंबरीश वर्मा: 2019 में नौकरी छोड़ने के बाद कोई काम नहीं था। गिल्ट और डर दोनों थे- क्या कर रहा हूं मैं? वो फेज बहुत भारी था, लेकिन वहीं से रास्ता बना। विजयंत कोहली: एक्टर की जिंदगी में रिजेक्शन रोज होता है। इसे स्वीकार करना ही सबसे बड़ी सीख है। सवाल : क्या कभी लगा कि फैसला गलत था? जवाब/अंबरीश वर्मा: अगर आप किसी से पूछ रहे हो कि छोड़ूं या नहीं , तो आप तैयार नहीं हो। जब आप अंदर से कन्विंस्ड होते हो, तो खुद ही कदम उठाते हो। मैंने भी बिना पूछे नौकरी छोड़ी थी। सवाल: ‘मर्दानी 3’ और ‘धुरंधर’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स छोड़ने की खबरें आईं, सच क्या है? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: ‘मर्दानी 3’ का मामला सीधा था, उस समय मैं एक ही फिल्म कर सकता था। मेरे पास ऑप्शन था ‘तेरे इश्क में’ और ‘मर्दानी 3’ का। मैंने ‘तेरे इश्क में’ चुनी, क्योंकि मैं आनंद सर के साथ काम करना चाहता था और उस वक्त वही सही लगा। जहां तक ‘धुरंधर’ जैसे रोल की बात है तो हर रोल की एक टाइमिंग होती है। अगर वही रोल मुझे 2 साल पहले मिलता, तो शायद मैं कर लेता। लेकिन अब लगा कि वो मेरे लिए सही फिट नहीं है। मैं मानता हूं कि हर इंसान की अपनी किस्मत और अपनी यात्रा होती है। और एक बात, अगर मैं हर रोल खुद ही करता रहूंगा, तो बाकी लोग क्या करेंगे? सवाल: क्या अब आपको सपने जैसे ही रोल ऑफर होते हैं? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: हां, कई बार कॉल आते हैं कि “सपने वाला ही किरदार करना है।” लेकिन मैं साफ कहता हूं, अगर वही करना है, तो किसी और को ले लो। मैं खुद को रिपीट नहीं करना चाहता। विजयंत कोहली: मेरे साथ भी ऐसा होता है। लोग उसी तरह का रोल ऑफर करते हैं। तब हमें कहना पड़ता है,थोड़ा अलग लिखो, कुछ नया दो, तभी मजा आएगा। सवाल : सबसे यादगार मौका या चांस? जवाब/परमवीर सिंह चीमा: जब अंबरीश भाई ने मुझे इस किरदार के लिए चुना, वो मेरे लिए लाइफ-चेंजिंग था। मैं आज भी उन्हें मैसेज

चंडीगढ़ में नाबालिग फुटबॉल प्लेयर का यौन उत्पीड़न:भरे स्टेडियम में नामी कोच ने पीछे से अंगुली डाली; अफसर जांच करने हथियार लेकर एकेडमी में घुसा

चंडीगढ़ में नाबालिग फुटबॉल प्लेयर का यौन उत्पीड़न:भरे स्टेडियम में नामी कोच ने पीछे से अंगुली डाली; अफसर जांच करने हथियार लेकर एकेडमी में घुसा

चंडीगढ़ में एक नाबालिग फुटबॉल प्लेयर से भरे स्टेडियम में यौन उत्पीड़न हुआ। यौन उत्पीड़न करने वाला कोई और नहीं बल्कि एक नामी फुटबॉल कोच है। प्लेयर का कहना है कि टूर्नामेंट के दौरान 2 टीमों में झगड़ा हुआ। इसी दौरान कोच ने उसके पीछे अंगुली डाल दी। इस मामले में पुलिस ने करीब डेढ़ महीने बाद केस दर्ज किया लेकिन आरोपी कोच को अभी तक अरेस्ट नहीं किया। फुटबॉल प्लेयर की तरफ से इस बारे में चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया और चीफ सेक्रेटरी को शिकायत भेजी गई है। जिसमें उन्होंने कहा कहा कि पुलिस आरोपी को पकड़ने के बजाय गवाहों और शिकायत करने वालों को धमका रही है। उन पर दबाव डाला जा रहा है। उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि उन्हें FIR की कॉपी तक नहीं दी जा रही। यही नहीं, बार-बार नोटिस भेज परेशान किया जा रहा। पुलिस की टीमें सीधे एकेडमी के अंदर आकर दहशत का माहौल बना रही हैं। एक अफसर तो हथियार लेकर ही घुस आया। जिससे बच्चे सहम गए। जानिए, कैसे हुई पूरी घटना गवर्नर को भेजी शिकायत में करीब 15 साल के प्लेयर के वकील ने बताया- इसी साल जनवरी के आखिरी हफ्ते में चंडीगढ़ के स्पोर्ट्स स्टेडियम में फुटबॉल का टूर्नामेंट था। जहां कई टीमें अलग-अलग स्कूल और एकेडमी से हिस्सा लेने आई हुई थीं। इस दौरान एक मैच में 2 टीमों के बीच विवाद हो गया था। दोनों टीमें आपस में उलझ गईं। इस दौरान नाबालिग खिलाड़ी ने आरोप लगाया कि उसके पीछे में अंगुली डाली गई। उससे वह काफी डर गया। इसके बावजूद उसने यह बात अपने सीनियर व कोच को बताई कि ग्राउंड में लड़ाई के दौरान उसके साथ यह घटना हुई। इसके बाद उसने पहले 28 जनवरी को POCSO ई-बॉक्स और ई-बाल निदान पोर्टल पर शिकायत की गई। इसके अगले दिन 29 जनवरी को चंडीगढ़ पुलिस के ऑनलाइन पोर्टल पर भी मामला दर्ज कराया गया। इसके बावजूद FIR दर्ज होने में लगभग डेढ़ महीने लग गए और आखिरकार 12 मार्च 2026 को केस दर्ज किया गया। चाइल्ड वेलफेयर में दर्ज हुए बयान पुलिस ने बच्चे को बयान देने के लिए थाने बुलाया, लेकिन परिवार ने मना कर दिया। उनका कहना था कि इतने छोटे बच्चों को थाने ले जाना ठीक नहीं है, खासकर ऐसे मामले में तो यह बिल्कुल उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि बच्चों के बयान किसी सुरक्षित और आरामदायक जगह पर लिए जाने चाहिए। इसके बाद 9 मार्च को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी में बच्चों के बयान लिए गए और उनका मेडिकल भी हुआ। लेकिन यहां भी काम देरी से हुआ और कुछ चीजें सही तरीके से नहीं हो पाईं, जिससे शिकायत करने वाले लोग संतुष्ट नहीं थे। बार-बार नोटिस और दबाव के आरोप शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि जांच अधिकारी बार-बार नोटिस भेजते रहे, लेकिन कई बार पहले से सही जानकारी या पर्याप्त समय नहीं दिया गया। उन्हें बहुत कम समय में थाने या तय जगह पर आने के लिए कहा जाता था, जिससे उन्हें काफी परेशानी हुई। यही नहीं, जब गवाहों के बयान लिए जा रहे थे, तब उनके कहे हुए शब्दों को बदलने या प्रभावित करने की कोशिश की गई। गवाहों को ऐसा महसूस हुआ कि उनके बयान को सही तरीके से नहीं लिखा जा रहा। इसी वजह से कुछ गवाहों ने अपने बयान देने से ही मना कर दिया। एकेडमी परिसर में प्रवेश पर विवाद परिवार में यह भी आरोप लगाया गया है कि पुलिस टीम बिना परमिशन के परिसर में अंदर आ गई। वहां दबाव बनाने की कोशिश की। शिकायतकर्तां के अनुसार, इस तरह बिना इजाजत आना और सख्त तरीके से पेश आना सही नहीं था, खासकर जहां बच्चे मौजूद हों। उन्होंने 11 मार्च की एक घटना को लेकर भी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि एक पुलिस अफसर हथियार के साथ एकेडमी परिसर में दाखिल हुआ, जहां उस समय नाबालिग बच्चे भी मौजूद थे। इस पर सवाल उठाए गए हैं कि ऐसे संवेदनशील माहौल में इस तरह का व्यवहार बच्चों को डराने वाला हो सकता है। FIR की कॉपी अब तक नहीं मिली 15 अप्रैल और 28 अप्रैल 2026 को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और अन्य बड़े अधिकारियों को लिखित शिकायत भेजी। इसमें उन्होंने बताया कि केस की FIR की कॉपी उन्हें अभी तक नहीं दी गई है। शिकायत में कहा गया है कि उन्होंने कई बार पुलिस से FIR की कॉपी मांगी। लिखित रूप में भी और मौखिक रूप से भी, लेकिन हर बार उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। उनका कहना है कि FIR की कॉपी लेना उनका कानूनी अधिकार है, और इसे न देना नियमों के खिलाफ है। शिकायतकर्ताओं ने यह भी कहा कि FIR की कॉपी ही नहीं दी जा रही, तो इससे जांच की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं। उन्हें लगता है कि इस तरह की देरी और जानकारी न देना सही प्रक्रिया का पालन नहीं है। POCSO नियमों के उल्लंघन का आरोप उनका ये आरोप है कि जांच के दौरान POCSO एक्ट में जो नियम बच्चों की सुरक्षा और सुविधा के लिए बनाए गए हैं, उनका ठीक से पालन नहीं किया गया। इस कानून के तहत यह जरूरी होता है कि नाबालिग बच्चों से बहुत ही संवेदनशील और सुरक्षित माहौल में बात की जाए, ताकि उन्हें डर या दबाव महसूस न हो। मगर, बच्चों को बार-बार अलग-अलग जगहों पर बुलाया गया, उनसे कई बार बयान लेने की कोशिश की गई। यह पूरी प्रक्रिया उनके लिए आसान या आरामदायक नहीं थी। इससे बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ा और वे तनाव में आ गए। अकादमी का कहना है कि ऐसे मामलों में बच्चों की मानसिक स्थिति का खास ध्यान रखना चाहिए, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ, जिसकी वजह से पीड़ित बच्चों को बार-बार परेशानी और तनाव झेलना पड़ा। शिकायतकर्ता पीछे हटा, एकेडमी मालिक ने मोर्चा संभाला इस बीच मामले में एक बड़ा बदलाव सामने आया। शुरुआत में जो व्यक्ति इस केस में शिकायतकर्ता थे, उन्होंने 23 अप्रैल को खुद को इस मामले से अलग कर लिया। उन्होंने बताया कि लगातार यात्रा, समय की कमी और बार-बार पुलिस की ओर से संपर्क किए जाने के कारण उन्हें काफी परेशानी हो रही थी, इसलिए अब वे इस केस में आगे नहीं जुड़ पाएंगे।