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खांसी की जांच कराने आई अविवाहित को बताया प्रेग्नेंट:स्वस्थ युवक को हैपेटाइटिस का मरीज, गड़बड़ी या फ्री जांच का मॉडल फेल करने की कोशिश?

खांसी की जांच कराने आई अविवाहित को बताया प्रेग्नेंट:स्वस्थ युवक को हैपेटाइटिस का मरीज, गड़बड़ी या फ्री जांच का मॉडल फेल करने की कोशिश?

अलवर में खांसी की जांच कराने आई अविवाहित युवती को प्रेग्नेंट बता दिया। युवक को हैपेटाइटिस सी की जांच में निगेटिव की बजाय पॉजिटिव बता दिया। ये तो सिर्फ 2 उदाहरण हैं। राजस्थान में स्वास्थ्य जांच के लिए अपनाए गए मदर-हब और स्पॉक मॉडल में ऐसी ही गलत रिपोट्‌र्स ने कई मरीजों का बीपी बढ़ा दिया। दरअसल, मरीजों को घर के पास के ही चिकित्सा संस्थानों में जांच की सुविधा के लिए राज्य सरकार ने मदर-हब और स्पॉक मॉडल लागू किया है। इस मॉडल के तहत प्रदेश के जिला-सैटेलाइट अस्पतालों और सीएचसी पर जांचों का काम कृष्णा डायग्नोस्टिक लैब प्राइवेट लिमिटेड को सौंपा गया। स्वास्थ्य विभाग ने भी माना है कि लापरवाही हुई है। कर्मचारियों पर एक्शन पर लिया है, लेकिन बड़ा सवाल है कि ऐसी गलतियां हो क्यों रही हैं? भास्कर रिपोर्टर ने इसी सवाल का जवाब जानने की कोशिश की। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… केस 1 : एक नाम की 3 युवतियां, बदली रिपोर्ट अलवर के काला कुआं सैटेलाइट अस्पताल में अविवाहित युवती खांसी का इलाज कराने आई थी। डॉक्टर ने कुछ जांचें लिखीं। रिपोर्ट आई तो युवती और उसके परिजन हैरान हो गए। जांच रिपोर्ट में उसे प्रेग्नेंट बता दिया। परिजनों के हंगामे के बाद मामले की जांच की तो सामने आया कि उस वक्त एक ही नाम की 3 युवतियां आई हुई थीं। प्रेग्नेंट युवती की रिपोर्ट अविवाहित युवती को थमा दी गई। तथ्यात्मक रिपोर्ट में लैब ने तर्क दिया है कि लैब के बाहर काफी भीड़ थी। एक ही नाम की तीन युवतियां थीं और उस युवती ने ओपीडी पर्ची या लैब द्वारा जारी जीरो बिल की प्रति भी नहीं दिखाई। हालांकि हंगामे के बाद रिपोर्ट बदल दी गई। मामले में कृष्णा लैब के स्टाफ के दस्तावेजों के सत्यापन के लिए कमेटी का गठन किया गया। लापरवाह कर्मचारियों को सेवा से अलग कर दिया गया। इसके अलावा कृष्णा लैब डायग्नोस्टिक के मैनेजर को रिपोर्ट वितरण में लापरवाही को लेकर चेतावनी जारी की गई है। केस 2 : निगेटिव रिपोर्ट को बताया पॉजिटिव टोंक के लाम्बा हरिसिंह सीएचसी में एक मरीज का सैंपल सेरोलॉजी जांच के लिए लिया गया। प्रारंभिक रिपोर्ट में हैपेटाइटिस सी पॉजिटिव बता दिया गया। जांच की तो सामने आया कि लैब टेक्निशियन गायत्री ने कम्प्यूटर में डेटा एंट्री के दौरान गलती कर दी थी। ऐसे में रिपोर्ट गलत तैयार हो गई। अगले दिन फिर जांच कराई गई। इस बार रिपोर्ट निगेटिव आई। दूसरी जांचों में भी रिपोर्ट निगेटिव आई। मामले में संबंधित लैब टेक्नीशियन को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। केस 3 : एक दिन में 2 जांच, दोनों रिपोर्ट अलग पिछले महीने उदयपुर के बड़गांव सैटेलाइट अस्पताल में भी एक मामला सामने आया था। मरीज की एक ही दिन में 2 बार जांच कराई गई। दोनों की रिपोर्ट में अंतर था। मामले की तथ्यात्मक रिपोर्ट के अनुसार 450 की ओपीडी वाले अस्पताल में सैम्पलिंग, कम्प्यूटर कार्य, रिपोर्टिंग और अन्य कार्यों के लिए एक ही स्टाफ लगाया गया था। स्टाफ के दस्तावेत मांगने पर उपलब्ध नहीं कराए गए। रिपोर्ट में लिखा है कि मामले में मैनेजर ने कमेटी के समक्ष लिखित और मौखिक रूप से स्टाफ का अप्रशिक्षित होना स्वीकार किया। हालांकि अब बड़गांव में दूसरा स्टाफ लगा दिया है। फर्म ने गड़बड़ी के आरोपों को नकारा कृष्णा डायग्नोस्टिक लैब प्राइवेट लिमिटेड के जोन हैड विपिन दीक्षित ने बताया कीफर्म के पास जांच करने, मशीनें लगाने, कंज्यूमेबल और स्टाफ गैप फिलिंग का जिम्मा है। अगर किसी अस्पताल में 10 लैब टेक्नीशियन की जरूरत है और 7 पहले से हैं तो फर्म को 3 लैब टेक्नीशियन ही लगाने होते हैं। प्रदेश भर में हमारी फर्म ने करीब साढ़े तीन हजार लैब टेक्नीशियन लगा रखे हैं। हमने गाइड लाइन के तहत राजस्थान पैरामेडिकल काउंसिल से रजिस्टर्ड लैब टेक्नीशियन ही लगा रखे हैं। हमारी जांच रिपोर्ट में किसी भी प्रकार की गड़बड़ सामने नहीं आई है। मामले में स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉ.रविप्रकाश शर्मा ने बताया कि जो भी शिकायतें सामने आ रही हैं, उसके लिए संबंधित चिकित्सा संस्थान प्रभारियों को जांच के लिए निर्देश दिए गए हैं। इस मामले में कुछ जगहों पर सेवा प्रदाता फर्म को नोटिस भी जारी किए गए हैं। लापरवाहियों के पीछे ये भी कारण? राज्य सरकार ने मरीजों को ज्यादा से ज्यादा जांच की सुविधा उनके पास के ही चिकित्सा संस्थान में देने की मंशा ये मॉडल लागू किया है। मॉडल के प्रॉपर तरीके से लागू नहीं होने के पीछे कई तरह के इश्यूज हैं। स्वास्थ्य विभाग की जांच में कुछ जगहों पर स्टाफ की कमी और कर्मचारियों की लापरवाही की बात सामने आ चुकी है। वहीं कुछ जगहों पर इस मॉडल को फेल करने की कोशिशें भी बताई जा रही हैं। ऑफ द रिकॉर्ड कुछ अधिकारियों ने बताया कि अब तक इन अस्पतालों में सीमित जांचें होती थी। अब जांचों का दायरा बढ़ गया है तो काम का प्रेशर भी बढ़ गया है। जो जांचें पहले निजी लैब में कराई जाती थीं, वो जांचें भी अब इन्हीं लैब में निशुल्क कराई जाने लगी हैं। माना जा रहा है कि इस कारण ये इस मॉडल को फेल करने की भी कोशिशें हो रही हैं। क्या है मदर-हब और स्पॉक मॉडल भारत सरकार की फ्री डायग्नोस्टिक सर्विस इनिशिएटिव गाइडलाइन के अनुसार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत निशुल्क जांचों को हब-स्पॉक मॉडल पर प्रदेशभर में लागू किया गया है। इसमें ट्रोपोनिन, कैंसर मार्कर, बायोप्सी, ब्लड और बॉडी फ्लूड कल्चर, विटामिन्स, थैलेसीमिया, हीमोफिलिया, मौसमी बीमारियों व थायराइड समेत अन्य जांचें शामिल की गई है। जिला अस्पतालों में 56 के बजाय 145, उप जिला व सैटेलाइट अस्पतालों में 56 से बढ़ाकर 117, सीएचसी में 37 की जगह 101 और पीएचसी व डिस्पेंसरी में 15 से बढ़ाकर 66 प्रकार की जांचें आउटसोर्स मोड पर उपलब्ध कराई जाएंगी। इस मॉडल को लागू करने के लिए प्रदेशभर में एक ही फर्म को काम सौंपा गया है। जिसमें फर्म को अतिरिक्त मशीनें और स्टाफ लगाने की भी जिम्मेदारी सौंपी गई है। …. राजस्थान में हेल्थ सर्विसेज से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… 2.50 लाख वाला इलाज मुफ्त, लेकिन नंबर 4 महीने बाद:गैलरी में बेड लगाकर ट्रीटमेंट के लिए मजबूर मरीज, बोले- बिना ठीक हुए कैसे लौटें पंचकर्म से लकवा, गठिया, स्लिप डिस्क जैसी बीमारियों का इलाज करवाने देशभर से मरीज जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (NIA) पहुंचते हैं। लेकिन इलाज के लिए उन्हें 3 से 4 महीने का इंतजार करना पड़ता है। पूरी खबर पढ़िए…

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राज्य सरकार ने मरीजों को ज्यादा से ज्यादा जांच की सुविधा उनके पास के ही चिकित्सा संस्थान में देने की मंशा ये मॉडल लागू किया है। मॉडल के प्रॉपर तरीके से लागू नहीं होने के पीछे कई तरह के इश्यूज हैं। स्वास्थ्य विभाग की जांच में कुछ जगहों पर स्टाफ की कमी और कर्मचारियों की लापरवाही की बात सामने आ चुकी है। वहीं कुछ जगहों पर इस मॉडल को फेल करने की कोशिशें भी बताई जा रही हैं। ऑफ द रिकॉर्ड कुछ अधिकारियों ने बताया कि अब तक इन अस्पतालों में सीमित जांचें होती थी। अब जांचों का दायरा बढ़ गया है तो काम का प्रेशर भी बढ़ गया है। जो जांचें पहले निजी लैब में कराई जाती थीं, वो जांचें भी अब इन्हीं लैब में निशुल्क कराई जाने लगी हैं। माना जा रहा है कि इस कारण ये इस मॉडल को फेल करने की भी कोशिशें हो रही हैं। क्या है मदर-हब और स्पॉक मॉडल भारत सरकार की फ्री डायग्नोस्टिक सर्विस इनिशिएटिव गाइडलाइन के अनुसार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत निशुल्क जांचों को हब-स्पॉक मॉडल पर प्रदेशभर में लागू किया गया है। इसमें ट्रोपोनिन, कैंसर मार्कर, बायोप्सी, ब्लड और बॉडी फ्लूड कल्चर, विटामिन्स, थैलेसीमिया, हीमोफिलिया, मौसमी बीमारियों व थायराइड समेत अन्य जांचें शामिल की गई है। जिला अस्पतालों में 56 के बजाय 145, उप जिला व सैटेलाइट अस्पतालों में 56 से बढ़ाकर 117, सीएचसी में 37 की जगह 101 और पीएचसी व डिस्पेंसरी में 15 से बढ़ाकर 66 प्रकार की जांचें आउटसोर्स मोड पर उपलब्ध कराई जाएंगी। इस मॉडल को लागू करने के लिए प्रदेशभर में एक ही फर्म को काम सौंपा गया है। जिसमें फर्म को अतिरिक्त मशीनें और स्टाफ लगाने की भी जिम्मेदारी सौंपी गई है। …. राजस्थान में हेल्थ सर्विसेज से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… 2.50 लाख वाला इलाज मुफ्त, लेकिन नंबर 4 महीने बाद:गैलरी में बेड लगाकर ट्रीटमेंट के लिए मजबूर मरीज, बोले- बिना ठीक हुए कैसे लौटें पंचकर्म से लकवा, गठिया, स्लिप डिस्क जैसी बीमारियों का इलाज करवाने देशभर से मरीज जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (NIA) पहुंचते हैं। लेकिन इलाज के लिए उन्हें 3 से 4 महीने का इंतजार करना पड़ता है। पूरी खबर पढ़िए…

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