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‘Chacha Cricket’ will not be seen holding the Pakistan flag in his hands.

'Chacha Cricket' will not be seen holding the Pakistan flag in his hands.
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लाहौर47 मिनट पहले

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अब्दुल जलील(चाचा क्रिकेट) को 1996 में पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने शुभंकर घोषित किया था। – फाइल फोटो

लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम में अगले हफ्ते जब पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया के बीच तीसरा वनडे खेला जाएगा, तब मैदान में एक चेहरा ऐसा भी होगा जिसे देखकर करोड़ों पाकिस्तानी भावुक हो जाएंगे। हरे रंग का कुर्ता, टोपी, हाथ में पाकिस्तान का झंडा और चेहरे पर वही मुस्कान। यह होंगे ‘चाचा क्रिकेट’।

77 साल के अब्दुल जलील, जिन्हें पूरी दुनिया चाचा क्रिकेट के नाम से जानती है, इस मैच के बाद पाकिस्तान में मैचों में चीयर करना छोड़ देंगे। करीब पांच दशक तक टीम के साथ हर जीत-हार में खड़े रहने वाले चाचा अब रिटायरमेंट की तैयारी कर रहे हैं। 1968-69 में लाहौर में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट देखकर उन्हें क्रिकेट से ऐसा प्यार हुआ कि जिंदगी ही बदल गई। बाद में नौकरी के लिए यूएई गए, लेकिन पाकिस्तान का मैच देखने के लिए अबु धाबी से शारजाह तक तीन-तीन बसें बदलकर पहुंचते थे। धीरे-धीरे उनका हरा पहनावा और जोश भरा अंदाज पाकिस्तान क्रिकेट की पहचान बन गया।

1996 में उन्हें पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने शुभंकर घोषित किया। साल 1998 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरी जिंदगी पाकिस्तान क्रिकेट को समर्पित कर दी। 1999 वर्ल्ड कप में वे इंग्लैंड तक पहुंचे। इसके बाद दुनिया के लगभग हर बड़े क्रिकेट मैदान में पाकिस्तान का झंडा लहराते दिखे। चाचा कहते हैं कि उन्होंने 500 मैचों में टीम को चीयर करने का सपना देखा था, जो पूरा हो चुका है। अब उनका सपना सियालकोट में एक रेस्टोरेंट और क्रिकेट म्यूजियम खोलने का है, जहां वह जुटाए गए अपने यादगार सामान को रखेंगे।

हालांकि, टीम के हालिया खराब फॉर्म के कारण वे श्रीलंका में 2026 टी20 वर्ल्ड कप में टीम का समर्थन करने नहीं गए। भले ही हालिया प्रदर्शन खराब हो, लेकिन चाचा क्रिकेट ने पाक के दबदबे का सुनहरा दौर भी करीब से देखा है। उन्हें आज भी 1986 में जावेद मियांदाद का आखिरी गेंद पर छक्का याद है। वहीं, 2011 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल (मोहाली) और 2024 टी20 वर्ल्ड कप (न्यूयॉर्क) में भारत से हार उनके दिल में दर्द छोड़ गई। लेकिन चाचा क्रिकेट अब भी वही बात दोहराते हैं- ‘कभी खुशी, कभी गम… कभी तुम, कभी हम। खेल में ऐसा होता है।’ शायद यही वजह है कि चाचा क्रिकेट सिर्फ एक फैन नहीं, बल्कि पाकिस्तान क्रिकेट की चलती-फिरती याद बन चुके हैं।

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लाहौर47 मिनट पहले

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अब्दुल जलील(चाचा क्रिकेट) को 1996 में पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने शुभंकर घोषित किया था। – फाइल फोटो

लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम में अगले हफ्ते जब पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया के बीच तीसरा वनडे खेला जाएगा, तब मैदान में एक चेहरा ऐसा भी होगा जिसे देखकर करोड़ों पाकिस्तानी भावुक हो जाएंगे। हरे रंग का कुर्ता, टोपी, हाथ में पाकिस्तान का झंडा और चेहरे पर वही मुस्कान। यह होंगे ‘चाचा क्रिकेट’।

77 साल के अब्दुल जलील, जिन्हें पूरी दुनिया चाचा क्रिकेट के नाम से जानती है, इस मैच के बाद पाकिस्तान में मैचों में चीयर करना छोड़ देंगे। करीब पांच दशक तक टीम के साथ हर जीत-हार में खड़े रहने वाले चाचा अब रिटायरमेंट की तैयारी कर रहे हैं। 1968-69 में लाहौर में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट देखकर उन्हें क्रिकेट से ऐसा प्यार हुआ कि जिंदगी ही बदल गई। बाद में नौकरी के लिए यूएई गए, लेकिन पाकिस्तान का मैच देखने के लिए अबु धाबी से शारजाह तक तीन-तीन बसें बदलकर पहुंचते थे। धीरे-धीरे उनका हरा पहनावा और जोश भरा अंदाज पाकिस्तान क्रिकेट की पहचान बन गया।

1996 में उन्हें पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने शुभंकर घोषित किया। साल 1998 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरी जिंदगी पाकिस्तान क्रिकेट को समर्पित कर दी। 1999 वर्ल्ड कप में वे इंग्लैंड तक पहुंचे। इसके बाद दुनिया के लगभग हर बड़े क्रिकेट मैदान में पाकिस्तान का झंडा लहराते दिखे। चाचा कहते हैं कि उन्होंने 500 मैचों में टीम को चीयर करने का सपना देखा था, जो पूरा हो चुका है। अब उनका सपना सियालकोट में एक रेस्टोरेंट और क्रिकेट म्यूजियम खोलने का है, जहां वह जुटाए गए अपने यादगार सामान को रखेंगे।

हालांकि, टीम के हालिया खराब फॉर्म के कारण वे श्रीलंका में 2026 टी20 वर्ल्ड कप में टीम का समर्थन करने नहीं गए। भले ही हालिया प्रदर्शन खराब हो, लेकिन चाचा क्रिकेट ने पाक के दबदबे का सुनहरा दौर भी करीब से देखा है। उन्हें आज भी 1986 में जावेद मियांदाद का आखिरी गेंद पर छक्का याद है। वहीं, 2011 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल (मोहाली) और 2024 टी20 वर्ल्ड कप (न्यूयॉर्क) में भारत से हार उनके दिल में दर्द छोड़ गई। लेकिन चाचा क्रिकेट अब भी वही बात दोहराते हैं- ‘कभी खुशी, कभी गम… कभी तुम, कभी हम। खेल में ऐसा होता है।’ शायद यही वजह है कि चाचा क्रिकेट सिर्फ एक फैन नहीं, बल्कि पाकिस्तान क्रिकेट की चलती-फिरती याद बन चुके हैं।

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