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Doctors are prescribing fishing, gardening, and social service alongside medication; these can improve mental health.

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लंदन / वॉशिंगटन7 घंटे पहले

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फिश एंड चैट सेशन में बुजुर्ग।

ब्रिटेन के कैंट में रहने वाले स्टीफन (58) की पत्नी को हार्ट अटैक आया। इसके बाद वे मानसिक संकट में घिर गए। स्टीफन बताते हैं, ‘एक समय ऐसा आया था जब मुझे अपनी जिंदगी समझ ही नहीं आ रही थी। 50 साल के ली भी उन्हीं की तरह विषम परिस्थितियों से जूझ रहे थे। अवसाद हावी होने लगा था… दोनों को फैमिली डॉक्टर्स ने मछली पकड़ना, आर्ट ग्रुप, वॉकिंग ग्रुप और वॉलंटियरिंग से जुड़ने को कहा। यह सोशल प्रिस्क्राइविंग है… इलाज का पारंपरिक तरीका।

दोनों ने फिशिंग चुनी। वे गैर लाभकारी संस्था ‘कास्ट ए थॉट’ से जुड़ गए। यहां उन्हें बचपन की पसंदीदा गतिविधि के साथ समान अनुभव वाले लोग भी मिले। स्टीफन कहते हैं, ‘यहां आकर लोगों से मिलना और पानी के किनारे बैठना जादू जैसा रहा।

यह थेरेपिस्ट के सामने सूट पहनकर बैठने से कहीं आसान और असरदार है। इस सेशन का नाम ‘फिश एंड चैट’ रखा गया। दो घंटे फिशिंग होती है। फिर कैफे में कॉफी। दोस्त बनते हैं। कोई तय स्क्रिप्ट नहीं होती।

दुनियाभर में हेल्थ केयर सिस्टम दबाव में हैं। कोविड के बाद वेटिंग लिस्ट लंबी हुई, स्टाफ की कमी बढ़ी। ऐसे में डॉक्टर ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग’ की ओर लौट रहे हैं। इसमें डॉक्टर मरीज की बीमारी के सामाजिक और मानसिक कारणों को समझते हुए उन्हें ऐसी गतिविधियों से जोड़ते हैं जो उनके अकेलेपन को दूर करें और मानसिक सेहत में सुधार लाएं।

ब्रिटेन और नीदरलैंड्स में इसकी सफलता के बाद अमेरिका में पायलट शुरू हुए हैं। ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग यूएसए’ संगठन 2035 तक अमेरिकियों को कला, संगीत व प्रकृति आधारित उपचार दिलाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। रोमानिया व डेनमार्क में नए प्रोजेक्ट शुरू हुए। मकसद है पोस्टनेटल डिप्रेशन घटाना। नई मांओं को गाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

नीदरलैंड्स में साइक्लिंग क्लब, म्यूजियम विजिट, ताई ची जैसी एक्टिविटी पर सब्सिडी मिलती है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2030 तक दुनिया में करीब 1.1 करोड़ स्वास्थ्य कर्मियों की कमी होगी। ऐसे में बीमारियों को रोकने के लिए ‘रोकथाम और सामाजिक जुड़ाव’ ही सबसे सस्ता व प्रभावी रास्ता दिख रहा है।

सोशल प्रिस्क्राइविंग यूएसए के कोफाउंडर एलन सीगल कहते हैं, ‘डिप्रेशन में उनके पास थेरेपी और दवा के बाद विकल्प जल्दी खत्म हो जाते हैं। कई लोग साइड इफेक्ट झेलते हैं। कई थेरेपिस्ट के पास नहीं जाना चाहते। उनके मुताबिक इलाज का बड़ा हिस्सा क्लिनिक के बाहर की जिंदगी में होता है। ऐसे में सोशल प्रिस्क्राइविंग बेहतर विकल्प बन सकता है।’ एक्टिविटी कोच डेव एलस्टोन कहते हैं, ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग उसी दौर की याद दिलाता है जब डॉक्टर घर-घर जाकर मरीजों की बातें सुना करते थे। डेव कहते हैं, ‘चाहे ताजी हवा से काम हो या गप्पे मारने से, सच तो यह है कि यह काम करता है… हमने लोगों को ठीक होते देखा है।’

दवाइयों की जरूरत कम पड़ रही, डिप्रेशन भी आध आधाः एक्सपर्ट

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर डेजी फैनकोर्ट के शोध के अनुसार, जो लोग महीने में कम से कम एक बार संगीत बजाने या बुनाई जैसी गतिविधियां करते हैं, उनमें डिप्रेशन का खतरा करीब आधा हो जाता है। ग्लोबल मेटा-एनालिसिस में पाया गया कि सर्जरी के बाद संगीत सुनने वाले मरीजों को कम दर्द हुआ और उन्हें दवाइयों की जरूरत भी कम पड़ी। यही वजह है कि डॉक्टर्स इसे महत्व दे रहे हैं।

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ब्रिटेन के कैंट में रहने वाले स्टीफन (58) की पत्नी को हार्ट अटैक आया। इसके बाद वे मानसिक संकट में घिर गए। स्टीफन बताते हैं, ‘एक समय ऐसा आया था जब मुझे अपनी जिंदगी समझ ही नहीं आ रही थी। 50 साल के ली भी उन्हीं की तरह विषम परिस्थितियों से जूझ रहे थे। अवसाद हावी होने लगा था… दोनों को फैमिली डॉक्टर्स ने मछली पकड़ना, आर्ट ग्रुप, वॉकिंग ग्रुप और वॉलंटियरिंग से जुड़ने को कहा। यह सोशल प्रिस्क्राइविंग है… इलाज का पारंपरिक तरीका।

दोनों ने फिशिंग चुनी। वे गैर लाभकारी संस्था ‘कास्ट ए थॉट’ से जुड़ गए। यहां उन्हें बचपन की पसंदीदा गतिविधि के साथ समान अनुभव वाले लोग भी मिले। स्टीफन कहते हैं, ‘यहां आकर लोगों से मिलना और पानी के किनारे बैठना जादू जैसा रहा।

यह थेरेपिस्ट के सामने सूट पहनकर बैठने से कहीं आसान और असरदार है। इस सेशन का नाम ‘फिश एंड चैट’ रखा गया। दो घंटे फिशिंग होती है। फिर कैफे में कॉफी। दोस्त बनते हैं। कोई तय स्क्रिप्ट नहीं होती।

दुनियाभर में हेल्थ केयर सिस्टम दबाव में हैं। कोविड के बाद वेटिंग लिस्ट लंबी हुई, स्टाफ की कमी बढ़ी। ऐसे में डॉक्टर ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग’ की ओर लौट रहे हैं। इसमें डॉक्टर मरीज की बीमारी के सामाजिक और मानसिक कारणों को समझते हुए उन्हें ऐसी गतिविधियों से जोड़ते हैं जो उनके अकेलेपन को दूर करें और मानसिक सेहत में सुधार लाएं।

ब्रिटेन और नीदरलैंड्स में इसकी सफलता के बाद अमेरिका में पायलट शुरू हुए हैं। ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग यूएसए’ संगठन 2035 तक अमेरिकियों को कला, संगीत व प्रकृति आधारित उपचार दिलाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। रोमानिया व डेनमार्क में नए प्रोजेक्ट शुरू हुए। मकसद है पोस्टनेटल डिप्रेशन घटाना। नई मांओं को गाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

नीदरलैंड्स में साइक्लिंग क्लब, म्यूजियम विजिट, ताई ची जैसी एक्टिविटी पर सब्सिडी मिलती है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2030 तक दुनिया में करीब 1.1 करोड़ स्वास्थ्य कर्मियों की कमी होगी। ऐसे में बीमारियों को रोकने के लिए ‘रोकथाम और सामाजिक जुड़ाव’ ही सबसे सस्ता व प्रभावी रास्ता दिख रहा है।

सोशल प्रिस्क्राइविंग यूएसए के कोफाउंडर एलन सीगल कहते हैं, ‘डिप्रेशन में उनके पास थेरेपी और दवा के बाद विकल्प जल्दी खत्म हो जाते हैं। कई लोग साइड इफेक्ट झेलते हैं। कई थेरेपिस्ट के पास नहीं जाना चाहते। उनके मुताबिक इलाज का बड़ा हिस्सा क्लिनिक के बाहर की जिंदगी में होता है। ऐसे में सोशल प्रिस्क्राइविंग बेहतर विकल्प बन सकता है।’ एक्टिविटी कोच डेव एलस्टोन कहते हैं, ‘सोशल प्रिस्क्राइविंग उसी दौर की याद दिलाता है जब डॉक्टर घर-घर जाकर मरीजों की बातें सुना करते थे। डेव कहते हैं, ‘चाहे ताजी हवा से काम हो या गप्पे मारने से, सच तो यह है कि यह काम करता है… हमने लोगों को ठीक होते देखा है।’

दवाइयों की जरूरत कम पड़ रही, डिप्रेशन भी आध आधाः एक्सपर्ट

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर डेजी फैनकोर्ट के शोध के अनुसार, जो लोग महीने में कम से कम एक बार संगीत बजाने या बुनाई जैसी गतिविधियां करते हैं, उनमें डिप्रेशन का खतरा करीब आधा हो जाता है। ग्लोबल मेटा-एनालिसिस में पाया गया कि सर्जरी के बाद संगीत सुनने वाले मरीजों को कम दर्द हुआ और उन्हें दवाइयों की जरूरत भी कम पड़ी। यही वजह है कि डॉक्टर्स इसे महत्व दे रहे हैं।

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