Trump Tariff Policy US Court Declared Illegal

Hindi News Business Trump Tariff Policy US Court Declared Illegal | Silver Jumps ₹2.56 Lakh, FMCG Prices Hike नई दिल्ली1 घंटे पहले कॉपी लिंक कल की बड़ी खबर महंगाई से जुड़ी रही। FMCG सेक्टर की दिग्गज कंपनी डाबर इंडिया ने अपने प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ाने के संकेत दिए हैं। कंपनी का कहना है कि पैकेजिंग मटेरियल की बढ़ती कीमतों और मिडिल-ईस्ट में तनाव बढ़ने के कारण इनपुट कॉस्ट बढ़ गई है। अमेरिका के एक फेडरल ट्रेड कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लगाए गए 10% ग्लोबल टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया है। कोर्ट ने गुरुवार को 2-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि यह टैरिफ 1974 के व्यापार कानून के तहत सही नहीं थे। कल की बड़ी खबर से पहले आज की ये सुर्खियां… शेयर बाजार आज बंद रहेगा। पेट्रोल-डीजल के दाम में कोई बदलाव नहीं हुआ है। अब कल की बड़ी खबरें पढ़ें… 1. साबुन-बिस्किट से लेकर तेल तक सब महंगा होगा: डाबर, HUL सहित FMCG कंपनियां दाम बढ़ाएंगी; पैकेजिंग और कच्चे माल की लागत बढ़ी FMCG सेक्टर की दिग्गज कंपनी डाबर इंडिया ने अपने प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ाने के संकेत दिए हैं। कंपनी का कहना है कि पैकेजिंग मटेरियल की बढ़ती कीमतों और मिडिल-ईस्ट में तनाव बढ़ने के कारण इनपुट कॉस्ट बढ़ गई है। डाबर के अलावा हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL) और नेस्ले जैसी कंपनियां भी महंगाई के दबाव का सामना कर रही हैं। ऐसे में आपके घर का बजट बिगड़ सकता है और साबुन, तेल, बिस्किट जैसे रोजमर्रा के सामान महंगे हो सकते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… 2. ट्रम्प की टैरिफ पॉलिसी को अमेरिकी कोर्ट ने अवैध बताया: 10% टैरिफ लगाने का फैसला रद्द; अदालत बोली- राष्ट्रपति ने शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया अमेरिका के एक फेडरल ट्रेड कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लगाए गए 10% ग्लोबल टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया है। कोर्ट ने गुरुवार को 2-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि यह टैरिफ 1974 के व्यापार कानून के तहत सही नहीं थे। प्रशासन के पास कांग्रेस की अनुमति के बिना इतने बड़े पैमाने पर आयात शुल्क (इम्पोर्ट ड्यूटी) लगाने का अधिकार नहीं है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड ने अपने फैसले में कहा कि इसी साल की शुरुआत में लगाए गए ये टैरिफ कानून अमान्य हैं। ट्रम्प ने फरवरी में एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के जरिए इन ग्लोबल टैरिफ को लागू करने की घोषणा की थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… 3. SBI का मुनाफा 5.5% बढ़कर ₹19,684 करोड़: चौथी तिमाही में टोटल इनकम ₹1.40 लाख करोड़ रही, बैंक निवेशकों को ₹17.35 प्रति शेयर डिविडेंड देगा देश के सबसे बड़े सरकारी लेंडर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में ₹19,684 करोड़ रुपए का स्टैंडअलोन मुनाफा हुआ। सालाना आधार पर यह 5.58% बढ़ा है। पिछले साल की समान तिमाही में SBI को ₹18,642 करोड़ का मुनाफा हुआ था। जनवरी-मार्च (Q4FY26) तिमाही में स्टेट बैंक की टोटल इनकम 1.40 लाख करोड़ रुपए रही। पिछले साल की समान तिमाही में यह 1.44 लाख करोड़ रुपए थी। सालाना आधार पर यह 2.7% घटी है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… 4. टाटा ट्रस्ट्स की अहम बैठक 16 मई तक टली: टाटा संस की लिस्टिंग पर फैसला होना था; बोर्ड में गवर्नेंस और हिस्सेदारी को लेकर मतभेद टाटा ट्रस्ट्स की आज 8 मई को होने वाली महत्वपूर्ण बोर्ड मीटिंग अब 16 मई को होगी। ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक आंतरिक मतभेदों के चलते इस बैठक को टाला गया है। यह दूसरी बार है जब मीटिंग की तारीख बदली गई है। पहले यह मीटिंग 12 मई को होनी थी। बार-बार तारीखें बदलने से ट्रस्ट के भीतर चल रही चर्चाओं को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… 5. चांदी 802 बढ़कर ₹2.56 लाख पहुंची: इस साल कीमत ₹25 हजार बढ़ी, सोना ₹71 गिरकर ₹1.51 लाख/10gm पर आया चांदी के दाम में 16 अप्रैल को मामूली तेजी रही। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, एक किलो चांदी 802 रुपए बढ़कर 2,55,600 रुपए पर पहुंच गई है। इससे पहले गुरुवार को इसकी कीमत 2,54,798 रुपए प्रति किलो थी। वहीं, 10 ग्राम 24 कैरेट सोना 71 रुपए घटकर 1,51,078 रुपए पर पहुंच गया है। इससे पहले 7 मई को इसकी कीमत 1,51,149 रुपए प्रति 10 ग्राम थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… कल दुनिया के टॉप-10 सबसे अमीर कौन रहे यह भी देख लीजिए… कल के शेयर बाजार और सोना-चांदी का हाल जान लीजिए… पेट्रोल-डीजल और घरेलू गैस सिलेंडर की लेटेस्ट कीमत जान लीजिए… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
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Hindi News Business Trump Tariff Policy US Court Declared Illegal | Silver Jumps ₹2.56 Lakh, FMCG Prices Hike नई दिल्ली6 घंटे पहले कॉपी लिंक कल की बड़ी खबर महंगाई से जुड़ी रही। FMCG सेक्टर की दिग्गज कंपनी डाबर इंडिया ने अपने प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ाने के संकेत दिए हैं। कंपनी का कहना है कि पैकेजिंग मटेरियल की बढ़ती कीमतों और मिडिल-ईस्ट में तनाव बढ़ने के कारण इनपुट कॉस्ट बढ़ गई है। अमेरिका के एक फेडरल ट्रेड कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लगाए गए 10% ग्लोबल टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया है। कोर्ट ने गुरुवार को 2-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि यह टैरिफ 1974 के व्यापार कानून के तहत सही नहीं थे। कल की बड़ी खबर से पहले आज की ये सुर्खियां… शेयर बाजार आज बंद रहेगा। पेट्रोल-डीजल के दाम में कोई बदलाव नहीं हुआ है। अब कल की बड़ी खबरें पढ़ें… 1. साबुन-बिस्किट से लेकर तेल तक सब महंगा होगा: डाबर, HUL सहित FMCG कंपनियां दाम बढ़ाएंगी; पैकेजिंग और कच्चे माल की लागत बढ़ी FMCG सेक्टर की दिग्गज कंपनी डाबर इंडिया ने अपने प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ाने के संकेत दिए हैं। कंपनी का कहना है कि पैकेजिंग मटेरियल की बढ़ती कीमतों और मिडिल-ईस्ट में तनाव बढ़ने के कारण इनपुट कॉस्ट बढ़ गई है। डाबर के अलावा हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL) और नेस्ले जैसी कंपनियां भी महंगाई के दबाव का सामना कर रही हैं। ऐसे में आपके घर का बजट बिगड़ सकता है और साबुन, तेल, बिस्किट जैसे रोजमर्रा के सामान महंगे हो सकते हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… 2. ट्रम्प की टैरिफ पॉलिसी को अमेरिकी कोर्ट ने अवैध बताया: 10% टैरिफ लगाने का फैसला रद्द; अदालत बोली- राष्ट्रपति ने शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया अमेरिका के एक फेडरल ट्रेड कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लगाए गए 10% ग्लोबल टैरिफ को अवैध घोषित कर दिया है। कोर्ट ने गुरुवार को 2-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि यह टैरिफ 1974 के व्यापार कानून के तहत सही नहीं थे। प्रशासन के पास कांग्रेस की अनुमति के बिना इतने बड़े पैमाने पर आयात शुल्क (इम्पोर्ट ड्यूटी) लगाने का अधिकार नहीं है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड ने अपने फैसले में कहा कि इसी साल की शुरुआत में लगाए गए ये टैरिफ कानून अमान्य हैं। ट्रम्प ने फरवरी में एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के जरिए इन ग्लोबल टैरिफ को लागू करने की घोषणा की थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… 3. SBI का मुनाफा 5.5% बढ़कर ₹19,684 करोड़: चौथी तिमाही में टोटल इनकम ₹1.40 लाख करोड़ रही, बैंक निवेशकों को ₹17.35 प्रति शेयर डिविडेंड देगा देश के सबसे बड़े सरकारी लेंडर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में ₹19,684 करोड़ रुपए का स्टैंडअलोन मुनाफा हुआ। सालाना आधार पर यह 5.58% बढ़ा है। पिछले साल की समान तिमाही में SBI को ₹18,642 करोड़ का मुनाफा हुआ था। जनवरी-मार्च (Q4FY26) तिमाही में स्टेट बैंक की टोटल इनकम 1.40 लाख करोड़ रुपए रही। पिछले साल की समान तिमाही में यह 1.44 लाख करोड़ रुपए थी। सालाना आधार पर यह 2.7% घटी है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… 4. टाटा ट्रस्ट्स की अहम बैठक 16 मई तक टली: टाटा संस की लिस्टिंग पर फैसला होना था; बोर्ड में गवर्नेंस और हिस्सेदारी को लेकर मतभेद टाटा ट्रस्ट्स की आज 8 मई को होने वाली महत्वपूर्ण बोर्ड मीटिंग अब 16 मई को होगी। ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक आंतरिक मतभेदों के चलते इस बैठक को टाला गया है। यह दूसरी बार है जब मीटिंग की तारीख बदली गई है। पहले यह मीटिंग 12 मई को होनी थी। बार-बार तारीखें बदलने से ट्रस्ट के भीतर चल रही चर्चाओं को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… 5. चांदी 802 बढ़कर ₹2.56 लाख पहुंची: इस साल कीमत ₹25 हजार बढ़ी, सोना ₹71 गिरकर ₹1.51 लाख/10gm पर आया चांदी के दाम में 16 अप्रैल को मामूली तेजी रही। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, एक किलो चांदी 802 रुपए बढ़कर 2,55,600 रुपए पर पहुंच गई है। इससे पहले गुरुवार को इसकी कीमत 2,54,798 रुपए प्रति किलो थी। वहीं, 10 ग्राम 24 कैरेट सोना 71 रुपए घटकर 1,51,078 रुपए पर पहुंच गया है। इससे पहले 7 मई को इसकी कीमत 1,51,149 रुपए प्रति 10 ग्राम थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें… कल दुनिया के टॉप-10 सबसे अमीर कौन रहे यह भी देख लीजिए… कल के शेयर बाजार और सोना-चांदी का हाल जान लीजिए… पेट्रोल-डीजल और घरेलू गैस सिलेंडर की लेटेस्ट कीमत जान लीजिए… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
अमेरिका-ईरान जंग 24 घंटे में खत्म हो सकती है:ट्रम्प बोले- तेहरान परमाणु हथियार नहीं रखने को तैयार, ईरान ने कहा- अभी फैसला नहीं हुआ

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि वे अमेरिका के साथ जंग रोकने और परमाणु प्रोग्राम से जुड़े समझौते के बेहद करीब पहुंच गए हैं। साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी कि अगर बातचीत विफल होती है तो बमबारी फिर शुरू की जा सकती है। इससे पहले बुधवार को अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस की रिपोर्ट में बताया गया था कि ईरान 48 घंटे के भीतर सीजफायर को लेकर सहमति दे सकता है। हालांकि ईरान ने इसे लेकर कोई साफ जवाब नहीं दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने कहा कि समझौते के करीब होने की खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया बताया। उन्होंने कहा कि हमने प्रस्ताव पर जवाब नहीं दिया है, हालांकि पाकिस्तान के जरिए बातचीत जारी है। ईरान की मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अमेरिकी प्रस्ताव में कुछ ऐसी शर्तें हैं जो स्वीकार नहीं की जा सकतीं, लेकिन यह साफ नहीं किया गया कि वे कौन सी शर्तें हैं। ईरानी संसद की विदेश मामलों की समिति के प्रवक्ता इब्राहिम रेजई ने इसे ‘अमेरिका की विशलिस्ट’ बताया है। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… अमेरिका-ईरान समझौता आगे बढ़ा: रिपोर्ट्स के मुताबिक दोनों देशों के बीच 14 पॉइंट वाला समझौता (MOU) तैयार है। हालांकि अभी यह फाइनल नहीं हुआ है, लेकिन बातचीत पहले से ज्यादा आगे बढ़ चुकी है। अमेरिका ने UNSC में प्रस्ताव पेश किया: अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही बहाल कराने के लिए UNSC में नया प्रस्ताव पेश किया है। दूसरी तरफ ईरान ने सदस्य देशों से इस प्रस्ताव को खारिज करने की अपील की। चीन-ईरान के बीच बैठक: चीन और ईरान के बीच बीजिंग में हाई-लेवल बैठक हुई। चीन ने युद्ध तुरंत रोकने की बात कही और ईरान को समर्थन का भरोसा दिया। वहीं ईरान चाहता है कि ट्रम्प की चीन यात्रा के दौरान बीजिंग अमेरिका के दबाव में कोई ऐसा फैसला न ले जिससे तेहरान को नुकसान हो। ट्रम्प बोले- स्थिति कंट्रोल में है: ट्रम्प ने दावा किया कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान की नौसेना, वायुसेना, मिसाइल सिस्टम और रडार नेटवर्क को भारी नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि स्थिति हमारे कंट्रोल में है और अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका पहले से बड़े हमले करेगा। होर्मुज में फ्रांसीसी जहाज पर हमला: फ्रांस की शिपिंग कंपनी CMA CGM ने बताया कि उसके एक कार्गो जहाज पर मिसाइल या ड्रोन से हमला हुआ, जिसमें कुछ क्रू मेंबर घायल हो गए। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…
World News Updates; Trump Pakistan China

7 मिनट पहले कॉपी लिंक स्पेन ने हंतावायरस (चूहों वाले वायरस) से जूझ रहे क्रूज शिप एमवी होंडियस को कैनरी आइलैंड्स में उतरने की अनुमति दे दी है। यह फैसला मानवीय आधार पर लिया गया है, ताकि जहाज पर मौजूद यात्रियों और क्रू मेंबर्स को तुरंत इलाज मिल सके। अप्रैल की शुरुआत में शुरू हुए इस संक्रमण में अब तक तीन लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि एक ब्रिटिश नागरिक की हालत गंभीर बनी हुई है और उसका इलाज साउथ अफ्रीका में चल रहा है। जहाज के दो क्रू मेंबर्स को भी तत्काल मेडिकल सहायता की जरूरत है। शिप पहले पश्चिम अफ्रीका की ओर जा रहा था, लेकिन वहां उतरने की अनुमति नहीं मिली। इसके बाद स्पेन ने आगे आकर जिम्मेदारी संभाली। यह कदम विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूरोपीय संघ (EU) के अनुरोध पर उठाया गया। स्पेन के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, जहाज के पहुंचने पर सभी यात्रियों और स्टाफ की मेडिकल जांच की जाएगी। संक्रमित लोगों का इलाज किया जाएगा और बाकी लोगों को उनके देशों में सुरक्षित वापस भेजा जाएगा। साथ ही, WHO इस मामले की जांच कर रहा है कि क्या यह संक्रमण करीबी संपर्क से फैला है। अगर ऐसा साबित होता है, तो यह हंतावायरस के मामलों में एक नया और गंभीर संकेत माना जाएगा। ये खबर भी देखें… समुद्र में जहाज पर चूहों वाला वायरस फैला:हंतावायरस से 3 की मौत, अफ्रीका तट पर जहाज रोका गया, यात्रियों को उतरने की इजाजत नहीं अटलांटिक महासागर में एक क्रूज शिप पर चूहों वाले वायरल (हंतावायरस) संक्रमण का मामला सामने आया है। इसमें तीन लोगों की मौत हो गई है और कम से कम तीन लोग बीमार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और दक्षिण अफ्रीका स्वास्थ्य विभाग ने रविवार को इसकी पुष्टि की। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
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7 मिनट पहले कॉपी लिंक ब्रिटेन में 36 साल के एक शख्स ने अपनी एक्स गर्लफ्रेंड के नाम से फेक डेटिंग प्रोफाइल बनाई। इसके बाद उसने लोगों को उसके घर भेजा, जिससे महिला और उसके परिवार की जान खतरे में पड़ गई। आरोपी की पहचान असद हुसैन के रूप मे हुई है, जिसे कोर्ट ने दोषी ठहराया है। आरोपी ने डेटिंग ऐप टिंडर पर कई नकली अकाउंट बनाकर खुद को महिला बताकर मैसेज भेजे। इन मैसेज में पुरुषों को महिला के घर आने के लिए उकसाया गया। पुलिस के मुताबिक, कम से कम 18 लोग अलग-अलग समय पर महिला के घर पहुंच गए। जांच में सामने आया कि आरोपी ने जुलाई 2024 में ब्रेकअप के तुरंत बाद यह साजिश शुरू की। कोर्ट में बताया गया कि एक ही रात में 4 लोग घर पहुंच गए थे। एक मामले में एक व्यक्ति ने दरवाजा तोड़ने की कोशिश की, जबकि दूसरी घटना में महिला की गैरमौजूदगी में एक शख्स घर में घुस गया जहां उसकी नाबालिग बेटी अकेली थी। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि आरोपी का मकसद महिला और उसके बच्चों को अधिकतम नुकसान पहुंचाना था। फिलहाल आरोपी को सजा जून में सुनाई जाएगी। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… स्पेन ने हंतावायरस से प्रभावित क्रूज शिप को एंट्री दी, अब तक 3 लोगों की मौत हो चुकी स्पेन ने हंतावायरस (चूहों वाले वायरस) से जूझ रहे क्रूज शिप एमवी होंडियस को कैनरी आइलैंड्स में उतरने की अनुमति दे दी है। यह फैसला मानवीय आधार पर लिया गया है, ताकि जहाज पर मौजूद यात्रियों और क्रू मेंबर्स को तुरंत इलाज मिल सके। अप्रैल की शुरुआत में शुरू हुए इस संक्रमण में अब तक तीन लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि एक ब्रिटिश नागरिक की हालत गंभीर बनी हुई है और उसका इलाज साउथ अफ्रीका में चल रहा है। जहाज के दो क्रू मेंबर्स को भी तत्काल मेडिकल सहायता की जरूरत है। शिप पहले पश्चिम अफ्रीका की ओर जा रहा था, लेकिन वहां उतरने की अनुमति नहीं मिली। इसके बाद स्पेन ने आगे आकर जिम्मेदारी संभाली। यह कदम विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूरोपीय संघ (EU) के अनुरोध पर उठाया गया। स्पेन के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, जहाज के पहुंचने पर सभी यात्रियों और स्टाफ की मेडिकल जांच की जाएगी। संक्रमित लोगों का इलाज किया जाएगा और बाकी लोगों को उनके देशों में सुरक्षित वापस भेजा जाएगा। साथ ही, WHO इस मामले की जांच कर रहा है कि क्या यह संक्रमण करीबी संपर्क से फैला है। अगर ऐसा साबित होता है, तो यह हंतावायरस के मामलों में एक नया और गंभीर संकेत माना जाएगा। ये खबर भी देखें… समुद्र में जहाज पर चूहों वाला वायरस फैला:हंतावायरस से 3 की मौत, अफ्रीका तट पर जहाज रोका गया, यात्रियों को उतरने की इजाजत नहीं अटलांटिक महासागर में एक क्रूज शिप पर चूहों वाले वायरल (हंतावायरस) संक्रमण का मामला सामने आया है। इसमें तीन लोगों की मौत हो गई है और कम से कम तीन लोग बीमार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और दक्षिण अफ्रीका स्वास्थ्य विभाग ने रविवार को इसकी पुष्टि की। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
अमेरिका का होर्मुज से सुरक्षित जहाज निकालने का ऑपरेशन बंद:ट्रम्प बोले- पाकिस्तान की अपील पर फैसला लिया; 2 दिन में सिर्फ 3 जहाज गुजरे

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मंगलवार रात अचानक ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ रोकने का ऐलान किया। अमेरिका ने सोमवार सुबह होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए यह ऑपरेशन शुरू किया था। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक ट्रम्प ने कहा कि पाकिस्तान की तरफ से यह ऑपरेशन रोकने की अपील की गई थी। ईरान के साथ समझौते को लेकर बात आगे बढ़ी है, इसलिए यह फैसला लिया गया है। उधर ईरान के सरकारी मीडिया ने इसे अपनी जीत बताया। उनका कहना है कि ट्रम्प को पीछे हटना पड़ा क्योंकि वो इस रास्ते को खुलवाने में नाकाम रहे। अमेरिका इस ऑपरेशन के तहत सोमवार को 2 और मंगलवार को सिर्फ 1 जहाज सुरक्षित निकाल पाया था। जबकि जंग से पहले हर दिन होर्मुज से औसतन 130 जहाज गुजरते थे। ऑपरेशन शुरू करने के बाद ईरान के हमले शुरू इससे कुछ ही घंटे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा था कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई पूरी कर ली है और अब सिर्फ ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ पर ध्यान है। प्रोजेक्ट फ्रीडम शुरू होने के बाद ईरान नाराज हो गया था। उसने चेतावनी दी थी कि उसकी इजाजत के बिना कोई जहाज इस रास्ते से नहीं गुजर सकता। इसके बाद ईरान ने होर्मुज में साऊथ कोरिया के एक जहाज पर हमला किया। साथ ही UAE में भी मिसाइल हमले किए। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… 1. होर्मुज पर UN में नया प्रस्ताव: अमेरिका ने होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए UNSC में नया प्रस्ताव पेश किया है। इसमें ईरान से हमले, माइंस बिछाना और टोल वसूली तुरंत रोकने को कहा गया है। 2. UAE पर फिर हमला: ईरान ने UAE पर लगातार दूसरे दिन मिसाइल और ड्रोनों से हमला किया। UAE ने कहा कि उसके डिफेंस सिस्टम ने मिसाइल और ड्रोन को आसमान में ही रोक लिया। 3. USS जॉर्ज बुश वॉरशिप होर्मुज पहुंचा: अमेरिका ने होर्मुज में प्रोजेक्ट फ्रीडम के तहत USS जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश वॉरशिप भेजा। इसका मकसद उन जहाजों को सुरक्षित निकालना था, जो होर्मुज में फंसे हुए हैं। 4. फुजैराह हमले के बाद भारत नाराज: भारत ने कहा कि तीन भारतीय नागरिकों का घायल होना पूरी तरह अस्वीकार्य है। भारत ने सभी पक्षों से तुरंत हिंसा रोकने की अपील की है। साथ ही कहा कि आम लोगों और नागरिक ढांचे को निशाना बनाना बंद होना चाहिए। 5. चीन की देशी कंपनियों को धमकी: चीनी कंपनियों के खिलाफ एक्शन लेने के लिए वहां की सरकार ने एक कानून बनाया है। इसके तहत विदेशी प्रतिबंधों को मानने वाली कंपनियों पर कार्रवाई की जा सकती है। दरअसल, अमेरिका ने ईरान से व्यापार करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी है। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…
Donald Trump Presidency Plan Video; White House Speech

वॉशिंगटन डीसी8 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर से राष्ट्रपति बनने की इच्छा जताई है। व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प ने कहा कि वे 8-9 साल बाद पद छोड़ेंगे। यह सुनकर वहां मौजूद लोग हंसने लगे तो ट्रम्प ने कहा कि वह मजाक नहीं कर रहे। उन्हें काम करना पसंद है। ट्रम्प ने यह भी कहा कि अभी उनके कार्यकाल की शुरुआत ही है और बहुत काम बाकी है। ट्रम्प अगले महीने 80 साल के हो जाएंगे। उन्होंने अपनी उम्र को लेकर भी मजाक किया। उन्होंने कहा, “मैं बुजुर्ग नहीं हूं; मैं बुजुर्ग से कहीं ज्यादा जवान हूं। मुझे आज भी वैसा ही महसूस होता है जैसा 50 साल पहले होता था।” इससे पहले भी ट्रम्प कई बार तीसरे टर्म का संकेत दे चुके हैं। ट्रम्प को तीसरी बार राष्ट्रपति बनाने का बिल पेश, फिर आगे नहीं बढ़ पाया इससे पहले एंडी ओगल्स ने 23 जनवरी 2025 को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में एक बिल पेश किया था। इस बिल का मकसद अमेरिकी संविधान में बदलाव करके डोनाल्ड ट्रम्प के लिए तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता खोलना था। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि जो व्यक्ति लगातार दो बार राष्ट्रपति नहीं रहा है, वह तीसरी बार चुनाव लड़ सके। चूंकि ट्रम्प 2020 में चुनाव हार गए थे, इसलिए इस बदलाव के बाद वे फिर से राष्ट्रपति बनने के लिए योग्य हो सकते थे। हालांकि यह बिल आगे नहीं बढ़ पाया और हाउस में वोटिंग तक भी नहीं पहुंच सका। दरअसल, अमेरिका में संविधान बदलना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए हाउस और सीनेट दोनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है। मौजूदा हालात में रिपब्लिकन पार्टी के पास इतना बहुमत नहीं है। इसके अलावा, ऐसे बदलाव को लागू करने के लिए 50 में से कम से कम 38 राज्यों की मंजूरी भी जरूरी होती है। अभी कई राज्यों में विपक्षी डेमोक्रेट पार्टी की सरकार है, इसलिए इस तरह का प्रस्ताव पास होना बहुत मुश्किल माना जाता है। 73 साल पहले 2 बार राष्ट्रपति बनने का नियम बना अमेरिका में पहले किसी व्यक्ति के सिर्फ 2 ही बार राष्ट्रपति बनने को लेकर कोई प्रावधान नहीं था। 1951 में संविधान में 22 संशोधन किया गया। इसके तहत ये नियम बनाया गया कि अमेरिका में कोई शख्स सिर्फ 2 बार ही राष्ट्रपति बन सकता है। दरअसल, अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने दो टर्म के बाद रिटायरमेंट ले लिया था। उसके बाद से राष्ट्रपति के दो टर्म से ज्यादा सेवाएं न देने का अनौपचारिक नियम ही बन गया। इसके बाद अमेरिका में यह प्रथा बन गई। 31 अमेरिकी राष्ट्रपतियों में से किसी भी राष्ट्रपति ने इस प्रथा को नहीं तोड़ा, लेकिन फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट के दौर में यह नियम टूट गया। वे 1933 से 1945 चार बार राष्ट्रपति चुनकर आए। क्या ट्रम्प संविधान बदल सकते हैं? ट्रम्प को तीसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव के लिए उतरना है तो उन्हें अमेरिकी संविधान में बदलाव करना होगा, जो इतना आसान नहीं है। ट्रम्प को इसके लिए अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव दोनों में दो-तिहाई बहुमत से एक बिल पास कराना होगा। ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास दोनों सदनों में इतने सदस्य नहीं हैं। सीनेट में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास 100 में से 52 सीनेटर है। वहीं, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में 435 में से 220 सदस्य हैं। ये संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो तिहाई यानी 67% बहुमत से काफी कम है। अगर ट्रम्प ये बहुमत हासिल कर लेते हैं तब भी उनके लिए संविधान में संशोधन करना इतना आसान नहीं होगा। अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों से बिल पास होने के बाद इस संशोधन के लिए राज्यों से मंजूरी लेनी होती है। इसके लिए तीन चौथाई राज्यों का बहुमत मिलन के बाद ही संविधान में संशोधन हो सकता है। यानी 50 अमेरिकी राज्यों में से अगर 38 संविधान में बदलाव के लिए राजी हो जाए तो ही नियम बदल सकते हैं। पुतिन की स्ट्रैटजी अपना सकते हैं ट्रम्प ट्रम्प खुद भी कई बार कह चुके हैं कि वो दो कार्यकाल के बाद भी सत्ता में बने रहना चाहते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ट्रम्प को तीसरा कार्यकाल नहीं मिलता तो वे सत्ता में बने रहने के लिए दूसरे तरीके अपना सकते हैं। हैमिल्टन कॉलेज के प्रोफेसर फिलिप क्लिंकनर ने मुताबिक ट्रम्प 2028 में उपराष्ट्रपति बन सकते हैं और जेडी वेंस या किसी और को नाममात्र का राष्ट्रपति बना सकते हैं। ऐसा ही कुछ पुतिन ने रूस में किया था। इसके अलावा वो अपने परिवार के किसी सदस्य को राष्ट्रपति बना सकते हैं, ताकि पर्दे के पीछे से सरकार पर उनका कंट्रोल बना रहे। पुतिन 2000 से 2008 तक लगातार 2 बार रूस के राष्ट्रपति रह चुके थे। रूस के संविधान के मुताबिक वे लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकते थे। ऐसे में उन्होंने अपने खास दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बना दिया था। इस दौरान पुतिन उपराष्ट्रपति के पद पर रहे थे। ———————— यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प के बाद कौन संभालेगा अमेरिका: पहले उपराष्ट्रपति वेंस आगे थे, वेनेजुएला पर हमले के बाद विदेश मंत्री रूबियो का रुतबा बढ़ा अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के अगले अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की संभावनाएं अचानक काफी बढ़ गई हैं। ब्रिटिश अखबार द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक इसकी वजह वेनेजुएला पर की गई अमेरिकी कार्रवाई है। अमेरिकी सेना ने 3 जनवरी की रात वेनेजुएला पर हमला किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा कर अमेरिका लेकर आ गए। यह मिलिट्री एक्शन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मंजूरी से हुआ। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Donald Trump Presidency Plan Video; White House Speech

वॉशिंगटन डीसी1 घंटे पहले कॉपी लिंक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर से राष्ट्रपति बनने की इच्छा जताई है। व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प ने कहा कि वे 8-9 साल बाद पद छोड़ेंगे। यह सुनकर वहां मौजूद लोग हंसने लगे तो ट्रम्प ने कहा कि वह मजाक नहीं कर रहे। उन्हें काम करना पसंद है। ट्रम्प ने यह भी कहा कि अभी उनके कार्यकाल की शुरुआत ही है और बहुत काम बाकी है। ट्रम्प अगले महीने 80 साल के हो जाएंगे। उन्होंने अपनी उम्र को लेकर भी मजाक किया। उन्होंने कहा, “मैं बुजुर्ग नहीं हूं; मैं बुजुर्ग से कहीं ज्यादा जवान हूं। मुझे आज भी वैसा ही महसूस होता है जैसा 50 साल पहले होता था।” इससे पहले भी ट्रम्प कई बार तीसरे टर्म का संकेत दे चुके हैं। ट्रम्प को तीसरी बार राष्ट्रपति बनाने का बिल पेश, फिर आगे नहीं बढ़ पाया इससे पहले एंडी ओगल्स ने 23 जनवरी 2025 को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में एक बिल पेश किया था। इस बिल का मकसद अमेरिकी संविधान में बदलाव करके डोनाल्ड ट्रम्प के लिए तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता खोलना था। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि जो व्यक्ति लगातार दो बार राष्ट्रपति नहीं रहा है, वह तीसरी बार चुनाव लड़ सके। चूंकि ट्रम्प 2020 में चुनाव हार गए थे, इसलिए इस बदलाव के बाद वे फिर से राष्ट्रपति बनने के लिए योग्य हो सकते थे। हालांकि यह बिल आगे नहीं बढ़ पाया और हाउस में वोटिंग तक भी नहीं पहुंच सका। दरअसल, अमेरिका में संविधान बदलना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए हाउस और सीनेट दोनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है। मौजूदा हालात में रिपब्लिकन पार्टी के पास इतना बहुमत नहीं है। इसके अलावा, ऐसे बदलाव को लागू करने के लिए 50 में से कम से कम 38 राज्यों की मंजूरी भी जरूरी होती है। अभी कई राज्यों में विपक्षी डेमोक्रेट पार्टी की सरकार है, इसलिए इस तरह का प्रस्ताव पास होना बहुत मुश्किल माना जाता है। 73 साल पहले 2 बार राष्ट्रपति बनने का नियम बना अमेरिका में पहले किसी व्यक्ति के सिर्फ 2 ही बार राष्ट्रपति बनने को लेकर कोई प्रावधान नहीं था। 1951 में संविधान में 22 संशोधन किया गया। इसके तहत ये नियम बनाया गया कि अमेरिका में कोई शख्स सिर्फ 2 बार ही राष्ट्रपति बन सकता है। दरअसल, अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने दो टर्म के बाद रिटायरमेंट ले लिया था। उसके बाद से राष्ट्रपति के दो टर्म से ज्यादा सेवाएं न देने का अनौपचारिक नियम ही बन गया। इसके बाद अमेरिका में यह प्रथा बन गई। 31 अमेरिकी राष्ट्रपतियों में से किसी भी राष्ट्रपति ने इस प्रथा को नहीं तोड़ा, लेकिन फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट के दौर में यह नियम टूट गया। वे 1933 से 1945 चार बार राष्ट्रपति चुनकर आए। क्या ट्रम्प संविधान बदल सकते हैं? ट्रम्प को तीसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव के लिए उतरना है तो उन्हें अमेरिकी संविधान में बदलाव करना होगा, जो इतना आसान नहीं है। ट्रम्प को इसके लिए अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव दोनों में दो-तिहाई बहुमत से एक बिल पास कराना होगा। ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास दोनों सदनों में इतने सदस्य नहीं हैं। सीनेट में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास 100 में से 52 सीनेटर है। वहीं, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में 435 में से 220 सदस्य हैं। ये संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो तिहाई यानी 67% बहुमत से काफी कम है। अगर ट्रम्प ये बहुमत हासिल कर लेते हैं तब भी उनके लिए संविधान में संशोधन करना इतना आसान नहीं होगा। अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों से बिल पास होने के बाद इस संशोधन के लिए राज्यों से मंजूरी लेनी होती है। इसके लिए तीन चौथाई राज्यों का बहुमत मिलन के बाद ही संविधान में संशोधन हो सकता है। यानी 50 अमेरिकी राज्यों में से अगर 38 संविधान में बदलाव के लिए राजी हो जाए तो ही नियम बदल सकते हैं। पुतिन की स्ट्रैटजी अपना सकते हैं ट्रम्प ट्रम्प खुद भी कई बार कह चुके हैं कि वो दो कार्यकाल के बाद भी सत्ता में बने रहना चाहते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ट्रम्प को तीसरा कार्यकाल नहीं मिलता तो वे सत्ता में बने रहने के लिए दूसरे तरीके अपना सकते हैं। हैमिल्टन कॉलेज के प्रोफेसर फिलिप क्लिंकनर ने मुताबिक ट्रम्प 2028 में उपराष्ट्रपति बन सकते हैं और जेडी वेंस या किसी और को नाममात्र का राष्ट्रपति बना सकते हैं। ऐसा ही कुछ पुतिन ने रूस में किया था। इसके अलावा वो अपने परिवार के किसी सदस्य को राष्ट्रपति बना सकते हैं, ताकि पर्दे के पीछे से सरकार पर उनका कंट्रोल बना रहे। पुतिन 2000 से 2008 तक लगातार 2 बार रूस के राष्ट्रपति रह चुके थे। रूस के संविधान के मुताबिक वे लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकते थे। ऐसे में उन्होंने अपने खास दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बना दिया था। इस दौरान पुतिन उपराष्ट्रपति के पद पर रहे थे। ———————— यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प के बाद कौन संभालेगा अमेरिका: पहले उपराष्ट्रपति वेंस आगे थे, वेनेजुएला पर हमले के बाद विदेश मंत्री रूबियो का रुतबा बढ़ा अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के अगले अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की संभावनाएं अचानक काफी बढ़ गई हैं। ब्रिटिश अखबार द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक इसकी वजह वेनेजुएला पर की गई अमेरिकी कार्रवाई है। अमेरिकी सेना ने 3 जनवरी की रात वेनेजुएला पर हमला किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा कर अमेरिका लेकर आ गए। यह मिलिट्री एक्शन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मंजूरी से हुआ। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Trump Skeptical of Iran Peace Proposal; Crime Price Not Paid

वॉशिंगटन डीसी22 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के नए शांति प्रस्ताव की समीक्षा करने की बात कही है, लेकिन इसकी सफलता पर संदेह जताया। उन्होंने कहा कि ईरान ने अभी तक अपने अपराधों की कीमत नहीं चुकाई है। ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कहा कि वे ईरान के भेजे गए प्रस्ताव को जल्द देखेंगे, लेकिन इसके स्वीकार होने की संभावना कम है। उनका कहना है कि पिछले 47 साल में ईरान ने जो किया, उसके लिए उसे बड़ी कीमत चुकानी बाकी है। दरअसल ईरान की एजेंसियों के मुताबिक, तेहरान ने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को 14-पॉइंट प्रस्ताव भेजा है। इसमें सभी मोर्चों पर संघर्ष खत्म करने और होर्मुज स्ट्रेट के लिए नया फ्रेमवर्क बनाने की बात शामिल है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि अब अमेरिका को तय करना है कि वह बातचीत चाहता है या टकराव। ईरान दोनों विकल्पों के लिए तैयार है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि अमेरिका को तय करना है कि वो शांति चाहता है या जंग। ईरानी अधिकारी बोले- अमेरिका पर भरोसा नहीं ईरानी सेना के सीनियर अधिकारी मोहम्मद जाफर असदी ने कल कहा कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता और दोनों देशों के बीच फिर से युद्ध हो सकता है। उन्होंने कहा कि ईरान की सेना पूरी तरह तैयार है और अगर अमेरिका कोई गलत कदम उठाता है, तो जवाब दिया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका किसी भी समझौते या वादे का पालन नहीं करता। असदी ने कहा कि अमेरिकी अधिकारियों के बयान और कदम ज्यादातर दिखावटी और मीडिया के लिए होते हैं। उनका मकसद पहले तेल की कीमतों को गिरने से रोकना और दूसरा अपनी बनाई हुई मुश्किल स्थिति से बाहर निकलना है। ईरान का आरोप- अमेरिका परमाणु संधि का पालन नहीं कर रहा ईरान ने अमेरिका पर परमाणु समझौते का पालन न करने का आरोप लगाया है। ईरान ने शनिवार को संयुक्त राष्ट्र में कहा कि अमेरिका परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के नियमों का पालन नहीं कर रहा और उसका व्यवहार दोहरे मापदंड वाला है। ईरान ने बयान में कहा कि पिछले 56 सालों से अमेरिका इस संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहा है। जबकि उसके पास हजारों परमाणु हथियार हैं। साथ ही ईरान ने यह भी कहा कि अगर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में काम किया जाए, तो यूरेनियम संवर्धन पर कोई कानूनी रोक नहीं है, जैसा कि ईरान के मामले में था। ईरान होर्मुज को लेकर नया कानून लाने की तैयारी कर रहा अमेरिका के साथ सीजफायर वार्ता को लेकर जारी चर्चा के बीच ईरान होर्मुज स्ट्रेट को लेकर नया कानून लाने की तैयारी कर रहा है। ईरानी संसद के उपाध्यक्ष हमीदरेजा हाजी-बाबाई ने कहा कि इस कानून के तहत इजराइल के जहाजों को इस समुद्री रास्ते से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाएगी। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित बिल में यह भी कहा गया है कि दुश्मन देशों के जहाज तभी गुजर पाएंगे, जब वे युद्ध का मुआवजा देंगे। इसके अलावा, दूसरे देशों के जहाजों को भी ईरान से अनुमति लेनी होगी, तभी वे इस रास्ते का इस्तेमाल कर सकेंगे। हाजी-बाबाई ने कहा कि अब होर्मुज में जहाजों की आवाजाही पहले जैसी नहीं रहेगी और युद्ध के बाद हालात बदल जाएंगे। ईरान जंग से दुनिया पर फूड संकट का खतरा संयुक्त राष्ट्र (UN) की संस्था FAO के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने चेतावनी दी है कि दुनिया एक बड़े खाद्य संकट की ओर बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि होर्मुज बंद होने से खाद (फर्टिलाइजर) की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। युद्ध शुरू होने के बाद से इसकी सप्लाई लगभग रुक गई है, जिससे कीमतें बढ़ रही हैं और कमी भी हो रही है। इसका असर खेती पर पड़ेगा और फसलों की पैदावार 30% तक घट सकती है। इससे खाने-पीने की चीजें और महंगी हो सकती हैं। टोरेरो ने अल जजीरा से कहा कि हालात इसलिए और खराब हो रहे हैं क्योंकि एशिया में बुआई का समय निकल चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका और ब्राजील जैसे बड़े देश अपनी फसलें बदल सकते हैं और गेहूं- मक्का की जगह सोयाबीन उगा सकते हैं, जिससे बाजार पर और असर पड़ेगा। ——————— यह खबर भी पढ़ें… ईरान जंग के 2 महीने, दुनिया में मंदी का संकट:दावा- अमेरिका ने ₹95 लाख करोड़ खर्चे, ईरान में 3,600+ मौतें; चीन-रूस फायदे में रहे अमेरिका की ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को शुरू हुई जंग को दो महीने हो चुके हैं, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने इसे छोटी और निर्णायक लड़ाई बताया था, लेकिन अब हालात उलट दिख रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
अमेरिका अपने 5000 सैनिक जर्मनी से वापस बुलाएगा:जर्मन चांसलर ने कहा था- ईरान के खिलाफ उनकी प्लानिंग ठीक नहीं, इससे ट्रम्प नाराज

अमेरिका ने जर्मनी से करीब 5,000 सैनिक हटाने का फैसला किया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह प्रक्रिया अगले 6 से 12 महीनों में पूरी होगी। यह कदम सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के बीच बयानबाजी के बाद सामने आया है। मर्ज ने पिछले महीने एक कार्यक्रम में कहा था कि अमेरिका के पास कोई अच्छी प्लानिंग नहीं है। उसे पता ही नहीं है कि वह इस जंग से बाहर कैसे निकलेगा। उन्होंने कहा कि ईरान बातचीत को टालने में माहिर है और अमेरिका को बिना नतीजे के इस्लामाबाद तक आना-जाना पड़ा। इससे अमेरिका को ईरान के सामने अपमानित होना पड़ा। इससे ट्रम्प नाराज हो गए थे। उन्होंने मर्ज को लेकर कहा कि वे बहुत खराब काम कर रहे हैं। उनको लगता है कि ईरान के पास परमाणु हथियार होना अच्छी बात है। उन्हें हकीकत की समझ नहीं है। जर्मनी में 36 हजार अमेरिकी सैन्य तैनात BBC के मुताबिक दिसंबर तक जर्मनी में 36,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात थे। यह संख्या जापान के बाद दूसरी सबसे बड़ी तैनाती है, जहां करीब 55,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। इसके अलावा इटली में करीब 12,000 और ब्रिटेन में लगभग 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। जर्मनी में अमेरिकी सैन्य ठिकाने लंबे समय से यूरोप में अमेरिका की रणनीतिक मौजूदगी का अहम हिस्सा रहे हैं। हालांकि, अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच ईरान को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। यूरोपीय देशों ने ईरान जंग में ट्रम्प का साथ देने के लिए कई बार इनकार किया है। जिसके बाद ट्रम्प आरोप लगाते आए है कि यूरोपीय देश केवल कागजी शेर है क्योंकि समय पर वह कभी काम नहीं आते। इसी बीच ट्रम्प ने इटली और स्पेन से भी सैनिक हटाने का संकेत दिया है। उनका कहना है कि ये देश ईरान के खिलाफ अमेरिका का साथ नहीं दे रहे हैं, जिससे नाटो के भीतर मतभेद बढ़ते दिख रहे हैं। पहले भी सैनिक हटाने की कोशिश कर चुके ट्रम्प राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इससे पहले भी जर्मनी से सैनिक हटाने की बात कर चुके हैं। उन्होंने जर्मनी पर नाटो के तय लक्ष्य के मुताबिक रक्षा खर्च न करने का आरोप लगाया था। साल 2020 में जर्मनी से 12,000 सैनिक हटाने का प्रस्ताव भी आया था, लेकिन अमेरिकी संसद ने इसे रोक दिया था। बाद में राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस फैसले को पलट दिया था। पिछले साल अमेरिका ने रोमानिया में भी अपने सैनिकों की संख्या कम करने का फैसला लिया था। दरअसल, ट्रम्प अमेरिकी सैनिकों को यूरोप से हटाकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शिफ्ट करना चाहते हैं ताकि चीन के खतरों से निपटा जा सके। अमेरिका के जर्मनी में सैन्य ठिकाने क्यों हैं? जर्मनी में अमेरिकी सेना की मौजूदगी 1945 से शुरू हुई, जब नाजी जर्मनी की हार के बाद अमेरिका ने वहां कब्जा कर लिया था। दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद वहां करीब 16 लाख अमेरिकी सैनिक तैनात थे, हालांकि 1 साल के बाद वहां 3 लाख सैनिक रह गए। शुरुआत में उनका काम जर्मनी के अमेरिकी कंट्रोल वाले हिस्से को संभालना और नाजीकरण खत्म करना था। लेकिन बाद में शीत युद्ध शुरू होने के साथ ही अमेरिका का मकसद बदल गया और जर्मनी को सोवियत संघ के खिलाफ एक मजबूत रक्षा दीवार बनाया गया। 1949 में नाटो बनने के बाद, अमेरिका के ये सैन्य ठिकाने स्थायी हो गए। इनका मकसद पश्चिम जर्मनी को मजबूत बनाना और सोवियत संघ के मुकाबले में खड़ा करना था। शीत युद्ध के समय जर्मनी में अमेरिका के करीब 50 बड़े सैन्य बेस और 800 से ज्यादा छोटे ठिकाने थे। उस समय वहां 2.5 लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात रहते थे, और कई जगहों पर तो पूरी की पूरी अमेरिकी बस्तियां बस गई थीं, जहां सैनिकों के परिवार के लोग रहते थे। सोवियत संघ कमजोर हुआ तो सैनिक लौटे 1989 में बर्लिन की दीवार गिरने और 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद अमेरिका ने अपनी मौजूदगी काफी कम कर दी, लेकिन पूरी तरह हटाई नहीं। आज की स्थिति में, यूरोप में अमेरिका के करीब 68,000 सैनिक तैनात हैं, जिनमें से लगभग 36,400 सिर्फ जर्मनी में हैं। ये सैनिक 20 से 40 अलग-अलग बेस में फैले हुए हैं। स्टुटगार्ट में यूरोप और अफ्रीका के लिए अमेरिकी कमांड हेडक्वार्टर है, जहां से पूरे क्षेत्र में सैन्य ऑपरेशन कंट्रोल होते हैं। यूरोप में अमेरिकी सेना के सात में से पांच स्थाई ठिकाने जर्मनी में ही हैं, बाकी बेल्जियम और इटली में हैं। जर्मनी के सबसे बड़े ठिकानों में रामस्टीन एयर बेस शामिल है, जो यूरोप में अमेरिकी वायुसेना का मुख्य केंद्र है और यहां करीब 8,500 सैनिक हैं। इसके अलावा ग्राफेनवोहर, विल्सेक और होहेनफेल्स यूरोप का सबसे बड़ा अमेरिकी ट्रेनिंग एरिया हैं। वीसबाडेन में अमेरिका आर्मी यूरोप और अफ्रीका का मुख्यालय है और लैंडस्टूल मेडिकल सेंटर अमेरिका का विदेश में सबसे बड़ा सैन्य अस्पताल है। इन बेस का रोल अब पूरी तरह बदल चुका है। पहले ये सोवियत खतरे को रोकने के लिए थे, लेकिन अब ये अमेरिका के लिए ‘लॉन्चिंग पैड’ और लॉजिस्टिक हब बन गए हैं। यहीं से अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान और हाल ही में ईरान से जुड़े सैन्य अभियानों को चलाया और सपोर्ट किया। असल में समझौता ऐसा है कि अमेरिका यूरोप की सुरक्षा में मदद करता है और बदले में यूरोप उसे ऐसा इन्फ्रास्ट्रक्चर देता है जिससे वह दुनिया भर में अपने सैन्य अभियान चला सके। इसलिए यह सिर्फ ‘यूरोप की मदद’ नहीं, बल्कि अमेरिका की रणनीति का हिस्सा है। एक्सपर्ट्स- इस फैसले से नाटो की एकता कमजोर हो सकती है सुरक्षा एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका जर्मनी से अपने सैनिक हटाता है तो इसके बड़े असर हो सकते हैं। इससे नाटो की एकता कमजोर पड़ सकती है, खासकर ऐसे वक्त में जब दुनिया में पहले ही तनाव बढ़ा हुआ है। साथ ही इससे ये संदेश जा सकता है कि अमेरिका अब यूरोप की सुरक्षा को लेकर उतना गंभीर नहीं है, जिसका फायदा रूस जैसे देश उठा सकते हैं। अमेरिकी संसद में भी इस फैसले की आलोचना हो रही है। कई नेताओं ने इसे लापरवाही भरा बताया है और कहा है कि इससे यूरोप में अमेरिका की पकड़ कमजोर हो सकती है। सीनेटर जैक रीड ने कहा






