इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से हुई मौतों पर शुक्रवार को विधानसभा में तीखी बहस हुई। नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने पहली बार सदन में बयान देते हुए भागीरथपुरा की तुलना मुंबई की धारावी से की। उन्होंने कहा कि यह 80-90 साल पुरानी बस्ती है और मिनी धारावी जैसी परिस्थितियां हैं। वहां कुछ अशिक्षित लोग रहते हैं, जिससे नगर निगम के लिए हर दृष्टि से व्यवस्थित काम करना कठिन हो जाता है। इन हालात में कर्मचारी भी प्रॉपर काम नहीं कर पाते थे। मंत्री ने घटना को इंदौर के लिए कलंक और व्यक्तिगत आत्मग्लानि का विषय बताया। उन्होंने माना कि भागीरथपुरा के लोगों और स्थानीय पार्षद ने दूषित पानी की शिकायत की थी। टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद काम शुरू होने में देरी हुई। कांग्रेस द्वारा किए गए धरना-प्रदर्शन को उन्होंने अशोभनीय बताते हुए कहा कि जहां मरहम की जरूरत थी, वहां “लाशों पर राजनीतिक रोटियां सेंकी गईं।” उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषियों पर कार्रवाई की गई है और इसमें किसी जाति को नहीं देखा गया। नेता प्रतिपक्ष ने कहा- मंत्री जी, गिनती मत करिए, लेकिन गिल्टी तो फील करिए नेता प्रतिपक्ष सिंघार ने आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि वे संवेदना व्यक्त करने गए थे, राजनीति करने नहीं। इंदौर में घोटाले पर घोटाले हो रहे हैं, एक रात में 5 करोड़ की सीवर लाइन डल जाती है। हाईकोर्ट ने हालात को हेल्थ इमरजेंसी जैसा बताया और दखल देना पड़ा। 35 से ज्यादा मौतें हुईं, सरकार 22 पर अटकी है। गिनती मत करिए, लेकिन गिल्टी तो फील करिए। आरोप लगाया कि कार्रवाई जाति देखकर की गई। दलित-आदिवासी अधिकारियों को हटाया गया, बाकी को सिर्फ ट्रांसफर किया गया। पार्षद द्वारा एक साल से गंदे पानी पर लिखे पत्रों की अनदेखी का भी मुद्दा उठाया गया। लखन घनघोरिया ने जबलपुर के गंदे पानी के सैंपल दिखाए, जबकि जयवर्धन सिंह ने कहा कि अवॉर्ड लेने में नेता आगे रहते हैं, तो विफलता पर जिम्मेदारी भी लें।














































