Saturday, 23 May 2026 | 10:37 AM

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हाइपरटेंशन क्यों कहलाता है ‘साइलेंट किलर’? हाई ब्लड प्रेशर किन गंभीर बीमारियों को देता है जन्म, ऐसे करें बीपी कंट्रोल

Hypertension signs and symptoms: आज के समय में हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है. यह ऐसी बीमारी है जो शुरुआत में कोई खास संकेत नहीं देती, लेकिन धीरे-धीरे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचाती रहती है. इसी वजह से इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है. समय से पहले मौत का बड़ा कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 70 साल से कम उम्र में होने वाली समयपूर्व मौतों की बड़ी वजह हाइपरटेंशन है. पहले यह समस्या बढ़ती उम्र में ज्यादा देखने को मिलती थी, लेकिन अब युवा भी तेजी से इसका शिकार हो रहे हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, खराब लाइफस्टाइल, तनाव, फास्ट फूड, ज्यादा नमक का सेवन, कम शारीरिक गतिविधि और अनियमित दिनचर्या इसकी प्रमुख वजहें हैं. क्यों खतरनाक है हाई ब्लड प्रेशर? जब ब्लड प्रेशर लंबे समय तक बढ़ा रहता है, तो इसका सीधा असर रक्त वाहिकाओं और दिल पर पड़ता है. दिल को सामान्य से ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे उसकी मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं. इसके कारण कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, जैसे: हार्ट अटैकब्रेन स्ट्रोककिडनी फेलियरहृदय संबंधी अन्य समस्याएं सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि अधिकतर लोगों को लंबे समय तक पता ही नहीं चलता कि उनका ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. रोजाना ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग क्यों जरूरी? स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हाइपरटेंशन को कंट्रोल में रखने के लिए नियमित ब्लड प्रेशर जांच बेहद जरूरी है. घर पर ही ब्लड प्रेशर चेक करने की आदत बीमारी को समय रहते पहचानने में मदद करती है. ध्यान रखने वाली जरूरी बातें-दिन में कम से कम 1 से 2 बार ब्लड प्रेशर चेक करें.-हमेशा क्लिनिकली वैलिडेटेड BP मॉनिटर का इस्तेमाल करें.-सही रीडिंग मिलने पर इलाज और दवाओं का असर समझना आसान होता है.-यदि ब्लड प्रेशर लगातार 140/90 mmHg या उससे ज्यादा रहे, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें.-लाइफस्टाइल में बदलाव से मिल सकता है फायदा डॉक्टर्स के अनुसार, सही समय पर पहचान और बेहतर जीवनशैली अपनाकर हाइपरटेंशन को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. अपनाएं ये हेल्दी आदतेंसंतुलित और पौष्टिक आहार लें.नियमित व्यायाम करें.वजन नियंत्रित रखें.नमक का सेवन कम करें.तनाव से दूर रहें.पर्याप्त नींद लें.

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Natural way to purify drinking water| पीने का पानी साफ करने का नेचुरल तरीका

Last Updated:May 22, 2026, 22:44 IST Water Purify Seed: महंगे वाटर फिल्टर पानी में मौजूद जिन माइक्रोप्लास्टिक को नहीं छान पाते हैं, उन्हें आप मोरिंगा के बीज से अलग कर सकते हैं. ब्राजील के शोधकर्ताओं ने इसकी पुष्टि की है. यहां आप पानी को साफ करने के लिए मोरिंगा सीड के इस्तेमाल के तरीके को जान सकते हैं. ख़बरें फटाफट दुनिया भर में पीने के लिए साफ पानी की समस्या तेजी से बढ़ रही है. इस समस्या ने वाटर फिल्टर का बड़ा मार्केट तो तैयार कर दिया है, लेकिन समस्या ये है कि सबके के लिए इसे अफोर्ड कर पाना आज भी मुश्किल है. ऐसे में बचाव के लिए सामने आता है नेचुरल उपाय. जिसके लिए आपको कोई भारी कीमत चुकाने की जरूरत नहीं पड़ती है और फायदे हजारों के मिल जाते हैं. ऐसा ही एक नेचुरल तरीका यहां आप जानेंगे जो पानी को साफ करके पीने योग्य बनाता है. आजकल जब भी हम नल का पानी पीते हैं, तो उसके साथ शरीर में बहुत छोटे-छोटे प्लास्टिक के कण के जाने का भी खतरा होता है, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है. ये प्लास्टिक के बेहद छोटे टुकड़े होते हैं, जो बोतलों, पैकेजिंग और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक चीजों से टूटकर पानी में मिल जाते हैं. ये इतने छोटे होते हैं कि आसानी से दिखाई नहीं देते. चिंता का विषय ये है कि ये नदियों, पीने के पानी और यहां तक कि इंसानों के खून में भी पाए गए हैं. रिसर्च में मिला नेचुरल सॉल्यूशनअब तक माइक्रोप्लास्टिक हटाने के लिए कई रासायनिक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता रहा है, लेकिन इनमें इस्तेमाल होने वाले केमिकल भी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं. ऐसे में वैज्ञानिकों ने एक प्राकृतिक उपाय खोजा है, जो मोरिंगा यानी सहजन का पौधा है. ब्राजील के साओ पाउलो स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि मोरिंगा के बीज पानी को साफ करने में मदद कर सकते हैं. मोरिंगा के बीजों से पानी की सफाईमोरिंगा भारत में भी काफी पाया जाता है और इसके पत्ते व बीज खाने में इस्तेमाल किए जाते हैं. यह पौधा पौष्टिक गुणों के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है. शोध में पता चला कि मोरिंगा के बीजों से तैयार किया गया नमक वाला अर्क पानी को साफ करने में उसी तरह काम करता है, जैसे पानी साफ करने वाले प्लांट्स में इस्तेमाल होने वाला एल्युमिनियम सल्फेट करता है. यह पदार्थ गंदगी और माइक्रोप्लास्टिक को एक जगह इकट्ठा कर देता है, जिससे उन्हें आसानी से हटाया जा सकता है. ऐसे करें यूजमोरिंगा के बीजों से पानी साफ करने के लिए सबसे पहले सूखे बीजों का छिलका हटाकर अंदर के बीज निकाल लें. इन्हें अच्छी तरह पीसकर बारीक पाउडर बना लें. अब एक लीटर साफ पानी में लगभग 1-2 चम्मच मोरिंगा पाउडर मिलाएं. इस मिश्रण को 5 मिनट तक अच्छे से हिलाएं, फिर 10-15 मिनट धीरे-धीरे चलाएं. इसके बाद पानी को 1-2 घंटे तक बिना छेड़े छोड़ दें. मोरिंगा के तत्व गंदगी और छोटे कणों को आपस में चिपकाकर नीचे बैठा देते हैं. ऊपर का साफ पानी कपड़े से छानकर इस्तेमाल किया जा सकता है. About the Author शारदा सिंहSenior Sub Editor शारदा सिंह मध्यप्रदेश की रहने वाली हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना सफर शुरू किया. उनके पास डिजिटल मीडिया और लाइफस्टाइल पत्रक…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : New Delhi,Delhi Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

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Yoga Benefits: डिप्रेशन को दूर रखने के आसान तरीके, करें ये 5 योगासन, आयुष मंत्रालय की सलाह

Last Updated:May 22, 2026, 22:06 IST Yoga For Depression: योग करने से शरीर में तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन कम होते हैं और मन शांत रहता है. इससे चिंता, घबराहट और डिप्रेशन जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है. यहां आप खास योगासन और प्राणायाम मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी माने जाते हैं. ख़बरें फटाफट Yoga For Depression: आज के समय में मेंटल हेल्थ इश्यू बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं. कम उम्र से ही लोग एंग्जायटी और डिप्रेशन से स्ट्रगल कर रहे हैं. ऐसे में आ रहे विश्व योग दिवस के मौके पर भारत सरकार का आयुष मंत्रालय लोगों को योग के फायदे बता रहा है. मंत्रालय का उद्देश्य है कि लोग योग अपनाकर शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहें. आयुष मंत्रालय ने खासतौर पर ऐसे योगासन और प्राणायाम बताए हैं, जो डिप्रेशन और तनाव को कम करने में मदद करते हैं. योग विशेषज्ञों के अनुसार, योग केवल शरीर को फिट रखने का तरीका नहीं है, बल्कि यह मन को शांत करने और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में भी बहुत फायदेमंद है. आज की तेज रफ्तार जिंदगी, काम का तनाव, पारिवारिक समस्याएं और मानसिक दबाव के कारण डिप्रेशन की समस्या तेजी से बढ़ रही है. ऐसे समय में रोजाना योग करना बहुत जरूरी हो गया है. योग से रखें रोग को दूरआयुष मंत्रालय का संदेश है “योग युक्त, रोग मुक्त.” मंत्रालय लोगों से अपील कर रहा है कि वे हर दिन सुबह कुछ समय योग के लिए निकालें. शुरुआत में 15 से 20 मिनट योग करना पर्याप्त है और बाद में धीरे-धीरे समय बढ़ाया जा सकता है. नियमित योगाभ्यास करने से शरीर स्वस्थ रहता है और मानसिक तनाव भी कम होता है. डिप्रेशन में फायदेमंद ये योगासन पवनमुक्तासनयह आसन पेट से जुड़ी समस्याओं को दूर करने में मदद करता है, साथ ही यह मन की बेचैनी और नकारात्मक सोच को कम करने में भी फायदेमंद है. भ्रामरी प्राणायामइस प्राणायाम में भौंरे जैसी आवाज निकालते हुए सांस ली और छोड़ी जाती है. इससे दिमाग शांत होता है और तनाव व चिंता कम होती है. ताड़ासनखड़े होकर किया जाने वाला यह आसान शरीर को ऊर्जा देता है. इससे शरीर का संतुलन और आत्मविश्वास बढ़ता है. भुजंगासनसांप की मुद्रा जैसा यह आसन रीढ़ की हड्डी को मजबूत बनाता है और छाती की जकड़न कम करता है. यह मन में आने वाली नकारात्मक भावनाओं को भी कम करने में मदद करता है. अनुलोम-विलोमयह प्राणायाम मन को शांत रखने और दिमाग के दोनों हिस्सों में संतुलन बनाने में मदद करता है. इसे नियमित करने से मानसिक तनाव कम होता है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. About the Author शारदा सिंहSenior Sub Editor शारदा सिंह मध्यप्रदेश की रहने वाली हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना सफर शुरू किया. उनके पास डिजिटल मीडिया और लाइफस्टाइल पत्रक…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : New Delhi,Delhi Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

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weak bones Symptoms: ऑस्टियोपोरोसिस के शुरुआती लक्षण

Last Updated:May 22, 2026, 20:00 IST Bones Weaking Disease Sign: हड्डियों में कमजोरी जीवन को मुश्किल बना सकती है. यदि आपको मूवमेंट में तकलीफ होती है, छोटी सी चोट भी फ्रेक्चर का कारण बन रही है, तो ये ऑस्टियोपोरोसिस की गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है. ख़बरें फटाफट हड्डियां हमारे शरीर का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. वे शरीर को सहारा देती हैं, चलने-फिरने में मदद करती हैं और अंदरूनी अंगों की सुरक्षा करती हैं. लेकिन बढ़ती उम्र के साथ हड्डियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं. बहुत ज्यादा कमजोरी जिससे चलना-फिरने में परेशानी होने लगे तो इसे ऑस्टियोपोरोसिस कहा जाता है. इसे “साइलेंट डिजीज” भी कहा जाता है, क्योंकि शुरुआत में इसके कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते. अक्सर लोगों को इसका पता तब चलता है जब हड्डी टूट जाती है या तेज दर्द होने लगता है. ऑस्टियोपोरोसिस में हड्डियों की घनत्व यानी बोन डेंसिटी कम हो जाती है. शरीर नई हड्डियां कम बनाता है और पुरानी हड्डियां तेजी से कमजोर होने लगती हैं. कमजोर हड्डियां हल्की चोट, गिरने या अचानक झटका लगने से भी टूट सकती हैं. यह समस्या खासतौर पर रीढ़, कूल्हों और कलाई की हड्डियों को अधिक प्रभावित करती है. 50 के बाद बढ़ता है रिस्कलखनऊ के मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में अस्थि रोग एवं जोड़ प्रतिस्थापन के निदेशक, डॉ. प्रसून कांत शमशेरी बताते हैं कि यह बीमारी किसी को भी हो सकती है, लेकिन 50 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा होता है. मेनोपॉज के बाद महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन कम हो जाता है, जिससे हड्डियां जल्दी कमजोर होने लगती हैं. हालांकि पुरुषों में भी उम्र बढ़ने के साथ यह समस्या हो सकती है. क्योंकि इसके होने का एक बड़ा कारण कैल्शियम और विटामिन D की कमी होता है.साथ ही गलत खानपान, धूम्रपान, शराब और व्यायाम की कमी भी हड्डियों को नुकसान पहुंचाते हैं. ऑस्टियोपोरोसिस के कुछ शुरुआती संकेतकद कम होनापीठ दर्दकमजोरी महसूस होनापकड़ कमजोर होनानाखून का जल्दी टूटनाअचानक फ्रैक्चर होना बचाव के उपायडॉक्टर बताते हैं कि इस बीमारी से बचाव के लिए संतुलित आहार बहुत जरूरी है. ऐसे में हड्डियों को मजबूत रखने के लिए दूध, दही, पनीर, बाजरा, तिल, बादाम और हरी सब्जियां खाएं, क्योंकि इसमें कैल्शियम की अच्छी मात्रा होती है. इसके साथ ही सुबह की धूप में कुछ देर बिना सनस्क्रिन बैठें, जिससे आपके शरीर को पर्याप्त विटामिन D मिल सके. इसके अलावा रोजाना चलना, योग, सीढ़ियां चढ़ना और हल्का व्यायाम हड्डियों को मजबूत बनाते हैं. इस बात का भी रखें ध्यानडॉक्टर 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को समय-समय पर बोन डेंसिटी टेस्ट करवाने की भी सलाह देते हैं. इससे समय रहते बीमारी का पता चलने पर सही इलाज, सप्लीमेंट और अच्छी जीवनशैली से हड्डियों को लंबे समय तक स्वस्थ रखा जा सकता है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. About the Author शारदा सिंहSenior Sub Editor शारदा सिंह मध्यप्रदेश की रहने वाली हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना सफर शुरू किया. उनके पास डिजिटल मीडिया और लाइफस्टाइल पत्रक…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : New Delhi,Delhi Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

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Last Updated:May 22, 2026, 19:51 IST Asli Shahad Ki Pehchan: क्या आप जानते हैं कि शहद का रंग ही उसकी शुद्धता, स्वाद और औषधीय गुणों का असली सर्टिफिकेट है? फूलों के आधार पर बदलने वाला शहद का रंग न सिर्फ असली-नकली का फर्क साफ करता है. बल्कि सेहत के कई राज भी खोलता है. जानिए क्यों हल्का शहद स्वाद में ज्यादा मीठा और गहरा शहद पोषक तत्वों व मिनरल्स के मामले में सबसे पावरफुल माना जाता है. ख़बरें फटाफट समस्तीपुर: शहद को सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है. लोग इसे स्वाद, ऊर्जा और औषधीय गुणों के कारण नियमित रूप से इस्तेमाल करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि शहद का रंग ही उसकी पहचान और गुणवत्ता का बड़ा संकेत होता है. दरअसल मधुमक्खियां जिस फूल के रस यानी नेक्टर को इकट्ठा करती हैं, उसी के अनुसार शहद का रंग, स्वाद और उसकी खासियत तय होती है. यही कारण है कि बाजार में मिलने वाला हर शहद एक जैसा नहीं दिखता. कोई हल्का सफेद या गोल्डन होता है तो कोई गहरा भूरा और एम्बर रंग का नजर आता है. जानकारी के अभाव में लोग इसे सामान्य अंतर समझते हैं, जबकि इसके पीछे फूलों और पौधों की पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया जुड़ी होती है. ऐसे में यह खबर उन लोगों के लिए खास है जो लंबे समय से शहद का उपयोग कर रहे हैं लेकिन उसके रंग के पीछे छिपे संकेतों को अब तक नहीं समझ पाए हैं. कौन सा फूल तैयार करता है कैसा शहदडॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ.राजेंद्र कुमार ने बताया कि मधुमक्खियां अलग-अलग फूलों के रस से विभिन्न प्रकार का शहद तैयार करती हैं. उन्होंने कहा कि अगर लोग रंग के आधार पर शहद को पहचानना सीख जाएं तो वे आसानी से समझ सकते हैं कि यह किस फूल से तैयार हुआ है. वैज्ञानिक के अनुसार लीची और सरसों के फूलों से बनने वाला शहद हल्का सफेद, क्रीम या चमकीला पीला रंग का होता है. सहजन के फूलों से तैयार शहद हल्का गोल्डन या एम्बर दिखाई देता है. वहीं सूरजमुखी का शहद सुनहरे पीले रंग का होता है. नीम और यूकेलिप्टस के फूलों से तैयार शहद हल्का से गहरा भूरा रंग लिए रहता है. वैज्ञानिक ने उदाहरण देते हुए बताया कि जामुन का फल और फूल गहरे रंग के होते हैं, इसलिए उससे बनने वाला शहद भी डार्क ब्राउन या हल्का पर्पल टोन लिए नजर आ सकता है. बहुफूल यानी मल्टीफ्लोरा शहद का रंग हल्के पीले से लेकर गहरे एम्बर तक हो सकता है, क्योंकि इसमें कई फूलों का मिश्रण होता है. रंग से समझें शहद की गुणवत्ता, स्वाद और औषधीय महत्वविशेषज्ञों के मुताबिक शहद का रंग केवल उसकी खूबसूरती नहीं बताता, बल्कि उसके स्वाद, घनत्व और औषधीय गुणों की भी जानकारी देता है. हल्के रंग का शहद स्वाद में मीठा और हल्का माना जाता है. जबकि गहरे रंग का शहद अधिक मजबूत स्वाद और अधिक मिनरल्स वाला माना जाता है. यही कारण है कि कई लोग खास बीमारी या स्वास्थ्य लाभ के लिए विशेष प्रकार का शहद चुनते हैं. उदाहरण के तौर पर लीची और सरसों का शहद ऊर्जा और स्वाद के लिए पसंद किया जाता है. जबकि नीम और जंगल से मिलने वाला गहरा शहद रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में उपयोगी माना जाता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर लोग शहद के रंग और उसके स्रोत को समझ लें तो नकली और असली शहद की पहचान करना भी आसान हो जाएगा. यही वजह है कि आजकल लोग सिर्फ स्वाद नहीं बल्कि शहद के रंग और उसके फूलों की जानकारी को भी महत्व देने लगे हैं. About the Author Amit ranjan मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Samastipur,Bihar

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Ebola Outbreak 2026: कोरोना से कम संक्रामक पर 50% मृत्यु दर, इबोला के बुंडिबुग्यो स्ट्रेन पर क्यों काम नहीं कर रही पुरानी वैक्सीन? WHO का रेड अलर्ट!

नई दिल्ली: सेंट्रल अफ्रीका में फैले नए इबोला वायरस ने पूरी दुनिया को डरा दिया है. डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) और युगांडा में इंफेक्शन बहुत तेजी से पैर पसार रहा है. सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और मामलों का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है. एक्सपर्ट्स को डर है कि मई की शुरुआत में हुई एक ‘सुपर स्प्रेडर’ घटना के बाद यह वायरस कई देशों में फैल सकता है. इसी बीच वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के डायरेक्टर जनरल डॉ. टेड्रोस एडहानोम गेब्रिएसस ने एक ऐसी घोषणा की है, जिसने सबको चिंता में डाल दिया है. उनका कहना है कि इस नए इबोला आउटब्रेक से निपटने के लिए अगले 6 से 9 महीने तक कोई भी वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो पाएगी. जब दुनिया के पास पहले से ही इबोला की वैक्सीन मौजूद है, तो इस बार ऐसा क्यों हो रहा है. आखिर क्यों मौजूदा मेडिकल साइंस इस नए खतरे के सामने बेबस नजर आ रही है. इसके पीछे एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक कारण है, जिसे समझना बेहद जरूरी है. इबोला का इतिहास क्या है? इबोला वायरस की खोज पहली बार साल 1976 में हुई थी. यह एक बेहद खतरनाक और जानलेवा बीमारी है, जो इंसानों और प्राइमेट्स (जैसे चिंपैंजी और गोरिल्ला) को अपना शिकार बनाती है. WHO की रिपोर्ट बताती है कि यह वायरस चमगादड़, साही और प्राइमेट्स के जरिए इंसानों में आता है. इसके बाद यह मरीजों के खून, शारीरिक तरल पदार्थ (बॉडी फ्लूइड्स) और उनके कपड़ों के संपर्क में आने से दूसरे इंसानों में फैलता है. इस बीमारी की औसतन मृत्यु दर लगभग 50 परसेंट है. आज से करीब एक दशक पहले साल 2014 में वेस्ट अफ्रीका में इबोला का सबसे खतरनाक हमला हुआ था. उस आउटब्रेक में दुनिया भर में 11,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी. उस समय तबाही मचाने वाला वायरस इबोला का ‘जायरे स्ट्रेन’ (Zaire strain) था. वह इतिहास का सबसे बड़ा आउटब्रेक था, जो गिनी से शुरू होकर सिएरा लियोन और लाइबेरिया तक फैल गया था. जायरे स्ट्रेन का इलाज न होने पर मृत्यु दर 90 परसेंट तक पहुंच जाता है. यही वजह थी कि वैज्ञानिकों ने रात-दिन एक करके इस खास स्ट्रेन के खिलाफ दो बेहतरीन वैक्सीन और मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज तैयार कर ली थीं. बुंडिबुग्यो स्ट्रेन क्या है और यह क्यों खतरनाक है? मौजूदा संकट के पीछे असली विलेन इबोला का एक बिल्कुल अलग रूप है, जिसे ‘बुंडिबुग्यो स्ट्रेन’ (Bundibugyo strain) कहा जाता है. इंसानों को बीमार करने वाले इबोला के मुख्य रूप से चार स्ट्रेन हैं, जिनमें जायरे और बुंडिबुग्यो शामिल हैं. बुंडिबुग्यो स्ट्रेन का इतिहास बहुत छोटा है. इतिहास में इसके सिर्फ दो आउटब्रेक देखे गए हैं. पहला साल 2007 में युगांडा में और दूसरा साल 2012 में कांगो में हुआ था. इस स्ट्रेन की चपेट में आने वाले करीब एक-तिहाई मरीजों की मौत हो जाती है. सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हमारे पास जो 5 लाख से ज्यादा वैक्सीन डोज (जैसे एरवेबो वैक्सीन) का स्टॉक मौजूद है, वह जायरे स्ट्रेन के लिए बना है. बुंडिबुग्यो स्ट्रेन पर वह वैक्सीन काम करेगी या नहीं, इसका कोई ठोस सबूत नहीं है. वायरस की बनावट अलग होने के कारण पुरानी वैक्सीन इस नए आउटब्रेक को रोकने में नाकाम साबित हो रही है. नई वैक्सीन आने में 9 महीने का समय क्यों लगेगा? WHO के एडवाइजर डॉ. वासी मूंथी के मुताबिक, बुंडिबुग्यो इबोला के खिलाफ दो ‘कैंडिडेट वैक्सीन’ पर काम चल रहा है, लेकिन अभी तक इनका इंसानों पर ट्रायल (क्लीनिकल ट्रायल) नहीं हुआ है. पहली वैक्सीन उसी रीकॉम्बीनेंट वेसिकुलर स्टोमेटाइटिस वायरस (rVSV) प्लेटफॉर्म पर आधारित है, जिससे जायरे स्ट्रेन की सफल वैक्सीन बनी थी. इसे सबसे ज्यादा उम्मीद जगाने वाली वैक्सीन माना जा रहा है, लेकिन इसके क्लीनिकल ट्रायल में 6 से 9 महीने का समय लगना तय है. दूसरी वैक्सीन को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) मिलकर तैयार कर रहे हैं. यह एस्ट्राजेनेका की कोविड वैक्सीन की तरह ChAdOx प्लेटफॉर्म पर काम करती है. यह वैक्सीन अगले दो से तीन महीनों में क्लीनिकल ट्रायल के लिए तैयार हो सकती है. हालांकि, अभी तक इसका जानवरों पर भी पूरी तरह टेस्ट नहीं हुआ है, जिससे इसकी सफलता को लेकर काफी अनिश्चितता बनी हुई है. जानवरों के टेस्ट सफल होने के बाद ही इसे इंसानों के ट्रायल के लिए मंजूरी मिलेगी. इसी वजह से WHO ने वैक्सीन उपलब्ध होने के लिए 6 से 9 महीने की समयसीमा तय की है. इस पूरे मामले पर एक्सपर्ट्स का क्या कहना है? हेल्थ एक्सपर्ट्स इस स्थिति को बेहद गंभीर मान रहे हैं. डलास की यूटी साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर की एसोसिएट प्रोफेसर कृतिका कुप्पल्ली कहती हैं कि भले ही बुंडिबुग्यो के आउटब्रेक पहले कम हुए हों, लेकिन यह एक बेहद घातक पैथोजन (बीमारी फैलाने वाला वायरस) है. इस बार स्थिति इसलिए ज्यादा डरावनी है क्योंकि हमारे पास इसके लिए कोई मान्यता प्राप्त वैक्सीन या खास दवा उपलब्ध नहीं है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के फिजिशियन डॉ. अबरार करन इसे ‘परफेक्ट स्टॉर्म’ यानी एक बहुत बड़ी मुसीबत की शुरुआत बताते हैं. हालांकि, राहत की बात यह है कि इबोला हवा के जरिए नहीं फैलता. इसलिए यह कोविड-19 या खसरे (Measles) जितना संक्रामक नहीं है. इबोला के मरीजों का इलाज कर चुकीं डॉ. नाहिद भदेलिया बताती हैं कि इबोला का एक मरीज औसतन दो लोगों को संक्रमित करता है, जबकि खसरे का एक मरीज 18 लोगों को बीमार कर सकता है. भले ही यह कम फैलता हो, लेकिन इसकी मृत्यु दर बहुत ज्यादा है. इस आउटब्रेक को लेकर क्या राजनीति हो रही है? इस महामारी के बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी शुरू हो गई है. अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो ने आरोप लगाया है कि WHO ने इस आउटब्रेक को संभालने में काफी देर कर दी. दूसरी तरफ, कांगो के इस संकट के बीच अमेरिकी प्रशासन ने वहां 50 इबोला ट्रीटमेंट क्लिनिक बनाने के लिए 23 मिलियन डॉलर की मदद का एलान किया है. इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी आपातकालीन फंड से 60 मिलियन डॉलर जारी किए हैं. हालांकि, युगांडा के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें अमेरिका की तरफ से ऐसे किसी ट्रीटमेंट सेंटर बनाए जाने की कोई जानकारी नहीं मिली है. मार्को रुबियो के आरोपों का

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कनखजूरा गलती से कान में चला जाए तो कैसे जानें, ऐसे में कौन सी सावधानियों का रखें ध्यान? जानें

कनखजूरा (Centipede) एक जहरीला कीट होता है, जो आमतौर पर नम और अंधेरी जगहों में पाया जाता है. कई बार यह गलती से कान में घुस सकता है, जो बेहद असहज और डरावनी स्थिति पैदा कर देता है. हालांकि, सही समय पर सही कदम उठाने से इस स्थिति को संभाला जा सकता है. कान में कनखजूरा जाने पर क्या हो सकता है?अगर कनखजूरा कान में चला जाए, तो व्यक्ति को तुरंत कुछ लक्षण महसूस हो सकते हैं: तेज दर्द और जलन: कनखजूरा हिलने-डुलने से कान में तेज दर्द हो सकता है.अचानक सरसराहट या हलचल महसूस होना.घबराहट और बेचैनी.सुनने में परेशानी.कभी-कभी जहर के कारण सूजन या जलन.हालांकि, आमतौर पर यह जानलेवा नहीं होता, लेकिन अगर समय पर इलाज न हो तो संक्रमण या चोट हो सकती है. क्या कनखजूरा खतरनाक होता है?कनखजूरा हल्का विषैला होता है. अगर यह काट दे या अंदर ज्यादा देर तक फंसा रहे, तो: कान में सूजन बढ़ सकती है.इन्फेक्शन का खतरा हो सकता है.कान के पर्दे को नुकसान पहुंच सकता है.इसलिए इसे हल्के में बिल्कुल न लें. ऐसी स्थिति में क्या करें?अगर कनखजूरा कान में चला जाए, तो तुरंत ये उपाय करें:1. घबराएं नहींसबसे पहले शांत रहें, क्योंकि घबराहट में आप गलत कदम उठा सकते हैं. 2. तेल या गुनगुना पानी डालेंसरसों का तेल, नारियल तेल या बेबी ऑयल की 2–3 बूंदें कान में डालें.इससे कनखजूरा मर जाता है या बाहर निकल सकता है. 3. सिर को झुकाएंजिस कान में कीट है, उस तरफ सिर झुकाकर बंद करें ताकि वह बाहर निकल सके. 4. रुई, पिन या सुई का इस्तेमाल न करेंकान में कोई नुकीली चीज डालने से स्थिति और खराब हो सकती है और चोट लग सकती है. 5. तुरंत डॉक्टर से संपर्क करेंअगर कीट बाहर न निकले या दर्द ज्यादा हो, तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं. क्या बिल्कुल नहीं करना चाहिए?कान में उंगली या तीली डालना.तेज झटके से निकालने की कोशिश करना.देर तक इंतजार करना.ये सभी चीजें नुकसान बढ़ा सकती हैं. बचाव कैसे करें?सोने से पहले आसपास साफ-सफाई रखें.जमीन पर सीधे न सोएं.नम और गंदे स्थानों से दूर रहें.बच्चों का खास ध्यान रखें.

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How to stop scalp itching | सिर की खुजली को कैसे खत्म करें

Last Updated:May 22, 2026, 17:27 IST Head Scalp Itching in Summer: झुलसती गर्मी का प्रकोप चारों तरफ शुरू हो चुका है. इस गर्मी में कई तरह की दिक्कतें एक साथ आने लगती है. शरीर के कई हिस्सों में खुजली बढ़ जाती है लेकिन इसके साथ ही कुछ लोगों के सिर की स्किन में खुजली परेशान करने लगती है. यह बहुत इरीटेट करने वाली परेशानी होती है. पर यह खुजली होती क्यों है. क्या है सिर की खुजली का कारण. इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमने डॉ. बांगिया स्किन एंड लेजर क्लिनिक के डायरेक्टर और डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. अमित बांगिया से बात की. सिर में खुजली के कारण. जैसे-जैसे तपिश बढ़ रही है शरीर में कई तरह की परेशानियां बढ़ने लगी है. एक तो गर्मी में बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है दूसरी ओर घर के अंदर भी गर्मी के कारण कई तरह की परेशानियां होने लगती है. जब उमस बढ़ती है तो पूरे शरीर में खुजली होने लगती है लेकिन अधिकांश लोग इससे कहीं ज्यादा सिर की खुजली से परेशान रहते हैं. इस खुजली के कारण चिड़चिड़ापन आ जाती है. भीषण गर्मी और पसीने के कारण सिर में होने वाली खुजली न केवल परेशानी का सबब है बल्कि यह बालों के झड़ने और स्कैल्प इंफेक्शन का कारण भी बन सकती है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि गर्मियों में सिर में खुजली इतनी क्यों बढ़ जाती है. इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमने डॉ. बांगिया स्किन एंड लेजर क्लिनिक के डायरेक्टर और डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. अमित बांगिया से बात की. सिर में खुजली बढ़ने के कारण पसीना सबसे बड़ा कारण- डॉ. अमित बांगिया ने बताया कि गर्मी के मौसम में सिर के स्कैल्प में खुजली के कई कारण है लेकिन सबसे बड़ा कारण गर्मी में सिर से ज्यादा पसीना निकलना है. जब सिर में ज्यादा पसीना निकलता है तो यह बालों में फंसकर सिर के स्कैल्प में फंस जाता है. पसीने में पानी के अलावा भी कई चीजें होती हैं. पसीना धूल, मिट्टी और नमक का मिश्रण होता है. जब यह स्कैल्प में चिपकता है तो डैंड्रफ, फंगस और बैक्टीरिया के लिए उपजाऊ जमीन तैयार कर देते हैं. वहीं ये सूक्ष्म जीव अपना घर बना लेते हैं और इंफेक्शन के कारण खुजली को जन्म देते हैं. इसके साथ पानी में नमक के कारण नमक स्कैल्प की परत को इरीटेट करता है जिसकी वजह से सिर में चुलचुलाहट पैदा होती है. जिन लोगों को पहले से डैंड्रफ, इंफेक्शन, सोराइसिस जैसी परेशानी है उनके लिए यह ज्यादा मुसीबत है. सनबर्न-गर्मी के दिनों में सूरज की रोशनी सीधे स्किन के अंदर घुसती है. जब आप बाहर ज्यादा जाएंगे तो सूरज से निकलने वाली अल्ट्रावायलेट रेज स्कैल्प को डैमेज करने लगते हैं जिसकी वजह से वहां इरीटेशन होने लगता है और जब वहां फंगस ज्यादा हो जाते हैं तो और भी परेशानी बढ़ने लगती है. डिहाइड्रेशन-गर्मी के दिनों में शरीर में पानी की कमी होने लगती है. इस डिहाइड्रेशन के कारण स्कैल्प ड्राई हो सकता है. इसकी वजह से वहां इरीटेशन होता है और सिर में खुजली ज्यादा बढ़ने लगती है. जिन लोगों को पहले से कुछ न कुछ परेशानी है उन्हें तो ज्यादा ही खुजली करती है. क्लोरीन वाला पानी-गर्मी के दिनों में लोग स्वीमिंग पूल में ज्यादा नहाने के लिए जाते हैं. अगर स्वीमिंग पूल में क्लोरीन का मात्रा ज्यादा है तो वह हैवी मेट स्कैल्प में घुसकर उसे छेड़छाड़ करता है और इससे इरीटेशन और खुजली बढ़ जाती है. तेल का इस्तेमाल-कुछ लोगों को हमेशा तेल लगाने की आदत होती है. अगर गर्मी में आप बालों में तेल लगाएंगे तो तेल में मौजूद हैवी मेटल स्कैल्प में परेशानी पैदा करेगा. इससे त्वचा में इरीटेशन बढती है और खुलजी ज्यादा होने लगती है. ज्यादा ह्यूमिडिटी के कारण भी स्कैल्प में फंगल इंफेक्शन का खतरा बढ़ता है. इन परेशानियों से कैसे बचें डॉ. अमित बांगिया कहते हैं कि गर्मी में सिर की खुजली से बचने का सबसे बेहतर तरीका यह है कि आप दिन भर में दो बार नहाएं. एक बार सुबह एक बार शाम. यदि दो समय नहाएंगे तो इस तरह की दिक्कतें होंगी ही नहीं. आप जितना हाइजीन यानी बालों की साफ-सफाई पर ध्यान देंगे, उतना आपके लिए फायदा होगा. गर्मी के दिनों में सप्ताह में 4 से 5 बार बाल में शैंपू लगाएं. शैंपू को सही तरीके से लगाएं. इसे लगाने के लिए आप शैंपू को बाल में लगाकर 2 से 3 मिनट के लिए छोड़ दें. इससे स्कैल्प अच्छे से क्लीन हो जाएगी. गर्मी के दिनों में बाल में तेल न लगाएं. अगर आप साबुन लगाना चाहते हैं तो वह भी लगा सकते हैं लेकिन साबुन को सप्ताह में तीन से चार बार ही लगाएं. यदि कंडीशनर लगाना चाहते हैं तो सप्ताह में एक ही बार लगाएं. हां, बाल में हेयर मिस्ट लगाएंगे तो यह ज्यादा अच्छा रहेगा. डॉक्टर से कब दिखाना चाहिएसामान्य तौर पर खुजली से ज्यादा कुछ नुकसान नहीं होता लेकिन यदि खुजली कई दिनों से हो रही है और यह ठीक नहीं हो रही है, इसके कारण इरीटेशन है और आप इलाज नहीं करा रहे हैं तो इससे हेयर फॉल होना शुरू हो जाएगा. इतना ही नहीं यदि लंबे वक्त तक आप इसका इलाज नहीं कराएंगे तो इससे परमानेंट हेयर लॉस भी हो सकता है. इसलिए ज्यादा दिन सिर में खुजली होने पर तुरंत डॉक्टर से दिखाना चाहिए. About the Author Lakshmi Narayan 18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें

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schizophrenia diagnosis| Twisha sharma death case: सिजोफ्रेनिया कौन-सी बीमारी है? ट्विशा की सास के दावे में कितनी सच्चाई, डॉक्टर ने बताया

सिजोफ्रेनिया शब्द इन दिनों आपने टीवी, इंटरनेट और अखबार में खूब देखा, सूना होगा. ये एक गंभीर मानसिक बीमारी है. इसका जिक्र ट्विशा शर्मा केस में भी किया गया है. मृतक ट्विशा की सास ने मीडिया में बताया कि उन्हें सिजोफ्रेनिया नाम की बीमारी थी. हालांकि ये बीमारी ट्रीटेबल है, लेकिन बहुत ही रेयर और सीरियस होती है. जिन लोगों को सिजोफ्रेनिया का पता चलता है, उन्हें यह समझने में दिक्कत हो सकती है कि क्या असली है और क्या काल्पनिक है. सिर्फ 100 में से एक को ही ये बीमारी होती है. खासबात ये है कि मरीज को खुद अपनी इस बीमारी का पता नहीं लग पाता है. नई दिल्ली स्थित तुलसी हेल्थकेयर के सीनियर साइकेट्रिस्ट और सी ई ओ डॉक्टर गौरव गुप्ता से हमने इस बीमारी के बारे में गहराई से समझने के लिए बात की. डॉक्टर ने बताया कि सिजोफ्रेनिया ट्रीटेबल मेंटल बीमारी है जो किसी व्यक्ति के सोचने के तरीके, भावनाओं, टास्क और रियलिटी की समझ पर असर डालती है. लेकिन इसका निदान तुरंत नहीं होता है. इसके लिए कई हफ्तों और महीनों तक मरीज की काउंसलिंग करनी पड़ती है. लेकिन इससे पहले भी जरूरी है कि इसके लिए लक्षण नजर आए. तो चलिए समझते हैं सिजोफ्रेनिया के लक्षण और इसके निदान के लिए क्या प्रोसेस किया जाता है और कितना समय निकलता है. सिजोफ्रेनिया के लक्षण ऐसी चीजें देखना और सुनना जो असल में वहां नहीं हैं.हेल्लुसिनेशन होना, ऐसी चीजों का अनुभव करना या उन पर यकीन करना जो सच नहीं हैं.उलझे हुए और रैंडम थॉट्स आना.अजीबोगरीब व्यवहार करना.सामाजिक मेलजोल से दूर रहना.बहुत कम या बिल्कुल भी भावनाएं जाहिर न करना.ध्यान न लगा पाना.नींद का पैटर्न बिगड़ जाना.रोजमर्रा के काम न कर पाना.साफ-सफाई का ध्यान न रखना.व्यक्तित्व में बदलाव.दूसरों पर विश्वास न करना या शक करना. बीमारी को समझने में हो सकती है गलत!एक्सपर्ट बताते हैं कि सिजोफ्रेनिया को अक्सर गलत समझा जाता है, क्योंकि यह माना जाता है कि इस बीमारी वाले व्यक्ति की स्प्लिट पर्सनैलिटी होती है. जबकि सिजोफ्रेनिया और स्प्लिट पर्सनैलिटी एक ही चीज नहीं हैं. लेकिन अगर आपने ट्विशा की सास को मीडिया ट्रायल में ये कहते हुए सुना है कि ट्विशा की दो स्प्लिट पर्सनैलिटी नजर आने लगी थी, तो आपको डॉक्टर की बात पर गौर करने की जरूरत है. क्योंकि सिजोफ्रेनिया में ऐसा नहीं होता है. कैसे शुरु होती है ये बीमारीएक्सपर्ट ने बताया कि इस बीमारी की शुरुआत धीरे-धीरे होती है, लेकिन जिन लोगों को यह बीमारी होती है, उनमें लक्षण अचानक भी उभर सकते हैं. सिजोफ्रेनिया के लक्षण अक्सर दूसरी मानसिक बीमारियों, जिनमें अन्य साइकोटिक या न्यूरोलॉजिकल बीमारियां भी शामिल हैं, के लक्षण एक जैसे ही लगते हैं. इसलिए, सिजोफ्रेनिया का पता लगाने के लिए डॉक्टर को व्यक्ति का ध्यान से असेसमेंट करना पड़ता है निदान में कितना समय लगता हैएक्सपर्ट ने ये बात साफ कहा है कि तुरंत किसी व्यक्ति को देखकर सिजोफ्रेनिया की पुष्टि नहीं की जा सकती है. इसके निदान के लिए एक पूरा प्रोसेस फॉलो किया जाता है, जिसमें कुछ हफ्तों से लेकर कई महीनों तक का समय लग सकता है. अगर लक्षण 6 महीने या उससे ज्यादा समय तक बने रहें, तब डॉक्टर इस बीमारी को कन्फर्म करते है. क्योंकि डायग्नोसिस के लिए डॉक्टर को मरीज के व्यवहार, सोच और मानसिक स्थिति को लगातार जांचना पड़ता है. क्या है डायग्नोसिस का पूरा प्रोसेससिजोफ्रेनिया के डायग्नोसिस प्रोसेस के बारे में डॉक्टर ने बताया कि इसका का पता किसी एक लैब टेस्ट, डायग्नोस्टिक स्कैन या किसी अन्य मेडिकल प्रॉसिजर के जरिए नहीं लगाया जा सकता है. जांच प्रक्रिया के दौरान, आमतौर पर मरीज की पूरी तरह से मानसिक जांच करके आकलन की प्रक्रिया शुरू की जाती है. – असेसमेंट के इंटरव्यू वाले हिस्से के दौरान, साइकेट्रिस्ट व्यक्ति के मानसिक स्थिति, कामकाज और रोजमर्रा के काम-काज के बारे में सावल पूछे जाते हैं ताकि सिजोफ्रेनिया का पता लगाने के लिए एक क्लिनिकल आधार बनाया जा सके. मरीज की पिछली या मौजूदा मेडिकल हिस्ट्री पर भी गौर किया जाता है, जिसमें परिवार में मानसिक समस्याएं, ड्रग्स या शराब का इस्तेमाल, और नींद से जुड़े दूसरे जरूरी दस्तावेज शामिल हैं. हर इंटरव्यू साइकेट्रिस्ट को मरीज की अपनी सोच, भावनाओं और व्यवहार को जाहिर करने की काबिलियत और तरीके को समझने का मौका देता है. – इसके अलावा मेडिकल जांच भी किया जाता है. इसमें ब्लड टेस्ट और ब्रेन इमेजिंग शामिल हैं, साथ ही साइकोलॉजिकल जांच भी, बीमारी का पता लगाने में मददगार साबित होती है. इन टेस्ट का मकसद यह पता लगाना है कि क्या मरीज के लक्षण ड्रग्स के इस्तेमाल, हार्मोन के असामान्य स्तर, इन्फेक्शन, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर या किसी दूसरी शारीरिक समस्या से जुड़े हैं. – मरीज की जांच में परिवार के सदस्यों को भी शामिल किया जाता है. क्योंकि वे ऐसी बहुत सी जानकारी देते हैं जो हेल्थकेयर देने वालों को मरीज की पर्सनैलिटी में आए बदलावों, जैसे कि अग्रेशन , सबसे अलग-थलग रहना, भ्रम या कामकाज और सोशल एक्टिविटी में सफलता के लेवल में कमी, को पहचानने में मदद करती है, जिनके बारे में शायद मरीज को खुद पता न हो. क्या है इलाजउपचार में आमतौर पर दवाएं , साइकोथेरेपी , फॅमिली थेरेपी , रिहैबिलिटेशन , जीवनशैली संबंधी सहायता और लगातार मनोचिकित्सकीय जांच-पड़ताल शामिल होती है. जिन लोगों में सिजोफ्रेनिया का डायग्नोसिस हुआ है, वे लगातार देखभाल और एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम मिलने पर अपने लक्षणों को कंट्रोल कर सकते हैं और अपने जीवन की क्वालिटी में सुधार ला सकते हैं. क्या ट्विशा की बीमारी को लेकर किया दावा सही?यदि यहां बताए गए जानकारी और ट्विशा की सास के दावों को देखा जाए तो दिमाग में कुछ सवाल खड़े होते हैं. पहला- जब शादी को ही 5 महीने हुए थे तो ट्विशा को ऐसी मेंटल डिजीज कैस हो सकती है जिसके निदान में ही 6 महीने तक समय लग जाता है? दूसरा- ट्विशा की सास ने ये बात भी खुद कही है कि शादी के 1-2 महीने तक सब कुछ ठीक था, उनका व्यवहार भी अच्छा था, तो अचानक उन्हें सिजोफ्रेनिया कैसे हो सकता है, जो कि बहुत ही धीरे- धीरे होता है? हालांकि अभी इस मामले में जजमेंट आना बाकी है, हम सिर्फ इस बीमारी के बारे में आपको जानकारी दे रहे

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Dog Care Tips: इंसानों ही नहीं, पालतू कुत्तों के लिए भी खतरनाक है गर्मी, अपनाएं ये टिप्स, वरना हो सकती है परेशानी

Last Updated:May 22, 2026, 16:01 IST Dog Summer Care Tips: भीषण गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान ने इन दिनों हर किसी का हाल बेहाल कर दिया है. चिलचिलाती धूप और गर्म हवाओं के थपेड़ों से सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि बेजुबान जानवर भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं. अगर आप भी एक डॉग लवर हैं और आपके घर पर कुत्ता है, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है. आज हम आपको बताएंगे कि गर्मी में डॉग का कैसे खयाल रखा जाए. (रिपोर्ट: शिवांक द्विवेदी/सतना) इसानों के मुकाबले कुत्तों को गर्मी अधिक सताती है. गर्मी में आपकी जरा सी लापरवाही आपके प्यारे डॉग की जान पर भारी पड़ सकती है. पशु चिकित्सकों ने चेतावनी दी है कि इस तपती गर्मी में डॉग्स को हीटस्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और गंभीर स्किन इंफेक्शन का सबसे ज्यादा खतरा होता है. लोकल 18 से खास बातचीत में सतना के पशु चिकित्सक डॉ. बृहस्पति भारती ने कहा कि वेटनरी में इस समय सबसे ज्यादा मामले हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के आ रहे हैं. कुत्ते इंसानों की तरह शरीर से पसीना नहीं बहा सकते, इसलिए वे गर्मी से राहत पाने के लिए अपनी जीभ बाहर निकालकर लगातार हांफते यानी पेंटिंग करते हैं. हांफते समय उनकी जीभ, मुंह और श्वसन नली से लार वाष्पित होती है, जिससे उनके शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है. गर्मियों के सीजन में कुत्तों में टिक्स यानी किलनी का प्रकोप काफी बढ़ जाता है. लंबे बालों वाली ब्रीड जैसे- गोल्डन रिट्रीवर, जर्मन शेफर्ड और कॉकर स्पैनियल में घने बालों के कारण टिक्स आसानी से छिप जाते हैं. इन टिक्स के कारण बेबेसिओसिस नाम की गंभीर प्रोटोजोअन बीमारी हो सकती है, जिसे आम भाषा में टिक फीवर भी कहते हैं. Add News18 as Preferred Source on Google इसमें कुत्ते का तापमान 105 से 106 डिग्री तक पहुंच जाता है. इस बीमारी में कुत्तों की नाक से खून भी आने लगता है, जिसे मेडिकल भाषा में एपिस्टेक्सिस और बघेलखंड में लोग विनास फूटना भी कहते हैं. वहीं इस बीमारी में कुत्तों की जान जाने का खतरा बहुत अधिक होता है. गर्मी से बचाव के लिए डॉग्स को सुबह 9 से 10 बजे से पहले और शाम को 6 बजे के बाद ही सैर पर बाहर ले जाएं. दोपहर की तेज धूप में उन्हें बिल्कुल बाहर न निकालें. चूंकि कुत्तों में स्वेट ग्लैंड्स नहीं होतीं, इसलिए उन्हें रोज नहलाना इतना जरूरी नहीं है लेकिन हफ्ते में एक बार अच्छे से नहलाना चाहिए है. डॉग्स को बहुत ज्यादा पानी में न रखें और पंजे साफ रखें क्योंकि लगातार गीलेपन से पंजों में रेडनेस, इचिंग या पायोडर्मा जैसी बीमारियां पनप सकती हैं. वहीं साइबेरियन हस्की जैसे विदेशी ब्रीड वाले डॉग्स को तो दिन-रात कूलर या एसी में ही रखना अनिवार्य है. अक्सर कई लोग डॉग्स को दिन में एक-दो बार पानी देकर भूल जाते हैं. उन्हें हमेशा साफ और ठंडा पानी उपलब्ध कराएं. आप बाजार में मिलने वाले डॉग्स स्पेशल ओआरएस घोल का इस्तेमाल भी कर सकते हैं. साथ ही उन्हें हल्का और सुपाच्य भोजन दें. अगर आपका डॉग वेजिटेरियन डाइट पर है, तो आप उसे पानी से भरपूर फल जैसे- तरबूज और खरबूजा खिला सकते हैं. डॉग्स इसे बड़े चाव से खाते हैं और इससे उनका डिहाइड्रेशन भी दूर होता है. कुत्तों का समय-समय पर टीकाकरण कराना बेहद जरूरी है. अन्यथा, उन्हें पार्वोवायरस जैसी घातक बीमारियां हो सकती हैं. गर्मियों के दौरान टिक संक्रमण भी तेजी से फैलता है, जिससे कुत्तों को कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं. इसलिए, नियमित रूप से डॉक्टर से परामर्श लेकर टिक संक्रमण का इलाज कराना जरूरी है. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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