तमिलनाडु और बंगाल में वंदे मातरम विवाद: भारत की ‘राजनीतिक प्लेलिस्ट’ पर पार्टियां क्यों लड़ रही हैं | भारत समाचार

आखरी अपडेट:21 मई, 2026, 16:41 IST प्रोटोकॉल के अनुसार, जब कई राष्ट्रगान गाए जाते हैं, तो राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान को आधिकारिक अनुक्रम में शामिल किया जाना चाहिए एक साधारण ऑडियो ट्रैक एक बड़े राजनीतिक तूफान को जन्म दे सकता है, इसका कारण भारतीय संघवाद की नाजुक बनावट है। (प्रतीकात्मक छवि) भारत की सांस्कृतिक और संघीय राजनीति राष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रतीकों के क्रम, क्रम और प्रवर्तन को लेकर एक नाटकीय मोड़ पर पहुंच गई है। पश्चिम बंगाल में, नई भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के तहत मदरसा शिक्षा निदेशालय ने एक व्यापक निर्देश जारी किया है, जिसमें सुबह की सभाओं के दौरान वंदे मातरम गाना अनिवार्य कर दिया गया है, जिससे इन संस्थानों को सभी राज्य स्कूलों के लिए पहले से अनिवार्य समान कोड के तहत लाया गया है। इसके साथ ही तमिलनाडु में एक हाई-प्रोफाइल शपथ ग्रहण समारोह के दौरान भयंकर प्रोटोकॉल युद्ध छिड़ गया है। कई दिनों में दूसरी बार, अभिनेता-राजनेता जोसेफ सी विजय के नेतृत्व वाली नवगठित सरकार से जुड़े लोक भवन कार्यक्रम में राज्य के आह्वान गीत, तमिल थाई वाज़्थु से पहले वंदे मातरम का प्रदर्शन किया गया। इस संरचनात्मक पुनर्व्यवस्था ने क्षेत्रीय दलों की उग्र प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया है, जिसने भारत की देशभक्ति की धुनों को नियंत्रित करने वाले जटिल कानूनी पदानुक्रम पर ध्यान केंद्रित किया है। भारतीय कानून के तहत वंदे मातरम की आधिकारिक कानूनी स्थिति क्या है? वर्तमान बहु-राज्य संवैधानिक बहस को समझने के लिए, किसी को 24 जनवरी, 1950 को भारत की संविधान सभा द्वारा पारित ऐतिहासिक फैसले को देखना चाहिए। सत्र की अध्यक्षता करते हुए, भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने एक निश्चित वक्तव्य दिया, जिसने देश के देशभक्ति संगीत के लिए कानूनी ढांचा स्थापित किया। उन्होंने घोषणा की कि जहां रवींद्रनाथ टैगोर का जन गण मन आधिकारिक राष्ट्रगान के रूप में काम करेगा, वहीं बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के ऐतिहासिक स्वतंत्रता गान, वंदे मातरम, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, को समान रूप से सम्मानित किया जाना चाहिए और राष्ट्रगान के बराबर दर्जा दिया जाना चाहिए। इस राष्ट्रपति के आदेश ने वंदे मातरम को भारत के आधिकारिक राष्ट्रीय गीत के रूप में स्थापित किया, जिससे इसे मानक क्षेत्रीय या राज्य गीतों से अलग एक अद्वितीय, पवित्र संवैधानिक स्थान प्राप्त हुआ। प्रोटोकॉल पदानुक्रम राष्ट्रीय और राज्य गीतों के अनुक्रम को कैसे व्यवस्थित करता है? चेन्नई में चल रहा टकराव लंबे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय सम्मेलन और संघीय सलाहकार प्रोटोकॉल के बीच सीधे टकराव से उत्पन्न हुआ है। गृह मंत्रालय द्वारा जारी स्पष्ट दिशानिर्देशों और ऐतिहासिक राज्य प्रोटोकॉल के अनुसार, सभी औपचारिक संवैधानिक और राज्य कार्यों में राष्ट्रीय प्रतीकों को पूर्ण प्राथमिकता दी जाती है। जब एक से अधिक गान गाए जाते हैं, तो राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान को आधिकारिक अनुक्रम का आधार बनाना चाहिए। पारंपरिक राज्य प्रोटोकॉल तय करता है कि एक राज्य मंगलाचरण गीत, जैसे कि तमिल थाई वाज़्थु, एक स्थानीय सांस्कृतिक आह्वान के रूप में कार्य करता है और इसलिए यदि इसे शुरुआत में बजाया जाता है या अनिवार्य समापन कोड के लिए रास्ता दिया जाता है, तो इसे व्यापक राष्ट्रीय प्रतीकों से पहले होना चाहिए। शपथ ग्रहण समारोह में राष्ट्रीय गीत के पीछे राज्य गान को शामिल करने को संघीय समर्थकों द्वारा राष्ट्रीय मिसाल के सख्त पालन के रूप में देखा जाता है, जबकि क्षेत्रीय दल इस पुनर्व्यवस्था को राज्य की पहचान के प्रत्यक्ष क्षरण के रूप में व्याख्या करते हैं। क्या कोई सरकार कानूनी तौर पर संस्थानों को राष्ट्रीय गीत गाने के लिए बाध्य कर सकती है? पश्चिम बंगाल का शासनादेश मदरसों को वंदे मातरम के अनिवार्य गायन को लागू करने के लिए बाध्य करता है, जो सीधे तौर पर अत्यधिक जटिल संवैधानिक ग्रे जोन में आता है। जबकि राज्य सरकार शैक्षिक एकरूपता सुनिश्चित करने के उपाय के रूप में आदेश का बचाव करती है, उसे बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य मामले में 1986 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक उदाहरण द्वारा स्थापित एक महत्वपूर्ण न्यायिक बाधा का सामना करना पड़ता है। उस ऐतिहासिक फैसले में, शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि किसी छात्र को उनकी कर्तव्यनिष्ठ धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ सक्रिय रूप से राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है, बशर्ते वे खड़े होकर उचित सम्मान दिखाएं। इसके अलावा, कानूनी परिदृश्य 1937 के ऐतिहासिक समझौते से जटिल है, जो धर्मनिरपेक्ष सद्भाव बनाए रखने के लिए वंदे मातरम के केवल पहले दो छंदों को गाने की सिफारिश करता है, क्योंकि बाद के छंदों में जटिल प्रतीकात्मक संदर्भ होते हैं जो अल्पसंख्यक समुदायों के बीच धार्मिक बहस को भड़काते हैं। क्षेत्रीय पहचान के लिए गानों का क्रम शून्य-काल का फ्लैशप्वाइंट क्यों बन गया है? एक साधारण ऑडियो ट्रैक एक बड़े राजनीतिक तूफान को जन्म दे सकता है, इसका कारण भारतीय संघवाद की नाजुक बनावट है। तमिलनाडु जैसे भाषा-आधारित पहचान की राजनीति के गहरे इतिहास वाले राज्यों में, तमिल थाई वाज़थु – जिसे आधिकारिक तौर पर 2021 में राज्य गीत घोषित किया गया है – को केवल एक संगीत विकल्प के रूप में नहीं माना जाता है; इसे क्षेत्रीय संप्रभुता और सांस्कृतिक गौरव के एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में देखा जाता है। जब जोसेफ सी विजय की नवगठित सरकार वंदे मातरम को औपचारिक कार्यक्रम के शीर्ष पर रखकर संघीय सलाह को समायोजित करती है, तो यह एक तीव्र राजनीतिक दुविधा पैदा करती है। प्रशासनिक ढांचे के लिए, यह राष्ट्रीय प्रोटोकॉल के साथ एक संरेखण का प्रतिनिधित्व करता है; क्षेत्रीय गठबंधनों के लिए, यह एक प्रतीकात्मक वापसी का प्रतिनिधित्व करता है, जो यह साबित करता है कि आधुनिक भारतीय राजनीति में, एक गीत का क्रम राजनीतिक अधिकार का एक उच्च-स्तरीय दावा है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया तमिलनाडु और बंगाल में वंदे मातरम विवाद: भारत की ‘राजनीतिक प्लेलिस्ट’ पर पार्टियां क्यों लड़ रही हैं? 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खमन ढोकला रेसिपी: बिना तेल-भुने मिनट में तैयार करें नरम और मसालेदार खमन ढोकला, गर्मी की शाम के लिए परफेक्ट बस्ट

खमन ढोलकला बनाने की सामग्री: 1 कप बेसन, 1/2 कप दही, 1/2 कप पानी, 1 मोटी अदरक-हरी मिर्च का पेस्ट, 1 चीनी चीनी, 1 मसाले का रस, स्वाद नमक, 1 मीठा ईनो नमक छवि: फ्रीपिक धन्यवाद के लिए: 1 ओरिजनल तेल, 1/2 क्वायन राई, 7-8 कैरी पत्ते, 2 हरी मिर्च लंबी कटी हुई, 1/2 कप पानी, 1 क्वारी चीनी। बबूल वाला मीठा पानी डाला से ढोलकला नर और रसदार बनता है। छवि: फ्रीपिक बनाने की विधि: सबसे पहले एक बड़े पोज़िशन में बेसन गुड लें ताकि शामिल न रहें। अब इसमें दही, पानी, नमक, चीनी, नींबू का रस और अदरक-हरी मिर्च का पेस्ट डॉलेक से पक्के हैं। छवि: एआई बैटर ना मैक्सिमम सोलोमन हो और ना मैक्सिमम सोलोमन। अब एक स्टीमर या प्लेट में पानी गर्म होने के लिए रख लें। जिस प्लेट या ट्रे में ढोलकला बनाई जाती है, उसे चित्र सा ग्रेव कर लें। छवि: एआई बैटर ने फाइनल में इनो डाला और ऊपर से थोड़ा सा पानी डाला ही बैटर को हाथ से पकड़ लिया। बैटर तुरंत फूलने जगह। अब बिना देर किए इसे ग्रीक की हुई प्लेट में डाल दिया गया। छवि: फ्रीपिक प्लेट को स्टीमर में लगभग 15 से 20 मिनट तक मध्यम गति पर ब्रेक लगाना। डोलकला पैक किया गया है या नहीं, इसमें चाकू शामिल करने के लिए चेक करें। अगर ढोलकला साफा बाहर आया है, तो समझ लें कि ढोलकला तैयार है। छवि: फ्रीपिक अब तड़का तैयार करें। एक छोटे पैन में तेल गर्म करें और इसमें राई, कैरी के पत्ते और हरी मिर्च डालें। फिर इसमें पानी और चीनी स्मारक एक स्मारक का आगमन हुआ। इस बैसाखी को तैयार करें ढोलकले के ऊपर की ओर। छवि: फ्रीपिक कुछ मिनट बाद ढोलकले को कुचलने में काट लें और हरी चटनी के साथ सर्व करें। इनोडोएड के बाद बैटर को बहुत देर तक न रखने के लिए डोकला मेन स्पॅली बनाई गई। छवि: एआई नारियल तो ऊपर से हरा धनियां और कद्दूकस किया हुआ नारियल भी डाल सकते हैं. प्रभाव, कलाकार और स्वाद से भरपूर खमन ढोलकला बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को पसंद आती है। एक बार घर में यह आसान रेसिपी जरूर ट्राई करें। छवि: फ्रीपिक
knee pain at 30| knee problems in youth|30 की उम्र में युवाओं को मिल रहा दर्द और धोखा, अपने नहीं घुटने हैं धोखेबाज, क्या है वजह? टॉप सर्जन ने बता दी

आखिर क्यों कमजोर हो रहे हैं युवाओं के घुटने?घुटना शरीर के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे ज्यादा दबाव सहने वाले जोड़ों में से एक है. चलना, बैठना, दौड़ना, सीढ़ियां चढ़ना, वजन उठाना. लगभग हर गतिविधि में घुटनों की भूमिका होती है. लेकिन जब शरीर को पर्याप्त मूवमेंट नहीं मिलता और आसपास की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं, तो घुटनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. धीरे-धीरे यह दबाव कार्टिलेज को नुकसान पहुंचाने लगता है और दर्द की शुरुआत हो जाती है. आज का शहरी जीवन इस समस्या को और बढ़ा रहा है. सुबह से रात तक लैपटॉप के सामने बैठकर काम करना, घंटों मोबाइल स्क्रीन पर समय बिताना और दिनभर बहुत कम चलना-फिरना शरीर की प्राकृतिक कार्यप्रणाली को प्रभावित कर रहा है. लगातार बैठने से क्वाड्रिसेप्स और हिप मसल्स कमजोर होने लगती हैं, जो घुटनों को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभाती हैं. जब ये मांसपेशियां कमजोर होती हैं, तो पूरा दबाव सीधे घुटनों के कार्टिलेज पर पड़ता है और घिसाव तेजी से बढ़ने लगता है. कम उम्र में घुटनों के दर्द के पीछे छिपे बड़े कारण 1. लंबे समय तक बैठकर काम करनाडेस्क जॉब आज घुटनों की समस्याओं की सबसे बड़ी वजह बन चुकी है. लगातार कई घंटों तक बैठने से घुटनों की मूवमेंट कम हो जाती है और ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होता है. यही कारण है कि कई युवा मीटिंग के बाद उठते समय जकड़न महसूस करते हैं या लंबे समय तक ड्राइव करने के बाद घुटनों में दर्द महसूस करते हैं. शुरुआती संकेतों में शामिल हैं- 2. तेजी से बढ़ता वजन और मोटापामोटापा घुटनों के लिए सबसे बड़ा जोखिम कारक माना जाता है. शरीर का अतिरिक्त वजन सीधे घुटनों पर दबाव बढ़ाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, चलने के दौरान शरीर का हर अतिरिक्त किलो वजन घुटनों पर कई गुना अधिक दबाव डालता है.रिसर्च के मुताबिक, मोटापे से ग्रस्त महिलाओं में घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस का खतरा लगभग 4 गुना तक बढ़ जाता है, जबकि पुरुषों में यह खतरा लगभग 5 गुना तक हो सकता है. यही कारण है कि कम उम्र में बढ़ता वजन अब घुटनों की बीमारी का प्रमुख कारण बनता जा रहा है. 3. “वीकेंड वॉरियर” फिटनेस कल्चरआजकल कई लोग पूरे सप्ताह शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहते हैं और फिर वीकेंड पर अचानक भारी वर्कआउट, रनिंग, ट्रेकिंग या खेलकूद शुरू कर देते हैं. बिना सही तैयारी, बिना स्ट्रेचिंग और गलत तकनीक के साथ किया गया हाई-इम्पैक्ट वर्कआउट घुटनों पर अचानक अत्यधिक दबाव डालता है.कंक्रीट सतह पर दौड़ना, गलत फुटवियर पहनना और जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज करना भी सूजन और माइक्रो-इंजरी का कारण बन सकता है. लंबे समय तक ऐसा होने पर घुटनों की संरचना प्रभावित होने लगती है. 4. कार्टिलेज का शुरुआती घिसावघुटनों में होने वाला नुकसान हमेशा तुरंत दर्द के रूप में सामने नहीं आता. कई बार कार्टिलेज धीरे-धीरे घिसना शुरू हो जाता है और व्यक्ति को लंबे समय तक इसका एहसास तक नहीं होता. डॉक्टरों के मुताबिक, 30 की उम्र तक कई लोगों में शुरुआती कार्टिलेज डैमेज और बोन स्पर्स बनने लगते हैं.अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यही शुरुआती बदलाव आगे चलकर ऑस्टियोआर्थराइटिस में बदल सकते हैं. 5. पोषण की कमी और लगातार तनावघुटनों की मजबूती केवल एक्सरसाइज पर निर्भर नहीं करती, बल्कि सही पोषण भी उतना ही जरूरी है. विटामिन D, कैल्शियम, मैग्नीशियम और प्रोटीन की कमी हड्डियों और मांसपेशियों को कमजोर बनाती है. इसके अलावा, लगातार तनाव और खराब नींद शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं, जिससे रिकवरी धीमी हो जाती है.फास्ट फूड, प्रोसेस्ड डाइट और अनियमित खानपान भी जोड़ों की सेहत पर नकारात्मक असर डालते हैं. किन संकेतों को भूलकर भी नजरअंदाज न करेंअगर कम उम्र में ये लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो उन्हें हल्के में लेने की गलती नहीं करनी चाहिए: क्या कम उम्र में घुटनों की समस्या को रोका जा सकता है?विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती चरण में घुटनों की अधिकांश समस्याओं को नियंत्रित किया जा सकता है और कई मामलों में स्थिति को सुधारा भी जा सकता है. इसके लिए कुछ आसान लेकिन जरूरी बदलाव अपनाने की जरूरत है. घुटनों को स्वस्थ रखने के लिए अपनाएं ये आदतें जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव30 की उम्र में घुटनों का दर्द अब दुर्लभ नहीं रहा, लेकिन इसे सामान्य समझना बड़ी गलती हो सकती है. शरीर समय रहते संकेत देना शुरू कर देता है, लेकिन ज्यादातर लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही आगे चलकर क्रॉनिक ऑस्टियोआर्थराइटिस, लगातार दर्द और चलने-फिरने में गंभीर परेशानी का कारण बन सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित शारीरिक गतिविधि, वजन नियंत्रण, मजबूत मांसपेशियां और सही जीवनशैली लंबे समय तक जोड़ों को स्वस्थ रखने की सबसे प्रभावी रणनीति हैं. छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करके कम उम्र में होने वाले घुटनों के दर्द से काफी हद तक बचा जा सकता है.शरीर हमेशा समय रहते चेतावनी देता है. जरूरत सिर्फ उसे समझने और सही समय पर कदम उठाने की है.
घर बैठे करें कान की जांच, QR स्कैन करते ही शुरू होगी टेस्टिंग, कुछ मिनट में रिपोर्ट, जानिए कैसे

Last Updated:May 21, 2026, 15:50 IST Kanpur News : यह तकनीक ऐसे लोगों के लिए वरदान है जिन्हें धीरे-धीरे कम सुनाई देना शुरू हो गया है, लेकिन वे समय पर जांच नहीं करा पाते. आजकल ईयरफोन का ज्यादा इस्तेमाल, तेज आवाज और ध्वनि प्रदूषण की वजह से लोगों में सुनने की समस्या तेजी से बढ़ रही है. लोकल 18 से शोधकर्ता डॉ. याजुषी देओल बताती हैं कि यह तकनीक लोगों को शुरुआती स्तर पर ही सुनने की समस्या पहचानने में मदद करेगी. इससे समय रहते इलाज शुरू किया जा सकेगा, ताकि वह आगे चलकर गंभीर दिक्कतों में न बदले. गांव और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा. कानपुर. यूपी स्थित कानपुर के लोगों के लिए राहत भरी खबर है. अब कान की सुनने की क्षमता जांचने के लिए अस्पतालों के लंबे चक्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने मिलकर एक खास एआई ऑडियोमीटर टूल तैयार किया है, जिससे लोग अपने मोबाइल फोन से ही सुनने की जांच कर सकेंगे. यह तकनीक खासतौर पर उन लोगों के लिए मददगार होगी जिन्हें धीरे-धीरे कम सुनाई देना शुरू हो गया है, लेकिन वे समय पर जांच नहीं करा पाते. अब सिर्फ क्यूआर कोड स्कैन करना होगा या वेब लिंक खोलना होगा. इसके बाद मोबाइल सीधे एआई टूल से जुड़ जाएगा और जांच शुरू हो जाएगी. इतने हर्ट्ज तक जांच इस नए सिस्टम में व्यक्ति को अलग-अलग ध्वनियां सुनाई जाएंगी. जैसे ही आवाज साफ सुनाई देगी, मोबाइल स्क्रीन पर क्लिक करना होगा. इसके बाद पूरी रिपोर्ट तैयार होकर सेव हो जाएगी. यह जांच 500 से 2000 हर्ट्ज की ध्वनि आवृत्ति तक सुनने की क्षमता को माप सकेगी. शोधकर्ता डॉ. याजुषी देओल ने बताया कि यह तकनीक लोगों को शुरुआती स्तर पर ही सुनने की समस्या पहचानने में मदद करेगी. इससे समय रहते इलाज शुरू किया जा सकेगा और गंभीर दिक्कतों से बचाव होगा. इनके लिए भी फायदेमंद जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. एस के कनौजिया ने बताया कि यह एआई आधारित टूल नवजात बच्चों, बुजुर्गों और कम सुनने वाले मरीजों के लिए काफी उपयोगी साबित होगा. इससे अस्पतालों की ओपीडी में भी मरीजों की स्क्रीनिंग तेजी से की जा सकेगी. उन्होंने कहा कि आजकल ईयरफोन का ज्यादा इस्तेमाल, तेज आवाज और ध्वनि प्रदूषण की वजह से लोगों में सुनने की समस्या तेजी से बढ़ रही है. ऐसे में यह तकनीक समय रहते समस्या पकड़ने में बड़ी भूमिका निभाएगी. कब से इस्तेमाल इस रिसर्च प्रोजेक्ट को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) का भी समर्थन मिला है. रिसर्च टीम के मुताबिक यह टूल करीब 80 प्रतिशत तक सटीक परिणाम देने में सफल रहा है. उम्मीद है कि इस साल के अंत तक इसे पूरी तरह इस्तेमाल के लिए तैयार कर दिया जाएगा. डॉक्टरों का मानना है कि आने वाले समय में यह तकनीक कान की बीमारियों की जांच और इलाज की प्रक्रिया को काफी आसान बना देगी. खासतौर पर गांव और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा. About the Author Priyanshu Gupta प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्स में सबमिट करें Location : Kanpur Nagar,Uttar Pradesh
दुनिया की सबसे खरनाक वायरल बीमारी कौन सी है जिसमें 100 % मौत तय है? इबोला तो इसके सामने कुछ भी नहीं

Last Updated:May 21, 2026, 15:32 IST Deadliest Viral Disease: अफ्रीकी देश कांगो में इबोला विस्फोट के बाद वायरल बीमारियों की खौफ दुनिया को हलकान कर दिया है. कोरोना के नए वैरिएंट और तरह-तरह के नए-नए वायरस से वैज्ञानिक बेहद चिंतित है. कौन सा वायरस कब तांडव दिखाने लगेगा, किसी को पता नहीं. ऐसे में अब तक जो वायरस इस धरती पर है, उनमें से कौन सा ऐसा वायरस है जो सबसे ज्यादा खतरनाक है. किस वायरस से मौत 100 फीसदी तय है. आइए इसके बारे में जानते हैं. दुनिया का सबसे घातक वायरस. कोरोना ने हमें किस तरह तबाह किया यह कहने की जरूरत नहीं. कोरोना के बाद कई अन्य वायरसों ने भी पिछले कुछ सालों से दुनिया को हलकान कर रखा है. सार्स, एवियन इंफ्लूएंजा, स्वाइन फ्लू, निपाह, मारबर्ग, इबोला जैसे खतरनाक वायरसों ने पिछले दो दशक से जिंदगी को तबाह कर दिया है. वर्तमान में यूगांडा में इबोला वायरस से हड़कंप मचा गया है. डब्यूएचओ ने इसे ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दी है. ये वायरस इतने खतरनाक होते हैं कि अगर इंसानों में प्रवेश कर जाए तो 50 फीसदी मौत तय हो जाती है. इबोला वायरस तो ऐसा है जिसमें मौत की दर 50 से 90 फीसदी तक है. लेकिन दुनिया में एक ऐसा वायरस भी है जो अगर इंसान में पहुंच जाए तो इसमें 100 फीसदी मौत तय है. रेयरेस्ट ऑफ द रेयर केस में ही इस वायरस से मौत न हो. लेकिन अगर मौत नहीं होगी तो भी व्यक्ति काम का नहीं रहेगा. इस वायरस का नाम है रेबीज. सबसे खतरनाक वायरस-रेबीजरेबीज अब तक ज्ञात सबसे खतरनाक वायरस है. अगर रेबीज के वायरस इंसानों में पहुंच जाए मौत की गारंटी पक्की है. इसमें शत-प्रतिशत मृत्यु दर है. हालांकि वैक्सीन के जरिए इससे बचाव संभव है लेकिन एक बार अगर इसके लक्षण शरीर में दिखाई दे जाएं तो मौत दर लगभग 100% हो जाती है. यह वायरस आज भी दुनिया भर में हर साल हजारों लोगों की जान ले रहा है. असली बात तो यह है कि रेबीज के वायरस अधिकांश जानवरों, सबसे ज्यादा कुत्तों में पहले से मौजूद रहता है. अगर कुत्ते को पहले से टीका न लगाया गया हो तो इसके इंसानों को काटने से यह बीमारी हो सकती है. आमतौर पर यह बीमारी कुत्तों और चमगादड़ों की लार से फैलता है. क्यों है इतना घातकरेबीज वायरस के इतना घातक होने की सबसे बड़ी वजह इसका सीधा सेंट्रल नर्वस सिस्टम यानी हमारे दिमाग और रीढ़ की हड्डी पर हमला करना है. जब कोई पहले से इंफेक्टेड जानवर किसी इंसान को काटता है तो यह वायरस मांसपेशियों के जरिए धीरे-धीरे नसों में प्रवेश करता है. इसके बाद यह नसों के रास्ते रीढ़ की हड्डी से होते हुए दिमाग तक पहुंच जाता है. दिमाग में पहुंचते ही यह वायरस तेजी से अपनी संख्या बढ़ाता है और वहां गंभीर सूजन पैदा कर देता है जिसे एक्यूट एन्सेफलाइटिस कहते हैं. एक बार जब दिमाग की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं तो शरीर के अंगों पर से नियंत्रण खो जाता है. इस वायरस की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड बहुत लंबा हो सकता है. संक्रमित होने के बाद हफ्तों या महीनों तक शरीर में कोई लक्षण नहीं दिखता. लेकिन जैसे ही पहला लक्षण जैसे पानी से डर लगना (हाइड्रोफोबिया) या हवा से डर लगना (एयरोफोबिया) सामने आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. लक्षण दिखने के बाद दुनिया में कहीं भी इसका कोई इलाज संभव नहीं है और मरीज की मौत लगभग तय हो जाती है. यही कारण है कि वैक्सीन न मिलने पर यह दुनिया का सौ फीसदी जानलेवा वायरस बन जाता है. लक्षण इतने खतरनाक कि कोई पास भी नहीं जा सकता रेबीज के अंतिम चरण में मरीज के लक्षण इतने भयानक होते हैं कि उन्हें देखकर कोई भी सिहर उठे. इस स्थिति को देखकर ही लोग मरीज के पास जाने से डरने लगते हैं. सबसे प्रमुख लक्षण है हाइड्रोफोबिया यानी पानी से बहुत ज्यादा डर लगना. जब मरीज पानी पीने की कोशिश करता है तो उसके गले की मांसपेशियों में बहुद जोर से ऐंठन होने लगती है. इससे टीस वाला दर्द होता है. यह ऐंठन इतनी तकलीफदेह होती है कि मरीज पानी की आवाज सुनकर या पानी को देखकर ही खौफ से कांपने और चीखने लगता है. इसके साथ ही मरीज का दिमाग पूरी तरह असंतुलित हो जाता है. वह अत्यधिक आक्रामक हो सकता है, अजीब हरकतें करता है, उसे मतिभ्रम होने लगता है और वह हिंसक रूप से छटपटाने लगता है. इस दौरान वायरस लार ग्रंथियों पर हमला करता है, जिससे मरीज के मुंह से लगातार अत्यधिक मात्रा में झाग और लार टपकती है. क्या मरीज को छूने से रेबीज हो सकता हैरेबीज को लेकर कुछ मिथक भी है. जैसे कहा जाता है कि रेबीज के मरीज को छून भर से किसी को बीमारी हो सकती है. यह बात पूरी तरह गलत है. सामान्य रूप से रेबीज के मरीज को केवल छूने, गले लगाने या उसकी देखभाल करने से संक्रमण नहीं फैलता है. रेबीज वायरस त्वचा को पार नहीं कर सकता. संक्रमण तब होता है जब मरीज की लार किसी दूसरे व्यक्ति के खुले घाव, कटी हुई त्वचा या खरोंच के माध्यम से शरीर के अंदर आ जाए. इसी तरह अगर मरीज की लार आंखों, नाक या मुंह के अंदर चली जाए या अपनी आक्रामक स्थिति में मरीज किसी को दांत से काट ले या ऐसी खरोंच मार दे जहां उसकी लार लगी हो तो इस स्थिति में उसे रेबीज हो सकता है. चूंकि मरीज के मुंह से बहुत ज्यादा लार निकलती है और वह अनियंत्रित होकर हाथ-पैर चलाता है, इसलिए अनजाने में उसकी लार दूसरों के संपर्क में आ सकती है. यही वजह है कि अस्पतालों में भी डॉक्टर और नर्स बेहद सावधानी बरतते हैं. वे पीपीई किट या सुरक्षात्मक गियर पहनते हैं और मरीज की देखभाल करने वाले स्टाफ को पहले ही रेबीज रोधी टीका लगा दिया जाता है. About the Author Lakshmi Narayan 18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न
High BP symptoms| हाई बीपी है ‘साइलेंट किलर’ लेकिन ये 6 लक्षण हैं पुख्ता सबूत, तुरंत पकड़ में आ जाएगी बीमारी, डॉक्टर ने बताई काम की बात

Last Updated:May 21, 2026, 15:24 IST High Blood Pressure Symptoms and signs: हाई बीपी को साइलेंट किलर कहा जाता है लेकिन डॉ पूजा त्रेहन ने हाई बीपी के 6 प्रमुख लक्षण बताए हैं, जिन्हें पहचान कर हार्ट अटैक जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है. अक्सर लोग इन लक्षणों को नींद की कमी या थकान समझकर इग्नोर कर देते हैं. हाई ब्लड प्रेशर के क्या लक्षण होते हैं, कैसे पहचानें और हार्ट अटैक के खतरे को कम करें ? High BP ke lakshan: हाई ब्लड प्रेशर अक्सर लोगों को होता है लेकिन उन्हें पता ही नहीं होता है, यही वजह है कि इस बीमारी को अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है. इसके लक्षण होते भी हैं लेकिन थकान और नींद कम आने से मिले जुले होने के कारण लोग इन्हें अक्सर इग्नोर कर देते हैं, लिहाजा ये पता करना मुश्किल होता है कि किसी को हाइपरटेंशन या हाई बीपी की समस्या हो चुकी है. हालांकि डॉक्टरों की मानें तो हाई बीपी के 6 लक्षण ऐसे हैं, जिन्हें अगर इग्नोर न किया जाए तो इस समस्या को तत्काल पहचाना जा सकता है और हार्ट अटैक या अन्य गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है. हाई ब्लड प्रेशर को लेकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर की कंसल्टेंट पैथोलॉजिस्ट और जोनल चीफ ऑफ लैब्स डॉ. पूजा त्रेहन कहती हैं कि हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन को अक्सर “साइलेंट किलर” कहा जाता है क्योंकि कई लोगों को लंबे समय तक इसका कोई साफ लक्षण महसूस ही नहीं होता.क्लिनिकल प्रैक्टिस में अक्सर मरीज कहते हैं, “हमें तो बिल्कुल ठीक लग रहा था,” लेकिन यही बात इसे और खतरनाक बनाती है. जब तक लक्षण दिखाई देते हैं, तब तक कई बार शरीर के अंदर नुकसान शुरू हो चुका होता है. पूजा आगे कहती हैं कि आज की भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल, देर रात तक जागना, कम नींद, ज्यादा स्क्रीन टाइम, बाहर का खाना, स्मोकिंग, शराब, मोटापा, तनाव और एक्सरसाइज की कमी हाई BP के मामलों को तेजी से बढ़ा रहे हैं. पहले इसे उम्रदराज लोगों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब 30–40 साल के युवाओं में भी हाई ब्लड प्रेशर काफी देखा जा रहा है. इसकी वजह से हार्ट की बीमारियां लगातार बढ़ती जा रही हैं. हालांकि कई लोगों को बीपी की समस्या होती हैं लेकिन उनमें कोई लक्षण नहीं दिखाई देते. फिर भी कुछ संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. जैसे बार-बार सिर दर्द होना, चक्कर आना, जल्दी थकान लगना, धुंधला दिखना, दिल की धड़कन तेज महसूस होना, सांस फूलना या सीने में भारीपन डॉ. पूजा कहती हैं कि लोग अक्सर इन्हें तनाव, थकावट या नींद की कमी समझकर टाल देते हैं. जबकि ये हाई बीपी के सबसे मजबूत संकेत हैं. जिन पर बारीकी से ध्यान देना जरूरी है. क्या किया जाना चाहिए? डॉ. पूजा बताती हैं कि इससे बचाव के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है. नियमित BP चेक कराना बेहद जरूरी है. कम नमक वाला संतुलित खाना खाएं रोजाना थोड़ी फिजिकल एक्टिविटी, वजन कंट्रोल में रखना, अच्छी नींद लेना, स्मोकिंग और शराब से दूरी बनाना तनाव कम करना बहुत जरूरी है. डॉ. पूजा कहती हैं कि सही समय पर पहचान और लाइफस्टाइल में छोटे बदलाव भविष्य में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और किडनी की बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं. इसलिए इन संकेतों को समय पर पहचानना जरूरी है. About the Author प्रिया गौतमSenior Correspondent Priya Gautam is an accomplished journalist currently working with Hindi.News18.com with over 14 years of extensive field reporting experience. Previously worked with Hindustan times group (Hindustan Hindi) and …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्स में सबमिट करें Location : Delhi,Delhi,Delhi
मैरी विल्सन कौन है? शिक्षाविद् से राजनेता बने अब तमिलनाडु का वित्त संभाल रहे हैं | चेन्नई-समाचार समाचार

आखरी अपडेट:21 मई, 2026, 15:22 IST आरके नगर से अपना पहला चुनाव जीतने के कुछ हफ्तों बाद, मैरी विल्सन को तमिलनाडु के सबसे शक्तिशाली मंत्रालयों में से एक मिल गया है। वह अब टीवीके की वित्तीय रणनीति का चेहरा हैं माना जाता है कि मैरी विल्सन ने पार्टी के शुरुआती विस्तार चरण के दौरान टीवीके के भीतर एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक भूमिका निभाई थी। राधाकृष्णन नगर (आरके नगर) विधानसभा क्षेत्र से अपनी पहली चुनावी जीत हासिल करने के कुछ हफ्तों बाद, एन मैरी विल्सन को तमिलगा वेट्री कज़गम (टीवीके) के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार में महत्वपूर्ण वित्त विभाग सौंपा गया है। यह घोषणा तब की गई जब विजय के नेतृत्व वाले प्रशासन ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया और नए शामिल मंत्रियों के बीच विभागों का वितरण किया। नई सरकार में वित्त विभाग के महत्व को देखते हुए, विल्सन की नियुक्ति को कैबिनेट फेरबदल में सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक के रूप में देखा जा रहा है। प्रमुख शिक्षाविद् से राजनेता बने सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने से पहले, मैरी विल्सन ने तमिलनाडु के शिक्षा क्षेत्र में एक मजबूत उपस्थिति बनाई। जनवरी 2011 से, उन्होंने कांचीपुरम जिले में स्थित श्रीपेरंबुदूर में जेप्पियार इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रबंध निदेशक के रूप में कार्य किया है। वह जेप्पियार रेमीबाई एजुकेशनल ट्रस्ट के प्रबंध ट्रस्टी के रूप में भी कार्य करते हैं। इससे पहले, विल्सन ने 2001 से 2010 तक जेप्पियार इंजीनियरिंग कॉलेज के संस्थापक-निदेशक के रूप में काम किया और 2003 और 2010 के बीच जेप्पियार इंटरनेशनल स्कूल का नेतृत्व भी किया। शिक्षाविदों के अलावा, वह जेआईटी ग्लोबल इंफोसिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक और जेआईटी स्पोर्ट्स अकादमी के संस्थापक-निदेशक हैं। आरके नगर से भारी जीत विल्सन ने टीवीके उम्मीदवार के रूप में आरके नगर से चुनाव लड़ा और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के उम्मीदवार जे जॉन एबेनेज़र के खिलाफ निर्णायक जीत दर्ज की। उन्होंने 97,800 वोट हासिल किए और एबेनेज़र को आसानी से हरा दिया, जिन्हें 48,132 वोट मिले थे। 2026 के विधानसभा चुनावों के दौरान इस निर्वाचन क्षेत्र में असाधारण रूप से उच्च मतदाता भागीदारी देखी गई, जिसमें 90.12% मतदान दर्ज किया गया, जो 2021 के चुनावों के दौरान दर्ज किए गए 70.98% मतदान से काफी अधिक है। आरके नगर में 23 अप्रैल, 2026 को मतदान हुआ। 2021 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में डीएमके के जॉन एबेनेजर ने एआईएडीएमके के राजेश आरएस को 42,479 वोटों के अंतर से हराकर सीट जीती थी। कई हाई-प्रोफाइल चेहरों के साथ टीवीके में शामिल हुए विल्सन एक समूह के हिस्से के रूप में विजय के राजनीतिक आंदोलन में शामिल हुए जिसमें पूर्व आईआरएस अधिकारी केजी अरुणराज, पूर्व न्यायिक अधिकारी सी सुभाष और पूर्व विधायक आर राजलक्ष्मी, एस डेविड सेलवन और डॉ ए श्रीधरन जैसी कई उल्लेखनीय हस्तियां शामिल थीं। राजनीति में उनके प्रवेश से जेप्पियार परिवार की दशकों बाद चुनावी राजनीति में वापसी भी हुई। परिवार की ओर से आखिरी बड़ा राजनीतिक प्रयास 1989 में हुआ, जब कर्नल डॉ जेप्पियार ने जानकी गुट के टिकट पर टी नगर से तमिलनाडु विधानसभा चुनाव लड़ा, हालांकि वह असफल रहे। टीवीके की आंतरिक रणनीति बैठकों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई माना जाता है कि मैरी विल्सन ने पार्टी के शुरुआती विस्तार चरण के दौरान टीवीके के भीतर एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक भूमिका निभाई थी। कथित तौर पर 27 सितंबर, 2025 को करूर भगदड़ की घटना के बाद जेप्पियार इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी परिसर में विजय के इनडोर बंद संबोधन के आयोजन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस बैठक को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि करूर घटना से जुड़े विवाद के बाद यह टीवीके की पहली बड़ी आंतरिक सभा बन गई। टीवीके की पूरी 234-सीटों की सूची में नामांकित उम्मीदवार विल्सन को आधिकारिक तौर पर आरके नगर के लिए टीवीके के उम्मीदवार के रूप में घोषित किया गया था जब पार्टी ने 29 और 30 मार्च, 2026 को अपनी पूरी 234 सीटों वाली उम्मीदवार सूची का अनावरण किया था। अपना पहला चुनाव लड़ने के कुछ ही महीनों के भीतर उनका शिक्षा प्रशासक से वित्त मंत्री तक का सफर विजय के नेतृत्व वाली पार्टी के भीतर हो रहे तेजी से राजनीतिक परिवर्तन और तमिलनाडु के बदलते राजनीतिक परिदृश्य को उजागर करता है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना समाचार शहर चेन्नई-समाचार मैरी विल्सन कौन है? शिक्षाविद् से राजनेता बने अब तमिलनाडु के वित्त को संभाल रहे हैं अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)एन मैरी विल्सन वित्त मंत्री तमिलनाडु(टी)तमिलगा वेट्री कड़गम(टी)टीवीके सरकार तमिलनाडु(टी)आरके नगर चुनाव 2026(टी)विजय के नेतृत्व वाला प्रशासन(टी)तमिलनाडु वित्त पोर्टफोलियो(टी)जेप्पियार इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी(टी)मैरी विल्सन राजनीतिक करियर
क्या गर्मियों में खाना चाहिए अंडा? हां या ना… जान लीजिए डॉक्टर की जुबानी

Last Updated:May 21, 2026, 15:20 IST Mirzapur News: कहा जाता है कि गर्मियों के दिनों में अंडा नहीं खाना चाहिए… पर क्या सच में ? यही जानने के लिए हमने डाइटीशियन से बात की. उन्होंने सारा भ्रम दूर किया और बताया कि अंडा खाना चाहिए या नहीं. मिर्जापुर: अक्सर आपके मन में सवाल रहता है कि गर्मियों में अंडे खाने चाहिए या नहीं. कई बार कुछ लोग गर्मियों के मौसम में अंडे को खाना ही छोड़ देते हैं. दरअसल, कहा जाता है कि गर्मियों के दिनों में अंडा नहीं खाना चाहिए. अब इस बात में कोई सच्चाई है भी या नहीं… ये आज हम आपको बताने वाले हैं. लोकल 18 की टीम ने मंडलीय अस्पताल की डाइटीशियन से इस बारे में बात की तो पता चला कि अंडा से गर्मी होने जैसी बात में कोई सच्चाई नहीं है. बिना किसी चिंता के अंडा खा सकते हैं. डाइटीशियन डॉ. ज्योति सिंह ने कहा कि अंडा किसी भी सीजन में खा सकते हैं. अंडे में सबसे ज्यादा प्रोटीन मिलता है. इसे प्रोटीन का बेहतर सोर्स माना जाता है, जो लोग भी अंडे खाते हैं वह खा सकते हैं. अक्सर मन में चलता रहता है कि गर्मियों में अंडे खाने से गर्मी होती है. यह नुकसान पहुंचाता है. हालांकि, ऐसा नहीं है. अंडे को खाने के बाद डाइजेस्ट होने में थोड़ा वक्त लगता है. यहीं वजह है कि लोग कहते हैं कि अंडा खाने से गर्मी होती है बाकी ऐसा कुछ नहीं है. यह आपके के लिए ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक है. दो अंडे हैं पर्याप्तडॉ. ज्योति सिंह ने बताया कि किसी भी संतुलित आहार के साथ दो अंडे ले सकते हैं. जब भी हाई प्रोटीन रिच चीजों को लेते हैं तो ऐसे में हाइड्रेटेड रहना फायदेमंद रहता है. अंडे में क्युरीन नामक पदार्थ होता है. ऐसे में जब भी अंडे खाएं तो पानी ज्यादा से ज्यादा मात्रा में पिएं. अन्यथा यह गठिया जैसी बीमारी का कारक हो सकता है. अंडे खाने के बाद नींद अच्छी लें. नींद पूरी न होने पर वेस्ट बनकर बाहर निकल जाता है. कोई फायदा हमारे शरीर को नहीं मिलता है. अगर आप अंडे खाने को लेकर सोच रहे हैं तो ये बेस्ट जगह है. अंडे खाए पर ज्यादा मात्रा में न खाए. यह नुकसानदेह हो सकता है. About the Author काव्या मिश्रा Kavya Mishra is working with News18 Hindi as a Senior Sub Editor in the regional section (Uttar Pradesh, Uttarakhand, Haryana and Himachal Pradesh). Active in Journalism for more than 7 years. She started her j…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्स में सबमिट करें Location : Mirzapur,Uttar Pradesh
इलॉन मस्क बन सकते हैं दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर:स्पेसएक्स वॉल स्ट्रीट के इतिहास का सबसे बड़ा IPO लाएगी; वैल्यूएशन 1.25 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई

इलॉन मस्क जल्द ही दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बन सकते हैं। दरअसल, इलॉन मस्क की रॉकेट और सैटेलाइट कंपनी स्पेसएक्स शेयर बाजार में लिस्ट होने की तैयारी कर रही है, जो वॉल स्ट्रीट के इतिहास का सबसे बड़ा IPO हो सकता है। इसकी लिस्टिंग के बाद ही मस्क की नेटवर्थ 1 ट्रिलियन के पार पहुंच सकती है। बुधवार को कंपनी ने SPCX टिकर सिंबल के तहत लिस्ट होने का प्लान पेश किया है। जिससे इस कंपनी के फाइनेंस-लीडरशिप जैसी अन्य जानकारी पहली बार सामने आई है। IPO से इलॉन मस्क कैसे बनेंगे ट्रिलियनेयर? स्पेसएक्स ने खुद की वैल्यूएशन 1.25 ट्रिलियन डॉलर आंकी है। बीबीसी (BBC) के मुताबिक, इस वैल्यूएशन से स्पेसएक्स में मस्क की बहुमत हिस्सेदारी की कीमत 600 बिलियन डॉलर से ज्यादा हो सकती है। उनकी मौजूदा संपत्ति और इस लिस्टिंग को मिलाकर मस्क की कुल नेटवर्थ 1 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर सकती है। मस्क पिछले साल ही 500 बिलियन डॉलर की नेटवर्थ पार करने वाले दुनिया के पहले व्यक्ति बने थे। वह इलेक्ट्रिक व्हीकल कंपनी टेस्ला के CEO भी हैं। स्पेसएक्स में कॉमन शेयर्स और क्लास बी शेयर्स के कॉम्बिनेशन के जरिए मस्क के पास 85.1% वोटिंग पावर है। लीडरशिप स्ट्रक्चर पहली बार सामने आया IPO फाइलिंग से स्पेसएक्स की लीडरशिप और ओनरशिप स्ट्रक्चर का पहली बार खुलासा हुआ है। मस्क कंपनी के चेयरमैन के रूप में काम करते हैं, जबकि प्रेसिडेंट और चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर ग्विन शॉटवेल भी बोर्ड में शामिल हैं। अन्य डायरेक्टर्स में चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर ब्रेट जॉनसन, वेंचर कैपिटलिस्ट रैंडी ग्लेन, स्टीव जर्विटसन, ल्यूक नोजेक, इरा एहरेनप्रेइस, प्राइवेट इक्विटी एग्जीक्यूटिव एंटोनियो ग्रासियस और गूगल एग्जीक्यूटिव डोनाल्ड हैरिसन शामिल हैं। मस्क का मार्स मिशन और सैलरी की शर्तें मस्क को 2019 से हर साल 54,080 डॉलर की फिक्स सैलरी मिल रही है। हालांकि, स्पेसएक्स ने कहा कि मस्क को 66,666,665 (6.66 करोड़) शेयर्स की 15 किश्तें मिल सकती हैं। बशर्ते कंपनी शेयर बाजार में 500 बिलियन डॉलर की बढ़ोतरी के साथ 7.5 ट्रिलियन डॉलर की वैल्यूएशन के टारगेट को छुए और कम से कम 10 लाख निवासियों के साथ मंगल ग्रह (Mars) पर एक स्थायी मानव बस्ती सफलतापूर्वक स्थापित करे। ये शेयर्स तभी दिए जाएंगे जब दोनों शर्तें पूरी होंगी और मस्क कंपनी में कार्यरत रहेंगे। इसके अलावा इस साल की शुरुआत में xAI के साथ मर्जर के बाद स्पेसएक्स ने एआई (AI) बिजनेस से मस्क के पुराने मुआवजे के अरेंजमेंट को 302 मिलियन शेयर्स के एक नए अवॉर्ड से बदल दिया है। यह अवॉर्ड फ्यूचर वैल्यूएशन टारगेट और सालाना 100 टेरावॉट कंप्यूटिंग पावर देने वाले डेटा सेंटर्स को लॉन्च करने से जुड़ा है। AI, स्टारलिंक और पृथ्वी के बाहर जीवन पर बड़ा दांव मस्क ने 2002 में स्पेसएक्स की शुरुआत एक रॉकेट कंपनी के रूप में की थी, जिसने 2021 में स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस लॉन्च करके टेलीकम्युनिकेशन में विस्तार किया। कंपनी ने अपने 277 पन्नों के प्रॉस्पेक्टस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सैटेलाइट कनेक्टिविटी और स्पेस एक्सप्लोरेशन पर फोकस को लेकर एक बड़ा लॉन्ग-टर्म विजन पेश किया है। कंपनी ने कहा कि उसका मिशन जीवन को मल्टीप्लेनेटरी बनाना और ब्रह्मांड की वास्तविक प्रकृति को समझना है। स्पेसएक्स स्टारलिंक नेटवर्क के लिए तेजी से सैटेलाइट्स बनाना और लॉन्च करना जारी रखेगी। साथ ही इसका उद्देश्य सूर्य की ऊर्जा का उपयोग करके एक ट्रुथ-सीकिंग एआई को पावर देना है, जो साइंटिफिक डिस्कवरी को आगे बढ़ा सके और चांद पर एक बेस व अन्य ग्रहों पर शहरों का निर्माण कर सके। 28.5 ट्रिलियन डॉलर का बड़ा मार्केट अवसर कंपनी ने इन्वेस्टर्स को बताया कि वह 28.5 ट्रिलियन डॉलर का संभावित मार्केट अवसर देखती है। इस मार्केट में स्पेस-इनेबल्ड सॉल्यूशंस में 370 बिलियन डॉलर, स्टारलिंक सैटेलाइट्स के जरिए कनेक्टिविटी सर्विसेज में 1.6 ट्रिलियन डॉलर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के अवसरों में 26.5 ट्रिलियन डॉलर शामिल हैं। एआई बिजनेस के भीतर स्पेसएक्स ने अंतरिक्ष में डेटा सेंटर्स लॉन्च करने से 2.4 ट्रिलियन डॉलर, संभावित कंज्यूमर सब्सक्रिप्शन से 760 बिलियन डॉलर, डिजिटल एडवरटाइजिंग से 600 बिलियन डॉलर और एंटरप्राइज एप्लिकेशंस से 22.7 ट्रिलियन डॉलर का अनुमान लगाया है। स्पेसएक्स का फाइनेंशियल पोर्टफोलियो क्या होता है टिकर सिंबल (SPCX)? पाठकों को समझाने के लिए एक छोटा बॉक्स कि शेयर बाजार में ट्रेडिंग के लिए कंपनियों को मिलने वाला यूनिक कोड क्या होता है। स्टारलिंक क्या है? यह स्पेसएक्स का सैटेलाइट इंटरनेट डिवीजन है जो अंतरिक्ष से सीधे धरती पर हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाता है। इसके बारे में संक्षिप्त जानकारी।
अंडे और पनीर की भुर्जी में क्या अंतर है, आपकी सेहत के लिये कौन है ज्यादा फायदेमंद? जानिये

अंडे और पनीर दोनों ही पोषण से भरपूर खाद्य पदार्थ हैं और भारतीय रसोई में इनकी भुर्जी बेहद लोकप्रिय है. लेकिन जब सवाल आता है कि दोनों में से कौन ज्यादा फायदेमंद है, तो इसका जवाब सीधा नहीं होता. यह आपके शरीर की जरूरत, जीवनशैली और खान-पान की आदतों पर निर्भर करता है. आइए विस्तार से समझते हैं. अंडे की भुर्जी के फायदेअंडे को “सुपरफूड” माना जाता है क्योंकि इसमें लगभग सभी जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं. हाई क्वालिटी प्रोटीन: अंडे में ऐसा प्रोटीन होता है जो शरीर द्वारा आसानी से अवशोषित हो जाता है. यह मसल्स बनाने और बॉडी रिपेयर में मदद करता है. कम कैलोरी: एक अंडे में लगभग 70–80 कैलोरी होती है, जिससे यह वजन कम करने वालों के लिए अच्छा विकल्प बनता है.विटामिन्स और मिनरल्स: इसमें विटामिन B12, D, आयरन और ओमेगा-3 फैटी एसिड होते हैं, जो दिमाग और हड्डियों के लिए फायदेमंद हैं. आसानी से पचता है: अंडे की भुर्जी हल्की होती है और जल्दी पच जाती है, इसलिए बीमार या रिकवरी कर रहे लोगों के लिए अच्छी मानी जाती है. जो लोग जिम करते हैं, फिटनेस पर ध्यान देते हैं या वजन कम करना चाहते हैं, उनके लिए अंडे की भुर्जी ज्यादा लाभकारी होती है. पनीर भुर्जी के फायदेपनीर खास तौर पर शाकाहारी लोगों के लिए एक बेहतरीन प्रोटीन स्रोत है. प्रोटीन और कैल्शियम का अच्छा स्रोत: पनीर हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है.ऊर्जा और तृप्ति: यह धीरे-धीरे पचता है, जिससे लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है.वजन बढ़ाने में मददगार: इसमें फैट की मात्रा अंडे की तुलना में अधिक होती है, जो कमजोर या दुबले लोगों के लिए फायदेमंद हो सकती है.शाकाहारी विकल्प: जो लोग अंडा नहीं खाते, उनके लिए पनीर एक बेहतरीन विकल्प है. बच्चों, बुजुर्गों और उन लोगों के लिए जो ताकत बढ़ाना चाहते हैं, पनीर भुर्जी अच्छी रहती है. किसके लिए क्या बेहतर है?वजन कम करना चाहते हैं: अंडे की भुर्जी बेहतर है क्योंकि इसमें कम कैलोरी और ज्यादा प्रोटीन होता है.वजन या ताकत बढ़ाना चाहते हैं: पनीर भुर्जी फायदेमंद है.शाकाहारी हैं: पनीर सबसे अच्छा विकल्प है.जल्दी पचने वाला भोजन चाहिए: अंडा बेहतर है.हड्डियों की मजबूती: पनीर ज्यादा लाभकारी है क्योंकि इसमें कैल्शियम अधिक होता है. ध्यान रखने वाली बातेंअंडे ज्यादा मात्रा में खाने से कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है, इसलिए संतुलित मात्रा में सेवन करें.पनीर ज्यादा खाने से वजन और फैट बढ़ सकता है, खासकर अगर आप पहले से ही कम एक्टिव हैं.दोनों को कम तेल और मसालों के साथ बनाना ज्यादा हेल्दी रहता है. तो इन सभी बातों का ध्यान में रखते हुये हम कह सकते हैं, अंडे और पनीर दोनों ही अपने-अपने तरीके से बेहद फायदेमंद हैं. अंडे की भुर्जी हल्की, जल्दी पचने वाली और फिटनेस के लिए बेहतर है, जबकि पनीर भुर्जी ज्यादा ऊर्जा और कैल्शियम देती है और शाकाहारियों के लिए बढ़िया विकल्प है.






