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दुनिया की सबसे खरनाक वायरल बीमारी कौन सी है जिसमें 100 % मौत तय है? इबोला तो इसके सामने कुछ भी नहीं

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Deadliest Viral Disease: अफ्रीकी देश कांगो में इबोला विस्फोट के बाद वायरल बीमारियों की खौफ दुनिया को हलकान कर दिया है. कोरोना के नए वैरिएंट और तरह-तरह के नए-नए वायरस से वैज्ञानिक बेहद चिंतित है. कौन सा वायरस कब तांडव दिखाने लगेगा, किसी को पता नहीं. ऐसे में अब तक जो वायरस इस धरती पर है, उनमें से कौन सा ऐसा वायरस है जो सबसे ज्यादा खतरनाक है. किस वायरस से मौत 100 फीसदी तय है. आइए इसके बारे में जानते हैं.

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दुनिया का सबसे घातक वायरस.

कोरोना ने हमें किस तरह तबाह किया यह कहने की जरूरत नहीं. कोरोना के बाद कई अन्य वायरसों ने भी पिछले कुछ सालों से दुनिया को हलकान कर रखा है. सार्स, एवियन इंफ्लूएंजा, स्वाइन फ्लू, निपाह, मारबर्ग, इबोला जैसे खतरनाक वायरसों ने पिछले दो दशक से जिंदगी को तबाह कर दिया है. वर्तमान में यूगांडा में इबोला वायरस से हड़कंप मचा गया है. डब्यूएचओ ने इसे ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दी है. ये वायरस इतने खतरनाक होते हैं कि अगर इंसानों में प्रवेश कर जाए तो 50 फीसदी मौत तय हो जाती है. इबोला वायरस तो ऐसा है जिसमें मौत की दर 50 से 90 फीसदी तक है. लेकिन दुनिया में एक ऐसा वायरस भी है जो अगर इंसान में पहुंच जाए तो इसमें 100 फीसदी मौत तय है. रेयरेस्ट ऑफ द रेयर केस में ही इस वायरस से मौत न हो. लेकिन अगर मौत नहीं होगी तो भी व्यक्ति काम का नहीं रहेगा. इस वायरस का नाम है रेबीज.

सबसे खतरनाक वायरस-रेबीज
रेबीज अब तक ज्ञात सबसे खतरनाक वायरस है. अगर रेबीज के वायरस इंसानों में पहुंच जाए मौत की गारंटी पक्की है. इसमें शत-प्रतिशत मृत्यु दर है. हालांकि वैक्सीन के जरिए इससे बचाव संभव है लेकिन एक बार अगर इसके लक्षण शरीर में दिखाई दे जाएं तो मौत दर लगभग 100% हो जाती है. यह वायरस आज भी  दुनिया भर में हर साल हजारों लोगों की जान ले रहा है. असली बात तो यह है कि रेबीज के वायरस अधिकांश जानवरों, सबसे ज्यादा कुत्तों में पहले से मौजूद रहता है. अगर कुत्ते को पहले से टीका न लगाया गया हो तो इसके इंसानों को काटने से यह बीमारी हो सकती है. आमतौर पर यह बीमारी कुत्तों और चमगादड़ों की लार से फैलता है.

क्यों है इतना घातक
रेबीज वायरस के इतना घातक होने की सबसे बड़ी वजह इसका सीधा सेंट्रल नर्वस सिस्टम यानी हमारे दिमाग और रीढ़ की हड्डी पर हमला करना है. जब कोई पहले से इंफेक्टेड जानवर किसी इंसान को काटता है तो यह वायरस मांसपेशियों के जरिए धीरे-धीरे नसों में प्रवेश करता है. इसके बाद यह नसों के रास्ते रीढ़ की हड्डी से होते हुए दिमाग तक पहुंच जाता है. दिमाग में पहुंचते ही यह वायरस तेजी से अपनी संख्या बढ़ाता है और वहां गंभीर सूजन पैदा कर देता है जिसे एक्यूट एन्सेफलाइटिस कहते हैं. एक बार जब दिमाग की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं तो शरीर के अंगों पर से नियंत्रण खो जाता है. इस वायरस की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड बहुत लंबा हो सकता है. संक्रमित होने के बाद हफ्तों या महीनों तक शरीर में कोई लक्षण नहीं दिखता. लेकिन जैसे ही पहला लक्षण जैसे पानी से डर लगना (हाइड्रोफोबिया) या हवा से डर लगना (एयरोफोबिया) सामने आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. लक्षण दिखने के बाद दुनिया में कहीं भी इसका कोई इलाज संभव नहीं है और मरीज की मौत लगभग तय हो जाती है. यही कारण है कि वैक्सीन न मिलने पर यह दुनिया का सौ फीसदी जानलेवा वायरस बन जाता है.

लक्षण इतने खतरनाक कि कोई पास भी नहीं जा सकता
रेबीज के अंतिम चरण में मरीज के लक्षण इतने भयानक होते हैं कि उन्हें देखकर कोई भी सिहर उठे. इस स्थिति को देखकर ही लोग मरीज के पास जाने से डरने लगते हैं. सबसे प्रमुख लक्षण है हाइड्रोफोबिया यानी पानी से बहुत ज्यादा डर लगना. जब मरीज पानी पीने की कोशिश करता है तो उसके गले की मांसपेशियों में बहुद जोर से ऐंठन होने लगती है. इससे टीस वाला दर्द होता है. यह ऐंठन इतनी तकलीफदेह होती है कि मरीज पानी की आवाज सुनकर या पानी को देखकर ही खौफ से कांपने और चीखने लगता है. इसके साथ ही मरीज का दिमाग पूरी तरह असंतुलित हो जाता है. वह अत्यधिक आक्रामक हो सकता है, अजीब हरकतें करता है, उसे मतिभ्रम होने लगता है और वह हिंसक रूप से छटपटाने लगता है. इस दौरान वायरस लार ग्रंथियों पर हमला करता है, जिससे मरीज के मुंह से लगातार अत्यधिक मात्रा में झाग और लार टपकती है.

क्या मरीज को छूने से रेबीज हो सकता है
रेबीज को लेकर कुछ मिथक भी है. जैसे कहा जाता है कि रेबीज के मरीज को छून भर से किसी को बीमारी हो सकती है. यह बात पूरी तरह गलत है. सामान्य रूप से रेबीज के मरीज को केवल छूने, गले लगाने या उसकी देखभाल करने से संक्रमण नहीं फैलता है. रेबीज वायरस त्वचा को पार नहीं कर सकता. संक्रमण तब होता है जब मरीज की लार किसी दूसरे व्यक्ति के खुले घाव, कटी हुई त्वचा या खरोंच के माध्यम से शरीर के अंदर आ जाए. इसी तरह अगर मरीज की लार आंखों, नाक या मुंह के अंदर चली जाए या अपनी आक्रामक स्थिति में मरीज किसी को दांत से काट ले या ऐसी खरोंच मार दे जहां उसकी लार लगी हो तो इस स्थिति में उसे रेबीज हो सकता है. चूंकि मरीज के मुंह से बहुत ज्यादा लार निकलती है और वह अनियंत्रित होकर हाथ-पैर चलाता है, इसलिए अनजाने में उसकी लार दूसरों के संपर्क में आ सकती है. यही वजह है कि अस्पतालों में भी डॉक्टर और नर्स बेहद सावधानी बरतते हैं. वे पीपीई किट या सुरक्षात्मक गियर पहनते हैं और मरीज की देखभाल करने वाले स्टाफ को पहले ही रेबीज रोधी टीका लगा दिया जाता है.

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Lakshmi Narayan

18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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दुनिया का सबसे घातक वायरस.

कोरोना ने हमें किस तरह तबाह किया यह कहने की जरूरत नहीं. कोरोना के बाद कई अन्य वायरसों ने भी पिछले कुछ सालों से दुनिया को हलकान कर रखा है. सार्स, एवियन इंफ्लूएंजा, स्वाइन फ्लू, निपाह, मारबर्ग, इबोला जैसे खतरनाक वायरसों ने पिछले दो दशक से जिंदगी को तबाह कर दिया है. वर्तमान में यूगांडा में इबोला वायरस से हड़कंप मचा गया है. डब्यूएचओ ने इसे ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दी है. ये वायरस इतने खतरनाक होते हैं कि अगर इंसानों में प्रवेश कर जाए तो 50 फीसदी मौत तय हो जाती है. इबोला वायरस तो ऐसा है जिसमें मौत की दर 50 से 90 फीसदी तक है. लेकिन दुनिया में एक ऐसा वायरस भी है जो अगर इंसान में पहुंच जाए तो इसमें 100 फीसदी मौत तय है. रेयरेस्ट ऑफ द रेयर केस में ही इस वायरस से मौत न हो. लेकिन अगर मौत नहीं होगी तो भी व्यक्ति काम का नहीं रहेगा. इस वायरस का नाम है रेबीज.

सबसे खतरनाक वायरस-रेबीज
रेबीज अब तक ज्ञात सबसे खतरनाक वायरस है. अगर रेबीज के वायरस इंसानों में पहुंच जाए मौत की गारंटी पक्की है. इसमें शत-प्रतिशत मृत्यु दर है. हालांकि वैक्सीन के जरिए इससे बचाव संभव है लेकिन एक बार अगर इसके लक्षण शरीर में दिखाई दे जाएं तो मौत दर लगभग 100% हो जाती है. यह वायरस आज भी  दुनिया भर में हर साल हजारों लोगों की जान ले रहा है. असली बात तो यह है कि रेबीज के वायरस अधिकांश जानवरों, सबसे ज्यादा कुत्तों में पहले से मौजूद रहता है. अगर कुत्ते को पहले से टीका न लगाया गया हो तो इसके इंसानों को काटने से यह बीमारी हो सकती है. आमतौर पर यह बीमारी कुत्तों और चमगादड़ों की लार से फैलता है.

क्यों है इतना घातक
रेबीज वायरस के इतना घातक होने की सबसे बड़ी वजह इसका सीधा सेंट्रल नर्वस सिस्टम यानी हमारे दिमाग और रीढ़ की हड्डी पर हमला करना है. जब कोई पहले से इंफेक्टेड जानवर किसी इंसान को काटता है तो यह वायरस मांसपेशियों के जरिए धीरे-धीरे नसों में प्रवेश करता है. इसके बाद यह नसों के रास्ते रीढ़ की हड्डी से होते हुए दिमाग तक पहुंच जाता है. दिमाग में पहुंचते ही यह वायरस तेजी से अपनी संख्या बढ़ाता है और वहां गंभीर सूजन पैदा कर देता है जिसे एक्यूट एन्सेफलाइटिस कहते हैं. एक बार जब दिमाग की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं तो शरीर के अंगों पर से नियंत्रण खो जाता है. इस वायरस की सबसे खतरनाक बात यह है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड बहुत लंबा हो सकता है. संक्रमित होने के बाद हफ्तों या महीनों तक शरीर में कोई लक्षण नहीं दिखता. लेकिन जैसे ही पहला लक्षण जैसे पानी से डर लगना (हाइड्रोफोबिया) या हवा से डर लगना (एयरोफोबिया) सामने आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. लक्षण दिखने के बाद दुनिया में कहीं भी इसका कोई इलाज संभव नहीं है और मरीज की मौत लगभग तय हो जाती है. यही कारण है कि वैक्सीन न मिलने पर यह दुनिया का सौ फीसदी जानलेवा वायरस बन जाता है.

लक्षण इतने खतरनाक कि कोई पास भी नहीं जा सकता
रेबीज के अंतिम चरण में मरीज के लक्षण इतने भयानक होते हैं कि उन्हें देखकर कोई भी सिहर उठे. इस स्थिति को देखकर ही लोग मरीज के पास जाने से डरने लगते हैं. सबसे प्रमुख लक्षण है हाइड्रोफोबिया यानी पानी से बहुत ज्यादा डर लगना. जब मरीज पानी पीने की कोशिश करता है तो उसके गले की मांसपेशियों में बहुद जोर से ऐंठन होने लगती है. इससे टीस वाला दर्द होता है. यह ऐंठन इतनी तकलीफदेह होती है कि मरीज पानी की आवाज सुनकर या पानी को देखकर ही खौफ से कांपने और चीखने लगता है. इसके साथ ही मरीज का दिमाग पूरी तरह असंतुलित हो जाता है. वह अत्यधिक आक्रामक हो सकता है, अजीब हरकतें करता है, उसे मतिभ्रम होने लगता है और वह हिंसक रूप से छटपटाने लगता है. इस दौरान वायरस लार ग्रंथियों पर हमला करता है, जिससे मरीज के मुंह से लगातार अत्यधिक मात्रा में झाग और लार टपकती है.

क्या मरीज को छूने से रेबीज हो सकता है
रेबीज को लेकर कुछ मिथक भी है. जैसे कहा जाता है कि रेबीज के मरीज को छून भर से किसी को बीमारी हो सकती है. यह बात पूरी तरह गलत है. सामान्य रूप से रेबीज के मरीज को केवल छूने, गले लगाने या उसकी देखभाल करने से संक्रमण नहीं फैलता है. रेबीज वायरस त्वचा को पार नहीं कर सकता. संक्रमण तब होता है जब मरीज की लार किसी दूसरे व्यक्ति के खुले घाव, कटी हुई त्वचा या खरोंच के माध्यम से शरीर के अंदर आ जाए. इसी तरह अगर मरीज की लार आंखों, नाक या मुंह के अंदर चली जाए या अपनी आक्रामक स्थिति में मरीज किसी को दांत से काट ले या ऐसी खरोंच मार दे जहां उसकी लार लगी हो तो इस स्थिति में उसे रेबीज हो सकता है. चूंकि मरीज के मुंह से बहुत ज्यादा लार निकलती है और वह अनियंत्रित होकर हाथ-पैर चलाता है, इसलिए अनजाने में उसकी लार दूसरों के संपर्क में आ सकती है. यही वजह है कि अस्पतालों में भी डॉक्टर और नर्स बेहद सावधानी बरतते हैं. वे पीपीई किट या सुरक्षात्मक गियर पहनते हैं और मरीज की देखभाल करने वाले स्टाफ को पहले ही रेबीज रोधी टीका लगा दिया जाता है.

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18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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