यूएन प्रमुख की रेस में 4 नाम, 2 महिलाएं:जेल में पिटाई, बिजली के झटके सहे, नहीं झुकीं मिशेल; रेबेका ने अनाज संकट से बचाया

संयुक्त राष्ट्र के 80 साल के इतिहास में पहली बार शीर्ष पद पर महिला नेतृत्व की उम्मीद बनी है। मौजूदा प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस का कार्यकाल दिसंबर में खत्म होगा। इस बार चार उम्मीदवार शार्ट लिस्ट हुए हैं। इनमें दो महिलाएं मिशेल बैचलेट (74) व रेबेका ग्रिनस्पैन (70) हैं। न्यूयॉर्क में 21-22 अप्रैल को दोनों की डिबेट होगी। मिशेल चिली की पहली महिला राष्ट्रपति रहीं जबकि रेबेका कोस्टा रिका की उप राष्ट्रपति रह चुकी हैं। मिशेल – संसाधनों की कमी से मरीज को तड़पते देख डॉक्टरी की पढ़ाई की 1973 में चिली में जनरल ऑगस्टो पिनोशे ने सैन्य तख्तापलट किया, तब मिशेल पैडिएट्रिक्स की पढ़ाई कर रही थीं। उस दौरान राष्ट्रपति सल्वाडोर से करीबी संबंध के चलते मिशेल के परिवार को बंधक बनाकर यातनाएं दी गईं। जेल में हाथ बांध लात-घूसे मारे गए। तब बंदियों को लोहे की ग्रिल से बिजली के झटके तक दिए जाते। यातनाओं से पिता की मौत के बाद भी मिशेल नहीं झुकीं। स्वास्थ्य मंत्री व रक्षा मंत्री के बाद 2006 में पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। तब शॉपिंग के लिए मॉल जाती तो प्रशंसक घेर लेते। उन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई का फैसला क्लीनिक में संसाधनों की कमी से तड़पते मरीज को देखकर ली। रेबेका – एक कॉल से कोस्टा रिका के उपराष्ट्रपति पद तक पहुंची थीं 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होते ही वैश्विक खाद्य संकट गहराने लगा। यूक्रेन से गेहूं, मक्का, जौ का निर्यात ठप हुआ, दाम बढ़े व भुखमरी का खतरा पैदा हुआ। तब रेबेका यूएन व्यापार-विकास सम्मेलन की महासचिव थीं। उन्होंने मुख्य वार्ताकार बन रूस, तुर्किए व यूक्रेन में बातचीत कराई। नतीजा काला सागर से निर्यात का समझौता हुआ, जिससे 3.3 करोड़ टन अनाज बाजार पहुंचा। कीमतें 23% तक घटीं। उनकी राजनीति 80 के दशक में राष्ट्रपति ऑफिस से एक फोन कॉल से शुरू हुई, जिसने उन्हें आर्थिक सलाहकार बनाया फिर वित्त उप मंत्री होते हुए 1994 में मध्य अमेरिकी देश कोस्टा रिका की उपराष्ट्रपति बनीं।
चेस में ‘चीटिंग’ का सस्पेंस:हार से बौखलाए कार्लसन 19 साल के नीमन से भिड़ने पहुंच गए थे

शतरंज की बिसात पर मोहरे अक्सर गहरी खामोशी व एकाग्रता के साथ चले जाते हैं। लेकिन 2022 में एक ऐसी चाल चली गई, जिसने कोहराम मचा दिया। वर्ल्ड नंबर-1 मैग्नस कार्लसन ने अमेरिका के 19 वर्षीय ग्रैंडमास्टर हंस नीमन पर चीटिंग का आरोप लगाया था। यह शतरंज के इतिहास का सबसे बड़ा, गंभीर और चर्चित विवाद बन गया। अब चार साल बाद, नेटफ्लिक्स की नई डॉक्यूमेंट्री ‘अनटोल्ड: चेस मेट्स’ ने इस विवाद को फिर से कुरेदा है। 74 मिनट की डॉक्यूमेंट्री में कई ऐसे छिपे हुए पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की गई है, जो दबे थे। डॉक्यूमेंट्री में मैग्नस कार्लसन के पिता हेनरिक कार्लसन ने एक बेहद चौंकाने वाला किस्सा साझा किया है। अमेरिका में चल रहे प्रतिष्ठित सिंकफील्ड कप में जब नीमन ने कार्लसन को हराया, तो वह कार्लसन की लगातार दूसरे टूर्नामेंट में नीमन के हाथों हार थी। इस हार के बाद कार्लसन इस कदर गुस्से और हताशा में थे कि वे सीधे नीमन के होटल के कमरे का दरवाजा खटखटाना चाहते थे। हेनरिक बताते हैं, ‘मैग्नस उस रात नीमन के कमरे में जाकर उससे सीधे पूछना चाहते थे कि आखिर यह सब क्या चल रहा है? तुम मुझे कैसे हरा रहे हो?’ नीमन रैंकिंग और खेल कौशल में कार्लसन से काफी नीचे थे। इसके बावजूद वे बिना कोई खास मेहनत के, बिल्कुल सहजता से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को मात दे रहे थे। पिता के समझाने पर कार्लसन नीमन के कमरे तक नहीं गए, लेकिन उन्होंने शतरंज के सबसे बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ‘चेस डॉट कॉम’ का रुख किया। इस हाई-प्रोफाइल मामले में यह प्लेटफॉर्म ही मुख्य गवाह था, जिसने सबसे पहले इशारा किया कि नीमन ने अतीत में बेईमानी की है। कार्लसन टूर्नामेंट से हट गए और चेस डॉट कॉम ने तत्काल नीमन को बैन कर दिया। इतना ही नहीं, प्लेटफॉर्म के सीईओ एरिक एलेबेस्ट ने जांच शुरू कर दी। अंततः इसी प्लेटफॉर्म ने 72 पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की, जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया कि नीमन के खिलाफ ‘आमने-सामने बैठकर खेले गए’ मैच में बेईमानी का कोई सुराग या प्रमाण नहीं मिला है। कार्लसन ने कभी सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया कि उन्हें नीमन पर किस खास तरीके से चीटिंग करने का शक था, इसलिए इंटरनेट की दुनिया में अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। इनमें सबसे चर्चित थ्योरी यह थी कि नीमन ने अपने शरीर में कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस छिपा रखी थी, जो उन्हें बाहर किसी कंप्यूटर से सही चाल बता रहा था। डॉक्यूमेंट्री में नीमन इस बात को लेकर बेहद भावुक और गहरे अवसाद में नजर आते हैं। डॉक्यूमेंट्री के आखिरी हिस्से में कार्लसन खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि प्लेटफॉर्म ने उन्हें गुमराह किया। चार साल बीत जाने के बाद भी यह पूरा स्कैंडल एक ऐसे अंधे मोड़ पर खड़ा है, जहां दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिद पर अड़े हैं। सटीक जवाब किसी के पास नहीं है। नीमन ने स्वीकारी चीटिंग डॉक्यूमेंट्री में चेस डॉट कॉम के चीफ चेस ऑफिसर डैनी रेंच ने बताया कि नीमन ने 100 से ज्यादा ऑनलाइन मैचों में अनुचित साधनों का प्रयोग किया था। नीमन ने स्वीकार किया कि उन्होंने 12 व 16 साल की उम्र में कुछ ऑनलाइन मैचों में रेटिंग बढ़ाने के लिए चीटिंग की थी।
चेस में ‘चीटिंग’ का सस्पेंस:हार से बौखलाए कार्लसन भिड़ने पहुंच गए थे नीमन से, 4 साल बाद भी नहीं मिला बेईमानी का सबूत

शतरंज की बिसात पर मोहरे अक्सर गहरी खामोशी व एकाग्रता के साथ चले जाते हैं। लेकिन 2022 में एक ऐसी चाल चली गई, जिसने कोहराम मचा दिया। वर्ल्ड नंबर-1 मैग्नस कार्लसन ने अमेरिका के 19 वर्षीय ग्रैंडमास्टर हंस नीमन पर चीटिंग का आरोप लगाया था। यह शतरंज के इतिहास का सबसे बड़ा, गंभीर और चर्चित विवाद बन गया। अब चार साल बाद, नेटफ्लिक्स की नई डॉक्यूमेंट्री ‘अनटोल्ड: चेस मेट्स’ ने इस विवाद को फिर से कुरेदा है। 74 मिनट की डॉक्यूमेंट्री में कई ऐसे छिपे हुए पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की गई है, जो दबे थे। डॉक्यूमेंट्री में मैग्नस कार्लसन के पिता हेनरिक कार्लसन ने एक बेहद चौंकाने वाला किस्सा साझा किया है। अमेरिका में चल रहे प्रतिष्ठित सिंकफील्ड कप में जब नीमन ने कार्लसन को हराया, तो वह कार्लसन की लगातार दूसरे टूर्नामेंट में नीमन के हाथों हार थी। इस हार के बाद कार्लसन इस कदर गुस्से और हताशा में थे कि वे सीधे नीमन के होटल के कमरे का दरवाजा खटखटाना चाहते थे। हेनरिक बताते हैं, ‘मैग्नस उस रात नीमन के कमरे में जाकर उससे सीधे पूछना चाहते थे कि आखिर यह सब क्या चल रहा है? तुम मुझे कैसे हरा रहे हो?’ नीमन रैंकिंग और खेल कौशल में कार्लसन से काफी नीचे थे। इसके बावजूद वे बिना कोई खास मेहनत के, बिल्कुल सहजता से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को मात दे रहे थे। पिता के समझाने पर कार्लसन नीमन के कमरे तक नहीं गए, लेकिन उन्होंने शतरंज के सबसे बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ‘चेस डॉट कॉम’ का रुख किया। इस हाई-प्रोफाइल मामले में यह प्लेटफॉर्म ही मुख्य गवाह था, जिसने सबसे पहले इशारा किया कि नीमन ने अतीत में बेईमानी की है। कार्लसन टूर्नामेंट से हट गए और चेस डॉट कॉम ने तत्काल नीमन को बैन कर दिया। इतना ही नहीं, प्लेटफॉर्म के सीईओ एरिक एलेबेस्ट ने जांच शुरू कर दी। अंततः इसी प्लेटफॉर्म ने 72 पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की, जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया कि नीमन के खिलाफ ‘आमने-सामने बैठकर खेले गए’ मैच में बेईमानी का कोई सुराग या प्रमाण नहीं मिला है। कार्लसन ने कभी सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया कि उन्हें नीमन पर किस खास तरीके से चीटिंग करने का शक था, इसलिए इंटरनेट की दुनिया में अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। इनमें सबसे चर्चित थ्योरी यह थी कि नीमन ने अपने शरीर में कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस छिपा रखी थी, जो उन्हें बाहर किसी कंप्यूटर से सही चाल बता रहा था। डॉक्यूमेंट्री में नीमन इस बात को लेकर बेहद भावुक और गहरे अवसाद में नजर आते हैं। डॉक्यूमेंट्री के आखिरी हिस्से में कार्लसन खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि प्लेटफॉर्म ने उन्हें गुमराह किया। चार साल बीत जाने के बाद भी यह पूरा स्कैंडल एक ऐसे अंधे मोड़ पर खड़ा है, जहां दोनों पक्ष अपनी-अपनी जिद पर अड़े हैं। सटीक जवाब किसी के पास नहीं है। नीमन ने स्वीकारी चीटिंग डॉक्यूमेंट्री में चेस डॉट कॉम के चीफ चेस ऑफिसर डैनी रेंच ने बताया कि नीमन ने 100 से ज्यादा ऑनलाइन मैचों में अनुचित साधनों का प्रयोग किया था। नीमन ने स्वीकार किया कि उन्होंने 12 व 16 साल की उम्र में कुछ ऑनलाइन मैचों में रेटिंग बढ़ाने के लिए चीटिंग की थी।
‘परफेक्ट मां’ बनने का प्रेशर:देश की 22% माताएं डिप्रेशन में, हर समय खुश रहने का दबाव खतरनाक

भारत में मां बनना अब पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित हो गया है। आंकड़ों के अनुसार मातृ मृत्यु दर में गिरावट आई है। 2014-16 में जहां एक लाख जन्म पर 130 मौतें होती थीं, जो कि अब घटकर 88 पर आ गई हैं। 89 प्रतिशत से ज्यादा डिलीवरी अब अस्पतालों में हो रही हैं। लेकिन क्या एक मां मानसिक रूप से भी उतनी ही स्वस्थ हैं, जितनी शारीरिक रूप से? नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ, अमेरिका के मुताबिक भारत में लगभग 22 फीसदी महिलाएं गर्भावस्था के दौरान या बच्चे के जन्म के बाद गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करती हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि मां की शारीरिक सुरक्षा के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना उतना ही जरूरी है। ‘नेशनल सेफ मदरहुड डे’ (11 अप्रैल) पर यह समझना जरूरी है कि सुरक्षित मातृत्व, स्वस्थ बच्चे के जन्म के साथ ही मां की मानसिक सेहत से भी जुड़ा है। आइए मेडिकल तथ्यों के नजरिए से समझते हैं मातृत्व का वह अनदेखा पहलू, जिस पर समाज आज भी बात नहीं करता। जानते हैं महिलाओं की मानसिक स्थिति से जुड़े खतरों के 4 संकेत और उनसे निपटने के उपाय भास्कर एक्सपर्ट तीन विशेषज्ञों से जानें सेफ मदरहुड के सही मायने, डॉ. सुनीला खंडेलवाल(स्त्री और प्रसूती रोग विशेषज्ञ), डॉ. स्मिता वैद कंसल्टेंट गाइनी और रोबोटिक सर्जन, डॉ. स्तुति कैलिफोर्निया (बर्कले यूनि. में एसोसिएट प्रोफेसर) 1. पॉजिटिव टॉक्सिसिटी – 23 फीसदी माताएं प्रभावित प्रेगनेंसी में एस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रॉन का उतार-चढ़ाव दिमाग पर असर डालता है, जिससे और एंग्जायटी बढ़ती है। जबरदस्ती खुश रहने के दबाव में नई मां असली भावनाएं दबा देती हैं, जिससे चिंता, थकान, इमोशनल डिस्कनेक्ट महसूस होता है। 14-23% महिलाएं क्लीनिकल एंग्जायटी से प्रभावित होती हैं। एक्सपर्ट टिप – गर्भवती महिला पर ‘हर वक्त खुश रहने’ का दबाव न डालें। एंग्जायटी ज्यादा हो तो गाइनेकोलॉजिस्ट के साथ मनोवैज्ञानिक की भी मदद लें। 2. टोकोफोबिया – 14 से 16.5% महिलाओं में डिलीवरी का डर करीब 14-16% महिलाएं टोकोफोबिया यानी डिलीवरी के डर से जूझती हैं। यह डर पिछले खराब अनुभव या लेबर पेन के कारण हो सकता है। ऐसे में कई महिलाएं सी-सेक्शन चुनती हैं। परिवार का कम सपोर्ट, अनप्लान्ड प्रेग्नेंसी, लड़का होने का दबाव और 35 साल की उम्र के बाद तनाव और बढ़ जाता है। एक्सपर्ट टिप – डॉक्टर से डिलीवरी की प्रक्रिया और पेन मैनेजमेंट पर बात करें। एंटीनेटल क्लासेस, काउंसलिंग और ब्रीदिंग एक्सरसाइज से डर कम किया जा सकता है। 3. ब्रेस्टफीडिंग न करा पाना – मां के लिए तनाव का बड़ा कारण शिशु के लिए पहले 6 महीने केवल स्तनपान की सलाह दी जाती है। लेकिन डिलीवरी के बाद कई महिलाएं चाहकर भी ब्रेस्टफीडिंग नहीं करा पाती। इसके पीछे अच्छी डाइट की कमी, पीसीओएस, थायरॉयड, डायबिटीज, ब्रेस्ट सर्जरी, प्रोलैक्टिन हॉर्मोन की कमी, तनाव, डिलीवरी के दौरान ज्यादा ब्लीडिंग जैसे मेडिकल कारण हो सकते हैं। साथ ही डिलीवरी के बाद कम पानी पीना भी इसकी एक बड़ी वजह है। एक्सपर्ट टिप – ब्रेस्टीफीडिंग में दिक्कत हो, तो फॉर्मूला फीडिंग एक विकल्प है। बस, बच्चा भूखा नहीं रहना चाहिए। इसकी मात्रा और देने का तरीका पीडियाट्रिशियन से डिस्कस कर लें। 4. प्रेगनेंसी के बाद डिप्रेशन – नवजात से दूरी और अलगाव डिलीवरी के बाद करीब 70-80% मांएं मानसिक अस्थिरता से गुजरती हैं, जिसे ‘बेबी ब्लूज’ कहा जाता है। इसमें शुरुआती 2-3 दिनों तक थकान, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन रहता है, जो आमतौर पर 1-2 हफ्तों में ठीक हो जाता है। लेकिन अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन (PPD) हो सकता है, जो करीब 15-20% महिलाओं में देखा जाता है। इसमें उदासी, तनाव, नींद और भूख में बदलाव, बच्चे से दूरी, परिवार और दोस्तों से अलगाव जैसे लक्षण होते हैं। गंभीर स्थिति में मां खुद को या बच्चे को नुकसान भी पहुंचा सकती है। एक्सपर्ट के अनुसार, अमेरिका में PPD के मामले ज्यादा देखे जाते हैं, क्योंकि वहां न्यूक्लियर फैमिली, देर से शादी और देर से मां बनने का ट्रेंड है। PPD के लक्षण अक्सर 6-8 हफ्तों बाद सामने आते हैं, जिनका इलाज काउंसलिंग, दवाइयों और बॉडी-माइंड थेरेपी से किया जाता है। एक्सपर्ट टिप – इसका सबसे बड़ा फैक्टर सोशल सपोर्ट की कमी है। इसलिए मां के लिए परिवार का साथ बहुत जरूरी है। अगर इनमें से कोई लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।
कागजों में ही होते हैं सरकारी सुधार:शहर में 20 हजार से ज्यादा मल्टियां, 40 लाख आबादी, 2 साल में सिर्फ 181 बिल्डिंगों में ही पार्किंग की जांच

सीतलामाता बाजार हो या दवा बाजार, जेल रोड या एमजी रोड… हर जगह बेतरतीब खड़े वाहन और बाजारों में पैदल चलने तक की जगह नहीं। बावजूद पार्किंग के नाम पर प्रशासन, पुलिस और नगर निगम की संयुक्त मुहिम दो साल बाद भी सिर्फ बैठकों तक ही सीमित रही। 40 लाख आबादी वाले शहर में 20 हजार से ज्यादा मल्टियां हैं, लेकिन अब तक सिर्फ 181 बिल्डिंगों की ही जांच या सर्वे हो सका है। 134 बहुमंजिला भवन सील किए गए हैं। 96 बिल्डिंग में ही बेसमेंट को पार्किंग में कन्वर्ट किया गया है। इनमें 87 में टू-व्हीलर तो 7 बिल्डिंगों में कार पार्किंग दोबारा शुरू हो सकी है। ये आंकड़े 1 अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2026 तक के हैं। साल 2026 में जनवरी से अब तक 22 जोन में 67 बिल्डिंगों की जांच की गई है। इनमें से भी मात्र 27 में पार्किंग शुरू करवाई गई है। मुहिम अब तक बड़े बाजारों से दूर जेल रोड, दवा बाजार, खजूरी बाजार, छावनी, गीता भवन, ढक्कनवाला कुआं, साउथ तुकोगंज, रेसकोर्स रोड, हाई कोर्ट से मालवा मिल, अन्नपूर्णा रोड, विजय नगर से सुखलिया, शहर के प्रमुख अस्पतालों में कहीं भी बेसमेंट पार्किंग पूरी तरह नहीं हो रही है। सपना-संगीता रोड पर टू-व्हीलर मार्केट, टॉवर चौराहा से खातीवाला टैंक, भोलाराम उस्ताद मार्ग, बड़ा गणपति से राजमोहल्ला, एरोड्रम रोड पर भी अंडर ग्राउंड पार्किंग का पूरी तरह उपयोग नहीं हो रहा है। अधिकांश क्षेत्रों में ग्राउंड फ्लोर पर दुकानें बनी हैं। यही हाल नई बन रही कॉलोनियों की मल्टियों में भी है। एबी रोड पर विजय नगर से एलआईजी तक सर्विस रोड पर खड़े वाहन बताते हैं कि पार्किंग नॉर्म्स का पालन नहीं हो रहा। सड़क किनारे ट्रैफिक रुकता है पिछले दिनों बैठक में कलेक्टर शिवम वर्मा ने निर्देश दिए थे कि सड़क सुरक्षा के तहत प्रमुख रूप से पार्किंग स्पेस विकसित करने पर विशेष ध्यान देना होगा। सड़क किनारे खड़े वाहनों के कारण यातायात प्रभावित होता है। इसे ध्यान में रखते हुए अवैध पार्किंग पर चालानी कार्रवाई, वाहनों पर लॉक लगाने जैसी सख्त कार्रवाई जारी रहे। पार्किंग स्पेस बढ़ाने के लिए विशेष अभियान लगातार चलाया जाए। बेसमेंट पार्किंग वाले भवनों में पार्किंग का अनिवार्य उपयोग सुनिश्चित किया जाए। अन्य उपयोग पाए जाने पर सीलिंग सहित वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। उधर, ट्रैफिक पुलिस का दावा है कि ड्रोन से शहर में सड़क पर खड़े वाहनों को जब्त कर रहे या चालान बना रहे हैं।
4 मिनट की सांस फूलने वाली मेहनत बड़े काम की:ब्रिटेन में 96 हजार लोगों पर स्टडी में खुलासा, बस के लिए दौड़ना भी कारगर

क्या आप रोजाना 5 मिनट भी कड़ी मेहनत करने का समय नहीं निकाल पाते हैं? अगर ऐसा है, तो ये आदत बदलें, क्योंकि रोजाना सिर्फ 4 मिनट की सांस फूलने वाली कठोर मेहनत आपको 8 बड़ी बीमारियों से बचा सकती है। सांस फूल जाने वाली मेहनत में जिम जाना जरूरी नहीं है। इसमें बस पकड़ने के लिए दौड़ना, तेज सीढ़ियां चढ़ना या बच्चों के साथ पूरे जोश के साथ खेलना भी आपके लिए उतना ही कारगर है। चीन की सेंट्रल साउथ यूनिवर्सिटी की ताजा स्टडी में खुलासा हुआ है कि ऐसे छोटे लेकिन तेज व्यायाम से डिमेंशिया का खतरा 63%, टाइप-2 डायबिटीज 60% और समय से पहले मौत का जोखिम 46% तक कम हो जाता है। यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित शोध में 96,400 ब्रिटिश वयस्कों के डेटा का विश्लेषण किया गया। प्रतिभागियों ने एक सप्ताह तक कलाई पर एक्सेलेरोमीटर (गति मापने वाला डिवाइस) पहना, जिससे उनके हर छोटे-बड़े हिलने-डुलने का रिकॉर्ड रखा गया। सात साल तक की फॉलो-अप में पाया गया कि जिन लोगों ने कुल शारीरिक गतिविधि का 4% भी तेज व्यायाम में लगाया, उनमें दिल के दौरे, स्ट्रोक, गठिया, लिवर-किडनी रोग और डिमेंशिया का खतरा 29-61% कम था। असरदार है ‘सांस फूलने’ वाली एक्टिविटी स्टडी के मुख्य लेखक डॉ. मिंक्सुए शेन कहते हैं, ‘तेज व्यायाम शरीर में ऐसे खास बदलाव लाता है, जो धीमी एक्टिविटी से नहीं होते। इससे दिल ज्यादा कुशलता से पंप करता है, ब्लड वेसल्स लचीले बनते हैं और शरीर ऑक्सीजन का बेहतर इस्तेमाल सीखता है।’ उनका कहना है कि तेज एक्टिविटी दिमाग में ऐसे केमिकल्स भी छोड़ती है, जो ब्रेन सेल्स को स्वस्थ रखते हैं। इसी से डिमेंशिया का खतरा घटता है। विशेषकर सूजन वाली बीमारियों (इंफ्लेमेटरी डिजीज) जैसे गठिया, सोरायसिस और हृदय रोगों पर इसका असर सबसे ज्यादा देखा गया। जो लोग पहले से व्यायाम नहीं करते, उन्हें ज्यादा फायदा अध्ययन में डायबिटीज और लिवर रोगों में दोनों- समय और तीव्रता, महत्वपूर्ण पाए गए। यह भी पाया गया कि जो लोग पहले से कोई व्यायाम नहीं करते, उन्हें सबसे ज्यादा फायदा हुआ। यानी शुरुआत करने के लिए कभी देर नहीं होती। नई दिल्ली के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अशोक सेठ कहते हैं, ‘भारत में 30% वयस्क शारीरिक रूप से निष्क्रिय हैं। यह स्टडी साबित करती है कि लंबी वर्कआउट का इंतजार किए बिना रोजमर्रा की छोटी-छोटी तेज एक्टिविटी से भी बड़ा स्वास्थ्य लाभ मिल सकता है।’ डॉक्टरों की सलाह है कि ऑफिस में लिफ्ट की जगह सीढ़ियां तेजी से चढ़ें। बस स्टॉप तक तेज चलें या शाम को 5 मिनट तेज दौड़ें। ये काफी है।’ डॉ. शेन कहते हैं, हफ्ते में सिर्फ 15-20 मिनट की ऐसी एक्टिविटी (रोज 2-3 मिनट) भी मायने रखती है।
Weight loss drugs bring good fortunes to tailors

न्यूयॉर्क14 मिनट पहले कॉपी लिंक किल बे कहते हैं कि मैं युवाओं को इस काम की सलाह देता हूं क्योंकि इसे “एआई’ भी नहीं छीन सकता है। मैनहट्टन की छोटी सी दुकान 85 कस्टम टेलर में सिलाई मशीन पर झुके हुए किल बे एक ड्रेस की तुरपाई कर रहे हैं। तभी एक ग्राहक उनके पास आता है। उसके हाथ में एक विंटेज टॉमी हिलफिगर जैकेट है, जिसे वह फिट करवाना चाहता है। उसने पुराने कपड़ों की दुकान से महज 20 डॉलर (1850 रुपए) में यह ड्रेस खरीदी है। लेकिन इसे सही आकार देने के लिए किल बे को 280 डॉलर (करीब 25,928 रुपए) देने को तैयार है। किल बे कहते हैं कि कुछ साल पहले कीमत का यह अंतर अजीब लगता, लेकिन आज यही मांग उनकी दुकान की मशीन के पहिए घुमा रही है। 63 वर्षीय किल बे ने 17 साल की उम्र में अपने मूल देश दक्षिण कोरिया में टेलरिंग की ट्रेनिंग शुरू की थी। आज वह अमेरिका में उस घटती हुई पीढ़ी का हिस्सा हैं, जो हाथ के हुनर में माहिर है। जैसे-जैसे पुराने दर्जी रिटायर हो रहे हैं, उनके काम की मांग उतनी ही बढ़ती जा रही है। कम वेतन और कठिन काम के कारण नई पीढ़ी इस काम को अपनाने से बच रही है। अमेरिकी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो के मुताबिक, पिछले 10 सालों में पेशेवर दर्जियों की संख्या में 30% की गिरावट दर्ज हुई है। फिलहाल पूरे देश में सिर्फ 17,000 से भी कम कुशल दर्जी बचे हैं। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की औसत उम्र 54 साल है। जो दूसरी नौकरियों के मुकाबले करीब 12 साल ज्यादा है। यहां करीब 40 प्रतिशत दर्जी, ड्रेसमेकर विदेशी मूल के हैं। इनमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी मेक्सिको, दक्षिण कोरिया, वियतनाम और चीन से आए लोगों की है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि युवाओं को इस पेशे की ओर आकर्षित नहीं किया गया, तो आने वाले समय में ‘कस्टम फिटिंग’ इतना लंग्जरी हो गाएगा, जिसे केवल अमीर लोग ही वहन कर पाएंगे। फास्ट फैशन के दौर में पली-बढ़ी पीढ़ी अब टेलर्स के पास जा रही है। कोई रेडीमेड कपड़ों को कस्टम फिट देना चाहता है, तो कोई पुराने कपड़ों को नया जीवन। दिलचस्प है कि वजन घटाने वाली दवाओं के कारण भी दर्जियों का काम बढ़ गया है। लोग वजन कम होने के बाद अपनी ढीली पैंटों की कमर कम कराने और आस्तीनें फिट कराने पहुंच रहे हैं। यही वजह है कि कुशल हाथों की कमी के बावजूद, यह बाजार सालाना 5% की रफ्तार से बढ़ रहा है। यह काम एआई भी नहीं छीन सकता, क्योंकि हर शख्स की नाप अलग: किल बे किल बे मुस्कुराते हुए कहते हैं कि मैं युवाओं को इस काम की सलाह देता हूं क्योंकि इसे “एआई’ भी नहीं छीन सकता है। एआई पैटर्न तो बना सकता है, लेकिन वह एक दर्जी के हाथ की कारीगरी की नकल नहीं कर सकता। हर शरीर अलग है, हर आकार अलग है। अगर मैं आज यह दुकान बंद कर दूं, तो मैं कहीं भी जाकर तुरंत काम ढूंढ सकता हूं। हालांकि अमेरिका में दर्जी की कमी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका को मैन्युफैक्चरिंग बनाने के मिशन के लिए बड़ा झटका है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Baseball player heals thumb injury with piano

केन रोसेंथल. द न्यूयॉर्क टाइम्स24 मिनट पहले कॉपी लिंक शर्जर के अनुसार, ‘पियानो बजाना अंगुलियों के लिए वेटलिफ्टिंग जैसा है।’ स्पोर्ट्स मेडिकल साइंस की दुनिया में एक कहावत है- ‘जब डॉक्टर जवाब दे दें, तो समझो करियर खत्म।’ लेकिन 41 साल के मैक्स शर्जर ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया। बेसबॉल के इतिहास के सबसे घातक पिचर में से एक शर्जर के लिए यह सीजन केवल वापसी का नहीं, बल्कि एक ‘चमत्कार’ का है। जिस अंगूठे के दर्द ने उन्हें संन्यास की कगार पर खड़ा कर दिया था, उसका इलाज किसी अस्पताल में नहीं, बल्कि पियानो के जरिए मिला। दरअसल, शर्जर दो साल से दाएं हाथ के अंगूठे में सूजन और असहनीय दर्द से जूझ रहे थे। अमेरिका के टॉप सर्जन्स ने हाथ खड़े कर दिए थे। उनके पास इस दर्द का कोई सर्जिकल समाधान नहीं था। हालात इतने खराब हो गए थे कि पिछले सीजन शर्जर ने साथी खिलाड़ी क्रिस बासिट से कह दिया था कि अगर प्रैक्टिस के दौरान दर्द हुआ, तो वे खेल को अलविदा कह देंगे। शर्जर की वापसी की कहानी टोरंटो के एक अपार्टमेंट से शुरू होती है। बच्चों को खेल-खेल में पियानो सिखाते वक्त उन्हें अहसास हुआ कि पियानो की भारी ‘कीज’ दबाते वक्त उनके अंगूठे में वह खिंचाव हो रहा है, जो कोई फिजियोथेरेपी नहीं दे पा रही थी। शर्जर ने कोई क्लासिकल संगीत नहीं सीखा था। उन्होंने यूट्यूब पर वीडियो देखकर ‘डॉ. ड्रे’ और ‘एमिनेम’ के रैप गानों की धुनें सीखीं। वे हर टूर पर अपना कीबोर्ड साथ ले जाने लगे। रात 11 बजे मैच खत्म होने के बाद वे होटल के कमरों में धीमी आवाज में घंटों पियानो बजाते, ताकि अंगुलियों के पोरों की मांसपेशियां मजबूत हो सकें। पियानो बजाने से उनके हाथ की मांसपेशियों में जो लचीलापन आया, उसने अंगूठे के जोड़ों पर पड़ने वाले दबाव को खत्म कर दिया। इस ‘पियानो रिहैब’ का असर यह हुआ कि शर्जर ने वर्ल्ड सीरीज के सबसे अहम गेम में बेहतरीन शुरुआत की। 41 की उम्र में जहां खिलाड़ी कमेंट्री बॉक्स में होते हैं, वहां शर्जर को टोरंटो ब्लू जेस ने फिर 25 करोड़ रुपए में रिटेन किया है। साथी खिलाड़ी बासिट कहते हैं, ‘पूरी दुनिया में इतने महंगे इलाज मौजूद थे, लेकिन एक पियानो ने मैक्स का करियर बचा लिया। यह सिर्फ मैक्स जैसा पागलपन की हद तक जुनूनी खिलाड़ी ही सोच सकता था।’ पियानो की हार्ड कीज दबाने से सुधरती है पिचिंग ग्रिप बेसबॉल पिचिंग में ‘फास्टबॉल’ फेंकने के लिए अंगूठे और तर्जनी के बीच जबरदस्त दबाव की जरूरत होती है। पियानो की कीज को दबाने के लिए अंगुलियों की जिस निपुणता की जरूरत होती है, वह सीधे तौर पर पिचिंग ग्रिप को सुधारती है। शर्जर के अनुसार, ‘पियानो बजाना अंगुलियों के लिए वेटलिफ्टिंग जैसा है।’ दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
5 sand dumpers numbered 1115 at night without counting

ग्वालियर शहर के बीचों-बीच और हाईवे पर बिना नंबर के डंपर बेखौफ दौड़ रहे हैं। ये डंपर लोगों को कुचलकर जान ले रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अफसर इन पर मेहरबान हैं। न डंपर पकड़े जा रहे और न ही मालिकों पर सख्त कार्रवाई हो रही है। दैनिक भास्कर ने डंपर हादसों म . रात 11:30 से 3:30 बजे तक शहर और हाईवे के 14 स्थानों पर 2302 डंपरों का पीछा किया। 48% यानी 1115 डंपर बिना नंबर के थे। हैरानी की बात यह है कि इतने डंपर खुलेआम सड़कों पर दौड़ते रहे, लेकिन कहीं कोई रोकने वाला नहीं दिखा। इन डंपरों ने किसी का पिता, किसी का पति और किसी का बेटा छीना है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि अब सड़क पर डंपर दिखते ही रूह कांप जाती है। हमारे अपने तो वापस नहीं आएंगे, लेकिन इन डंपरों और मालिकों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि आगे और परिवार उजड़ने से बच सकें। पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत के बिना संभव नहीं यह पूरा खेल ग्वालियर में अवैध खनन का कारोबार में लगे डंपर रात-दिन बिना नंबर और दस्तावेज के दौड़ते हैं। इनका आरटीओ रिकॉर्ड भी नहीं होता। इतना बड़ा काला कारोबार पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत के संभव नहीं हो सकता। ज्यादा चक्कर लगाने के लिए तेज रफ्तार से चलते हैं और लोगों को कुचल देते हैं। अधिकांश मामलों में डंपर पकड़े नहीं जाते। यदि विवाद बढ़ने पर पकड़े भी जाते हैं तो कुछ ही घंटों में दूसरी वैध गाड़ी के कागज लगाकर छुड़ा लिया जाता है। ये हैं जिम्मेदार… सब मौन हमारा विभाग खनिज की रॉयल्टी जांचने अधिकृत बिना नंबर के चल रहे खनिज से भरे वाहनों के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार परिवहन विभाग का है। हमारा विभाग उसमें भरे खनिज की रॉयल्टी जांचने ही अधिकृत है। -जीएस यादव, खनिज अधिकारी खनिज व पुलिस के साथ मिलकर कार्रवाई करेंगे सड़कों पर बिना नंबर प्लेट के डंपरों का संचालन गैर-कानूनी है। रात के समय रेत परिवहन में लगे इन डंपरों के खिलाफ खनिज व पुलिस के साथ मिलकर कार्रवाई करेंगे। -विक्रमजीत कंग, आरटीओ माफिया का वैध व अवैध दो तरह का सिस्टम..! अवैध गाड़ियां: इन डंपरों पर न नंबर होते हैं, न बीमा और न ही कोई दस्तावेज। इन्हें अवैध खनन और ढुलाई में लगाया जाता है। वैध गाड़ियां: जब कोई अवैध डंपर पकड़ा जाता है या हादसा हो जाता है तो उसी पर वैध गाड़ी के दस्तावेज लगाकर छुड़ा लिया जाता है।
क्लॉड मिथोस मॉडल; साइबर पैमाने पर 100% स्कोर:एंथ्रोपिक ने ताकतवर एआई बनाया पर लॉन्च रोका; वजह-गलत हाथों में आने से साइबर तबाही का डर

एआई दिग्गज कंपनी एंथ्रोपिक ने बुधवार को दुनिया का सबसे ताकतवर मॉडल ‘क्लॉड मिथोस’ पेश किया, लेकिन इसे आम यूजर के लिए लॉन्च नहीं किया गया। कंपनी का कहना है कि यह मॉडल खुद जिम्मेदारी से काम करता है, लेकिन इसकी ताकत गलत हाथों में बेहद खतरनाक हो सकती है। बैंक, अस्पताल, बिजली ग्रिड और सरकारी सिस्टम सब इसके निशाने पर आ सकते हैं। एंथ्रोपिक ने इसे फिलहाल प्रोजेक्ट ग्लासविंग के तहत अमेजन, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसी 12 बड़ी कंपनियों और 40 से अधिक संस्थाओं को दिया है, ताकि वे पहले अपने सिस्टम की सुरक्षा दुरुस्त कर सकें। प्रोजेक्ट ग्लासविंग नाम एक पारदर्शी पंखों वाली तितली से लिया गया है। यह खुले में होने पर भी नजर नहीं आती। ठीक वैसे ही जैसे सॉफ्टवेयर की खामियां छुपी रहती हैं। एंथ्रोपिक ने 850 करोड़ रु. के क्रेडिट व ओपन सोर्स संस्थाओं को 34 करोड़ रु. की मदद का वादा किया है। 90 दिनों बाद कंपनी बताएगी कि मॉडल ने कितनी खामियां पकड़ी। ऐतिहासिक – 50 लाख टेस्ट में नहीं पकड़ी खामी, इसने पहली बार में ढूंढ़ी पायलट में मॉडल ने कई ऑपरेटिंग सिस्टम और वेब ब्राउजर में हजारों गंभीर साइबर खामियां खोजीं। सबसे सुरक्षित ऑपरेटिंग सिस्टम ओपनबीएसडी में 27 साल पुरानी खामी ढूंढी। वीडियो सॉफ्टवेयर एफएफएमपेग में 16 साल पुरानी खामी जो 50 लाख बार स्कैन में भी नहीं मिली। इसने पहली बार में पकड़ा। लिनक्स कर्नेल में कई खामियां जोड़कर पूरे सिस्टम का नियंत्रण हासिल करने का रास्ता भी इसी मॉडल ने दिखाया। बेंचमार्क – साइबर परीक्षण में 100%, कोडिंग में 93.9% स्कोर साइबर सुरक्षा के सबसे कठिन परीक्षणों में इस मॉडल ने शत-प्रतिशत सफलता हासिल की। कोडिंग बेंचमार्क में 93.9% जबकि पिछले मॉडल का स्कोर 80.8% था। साइबरजिम परीक्षण में 83.1%, पिछले मॉडल का 66.6% स्कोर था। बता दें कि इस मॉडल के लॉन्च के साथ एंथ्रोपिक की सालाना आय भी तीन गुना से अधिक बढ़कर करीब 2.5 लाख करोड़ रुपए हो गई है। सीईओ अमोडेई बोले- मिथोस मॉडल से खतरा बहुत हमने मिथोस को साइबर सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि कोडिंग के लिए बनाया था। लेकिन कोडिंग की ताकत का साइड इफेक्ट यह निकला कि यह साइबर हमलों में भी उतना ही माहिर हो गया। यदि यह सही हाथों में रहा तो यह तकनीक पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित इंटरनेट और दुनिया बना सकती है। लेकिन अगर गलत हुआ तो खतरा बहुत है।’









