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अमेरिका का पहला एआई स्कूल:हाईटेक लैब होते हुए भी बच्चों को दिमाग दौड़ाने के लिए प्रोत्साहन, कोशिश यही कि इंसानी खूबियां बची रहें

अमेरिका का पहला एआई स्कूल:हाईटेक लैब होते हुए भी बच्चों को दिमाग दौड़ाने के लिए प्रोत्साहन, कोशिश यही कि इंसानी खूबियां बची रहें

जॉर्जिया राज्य के हार्मनी एलीमेंट्री स्कूल की लाइब्रेरी में पहली क्लास के बच्चे रंग-बिरंगे प्लास्टिक ब्लॉक्स से घर बनाने में जुटे हैं। टीचर शानाज लखानी प्लास्टिक के खिलौने को दिखाकर पूछती हैं,‘यह हमारा ‘यूजर’ है। हमें इसके लिए मजबूत घर बनाना है, जो भूकंप में भी न गिरे।’ टीचर यहां बच्चों को ‘यूजर एक्सपीरियंस’ और ‘एआई एप्लीकेशंस’ जैसे भारी-भरकम तकनीकी शब्द सिखा रही हैं। वाइटबोर्ड पर डेटा साइंस और प्रोग्रामिंग के रंग-बिरंगे ट्राएंगल्स बने हैं। पर, 7 साल के इन मासूमों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसका एआई से क्या कनेक्शन है, वे तो बस अपनी टीचर की गोद में बैठकर, दोस्तों के साथ मिलकर खिलौनों का घर बनाने का आनंद ले रहे हैं। भविष्य की कल्पनाओं में अक्सर ऐसे स्कूल दिखते हैं जहां रोबोट पढ़ा रहे हों और बच्चे चैटबॉट्स से बातें कर रहे हों। लेकिन, हकीकत में यह स्कूल तकनीक से ज्यादा इंसानी जुड़ाव पर टिका है। असली शिक्षा वही है जहां टीचर्स का व्यक्तिगत मार्गदर्शन, बच्चों का आपसी जुड़ाव और खुद से सोचने की क्षमता अहम रहती है। इस हाई स्कूल को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ‘नौकरियां बदलने वाली’ रिपोर्ट देखकर डिजाइन किया गया था। पूर्व छात्र मोहम्मद रिजवान व जोसेफ श्राग ने बताया कि ‘एआई स्कूल’ का दावा हकीकत से अलग था। उन्होंने कहा कि हम एआई का उतना इस्तेमाल नहीं करते। रोबोटिक्स जैसी कुछ क्लास छोड़ दें तो बाकी पढ़ाई पारंपरिक तरीके से होती है। भाषा व इतिहास में टीचर्स बच्चों से हाथ से निबंध लिखवाते हैं ताकि वे एआई से मदद न ले सकें। स्कूल के मैकेनिकल इंजीनियरिंग रूम में कार्डबोर्ड से बड़ा स्पिनिंग गेम बना रहे एक छात्र से जब पूछा गया कि क्या उसने इसके लिए किसी एआई टूल या चैटबॉट का इस्तेमाल किया? तो उसका जवाब था, ‘नहीं, मैं सिर्फ अपने दिमाग का इस्तेमाल कर रहा हूं।’ इतिहास की क्लास में जब बच्चे चैटबॉट से सवाल-जवाब करते हैं, तो टीचर केसी होलीक्रॉस उनका मार्गदर्शन करती हैं। पैरेंट लिडिया क्लार्क कहती हैं,‘हमारे बच्चे तकनीक की वजह से नहीं, बल्कि स्कूल के सुरक्षित माहौल और बेहतरीन टीचर्स के मानवीय जुड़ाव की वजह से आगे बढ़ रहे हैं। एआई सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी ‘खान एकेडमी’ के प्रमुख सलमान खान ने स्वीकार किया है कि कई छात्रों के लिए एआई टूल से पढ़ना बेहद निराशाजनक रहा, क्योंकि मशीनें बच्चों की मानसिक उलझन को इंसानों की तरह नहीं समझ सकतीं। ’ स्कूल के अधिकारियों ने भी अंततः माना कि उनके लिए एआई का मतलब सिर्फ कोडिंग सिखाना नहीं, बल्कि उन ‘ड्यूरेबल स्किल्स’ (जैसे- नैतिक सोच, आपसी सहयोग और रचनात्मकता को बचाना है जो मशीनें कभी नहीं सीख सकतीं। आपसी चर्चा, एक्टिविटी को महत्व ताकि मौलिक सोच बनी रहे स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने 800 से ज्यादा रिसर्च पेपर्स की स्टडी करके चेतावनी दी है कि एआई टूल तुरंत काम पूरा करने में तो मदद करते हैं, पर लंबे वक्त में बच्चों की खुद सोचने की क्षमता खत्म हो रही है। इसे वैज्ञानिकों ने ‘कॉग्निटिव सरेंडर’ कहा है, जहां इंसान अपने फैसले मशीनों पर छोड़ देता है। हार्मनी स्कूल इस खतरे को भांपते हुए ‘ह्यूमन टच’ पर जोर दे रहा है। यहां एआई सिर्फ टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जबकि मुख्य फोकस आपसी चर्चा, फिजिकल एक्टिविटी और टीचर्स के मार्गदर्शन पर है ताकि बच्चों की मौलिक सोच बनी रहे।

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अमेरिका का पहला एआई स्कूल:हाईटेक लैब होते हुए भी बच्चों को दिमाग दौड़ाने के लिए प्रोत्साहन, कोशिश यही कि इंसानी खूबियां बची रहें

जॉर्जिया राज्य के हार्मनी एलीमेंट्री स्कूल की लाइब्रेरी में पहली क्लास के बच्चे रंग-बिरंगे प्लास्टिक ब्लॉक्स से घर बनाने में जुटे हैं। टीचर शानाज लखानी प्लास्टिक के खिलौने को दिखाकर पूछती हैं,‘यह हमारा ‘यूजर’ है। हमें इसके लिए मजबूत घर बनाना है, जो भूकंप में भी न गिरे।’ टीचर यहां बच्चों को ‘यूजर एक्सपीरियंस’ और ‘एआई एप्लीकेशंस’ जैसे भारी-भरकम तकनीकी शब्द सिखा रही हैं। वाइटबोर्ड पर डेटा साइंस और प्रोग्रामिंग के रंग-बिरंगे ट्राएंगल्स बने हैं। पर, 7 साल के इन मासूमों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इसका एआई से क्या कनेक्शन है, वे तो बस अपनी टीचर की गोद में बैठकर, दोस्तों के साथ मिलकर खिलौनों का घर बनाने का आनंद ले रहे हैं। भविष्य की कल्पनाओं में अक्सर ऐसे स्कूल दिखते हैं जहां रोबोट पढ़ा रहे हों और बच्चे चैटबॉट्स से बातें कर रहे हों। लेकिन, हकीकत में यह स्कूल तकनीक से ज्यादा इंसानी जुड़ाव पर टिका है। असली शिक्षा वही है जहां टीचर्स का व्यक्तिगत मार्गदर्शन, बच्चों का आपसी जुड़ाव और खुद से सोचने की क्षमता अहम रहती है। इस हाई स्कूल को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ‘नौकरियां बदलने वाली’ रिपोर्ट देखकर डिजाइन किया गया था। पूर्व छात्र मोहम्मद रिजवान व जोसेफ श्राग ने बताया कि ‘एआई स्कूल’ का दावा हकीकत से अलग था। उन्होंने कहा कि हम एआई का उतना इस्तेमाल नहीं करते। रोबोटिक्स जैसी कुछ क्लास छोड़ दें तो बाकी पढ़ाई पारंपरिक तरीके से होती है। भाषा व इतिहास में टीचर्स बच्चों से हाथ से निबंध लिखवाते हैं ताकि वे एआई से मदद न ले सकें। स्कूल के मैकेनिकल इंजीनियरिंग रूम में कार्डबोर्ड से बड़ा स्पिनिंग गेम बना रहे एक छात्र से जब पूछा गया कि क्या उसने इसके लिए किसी एआई टूल या चैटबॉट का इस्तेमाल किया? तो उसका जवाब था, ‘नहीं, मैं सिर्फ अपने दिमाग का इस्तेमाल कर रहा हूं।’ इतिहास की क्लास में जब बच्चे चैटबॉट से सवाल-जवाब करते हैं, तो टीचर केसी होलीक्रॉस उनका मार्गदर्शन करती हैं। पैरेंट लिडिया क्लार्क कहती हैं,‘हमारे बच्चे तकनीक की वजह से नहीं, बल्कि स्कूल के सुरक्षित माहौल और बेहतरीन टीचर्स के मानवीय जुड़ाव की वजह से आगे बढ़ रहे हैं। एआई सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी ‘खान एकेडमी’ के प्रमुख सलमान खान ने स्वीकार किया है कि कई छात्रों के लिए एआई टूल से पढ़ना बेहद निराशाजनक रहा, क्योंकि मशीनें बच्चों की मानसिक उलझन को इंसानों की तरह नहीं समझ सकतीं। ’ स्कूल के अधिकारियों ने भी अंततः माना कि उनके लिए एआई का मतलब सिर्फ कोडिंग सिखाना नहीं, बल्कि उन ‘ड्यूरेबल स्किल्स’ (जैसे- नैतिक सोच, आपसी सहयोग और रचनात्मकता को बचाना है जो मशीनें कभी नहीं सीख सकतीं। आपसी चर्चा, एक्टिविटी को महत्व ताकि मौलिक सोच बनी रहे स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने 800 से ज्यादा रिसर्च पेपर्स की स्टडी करके चेतावनी दी है कि एआई टूल तुरंत काम पूरा करने में तो मदद करते हैं, पर लंबे वक्त में बच्चों की खुद सोचने की क्षमता खत्म हो रही है। इसे वैज्ञानिकों ने ‘कॉग्निटिव सरेंडर’ कहा है, जहां इंसान अपने फैसले मशीनों पर छोड़ देता है। हार्मनी स्कूल इस खतरे को भांपते हुए ‘ह्यूमन टच’ पर जोर दे रहा है। यहां एआई सिर्फ टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है, जबकि मुख्य फोकस आपसी चर्चा, फिजिकल एक्टिविटी और टीचर्स के मार्गदर्शन पर है ताकि बच्चों की मौलिक सोच बनी रहे।

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