Tuesday, 02 Jun 2026 | 02:46 PM

Trending :

EXCLUSIVE

फोर्ब्स बिलियनेयर्स की लिस्ट में माइक्रॉन के भारतवंशी सीईओ शामिल:संजय ने कोडेक का ऑफर ठुकराकर सैंडिस्क को घर-घर पहुंचाया

फोर्ब्स बिलियनेयर्स की लिस्ट में माइक्रॉन के भारतवंशी सीईओ शामिल:संजय ने कोडेक का ऑफर ठुकराकर सैंडिस्क को घर-घर पहुंचाया

अमेरिकी चिप कंपनी माइक्रॉन टेक्नोलॉजी के सीईओ संजय मेहरोत्रा फोर्ब्स की चिप कंपनियों के अरबपतियों की लिस्ट में शामिल हो गए हैं। फोर्ब्स के मुताबिक उनकी संपत्ति 11,406 करोड़ रुपए है। वे इस लिस्ट में शामिल इकलौते भारतीय हैं। इसमें शीर्ष पर एनवीडिया के सीईओ जेन्संग हुआंग हैं जिनकी नेटवर्थ 17.46 लाख करोड़ रु. है। कानपुर में जन्मे मेहरोत्रा (67) ने सैंडिस्क की सह-स्थापना से लेकर माइक्रॉन को 104 लाख करोड़ मार्केट कैप तक पहुंचाने में काफी योगदान दिया है।
1976 में संजय ने अमेरिका में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए स्टूडेंट वीसा मांगा, लेकिन तीन बार दूतावास ने मना कर दिया। अंत में पिता उनके साथ नई दिल्ली दूतावास पहुंचे और काउंसलर अधिकारी के लंच पर जाने के बावजूद लॉबी में डटे रहे। अंत में उन्हें वीसा मिला। इंटेल में पहली नौकरी के दौरान वे रात दो बजे तक नौकरी करते थे। 1988 में संजय ने दो दोस्तों के साथ मिलकर सैंडिस्क की नींव रखी। उस समय फ्लैश मेमोरी नई तकनीक थी, लेकिन संजय ने इसी पर दांव लगाया। आगे चलकर पेनड्राइव, एसडी कार्ड और मोबाइल मेमोरी को दुनिया भर तक पहुंचाने में सैनडिस्क की बड़ी भूमिका रही। 90 के दशक में जब सैनडिस्क एक स्टार्टअप था, तब कोडेक ने उनकी डिजिटल मेमोरी तकनीक को सिर्फ अपने लिए बनाने का ऑफर दिया और इसके बदले बड़ी रकम देने की बात कही, लेकिन संजय और उनके साथी एली हरारी ने इसे ठुकरा दिया। उन्होंने तकनीक को खुले मानक के रूप में रखने का फैसला किया। इसी सोच से कॉम्पैक्ट फ्लैश और आगे एसडी कार्ड बने, जो आज हर डिवाइस में इस्तेमाल होते हैं। उसी दौरान जब वैश्विक मंदी आई तो कंपनी पर दबाव बढ़ गया, लेकिन संजय ने कर्मचारियों की छंटनी के बजाय अलग रास्ता चुना। उन्होंने अपनी बेसिक सैलरी शून्य कर दी और बड़े अधिकारियों की सैलरी भी घटाई। उनका मानना था कि मुश्किल समय में सबसे पहले त्याग नेतृत्व को करना चाहिए। इस फैसले ने उन्हें कर्मचारियों के बीच खास भरोसा दिलाया। पद से ज्यादा तकनीक पसंद थी इसलिए नौकरी तक छोड़ दी 80 के दशक में संजय आईडीटी में थे। कंपनी उन्हें बेहतर पद देने को तैयार थी, लेकिन जिस नॉन-वोलेटाइल मेमोरी प्रोजेक्ट पर वे काम कर रहे थे, उसे बंद कर दिया गया। तब पसंदीदा तकनीक के चलते उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बाद में कहा, ‘मुझे मेमोरी का जुनून था।’ यही जिद सैनडिस्क की नींव बनी। 2017 में वे माइक्रॉन से जुड़े, जो अब गुजरात के साणंद में 26 हजार करोड़ रुपए की चिप फैसिलिटी बना रही है, जिसमें कंपनी की हिस्सेदारी 7838 करोड़ रुपए है।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
ऑनलाइन शॉपिंग में प्रोटीन पर खर्च तीन गुना बढ़ा:फास्ट फूड में ‘हाई प्रोटीन’ का चलन, सितारे भी शुरू कर रहे फूड ब्रांड्स

May 30, 2026/
4:00 pm

भारत में अब ‘हाई-प्रोटीन’ फूड्स का ट्रेंड सिर्फ फिटनेस की दुनिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि फास्ट फूड्स में भी...

authorimg

April 10, 2026/
10:08 am

Signs of insulin resistance : डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जो दबे पांव आती है. लेकिन क्या आप जानते हैं...

राजनीति

फोर्ब्स बिलियनेयर्स की लिस्ट में माइक्रॉन के भारतवंशी सीईओ शामिल:संजय ने कोडेक का ऑफर ठुकराकर सैंडिस्क को घर-घर पहुंचाया

फोर्ब्स बिलियनेयर्स की लिस्ट में माइक्रॉन के भारतवंशी सीईओ शामिल:संजय ने कोडेक का ऑफर ठुकराकर सैंडिस्क को घर-घर पहुंचाया

अमेरिकी चिप कंपनी माइक्रॉन टेक्नोलॉजी के सीईओ संजय मेहरोत्रा फोर्ब्स की चिप कंपनियों के अरबपतियों की लिस्ट में शामिल हो गए हैं। फोर्ब्स के मुताबिक उनकी संपत्ति 11,406 करोड़ रुपए है। वे इस लिस्ट में शामिल इकलौते भारतीय हैं। इसमें शीर्ष पर एनवीडिया के सीईओ जेन्संग हुआंग हैं जिनकी नेटवर्थ 17.46 लाख करोड़ रु. है। कानपुर में जन्मे मेहरोत्रा (67) ने सैंडिस्क की सह-स्थापना से लेकर माइक्रॉन को 104 लाख करोड़ मार्केट कैप तक पहुंचाने में काफी योगदान दिया है।
1976 में संजय ने अमेरिका में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए स्टूडेंट वीसा मांगा, लेकिन तीन बार दूतावास ने मना कर दिया। अंत में पिता उनके साथ नई दिल्ली दूतावास पहुंचे और काउंसलर अधिकारी के लंच पर जाने के बावजूद लॉबी में डटे रहे। अंत में उन्हें वीसा मिला। इंटेल में पहली नौकरी के दौरान वे रात दो बजे तक नौकरी करते थे। 1988 में संजय ने दो दोस्तों के साथ मिलकर सैंडिस्क की नींव रखी। उस समय फ्लैश मेमोरी नई तकनीक थी, लेकिन संजय ने इसी पर दांव लगाया। आगे चलकर पेनड्राइव, एसडी कार्ड और मोबाइल मेमोरी को दुनिया भर तक पहुंचाने में सैनडिस्क की बड़ी भूमिका रही। 90 के दशक में जब सैनडिस्क एक स्टार्टअप था, तब कोडेक ने उनकी डिजिटल मेमोरी तकनीक को सिर्फ अपने लिए बनाने का ऑफर दिया और इसके बदले बड़ी रकम देने की बात कही, लेकिन संजय और उनके साथी एली हरारी ने इसे ठुकरा दिया। उन्होंने तकनीक को खुले मानक के रूप में रखने का फैसला किया। इसी सोच से कॉम्पैक्ट फ्लैश और आगे एसडी कार्ड बने, जो आज हर डिवाइस में इस्तेमाल होते हैं। उसी दौरान जब वैश्विक मंदी आई तो कंपनी पर दबाव बढ़ गया, लेकिन संजय ने कर्मचारियों की छंटनी के बजाय अलग रास्ता चुना। उन्होंने अपनी बेसिक सैलरी शून्य कर दी और बड़े अधिकारियों की सैलरी भी घटाई। उनका मानना था कि मुश्किल समय में सबसे पहले त्याग नेतृत्व को करना चाहिए। इस फैसले ने उन्हें कर्मचारियों के बीच खास भरोसा दिलाया। पद से ज्यादा तकनीक पसंद थी इसलिए नौकरी तक छोड़ दी 80 के दशक में संजय आईडीटी में थे। कंपनी उन्हें बेहतर पद देने को तैयार थी, लेकिन जिस नॉन-वोलेटाइल मेमोरी प्रोजेक्ट पर वे काम कर रहे थे, उसे बंद कर दिया गया। तब पसंदीदा तकनीक के चलते उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बाद में कहा, ‘मुझे मेमोरी का जुनून था।’ यही जिद सैनडिस्क की नींव बनी। 2017 में वे माइक्रॉन से जुड़े, जो अब गुजरात के साणंद में 26 हजार करोड़ रुपए की चिप फैसिलिटी बना रही है, जिसमें कंपनी की हिस्सेदारी 7838 करोड़ रुपए है।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जॉब - शिक्षा

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.