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जरा से काम में सांस फूलना, नाक से सीटी की आवाज आना…ये हो सकते हैं अस्थमा के लक्षण, न करें नजरअंदाज

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जमशेदपुर. आज के समय में तेजी से बढ़ता वायु प्रदूषण, बदलता मौसम और जीवनशैली में हो रहे बदलाव लोगों की सेहत पर गहरा असर डाल रहे हैं. खासकर सांस से जुड़ी बीमारियां अब आम होती जा रही हैं, जिनमें अस्थमा एक गंभीर और तेजी से फैलने वाली समस्या बन चुकी है. शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक इसके मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो चिंता का विषय है. यह बीमारी न केवल व्यक्ति की दैनिक दिनचर्या को प्रभावित करती है, बल्कि समय रहते ध्यान न देने पर गंभीर रूप भी ले सकती है.

आज क्यों बढ़ गई है यह समस्या
इसी विषय पर झारखंड के सीनियर चेस्ट फिजिशियन डॉ. टी.के. मोहंती बताते हैं कि अस्थमा एक क्रॉनिक (लंबे समय तक रहने वाली) श्वसन संबंधी बीमारी है, जिसमें फेफड़ों की श्वासनलियां संकुचित और सूज जाती हैं. इससे मरीज को सांस लेने में कठिनाई होती है और कई बार अचानक अस्थमा अटैक भी आ सकता है. उन्होंने कहा कि आज के दौर में इसके मामलों में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण पर्यावरणीय बदलाव और एलर्जी कारकों का बढ़ना है.

एलर्जी है मुख्य कारण
अस्थमा के प्रमुख कारणों में एलर्जी सबसे अहम भूमिका निभाती है. धूल, धुआं, परागकण (पोलन), पालतू जानवरों के बाल, फफूंदी और विभिन्न प्रकार के केमिकल्स शरीर में एलर्जिक रिएक्शन पैदा करते हैं, जिससे श्वासनलियां प्रभावित होती हैं. इसके अलावा बढ़ता वायु प्रदूषण, खासकर औद्योगिक क्षेत्रों और ट्रैफिक वाले इलाकों में, अस्थमा के खतरे को और बढ़ा देता है. मौसम में अचानक बदलाव, ठंडी हवा, वायरल संक्रमण और कई बार आनुवंशिक कारण भी इस बीमारी के पीछे जिम्मेदार होते हैं.

समय रहते पहचानें लक्षण
अस्थमा के लक्षणों को समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है. लगातार खांसी आना, सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज (व्हीजिंग), सीने में जकड़न और थोड़ी सी मेहनत में ही सांस फूलना इसके मुख्य संकेत हैं. कई मरीजों में ये लक्षण रात या सुबह के समय ज्यादा बढ़ जाते हैं. अगर ये लक्षण बार-बार दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है, इसलिए इन पर ध्यान दें.

खत्म नहीं कर सकते, नियंत्रित कर सकते हैं
बचाव के उपायों पर जोर देते हुए बताया गया कि अस्थमा को पूरी तरह खत्म तो नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे नियंत्रित जरूर किया जा सकता है. इसके लिए सबसे जरूरी है एलर्जी पैदा करने वाले कारकों से दूरी बनाना. घर को साफ रखना, धूल से बचाव करना, मास्क का इस्तेमाल करना और धूम्रपान से दूर रहना बेहद आवश्यक है. साथ ही डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित दवाइयों और इनहेलर का उपयोग करना चाहिए. बदलते मौसम में विशेष सावधानी बरतना भी जरूरी है.

प्रभाव कम किया जा सकता है
अंत में यही कहा जा सकता है कि अस्थमा जैसी बीमारी के प्रति जागरूकता और समय पर उपचार ही सबसे बड़ा बचाव है. अगर सही समय पर इसके लक्षणों को पहचान लिया जाए और जरूरी सावधानियां अपनाई जाएं, तो इस बीमारी के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

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जमशेदपुर. आज के समय में तेजी से बढ़ता वायु प्रदूषण, बदलता मौसम और जीवनशैली में हो रहे बदलाव लोगों की सेहत पर गहरा असर डाल रहे हैं. खासकर सांस से जुड़ी बीमारियां अब आम होती जा रही हैं, जिनमें अस्थमा एक गंभीर और तेजी से फैलने वाली समस्या बन चुकी है. शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक इसके मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो चिंता का विषय है. यह बीमारी न केवल व्यक्ति की दैनिक दिनचर्या को प्रभावित करती है, बल्कि समय रहते ध्यान न देने पर गंभीर रूप भी ले सकती है.

आज क्यों बढ़ गई है यह समस्या
इसी विषय पर झारखंड के सीनियर चेस्ट फिजिशियन डॉ. टी.के. मोहंती बताते हैं कि अस्थमा एक क्रॉनिक (लंबे समय तक रहने वाली) श्वसन संबंधी बीमारी है, जिसमें फेफड़ों की श्वासनलियां संकुचित और सूज जाती हैं. इससे मरीज को सांस लेने में कठिनाई होती है और कई बार अचानक अस्थमा अटैक भी आ सकता है. उन्होंने कहा कि आज के दौर में इसके मामलों में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण पर्यावरणीय बदलाव और एलर्जी कारकों का बढ़ना है.

एलर्जी है मुख्य कारण
अस्थमा के प्रमुख कारणों में एलर्जी सबसे अहम भूमिका निभाती है. धूल, धुआं, परागकण (पोलन), पालतू जानवरों के बाल, फफूंदी और विभिन्न प्रकार के केमिकल्स शरीर में एलर्जिक रिएक्शन पैदा करते हैं, जिससे श्वासनलियां प्रभावित होती हैं. इसके अलावा बढ़ता वायु प्रदूषण, खासकर औद्योगिक क्षेत्रों और ट्रैफिक वाले इलाकों में, अस्थमा के खतरे को और बढ़ा देता है. मौसम में अचानक बदलाव, ठंडी हवा, वायरल संक्रमण और कई बार आनुवंशिक कारण भी इस बीमारी के पीछे जिम्मेदार होते हैं.

समय रहते पहचानें लक्षण
अस्थमा के लक्षणों को समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है. लगातार खांसी आना, सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज (व्हीजिंग), सीने में जकड़न और थोड़ी सी मेहनत में ही सांस फूलना इसके मुख्य संकेत हैं. कई मरीजों में ये लक्षण रात या सुबह के समय ज्यादा बढ़ जाते हैं. अगर ये लक्षण बार-बार दिखाई दें, तो इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है, इसलिए इन पर ध्यान दें.

खत्म नहीं कर सकते, नियंत्रित कर सकते हैं
बचाव के उपायों पर जोर देते हुए बताया गया कि अस्थमा को पूरी तरह खत्म तो नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे नियंत्रित जरूर किया जा सकता है. इसके लिए सबसे जरूरी है एलर्जी पैदा करने वाले कारकों से दूरी बनाना. घर को साफ रखना, धूल से बचाव करना, मास्क का इस्तेमाल करना और धूम्रपान से दूर रहना बेहद आवश्यक है. साथ ही डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित दवाइयों और इनहेलर का उपयोग करना चाहिए. बदलते मौसम में विशेष सावधानी बरतना भी जरूरी है.

प्रभाव कम किया जा सकता है
अंत में यही कहा जा सकता है कि अस्थमा जैसी बीमारी के प्रति जागरूकता और समय पर उपचार ही सबसे बड़ा बचाव है. अगर सही समय पर इसके लक्षणों को पहचान लिया जाए और जरूरी सावधानियां अपनाई जाएं, तो इस बीमारी के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

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