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सुप्रीम कोर्ट जज बोले-ज्यूडिशियरी हद से ज्यादा सख्त हो रही:इसलिए लोग जेलों में सड़ रहे; यह विकसित भारत का आदर्श नहीं हो सकता

सुप्रीम कोर्ट जज बोले-ज्यूडिशियरी हद से ज्यादा सख्त हो रही:इसलिए लोग जेलों में सड़ रहे; यह विकसित भारत का आदर्श नहीं हो सकता

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि ज्यूडिशियरी के कुछ हिस्से ‘मोर लॉयल देन द किंग सिंड्रोम’ से ग्रस्त हैं। यानी ये हिस्से राजा से भी ज्यादा वफादार होने की प्रवृत्ति अपना चुके हैं। इसके कारण ही लोग महीनों तक जेलों में सड़ते रहते हैं। जस्टिस भुइयां ने यह बात रविवार को बेंगलुरु में हुए सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पहली नेशनल समिट के दौरान कही। ‘विकसित भारत में न्यायपालिका की भूमिका’ विषय पर पैनल डिस्कशन के दौरान जस्टिस भुइयां ने कहा- कुछ मामलों में सिस्टम इतना ज्यादा सख्त हो रहा है कि जरूरत से ज्यादा केस दर्ज हो रहे हैं। बार एंड बेंच की एक खबर के मुताबिक जस्टिस भुइयां ने सरकार और न्यायपालिका के संबंधों, PMLA, UAPA कानूनों के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने विरोध प्रदर्शन और सोशल मीडिया एक्टिविटी जैसे छोटे मुद्दों पर मनमाने ढंग से क्रिमिनल केस दर्ज किए जाने की निंदा की। UAPA और PMLA एक्ट का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल उनकी वैल्यू घटा रहा अपनी स्पीच के दौरान जस्टिस भुइयां ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) जैसे कानूनों के तहत आरोपियों को लंबे समय तक हिरासत में रखे जाने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा- PMLA प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, ऐसे मामलों से निपटने का एक बड़ा साधन है, लेकिन कानून का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल इसके असर को कमजोर करता है। वहीं, UAPA को लेकर कहा कि जब दोषसिद्धि की दर लगभग 5% से भी कम है, तो आरोपी को सालों तक जेल में क्यों रखा जाए। जस्टिस भुइयां ने कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े कुछ विवादों से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट को SIT बनानी पड़ी हैं, जिससे सिर्फ समय की बर्बादी हुई है। विकसित भारत राजनीतिक नारा, अदालतें इससे अलग रहें जस्टिस भुइयां ने न्यायपालिका को विकसित भारत जैसे राजनीतिक नारों से बहुत ज्यादा जोड़ने के खिलाफ भी चेतावनी दी। उन्होंने कहा- ‘विकसित भारत’ का विचार एक राजनीतिक लक्ष्य है और अदालतों को अपने कामकाज में स्वतंत्र रहना चाहिए। जब हम विकसित भारत की बात करते हैं, तो बहस और असहमति के लिए गुंजाइश होनी चाहिए। असहमति को अपराध नहीं माना जाना चाहिए। दलित से भेदभाव होता रहा, तो विकास सार्थक नहीं हो सकता पैनल डिस्कशन के दौरान जस्टिस भुइयां बोले- “भारत में दलितों से भेदभाव जैसी सामाजिक दरारें बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं। माता-पिता यह जिद नहीं कर सकते कि बच्चे दलित महिला के हाथ का बना खाना नहीं खाएंगे। हम ऐसी स्थिति बर्दाश्त नहीं कर सकते जहां दलित पुरुषों, अनुसूचित जाति के पुरुषों को गलियारों में खड़ा किया जाए और लोग उन पर पेशाब करें। यह विकास का मॉडल नहीं हो सकता। व्यक्ति के सम्मान की रक्षा की जानी चाहिए।”

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