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Ebola Outbreak 2026: कोरोना से कम संक्रामक पर 50% मृत्यु दर, इबोला के बुंडिबुग्यो स्ट्रेन पर क्यों काम नहीं कर रही पुरानी वैक्सीन? WHO का रेड अलर्ट!

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नई दिल्ली: सेंट्रल अफ्रीका में फैले नए इबोला वायरस ने पूरी दुनिया को डरा दिया है. डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) और युगांडा में इंफेक्शन बहुत तेजी से पैर पसार रहा है. सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और मामलों का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है. एक्सपर्ट्स को डर है कि मई की शुरुआत में हुई एक ‘सुपर स्प्रेडर’ घटना के बाद यह वायरस कई देशों में फैल सकता है. इसी बीच वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के डायरेक्टर जनरल डॉ. टेड्रोस एडहानोम गेब्रिएसस ने एक ऐसी घोषणा की है, जिसने सबको चिंता में डाल दिया है. उनका कहना है कि इस नए इबोला आउटब्रेक से निपटने के लिए अगले 6 से 9 महीने तक कोई भी वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो पाएगी.

जब दुनिया के पास पहले से ही इबोला की वैक्सीन मौजूद है, तो इस बार ऐसा क्यों हो रहा है. आखिर क्यों मौजूदा मेडिकल साइंस इस नए खतरे के सामने बेबस नजर आ रही है. इसके पीछे एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक कारण है, जिसे समझना बेहद जरूरी है.

इबोला का इतिहास क्या है?

  1. इबोला वायरस की खोज पहली बार साल 1976 में हुई थी. यह एक बेहद खतरनाक और जानलेवा बीमारी है, जो इंसानों और प्राइमेट्स (जैसे चिंपैंजी और गोरिल्ला) को अपना शिकार बनाती है.
  2. WHO की रिपोर्ट बताती है कि यह वायरस चमगादड़, साही और प्राइमेट्स के जरिए इंसानों में आता है. इसके बाद यह मरीजों के खून, शारीरिक तरल पदार्थ (बॉडी फ्लूइड्स) और उनके कपड़ों के संपर्क में आने से दूसरे इंसानों में फैलता है. इस बीमारी की औसतन मृत्यु दर लगभग 50 परसेंट है.
  3. आज से करीब एक दशक पहले साल 2014 में वेस्ट अफ्रीका में इबोला का सबसे खतरनाक हमला हुआ था. उस आउटब्रेक में दुनिया भर में 11,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी.
  4. उस समय तबाही मचाने वाला वायरस इबोला का ‘जायरे स्ट्रेन’ (Zaire strain) था. वह इतिहास का सबसे बड़ा आउटब्रेक था, जो गिनी से शुरू होकर सिएरा लियोन और लाइबेरिया तक फैल गया था.
  5. जायरे स्ट्रेन का इलाज न होने पर मृत्यु दर 90 परसेंट तक पहुंच जाता है. यही वजह थी कि वैज्ञानिकों ने रात-दिन एक करके इस खास स्ट्रेन के खिलाफ दो बेहतरीन वैक्सीन और मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज तैयार कर ली थीं.

बुंडिबुग्यो स्ट्रेन क्या है और यह क्यों खतरनाक है?

मौजूदा संकट के पीछे असली विलेन इबोला का एक बिल्कुल अलग रूप है, जिसे ‘बुंडिबुग्यो स्ट्रेन’ (Bundibugyo strain) कहा जाता है. इंसानों को बीमार करने वाले इबोला के मुख्य रूप से चार स्ट्रेन हैं, जिनमें जायरे और बुंडिबुग्यो शामिल हैं.

बुंडिबुग्यो स्ट्रेन का इतिहास बहुत छोटा है. इतिहास में इसके सिर्फ दो आउटब्रेक देखे गए हैं. पहला साल 2007 में युगांडा में और दूसरा साल 2012 में कांगो में हुआ था. इस स्ट्रेन की चपेट में आने वाले करीब एक-तिहाई मरीजों की मौत हो जाती है.

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हमारे पास जो 5 लाख से ज्यादा वैक्सीन डोज (जैसे एरवेबो वैक्सीन) का स्टॉक मौजूद है, वह जायरे स्ट्रेन के लिए बना है.

बुंडिबुग्यो स्ट्रेन पर वह वैक्सीन काम करेगी या नहीं, इसका कोई ठोस सबूत नहीं है. वायरस की बनावट अलग होने के कारण पुरानी वैक्सीन इस नए आउटब्रेक को रोकने में नाकाम साबित हो रही है.

नई वैक्सीन आने में 9 महीने का समय क्यों लगेगा?

WHO के एडवाइजर डॉ. वासी मूंथी के मुताबिक, बुंडिबुग्यो इबोला के खिलाफ दो ‘कैंडिडेट वैक्सीन’ पर काम चल रहा है, लेकिन अभी तक इनका इंसानों पर ट्रायल (क्लीनिकल ट्रायल) नहीं हुआ है.

  1. पहली वैक्सीन उसी रीकॉम्बीनेंट वेसिकुलर स्टोमेटाइटिस वायरस (rVSV) प्लेटफॉर्म पर आधारित है, जिससे जायरे स्ट्रेन की सफल वैक्सीन बनी थी. इसे सबसे ज्यादा उम्मीद जगाने वाली वैक्सीन माना जा रहा है, लेकिन इसके क्लीनिकल ट्रायल में 6 से 9 महीने का समय लगना तय है.
  2. दूसरी वैक्सीन को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) मिलकर तैयार कर रहे हैं. यह एस्ट्राजेनेका की कोविड वैक्सीन की तरह ChAdOx प्लेटफॉर्म पर काम करती है. यह वैक्सीन अगले दो से तीन महीनों में क्लीनिकल ट्रायल के लिए तैयार हो सकती है. हालांकि, अभी तक इसका जानवरों पर भी पूरी तरह टेस्ट नहीं हुआ है, जिससे इसकी सफलता को लेकर काफी अनिश्चितता बनी हुई है. जानवरों के टेस्ट सफल होने के बाद ही इसे इंसानों के ट्रायल के लिए मंजूरी मिलेगी. इसी वजह से WHO ने वैक्सीन उपलब्ध होने के लिए 6 से 9 महीने की समयसीमा तय की है.

इस पूरे मामले पर एक्सपर्ट्स का क्या कहना है?

हेल्थ एक्सपर्ट्स इस स्थिति को बेहद गंभीर मान रहे हैं. डलास की यूटी साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर की एसोसिएट प्रोफेसर कृतिका कुप्पल्ली कहती हैं कि भले ही बुंडिबुग्यो के आउटब्रेक पहले कम हुए हों, लेकिन यह एक बेहद घातक पैथोजन (बीमारी फैलाने वाला वायरस) है. इस बार स्थिति इसलिए ज्यादा डरावनी है क्योंकि हमारे पास इसके लिए कोई मान्यता प्राप्त वैक्सीन या खास दवा उपलब्ध नहीं है.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के फिजिशियन डॉ. अबरार करन इसे ‘परफेक्ट स्टॉर्म’ यानी एक बहुत बड़ी मुसीबत की शुरुआत बताते हैं. हालांकि, राहत की बात यह है कि इबोला हवा के जरिए नहीं फैलता. इसलिए यह कोविड-19 या खसरे (Measles) जितना संक्रामक नहीं है. इबोला के मरीजों का इलाज कर चुकीं डॉ. नाहिद भदेलिया बताती हैं कि इबोला का एक मरीज औसतन दो लोगों को संक्रमित करता है, जबकि खसरे का एक मरीज 18 लोगों को बीमार कर सकता है. भले ही यह कम फैलता हो, लेकिन इसकी मृत्यु दर बहुत ज्यादा है.

इस आउटब्रेक को लेकर क्या राजनीति हो रही है?

  • इस महामारी के बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी शुरू हो गई है. अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो ने आरोप लगाया है कि WHO ने इस आउटब्रेक को संभालने में काफी देर कर दी.
  • दूसरी तरफ, कांगो के इस संकट के बीच अमेरिकी प्रशासन ने वहां 50 इबोला ट्रीटमेंट क्लिनिक बनाने के लिए 23 मिलियन डॉलर की मदद का एलान किया है.
  • इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी आपातकालीन फंड से 60 मिलियन डॉलर जारी किए हैं. हालांकि, युगांडा के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें अमेरिका की तरफ से ऐसे किसी ट्रीटमेंट सेंटर बनाए जाने की कोई जानकारी नहीं मिली है.
  • मार्को रुबियो के आरोपों का जवाब देते हुए WHO के चीफ टेड्रोस ने कहा कि यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियमों (IHR) की समझ न होने के कारण दिया गया है. WHO किसी देश के काम को बदलता नहीं है, बल्कि वह सिर्फ उनकी मदद के लिए काम करता है.
  • WHO ने इस आउटब्रेक को ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑफ इंटरनेशनल कंसर्न’ (PHEIC) घोषित कर दिया है. उनके मुताबिक, इस बीमारी का खतरा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर बहुत ज्यादा है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह अभी कम है.

इबोला वायरस को लेकर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

क्या पुरानी इबोला वैक्सीन इस नए आउटब्रेक में इस्तेमाल हो सकती है?
नहीं, पुरानी वैक्सीन जायरे स्ट्रेन के लिए बनी हैं. मौजूदा आउटब्रेक बुंडिबुग्यो स्ट्रेन के कारण फैला है, जिस पर पुरानी वैक्सीन का असर साबित नहीं हुआ है.

बुंडिबुग्यो स्ट्रेन की नई वैक्सीन कब तक तैयार हो पाएगी?
WHO के मुताबिक, सबसे प्रभावी वैक्सीन को क्लीनिकल ट्रायल और इस्तेमाल के लिए तैयार होने में कम से कम 6 से 9 महीने का समय लगेगा.

क्या यह नया इबोला वायरस कोरोना की तरह हवा से फैल सकता है?
नहीं, यह वायरस हवा से नहीं फैलता है. यह केवल संक्रमित मरीज के खून, बॉडी फ्लूइड्स या उनके इस्तेमाल किए गए कपड़ों के सीधे संपर्क में आने से फैलता है.

सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कौन सी वैक्सीन बना रहा है?
सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर ChAdOx प्लेटफॉर्म पर एक वैक्सीन तैयार कर रहा है, जिसका जल्द ही ट्रायल शुरू हो सकता है.

मौजूदा आउटब्रेक में मृत्यु दर कितनी देखी जा रही है?
इतिहास में बुंडिबुग्यो स्ट्रेन की मृत्यु दर 30 से 50 परसेंट के बीच रही है. इस बार भी यह वायरस बहुत तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है.

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राजनीति

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नई दिल्ली: सेंट्रल अफ्रीका में फैले नए इबोला वायरस ने पूरी दुनिया को डरा दिया है. डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) और युगांडा में इंफेक्शन बहुत तेजी से पैर पसार रहा है. सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और मामलों का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है. एक्सपर्ट्स को डर है कि मई की शुरुआत में हुई एक ‘सुपर स्प्रेडर’ घटना के बाद यह वायरस कई देशों में फैल सकता है. इसी बीच वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के डायरेक्टर जनरल डॉ. टेड्रोस एडहानोम गेब्रिएसस ने एक ऐसी घोषणा की है, जिसने सबको चिंता में डाल दिया है. उनका कहना है कि इस नए इबोला आउटब्रेक से निपटने के लिए अगले 6 से 9 महीने तक कोई भी वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो पाएगी.

जब दुनिया के पास पहले से ही इबोला की वैक्सीन मौजूद है, तो इस बार ऐसा क्यों हो रहा है. आखिर क्यों मौजूदा मेडिकल साइंस इस नए खतरे के सामने बेबस नजर आ रही है. इसके पीछे एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक कारण है, जिसे समझना बेहद जरूरी है.

इबोला का इतिहास क्या है?

  1. इबोला वायरस की खोज पहली बार साल 1976 में हुई थी. यह एक बेहद खतरनाक और जानलेवा बीमारी है, जो इंसानों और प्राइमेट्स (जैसे चिंपैंजी और गोरिल्ला) को अपना शिकार बनाती है.
  2. WHO की रिपोर्ट बताती है कि यह वायरस चमगादड़, साही और प्राइमेट्स के जरिए इंसानों में आता है. इसके बाद यह मरीजों के खून, शारीरिक तरल पदार्थ (बॉडी फ्लूइड्स) और उनके कपड़ों के संपर्क में आने से दूसरे इंसानों में फैलता है. इस बीमारी की औसतन मृत्यु दर लगभग 50 परसेंट है.
  3. आज से करीब एक दशक पहले साल 2014 में वेस्ट अफ्रीका में इबोला का सबसे खतरनाक हमला हुआ था. उस आउटब्रेक में दुनिया भर में 11,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी.
  4. उस समय तबाही मचाने वाला वायरस इबोला का ‘जायरे स्ट्रेन’ (Zaire strain) था. वह इतिहास का सबसे बड़ा आउटब्रेक था, जो गिनी से शुरू होकर सिएरा लियोन और लाइबेरिया तक फैल गया था.
  5. जायरे स्ट्रेन का इलाज न होने पर मृत्यु दर 90 परसेंट तक पहुंच जाता है. यही वजह थी कि वैज्ञानिकों ने रात-दिन एक करके इस खास स्ट्रेन के खिलाफ दो बेहतरीन वैक्सीन और मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज तैयार कर ली थीं.

बुंडिबुग्यो स्ट्रेन क्या है और यह क्यों खतरनाक है?

मौजूदा संकट के पीछे असली विलेन इबोला का एक बिल्कुल अलग रूप है, जिसे ‘बुंडिबुग्यो स्ट्रेन’ (Bundibugyo strain) कहा जाता है. इंसानों को बीमार करने वाले इबोला के मुख्य रूप से चार स्ट्रेन हैं, जिनमें जायरे और बुंडिबुग्यो शामिल हैं.

बुंडिबुग्यो स्ट्रेन का इतिहास बहुत छोटा है. इतिहास में इसके सिर्फ दो आउटब्रेक देखे गए हैं. पहला साल 2007 में युगांडा में और दूसरा साल 2012 में कांगो में हुआ था. इस स्ट्रेन की चपेट में आने वाले करीब एक-तिहाई मरीजों की मौत हो जाती है.

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हमारे पास जो 5 लाख से ज्यादा वैक्सीन डोज (जैसे एरवेबो वैक्सीन) का स्टॉक मौजूद है, वह जायरे स्ट्रेन के लिए बना है.

बुंडिबुग्यो स्ट्रेन पर वह वैक्सीन काम करेगी या नहीं, इसका कोई ठोस सबूत नहीं है. वायरस की बनावट अलग होने के कारण पुरानी वैक्सीन इस नए आउटब्रेक को रोकने में नाकाम साबित हो रही है.

नई वैक्सीन आने में 9 महीने का समय क्यों लगेगा?

WHO के एडवाइजर डॉ. वासी मूंथी के मुताबिक, बुंडिबुग्यो इबोला के खिलाफ दो ‘कैंडिडेट वैक्सीन’ पर काम चल रहा है, लेकिन अभी तक इनका इंसानों पर ट्रायल (क्लीनिकल ट्रायल) नहीं हुआ है.

  1. पहली वैक्सीन उसी रीकॉम्बीनेंट वेसिकुलर स्टोमेटाइटिस वायरस (rVSV) प्लेटफॉर्म पर आधारित है, जिससे जायरे स्ट्रेन की सफल वैक्सीन बनी थी. इसे सबसे ज्यादा उम्मीद जगाने वाली वैक्सीन माना जा रहा है, लेकिन इसके क्लीनिकल ट्रायल में 6 से 9 महीने का समय लगना तय है.
  2. दूसरी वैक्सीन को ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) मिलकर तैयार कर रहे हैं. यह एस्ट्राजेनेका की कोविड वैक्सीन की तरह ChAdOx प्लेटफॉर्म पर काम करती है. यह वैक्सीन अगले दो से तीन महीनों में क्लीनिकल ट्रायल के लिए तैयार हो सकती है. हालांकि, अभी तक इसका जानवरों पर भी पूरी तरह टेस्ट नहीं हुआ है, जिससे इसकी सफलता को लेकर काफी अनिश्चितता बनी हुई है. जानवरों के टेस्ट सफल होने के बाद ही इसे इंसानों के ट्रायल के लिए मंजूरी मिलेगी. इसी वजह से WHO ने वैक्सीन उपलब्ध होने के लिए 6 से 9 महीने की समयसीमा तय की है.

इस पूरे मामले पर एक्सपर्ट्स का क्या कहना है?

हेल्थ एक्सपर्ट्स इस स्थिति को बेहद गंभीर मान रहे हैं. डलास की यूटी साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर की एसोसिएट प्रोफेसर कृतिका कुप्पल्ली कहती हैं कि भले ही बुंडिबुग्यो के आउटब्रेक पहले कम हुए हों, लेकिन यह एक बेहद घातक पैथोजन (बीमारी फैलाने वाला वायरस) है. इस बार स्थिति इसलिए ज्यादा डरावनी है क्योंकि हमारे पास इसके लिए कोई मान्यता प्राप्त वैक्सीन या खास दवा उपलब्ध नहीं है.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के फिजिशियन डॉ. अबरार करन इसे ‘परफेक्ट स्टॉर्म’ यानी एक बहुत बड़ी मुसीबत की शुरुआत बताते हैं. हालांकि, राहत की बात यह है कि इबोला हवा के जरिए नहीं फैलता. इसलिए यह कोविड-19 या खसरे (Measles) जितना संक्रामक नहीं है. इबोला के मरीजों का इलाज कर चुकीं डॉ. नाहिद भदेलिया बताती हैं कि इबोला का एक मरीज औसतन दो लोगों को संक्रमित करता है, जबकि खसरे का एक मरीज 18 लोगों को बीमार कर सकता है. भले ही यह कम फैलता हो, लेकिन इसकी मृत्यु दर बहुत ज्यादा है.

इस आउटब्रेक को लेकर क्या राजनीति हो रही है?

  • इस महामारी के बीच अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी शुरू हो गई है. अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो ने आरोप लगाया है कि WHO ने इस आउटब्रेक को संभालने में काफी देर कर दी.
  • दूसरी तरफ, कांगो के इस संकट के बीच अमेरिकी प्रशासन ने वहां 50 इबोला ट्रीटमेंट क्लिनिक बनाने के लिए 23 मिलियन डॉलर की मदद का एलान किया है.
  • इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी आपातकालीन फंड से 60 मिलियन डॉलर जारी किए हैं. हालांकि, युगांडा के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें अमेरिका की तरफ से ऐसे किसी ट्रीटमेंट सेंटर बनाए जाने की कोई जानकारी नहीं मिली है.
  • मार्को रुबियो के आरोपों का जवाब देते हुए WHO के चीफ टेड्रोस ने कहा कि यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नियमों (IHR) की समझ न होने के कारण दिया गया है. WHO किसी देश के काम को बदलता नहीं है, बल्कि वह सिर्फ उनकी मदद के लिए काम करता है.
  • WHO ने इस आउटब्रेक को ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑफ इंटरनेशनल कंसर्न’ (PHEIC) घोषित कर दिया है. उनके मुताबिक, इस बीमारी का खतरा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर बहुत ज्यादा है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह अभी कम है.

इबोला वायरस को लेकर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

क्या पुरानी इबोला वैक्सीन इस नए आउटब्रेक में इस्तेमाल हो सकती है?
नहीं, पुरानी वैक्सीन जायरे स्ट्रेन के लिए बनी हैं. मौजूदा आउटब्रेक बुंडिबुग्यो स्ट्रेन के कारण फैला है, जिस पर पुरानी वैक्सीन का असर साबित नहीं हुआ है.

बुंडिबुग्यो स्ट्रेन की नई वैक्सीन कब तक तैयार हो पाएगी?
WHO के मुताबिक, सबसे प्रभावी वैक्सीन को क्लीनिकल ट्रायल और इस्तेमाल के लिए तैयार होने में कम से कम 6 से 9 महीने का समय लगेगा.

क्या यह नया इबोला वायरस कोरोना की तरह हवा से फैल सकता है?
नहीं, यह वायरस हवा से नहीं फैलता है. यह केवल संक्रमित मरीज के खून, बॉडी फ्लूइड्स या उनके इस्तेमाल किए गए कपड़ों के सीधे संपर्क में आने से फैलता है.

सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कौन सी वैक्सीन बना रहा है?
सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर ChAdOx प्लेटफॉर्म पर एक वैक्सीन तैयार कर रहा है, जिसका जल्द ही ट्रायल शुरू हो सकता है.

मौजूदा आउटब्रेक में मृत्यु दर कितनी देखी जा रही है?
इतिहास में बुंडिबुग्यो स्ट्रेन की मृत्यु दर 30 से 50 परसेंट के बीच रही है. इस बार भी यह वायरस बहुत तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है.

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