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Mamta Kaliya Wins Sahitya Akademi Award 2025 for Jeete Ji Allahabad

Mamta Kaliya Wins Sahitya Akademi Award 2025 for Jeete Ji Allahabad
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16 मिनट पहले

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31 मार्च को ममता कालिया को साहित्य अकादमी पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया गया। ये सम्मान 2021 में प्रकाशित उनके संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए मिला है।

ममता कालिया हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका हैं। उनके चर्चित उपन्यासों में ‘बेघर’, ‘दुक्खम-सुक्खम’, ‘नरक दर नरक’, ‘प्रेम कहानी’ और कहानियों में ‘दूसरा देवदास’, ‘आपकी छोटी लड़की’, ‘छुटकारा’, ‘एक अरद औरत’, ‘सीट नंबर छह’, ‘बोलने वाली औरत’ शामिल हैं। साथ ही ‘कितने प्रश्न करूं’ और ‘खांटी घरेलू औरतें’ उनकी चर्चित कविताएं हैं।

नुक़्ता और अनुस्वार की गलतियों पर चिढ़ जाने वाली ममता मीडिल क्लास, स्त्री-पुरुष सम्बंध, उनके अन्तर्मन की बातें और कामकाजी महिलाओं के संघर्ष पर बेबाकी से लिखती आई हैं।

नवंबर 1940 में उत्तर प्रदेश के मथुरा में जन्मीं ममता कालिया का बचपन शहर दर शहर घूमते बीता। दिल्ली, गाजियाबाद, मुंबई, पुणे, नागपुर और इंदौर जैसे शहरों में पली-बढ़ीं। पिता विद्याभूषण अग्रवाल सरकारी अधिकारी थे, तो उनकी पोस्टिंग के साथ हर दो-ढ़ाई साल में शहर बदलते रहे। ममता भी खुद को ‘सरकारी बंजारा’ कहती हैं।

परिवार में माता-पिता के अलावा ये दो बहनें थीं। ममता छोटी थीं।

एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उनकी बड़ी बहन पढ़ने, नाचने-गाने, सबमें अव्वल थी। उनके साथ की और लड़कियों के पास भी कई हुनर थे, लेकिन खुद उनके पास बस कागज-कलम और कई सवाल थे। घर के साहित्यिक माहौल में उन्होंने बचपन में ही वो सब पढ़ना शुरू कर दिया था जो उन्हें उस वक्त समझ भी नहीं आया।

पिता का साहित्य के लिए प्रेम और आदर भाव देखकर उनकी नजरों में बने रहने के लिए ममता लगातार लिखने-पढ़ने से ताल्लुक रखने लगीं। घर में भी नामी साहित्यकारों का आना-जाना लगा रहता। ऐसे में लेखक बनने का इरादा करना बिलकुल भी मुश्किल नहीं था।

इंग्लिश में पढ़ाई की पर लिखने की भाषा हिंदी चुनी

ममता ने इंग्लिश मीडियम से स्कूली पढ़ाई पूरी की। इंग्लिश के अलावा फ्रेंच की भी अच्छी जानकार थीं। नागपुर में स्कूल के बाद फ्रेंच ऑनर्स में एडमिशन लिया। तब फ्रेंच ऑनर्स में दाखिले पर हर महीने 150 रुपए की स्कॉलरशिप मिलती थी। स्कॉलरशिप मिलती उससे पहले ही पिता का ट्रांसफर इंदौर हो गया। न फ्रेंच ऑनर्स हुआ और न स्कॉलरशिप के रुपए मिले।

इंदौर के क्रिश्चन कॉलेज में इंग्लिश ऑनर्स में एडमिशन लिया, साथ ही कॉलेज के हिंदी विभाग की गोष्ठियों में भी जाती रहीं। ममता बचपन से ही बच्चों के लिए कहानियां लिखती थीं, लेकिन वे मानती हैं कि इंदौर ने एक लेखिका के बतौर उन्हें खूब सजाया और संवारा है। वे कहती हैं, ‘इंदौर ने मेरी रचनात्मक्ता को पंख दिया।’

चुनौती स्वीकार कविताओं से कहानियों की ओर मुड़ीं

कॉलेज के शुरुआती दिनों में ही ‘प्रयोगवादी प्रियतम’ शीर्षक से पहली कविता ‘जागरण’ के संडे एडिशन में छपी। तब घरवालों को पहली बार पता चला कि ममता भी लिखने लगी है। ये 1960 का दौर था जब ‘नई दुनिया’, ‘जागरण’ अखबार और ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘निहारिका’, ‘कादम्बिनी’ और ‘ज्ञानोदय’ जैैसी अन्य पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं छपने लगीं। तभी अजमेर से छपने वाली ‘लहर’ पत्रिका के संपादक प्रकाश जैन ने ममता से कहानी पर हाथ आजमाने को कहा। और ऐसे उन्होंने छुटपुट कहानियां लिखना भी शुरू किया।

1964 में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ की कहानी प्रतियोगिता में ममता की कहानी श्रेष्ठ कहानी चुनी गई। कविताओं से लेखन की शुरुआत करने वाली ममता 1965 में हिंदी के प्रसिद्ध लेखक रविन्द्र कालिया से पहली मुलाकात के बाद कहानियों की ओर रुख कर गईं। दौलतराम कॉलेज में पढ़ाने के दौरान 1965 में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के बुलावे पर चंडीगढ़ के एक सम्मेलन में गई थीं। वहीं रविन्द्र कालिया से पहली बार मिलीं।

जिस लेखक से तकरार फिर उसी से प्यार

रवि से मिलने की कहानी भी काफी फिल्मी है। चंडीगढ़ में 30 जनवरी 1965 की शाम। ममता उसी सम्मेलन से दिल्ली लौट रही थीं। जिस बस में ममता कालिया चढ़ीं, उसमें सिर्फ एक ही सीट खाली थी, वो भी रविन्द्र के बगल वाली। वो न चाहते हुए भी बैठ गईं। पास बैठे सोचने लगीं कि इस आदमी ने मेरी उपेक्षा की, सारा दिन सम्मेलन में बात तक नहीं की और अब साथ जा रहा है।

बड़ी देर चुप्पी के बाद रवि ममता से बोले- ‘सिर्फ कविता-वविता लिखती हैं? कहानी नहीं लिखतीं क्या?’ ये तंज ममता को बर्दाश्‍त नहीं हुआ। इसे उन्होंने एक चैलेंज के रूप में लिया और फिर खूब कहानियां लिखनी शुरू की। कहानियां वे पहले भी लिख चुकी थीं, पर अब रवि को दिखाने के लिए लिखने लगीं कि ये कोई बहुत मुश्किल काम नहीं। वे उनका गुरूर तोड़ना चाहती थीं। ऐसे में उन्होंने 200 से ज्यादा कहानियां और ‘बेघर’, ‘नरक-दर-नरक’, ‘दौड़’, ‘दुक्खम सुक्खम’, ‘सपनों की होम डिलिवरी’, ‘कल्‍चर-वल्चर’ जैसे उपन्यास लिख डाले।

इसके साथ-साथ ‘अ ट्रिब्यूट टू पापा एंड अदर पोयम्स’, ‘पोयम्स 78’, ‘खांटी घरेलू औरत’, ‘कितने प्रश्न करूं’ और ‘पचास कविताएं’ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुईं।

उन्होंने ‘जीते जी इलाहाबाद’ के अलावा ‘कल परसों के बरसों’, ‘सफर में हमसफर’, ‘कितने शहरों में कितनी बार’ और ‘अन्‍दाज-ए-बयां उर्फ रवि कथा’ संस्मरण भी लिखे।

संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए ममता कालिया को नई दिल्ली के कमानी सभागार में साहित्य अकादमी पुरस्कार-2025 से सम्मानित किया गया।

संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए ममता कालिया को नई दिल्ली के कमानी सभागार में साहित्य अकादमी पुरस्कार-2025 से सम्मानित किया गया।

अपने लिखे को वापस नहीं पढ़तीं ममता

इसके बाद उनकी रवि से दोस्‍ती बढ़ती गई और 11 महीने के भीतर ही 12 दिसंबर 1965 को ममता ने रवि से शादी की। शादी के तुरंत बाद रवि ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ (TOI) के साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ में नौकरी के लिए मुंबई चले गए। ममता दिल्ली में ही रह गईं। यही वो समय था जब कॉलेज से खाली वक्त में उन्होंने एक धुन में ‘बेघर’ उपन्यास लिख दिया था।

ममता कालिया कोई भी रचना एक बार में लिखती हैं और अपने लिखे को वापस नहीं पढ़तीं। उनका मानना है कि अगर वे दोबारा पढ़ें तो वो या तो कुछ नहीं बदलेंगी या फिर उसे छपने ही नहीं देंगी।

उन्होंने लिखने के लिए कभी नौकरी नहीं छोड़ी। ममता कहती हैं कि ‘अगर मैं नौकरी न कर रही होती तो भूखी मर जाती’। इसीलिए वे अक्सर रात में लिखतीं जब घर में सब सो जाते। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि नौकरी बस जीविका चलाने के लिए, पर लेखन जिंदगी का हिस्सा है। इसलिए 6 दशकों से ज्यादा समय हो जाने के बाद वो आज भी लगातार लिख रहीं हैं।

हालांकि जब उनके दोनों बच्चों ने लेखन न चुनकर दूसरी राह चुनी तब उन्होंने राहत की सांस मिली। वे नहीं चाहती थीं कि बच्चे लेखक बनकर तंग हालात में जिंदगी गुजारें।

ममता कालिया दिन में नौकरी और रात में सबके सो जाने पर लिखती थीं।

ममता कालिया दिन में नौकरी और रात में सबके सो जाने पर लिखती थीं।

ममता कहती हैं- ‘इंग्लिश कमाई की और हिंदी दिल की भाषा है…’

ममता कालिया ने पढ़ाई इंग्लिश में की और पढ़ाया भी इंग्लिश में, लेकिन लेखन ज्यादा हिंदी में किया। वो एक इंटरव्यू में बताती हैं कि पिता ने सलाह दी थी- ‘इंग्लिश में एम.ए. कर लो तो भूखी नहीं मरोगी’। इस सलाह ने उन्हें बाकी हिंदी राइटर्स की तरह तंगी में जीने से बचा लिया। हालांकि, उन्होंने इंग्लिश में भी लिखा है। TOI के इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया पत्रिका में ममता कालिया की अंग्रेजी कविताओं को पूरा एक पन्ना मिला था।

घर में शब्दों के लिए लड़ा करते थे

ममता ने अपने एक इंटरव्यू बताया था कि उनके घर में भाषागत गलती की कोई माफी नहीं थी। खासकर पापा और चाचा भारतभूषण अग्रवाल (हिंदी कवि) के सामने कभी शब्दों के उच्चारण, उनके इस्तेमाल को लेकर कोई गलती नहीं कर सकते थे। बहनें भी एक-एक शब्द के सही इस्तेमाल के लिए लड़ा करतीं। इसीलिए ममता जी का दोनों भाषाओं पर समान अधिकार रहा है। इसके चलते उन्होंने कई अंग्रेजी उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद किया। उन्होंने सोमरसेट मॉम के बेहद चर्चित उपन्यास ‘ ऑफ ह्यूमन बॉन्डेज’ का भी हिंदी अनुवाद किया है।

रवि के चाचा बोले थे- ‘इससे अच्छा तो मां से शादी कर लेता’

रवि के घरवालों ने मन से कभी ममता को नहीं स्वीकारा। वे किसी पंजाबी लड़की से रवि की शादी करवाना चाहते थे। पर रवि ने ममता को पसंद कर लिया था और किसी और से शादी को राजी नहीं थे, इसलिए शादी तय हो गई। शादी के दिन जब ममता जी की खूबसूरत मां आरती की थाल लेकर सीढ़ियों से उतरीं, तो रवि के चाचा रवि से बोल उठे- ‘इससे अच्छा तो मां से शादी कर लेता’।

बाकी साहित्यिक दंपतियों से अलग, ममता और रविन्द्र कालिया ने कभी कोई रचना साथ में नहीं लिखी।

बाकी साहित्यिक दंपतियों से अलग, ममता और रविन्द्र कालिया ने कभी कोई रचना साथ में नहीं लिखी।

कवि मुक्तिबोध से सीखा ‘दुनिया को अपने चश्मे से देखना’

ममता कालिया बचपन से पापा को अपना हीरो मानती और एक वक्त तक उन्हीं के चश्मे से दुनिया को देखती रहीं। हिंदी के कवि गजानन माधव मुक्तिबोध से बचपन की एक मुलाकात में हर सवाल का जवाब ‘पापा कहते हैं’ बोलकर शुरू करतीं। मुक्तिबोध ने एक सीधा सवाल किया- ‘ये सब तो पापा कहते हैं, तुम क्या कहती हो?’ ममता का चश्मा ठीक करते हुए उन्होंने सलाह दी कि ‘दुनिया को अपने चश्मे से देखना शुरू करो’ और ऐसे ममता ने दुनिया को देखने का अपना नजरिया बदला।

जिंदगी के अनुभवों को कहानियों में दर्ज करतीं

बचपन की बात करते इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि एक बार घर पर आए ‘अधूरा उपन्यास’ के लेखक जनार्दन मुक्तिदूत ने पिता विद्याभूषण अग्रवाल से ममता के लिए कहा- ‘आपकी लड़की की आवाज बहुत अच्छी है’। इससे ममता बहुत खुश हुईं और इस वाकिये से प्रेरित होकर, उन्होंने आगे चलकर कहानी लिखी ‘आपकी छोटी लड़की’। वे अक्सर किताबों के जिल्द पर कोटेशंस में अपनी जिंदगी के अनुभवों को दर्ज करती हैं। ‘जीते जी इलाहाबाद’, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल रहा है, उसके कवर पर लिखा है- ‘शहर- पुड़िया में बांधकर हम नहीं ला सकते थे साथ; तो क्या!’।

स्टोरी – सोनाली राय

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इंडियन हॉकी प्लेयर गुरजंत सिंह ने इंटरनेशनल हॉकी से रिटायरमेंट का ऐलान किया। इसकी घोषणा उन्होंने 27 मार्च को दिल्ली के ला मेरेडिएन में आयोजित हॉकी इंडिया एनुअल अवॉर्ड सेरेमनी के दौरान की, जिसके बाद से ही वे चर्चा में हैं। पूरी खबर पढ़ें…

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31 मार्च को ममता कालिया को साहित्य अकादमी पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया गया। ये सम्मान 2021 में प्रकाशित उनके संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए मिला है।

ममता कालिया हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका हैं। उनके चर्चित उपन्यासों में ‘बेघर’, ‘दुक्खम-सुक्खम’, ‘नरक दर नरक’, ‘प्रेम कहानी’ और कहानियों में ‘दूसरा देवदास’, ‘आपकी छोटी लड़की’, ‘छुटकारा’, ‘एक अरद औरत’, ‘सीट नंबर छह’, ‘बोलने वाली औरत’ शामिल हैं। साथ ही ‘कितने प्रश्न करूं’ और ‘खांटी घरेलू औरतें’ उनकी चर्चित कविताएं हैं।

नुक़्ता और अनुस्वार की गलतियों पर चिढ़ जाने वाली ममता मीडिल क्लास, स्त्री-पुरुष सम्बंध, उनके अन्तर्मन की बातें और कामकाजी महिलाओं के संघर्ष पर बेबाकी से लिखती आई हैं।

नवंबर 1940 में उत्तर प्रदेश के मथुरा में जन्मीं ममता कालिया का बचपन शहर दर शहर घूमते बीता। दिल्ली, गाजियाबाद, मुंबई, पुणे, नागपुर और इंदौर जैसे शहरों में पली-बढ़ीं। पिता विद्याभूषण अग्रवाल सरकारी अधिकारी थे, तो उनकी पोस्टिंग के साथ हर दो-ढ़ाई साल में शहर बदलते रहे। ममता भी खुद को ‘सरकारी बंजारा’ कहती हैं।

परिवार में माता-पिता के अलावा ये दो बहनें थीं। ममता छोटी थीं।

एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उनकी बड़ी बहन पढ़ने, नाचने-गाने, सबमें अव्वल थी। उनके साथ की और लड़कियों के पास भी कई हुनर थे, लेकिन खुद उनके पास बस कागज-कलम और कई सवाल थे। घर के साहित्यिक माहौल में उन्होंने बचपन में ही वो सब पढ़ना शुरू कर दिया था जो उन्हें उस वक्त समझ भी नहीं आया।

पिता का साहित्य के लिए प्रेम और आदर भाव देखकर उनकी नजरों में बने रहने के लिए ममता लगातार लिखने-पढ़ने से ताल्लुक रखने लगीं। घर में भी नामी साहित्यकारों का आना-जाना लगा रहता। ऐसे में लेखक बनने का इरादा करना बिलकुल भी मुश्किल नहीं था।

इंग्लिश में पढ़ाई की पर लिखने की भाषा हिंदी चुनी

ममता ने इंग्लिश मीडियम से स्कूली पढ़ाई पूरी की। इंग्लिश के अलावा फ्रेंच की भी अच्छी जानकार थीं। नागपुर में स्कूल के बाद फ्रेंच ऑनर्स में एडमिशन लिया। तब फ्रेंच ऑनर्स में दाखिले पर हर महीने 150 रुपए की स्कॉलरशिप मिलती थी। स्कॉलरशिप मिलती उससे पहले ही पिता का ट्रांसफर इंदौर हो गया। न फ्रेंच ऑनर्स हुआ और न स्कॉलरशिप के रुपए मिले।

इंदौर के क्रिश्चन कॉलेज में इंग्लिश ऑनर्स में एडमिशन लिया, साथ ही कॉलेज के हिंदी विभाग की गोष्ठियों में भी जाती रहीं। ममता बचपन से ही बच्चों के लिए कहानियां लिखती थीं, लेकिन वे मानती हैं कि इंदौर ने एक लेखिका के बतौर उन्हें खूब सजाया और संवारा है। वे कहती हैं, ‘इंदौर ने मेरी रचनात्मक्ता को पंख दिया।’

चुनौती स्वीकार कविताओं से कहानियों की ओर मुड़ीं

कॉलेज के शुरुआती दिनों में ही ‘प्रयोगवादी प्रियतम’ शीर्षक से पहली कविता ‘जागरण’ के संडे एडिशन में छपी। तब घरवालों को पहली बार पता चला कि ममता भी लिखने लगी है। ये 1960 का दौर था जब ‘नई दुनिया’, ‘जागरण’ अखबार और ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘निहारिका’, ‘कादम्बिनी’ और ‘ज्ञानोदय’ जैैसी अन्य पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं छपने लगीं। तभी अजमेर से छपने वाली ‘लहर’ पत्रिका के संपादक प्रकाश जैन ने ममता से कहानी पर हाथ आजमाने को कहा। और ऐसे उन्होंने छुटपुट कहानियां लिखना भी शुरू किया।

1964 में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ की कहानी प्रतियोगिता में ममता की कहानी श्रेष्ठ कहानी चुनी गई। कविताओं से लेखन की शुरुआत करने वाली ममता 1965 में हिंदी के प्रसिद्ध लेखक रविन्द्र कालिया से पहली मुलाकात के बाद कहानियों की ओर रुख कर गईं। दौलतराम कॉलेज में पढ़ाने के दौरान 1965 में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के बुलावे पर चंडीगढ़ के एक सम्मेलन में गई थीं। वहीं रविन्द्र कालिया से पहली बार मिलीं।

जिस लेखक से तकरार फिर उसी से प्यार

रवि से मिलने की कहानी भी काफी फिल्मी है। चंडीगढ़ में 30 जनवरी 1965 की शाम। ममता उसी सम्मेलन से दिल्ली लौट रही थीं। जिस बस में ममता कालिया चढ़ीं, उसमें सिर्फ एक ही सीट खाली थी, वो भी रविन्द्र के बगल वाली। वो न चाहते हुए भी बैठ गईं। पास बैठे सोचने लगीं कि इस आदमी ने मेरी उपेक्षा की, सारा दिन सम्मेलन में बात तक नहीं की और अब साथ जा रहा है।

बड़ी देर चुप्पी के बाद रवि ममता से बोले- ‘सिर्फ कविता-वविता लिखती हैं? कहानी नहीं लिखतीं क्या?’ ये तंज ममता को बर्दाश्‍त नहीं हुआ। इसे उन्होंने एक चैलेंज के रूप में लिया और फिर खूब कहानियां लिखनी शुरू की। कहानियां वे पहले भी लिख चुकी थीं, पर अब रवि को दिखाने के लिए लिखने लगीं कि ये कोई बहुत मुश्किल काम नहीं। वे उनका गुरूर तोड़ना चाहती थीं। ऐसे में उन्होंने 200 से ज्यादा कहानियां और ‘बेघर’, ‘नरक-दर-नरक’, ‘दौड़’, ‘दुक्खम सुक्खम’, ‘सपनों की होम डिलिवरी’, ‘कल्‍चर-वल्चर’ जैसे उपन्यास लिख डाले।

इसके साथ-साथ ‘अ ट्रिब्यूट टू पापा एंड अदर पोयम्स’, ‘पोयम्स 78’, ‘खांटी घरेलू औरत’, ‘कितने प्रश्न करूं’ और ‘पचास कविताएं’ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुईं।

उन्होंने ‘जीते जी इलाहाबाद’ के अलावा ‘कल परसों के बरसों’, ‘सफर में हमसफर’, ‘कितने शहरों में कितनी बार’ और ‘अन्‍दाज-ए-बयां उर्फ रवि कथा’ संस्मरण भी लिखे।

संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए ममता कालिया को नई दिल्ली के कमानी सभागार में साहित्य अकादमी पुरस्कार-2025 से सम्मानित किया गया।

संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए ममता कालिया को नई दिल्ली के कमानी सभागार में साहित्य अकादमी पुरस्कार-2025 से सम्मानित किया गया।

अपने लिखे को वापस नहीं पढ़तीं ममता

इसके बाद उनकी रवि से दोस्‍ती बढ़ती गई और 11 महीने के भीतर ही 12 दिसंबर 1965 को ममता ने रवि से शादी की। शादी के तुरंत बाद रवि ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ (TOI) के साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ में नौकरी के लिए मुंबई चले गए। ममता दिल्ली में ही रह गईं। यही वो समय था जब कॉलेज से खाली वक्त में उन्होंने एक धुन में ‘बेघर’ उपन्यास लिख दिया था।

ममता कालिया कोई भी रचना एक बार में लिखती हैं और अपने लिखे को वापस नहीं पढ़तीं। उनका मानना है कि अगर वे दोबारा पढ़ें तो वो या तो कुछ नहीं बदलेंगी या फिर उसे छपने ही नहीं देंगी।

उन्होंने लिखने के लिए कभी नौकरी नहीं छोड़ी। ममता कहती हैं कि ‘अगर मैं नौकरी न कर रही होती तो भूखी मर जाती’। इसीलिए वे अक्सर रात में लिखतीं जब घर में सब सो जाते। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि नौकरी बस जीविका चलाने के लिए, पर लेखन जिंदगी का हिस्सा है। इसलिए 6 दशकों से ज्यादा समय हो जाने के बाद वो आज भी लगातार लिख रहीं हैं।

हालांकि जब उनके दोनों बच्चों ने लेखन न चुनकर दूसरी राह चुनी तब उन्होंने राहत की सांस मिली। वे नहीं चाहती थीं कि बच्चे लेखक बनकर तंग हालात में जिंदगी गुजारें।

ममता कालिया दिन में नौकरी और रात में सबके सो जाने पर लिखती थीं।

ममता कालिया दिन में नौकरी और रात में सबके सो जाने पर लिखती थीं।

ममता कहती हैं- ‘इंग्लिश कमाई की और हिंदी दिल की भाषा है…’

ममता कालिया ने पढ़ाई इंग्लिश में की और पढ़ाया भी इंग्लिश में, लेकिन लेखन ज्यादा हिंदी में किया। वो एक इंटरव्यू में बताती हैं कि पिता ने सलाह दी थी- ‘इंग्लिश में एम.ए. कर लो तो भूखी नहीं मरोगी’। इस सलाह ने उन्हें बाकी हिंदी राइटर्स की तरह तंगी में जीने से बचा लिया। हालांकि, उन्होंने इंग्लिश में भी लिखा है। TOI के इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया पत्रिका में ममता कालिया की अंग्रेजी कविताओं को पूरा एक पन्ना मिला था।

घर में शब्दों के लिए लड़ा करते थे

ममता ने अपने एक इंटरव्यू बताया था कि उनके घर में भाषागत गलती की कोई माफी नहीं थी। खासकर पापा और चाचा भारतभूषण अग्रवाल (हिंदी कवि) के सामने कभी शब्दों के उच्चारण, उनके इस्तेमाल को लेकर कोई गलती नहीं कर सकते थे। बहनें भी एक-एक शब्द के सही इस्तेमाल के लिए लड़ा करतीं। इसीलिए ममता जी का दोनों भाषाओं पर समान अधिकार रहा है। इसके चलते उन्होंने कई अंग्रेजी उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद किया। उन्होंने सोमरसेट मॉम के बेहद चर्चित उपन्यास ‘ ऑफ ह्यूमन बॉन्डेज’ का भी हिंदी अनुवाद किया है।

रवि के चाचा बोले थे- ‘इससे अच्छा तो मां से शादी कर लेता’

रवि के घरवालों ने मन से कभी ममता को नहीं स्वीकारा। वे किसी पंजाबी लड़की से रवि की शादी करवाना चाहते थे। पर रवि ने ममता को पसंद कर लिया था और किसी और से शादी को राजी नहीं थे, इसलिए शादी तय हो गई। शादी के दिन जब ममता जी की खूबसूरत मां आरती की थाल लेकर सीढ़ियों से उतरीं, तो रवि के चाचा रवि से बोल उठे- ‘इससे अच्छा तो मां से शादी कर लेता’।

बाकी साहित्यिक दंपतियों से अलग, ममता और रविन्द्र कालिया ने कभी कोई रचना साथ में नहीं लिखी।

बाकी साहित्यिक दंपतियों से अलग, ममता और रविन्द्र कालिया ने कभी कोई रचना साथ में नहीं लिखी।

कवि मुक्तिबोध से सीखा ‘दुनिया को अपने चश्मे से देखना’

ममता कालिया बचपन से पापा को अपना हीरो मानती और एक वक्त तक उन्हीं के चश्मे से दुनिया को देखती रहीं। हिंदी के कवि गजानन माधव मुक्तिबोध से बचपन की एक मुलाकात में हर सवाल का जवाब ‘पापा कहते हैं’ बोलकर शुरू करतीं। मुक्तिबोध ने एक सीधा सवाल किया- ‘ये सब तो पापा कहते हैं, तुम क्या कहती हो?’ ममता का चश्मा ठीक करते हुए उन्होंने सलाह दी कि ‘दुनिया को अपने चश्मे से देखना शुरू करो’ और ऐसे ममता ने दुनिया को देखने का अपना नजरिया बदला।

जिंदगी के अनुभवों को कहानियों में दर्ज करतीं

बचपन की बात करते इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि एक बार घर पर आए ‘अधूरा उपन्यास’ के लेखक जनार्दन मुक्तिदूत ने पिता विद्याभूषण अग्रवाल से ममता के लिए कहा- ‘आपकी लड़की की आवाज बहुत अच्छी है’। इससे ममता बहुत खुश हुईं और इस वाकिये से प्रेरित होकर, उन्होंने आगे चलकर कहानी लिखी ‘आपकी छोटी लड़की’। वे अक्सर किताबों के जिल्द पर कोटेशंस में अपनी जिंदगी के अनुभवों को दर्ज करती हैं। ‘जीते जी इलाहाबाद’, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल रहा है, उसके कवर पर लिखा है- ‘शहर- पुड़िया में बांधकर हम नहीं ला सकते थे साथ; तो क्या!’।

स्टोरी – सोनाली राय

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इंडियन हॉकी प्लेयर गुरजंत सिंह ने इंटरनेशनल हॉकी से रिटायरमेंट का ऐलान किया। इसकी घोषणा उन्होंने 27 मार्च को दिल्ली के ला मेरेडिएन में आयोजित हॉकी इंडिया एनुअल अवॉर्ड सेरेमनी के दौरान की, जिसके बाद से ही वे चर्चा में हैं। पूरी खबर पढ़ें…

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