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मशहूर शेफ विकास खन्ना की स्वीकारोक्ति:मां को मेरे हा​​थ का खाना पसंद नहीं आया, तब लगा भोजन की आत्मा छूना जरूरी

मशहूर शेफ विकास खन्ना की स्वीकारोक्ति:मां को मेरे हा​​थ का खाना पसंद नहीं आया, तब लगा भोजन की आत्मा छूना जरूरी

‘अमृतसर की गलियों में मेरा बचपन बीता और वहां मैंने एक बात सीखी- भोजन सिर्फ पकाया नहीं जाता, ‘अर्पित’ किया जाता है। मुझे याद है, मेरी दादी सुबह के धुंधलके में सहज प्रवृत्ति और अगाध श्रद्धा के साथ बड़े-बड़े पतीले चढ़ाती थीं। वे रसोईघर विलासिता या महंगी सामग्रियों से नहीं सजे थे, लेकिन वे सुंदर अनुष्ठानों और बेपनाह देखभाल से भरे हुए थे। मुझे मिशेलिन स्टार्स मिले, दुनियाभर में सराहना मिली, लेकिन इस दौड़ में मैं उस भोजन से दूर होता गया जिसने मुझे पहली पहचान दी थी। एक पल आज भी मुझे झकझोर देता है- मेरी मां मेरे रेस्त्रां में खाना खाने बैठी थीं और उन्होंने मेरे बनाए भोजन का एक ग्रास भी पसंद नहीं किया। वह बात मेरे मन में गहराई से घर कर गई। मैंने वर्षों उस उत्कृष्टता को पाने में लगाए थे जिसे दुनिया ने परिभाषित किया था, पर जिस व्यक्ति का मैं सबसे ज्यादा सम्मान करता था, वह मेरे भोजन में खुद को नहीं ढूंढ पा रही थीं। उस घटना ने मेरे भीतर एक सवाल जगा दिया जिसे मैं और टाल नहीं सकता था- महान स्वाद तय कौन करता है?’ वैश्विक पाक मानक विशेष इतिहास में विकसित हुए हैं। उन्होंने तकनीक, सटीकता और निरंतरता को महत्व दिया है और इसके लिए वे सम्मान के पात्र हैं, लेकिन वे हमेशा उन व्यंजनों की आत्मा को नहीं पकड़ पाते जो स्मृतियों और जीवन के अनुभवों से आकार लेते हैं। व्यंजन की सफलता सिर्फ स्टार्स या रैंकिंग से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान से आंकी जानी चाहिए- उन लोगों से जो उसमें खुद को देख पाते हैं। हर संस्कृति को एक सांचे में फिट करने के बजाय हमें दायरा बड़ा करना होगा, जहां उत्कृष्टता की कई परिभाषाएं साथ रह सकें। भोजन हमेशा जुड़ाव और हमारी पहचान का प्रतिबिंब रहा है; उसकी इस विविधता को स्वीकार करना ही उसकी सबसे बड़ी जीत है।’ भारतीय भोजन का अस्तित्व हमेशा से घरों, मंदिरों और लंगरों में रहा है। इसे किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं, बल्कि पोषण देने, सबको साथ लाने और घाव भरने के लिए बनाया गया था। पर विडंबना देखिए, लंबे समय तक दुनिया ने भारतीय भोजन को इन्हीं खूबियों की वजह से नजरअंदाज किया। मैंने भारत के कुलीनरी स्कूल में फ्रेंच सॉस और यूरोपीय तकनीकें सीखीं, जिसने अनुशासन और ढांचा दिया। परंतु मन तो भारतीय भोजन की गहराई की ओर खिंचा रहता था, जिसे सिखाया नहीं जाता बल्कि आत्मा से महसूस किया जाता है। उडुपी के कृष्ण मंदिर की अनानास-नारियल करी, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की दाल, पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मीठे चावल और मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर के मोदक… इन स्वादों ने मेरे भीतर कलिनेरी स्कूल की किसी भी सॉस से कहीं गहरी गूंज जगाई। जब सहपाठी यूरोपीय पाठ्यक्रम के तय रास्ते पर बढ़ रहे थे, मैं बार-बार उन्हीं स्वादों की ओर लौट रहा था, जिनके साथ मेरा बचपन और मेरी आत्मा जुड़ी रही। हमारे स्कूल की लाइब्रेरी की दीवार पश्चिमी शेफ की तस्वीरों से भरी थी, जिन्हें आदर्श मानने को कहा जाता था। मैंने एक बार पूछा था,‘यहां कोई मेरी तरह क्यों नहीं दिखता?’ जवाब था…‘क्योंकि दुनिया पर इन्हीं का नियंत्रण है।’ यही नियंत्रण तय करता है कि किस व्यंजन की अहमियत है और किसे कमतर माना जाए। इस तरह खाने-पीने के मामले में समाज में एक तरह का ऊंच-नीच का भेदभाव बन गया है। इसमें कुछ खास तरह के खान-पान (जैसे विदेशी या बड़े शहरों के पकवान) को ‘बेहतर और स्टैंडर्ड’ मान लिया जाता है, जबकि हमारे अपने स्थानीय या गांव-देहात के पारंपरिक खाने को ‘क्षेत्रीय’ कहकर उतना महत्व नहीं दिया जाता। नतीजा यह हुआ कि भोजन का एक ही ढांचा हावी हो गया और बाकी सबसे उसी में ढलने की उम्मीद की जाती रही। कुलीनरी स्कूल के बाद मैंने उसी सिस्टम में नाम कमाया। लगातार 6 बार ‘कुकिंग का ऑस्कर’ जीता, मास्टरशेफ इंडिया के जज रहे शेफ विकास खन्ना ने न्यूयॉर्क स्थित रेस्टोरेंट ‘जुनून’ के लिए लगातार 6 बार (6 साल) मिशेलिन स्टार हासिल किए। ये रेस्टोरेंट की दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान है, जिसे ‘कुकिंग का ऑस्कर’ भी कहा जाता है। विकास ने कोविड-19 के दौरान ‘Feed India’ नाम से दुनिया का सबसे बड़ा फूड ड्राइव चलाया, जिसके लिए उन्हें ‘एशिया गेम चेंजर अवॉर्ड’ से नवाजा गया। उन्होंने ‘मास्टरशेफ इंडिया’ को जज किया है और दर्जनों किताबें लिखी हैं। उनकी किताब ‘उत्सव’ दुनिया की सबसे महंगी और भारी किताबों में गिनी जाती है। 15-16 किलो वजनी इस किताब में 1200 पन्ने हैं। इसकी शुरुआती 12 प्रतियां बहुत खास थीं। इनमें एक प्रति 30 लाख रु. में नीलाम हुई थी, जिसके पैसे दान किए गए थे। इस किताब की एक प्रति का अंकित मूल्य 8 लाख रु. था।

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‘अमृतसर की गलियों में मेरा बचपन बीता और वहां मैंने एक बात सीखी- भोजन सिर्फ पकाया नहीं जाता, ‘अर्पित’ किया जाता है। मुझे याद है, मेरी दादी सुबह के धुंधलके में सहज प्रवृत्ति और अगाध श्रद्धा के साथ बड़े-बड़े पतीले चढ़ाती थीं। वे रसोईघर विलासिता या महंगी सामग्रियों से नहीं सजे थे, लेकिन वे सुंदर अनुष्ठानों और बेपनाह देखभाल से भरे हुए थे। मुझे मिशेलिन स्टार्स मिले, दुनियाभर में सराहना मिली, लेकिन इस दौड़ में मैं उस भोजन से दूर होता गया जिसने मुझे पहली पहचान दी थी। एक पल आज भी मुझे झकझोर देता है- मेरी मां मेरे रेस्त्रां में खाना खाने बैठी थीं और उन्होंने मेरे बनाए भोजन का एक ग्रास भी पसंद नहीं किया। वह बात मेरे मन में गहराई से घर कर गई। मैंने वर्षों उस उत्कृष्टता को पाने में लगाए थे जिसे दुनिया ने परिभाषित किया था, पर जिस व्यक्ति का मैं सबसे ज्यादा सम्मान करता था, वह मेरे भोजन में खुद को नहीं ढूंढ पा रही थीं। उस घटना ने मेरे भीतर एक सवाल जगा दिया जिसे मैं और टाल नहीं सकता था- महान स्वाद तय कौन करता है?’ वैश्विक पाक मानक विशेष इतिहास में विकसित हुए हैं। उन्होंने तकनीक, सटीकता और निरंतरता को महत्व दिया है और इसके लिए वे सम्मान के पात्र हैं, लेकिन वे हमेशा उन व्यंजनों की आत्मा को नहीं पकड़ पाते जो स्मृतियों और जीवन के अनुभवों से आकार लेते हैं। व्यंजन की सफलता सिर्फ स्टार्स या रैंकिंग से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान से आंकी जानी चाहिए- उन लोगों से जो उसमें खुद को देख पाते हैं। हर संस्कृति को एक सांचे में फिट करने के बजाय हमें दायरा बड़ा करना होगा, जहां उत्कृष्टता की कई परिभाषाएं साथ रह सकें। भोजन हमेशा जुड़ाव और हमारी पहचान का प्रतिबिंब रहा है; उसकी इस विविधता को स्वीकार करना ही उसकी सबसे बड़ी जीत है।’ भारतीय भोजन का अस्तित्व हमेशा से घरों, मंदिरों और लंगरों में रहा है। इसे किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं, बल्कि पोषण देने, सबको साथ लाने और घाव भरने के लिए बनाया गया था। पर विडंबना देखिए, लंबे समय तक दुनिया ने भारतीय भोजन को इन्हीं खूबियों की वजह से नजरअंदाज किया। मैंने भारत के कुलीनरी स्कूल में फ्रेंच सॉस और यूरोपीय तकनीकें सीखीं, जिसने अनुशासन और ढांचा दिया। परंतु मन तो भारतीय भोजन की गहराई की ओर खिंचा रहता था, जिसे सिखाया नहीं जाता बल्कि आत्मा से महसूस किया जाता है। उडुपी के कृष्ण मंदिर की अनानास-नारियल करी, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की दाल, पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मीठे चावल और मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर के मोदक… इन स्वादों ने मेरे भीतर कलिनेरी स्कूल की किसी भी सॉस से कहीं गहरी गूंज जगाई। जब सहपाठी यूरोपीय पाठ्यक्रम के तय रास्ते पर बढ़ रहे थे, मैं बार-बार उन्हीं स्वादों की ओर लौट रहा था, जिनके साथ मेरा बचपन और मेरी आत्मा जुड़ी रही। हमारे स्कूल की लाइब्रेरी की दीवार पश्चिमी शेफ की तस्वीरों से भरी थी, जिन्हें आदर्श मानने को कहा जाता था। मैंने एक बार पूछा था,‘यहां कोई मेरी तरह क्यों नहीं दिखता?’ जवाब था…‘क्योंकि दुनिया पर इन्हीं का नियंत्रण है।’ यही नियंत्रण तय करता है कि किस व्यंजन की अहमियत है और किसे कमतर माना जाए। इस तरह खाने-पीने के मामले में समाज में एक तरह का ऊंच-नीच का भेदभाव बन गया है। इसमें कुछ खास तरह के खान-पान (जैसे विदेशी या बड़े शहरों के पकवान) को ‘बेहतर और स्टैंडर्ड’ मान लिया जाता है, जबकि हमारे अपने स्थानीय या गांव-देहात के पारंपरिक खाने को ‘क्षेत्रीय’ कहकर उतना महत्व नहीं दिया जाता। नतीजा यह हुआ कि भोजन का एक ही ढांचा हावी हो गया और बाकी सबसे उसी में ढलने की उम्मीद की जाती रही। कुलीनरी स्कूल के बाद मैंने उसी सिस्टम में नाम कमाया। लगातार 6 बार ‘कुकिंग का ऑस्कर’ जीता, मास्टरशेफ इंडिया के जज रहे शेफ विकास खन्ना ने न्यूयॉर्क स्थित रेस्टोरेंट ‘जुनून’ के लिए लगातार 6 बार (6 साल) मिशेलिन स्टार हासिल किए। ये रेस्टोरेंट की दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान है, जिसे ‘कुकिंग का ऑस्कर’ भी कहा जाता है। विकास ने कोविड-19 के दौरान ‘Feed India’ नाम से दुनिया का सबसे बड़ा फूड ड्राइव चलाया, जिसके लिए उन्हें ‘एशिया गेम चेंजर अवॉर्ड’ से नवाजा गया। उन्होंने ‘मास्टरशेफ इंडिया’ को जज किया है और दर्जनों किताबें लिखी हैं। उनकी किताब ‘उत्सव’ दुनिया की सबसे महंगी और भारी किताबों में गिनी जाती है। 15-16 किलो वजनी इस किताब में 1200 पन्ने हैं। इसकी शुरुआती 12 प्रतियां बहुत खास थीं। इनमें एक प्रति 30 लाख रु. में नीलाम हुई थी, जिसके पैसे दान किए गए थे। इस किताब की एक प्रति का अंकित मूल्य 8 लाख रु. था।

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