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ओटीटी रिव्यू: प्रीतम एंड पेड्रो:दमदार स्टारकास्ट, दिलचस्प कॉन्सेप्ट… लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले फीका कर गया राजकुमार हिरानी का OTT डेब्यू

ओटीटी रिव्यू: प्रीतम एंड पेड्रो:दमदार स्टारकास्ट, दिलचस्प कॉन्सेप्ट... लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले फीका कर गया राजकुमार हिरानी का OTT डेब्यू

जब किसी प्रोजेक्ट से राजकुमार हिरानी का नाम जुड़ता है तो उम्मीदें बढ़ना स्वाभाविक है। अरशद वारसी, विक्रांत मैसी, बोमन ईरानी और मोना सिंह जैसे कलाकार हों तो बेहतरीन क्राइम-कॉमेडी की आस और मजबूत हो जाती है। जियोहॉटस्टार पर रिलीज हुई ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ साइबर क्राइम जैसे समकालीन विषय को कॉमेडी, थ्रिल और इमोशन के साथ पेश करने की कोशिश करती है। कॉन्सेप्ट दिलचस्प और स्टारकास्ट दमदार है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और धीमी रफ्तार के कारण सीरीज अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाती। 6 एपिसोड की इस सीरीज को दैनिक भास्कर ने 5 में से 2.5 स्टार दिए हैं। सीरीज की कहानी कैसी है? ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ की कहानी गोवा में सेट है। पेड्रो गोंसाल्वेस (अरशद वारसी) पुराने ख्यालों वाला अनुभवी पुलिस अफसर है, जो अपराधियों को पकड़ने में माहिर है, लेकिन तकनीक और साइबर दुनिया से उसकी ज्यादा दोस्ती नहीं है। एक घटना के बाद उसका तबादला साइबर सेल में होता है, जहां उसकी मुलाकात युवा और टेक-सेवी अधिकारी प्रीतम पार्कर (वीर हिरानी) से होती है। दोनों की कार्यशैली बिल्कुल अलग है। पेड्रो अनुभव और जमीनी जांच पर भरोसा करता है, जबकि प्रीतम डेटा, हैकिंग और डिजिटल तकनीक के जरिए अपराध सुलझाता है। इसी बीच उन्हें मंत्री के बेटे के अपहरण और एक हाई-प्रोफाइल साइबर क्राइम की गुत्थी सुलझाने की जिम्मेदारी मिलती है। जांच के साथ ऑनलाइन फ्रॉड, हैकिंग और डिजिटल स्कैम की परतें खुलती हैं, वहीं दोनों किरदारों की निजी जिंदगी और भावनात्मक संघर्ष को भी कहानी में जोड़ा गया है। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? अरशद वारसी पूरी सीरीज की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनका सहज अभिनय, शानदार कॉमिक टाइमिंग और स्क्रीन प्रेजेंस कई कमजोर दृश्यों को भी संभाल लेती है। राजकुमार हिरानी के बेटे वीर हिरानी इस सीरीज से बतौर लीड एक्टर डेब्यू कर रहे हैं। उन्होंने ईमानदारी से किरदार निभाया है। कई दृश्यों में उनका आत्मविश्वास दिखता है, लेकिन भावनात्मक हिस्सों में अनुभव की कमी महसूस होती है। शुरुआत के लिहाज से उनका प्रदर्शन संतोषजनक है। विक्रांत मैसी सीमित स्क्रीन टाइम में भी प्रभाव छोड़ते हैं। मोना सिंह, बोमन ईरानी, सत्यदीप मिश्रा और श्रुति मराठे अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें ज्यादा अवसर नहीं देती। डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष कैसा है? निर्देशक अविनाश अरुण ने इससे पहले ‘थ्री ऑफ अस’ और ‘पाताल लोक’ जैसी बेहतरीन कृतियां दी हैं। ऐसे में उनसे उम्मीदें ज्यादा थीं, लेकिन इस बार वह कहानी की पकड़ बनाए रखने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाए। निर्देशन में राजकुमार हिरानी की फिल्मों वाला हल्का-फुल्का ह्यूमर और मानवीय स्पर्श जरूर नजर आता है। हालांकि सबसे बड़ी कमजोरी इसकी राइटिंग और स्क्रीनप्ले है। राजकुमार हिरानी, अभिजात जोशी, सुयश त्रिवेदी और अमित दुबे की लिखी कहानी का विषय प्रासंगिक है, लेकिन कई एपिसोड अनावश्यक रूप से लंबे लगते हैं। थ्रिल लगातार नहीं बनता और इमोशनल सीन भी अपेक्षित असर नहीं छोड़ते। अंत तक सीरीज मनोरंजक तो रहती है, लेकिन यादगार नहीं बनती। तकनीकी रूप से सीरीज मजबूत है। गोवा की लोकेशंस, सिनेमैटोग्राफी, कैमरा वर्क और प्रोडक्शन वैल्यू प्रभावित करते हैं। साइबर क्राइम से जुड़े विजुअल्स भी विश्वसनीय लगते हैं, लेकिन मजबूत तकनीकी पक्ष कमजोर लेखन की भरपाई नहीं कर पाता। म्यूजिक कैसा है? राजकुमार हिरानी के प्रोजेक्ट्स में संगीत हमेशा एक अहम भूमिका निभाता रहा है। ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ में भी कुछ गाने शामिल किए गए हैं। शांतनु मोइत्रा का संगीत और स्वानंद किरकिरे के गीत कहानी के साथ मेल खाते हैं। श्रेया घोषाल की आवाज में रेट्रो अंदाज वाला गीत सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन कोई भी गाना लंबे समय तक याद नहीं रहता। बैकग्राउंड स्कोर कई जगह सस्पेंस पैदा करता है, लेकिन कहानी की धीमी रफ्तार और कमजोर थ्रिल के कारण उसका असर सीमित रह जाता है। फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं? अगर आप अरशद वारसी के फैन हैं या साइबर क्राइम पर हल्के-फुल्के अंदाज की सीरीज देखना चाहते हैं, तो ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ एक बार देख सकते हैं। लेकिन अगर आप राजकुमार हिरानी के नाम से उनकी फिल्मों जैसा दमदार लेखन, गहरे इमोशन और यादगार मनोरंजन की उम्मीद करेंगे, तो यह सीरीज निराश कर सकती है।

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