Friday, 25 Sep 2026 | 02:08 PM

Trending :

EXCLUSIVE

'द वन'- मूवी रिव्यू:वन देवी की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्य से भरी कहानी, जंगल में छिपा है कौन सा राज?

'द वन'- मूवी रिव्यू:वन देवी की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्य से भरी कहानी, जंगल में छिपा है कौन सा राज?

हमारे देश में कहानियों की कोई कमी नहीं है, कमी है उन्हें बड़े पर्दे पर नए अंदाज में सुनाने की। ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ बिहार की मिट्टी से निकली ऐसी ही एक लोककथा को लेकर आती है, जहां वन देवी, रहस्यमयी जंगल, छठी मइया की आस्था और इंसान की अपनी सोच आमने-सामने आती है। फिल्म की शुरुआत जितनी दिलचस्पी जगाती है, उतना ही सवाल भी छोड़ती है कि जंगल के अंदर आखिर है क्या? अच्छी बात यह है कि फिल्म काफी देर तक इस सवाल को जिंदा रखती है, बस बाद में जब जवाब मिलने शुरू होते हैं तो कुछ रहस्य उतने रहस्यमयी नहीं रह जाते। फिल्म की कहानी कैसी है कहानी ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) की है, जो अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ बिहार के पुश्तैनी गांव आता है। शहर में पले ऋषि के लिए गांव और उसकी मान्यताएं पुरानी सोच का हिस्सा हैं। दोनों का अपना पारिवारिक दर्द भी है और छठ के लिए घर लौटने का रिश्ता भी। गांव के पास एक जंगल है, जिसके बीच वन देवी का मंदिर है। स्थानीय लोककथा के मुताबिक सूर्यास्त के बाद इस जंगल में जाना मना है। फिल्म की प्रेरणा बिहार के बिहटा स्थित वन देवी मंदिर से जुड़ी इसी लोककथा से ली गई है, जहां जंगल और देवी को लेकर पीढ़ियों से कई मान्यताएं चली आ रही हैं। ऋषि इन बातों को नहीं मानता। इसी बीच जंगल को लेकर विकास और प्रकृति के बीच खींचतान सामने आती है, लेकिन जब ऋषि जंगल में पहुंचता है और एक पुरानी मुहर टूटने के बाद अलौकिक ताकत जागती है, तब उसकी अपनी सोच भी सवालों के घेरे में आ जाती है। पहला हिस्सा यहीं सबसे ज्यादा पकड़ बनाता है। गांव का माहौल, रिश्ते, हल्का हास्य और जंगल का रहस्य साथ-साथ चलते हैं। लेकिन दूसरे हिस्से में कहानी प्रकृति और जमीन के सवाल से निकलकर सीधे अच्छाई बनाम बुराई की बड़ी लड़ाई की तरफ बढ़ जाती है। इससे शुरुआत में बना वह जमीन से जुड़ा संघर्ष थोड़ा पीछे छूटता है। कहानी में विचार कम नहीं हैं, बस कुछ विचारों को पूरी तरह खुलने का मौका नहीं मिलता। फिल्म में एक्टिंग कैसी है सिद्धार्थ मल्होत्रा ऋषि के किरदार में एक्शन के साथ भावनात्मक बदलाव भी संभालते हैं। उनका अविश्वास धीरे-धीरे विश्वास में बदलता है, हालांकि इस बदलाव को थोड़ा और समय मिलता तो किरदार और गहराता। तमन्ना भाटिया सहज लगती हैं और सिद्धार्थ के साथ उनकी पति-पत्नी वाली केमिस्ट्री फिल्म के फैंटेसी हिस्से को मानवीय आधार देती है। उनके किरदार में संभावनाएं हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें पूरी तरह इस्तेमाल नहीं करता। सुनील ग्रोवर फिल्म का अच्छा सरप्राइज हैं। गंभीर किरदार में उनका अंदाज अलग लगता है और उनकी कहानी खुलने के साथ उत्सुकता बढ़ती है। मनीष पॉल पहले हिस्से में हंसी और हल्कापन लाते हैं। श्वेता तिवारी और अनूप सोनी भी अपने किरदारों में ठीक बैठते हैं। फिल्म का निर्देशन कैसा है निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उन्होंने बिहार की एक कम सुनी गई लोककथा को सिर्फ डर की कहानी नहीं बनाया। इसमें परिवार है, प्रकृति है, आस्था है, विकास का सवाल है और फैंटेसी भी है। दिक्कत बस यही है कि इतनी सारी चीजों को साथ लेकर चलने की कोशिश में स्क्रीनप्ले कभी-कभी खुद अपनी रफ्तार से आगे निकल जाता है। शुरुआत में जो रहस्य धीरे-धीरे बनता है, बाद में उसके कई जवाब जल्दी मिल जाते हैं। कुछ चीजें अगर थोड़ी देर और छिपी रहतीं तो जंगल का रोमांच और टिक सकता था। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की बड़ी ताकत है। जंगल की हरियाली, धुंध, अंधेरा और रोशनी मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं कि कई बार जंगल खुद कहानी का किरदार लगता है। प्रोडक्शन डिजाइन में बिहार की मिट्टी और गांव की पहचान बनी रहती है। रहस्यमयी जीवों और पुराने घटनाक्रम को समझाने वाला एनीमेशन भी फिल्म का दिलचस्प प्रयोग है। वीएफएक्स में पैमाना बड़ा रखा गया है। कुछ दृश्य शानदार लगते हैं, जबकि कुछ जगह कंप्यूटर से बने हिस्से उतने सहज नहीं बैठते। बड़े पर्दे पर फिल्म का स्केल जरूर दिखाई देता है। फिल्म का म्यूजिक कैसा है ‘समझो ना’ कहानी के रोमांटिक हिस्से को जगह देता है, जबकि ‘ठुमक ठुमक’ माहौल में मस्ती भरता है। लेकिन सबसे ज्यादा फिल्म की जड़ों से जुड़ता है ‘छठी मइया’। छठ के घाट, अर्घ्य और भक्ति वाला माहौल फिल्म को बिहार की संस्कृति से जोड़ता है। हां, यहां सिनेमा ने अपनी थोड़ी आजादी भी ली है—कुछ दृश्य असली छठ की सादगी से ज्यादा फिल्मी और सजाए हुए लगते हैं। असल छठ चार दिन की साधना, व्रत, अनुशासन और डूबते-उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा पर टिका है; फिल्म उसका भाव पकड़ती है, हर बारीकी नहीं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘द वन’ एक देसी फैंटेसी एडवेंचर है, जो बिहार की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्यमयी जंगल को अपनी दुनिया का आधार बनाती है। फिल्म का माहौल, सिनेमैटोग्राफी और कलाकार इसे देखने लायक बनाते हैं। दूसरे हिस्से में कहानी कुछ जानी-पहचानी राह पकड़ती है, लेकिन अपनी मिट्टी से जुड़ी दुनिया और बड़े पर्दे का स्केल इसका असर बनाए रखते हैं। रास्ता हर जगह बराबर मजबूत नहीं है, लेकिन ‘द वन’ की दुनिया में कदम रखना एक दिलचस्प सिनेमाई अनुभव जरूर है।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
नर्मदापुरम में 4.22 करोड़ की मूंग हेराफेरी में FIR:वेयरहाउस संचालिका, रिश्तेदार और चौकीदार बने आरोपी, ताला बदलकर गायब की 9899 बोरी मूंग

February 20, 2026/
9:26 pm

नर्मदापुरम जिले के माखननगर के एकलव्य वेयरहाउस से गायब 9899 बोरी सरकारी मूंग मामले में आखिरकार शुक्रवार को एफआईआर हो...

ask search icon

April 16, 2026/
4:55 pm

Last Updated:April 16, 2026, 16:55 IST प्रकृति ने हमें कई ऐसी जड़ी-बूटियां दी हैं, जो बिना दवा के ही कई...

Summer Healthy Diet Plan Foods List; Nutrition Tips

May 15, 2026/
4:30 am

23 मिनट पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल कॉपी लिंक गर्मियों में शरीर की जरूरतें बदल जाती हैं। तेज धूप के कारण पसीने...

फिल्म एक दिन का ट्रेलर रिलीज:साई पल्लवी-जुनैद खान के बीच दिखी इमोशनल केमिस्ट्री, कहानी में जापान में आया ट्विस्ट

April 16, 2026/
2:35 pm

आमिर खान प्रोडक्शन्स की फिल्म एक दिन का दूसरा ट्रेलर गुरुवार को रिलीज हुआ। फिल्म में साई पल्लवी और जुनैद...

राजनीति

'द वन'- मूवी रिव्यू:वन देवी की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्य से भरी कहानी, जंगल में छिपा है कौन सा राज?

'द वन'- मूवी रिव्यू:वन देवी की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्य से भरी कहानी, जंगल में छिपा है कौन सा राज?

हमारे देश में कहानियों की कोई कमी नहीं है, कमी है उन्हें बड़े पर्दे पर नए अंदाज में सुनाने की। ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ बिहार की मिट्टी से निकली ऐसी ही एक लोककथा को लेकर आती है, जहां वन देवी, रहस्यमयी जंगल, छठी मइया की आस्था और इंसान की अपनी सोच आमने-सामने आती है। फिल्म की शुरुआत जितनी दिलचस्पी जगाती है, उतना ही सवाल भी छोड़ती है कि जंगल के अंदर आखिर है क्या? अच्छी बात यह है कि फिल्म काफी देर तक इस सवाल को जिंदा रखती है, बस बाद में जब जवाब मिलने शुरू होते हैं तो कुछ रहस्य उतने रहस्यमयी नहीं रह जाते। फिल्म की कहानी कैसी है कहानी ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) की है, जो अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ बिहार के पुश्तैनी गांव आता है। शहर में पले ऋषि के लिए गांव और उसकी मान्यताएं पुरानी सोच का हिस्सा हैं। दोनों का अपना पारिवारिक दर्द भी है और छठ के लिए घर लौटने का रिश्ता भी। गांव के पास एक जंगल है, जिसके बीच वन देवी का मंदिर है। स्थानीय लोककथा के मुताबिक सूर्यास्त के बाद इस जंगल में जाना मना है। फिल्म की प्रेरणा बिहार के बिहटा स्थित वन देवी मंदिर से जुड़ी इसी लोककथा से ली गई है, जहां जंगल और देवी को लेकर पीढ़ियों से कई मान्यताएं चली आ रही हैं। ऋषि इन बातों को नहीं मानता। इसी बीच जंगल को लेकर विकास और प्रकृति के बीच खींचतान सामने आती है, लेकिन जब ऋषि जंगल में पहुंचता है और एक पुरानी मुहर टूटने के बाद अलौकिक ताकत जागती है, तब उसकी अपनी सोच भी सवालों के घेरे में आ जाती है। पहला हिस्सा यहीं सबसे ज्यादा पकड़ बनाता है। गांव का माहौल, रिश्ते, हल्का हास्य और जंगल का रहस्य साथ-साथ चलते हैं। लेकिन दूसरे हिस्से में कहानी प्रकृति और जमीन के सवाल से निकलकर सीधे अच्छाई बनाम बुराई की बड़ी लड़ाई की तरफ बढ़ जाती है। इससे शुरुआत में बना वह जमीन से जुड़ा संघर्ष थोड़ा पीछे छूटता है। कहानी में विचार कम नहीं हैं, बस कुछ विचारों को पूरी तरह खुलने का मौका नहीं मिलता। फिल्म में एक्टिंग कैसी है सिद्धार्थ मल्होत्रा ऋषि के किरदार में एक्शन के साथ भावनात्मक बदलाव भी संभालते हैं। उनका अविश्वास धीरे-धीरे विश्वास में बदलता है, हालांकि इस बदलाव को थोड़ा और समय मिलता तो किरदार और गहराता। तमन्ना भाटिया सहज लगती हैं और सिद्धार्थ के साथ उनकी पति-पत्नी वाली केमिस्ट्री फिल्म के फैंटेसी हिस्से को मानवीय आधार देती है। उनके किरदार में संभावनाएं हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें पूरी तरह इस्तेमाल नहीं करता। सुनील ग्रोवर फिल्म का अच्छा सरप्राइज हैं। गंभीर किरदार में उनका अंदाज अलग लगता है और उनकी कहानी खुलने के साथ उत्सुकता बढ़ती है। मनीष पॉल पहले हिस्से में हंसी और हल्कापन लाते हैं। श्वेता तिवारी और अनूप सोनी भी अपने किरदारों में ठीक बैठते हैं। फिल्म का निर्देशन कैसा है निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उन्होंने बिहार की एक कम सुनी गई लोककथा को सिर्फ डर की कहानी नहीं बनाया। इसमें परिवार है, प्रकृति है, आस्था है, विकास का सवाल है और फैंटेसी भी है। दिक्कत बस यही है कि इतनी सारी चीजों को साथ लेकर चलने की कोशिश में स्क्रीनप्ले कभी-कभी खुद अपनी रफ्तार से आगे निकल जाता है। शुरुआत में जो रहस्य धीरे-धीरे बनता है, बाद में उसके कई जवाब जल्दी मिल जाते हैं। कुछ चीजें अगर थोड़ी देर और छिपी रहतीं तो जंगल का रोमांच और टिक सकता था। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की बड़ी ताकत है। जंगल की हरियाली, धुंध, अंधेरा और रोशनी मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं कि कई बार जंगल खुद कहानी का किरदार लगता है। प्रोडक्शन डिजाइन में बिहार की मिट्टी और गांव की पहचान बनी रहती है। रहस्यमयी जीवों और पुराने घटनाक्रम को समझाने वाला एनीमेशन भी फिल्म का दिलचस्प प्रयोग है। वीएफएक्स में पैमाना बड़ा रखा गया है। कुछ दृश्य शानदार लगते हैं, जबकि कुछ जगह कंप्यूटर से बने हिस्से उतने सहज नहीं बैठते। बड़े पर्दे पर फिल्म का स्केल जरूर दिखाई देता है। फिल्म का म्यूजिक कैसा है ‘समझो ना’ कहानी के रोमांटिक हिस्से को जगह देता है, जबकि ‘ठुमक ठुमक’ माहौल में मस्ती भरता है। लेकिन सबसे ज्यादा फिल्म की जड़ों से जुड़ता है ‘छठी मइया’। छठ के घाट, अर्घ्य और भक्ति वाला माहौल फिल्म को बिहार की संस्कृति से जोड़ता है। हां, यहां सिनेमा ने अपनी थोड़ी आजादी भी ली है—कुछ दृश्य असली छठ की सादगी से ज्यादा फिल्मी और सजाए हुए लगते हैं। असल छठ चार दिन की साधना, व्रत, अनुशासन और डूबते-उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा पर टिका है; फिल्म उसका भाव पकड़ती है, हर बारीकी नहीं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘द वन’ एक देसी फैंटेसी एडवेंचर है, जो बिहार की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्यमयी जंगल को अपनी दुनिया का आधार बनाती है। फिल्म का माहौल, सिनेमैटोग्राफी और कलाकार इसे देखने लायक बनाते हैं। दूसरे हिस्से में कहानी कुछ जानी-पहचानी राह पकड़ती है, लेकिन अपनी मिट्टी से जुड़ी दुनिया और बड़े पर्दे का स्केल इसका असर बनाए रखते हैं। रास्ता हर जगह बराबर मजबूत नहीं है, लेकिन ‘द वन’ की दुनिया में कदम रखना एक दिलचस्प सिनेमाई अनुभव जरूर है।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.