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Kharg Island Trump Military Plan; Iran Oil Export Hub

Kharg Island Trump Military Plan; Iran Oil Export Hub

तेहरान1 मिनट पहले

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अमेरिका, इजराइल और ईरान में जारी जंग के बीच होर्मुज स्ट्रेट के पास मौजूद खार्ग आइलैंड की अहमियत अचानक बढ़ गई है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ट्रम्प सरकार इस आइलैंड पर कब्जे को लेकर सैन्य विकल्पों पर विचार कर रही है, क्योंकि यह ईरान की तेल कमाई का सबसे बड़ा सेंटर माना जाता है।

दरअसल ईरान के करीब 80 से 90% कच्चे तेल का निर्यात इसी आइलैंड से होता है। यहां बड़े तेल टर्मिनल, पाइपलाइन, स्टोरेज टैंक और जहाजों में तेल भरने की फैसिलिटी मौजूद हैं।

इस टर्मिनल से हर दिन करीब 70 लाख बैरल तक तेल जहाजों में भरा जा सकता है। 1960 के दशक में विदेशी निवेश के बाद इस जगह को बड़े ऑयल एक्सपोर्ट सेंटर के तौर पर डेवलप किया गया था और तब से यह ईरान की ऑयल सप्लाई की रीढ़ बन गया।

हडसन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो माइकल डोरान ने कहा कि ट्रम्प सरकार युद्ध के बाद भी ईरान की पूरी अर्थव्यवस्था को तबाह नहीं करना चाहती। इसलिए कुछ अहम ठिकानों पर हमला नहीं करना अमेरिका की पुरानी ‘रेड लाइन’ रहा है।

डोरान के मुताबिक अगर इन जगहों पर हमला हुआ, तो ईरान बड़े पैमाने पर जवाबी हमला कर सकता है, जिससे तीसरे विश्व युद्ध जैसे हालात बन सकते हैं।

जंग के बीच भी जारी है तेल निर्यात

अमेरिका और इजराइल ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों और न्यूक्लियर फैसिलिटी को निशाना बनाया है, लेकिन खार्ग आइलैंड पर अब तक हमला नहीं हुआ है। सैटेलाइट डेटा और जहाजों की निगरानी करने वाली कंपनियों के मुताबिक जंग जारी होने के बावजूद ईरान यहां से लगातार तेल निर्यात कर रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक 28 फरवरी से अब तक करीब 1.2 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल टैंकरों के जरिए बाहर भेजा गया है। असली आंकड़ा इससे ज्यादा भी हो सकता है क्योंकि ईरान के कई जहाज अपनी ट्रैकिंग सिस्टम बंद करके चलते हैं।

डार्क फ्लीट से भेजा जा रहा तेल

ईरान कई बार ऐसे टैंकरों का इस्तेमाल करता है जिन्हें डार्क फ्लीट कहा जाता है। ये जहाज अपनी लोकेशन दिखाने वाली ट्रैकिंग मशीन बंद कर देते हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। खार्ग आइलैंड फारस की खाड़ी में ईरान के तट से करीब 25 से 30 किलोमीटर दूर स्थित है।

हाल ही में एक बड़ा तेल टैंकर होर्मुज स्ट्रेट पार करते समय कुछ समय के लिए ट्रैकिंग से गायब हो गया था और बाद में फिर दिखाई दिया। रिपोर्ट्स में कहा गया कि वह जहाज एशिया की ओर जा रहा था ।

खार्ग आइलैंड के पास दुनिया के अहम तेल रास्ते

खार्ग आइलैंड स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बेहद करीब है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है। दुनिया का करीब 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है। अगर इस इलाके में हमला होता है या जहाजों की आवाजाही रुकती है तो पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी प्रशासन इस बात पर विचार कर रहा है कि अगर खार्ग आइलैंड के तेल टर्मिनल को तबाह कर दिया जाए या उस पर कब्जा कर लिया जाए, तो ईरान की सबसे बड़ी आय बंद हो सकती है।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि तेल की बिक्री से मिलने वाला पैसा ईरान की सरकार और उसकी सैन्य ताकत के लिए सबसे बड़ा आर्थिक सहारा है। अगर यह कमाई रुक जाती है तो ईरान के लिए लंबे समय तक युद्ध जारी रखना मुश्किल हो सकता है।

हमला हुआ तो क्या असर होगा

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर खार्ग आइलैंड पर हमला हुआ तो इसके दो बड़े असर हो सकते हैं:

  • ईरान की तेल से होने वाली कमाई अचानक गिर सकती है
  • दुनिया भर में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं

कुछ अनुमानों के मुताबिक अगर यहां से सप्लाई रुकती है तो तेल की कीमत प्रति बैरल करीब 10 डॉलर तक बढ़ सकती है।

ईरान की तेल उत्पादन क्षमता

इस समय ईरान करीब 33 लाख बैरल कच्चा तेल का प्रोडक्शन करता है। इसके अलावा लगभग 13 लाख बैरल कंडेन्सेट और अन्य लिक्विड ईंधन का भी प्रोडक्शन करता है है। इस तरह कुल ग्लोबल एनर्जी सप्लाई का 4.5% हिस्सा ईरान से आता है।

ईरान के बड़े तेल क्षेत्र जैसे अहवाज, मरून और गचसरान से पाइपलाइन सीधे खार्ग आइलैंड तक आती हैं। यहां तेल को बड़े स्टोरेज टैंकों में रखा जाता है और फिर टैंकर जहाजों में भरकर दुनिया के अलग-अलग देशों में भेजा जाता है।

आइलैंड पर करीब 3 करोड़ बैरल तेल स्टोर करने की क्षमता है। फिलहाल अनुमान है कि यहां लगभग 1.8 करोड़ बैरल तेल स्टोरेज में मौजूद है, जो सामान्य हालात में 10 से 12 दिन के निर्यात के बराबर है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जंग शुरू होने से ठीक पहले ईरान ने खार्ग आइलैंड से ऑयल एक्सपोर्ट तेजी से बढ़ा दिया था।

15 से 20 फरवरी के बीच तेल निर्यात 30 लाख बैरल प्रतिदिन से ज्यादा हो गया था, जो सामान्य से लगभग तीन गुना था। माना जा रहा है कि ईरान ने युद्ध शुरू होने से पहले ज्यादा से ज्यादा तेल बाहर भेजने की कोशिश की।

ईरान-इराक वॉर में इस आइलैंड पर हमला हुआ था

खार्ग आइलैंड पहले भी कई बार रणनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है। 1979 के ईरान बंधक संकट के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर को सलाह दी गई थी कि इस आइलैंड पर कब्जा कर लिया जाए, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

1980 के दशक में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के समय अमेरिका ने ईरान की कुछ अन्य तेल सुविधाओं पर हमला किया था, लेकिन खार्ग आइलैंड को निशाना नहीं बनाया गया।

हालांकि ईरान-इराक वॉर के दौरान इराकी हमलों में इस आइलैंड के तेल टर्मिनल को भारी नुकसान पहुंचा था, लेकिन बाद में ईरान ने इसे दोबारा बना लिया।

अभी तक हमला क्यों नहीं किया गया

एक्सपर्ट्स का कहना है कि खार्ग आइलैंड पर हमला करने से दुनिया भर के तेल बाजार में बड़ा संकट पैदा हो सकता है। तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं, जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है और खाड़ी क्षेत्र में युद्ध और फैल सकता है।

यही वजह है कि अभी तक अमेरिका और उसके सहयोगी देश पहले ईरान की सैन्य और न्यूक्लियर कैपिसिटी को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

इसलिए फिलहाल यह छोटा सा आइलैंड सीधे युद्ध का मैदान नहीं बना है, लेकिन आने वाले समय में जंग की दिशा तय करने में इसकी बड़ी भूमिका हो सकती है।

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ईरान बोला- इजराइल-अमेरिका के राजदूतों को निकाले:तभी होर्मुज स्ट्रेट से उनके जहाज गुजरने देंगे; टैक्स वसूलने की शर्त भी रखी

अमेरिका-इजराइल और ईरान जंग का 11वां दिन हैं। इस बीच ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों के गुजरने को लेकर एक नई शर्त रखी है।

इजराइली मीडिया वाइनेट की रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की सेना इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा है कि कुछ देशों के जहाजों को इस रास्ते से गुजरने दिया जा सकता है, लेकिन इसके लिए उन देशों को पहले इजराइल और अमेरिका के राजदूतों को अपने देश से निकालना होगा। पढ़ें पूरी खबर

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दरअसल ईरान के करीब 80 से 90% कच्चे तेल का निर्यात इसी आइलैंड से होता है। यहां बड़े तेल टर्मिनल, पाइपलाइन, स्टोरेज टैंक और जहाजों में तेल भरने की फैसिलिटी मौजूद हैं।

इस टर्मिनल से हर दिन करीब 70 लाख बैरल तक तेल जहाजों में भरा जा सकता है। 1960 के दशक में विदेशी निवेश के बाद इस जगह को बड़े ऑयल एक्सपोर्ट सेंटर के तौर पर डेवलप किया गया था और तब से यह ईरान की ऑयल सप्लाई की रीढ़ बन गया।

हडसन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो माइकल डोरान ने कहा कि ट्रम्प सरकार युद्ध के बाद भी ईरान की पूरी अर्थव्यवस्था को तबाह नहीं करना चाहती। इसलिए कुछ अहम ठिकानों पर हमला नहीं करना अमेरिका की पुरानी ‘रेड लाइन’ रहा है।

डोरान के मुताबिक अगर इन जगहों पर हमला हुआ, तो ईरान बड़े पैमाने पर जवाबी हमला कर सकता है, जिससे तीसरे विश्व युद्ध जैसे हालात बन सकते हैं।

जंग के बीच भी जारी है तेल निर्यात

अमेरिका और इजराइल ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों और न्यूक्लियर फैसिलिटी को निशाना बनाया है, लेकिन खार्ग आइलैंड पर अब तक हमला नहीं हुआ है। सैटेलाइट डेटा और जहाजों की निगरानी करने वाली कंपनियों के मुताबिक जंग जारी होने के बावजूद ईरान यहां से लगातार तेल निर्यात कर रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक 28 फरवरी से अब तक करीब 1.2 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल टैंकरों के जरिए बाहर भेजा गया है। असली आंकड़ा इससे ज्यादा भी हो सकता है क्योंकि ईरान के कई जहाज अपनी ट्रैकिंग सिस्टम बंद करके चलते हैं।

डार्क फ्लीट से भेजा जा रहा तेल

ईरान कई बार ऐसे टैंकरों का इस्तेमाल करता है जिन्हें डार्क फ्लीट कहा जाता है। ये जहाज अपनी लोकेशन दिखाने वाली ट्रैकिंग मशीन बंद कर देते हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। खार्ग आइलैंड फारस की खाड़ी में ईरान के तट से करीब 25 से 30 किलोमीटर दूर स्थित है।

हाल ही में एक बड़ा तेल टैंकर होर्मुज स्ट्रेट पार करते समय कुछ समय के लिए ट्रैकिंग से गायब हो गया था और बाद में फिर दिखाई दिया। रिपोर्ट्स में कहा गया कि वह जहाज एशिया की ओर जा रहा था ।

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खार्ग आइलैंड स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बेहद करीब है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है। दुनिया का करीब 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है। अगर इस इलाके में हमला होता है या जहाजों की आवाजाही रुकती है तो पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी प्रशासन इस बात पर विचार कर रहा है कि अगर खार्ग आइलैंड के तेल टर्मिनल को तबाह कर दिया जाए या उस पर कब्जा कर लिया जाए, तो ईरान की सबसे बड़ी आय बंद हो सकती है।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि तेल की बिक्री से मिलने वाला पैसा ईरान की सरकार और उसकी सैन्य ताकत के लिए सबसे बड़ा आर्थिक सहारा है। अगर यह कमाई रुक जाती है तो ईरान के लिए लंबे समय तक युद्ध जारी रखना मुश्किल हो सकता है।

हमला हुआ तो क्या असर होगा

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर खार्ग आइलैंड पर हमला हुआ तो इसके दो बड़े असर हो सकते हैं:

  • ईरान की तेल से होने वाली कमाई अचानक गिर सकती है
  • दुनिया भर में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं

कुछ अनुमानों के मुताबिक अगर यहां से सप्लाई रुकती है तो तेल की कीमत प्रति बैरल करीब 10 डॉलर तक बढ़ सकती है।

ईरान की तेल उत्पादन क्षमता

इस समय ईरान करीब 33 लाख बैरल कच्चा तेल का प्रोडक्शन करता है। इसके अलावा लगभग 13 लाख बैरल कंडेन्सेट और अन्य लिक्विड ईंधन का भी प्रोडक्शन करता है है। इस तरह कुल ग्लोबल एनर्जी सप्लाई का 4.5% हिस्सा ईरान से आता है।

ईरान के बड़े तेल क्षेत्र जैसे अहवाज, मरून और गचसरान से पाइपलाइन सीधे खार्ग आइलैंड तक आती हैं। यहां तेल को बड़े स्टोरेज टैंकों में रखा जाता है और फिर टैंकर जहाजों में भरकर दुनिया के अलग-अलग देशों में भेजा जाता है।

आइलैंड पर करीब 3 करोड़ बैरल तेल स्टोर करने की क्षमता है। फिलहाल अनुमान है कि यहां लगभग 1.8 करोड़ बैरल तेल स्टोरेज में मौजूद है, जो सामान्य हालात में 10 से 12 दिन के निर्यात के बराबर है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जंग शुरू होने से ठीक पहले ईरान ने खार्ग आइलैंड से ऑयल एक्सपोर्ट तेजी से बढ़ा दिया था।

15 से 20 फरवरी के बीच तेल निर्यात 30 लाख बैरल प्रतिदिन से ज्यादा हो गया था, जो सामान्य से लगभग तीन गुना था। माना जा रहा है कि ईरान ने युद्ध शुरू होने से पहले ज्यादा से ज्यादा तेल बाहर भेजने की कोशिश की।

ईरान-इराक वॉर में इस आइलैंड पर हमला हुआ था

खार्ग आइलैंड पहले भी कई बार रणनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है। 1979 के ईरान बंधक संकट के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर को सलाह दी गई थी कि इस आइलैंड पर कब्जा कर लिया जाए, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

1980 के दशक में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के समय अमेरिका ने ईरान की कुछ अन्य तेल सुविधाओं पर हमला किया था, लेकिन खार्ग आइलैंड को निशाना नहीं बनाया गया।

हालांकि ईरान-इराक वॉर के दौरान इराकी हमलों में इस आइलैंड के तेल टर्मिनल को भारी नुकसान पहुंचा था, लेकिन बाद में ईरान ने इसे दोबारा बना लिया।

अभी तक हमला क्यों नहीं किया गया

एक्सपर्ट्स का कहना है कि खार्ग आइलैंड पर हमला करने से दुनिया भर के तेल बाजार में बड़ा संकट पैदा हो सकता है। तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं, जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है और खाड़ी क्षेत्र में युद्ध और फैल सकता है।

यही वजह है कि अभी तक अमेरिका और उसके सहयोगी देश पहले ईरान की सैन्य और न्यूक्लियर कैपिसिटी को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

इसलिए फिलहाल यह छोटा सा आइलैंड सीधे युद्ध का मैदान नहीं बना है, लेकिन आने वाले समय में जंग की दिशा तय करने में इसकी बड़ी भूमिका हो सकती है।

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इजराइली मीडिया वाइनेट की रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की सेना इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा है कि कुछ देशों के जहाजों को इस रास्ते से गुजरने दिया जा सकता है, लेकिन इसके लिए उन देशों को पहले इजराइल और अमेरिका के राजदूतों को अपने देश से निकालना होगा। पढ़ें पूरी खबर

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