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टॉक्सिक-धुरंधर के दौर में ट्रेंड फॉलो नहीं करते सुधांशु पांडे:बोले- मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि मेरा हर काम नया ट्रेंड शुरू करे

टॉक्सिक-धुरंधर के दौर में ट्रेंड फॉलो नहीं करते सुधांशु पांडे:बोले- मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि मेरा हर काम नया ट्रेंड शुरू करे

एक्टर सुधांशु पांडे इन दिनों कलर्स के नए शो ‘दो दुनिया एक दिल’ को लेकर चर्चा में हैं। इस शो में वे बलदेव नाम के ऐसे किरदार में नजर आ रहे हैं, जिसकी जिंदगी डिजिटल और रियल दुनिया के टकराव के बीच उलझी हुई है। शो में ऑनलाइन स्कैम, डिजिटल धोखाधड़ी और टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव जैसे मुद्दों को ड्रामा के जरिए दिखाया गया है। दैनिक भास्कर से बातचीत में सुधांशु पांडे ने टेक्नोलॉजी के फायदे-नुकसान, डिजिटल फ्रॉड के बढ़ते मामलों, बदलती स्टोरीटेलिंग और ‘टॉक्सिक’ और ‘धुरंधर’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पर खुलकर बात की। पेश है सुधांशु पांडे से हुई बातचीत के कुछ खास अंश..
सवाल: ‘दो दुनिया एक दिल’ डिजिटल और रियल दुनिया की टकराहट दिखाता है। क्या आपको लगता है कि आज के दौर में टेक्नोलॉजी रिश्तों को मजबूत कर रही है या उन्हें और जटिल बना रही है? जवाब: मेरा हमेशा से मानना रहा है कि डिजिटल टेक्नोलॉजी जितनी हमारे लिए वरदान है, उतनी ही बड़ी अभिशाप भी बन सकती है। यह पूरी तरह हम पर निर्भर करता है कि हम इसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करते हैं या नुकसान के लिए। इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि टेक्नोलॉजी हमारे जीवन में किस काम की है और हमें उस पर कितना निर्भर होना चाहिए। अगर हम बिना सोचे-समझे पूरी तरह उस पर निर्भर हो जाएं, तो यह हमें नुकसान भी पहुंचा सकती है। सवाल: आजकल डिजिटल फ्रॉड और ऑनलाइन स्कैम के कई मामले सामने आ रहे हैं। आपके हिसाब से परिवारों को बच्चों को इसके बारे में कैसे जागरूक करना चाहिए? क्या कभी आपके आसपास ऐसा कुछ हुआ है? जवाब: मेरे आसपास मैंने कई ऐसे किस्से सुने हैं, जहां लोगों का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। कुछ लोगों के तो 60-70 लाख रुपये तक उड़ गए। मुझे लगता है कि लोग समझते तो हैं, लेकिन अभी भी जागरूकता उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिए। स्कैम लगातार होते रहते हैं। फोन, मैसेज और लिंक के जरिए। आप दस बार सावधान रहेंगे, लेकिन अगर ग्यारहवीं बार भावनाओं में आकर किसी लिंक पर क्लिक कर दिया, तो नुकसान हो सकता है। इसलिए कॉन्शियस अवेयरनेस बहुत जरूरी है। हमारा शो भी इसी मुद्दे को एक ह्यूमन स्टोरी और ड्रामा के जरिए सामने लाता है, जिसमें दिखाया गया है कि लोग कैसे फंसते हैं और कैसे सतर्क रहकर इससे बच सकते हैं। सवाल: आप लंबे समय से इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि आज की कहानियां पहले से ज्यादा डार्क और रियलिस्टिक हो गई हैं? जवाब: नहीं, मेरा मानना है कि हर दौर में उसी समय के हिसाब से कहानियां कही जाती रही हैं। कुछ कहानियां अपने समय से आगे भी होती थीं। फर्क सिर्फ इतना है कि आज मीडियम्स बहुत बढ़ गए हैं। अलग-अलग प्लेटफॉर्म आ गए हैं। इसलिए कहानियों की डिमांड और विविधता भी बढ़ी है। आज फिल्ममेकर के पास ज्यादा स्कोप है कि वह अलग-अलग तरह की कहानियां कह सके। यही वजह है कि अब ऐसे विषय भी सामने आ रहे हैं, जिन्हें पहले कम एक्सप्लोर किया जाता था। इनमें रियलिस्टिक, फैंटेसी और कई तरह के अलग-अलग सब्जेक्ट शामिल हैं। सवाल: आजकल ‘टॉक्सिक’ और ‘धुरंधर’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स चर्चा में हैं, जिनमें ग्रे शेड्स वाले किरदार दिख रहे हैं। ‘दो दुनिया एक दिल’ में आपका बलदेव का किरदार इस ट्रेंड में कहां फिट होता है? जवाब: देखिए, मैंने पर्सनली कभी भी अपनी लाइफ में ट्रेंड्स को फॉलो नहीं किया। यह कहना कि आज के समय में जब धुरंधर जैसी फिल्में आ रही हैं, जहां नेगेटिव कैरेक्टर्स को काफी ग्लोरिफाई किया जा रहा है, तो ऐसे में बलदेव का किरदार कहां फिट बैठता है। अगर वह इस दौर में नेचुरली फिट हो रहा है, तो यह अच्छी बात है। क्योंकि यह भी एक ग्रे शेड्स वाला कैरेक्टर है। लेकिन मैं सिर्फ इसलिए कोई काम नहीं कर सकता कि वह ट्रेंड में चल रहा है। मैंने अपनी जिंदगी में कभी भी ऐसा कुछ नहीं किया जो सिर्फ ट्रेंड को देखकर किया गया हो। मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि मैं जो भी काम करूं, उससे एक नया ट्रेंड शुरू हो।पहले भी मैंने जिन किरदारों को निभाया है, उनसे एक अलग ट्रेंड देखने को मिला था। इसलिए मेरी उम्मीद है कि इस शो में जो किरदार मैं निभा रहा हूं, उससे भी दर्शकों के बीच एक नया ट्रेंड शुरू हो सकता है।

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एक्टर सुधांशु पांडे इन दिनों कलर्स के नए शो ‘दो दुनिया एक दिल’ को लेकर चर्चा में हैं। इस शो में वे बलदेव नाम के ऐसे किरदार में नजर आ रहे हैं, जिसकी जिंदगी डिजिटल और रियल दुनिया के टकराव के बीच उलझी हुई है। शो में ऑनलाइन स्कैम, डिजिटल धोखाधड़ी और टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव जैसे मुद्दों को ड्रामा के जरिए दिखाया गया है। दैनिक भास्कर से बातचीत में सुधांशु पांडे ने टेक्नोलॉजी के फायदे-नुकसान, डिजिटल फ्रॉड के बढ़ते मामलों, बदलती स्टोरीटेलिंग और ‘टॉक्सिक’ और ‘धुरंधर’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पर खुलकर बात की। पेश है सुधांशु पांडे से हुई बातचीत के कुछ खास अंश..
सवाल: ‘दो दुनिया एक दिल’ डिजिटल और रियल दुनिया की टकराहट दिखाता है। क्या आपको लगता है कि आज के दौर में टेक्नोलॉजी रिश्तों को मजबूत कर रही है या उन्हें और जटिल बना रही है? जवाब: मेरा हमेशा से मानना रहा है कि डिजिटल टेक्नोलॉजी जितनी हमारे लिए वरदान है, उतनी ही बड़ी अभिशाप भी बन सकती है। यह पूरी तरह हम पर निर्भर करता है कि हम इसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करते हैं या नुकसान के लिए। इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि टेक्नोलॉजी हमारे जीवन में किस काम की है और हमें उस पर कितना निर्भर होना चाहिए। अगर हम बिना सोचे-समझे पूरी तरह उस पर निर्भर हो जाएं, तो यह हमें नुकसान भी पहुंचा सकती है। सवाल: आजकल डिजिटल फ्रॉड और ऑनलाइन स्कैम के कई मामले सामने आ रहे हैं। आपके हिसाब से परिवारों को बच्चों को इसके बारे में कैसे जागरूक करना चाहिए? क्या कभी आपके आसपास ऐसा कुछ हुआ है? जवाब: मेरे आसपास मैंने कई ऐसे किस्से सुने हैं, जहां लोगों का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। कुछ लोगों के तो 60-70 लाख रुपये तक उड़ गए। मुझे लगता है कि लोग समझते तो हैं, लेकिन अभी भी जागरूकता उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिए। स्कैम लगातार होते रहते हैं। फोन, मैसेज और लिंक के जरिए। आप दस बार सावधान रहेंगे, लेकिन अगर ग्यारहवीं बार भावनाओं में आकर किसी लिंक पर क्लिक कर दिया, तो नुकसान हो सकता है। इसलिए कॉन्शियस अवेयरनेस बहुत जरूरी है। हमारा शो भी इसी मुद्दे को एक ह्यूमन स्टोरी और ड्रामा के जरिए सामने लाता है, जिसमें दिखाया गया है कि लोग कैसे फंसते हैं और कैसे सतर्क रहकर इससे बच सकते हैं। सवाल: आप लंबे समय से इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि आज की कहानियां पहले से ज्यादा डार्क और रियलिस्टिक हो गई हैं? जवाब: नहीं, मेरा मानना है कि हर दौर में उसी समय के हिसाब से कहानियां कही जाती रही हैं। कुछ कहानियां अपने समय से आगे भी होती थीं। फर्क सिर्फ इतना है कि आज मीडियम्स बहुत बढ़ गए हैं। अलग-अलग प्लेटफॉर्म आ गए हैं। इसलिए कहानियों की डिमांड और विविधता भी बढ़ी है। आज फिल्ममेकर के पास ज्यादा स्कोप है कि वह अलग-अलग तरह की कहानियां कह सके। यही वजह है कि अब ऐसे विषय भी सामने आ रहे हैं, जिन्हें पहले कम एक्सप्लोर किया जाता था। इनमें रियलिस्टिक, फैंटेसी और कई तरह के अलग-अलग सब्जेक्ट शामिल हैं। सवाल: आजकल ‘टॉक्सिक’ और ‘धुरंधर’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स चर्चा में हैं, जिनमें ग्रे शेड्स वाले किरदार दिख रहे हैं। ‘दो दुनिया एक दिल’ में आपका बलदेव का किरदार इस ट्रेंड में कहां फिट होता है? जवाब: देखिए, मैंने पर्सनली कभी भी अपनी लाइफ में ट्रेंड्स को फॉलो नहीं किया। यह कहना कि आज के समय में जब धुरंधर जैसी फिल्में आ रही हैं, जहां नेगेटिव कैरेक्टर्स को काफी ग्लोरिफाई किया जा रहा है, तो ऐसे में बलदेव का किरदार कहां फिट बैठता है। अगर वह इस दौर में नेचुरली फिट हो रहा है, तो यह अच्छी बात है। क्योंकि यह भी एक ग्रे शेड्स वाला कैरेक्टर है। लेकिन मैं सिर्फ इसलिए कोई काम नहीं कर सकता कि वह ट्रेंड में चल रहा है। मैंने अपनी जिंदगी में कभी भी ऐसा कुछ नहीं किया जो सिर्फ ट्रेंड को देखकर किया गया हो। मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि मैं जो भी काम करूं, उससे एक नया ट्रेंड शुरू हो।पहले भी मैंने जिन किरदारों को निभाया है, उनसे एक अलग ट्रेंड देखने को मिला था। इसलिए मेरी उम्मीद है कि इस शो में जो किरदार मैं निभा रहा हूं, उससे भी दर्शकों के बीच एक नया ट्रेंड शुरू हो सकता है।

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