Wednesday, 07 Oct 2026 | 09:29 PM

Trending :

EXCLUSIVE

अमित बोले- ‘धुरंधर’ सक्सेस डिजर्व करती है, लेकिन ईर्ष्या हुई:प्रवीण सिसोदिया ने कहा- कास्टिंग परफेक्ट हो तो ‘मुगल-ए-आजम’ की तरह हर किरदार याद रहता है

अमित बोले- ‘धुरंधर’ सक्सेस डिजर्व करती है, लेकिन ईर्ष्या हुई:प्रवीण सिसोदिया ने कहा- कास्टिंग परफेक्ट हो तो ‘मुगल-ए-आजम’ की तरह हर किरदार याद रहता है

फिल्म ‘सितंबर 21’ सिर्फ अल्जाइमर पर बनी कहानी नहीं, बल्कि उन केयरगिवर्स की भावनात्मक यात्रा है जो अपनों की देखभाल करते-करते अंदर से टूटने लगते हैं। डायरेक्टर करेन क्षिति सुवर्णा और को-प्रोड्यूसर प्रीति अली ने इस संवेदनशील विषय को असली जिंदगी के अनुभवों से जोड़कर पर्दे पर उतारा है। दैनिक भास्कर से बातचीत में प्रवीण एस. सिसोदिया, प्रियंका उपेंद्र और अमित बहल ने बताया कि फिल्म मरीजों के साथ उनके परिवार के दर्द को भी सामने लाती है। इंटरव्यू में ‘धुरंधर’ की कास्टिंग और ‘मुगल-ए-आजम’ जैसे क्लासिक सिनेमा पर भी चर्चा हुई। सवाल: पहली ही फिल्म में अल्जाइमर जैसा संवेदनशील विषय… आखिर इस कहानी ने आपको इतना अंदर तक कैसे छू लिया? जवाब/करेन क्षिति सुवर्णा: जब मैं अपनी पहली फीचर फिल्म बनाना चाहती थी, तब मैंने तय किया था कि सिर्फ मनोरंजन के लिए फिल्म नहीं बनाऊंगी। मैं ऐसी कहानी कहना चाहती थी जो समाज को कुछ दे। हमारे लेखक राज शेखर की यह उनकी असली जिंदगी की कहानी है। वह अपने भाई के केयरगिवर थे, जिन्हें अल्जाइमर था। हमारे प्रोड्यूसर्स की मां भी इस बीमारी से जूझ चुकी थीं। जब मैं अल्जाइमर केयर सेंटर गई, तब मुझे एहसास हुआ कि लोग मरीजों की बात तो करते हैं, लेकिन केयरगिवर्स की तकलीफ कोई नहीं समझता। वहीं से यह फिल्म शुरू हुई। सवाल: यानी यह सिर्फ मरीज की नहीं, उन लोगों की भी कहानी है जो चुपचाप टूटते रहते हैं? जवाब/करेन क्षिति सुवर्णा: बिल्कुल। अल्जाइमर का अभी तक कोई इलाज नहीं है। सिर्फ देखभाल की जा सकती है। लेकिन किसी ने यह नहीं दिखाया कि केयरगिवर्स पर क्या बीतती है। वे मानसिक और भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं। हमारी फिल्म उसी दर्द और संघर्ष को दिखाती है। सवाल: प्रवीण, जब आपने पहली बार कहानी सुनी तो क्या तुरंत लगा कि यह फिल्म करनी ही है? जवाब/प्रवीण एस. सिसोदिया: हां। ऐसी फिल्में हर बार नहीं मिलतीं। एक कलाकार हमेशा कुछ नया करना चाहता है। जब करेन क्षिति ने कहानी सुनाई, तो मुझे लगा कि यह सिर्फ एक्टिंग नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। मैंने तुरंत हां कह दी। सवाल: प्रियंका, एक केयरगिवर का दर्द निभाना कितना मुश्किल था? जवाब/प्रियंका उपेंद्र: बहुत मुश्किल था। क्योंकि सिर्फ लुक बदलना काफी नहीं था। मुझे उसकी भावनाएं समझनी थीं। अल्जाइमर के बारे में सुनना अलग बात है, लेकिन यह सोचना कि उस इंसान और उसके family पर क्या गुजरती होगी… वह बहुत भारी था। मेरे किरदार के अंदर बहुत दर्द था, लेकिन बाहर से उसे मजबूत दिखना था। यही सबसे बड़ी चुनौती थी। सवाल: फिल्म का नाम ‘सितंबर 21’ क्यों रखा गया? क्या इसका कनेक्शन कोविड से भी है? जवाब/प्रीति अली: हां, कोविड का दौर फिल्म का हिस्सा है। लेकिन ‘सितंबर 21’ सिर्फ एक तारीख नहीं है, यह कहानी की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ हिस्सा है। मैं अभी ज्यादा नहीं बताऊंगी, क्योंकि दर्शकों को यह फिल्म में महसूस करना चाहिए। सवाल: अमित, आपको इस फिल्म की कहानी ने निजी तौर पर छुआ? जवाब/अमित बहल: बहुत ज्यादा। मेरे पिता मेरे शिक्षक थे और मैंने करीब ढाई साल तक उनकी देखभाल की थी।जब मैंने फिल्म देखी, तो मुझे एहसास हुआ कि यह सिर्फ मरीज की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की भी कहानी है जो उनके साथ जीते हैं। फिल्म यह भी दिखाती है कि हर केयरगिवर एक जैसा नहीं होता। हर इंसान की अपनी सीमाएं और संघर्ष होते हैं। सवाल: फिल्म में अल्जाइमर के मेडिकल पहलुओं पर भी काफी रिसर्च की गई है। यह कितना जरूरी था? जवाब/अमित बहल: बहुत जरूरी था। लोग अक्सर अल्जाइमर को सिर्फ बुढ़ापे में भूलने की आदत समझ लेते हैं। लेकिन यह एक गंभीर बीमारी है। फिल्म में दिखाया गया है कि यह बीमारी किस तरह बढ़ती है और मरीज के व्यवहार में क्या बदलाव आते हैं। यह सिर्फ इमोशनल फिल्म नहीं, बल्कि काफी शैक्षिक भी है। सवाल: फिल्म हिंदी और कन्नड़ दोनों भाषाओं में बनी है। पहली ही फिल्म में यह रिस्क लेना कितना मुश्किल था? जवाब/प्रीति अली: बहुत मुश्किल था। लेकिन जब हमने फिल्म को सपोर्ट करने का फैसला किया, तभी तय कर लिया था कि इसे दोनों भाषाओं में बनाएंगे। पूरी टीम ने इसे बहुत मेहनत से संभाला। सवाल: हाल ही में ‘धुरंधर’ की काफी चर्चा रही। उसकी सफलता और कास्टिंग को आप कैसे देखते हैं? जवाब/अमित बहल: ‘धुरंधर’ सच में कमाल की फिल्म है। उसकी सफलता पूरी तरह डिजर्व करती है। और सच कहूं तो थोड़ी-सी ईर्ष्या भी होती है, लेकिन वह बहुत स्वाभाविक है। उसकी कास्टिंग इतनी परफेक्ट थी कि कई किरदारों को पहचानना मुश्किल हो गया था। हर कलाकार अपने रोल में पूरी तरह फिट था। सवाल: प्रवीण, आपको ‘धुरंधर’ में कोई ऐसा किरदार लगा जिसे आप निभाना चाहते? जवाब/ प्रवीण एस. सिसोदिया: देखिए, अभिनेता के मन में हमेशा आता है कि “यह रोल मैं भी कर सकता था।” लेकिन सच यह है कि उस फिल्म की कास्टिंग शानदार थी। हर कलाकार बिल्कुल सही जगह पर था। मुझे तो ऐसा लगा जैसे पुरानी क्लासिक फिल्मों की तरह हर किरदार अपनी जगह पर पूरी ईमानदारी से खड़ा है। जैसे लोग ‘मुगल-ए-आजम’ के किरदारों को आज तक याद रखते हैं, वैसे ही जब कोई फिल्म सही कास्टिंग और सच्चे अभिनय के साथ बनती है, तो उसका असर लंबे समय तक रहता है।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
img

May 9, 2026/
5:43 pm

होमताजा खबरनॉलेज तैरते शहरों में छिपे हैं साइलेंट किलर! क्यों यहां वायरस को हराना नामुमकिन है? Last Updated:May 09, 2026,...

World News Updates; Trump Pakistan China

April 4, 2026/
12:14 am

7 घंटे पहले कॉपी लिंक फाइल फोटो। अफगानिस्तान के काबुल में शुक्रवार देर शाम भूकंप से 8 लोगों की मौत...

Bengaluru Professor Calls Student Terrorist, Sparks Controversy

March 28, 2026/
5:43 pm

बेंगलुरु9 घंटे पहले कॉपी लिंक AI इमेज कर्नाटक के बेंगलुरु में निजी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के खिलाफ स्टूडेंट को आतंकी...

आदित्य सील और अनुष्का रंजन बने जुड़वा बेटियों के पेरेंट्स:'वीरा' और 'माही' नाम रखे; आदित्य बोले- हमारी जिंदगी में रोशनी आ गई

August 24, 2026/
3:24 pm

फिल्म ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2’ फेम एक्टर आदित्य सील और उनकी पत्नी एक्ट्रेस अनुष्का रंजन जुड़वा बेटियों के पेरेंट्स...

ऑफ कटर से गच्चा खा रहे मॉडर्न बैटर:वर्ल्ड कप के 357 विकेट पेसर्स को, इसमें 68 ऑफ कटर पर गिरे, बुमराह इसके उस्ताद

March 12, 2026/
8:44 am

टी-20 क्रिकेट को हमेशा से बल्लेबाजों का गेम माना जाता है, लेकिन टी-20 वर्ल्ड कप 2026 में तेज गेंदबाजों ने...

Nashik TCS Conversion Plea Reaches Supreme Court

April 16, 2026/
6:43 pm

नासिक54 मिनट पहले कॉपी लिंक महाराष्ट्र के नासिक स्थित TCS ऑफिस से जुड़ा धर्मांतरण और योन उत्पीड़ने का मामला गुरुवार...

जॉब - शिक्षा

राजनीति

अमित बोले- ‘धुरंधर’ सक्सेस डिजर्व करती है, लेकिन ईर्ष्या हुई:प्रवीण सिसोदिया ने कहा- कास्टिंग परफेक्ट हो तो ‘मुगल-ए-आजम’ की तरह हर किरदार याद रहता है

अमित बोले- ‘धुरंधर’ सक्सेस डिजर्व करती है, लेकिन ईर्ष्या हुई:प्रवीण सिसोदिया ने कहा- कास्टिंग परफेक्ट हो तो ‘मुगल-ए-आजम’ की तरह हर किरदार याद रहता है

फिल्म ‘सितंबर 21’ सिर्फ अल्जाइमर पर बनी कहानी नहीं, बल्कि उन केयरगिवर्स की भावनात्मक यात्रा है जो अपनों की देखभाल करते-करते अंदर से टूटने लगते हैं। डायरेक्टर करेन क्षिति सुवर्णा और को-प्रोड्यूसर प्रीति अली ने इस संवेदनशील विषय को असली जिंदगी के अनुभवों से जोड़कर पर्दे पर उतारा है। दैनिक भास्कर से बातचीत में प्रवीण एस. सिसोदिया, प्रियंका उपेंद्र और अमित बहल ने बताया कि फिल्म मरीजों के साथ उनके परिवार के दर्द को भी सामने लाती है। इंटरव्यू में ‘धुरंधर’ की कास्टिंग और ‘मुगल-ए-आजम’ जैसे क्लासिक सिनेमा पर भी चर्चा हुई। सवाल: पहली ही फिल्म में अल्जाइमर जैसा संवेदनशील विषय… आखिर इस कहानी ने आपको इतना अंदर तक कैसे छू लिया? जवाब/करेन क्षिति सुवर्णा: जब मैं अपनी पहली फीचर फिल्म बनाना चाहती थी, तब मैंने तय किया था कि सिर्फ मनोरंजन के लिए फिल्म नहीं बनाऊंगी। मैं ऐसी कहानी कहना चाहती थी जो समाज को कुछ दे। हमारे लेखक राज शेखर की यह उनकी असली जिंदगी की कहानी है। वह अपने भाई के केयरगिवर थे, जिन्हें अल्जाइमर था। हमारे प्रोड्यूसर्स की मां भी इस बीमारी से जूझ चुकी थीं। जब मैं अल्जाइमर केयर सेंटर गई, तब मुझे एहसास हुआ कि लोग मरीजों की बात तो करते हैं, लेकिन केयरगिवर्स की तकलीफ कोई नहीं समझता। वहीं से यह फिल्म शुरू हुई। सवाल: यानी यह सिर्फ मरीज की नहीं, उन लोगों की भी कहानी है जो चुपचाप टूटते रहते हैं? जवाब/करेन क्षिति सुवर्णा: बिल्कुल। अल्जाइमर का अभी तक कोई इलाज नहीं है। सिर्फ देखभाल की जा सकती है। लेकिन किसी ने यह नहीं दिखाया कि केयरगिवर्स पर क्या बीतती है। वे मानसिक और भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं। हमारी फिल्म उसी दर्द और संघर्ष को दिखाती है। सवाल: प्रवीण, जब आपने पहली बार कहानी सुनी तो क्या तुरंत लगा कि यह फिल्म करनी ही है? जवाब/प्रवीण एस. सिसोदिया: हां। ऐसी फिल्में हर बार नहीं मिलतीं। एक कलाकार हमेशा कुछ नया करना चाहता है। जब करेन क्षिति ने कहानी सुनाई, तो मुझे लगा कि यह सिर्फ एक्टिंग नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। मैंने तुरंत हां कह दी। सवाल: प्रियंका, एक केयरगिवर का दर्द निभाना कितना मुश्किल था? जवाब/प्रियंका उपेंद्र: बहुत मुश्किल था। क्योंकि सिर्फ लुक बदलना काफी नहीं था। मुझे उसकी भावनाएं समझनी थीं। अल्जाइमर के बारे में सुनना अलग बात है, लेकिन यह सोचना कि उस इंसान और उसके family पर क्या गुजरती होगी… वह बहुत भारी था। मेरे किरदार के अंदर बहुत दर्द था, लेकिन बाहर से उसे मजबूत दिखना था। यही सबसे बड़ी चुनौती थी। सवाल: फिल्म का नाम ‘सितंबर 21’ क्यों रखा गया? क्या इसका कनेक्शन कोविड से भी है? जवाब/प्रीति अली: हां, कोविड का दौर फिल्म का हिस्सा है। लेकिन ‘सितंबर 21’ सिर्फ एक तारीख नहीं है, यह कहानी की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ हिस्सा है। मैं अभी ज्यादा नहीं बताऊंगी, क्योंकि दर्शकों को यह फिल्म में महसूस करना चाहिए। सवाल: अमित, आपको इस फिल्म की कहानी ने निजी तौर पर छुआ? जवाब/अमित बहल: बहुत ज्यादा। मेरे पिता मेरे शिक्षक थे और मैंने करीब ढाई साल तक उनकी देखभाल की थी।जब मैंने फिल्म देखी, तो मुझे एहसास हुआ कि यह सिर्फ मरीज की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की भी कहानी है जो उनके साथ जीते हैं। फिल्म यह भी दिखाती है कि हर केयरगिवर एक जैसा नहीं होता। हर इंसान की अपनी सीमाएं और संघर्ष होते हैं। सवाल: फिल्म में अल्जाइमर के मेडिकल पहलुओं पर भी काफी रिसर्च की गई है। यह कितना जरूरी था? जवाब/अमित बहल: बहुत जरूरी था। लोग अक्सर अल्जाइमर को सिर्फ बुढ़ापे में भूलने की आदत समझ लेते हैं। लेकिन यह एक गंभीर बीमारी है। फिल्म में दिखाया गया है कि यह बीमारी किस तरह बढ़ती है और मरीज के व्यवहार में क्या बदलाव आते हैं। यह सिर्फ इमोशनल फिल्म नहीं, बल्कि काफी शैक्षिक भी है। सवाल: फिल्म हिंदी और कन्नड़ दोनों भाषाओं में बनी है। पहली ही फिल्म में यह रिस्क लेना कितना मुश्किल था? जवाब/प्रीति अली: बहुत मुश्किल था। लेकिन जब हमने फिल्म को सपोर्ट करने का फैसला किया, तभी तय कर लिया था कि इसे दोनों भाषाओं में बनाएंगे। पूरी टीम ने इसे बहुत मेहनत से संभाला। सवाल: हाल ही में ‘धुरंधर’ की काफी चर्चा रही। उसकी सफलता और कास्टिंग को आप कैसे देखते हैं? जवाब/अमित बहल: ‘धुरंधर’ सच में कमाल की फिल्म है। उसकी सफलता पूरी तरह डिजर्व करती है। और सच कहूं तो थोड़ी-सी ईर्ष्या भी होती है, लेकिन वह बहुत स्वाभाविक है। उसकी कास्टिंग इतनी परफेक्ट थी कि कई किरदारों को पहचानना मुश्किल हो गया था। हर कलाकार अपने रोल में पूरी तरह फिट था। सवाल: प्रवीण, आपको ‘धुरंधर’ में कोई ऐसा किरदार लगा जिसे आप निभाना चाहते? जवाब/ प्रवीण एस. सिसोदिया: देखिए, अभिनेता के मन में हमेशा आता है कि “यह रोल मैं भी कर सकता था।” लेकिन सच यह है कि उस फिल्म की कास्टिंग शानदार थी। हर कलाकार बिल्कुल सही जगह पर था। मुझे तो ऐसा लगा जैसे पुरानी क्लासिक फिल्मों की तरह हर किरदार अपनी जगह पर पूरी ईमानदारी से खड़ा है। जैसे लोग ‘मुगल-ए-आजम’ के किरदारों को आज तक याद रखते हैं, वैसे ही जब कोई फिल्म सही कास्टिंग और सच्चे अभिनय के साथ बनती है, तो उसका असर लंबे समय तक रहता है।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.