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आशा भोसले को याद कर संगीत जगत के सितारे भावुक:उदित, अनु, हरिहरन समेत दिग्गजों ने यादें साझा कीं, कहा- उनकी विरासत हमेशा अमर रहेगी

आशा भोसले को याद कर संगीत जगत के सितारे भावुक:उदित, अनु, हरिहरन समेत दिग्गजों ने यादें साझा कीं, कहा- उनकी विरासत हमेशा अमर रहेगी

आशा भोसले के निधन के बाद संगीत जगत में शोक की लहर है। कई दिग्गजों ने उनसे जुड़ी यादें साझा कीं। उदित नारायण ने उन्हें भारतीय संगीत का एक युग बताया और उनके साथ गाना जीवन की बड़ी उपलब्धि कहा। अनु मलिक ने बताया कि चोटिल होने के बावजूद उन्होंने उनके पहले गाने की रिकॉर्डिंग में सहयोग दिया। हरिहरन और कैलाश खेर ने उनके विनम्र स्वभाव और ऊर्जा को प्रेरणादायक बताया। अनुप जलोटा, ललित पंडित, डब्बू मलिक, उत्तम सिंह और रमेश सिप्पी ने भी अनुभव साझा किए। सभी ने कहा कि उनकी आवाज, सादगी और विरासत हमेशा अमर रहेगी। उनकी सरलता, मेहनत और नए कलाकारों को आगे बढ़ाने की प्रवृत्ति सामने आई। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। उदित नारायण बोले- संगीत जगत के लिए एक युग का अंत है गायक उदित नारायण ने कहा कि आशा जी के निधन की खबर सुनकर उन्हें विश्वास नहीं हुआ। उनके अनुसार वह सिर्फ गायिका नहीं, बल्कि संगीत इतिहास का अहम हिस्सा थीं। उदित नारायण ने बताया कि उनका बचपन नेपाल में बीता, जहां वे रेडियो पर आशा जी को सुनते थे। उन्होंने नहीं सोचा था कि एक दिन वे मुंबई आकर उनके साथ गाएंगे और माइक साझा करेंगे। उन्होंने फिल्म ‘लगान’ का किस्सा याद करते हुए कहा कि ए.आर. रहमान ने उन्हें “राधा कैसे ना जले” के लिए बुलाया था। पहले उन्होंने अपना हिस्सा रिकॉर्ड किया, फिर आशा जी ने उसे यादगार बना दिया। उदित नारायण ने कहा कि आशा जी की सबसे बड़ी खासियत उनकी वर्सेटिलिटी थी। वे हर तरह का गाना, क्लासिकल, रोमांटिक और पॉप आसानी से गा लेती थीं। उन्होंने कहा कि स्टूडियो में आशा जी खुशमिजाज और मजाकिया थीं, लेकिन माइक के सामने आते ही उनकी आवाज में जबरदस्त ताकत और जादू आ जाता था। उदित नारायण ने कहा कि बढ़ती उम्र के बावजूद उनकी आवाज में थकान नहीं आई और वे युवा कलाकारों के लिए प्रेरणा बनी रहीं। अंत में उन्होंने कहा कि आशा जी का जाना संगीत जगत के लिए एक युग का अंत है, लेकिन उनकी आवाज और विरासत हमेशा दिलों में जिंदा रहेगी। अनु मलिक ने कहा- हाथ में चोट लगी थी, फिर भी मेरे लिए रिकॉर्डिंग पर आईं “मेरी मां चली गई थी 2021 में, और मुझे लगता है फिर से मेरी माँ चली गई… यह बहुत दुखद खबर है,” यह कहते हुए अनु मलिक भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने पहला गाना रिकॉर्ड किया, तब उनकी उम्र 14 साल थी। उस समय उन्हें गाने के लिए आशा भोसले को स्टूडियो बुलाना था। आशा भोसले उस वक्त व्यस्त थीं और उनके हाथ में चोट थी, प्लास्टर चढ़ा था। इसके बावजूद वे एक बच्चे के पहले गाने के लिए स्टूडियो आईं। अनु मलिक ने कहा कि वह पल कभी नहीं भूल सकते। उस दौर में आर.डी. बर्मन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे बड़े संगीतकारों के गाने चल रहे थे, फिर भी आशा भोसले ने उन्हें सहयोग दिया और हिम्मत बढ़ाई। उन्होंने कहा कि अगर आज वह अनु मलिक बन पाए हैं, तो उसमें आशा भोसले का बड़ा योगदान और आशीर्वाद है। हरिहरन बोले- आशा जी ने कभी छोटा महसूस नहीं होने दिया गायक हरिहरन ने कहा कि आशा भोसले ने अपने सुरों और गीतों से कई दशकों तक लोगों को खुशी दी है। उनके अनुसार, इतने लंबे समय तक शानदार प्रदर्शन करना आम इंसान के बस की बात नहीं, बल्कि “आशीर्वाद से भरी हुई प्रतिभा” है। हरिहरन ने कहा कि उन्हें आशा जी के साथ काम करने का सौभाग्य मिला और वह उन्हें परिवार का हिस्सा मानते हैं। उनके लिए उनका जाना किसी परिवार के सदस्य जैसा दुख है। उन्होंने कहा कि आशा जी ने हर तरह के संगीत, क्लासिकल, रोमांटिक और अन्य जॉनर्स में अपनी अलग पहचान बनाई। 90 की उम्र के बाद भी उनमें वही ऊर्जा और जोश था, जो युवा कलाकार में होता है। हरिहरन ने बताया कि 1984–85 में उन्होंने आशा जी के लिए एक गजल एल्बम कंपोज किया था। उसमें आठ गजलें थीं, जिनमें छह सोलो उन्होंने गाईं और दो डुएट उन्होंने खुद गाए थे। उन्होंने बताया कि उस समय वे नए कलाकार थे, लेकिन आशा जी ने उन्हें छोटा महसूस नहीं होने दिया। उनका व्यवहार सरल और प्यार से भरा था। उन्होंने हर गाने को ध्यान और मेहनत से सीखा और गाया। हरिहरन ने कहा कि उस अनुभव से उन्हें बड़ा सबक मिला, अगर बड़ा बनना है तो सरल रहना और काम पर ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि यही सीख उन्होंने आज तक संभाल कर रखी है। अंत में उन्होंने आशा जी को सरल, विनम्र और हंसमुख कलाकार बताया, जिनकी मुस्कान हर माहौल को रोशन करती थी। कैलाश खेर बोले- आशा जी हमेशा विनम्र और मिलनसार रहीं “हमारी मुलाकातें कई बार मंच पर हुई हैं- कभी रियलिटी शो में, कभी इवेंट्स में,” यह कहते हुए कैलाश खेर ने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि 2007 में, करियर के शुरुआती दौर में पहली एल्बम 2006 में आई थी। उन्हें आशा भोसले के साथ यूएस और कनाडा का करीब एक महीने का टूर मिला। इस दौरान उन्होंने करीब 10 शहरों में परफॉर्म किया। कैलाश खेर ने कहा कि उस टूर में उन्होंने उन्हें करीब से जाना। इतनी बड़ी सीनियर कलाकार होने के बावजूद उनका व्यवहार सरल और अपनापन भरा था। गाड़ी या फ्लाइट—हर जगह वह कॉर्डियल और सहज रहती थीं। उन्होंने कहा, “इससे मुझे उनके स्वभाव का असली पता चला, बहुत मिलनसार और विनम्र। ऐसा नहीं था कि सीनियर होने का घमंड हो। वह सबके साथ बराबरी और प्यार से बात करती थीं।” कैलाश खेर ने कहा कि लंबे टूर से इंसान की असली प्रकृति सामने आती है, कैसा व्यवहार और कितनी विनम्रता है। आशा भोसले में उन्होंने यही खूबी देखी, सीनियर होकर भी सरल, जमीन से जुड़ी और संवेदनशील व्यक्तित्व। अनूप जलोटा बोले- आशा जी अमर हैं और उन्हें हमेशा याद किया जाएगा भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की प्लेबैक सिंगिंग की दूसरी मजबूत स्तंभ चली गई हैं। दो बड़े स्तंभ थे, लता मंगेशकर और आशा भोसले। नई सिंगर्स इन्हीं को आदर्श मानती हैं। उन्होंने अपनी गायकी से एक यूनिवर्सिटी बनाई, जिससे पीढ़ियां सीखती रहेंगी। भजन सम्राट अनूप जलोटा ने कहा कि आशा जी का जाना फिल्म इंडस्ट्री के लिए बड़ा नुकसान है। उन्होंने बताया कि आशा भोसले को खाना बनाने का शौक था और उन्होंने कई बार कबाब और बिरयानी बनाकर खिलाई। उन्होंने कहा कि इसी शौक के कारण कई जगहों पर उनके नाम से रेस्टोरेंट शुरू हुए। दुबई समेत कई देशों में उनके रेस्टोरेंट हैं, जहां उनकी पसंद की डिशेज परोसी जाती हैं। अनूप जलोटा के अनुसार, आशा भोसले को भुलाया नहीं जा सकता। वे भारतीय फिल्म संगीत की मजबूत स्तंभ थीं। उन्होंने हर तरह के गाने, भजन, गजल और फिल्मी गाए। हर शैली में उनकी पकड़ शानदार थी। उनकी आवाज में चुलबुलापन और ठहराव दोनों थे। यही उन्हें अलग बनाता है। ललित पंडित बोले- आशा भोसले आखिरी दिग्गज थीं, उनके जैसा न कोई था, न होगा संगीतकार ललित पंडित ने आशा भोसले को याद करते हुए कहा, “दो हफ्ते पहले ही मेरी उनसे बात हुई थी। मैंने फोन कर उनकी तबीयत पूछी तो उन्होंने बहुत प्यार से लंबी बातचीत की। बोलीं- तबीयत ठीक नहीं है, मगर चल रहा है। उस बातचीत में भी वही अपनापन था, जो हमेशा रहा।” वह कहते हैं, “हमारा रिश्ता बहुत पुराना है। मैं बचपन से उनके साथ गा रहा हूं, वो हमें तब से जानती थीं। बाद में खिलाड़ी, प्यार तो होना ही था और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी फिल्मों में उन्होंने हमारे लिए गाया। हर गाने में उन्होंने अपनी जान डाल दी। ‘ज़रा सा झूम लूं मैं’ में जो एक्सप्रेशन उन्होंने दिए, वो आज भी मिसाल हैं।” ललित पंडित बताते हैं, “वो बड़ी कलाकार थीं, लेकिन कभी महसूस नहीं होने देती थीं। हर गाने से पहले म्यूजिक रूम में आकर रिहर्सल करती थीं और ऐसा माहौल बना देती थीं कि हम सीखते रहते थे। उनका स्वभाव विनम्र और खुशमिजाज था।” वह याद करते हैं, “हमारे करियर में उनका बड़ा हाथ रहा। उन्होंने ही यश चोपड़ा को फोन कर हमें सुनने को कहा था। उस एक कॉल ने हमारी जिंदगी बदल दी।” अंत में वह कहते हैं, “उनकी वर्सेटिलिटी का कोई मुकाबला नहीं है। जैसा काम उन्होंने किया है, वैसा फिर कभी नहीं होगा। ये इंडस्ट्री के लिए बड़ा नुकसान है, लेकिन उनके गाने हमेशा जिंदा रहेंगे। वो सच में आखिरी दिग्गज कलाकार थीं।” उत्तम सिंह ने कहा- रात डेढ़ बजे आशा जी ने खुद खाना बनाकर खिलाया संगीतकार उत्तम सिंह ने बताया कि आशा जी के साथ काम करते हुए कई यादें बनीं, जिनमें फिल्म दिल तो पागल है का दौर भी शामिल है। उस समय उन्होंने उनके काम के प्रति समर्पण और ऊर्जा को करीब से देखा। उन्होंने बताया कि एक बार रात 1:30 बजे तक काम चल रहा था। जब वे बाहर निकल रहे थे, तभी आशा जी आईं। उन्हें पता चला कि किसी ने खाना नहीं खाया, तो उन्होंने 15 मिनट में चिकन और चावल बनाकर सबको खिलाया। यह उनके अपनापन को दिखाता है। उत्तम सिंह ने बताया कि आशा जी काम को लेकर प्रोफेशनल थीं। एक बार वे रिकॉर्डिंग के लिए आईं, चेहरा उतरा था और आंखें नम थीं, लेकिन गाने के वक्त उन्होंने शानदार कैबरे सॉन्ग गाया और किसी को उनकी हालत का अंदाजा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि आशा भोसले जैसी कलाकार बहुत कम पैदा होते हैं। उन्होंने हजारों गाने गाए, जो दिलों में जिंदा रहेंगे। उनके जाने से इंडस्ट्री को बड़ा नुकसान हुआ है, लेकिन उनकी आवाज और काम उन्हें अमर बनाए रखेगा। डब्बू मालिक बोले- संगीत का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया गायक-संगीतकार डब्बू मलिक ने कहा कि आशा भोसले के निधन की खबर सुनकर उन्हें लगा जैसे संगीत का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया। उनके मुताबिक उनका जीवन प्रेरणादायक रहा है और उनकी संगीत यात्रा किसी ग्रंथ जैसी है। डब्बू मलिक ने बताया कि उनके परिवार, सरदार मलिक, अनु मलिक और पूरे परिवार से आशा जी का गहरा रिश्ता था। उन्होंने कठिन समय में उनके पिता सरदार मलिक की मदद की और हमेशा परिवार की चिंता करती थीं। उन्होंने कहा कि आशा जी न सिर्फ महान गायिका थीं, बल्कि बड़ी इंसान भी थीं, जो हर किसी की फिक्र करती थीं। उन्होंने बताया कि एक बार स्टूडियो में वे उन्हें गाना सिखा रहे थे, तभी आशा जी ने कहा, “अच्छा, तुम गाकर सुनाओ।” जब उन्होंने कहा कि उन्हें हारमोनियम नहीं आता, तो आशा जी ने उन्हें छोटा महसूस नहीं होने दिया। उन्होंने कहा कि आशा जी ने उन्हें समझाया कि हर इंसान का तरीका अलग होता है और हर कलाकार हर चीज में माहिर नहीं होता। उन्होंने उन्हें आत्मविश्वास दिया और कहा कि अपने आप को कभी कम मत समझो। डब्बू मलिक ने कहा कि यह अनुभव उनके लिए मां जैसी सीख था और उनके जीवन की बड़ी सीखों में से एक है।
रमेश सिप्पी बोले- संगीत की वह जादुई आवाज हमेशा के लिए शांत हो गई निर्देशक रमेश सिप्पी ने लता मंगेशकर और आशा भोसले को भारतीय संगीत के दो मजबूत स्तंभ बताया। उन्होंने कहा कि तुलना होती रही, लेकिन आशा जी ने अपनी अलग पहचान बनाई। सिप्पी बताते हैं कि आशा भोसले के सामने चुनौती थी कि लता मंगेशकर पहले ही शिखर पर थीं। ऐसे में उन्हें अपनी अलग शैली बनानी पड़ी। उन्हें सही दिशा ओ.पी. नैयर ने दी, जिन्होंने उनकी आवाज़ में चुलबुलापन और आधुनिकता पहचानी। इसके बाद “जाइए आप कहाँ जाइएगा” से उन्होंने साबित किया कि वे किसी से कम नहीं हैं। रमेश सिप्पी ने फिल्म ‘शान’ का किस्सा बताया। उन्होंने कहा कि ताज होटल में मुहूर्त के दौरान आशा जी ने “प्यार करने वाले प्यार करते हैं शान से” गाया, जबकि परवीन बॉबी स्क्रीन पर थीं। उस सीन ने फिल्म को यादगार बना दिया। वे बताते हैं कि ‘शोले’ और कई फिल्मों में गानों का चुनाव मूड और किरदार के हिसाब से होता था। जहां भावनात्मक गाने होते, वहां लता जी चुनी जाती थीं और जहां ऊर्जा व शरारत होती, वहां आशा जी उपयुक्त थीं। सिप्पी के मुताबिक, आर.डी. बर्मन के साथ आशा भोसले की जोड़ी ने नए प्रयोग किए और “चुरा लिया है” जैसे गाने आज भी लोकप्रिय हैं। उन्होंने कहा कि आशा भोसले अनुशासित कलाकार थीं, जो हर गाने को परफेक्ट बनाने के लिए घंटों रिहर्सल करती थीं। अंत में सिप्पी ने कहा कि आज जब आशा भोसले हमारे बीच नहीं हैं, तो लगता है जैसे संगीत की वह जादुई आवाज हमेशा के लिए शांत हो गई हो।

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आशा भोसले के निधन के बाद संगीत जगत में शोक की लहर है। कई दिग्गजों ने उनसे जुड़ी यादें साझा कीं। उदित नारायण ने उन्हें भारतीय संगीत का एक युग बताया और उनके साथ गाना जीवन की बड़ी उपलब्धि कहा। अनु मलिक ने बताया कि चोटिल होने के बावजूद उन्होंने उनके पहले गाने की रिकॉर्डिंग में सहयोग दिया। हरिहरन और कैलाश खेर ने उनके विनम्र स्वभाव और ऊर्जा को प्रेरणादायक बताया। अनुप जलोटा, ललित पंडित, डब्बू मलिक, उत्तम सिंह और रमेश सिप्पी ने भी अनुभव साझा किए। सभी ने कहा कि उनकी आवाज, सादगी और विरासत हमेशा अमर रहेगी। उनकी सरलता, मेहनत और नए कलाकारों को आगे बढ़ाने की प्रवृत्ति सामने आई। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। उदित नारायण बोले- संगीत जगत के लिए एक युग का अंत है गायक उदित नारायण ने कहा कि आशा जी के निधन की खबर सुनकर उन्हें विश्वास नहीं हुआ। उनके अनुसार वह सिर्फ गायिका नहीं, बल्कि संगीत इतिहास का अहम हिस्सा थीं। उदित नारायण ने बताया कि उनका बचपन नेपाल में बीता, जहां वे रेडियो पर आशा जी को सुनते थे। उन्होंने नहीं सोचा था कि एक दिन वे मुंबई आकर उनके साथ गाएंगे और माइक साझा करेंगे। उन्होंने फिल्म ‘लगान’ का किस्सा याद करते हुए कहा कि ए.आर. रहमान ने उन्हें “राधा कैसे ना जले” के लिए बुलाया था। पहले उन्होंने अपना हिस्सा रिकॉर्ड किया, फिर आशा जी ने उसे यादगार बना दिया। उदित नारायण ने कहा कि आशा जी की सबसे बड़ी खासियत उनकी वर्सेटिलिटी थी। वे हर तरह का गाना, क्लासिकल, रोमांटिक और पॉप आसानी से गा लेती थीं। उन्होंने कहा कि स्टूडियो में आशा जी खुशमिजाज और मजाकिया थीं, लेकिन माइक के सामने आते ही उनकी आवाज में जबरदस्त ताकत और जादू आ जाता था। उदित नारायण ने कहा कि बढ़ती उम्र के बावजूद उनकी आवाज में थकान नहीं आई और वे युवा कलाकारों के लिए प्रेरणा बनी रहीं। अंत में उन्होंने कहा कि आशा जी का जाना संगीत जगत के लिए एक युग का अंत है, लेकिन उनकी आवाज और विरासत हमेशा दिलों में जिंदा रहेगी। अनु मलिक ने कहा- हाथ में चोट लगी थी, फिर भी मेरे लिए रिकॉर्डिंग पर आईं “मेरी मां चली गई थी 2021 में, और मुझे लगता है फिर से मेरी माँ चली गई… यह बहुत दुखद खबर है,” यह कहते हुए अनु मलिक भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने पहला गाना रिकॉर्ड किया, तब उनकी उम्र 14 साल थी। उस समय उन्हें गाने के लिए आशा भोसले को स्टूडियो बुलाना था। आशा भोसले उस वक्त व्यस्त थीं और उनके हाथ में चोट थी, प्लास्टर चढ़ा था। इसके बावजूद वे एक बच्चे के पहले गाने के लिए स्टूडियो आईं। अनु मलिक ने कहा कि वह पल कभी नहीं भूल सकते। उस दौर में आर.डी. बर्मन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे बड़े संगीतकारों के गाने चल रहे थे, फिर भी आशा भोसले ने उन्हें सहयोग दिया और हिम्मत बढ़ाई। उन्होंने कहा कि अगर आज वह अनु मलिक बन पाए हैं, तो उसमें आशा भोसले का बड़ा योगदान और आशीर्वाद है। हरिहरन बोले- आशा जी ने कभी छोटा महसूस नहीं होने दिया गायक हरिहरन ने कहा कि आशा भोसले ने अपने सुरों और गीतों से कई दशकों तक लोगों को खुशी दी है। उनके अनुसार, इतने लंबे समय तक शानदार प्रदर्शन करना आम इंसान के बस की बात नहीं, बल्कि “आशीर्वाद से भरी हुई प्रतिभा” है। हरिहरन ने कहा कि उन्हें आशा जी के साथ काम करने का सौभाग्य मिला और वह उन्हें परिवार का हिस्सा मानते हैं। उनके लिए उनका जाना किसी परिवार के सदस्य जैसा दुख है। उन्होंने कहा कि आशा जी ने हर तरह के संगीत, क्लासिकल, रोमांटिक और अन्य जॉनर्स में अपनी अलग पहचान बनाई। 90 की उम्र के बाद भी उनमें वही ऊर्जा और जोश था, जो युवा कलाकार में होता है। हरिहरन ने बताया कि 1984–85 में उन्होंने आशा जी के लिए एक गजल एल्बम कंपोज किया था। उसमें आठ गजलें थीं, जिनमें छह सोलो उन्होंने गाईं और दो डुएट उन्होंने खुद गाए थे। उन्होंने बताया कि उस समय वे नए कलाकार थे, लेकिन आशा जी ने उन्हें छोटा महसूस नहीं होने दिया। उनका व्यवहार सरल और प्यार से भरा था। उन्होंने हर गाने को ध्यान और मेहनत से सीखा और गाया। हरिहरन ने कहा कि उस अनुभव से उन्हें बड़ा सबक मिला, अगर बड़ा बनना है तो सरल रहना और काम पर ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि यही सीख उन्होंने आज तक संभाल कर रखी है। अंत में उन्होंने आशा जी को सरल, विनम्र और हंसमुख कलाकार बताया, जिनकी मुस्कान हर माहौल को रोशन करती थी। कैलाश खेर बोले- आशा जी हमेशा विनम्र और मिलनसार रहीं “हमारी मुलाकातें कई बार मंच पर हुई हैं- कभी रियलिटी शो में, कभी इवेंट्स में,” यह कहते हुए कैलाश खेर ने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि 2007 में, करियर के शुरुआती दौर में पहली एल्बम 2006 में आई थी। उन्हें आशा भोसले के साथ यूएस और कनाडा का करीब एक महीने का टूर मिला। इस दौरान उन्होंने करीब 10 शहरों में परफॉर्म किया। कैलाश खेर ने कहा कि उस टूर में उन्होंने उन्हें करीब से जाना। इतनी बड़ी सीनियर कलाकार होने के बावजूद उनका व्यवहार सरल और अपनापन भरा था। गाड़ी या फ्लाइट—हर जगह वह कॉर्डियल और सहज रहती थीं। उन्होंने कहा, “इससे मुझे उनके स्वभाव का असली पता चला, बहुत मिलनसार और विनम्र। ऐसा नहीं था कि सीनियर होने का घमंड हो। वह सबके साथ बराबरी और प्यार से बात करती थीं।” कैलाश खेर ने कहा कि लंबे टूर से इंसान की असली प्रकृति सामने आती है, कैसा व्यवहार और कितनी विनम्रता है। आशा भोसले में उन्होंने यही खूबी देखी, सीनियर होकर भी सरल, जमीन से जुड़ी और संवेदनशील व्यक्तित्व। अनूप जलोटा बोले- आशा जी अमर हैं और उन्हें हमेशा याद किया जाएगा भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की प्लेबैक सिंगिंग की दूसरी मजबूत स्तंभ चली गई हैं। दो बड़े स्तंभ थे, लता मंगेशकर और आशा भोसले। नई सिंगर्स इन्हीं को आदर्श मानती हैं। उन्होंने अपनी गायकी से एक यूनिवर्सिटी बनाई, जिससे पीढ़ियां सीखती रहेंगी। भजन सम्राट अनूप जलोटा ने कहा कि आशा जी का जाना फिल्म इंडस्ट्री के लिए बड़ा नुकसान है। उन्होंने बताया कि आशा भोसले को खाना बनाने का शौक था और उन्होंने कई बार कबाब और बिरयानी बनाकर खिलाई। उन्होंने कहा कि इसी शौक के कारण कई जगहों पर उनके नाम से रेस्टोरेंट शुरू हुए। दुबई समेत कई देशों में उनके रेस्टोरेंट हैं, जहां उनकी पसंद की डिशेज परोसी जाती हैं। अनूप जलोटा के अनुसार, आशा भोसले को भुलाया नहीं जा सकता। वे भारतीय फिल्म संगीत की मजबूत स्तंभ थीं। उन्होंने हर तरह के गाने, भजन, गजल और फिल्मी गाए। हर शैली में उनकी पकड़ शानदार थी। उनकी आवाज में चुलबुलापन और ठहराव दोनों थे। यही उन्हें अलग बनाता है। ललित पंडित बोले- आशा भोसले आखिरी दिग्गज थीं, उनके जैसा न कोई था, न होगा संगीतकार ललित पंडित ने आशा भोसले को याद करते हुए कहा, “दो हफ्ते पहले ही मेरी उनसे बात हुई थी। मैंने फोन कर उनकी तबीयत पूछी तो उन्होंने बहुत प्यार से लंबी बातचीत की। बोलीं- तबीयत ठीक नहीं है, मगर चल रहा है। उस बातचीत में भी वही अपनापन था, जो हमेशा रहा।” वह कहते हैं, “हमारा रिश्ता बहुत पुराना है। मैं बचपन से उनके साथ गा रहा हूं, वो हमें तब से जानती थीं। बाद में खिलाड़ी, प्यार तो होना ही था और दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी फिल्मों में उन्होंने हमारे लिए गाया। हर गाने में उन्होंने अपनी जान डाल दी। ‘ज़रा सा झूम लूं मैं’ में जो एक्सप्रेशन उन्होंने दिए, वो आज भी मिसाल हैं।” ललित पंडित बताते हैं, “वो बड़ी कलाकार थीं, लेकिन कभी महसूस नहीं होने देती थीं। हर गाने से पहले म्यूजिक रूम में आकर रिहर्सल करती थीं और ऐसा माहौल बना देती थीं कि हम सीखते रहते थे। उनका स्वभाव विनम्र और खुशमिजाज था।” वह याद करते हैं, “हमारे करियर में उनका बड़ा हाथ रहा। उन्होंने ही यश चोपड़ा को फोन कर हमें सुनने को कहा था। उस एक कॉल ने हमारी जिंदगी बदल दी।” अंत में वह कहते हैं, “उनकी वर्सेटिलिटी का कोई मुकाबला नहीं है। जैसा काम उन्होंने किया है, वैसा फिर कभी नहीं होगा। ये इंडस्ट्री के लिए बड़ा नुकसान है, लेकिन उनके गाने हमेशा जिंदा रहेंगे। वो सच में आखिरी दिग्गज कलाकार थीं।” उत्तम सिंह ने कहा- रात डेढ़ बजे आशा जी ने खुद खाना बनाकर खिलाया संगीतकार उत्तम सिंह ने बताया कि आशा जी के साथ काम करते हुए कई यादें बनीं, जिनमें फिल्म दिल तो पागल है का दौर भी शामिल है। उस समय उन्होंने उनके काम के प्रति समर्पण और ऊर्जा को करीब से देखा। उन्होंने बताया कि एक बार रात 1:30 बजे तक काम चल रहा था। जब वे बाहर निकल रहे थे, तभी आशा जी आईं। उन्हें पता चला कि किसी ने खाना नहीं खाया, तो उन्होंने 15 मिनट में चिकन और चावल बनाकर सबको खिलाया। यह उनके अपनापन को दिखाता है। उत्तम सिंह ने बताया कि आशा जी काम को लेकर प्रोफेशनल थीं। एक बार वे रिकॉर्डिंग के लिए आईं, चेहरा उतरा था और आंखें नम थीं, लेकिन गाने के वक्त उन्होंने शानदार कैबरे सॉन्ग गाया और किसी को उनकी हालत का अंदाजा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि आशा भोसले जैसी कलाकार बहुत कम पैदा होते हैं। उन्होंने हजारों गाने गाए, जो दिलों में जिंदा रहेंगे। उनके जाने से इंडस्ट्री को बड़ा नुकसान हुआ है, लेकिन उनकी आवाज और काम उन्हें अमर बनाए रखेगा। डब्बू मालिक बोले- संगीत का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया गायक-संगीतकार डब्बू मलिक ने कहा कि आशा भोसले के निधन की खबर सुनकर उन्हें लगा जैसे संगीत का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया। उनके मुताबिक उनका जीवन प्रेरणादायक रहा है और उनकी संगीत यात्रा किसी ग्रंथ जैसी है। डब्बू मलिक ने बताया कि उनके परिवार, सरदार मलिक, अनु मलिक और पूरे परिवार से आशा जी का गहरा रिश्ता था। उन्होंने कठिन समय में उनके पिता सरदार मलिक की मदद की और हमेशा परिवार की चिंता करती थीं। उन्होंने कहा कि आशा जी न सिर्फ महान गायिका थीं, बल्कि बड़ी इंसान भी थीं, जो हर किसी की फिक्र करती थीं। उन्होंने बताया कि एक बार स्टूडियो में वे उन्हें गाना सिखा रहे थे, तभी आशा जी ने कहा, “अच्छा, तुम गाकर सुनाओ।” जब उन्होंने कहा कि उन्हें हारमोनियम नहीं आता, तो आशा जी ने उन्हें छोटा महसूस नहीं होने दिया। उन्होंने कहा कि आशा जी ने उन्हें समझाया कि हर इंसान का तरीका अलग होता है और हर कलाकार हर चीज में माहिर नहीं होता। उन्होंने उन्हें आत्मविश्वास दिया और कहा कि अपने आप को कभी कम मत समझो। डब्बू मलिक ने कहा कि यह अनुभव उनके लिए मां जैसी सीख था और उनके जीवन की बड़ी सीखों में से एक है।
रमेश सिप्पी बोले- संगीत की वह जादुई आवाज हमेशा के लिए शांत हो गई निर्देशक रमेश सिप्पी ने लता मंगेशकर और आशा भोसले को भारतीय संगीत के दो मजबूत स्तंभ बताया। उन्होंने कहा कि तुलना होती रही, लेकिन आशा जी ने अपनी अलग पहचान बनाई। सिप्पी बताते हैं कि आशा भोसले के सामने चुनौती थी कि लता मंगेशकर पहले ही शिखर पर थीं। ऐसे में उन्हें अपनी अलग शैली बनानी पड़ी। उन्हें सही दिशा ओ.पी. नैयर ने दी, जिन्होंने उनकी आवाज़ में चुलबुलापन और आधुनिकता पहचानी। इसके बाद “जाइए आप कहाँ जाइएगा” से उन्होंने साबित किया कि वे किसी से कम नहीं हैं। रमेश सिप्पी ने फिल्म ‘शान’ का किस्सा बताया। उन्होंने कहा कि ताज होटल में मुहूर्त के दौरान आशा जी ने “प्यार करने वाले प्यार करते हैं शान से” गाया, जबकि परवीन बॉबी स्क्रीन पर थीं। उस सीन ने फिल्म को यादगार बना दिया। वे बताते हैं कि ‘शोले’ और कई फिल्मों में गानों का चुनाव मूड और किरदार के हिसाब से होता था। जहां भावनात्मक गाने होते, वहां लता जी चुनी जाती थीं और जहां ऊर्जा व शरारत होती, वहां आशा जी उपयुक्त थीं। सिप्पी के मुताबिक, आर.डी. बर्मन के साथ आशा भोसले की जोड़ी ने नए प्रयोग किए और “चुरा लिया है” जैसे गाने आज भी लोकप्रिय हैं। उन्होंने कहा कि आशा भोसले अनुशासित कलाकार थीं, जो हर गाने को परफेक्ट बनाने के लिए घंटों रिहर्सल करती थीं। अंत में सिप्पी ने कहा कि आज जब आशा भोसले हमारे बीच नहीं हैं, तो लगता है जैसे संगीत की वह जादुई आवाज हमेशा के लिए शांत हो गई हो।

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