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तालियों से नहीं, विश्वसनीयता से तय होती है आपकी कीमत:जो अपनी भूल मानने को तैयार नहीं, वह सच तक नहीं पहुंच सकता

तालियों से नहीं, विश्वसनीयता से तय होती है आपकी कीमत:जो अपनी भूल मानने को तैयार नहीं, वह सच तक नहीं पहुंच सकता

किसी भी पेशे में और खास तौर पर लेखन तथा कला के क्षेत्र में अहम चीज इंटेग्रिटी है। टैलेंट से भी ज्यादा क्योंकि प्रतिभा आपको पहचान दिला सकती है, लेकिन असली पहचान इस बात से बनती है कि आप अपने काम और अपने आप से कितने ईमानदार हैं। इंटेग्रिटी का मतलब सिर्फ सच बोलना नहीं है, बल्कि अपने विश्वासों और अपने व्यवहार के बीच कोई फासला न होने देना है। जो बात आप दूसरों से कहते हैं, वही बात अपने लिए भी लागू करना- यही इंटेग्रिटी है। इसका मतलब है विचारों, संवेदना, रचनात्मकता और अभिव्यक्ति के प्रति सच्चा होना। कलाकार का पहला फर्ज यह नहीं है कि वह लोगों को वही दे जो वे सुनना चाहते हैं; उसका पहला फर्ज है कि वो कहे जिसे वह सच मानता है। इंसान की अपनी सीमाएं, कमजोंरियां हो सकती हैं, वह गलतियां भी कर सकता है; लेकिन अगर उसमें ईमानदारी है तो अपनी गलतियों को पहचान लेगा और उनसे सीख लेगा। परफेक्शन एक भ्रम है, लेकिन ईमानदारी वह चीज है जो आपको जिंदा और प्रासंगिक बनाए रखती है। इंटेग्रिटी का मतलब जिद नहीं, बल्कि सत्य के प्रति निष्ठा है। विनम्रता और आत्म-परीक्षण भी इसका हिस्सा हैं। जब मैंने पहली बार फिल्म ‘लगान’ की कहानी सुनी थी, तो मुझे लगा था कि यह फिल्म शायद नहीं चलेगी। बाद में वही फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी गई। मुझे अपनी उस राय को गलत मानने में कोई झिझक नहीं हुई। अपनी गलती स्वीकार करने का साहस भी बौद्धिक ईमानदारी में शामिल है। जो आदमी अपनी भूल मानने को तैयार नहीं, वह सच तक नहीं पहुंच सकता। आज भी मुझे कभी यह भ्रम नहीं होता कि मैं दुनिया के बाकी लोगों से ज्यादा योग्य हूं। अपने बारे में झूठे भ्रम पाल लेना भी एक तरह की बेईमानी है। कला में ईमानदारी का एक और अर्थ है- अपने विश्वास और सांस्कृतिक पहचान के प्रति निष्ठा। मुझे कभी-कभी यह देखकर अफसोस होता है कि कुछ फिल्मकार समाज, तहजीब और सांस्कृतिक विरासत से कटते जा रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे उन्हें अपनी ही परंपराओं से संकोच होने लगा है। मेरे खयाल में किसी कलाकार की पहली जिम्मेदारी यह है कि वह अपनी सच्चाई के प्रति ईमानदार रहे। केवल ज्यादा आधुनिक या अंतरराष्ट्रीय दिखाई देने के लिए अपनी जड़ों से दूरी बना लेना मुझे कलात्मक ईमानदारी के खिलाफ लगता है। मुझे हमेशा यह लगा है कि महान सिनेमा की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती, उसकी अपनी एक सच्चाई होती है। आप अकिरा कुरोसावा, इंगमार बर्गमैन, फेदेरिको फेलिनी को देख लीजिए, या फिर सत्यजित राय को। इन सबकी फिल्मों की भाषा, संस्कृति और परिवेश अलग हैं, लेकिन एक चीज साझा है- अपने अनुभव और अपनी दृष्टि के प्रति अटूट ईमानदारी। सत्यजित राय की फिल्मों में मुझे यही ईमानदारी दिखाई देती है। उन्होंने कभी दर्शकों पर प्रभाव डालने के लिए कृत्रिम भावुकता का सहारा नहीं लिया। उनके पात्र ज़िंदगी से आते हैं और ज़िंदगी की तरह ही हमारे सामने उपस्थित होते हैं। दिलचस्प है जितनी ईमानदारी से वे स्थानीय रहे, उतने ही वैश्विक, ग्लोबल हो गए। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान पर पूरा भरोसा था। उन्होंने बंगाल की मिट्टी, वहां के लोगों और दुनिया को पूरी सच्चाई के साथ दिखाया। सत्तर के दशक में स्क्रिप्ट पर काम करते हुए सलीम साहब और मेरी हमेशा यही कोशिश रही कि कहानी के साथ बेईमानी न हो। इंटेग्रिटी केवल व्यक्तिगत गुण नहीं; यह संस्थागत और पेशेवर नैतिकता का भी प्रश्न है। ‘दीवार’ में विजय को हमने संत नहीं बनाया, क्योंकि वह था नहीं। ‘शक्ति’ में हमने किसी एक पात्र को पूरी तरह सही और दूसरे को पूरी तरह गलत नहीं ठहराया, क्योंकि ज़िंदगी इतनी सरल नहीं होती। ‘जंजीर’ में हमने जानबूझकर कथा को कसा हुआ रखा। उस दौर में हर फिल्म में एक्स्ट्रा गीत, हास्य और रोमांस जोड़ने का दबाव था, लेकिन अगर हर दृश्य केवल दर्शकों को खुश करने के लिए लिखा जाए, तो कहानी की रीढ़ टूट जाती है। मेरे लिए फिल्म अच्छी है या बुरी, यह अलग बहस है। असली सवाल यह है कि क्या फिल्मकार को अपनी बनाई हुई फिल्म पर खुद यकीन है। मेरा मानना है कि हर कलाकार को वही काम करना चाहिए जिस पर उसका दिल और दिमाग दोनों राजी हों। लोकप्रियता और सच्चाई के बीच चुनाव का क्षण ही कलाकार की असली परीक्षा है। आसान रास्ता चुनकर शायद आप सफलता हासिल कर लें, लेकिन अगर उस सफलता की कीमत आपकी रचनात्मक ईमानदारी है तो वह सौदा बहुत महंगा है। और सबसे बड़ी बेईमानी तब होती है जब आप ऐसी चीज बनाने लगते हैं जिस पर आपका अपना विश्वास ही नहीं है। महान कला और सिनेमा को ईमानदारी से अपने समय, समाज और अनुभव को व्यक्त करना चाहिए, न कि केवल दर्शकों को खुश करने के लिए बनाया जाना चाहिए। सिनेमा अंतत: समाज से निकलता है और समाज के मनोभावों को प्रतिबिंबित करता है। यही वजह है कि कुरोसावा की जापान में बनी हुई फिल्म हमें भारत में भी छूती है, और राय की बंगाल में बनी हुई फिल्म दुनिया के दूसरे छोर पर बैठे दर्शक को भी अपनी लगती है। स्थानीय होने और सार्वभौमिक होने के बीच कोई विरोध नहीं है। सच्चाई से कही गई स्थानीय कहानी ही अंततः सार्वभौमिक बनती है। दक्षिण भारतीय सिनेमा की सफलता का कारण भी उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव बताया है। मेरे खयाल में कलाकार की असली इंटेग्रिटी इसी में है कि वह अपनी मिट्टी से जुड़ा रहे और अपनी सच्चाई पर भरोसा रखे। जो कलाकार अपनी पहचान से भागता है, वह अक्सर दुनिया तक भी नहीं पहुंच पाता। लेकिन जो अपनी सच्चाई के साथ खड़ा रहता है, उसकी आवाज सीमाओं और भाषाओं से बहुत आगे तक सुनाई देती है। आज की समस्या यह नहीं है कि हमारे फिल्मकार अंतरराष्ट्रीय सिनेमा देखते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब वे उससे सीखने के बजाय उसकी नकल करने लगते हैं। प्रभाव लेना और बात है, अपनी पहचान खो देना दूसरी बात। मेरा मानना है कि दुनिया की खिड़कियां खुली रखिए, लेकिन अपने घर की नींव को मत उखाड़िए। यदि आप हर समय सबको खुश करने की कोशिश करेंगे, तो अंततः अपने आप से बेईमानी करने लगेंगे। यदि हर बात केवल तालियां पाने के लिए कही जाए, तो वह बौद्धिक ईमानदारी नहीं रह जाती। इंसान की कीमत उसकी कामयाबी से नहीं, उसकी विश्वसनीयता से तय होती है। आपसे गलती हो सकती है, आपकी राय गलत हो सकती है, आपका काम कभी-कभी कमजोर भी हो सकता है। लेकिन अगर आप अपने काम, शब्द और जमीर के प्रति ईमानदार हैं, तो लोग आपसे इत्तफाक न रखते हुए भी आप पर भरोसा करेंगे। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)

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किसी भी पेशे में और खास तौर पर लेखन तथा कला के क्षेत्र में अहम चीज इंटेग्रिटी है। टैलेंट से भी ज्यादा क्योंकि प्रतिभा आपको पहचान दिला सकती है, लेकिन असली पहचान इस बात से बनती है कि आप अपने काम और अपने आप से कितने ईमानदार हैं। इंटेग्रिटी का मतलब सिर्फ सच बोलना नहीं है, बल्कि अपने विश्वासों और अपने व्यवहार के बीच कोई फासला न होने देना है। जो बात आप दूसरों से कहते हैं, वही बात अपने लिए भी लागू करना- यही इंटेग्रिटी है। इसका मतलब है विचारों, संवेदना, रचनात्मकता और अभिव्यक्ति के प्रति सच्चा होना। कलाकार का पहला फर्ज यह नहीं है कि वह लोगों को वही दे जो वे सुनना चाहते हैं; उसका पहला फर्ज है कि वो कहे जिसे वह सच मानता है। इंसान की अपनी सीमाएं, कमजोंरियां हो सकती हैं, वह गलतियां भी कर सकता है; लेकिन अगर उसमें ईमानदारी है तो अपनी गलतियों को पहचान लेगा और उनसे सीख लेगा। परफेक्शन एक भ्रम है, लेकिन ईमानदारी वह चीज है जो आपको जिंदा और प्रासंगिक बनाए रखती है। इंटेग्रिटी का मतलब जिद नहीं, बल्कि सत्य के प्रति निष्ठा है। विनम्रता और आत्म-परीक्षण भी इसका हिस्सा हैं। जब मैंने पहली बार फिल्म ‘लगान’ की कहानी सुनी थी, तो मुझे लगा था कि यह फिल्म शायद नहीं चलेगी। बाद में वही फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी गई। मुझे अपनी उस राय को गलत मानने में कोई झिझक नहीं हुई। अपनी गलती स्वीकार करने का साहस भी बौद्धिक ईमानदारी में शामिल है। जो आदमी अपनी भूल मानने को तैयार नहीं, वह सच तक नहीं पहुंच सकता। आज भी मुझे कभी यह भ्रम नहीं होता कि मैं दुनिया के बाकी लोगों से ज्यादा योग्य हूं। अपने बारे में झूठे भ्रम पाल लेना भी एक तरह की बेईमानी है। कला में ईमानदारी का एक और अर्थ है- अपने विश्वास और सांस्कृतिक पहचान के प्रति निष्ठा। मुझे कभी-कभी यह देखकर अफसोस होता है कि कुछ फिल्मकार समाज, तहजीब और सांस्कृतिक विरासत से कटते जा रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे उन्हें अपनी ही परंपराओं से संकोच होने लगा है। मेरे खयाल में किसी कलाकार की पहली जिम्मेदारी यह है कि वह अपनी सच्चाई के प्रति ईमानदार रहे। केवल ज्यादा आधुनिक या अंतरराष्ट्रीय दिखाई देने के लिए अपनी जड़ों से दूरी बना लेना मुझे कलात्मक ईमानदारी के खिलाफ लगता है। मुझे हमेशा यह लगा है कि महान सिनेमा की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती, उसकी अपनी एक सच्चाई होती है। आप अकिरा कुरोसावा, इंगमार बर्गमैन, फेदेरिको फेलिनी को देख लीजिए, या फिर सत्यजित राय को। इन सबकी फिल्मों की भाषा, संस्कृति और परिवेश अलग हैं, लेकिन एक चीज साझा है- अपने अनुभव और अपनी दृष्टि के प्रति अटूट ईमानदारी। सत्यजित राय की फिल्मों में मुझे यही ईमानदारी दिखाई देती है। उन्होंने कभी दर्शकों पर प्रभाव डालने के लिए कृत्रिम भावुकता का सहारा नहीं लिया। उनके पात्र ज़िंदगी से आते हैं और ज़िंदगी की तरह ही हमारे सामने उपस्थित होते हैं। दिलचस्प है जितनी ईमानदारी से वे स्थानीय रहे, उतने ही वैश्विक, ग्लोबल हो गए। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान पर पूरा भरोसा था। उन्होंने बंगाल की मिट्टी, वहां के लोगों और दुनिया को पूरी सच्चाई के साथ दिखाया। सत्तर के दशक में स्क्रिप्ट पर काम करते हुए सलीम साहब और मेरी हमेशा यही कोशिश रही कि कहानी के साथ बेईमानी न हो। इंटेग्रिटी केवल व्यक्तिगत गुण नहीं; यह संस्थागत और पेशेवर नैतिकता का भी प्रश्न है। ‘दीवार’ में विजय को हमने संत नहीं बनाया, क्योंकि वह था नहीं। ‘शक्ति’ में हमने किसी एक पात्र को पूरी तरह सही और दूसरे को पूरी तरह गलत नहीं ठहराया, क्योंकि ज़िंदगी इतनी सरल नहीं होती। ‘जंजीर’ में हमने जानबूझकर कथा को कसा हुआ रखा। उस दौर में हर फिल्म में एक्स्ट्रा गीत, हास्य और रोमांस जोड़ने का दबाव था, लेकिन अगर हर दृश्य केवल दर्शकों को खुश करने के लिए लिखा जाए, तो कहानी की रीढ़ टूट जाती है। मेरे लिए फिल्म अच्छी है या बुरी, यह अलग बहस है। असली सवाल यह है कि क्या फिल्मकार को अपनी बनाई हुई फिल्म पर खुद यकीन है। मेरा मानना है कि हर कलाकार को वही काम करना चाहिए जिस पर उसका दिल और दिमाग दोनों राजी हों। लोकप्रियता और सच्चाई के बीच चुनाव का क्षण ही कलाकार की असली परीक्षा है। आसान रास्ता चुनकर शायद आप सफलता हासिल कर लें, लेकिन अगर उस सफलता की कीमत आपकी रचनात्मक ईमानदारी है तो वह सौदा बहुत महंगा है। और सबसे बड़ी बेईमानी तब होती है जब आप ऐसी चीज बनाने लगते हैं जिस पर आपका अपना विश्वास ही नहीं है। महान कला और सिनेमा को ईमानदारी से अपने समय, समाज और अनुभव को व्यक्त करना चाहिए, न कि केवल दर्शकों को खुश करने के लिए बनाया जाना चाहिए। सिनेमा अंतत: समाज से निकलता है और समाज के मनोभावों को प्रतिबिंबित करता है। यही वजह है कि कुरोसावा की जापान में बनी हुई फिल्म हमें भारत में भी छूती है, और राय की बंगाल में बनी हुई फिल्म दुनिया के दूसरे छोर पर बैठे दर्शक को भी अपनी लगती है। स्थानीय होने और सार्वभौमिक होने के बीच कोई विरोध नहीं है। सच्चाई से कही गई स्थानीय कहानी ही अंततः सार्वभौमिक बनती है। दक्षिण भारतीय सिनेमा की सफलता का कारण भी उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव बताया है। मेरे खयाल में कलाकार की असली इंटेग्रिटी इसी में है कि वह अपनी मिट्टी से जुड़ा रहे और अपनी सच्चाई पर भरोसा रखे। जो कलाकार अपनी पहचान से भागता है, वह अक्सर दुनिया तक भी नहीं पहुंच पाता। लेकिन जो अपनी सच्चाई के साथ खड़ा रहता है, उसकी आवाज सीमाओं और भाषाओं से बहुत आगे तक सुनाई देती है। आज की समस्या यह नहीं है कि हमारे फिल्मकार अंतरराष्ट्रीय सिनेमा देखते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब वे उससे सीखने के बजाय उसकी नकल करने लगते हैं। प्रभाव लेना और बात है, अपनी पहचान खो देना दूसरी बात। मेरा मानना है कि दुनिया की खिड़कियां खुली रखिए, लेकिन अपने घर की नींव को मत उखाड़िए। यदि आप हर समय सबको खुश करने की कोशिश करेंगे, तो अंततः अपने आप से बेईमानी करने लगेंगे। यदि हर बात केवल तालियां पाने के लिए कही जाए, तो वह बौद्धिक ईमानदारी नहीं रह जाती। इंसान की कीमत उसकी कामयाबी से नहीं, उसकी विश्वसनीयता से तय होती है। आपसे गलती हो सकती है, आपकी राय गलत हो सकती है, आपका काम कभी-कभी कमजोर भी हो सकता है। लेकिन अगर आप अपने काम, शब्द और जमीर के प्रति ईमानदार हैं, तो लोग आपसे इत्तफाक न रखते हुए भी आप पर भरोसा करेंगे। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)

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