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मार्च-अप्रैल में बीमारियों से बचने के उपाय: डॉ. परिनीता कौर के सुझाव

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मार्च-अप्रैल में लोग सबसे ज्यादा बीमार पड़ते हैं. हर दिन बदलता मौसम इसका एक बड़ा कारण है. ऐसे में अगर आप एयर-कंडीशन्ड ऑफिस से अचानक तेज गर्मी में निकलते हैं तो बीमार होने की संभावना और बढ़ जाती है. यह भले ही हमारी दिनचर्या का हिस्सा लग सकता है, लेकिन हमारा शरीर इसे अलग तरीके से महसूस करता है. तापमान में यह अचानक बदलाव शरीर पर एक तरह का “दोहरा थर्मल शॉक” डालता है, जिससे शरीर पर हल्का लेकिन असरदार दबाव पड़ता है.

डॉ. परिनीता कौर, एसोसिएट डायरेक्टर एवं यूनिट हेड – इंटरनल मेडिसिन, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, द्वारका बताती हैं कि हमारा शरीर अपने अंदर का तापमान संतुलित रखने की कोशिश करता है, जिसे थर्मोरेगुलेशन कहा जाता है. जब हम लंबे समय तक एसी में रहते हैं, तो शरीर ठंडे माहौल के अनुसार खुद को ढाल लेता है, जिससे पसीना कम आता है और शरीर की कुछ प्रक्रियाएं धीमी हो जाती हैं. फिर जैसे ही हम बाहर तेज गर्मी में जाते हैं, शरीर को अचानक सक्रिय होना पड़ता है जिससे पसीना आना शुरू होता है, त्वचा में रक्त संचार बढ़ता है और शरीर खुद को ठंडा करने की कोशिश करता है. यह बदलाव हमेशा आसान नहीं होता.

टेंपरेचर में बदलाव का असर
इसका सबसे आम असर थकान के रूप में दिखता है. शरीर को खुद को ढालने में ज्यादा ऊर्जा लगती है, जिससे बिना ज्यादा काम किए भी थकान महसूस होती है. सिरदर्द भी एक सामान्य समस्या है, जो अक्सर डिहाइड्रेशन या तापमान में अचानक बदलाव से होता है. समय के साथ यह स्थिति काम करने की क्षमता और पूरे सेहत पर भी असर डाल सकती है.

रेस्टिरेटरी सिस्टम की गड़बड़ी
रेस्पिरेटरी सिस्टम भी इससे प्रभावित होता है. एसी वाले कमरों में नमी कम होती है, जिससे नाक और गला सूख जाता है. इससे एलर्जी, जलन और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. इसके तुरंत बाद जब हम गर्म और नमी भरी हवा में जाते हैं, तो यह समस्या और बढ़ सकती है, जिससे खांसी, गले में परेशानी या साइनस की दिक्कत हो सकती है.

स्किन प्रॉब्लम
त्वचा पर भी इसका असर पड़ता है. एसी में ज्यादा समय बिताने से त्वचा की नमी कम हो जाती है, जिससे सूखापन और संवेदनशीलता बढ़ती है. बाहर की गर्मी, प्रदूषण और धूप के संपर्क में आने पर त्वचा में जलन, टैनिंग या पिंपल्स हो सकते हैं. बार-बार होने वाला यह बदलाव त्वचा की सुरक्षा परत को कमजोर कर देता है.

इन लोगों के लिए ज्यादा खतरा
टेंपरेचर में यह असंतुलन हल्के डिहाइड्रेशन का कारण बन सकता है, जो लंबे समय में ऊर्जा, ध्यान और किडनी के काम पर असर डाल सकता है. इसके साथ ही जिन लोगों को पहले से माइग्रेन, अस्थमा या दिल से जुड़ी समस्याएं हैं, उनके लिए यह तापमान बदलाव ट्रिगर बन सकता है. इससे रक्त वाहिकाओं में बदलाव आता है, सांस लेने में फर्क पड़ता है और लक्षण बढ़ सकते हैं.

तो इससे बचाव कैसे किया जाए?
सबसे जरूरी है धीरे-धीरे बदलाव को अपनाना और कुछ आदतों में सुधार करना. एसी का तापमान बहुत कम न रखें, बल्कि सामान्य स्तर पर रखें ताकि शरीर को ढलने में आसानी हो. दिनभर पर्याप्त पानी पीते रहें, भले ही प्यास न लगे. बाहर जाते समय हल्का दुपट्टा या जैकेट पहनना अचानक बदलाव को कम कर सकता है. इसके अलावा, त्वचा की देखभाल, मॉइस्चराइज़र का इस्तेमाल और इनडोर हवा की गुणवत्ता का ध्यान रखना भी जरूरी है.

Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

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डॉ. परिनीता कौर, एसोसिएट डायरेक्टर एवं यूनिट हेड – इंटरनल मेडिसिन, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, द्वारका बताती हैं कि हमारा शरीर अपने अंदर का तापमान संतुलित रखने की कोशिश करता है, जिसे थर्मोरेगुलेशन कहा जाता है. जब हम लंबे समय तक एसी में रहते हैं, तो शरीर ठंडे माहौल के अनुसार खुद को ढाल लेता है, जिससे पसीना कम आता है और शरीर की कुछ प्रक्रियाएं धीमी हो जाती हैं. फिर जैसे ही हम बाहर तेज गर्मी में जाते हैं, शरीर को अचानक सक्रिय होना पड़ता है जिससे पसीना आना शुरू होता है, त्वचा में रक्त संचार बढ़ता है और शरीर खुद को ठंडा करने की कोशिश करता है. यह बदलाव हमेशा आसान नहीं होता.

टेंपरेचर में बदलाव का असर
इसका सबसे आम असर थकान के रूप में दिखता है. शरीर को खुद को ढालने में ज्यादा ऊर्जा लगती है, जिससे बिना ज्यादा काम किए भी थकान महसूस होती है. सिरदर्द भी एक सामान्य समस्या है, जो अक्सर डिहाइड्रेशन या तापमान में अचानक बदलाव से होता है. समय के साथ यह स्थिति काम करने की क्षमता और पूरे सेहत पर भी असर डाल सकती है.

रेस्टिरेटरी सिस्टम की गड़बड़ी
रेस्पिरेटरी सिस्टम भी इससे प्रभावित होता है. एसी वाले कमरों में नमी कम होती है, जिससे नाक और गला सूख जाता है. इससे एलर्जी, जलन और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. इसके तुरंत बाद जब हम गर्म और नमी भरी हवा में जाते हैं, तो यह समस्या और बढ़ सकती है, जिससे खांसी, गले में परेशानी या साइनस की दिक्कत हो सकती है.

स्किन प्रॉब्लम
त्वचा पर भी इसका असर पड़ता है. एसी में ज्यादा समय बिताने से त्वचा की नमी कम हो जाती है, जिससे सूखापन और संवेदनशीलता बढ़ती है. बाहर की गर्मी, प्रदूषण और धूप के संपर्क में आने पर त्वचा में जलन, टैनिंग या पिंपल्स हो सकते हैं. बार-बार होने वाला यह बदलाव त्वचा की सुरक्षा परत को कमजोर कर देता है.

इन लोगों के लिए ज्यादा खतरा
टेंपरेचर में यह असंतुलन हल्के डिहाइड्रेशन का कारण बन सकता है, जो लंबे समय में ऊर्जा, ध्यान और किडनी के काम पर असर डाल सकता है. इसके साथ ही जिन लोगों को पहले से माइग्रेन, अस्थमा या दिल से जुड़ी समस्याएं हैं, उनके लिए यह तापमान बदलाव ट्रिगर बन सकता है. इससे रक्त वाहिकाओं में बदलाव आता है, सांस लेने में फर्क पड़ता है और लक्षण बढ़ सकते हैं.

तो इससे बचाव कैसे किया जाए?
सबसे जरूरी है धीरे-धीरे बदलाव को अपनाना और कुछ आदतों में सुधार करना. एसी का तापमान बहुत कम न रखें, बल्कि सामान्य स्तर पर रखें ताकि शरीर को ढलने में आसानी हो. दिनभर पर्याप्त पानी पीते रहें, भले ही प्यास न लगे. बाहर जाते समय हल्का दुपट्टा या जैकेट पहनना अचानक बदलाव को कम कर सकता है. इसके अलावा, त्वचा की देखभाल, मॉइस्चराइज़र का इस्तेमाल और इनडोर हवा की गुणवत्ता का ध्यान रखना भी जरूरी है.

Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

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