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18 लाख साल से मच्छर पी रहे हैं इंसानों का खून, रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा | Mosquitoes Sucking Human Blood Since 1.8 Million Years

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मच्छरों को कब लगा इंसानों के खून का चस्का? आज भी हर साल लेते हैं 6 लाख की जान

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दुनिया का सबसे खतरनाक जानवर कौन है? शेर, शार्क या सांप? जवाब है मच्छर. ये नन्हा सा जीव हर साल करीब 6 लाख से ज्यादा लोगों की जान ले लेता है. मलेरिया, डेंगू और वेस्ट नाइल वायरस जैसी बीमारियों के जरिए इसने सदियों से इंसानों को खौफ में रखा है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मच्छरों ने इंसानों का खून पीना कब शुरू किया? एक नई इंटरनेशनल रिसर्च ने चौंकाने वाला दावा किया है. रिसर्च के मुताबिक, मच्छरों और इंसानों का ये खूनी रिश्ता आज का नहीं, बल्कि करीब 18 लाख साल पुराना है.

साइंटिस्ट्स ने डीएनए एनालिसिस के जरिए उस दौर का पता लगाया है जब मच्छरों ने जानवरों को छोड़कर आदिमानवों को अपना शिकार बनाना शुरू किया था. यह कहानी दक्षिण-पूर्व एशिया के जंगलों से शुरू होती है, जहां हमारे पूर्वज पहली बार इन नन्हे शिकारियों के संपर्क में आए थे.

साइंटिस्ट्स ने एनोफिलीज ल्यूकोस्फायरस ग्रुप के मच्छरों पर की है. ये वही ग्रुप है जिसके मच्छर मलेरिया फैलाते हैं. रिसर्च के लिए 1992 से 2020 के बीच दक्षिण-पूर्व एशिया से इकट्ठा किए गए 11 अलग-अलग प्रजातियों के मच्छरों का डीएनए टेस्ट किया गया. कंप्यूटर मॉडल्स की मदद से उनके म्यूटेशन और इवोल्यूशन की हिस्ट्री चेक की गई.

एनालिसिस से पता चला कि मच्छरों में इंसानों का खून पीने की आदत आज से 29 लाख से 16 लाख साल पहले के बीच डेवलप हुई. यह वह दौर था जब आदिमानव यानी होमो इरेक्टस पहली बार दक्षिण-पूर्व एशिया के सुंडालैंड इलाके में पहुंचे थे. सुंडालैंड आज के बोर्नियो, जावा और सुमात्रा जैसे द्वीपों का हिस्सा है.

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इस बदलाव से पहले मच्छर इस इलाके में रहने वाले दूसरे जानवरों और बंदरों का खून पीकर खुश थे. लेकिन जैसे ही होमो इरेक्टस की आबादी बढ़ी, मच्छरों के भीतर एक जेनेटिक बदलाव यानी म्यूटेशन हुआ. उन्होंने इंसानों की बॉडी ऑडर यानी शरीर की गंध को पहचानने वाले रिसेप्टर्स डेवलप कर लिए.

यह समझना जरूरी है कि मच्छरों का यह विकास अचानक नहीं हुआ. इंसानों की त्वचा पतली होती है और वे झुंड में रहते थे, जिससे मच्छरों के लिए खून पीना आसान हो गया. धीरे-धीरे मच्छरों ने इंसानी पसीने और कार्बन डाइऑक्साइड को पहचानने की क्षमता हासिल कर ली, जो उन्हें एक परफेक्ट शिकारी बनाती है.

यह रिसर्च इंसानों के इतिहास की खाली जगहों को भी भरती है. दक्षिण-पूर्व एशिया में आदिमानवों के बहुत कम जीवाश्म मिले हैं. ऐसे में मच्छरों के इवोल्यूशन की टाइमलाइन यह साबित करती है कि 18 लाख साल पहले इस इलाके में इंसानों की अच्छी-खासी आबादी मौजूद थी. अगर वहां इंसान नहीं होते, तो मच्छर कभी भी इंसानी खून के प्रति आकर्षित होने वाले जीन डेवलप नहीं करते. पुरानी थ्योरीज मानती थीं कि मच्छरों ने इंसानों को काटना 61 हजार से 5 लाख साल पहले शुरू किया था, लेकिन इस नई खोज ने इतिहास को लाखों साल पीछे धकेल दिया है.

आज दुनिया भर में मच्छरों की करीब 3,500 प्रजातियां हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही इंसान की जान की दुश्मन हैं. मलेरिया के अलावा डेंगू, पीला बुखार और जीका वायरस भी इन्हीं की देन हैं. मच्छरों की लार में मौजूद केमिकल्स इंसानी इम्यून सिस्टम को चकमा देने में माहिर होते हैं.

साइंटिस्ट्स का मानना है कि मच्छरों के इस पुराने इतिहास को समझकर हम भविष्य में बीमारियों को रोकने के नए तरीके खोज सकते हैं. फिलहाल तो ये साफ है कि जब तक इंसान धरती पर रहेंगे, ये 18 लाख साल पुराना ‘खून का खेल’ जारी रहेगा.

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साइंटिस्ट्स ने डीएनए एनालिसिस के जरिए उस दौर का पता लगाया है जब मच्छरों ने जानवरों को छोड़कर आदिमानवों को अपना शिकार बनाना शुरू किया था. यह कहानी दक्षिण-पूर्व एशिया के जंगलों से शुरू होती है, जहां हमारे पूर्वज पहली बार इन नन्हे शिकारियों के संपर्क में आए थे.

साइंटिस्ट्स ने एनोफिलीज ल्यूकोस्फायरस ग्रुप के मच्छरों पर की है. ये वही ग्रुप है जिसके मच्छर मलेरिया फैलाते हैं. रिसर्च के लिए 1992 से 2020 के बीच दक्षिण-पूर्व एशिया से इकट्ठा किए गए 11 अलग-अलग प्रजातियों के मच्छरों का डीएनए टेस्ट किया गया. कंप्यूटर मॉडल्स की मदद से उनके म्यूटेशन और इवोल्यूशन की हिस्ट्री चेक की गई.

एनालिसिस से पता चला कि मच्छरों में इंसानों का खून पीने की आदत आज से 29 लाख से 16 लाख साल पहले के बीच डेवलप हुई. यह वह दौर था जब आदिमानव यानी होमो इरेक्टस पहली बार दक्षिण-पूर्व एशिया के सुंडालैंड इलाके में पहुंचे थे. सुंडालैंड आज के बोर्नियो, जावा और सुमात्रा जैसे द्वीपों का हिस्सा है.

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यह समझना जरूरी है कि मच्छरों का यह विकास अचानक नहीं हुआ. इंसानों की त्वचा पतली होती है और वे झुंड में रहते थे, जिससे मच्छरों के लिए खून पीना आसान हो गया. धीरे-धीरे मच्छरों ने इंसानी पसीने और कार्बन डाइऑक्साइड को पहचानने की क्षमता हासिल कर ली, जो उन्हें एक परफेक्ट शिकारी बनाती है.

यह रिसर्च इंसानों के इतिहास की खाली जगहों को भी भरती है. दक्षिण-पूर्व एशिया में आदिमानवों के बहुत कम जीवाश्म मिले हैं. ऐसे में मच्छरों के इवोल्यूशन की टाइमलाइन यह साबित करती है कि 18 लाख साल पहले इस इलाके में इंसानों की अच्छी-खासी आबादी मौजूद थी. अगर वहां इंसान नहीं होते, तो मच्छर कभी भी इंसानी खून के प्रति आकर्षित होने वाले जीन डेवलप नहीं करते. पुरानी थ्योरीज मानती थीं कि मच्छरों ने इंसानों को काटना 61 हजार से 5 लाख साल पहले शुरू किया था, लेकिन इस नई खोज ने इतिहास को लाखों साल पीछे धकेल दिया है.

आज दुनिया भर में मच्छरों की करीब 3,500 प्रजातियां हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही इंसान की जान की दुश्मन हैं. मलेरिया के अलावा डेंगू, पीला बुखार और जीका वायरस भी इन्हीं की देन हैं. मच्छरों की लार में मौजूद केमिकल्स इंसानी इम्यून सिस्टम को चकमा देने में माहिर होते हैं.

साइंटिस्ट्स का मानना है कि मच्छरों के इस पुराने इतिहास को समझकर हम भविष्य में बीमारियों को रोकने के नए तरीके खोज सकते हैं. फिलहाल तो ये साफ है कि जब तक इंसान धरती पर रहेंगे, ये 18 लाख साल पुराना ‘खून का खेल’ जारी रहेगा.

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