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30-35 की उम्र में याददाश्त कमजोर क्यों हो रही है? क्या यह दिमागी बीमारी का संकेत, डॉक्टर से जानिए सच

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The Science of Brain Fog: जब व्यक्ति बुजुर्ग हो जाता है, तब उसकी याददाश्त कमजोर होने लगती है. यह उम्र का एक असर होता है और कई अन्य कारण भी इस परेशानी को बढ़ा देते हैं. मगर आजकल 30 से 40 साल की उम्र के लोग छोटी-छोटी चीजों को भूल रहे हैं और उनकी याददाश्त कमजोर होती दिख रही है. लोग अपने ऑफिस की चीजों से लेकर घर के कई जरूरी काम भूल जाते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह ब्रेन से जुड़ी किसी बीमारी का संकेत है? हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो युवाओं में भूलने की समस्या आमतौर पर कोई बीमारी नहीं होती है. आजकल की मॉडर्न लाइफस्टाइल और वर्कलोड के कारण ऐसा हो रहा है. अत्यधिक तनाव, अधूरी नींद और डिजिटल ओवरलोड के कारण हमारा ब्रेन थका हुआ महसूस कर रहा है.

जयपुर के सीके बिरला हॉस्पिटल के न्यूरोसाइंसेस डिपार्टमेंट के डायरेक्ट डॉ. अंजनी कुमार शर्मा ने TOI को बताया कि आज के दौर में हमारा ब्रेन सूचनाओं की बाढ़ से घिरा हुआ है. 90 के दशक में एक कर्मचारी के पास सीमित डिजिटल इनपुट होते थे, लेकिन आज हर कुछ मिनटों में नोटिफिकेशन, ईमेल, व्हाट्सएप मैसेज और सोशल मीडिया अलर्ट्स ध्यान भंग करते हैं. याददाश्त बनाने के लिए एकाग्रता जरूरी है. जब हमारा ध्यान बार-बार डिस्टर्ब होता है, तो ब्रेन जानकारी को ठीक से एनकोड नहीं कर पाता. 30 की उम्र में याददाश्त की शिकायतें अक्सर एकाग्रता की कमी, विटामिन B12 की कमी, थायराइड डिसऑर्डर और स्क्रीन के ओवर एक्सपोजर के कारण होती हैं. अधिकतर मामलों में ऐसा किसी दिमागी बीमारी के कारण नहीं होता है.

डॉक्टर के मुताबिक तनाव केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि बायोलॉजिकल प्रक्रिया है. जब हम लगातार तनाव में रहते हैं, तो शरीर कोर्टिसोल नामक हार्मोन रिलीज करता है. कोर्टिसोल की ज्यादा मात्रा ब्रेन के हिप्पोकैम्पस हिस्से को प्रभावित करती है, जो याददाश्त का मुख्य केंद्र है. आज के युवा करियर, फाइनेंशियल प्रेशर और सामाजिक तुलना के बीच लगातार सर्वाइवल मोड में रहते हैं. इस मोड में मस्तिष्क नई यादें जमा करने के बजाय केवल खतरों को पहचानने को प्राथमिकता देता है. बार-बार मल्टीटास्किंग करने से जानकारी को गहराई से सहेजने की क्षमता कम हो जाती है, जिसे अक्सर लोग मेमोरी लॉस समझते हैं.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

याददाश्त को बेहतर बनाए रखने के लिए अच्छी नींद जरूरी है. गहरी नींद के दौरान ब्रेन दिन भर की जानकारियों को प्रोसेस और स्टोर करने का काम करता है. एक वयस्क को रोज कम से कम 7 घंटे की नींद की जरूरत होती है, लेकिन अधिकांश कामकाजी लोग केवल 5 से 6 घंटे ही सो पाते हैं. नींद की यह कमी सबसे पहले वर्किंग मेमोरी को प्रभावित करती है, जिससे हाल की बातचीत, अपॉइंटमेंट या निर्देश याद रखने में कठिनाई होती है. अगर नींद की क्वालिटी खराब है, तो ब्रेन नई जानकारी को बचाने में असमर्थ हो जाता है, जिससे सोचने की क्षमता भी धीमी पड़ जाती है.

आज हम फोन नंबर याद नहीं रखते और नेविगेशन के लिए पूरी तरह ऐप्स पर निर्भर हैं. इस डिजिटल निर्भरता ने हमारे मस्तिष्क को स्कैनिंग और स्क्रॉलिंग का आदी बना दिया है, लेकिन डीप रिकॉल की क्षमता को कम कर दिया है. इसके अलावा डिप्रेशन और एंजायटी जैसे फैक्टर्स की याददाश्त को प्रभावित करते हैं. मानसिक तनाव सीधे तौर पर निर्णय लेने और एकाग्रता की शक्ति को कम कर देता है. जब व्यक्ति का मूड बेहतर होता है, तो उसकी याददाश्त भी अपने आप सुधरने लगती है. इसके अलावा कम उम्र में ही हाई बीपी, डायबिटीज और मोटापे जैसी बीमारियों का बढ़ना मस्तिष्क की सेहत के लिए चिंताजनक है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आप चाबियां कहीं रखकर भूल जाते हैं, तो यह सामान्य है, लेकिन अगर आप चाबियों का इस्तेमाल करना ही भूल जाएं, तो यह गंभीर चेतावनी हो सकती है.

डॉक्टर का कहना है कि 30 की उम्र में होने वाले कॉग्निटिव स्ट्रेन को रिवर्स किया जा सकता है. दरअसल यह मस्तिष्क की कमजोरी नहीं, बल्कि इसके अति-उत्तेजित होने का संकेत है. नियमित और गहरी नींद, डिजिटल डिटॉक्स, एरोबिक एक्सरसाइज, संतुलित पोषण और तनाव प्रबंधन के जरिए कुछ ही महीनों में याददाश्त में काफी सुधार किया जा सकता है. अगर हम अपने मस्तिष्क का सही ख्याल रखें, तो वह पूरी क्षमता के साथ प्रतिक्रिया देता है. अगर सभी चीजें ठीक होने के बावजूद अगर आपको याददाश्त से जुड़ी समस्याएं पैदा होती हैं, तो इस बारे में डॉक्टर से मिलकर कंसल्ट करें.

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The Science of Brain Fog: जब व्यक्ति बुजुर्ग हो जाता है, तब उसकी याददाश्त कमजोर होने लगती है. यह उम्र का एक असर होता है और कई अन्य कारण भी इस परेशानी को बढ़ा देते हैं. मगर आजकल 30 से 40 साल की उम्र के लोग छोटी-छोटी चीजों को भूल रहे हैं और उनकी याददाश्त कमजोर होती दिख रही है. लोग अपने ऑफिस की चीजों से लेकर घर के कई जरूरी काम भूल जाते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह ब्रेन से जुड़ी किसी बीमारी का संकेत है? हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो युवाओं में भूलने की समस्या आमतौर पर कोई बीमारी नहीं होती है. आजकल की मॉडर्न लाइफस्टाइल और वर्कलोड के कारण ऐसा हो रहा है. अत्यधिक तनाव, अधूरी नींद और डिजिटल ओवरलोड के कारण हमारा ब्रेन थका हुआ महसूस कर रहा है.

जयपुर के सीके बिरला हॉस्पिटल के न्यूरोसाइंसेस डिपार्टमेंट के डायरेक्ट डॉ. अंजनी कुमार शर्मा ने TOI को बताया कि आज के दौर में हमारा ब्रेन सूचनाओं की बाढ़ से घिरा हुआ है. 90 के दशक में एक कर्मचारी के पास सीमित डिजिटल इनपुट होते थे, लेकिन आज हर कुछ मिनटों में नोटिफिकेशन, ईमेल, व्हाट्सएप मैसेज और सोशल मीडिया अलर्ट्स ध्यान भंग करते हैं. याददाश्त बनाने के लिए एकाग्रता जरूरी है. जब हमारा ध्यान बार-बार डिस्टर्ब होता है, तो ब्रेन जानकारी को ठीक से एनकोड नहीं कर पाता. 30 की उम्र में याददाश्त की शिकायतें अक्सर एकाग्रता की कमी, विटामिन B12 की कमी, थायराइड डिसऑर्डर और स्क्रीन के ओवर एक्सपोजर के कारण होती हैं. अधिकतर मामलों में ऐसा किसी दिमागी बीमारी के कारण नहीं होता है.

डॉक्टर के मुताबिक तनाव केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि बायोलॉजिकल प्रक्रिया है. जब हम लगातार तनाव में रहते हैं, तो शरीर कोर्टिसोल नामक हार्मोन रिलीज करता है. कोर्टिसोल की ज्यादा मात्रा ब्रेन के हिप्पोकैम्पस हिस्से को प्रभावित करती है, जो याददाश्त का मुख्य केंद्र है. आज के युवा करियर, फाइनेंशियल प्रेशर और सामाजिक तुलना के बीच लगातार सर्वाइवल मोड में रहते हैं. इस मोड में मस्तिष्क नई यादें जमा करने के बजाय केवल खतरों को पहचानने को प्राथमिकता देता है. बार-बार मल्टीटास्किंग करने से जानकारी को गहराई से सहेजने की क्षमता कम हो जाती है, जिसे अक्सर लोग मेमोरी लॉस समझते हैं.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

याददाश्त को बेहतर बनाए रखने के लिए अच्छी नींद जरूरी है. गहरी नींद के दौरान ब्रेन दिन भर की जानकारियों को प्रोसेस और स्टोर करने का काम करता है. एक वयस्क को रोज कम से कम 7 घंटे की नींद की जरूरत होती है, लेकिन अधिकांश कामकाजी लोग केवल 5 से 6 घंटे ही सो पाते हैं. नींद की यह कमी सबसे पहले वर्किंग मेमोरी को प्रभावित करती है, जिससे हाल की बातचीत, अपॉइंटमेंट या निर्देश याद रखने में कठिनाई होती है. अगर नींद की क्वालिटी खराब है, तो ब्रेन नई जानकारी को बचाने में असमर्थ हो जाता है, जिससे सोचने की क्षमता भी धीमी पड़ जाती है.

आज हम फोन नंबर याद नहीं रखते और नेविगेशन के लिए पूरी तरह ऐप्स पर निर्भर हैं. इस डिजिटल निर्भरता ने हमारे मस्तिष्क को स्कैनिंग और स्क्रॉलिंग का आदी बना दिया है, लेकिन डीप रिकॉल की क्षमता को कम कर दिया है. इसके अलावा डिप्रेशन और एंजायटी जैसे फैक्टर्स की याददाश्त को प्रभावित करते हैं. मानसिक तनाव सीधे तौर पर निर्णय लेने और एकाग्रता की शक्ति को कम कर देता है. जब व्यक्ति का मूड बेहतर होता है, तो उसकी याददाश्त भी अपने आप सुधरने लगती है. इसके अलावा कम उम्र में ही हाई बीपी, डायबिटीज और मोटापे जैसी बीमारियों का बढ़ना मस्तिष्क की सेहत के लिए चिंताजनक है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आप चाबियां कहीं रखकर भूल जाते हैं, तो यह सामान्य है, लेकिन अगर आप चाबियों का इस्तेमाल करना ही भूल जाएं, तो यह गंभीर चेतावनी हो सकती है.

डॉक्टर का कहना है कि 30 की उम्र में होने वाले कॉग्निटिव स्ट्रेन को रिवर्स किया जा सकता है. दरअसल यह मस्तिष्क की कमजोरी नहीं, बल्कि इसके अति-उत्तेजित होने का संकेत है. नियमित और गहरी नींद, डिजिटल डिटॉक्स, एरोबिक एक्सरसाइज, संतुलित पोषण और तनाव प्रबंधन के जरिए कुछ ही महीनों में याददाश्त में काफी सुधार किया जा सकता है. अगर हम अपने मस्तिष्क का सही ख्याल रखें, तो वह पूरी क्षमता के साथ प्रतिक्रिया देता है. अगर सभी चीजें ठीक होने के बावजूद अगर आपको याददाश्त से जुड़ी समस्याएं पैदा होती हैं, तो इस बारे में डॉक्टर से मिलकर कंसल्ट करें.

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