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SC Industry Definition Hearing; Constitution Bench Udyog Word Hearing

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नई दिल्ली27 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच 17 मार्च से औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत ‘उद्योग’ शब्द को परिभाषित करने के विवादित मुद्दे पर सुनवाई शुरू करेगी। बेंच की अध्यक्षता CJI सूर्यकांत करेंगे।

16 फरवरी को कोर्ट ने तय किया था कि वह उद्योग की परिभाषा, सरकारी संस्थाओं की स्थिति, NGO/चैरिटी की भूमिका और 1978 के पुराने फैसले की समीक्षा जैसे अहम मुद्दों पर यह बेंच फैसला सुनाएगी।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि इससे तय होगा कि कौन-कौन सी संस्थाओं पर लेबर लॉ लागू होंगे। क्या उद्योग की परिभाषा तय होने से कर्मचारियों के अधिकार (जैसे छंटनी, वेतन, यूनियन) प्रभावित होंगे।

9 जजों की बेंच में CJI सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल हैं। सुनवाई 18 मार्च को खत्म हो जाएगी।

उद्योग शब्द पर विवाद क्यों…

1978 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने ‘बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड’ मामले (1978) में उद्योग की विस्तृत परिभाषा दी थी। फैसले के पैराग्राफ 140 से 144 में कहा गया था कि जहां नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध है और कोई सेवा/काम होता है, वह उद्योग हो सकता है। इस परिभाषा की वजह से सरकारी विभाग, अस्पताल, स्कूल, NGO भी उद्योग माने जाने लगे और उन पर लेबर कानून लागू हो गए।

मई 2005 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(j) में उद्योग शब्द की परिभाषा की व्याख्या से जुड़े इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया था। बेंच ने कहा था कि बड़ी बेंच को सभी कानूनी सवालों के हर पहलू और गहराई पर विचार करना होगा।

इसके बाद 2017 में तत्कालीन CJI टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बेंच ने कहा था कि उसकी राय में, उसके सामने आई अपीलों को नौ जजों की बेंच के सामने रखा जाना चाहिए, क्योंकि इस मुद्दे के गंभीर और दूरगामी असर हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट इन मुद्दों पर देगा फैसला…

  • उद्योग की सही परिभाषा क्या हो: क्या हर तरह की संगठित गतिविधि को उद्योग माना जाए। या परिभाषा को सीमित किया जाए।
  • क्या सरकारी विभाग भी उद्योग हैं: क्या सरकार के विभाग जैसे नगरपालिका, अस्पताल, शिक्षा संस्थान) भी उद्योग माने जाएंगे, या इन्हें अलग रखा जाए।
  • गैर-लाभकारी संस्थाएं NGO उद्योग हैं या नहीं: क्या NGO, चैरिटी, ट्रस्ट जैसी संस्थाएं उद्योग की कैटेगरी में आएंगी।
  • श्रमिक-नियोक्ता संबंध: क्या केवल वही जगह उद्योग होगी जहां साफ तौर पर नियोक्ता-कर्मचारी में संबंध हो, या विस्तृत परिभाषा लागू होगी।
  • सॉवरेन फंक्शन का दायरा: सरकार के कौन-कौन से काम जैसे पुलिस, रक्षा उद्योग से बाहर रहेंगे।
  • 1978 के फैसले की समीक्षा: क्या 1978 में बेंगलुरु वाटर सप्लाई केस की व्यापक परिभाषा सही है, या उसे संबदला जाए, या उसका दायरा छोटा किया जाए।

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16 फरवरी को कोर्ट ने तय किया था कि वह उद्योग की परिभाषा, सरकारी संस्थाओं की स्थिति, NGO/चैरिटी की भूमिका और 1978 के पुराने फैसले की समीक्षा जैसे अहम मुद्दों पर यह बेंच फैसला सुनाएगी।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि इससे तय होगा कि कौन-कौन सी संस्थाओं पर लेबर लॉ लागू होंगे। क्या उद्योग की परिभाषा तय होने से कर्मचारियों के अधिकार (जैसे छंटनी, वेतन, यूनियन) प्रभावित होंगे।

9 जजों की बेंच में CJI सूर्यकांत, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल हैं। सुनवाई 18 मार्च को खत्म हो जाएगी।

उद्योग शब्द पर विवाद क्यों…

1978 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने ‘बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड’ मामले (1978) में उद्योग की विस्तृत परिभाषा दी थी। फैसले के पैराग्राफ 140 से 144 में कहा गया था कि जहां नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध है और कोई सेवा/काम होता है, वह उद्योग हो सकता है। इस परिभाषा की वजह से सरकारी विभाग, अस्पताल, स्कूल, NGO भी उद्योग माने जाने लगे और उन पर लेबर कानून लागू हो गए।

मई 2005 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 2(j) में उद्योग शब्द की परिभाषा की व्याख्या से जुड़े इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया था। बेंच ने कहा था कि बड़ी बेंच को सभी कानूनी सवालों के हर पहलू और गहराई पर विचार करना होगा।

इसके बाद 2017 में तत्कालीन CJI टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बेंच ने कहा था कि उसकी राय में, उसके सामने आई अपीलों को नौ जजों की बेंच के सामने रखा जाना चाहिए, क्योंकि इस मुद्दे के गंभीर और दूरगामी असर हो सकते हैं।

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  • उद्योग की सही परिभाषा क्या हो: क्या हर तरह की संगठित गतिविधि को उद्योग माना जाए। या परिभाषा को सीमित किया जाए।
  • क्या सरकारी विभाग भी उद्योग हैं: क्या सरकार के विभाग जैसे नगरपालिका, अस्पताल, शिक्षा संस्थान) भी उद्योग माने जाएंगे, या इन्हें अलग रखा जाए।
  • गैर-लाभकारी संस्थाएं NGO उद्योग हैं या नहीं: क्या NGO, चैरिटी, ट्रस्ट जैसी संस्थाएं उद्योग की कैटेगरी में आएंगी।
  • श्रमिक-नियोक्ता संबंध: क्या केवल वही जगह उद्योग होगी जहां साफ तौर पर नियोक्ता-कर्मचारी में संबंध हो, या विस्तृत परिभाषा लागू होगी।
  • सॉवरेन फंक्शन का दायरा: सरकार के कौन-कौन से काम जैसे पुलिस, रक्षा उद्योग से बाहर रहेंगे।
  • 1978 के फैसले की समीक्षा: क्या 1978 में बेंगलुरु वाटर सप्लाई केस की व्यापक परिभाषा सही है, या उसे संबदला जाए, या उसका दायरा छोटा किया जाए।

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